Sunday, January 27, 2019

सुनो, तुम अब कहानियाँ नहीं लिखना


वो जनवरी का कोई दिन रहा होगा. सुबह से बारिश हो रही थी. लड़की को वैसे तो जनवरी की बारिश खूब अच्छी लगती थी और वो उसे खूब एन्जॉय करती थी, लेकिन आज जाने क्यों वो कुछ परेशान सी थी. लड़के ने पिछले शाम भी ये बात गौर की थी. उसने वजह जानने की  बहुत कोशिश की थी, लेकिन हमेशा की तरह लड़की ने उसे कुछ बताया नहीं.

दोपहर जब बारिश रुकी और हलकी धूप निकल आई, तो लड़के ने जानबूझ कर लड़की के साथ बाहर लंच करने का प्रोग्राम बना डाला. उसने सोचा कि बाहर घूमने के बहाने शायद लड़की का मन कुछ हल्का हो जाए और अपने मन में अटकी बात वो उसे बता सके.

धूप निकल आने के बावजूद बाहर हवा बेहद सर्द चल रही थी. वैसे तो ऐसे मौसम दोनों को पसंद आते थे, और लड़की तो बस ताक में रहती थी कि कब मौसम ऐसी करवट ले और उसे लड़के के साथ शहर घूमने का बहाना मिले. लेकिन उस दिन भी वो पिछली शाम की ही तरह एकदम गुमसुम सी थी.

कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल के गलियारे में वे टहल रहे थे. लड़का समझ ही नहीं पा रहा था कि लड़की के परेशानी का सबब उससे कैसे पूछे. लड़की जब भी चुप-सी हो जाती थी, तब लड़का बड़ा असहाय सा महसूस करता था. वो समझ ही नहीं पाता कि बात शुरू कहाँ से की जाए.

रीगल से होते हुए कस्तूरबा गांधी मार्ग को पार कर के वे दोनों बाराखम्बा रोड के पास आ गए थे. उनके सामने स्टेट्समैन बिल्डिंग थी. वहां कुछ टूरिस्ट थे जो अपने कैमरे से उस बिल्डिंग की तस्वीरें खींच रहे थे. पहले अक्सर वे दोनों इस बिल्डिंग के सामने एक बुकस्टोर के पास मिलते थे. उन दिनों लड़का इसी बिल्डिंग में एक टेम्पररी जॉब करता था और लड़की हर शाम उससे मिलने यहाँ चली आया करती थी. एक मजेदार वाकया उन दिनों हुआ करता था. हर रोज़ लड़का अपने सस्ते मोबाइल के कैमरे से स्टेट्समैन बिल्डिंग की तस्वीर क्लिक करना चाहता और हर बार मन माफिक तस्वीर न आने पर खींची गयी तस्वीर को मोबाइल से डिलीट कर देता. लड़की उससे कहती कि देखना एक दिन तुम्हें एक प्रोफेशनल कैमरा गिफ्ट करुँगी, तब क्लिक करना यहाँ की तस्वीर.

इतनी देर से चुप सी चलती जा रही लड़की ने अचानक ये बात लड़के को याद दिलाई. लड़के को लगा, मौका अच्छा है...पुरानी बातों के ज़िक्र से शायद लड़की का मूड वापस नार्मल हो जाए, सो उस ने उसे जानबूझ कर एक ताना मार दिया, "जब ये बात याद आ ही गई है तो बताओ, कब गिफ्ट कर रही हो कैमरा...? कितने साल से ड्यू है..." उम्मीद तो उसे यही थी कि लड़की उसके इस ताने का कुछ करारा जवाब देगी, पर हुआ उल्टा... लड़की ने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा कर रह गई. लड़का भी थोड़ा क्लूलेस सा महसूस करता हुआ चुप हो गया.

स्टेट्समैन बिल्डिंग के ठीक सामने एक कैफ़े था जो कुछ महीने पहले ही खुला था. बाहर की ठंड से बचने के लिए और पैरों को थोड़ा आराम देने के लिए दोनों उस कैफ़े के अन्दर आ गए. जब से ये कैफ़े खुला था, तब से लड़का अक्सर यहाँ आया करता था. यहाँ का लगभग पूरा स्टाफ लड़के को नाम से जानता था.

लड़की को इस कैफ़े की कोई जानकारी नहीं थी. ये कैफ़े तब खुला था जब लड़की दूसरे शहर जा चुकी थी. वे दोनों जब कैफ़े में दाखिल हो रहे थे, तो लड़की को ये देख बड़ी हैरत हुई कि दरवाज़े पर खड़े दरबान ने लड़के के नाम के साथ उसे 'सर' लगा कर संबोधित किया और एक कड़क सलाम ठोका.

कैफ़े बाहर से दिखने पर ज्यादा बड़ा नहीं दिखता था, लेकिन अन्दर जाते ही पता लगता कि वो एक दो मंजिला कैफ़े था, नीचे के फ्लोर पर काउंटर, किचन और कुछ टेबल कुर्सियां लगी हुई थी. ऊपर का फ्लोर नीचे से ज्यादा बड़ा था और वहाँ की सीटिंग अरेंजमेंट और अम्बिएंस बेहतर थी. आम तौर पर दोपहर के इस वक़्त कैफ़े वाले ऊपर वाले फ्लोर को बंद रखते थे. नीचे के फ्लोर पर बैठने की जगह जब भर जाती, तभी ऊपर के फ्लोर को वे खोलते थे.

लड़की ने अपर फ्लोर की सीढ़ियों पर “क्लोज्ड” का बोर्ड लगा देखा और लड़के को नीचे ही बैठने के लिए कहा, लेकिन लड़के ने बोर्ड की परवाह नहीं की और उसे किनारे हटा कर ऊपर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा. एक पल तो लड़की वहीं ठिठकी खड़ी रही, फिर लड़के के पीछे पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी...

“सुनो, आर यू श्योर? ये लोग कुछ कहेंगे नहीं...?” लड़की ने लड़के से पूछा.
“न...कोई कुछ नहीं कहेगा...यहाँ मुझे सब जानते हैं...कम ऑन!”लड़के ने बेपरवाही से जवाब दिया.

“सब जानते हैं... मतलब? तुम क्या दिन भर यहीं बैठे रहते हो? या रोज़ नई लड़कियों को लाइन मारने के चक्कर मे यहाँ वेटर की नौकरी कर ली?" सहसा अपने चुप्पेपन से बाहर निकल लड़की ने लड़के को छेड़ते हुए पूछा.

उसकी बात सुन लड़का हँसने लगा. नीचे फ्लोर पर काउंटर के ठीक आगे लगी एक टेबल की तरफ इशारे करते हुए उसने कहा, “उस स्पॉट को देख रही हो, मैं अक्सर वहीं बैठता हूँ. कुछ महीने पहले मैं हर सुबह यहीं कॉफ़ी पीने आ जाया करता था, तब से यहाँ मैं रेगुलर हूँ”, लड़के ने कहा.

“लेकिन रेगुलर तो और भी कई होंगे न. यहाँ तो दरबान ने तुम्हें सलाम ठोका, काउंटर पर बैठी लड़की ने स्माइल किया, और तुम इतने कॉंफिडेंटली ऊपर आ गए. इतने अच्छे से ये तुम्हें कैसे पहचानते हैं?” लड़की ने फिर से सवाल दोहराया.

लड़का मुस्कुराने लगा, “दरअसल ये मेरे किस्सों से मुझे पहचानते हैं?”

“किस्सों से? ओह गॉड!! तुमने यहाँ भी सबको अपनी कहानियाँ पढ़ानी शुरू कर दी क्या?” लड़की ने माथे पर हाथ मारते हुए पूछा.

“इन्हें मैं कहानियाँ पढ़ाता नहीं, किस्से सुनाता हूँ?” लड़के ने मुस्कराते हुए कहा तो
लड़की थोड़ा कन्फ्यूज्ड सी हो गयी, “सुनाता हूँ मतलब? कौन से किस्से सुनाते हो?” लड़की उसे थोड़ा शक़ की निग़ाह से ताक रही थी.

लड़का अब भी मुस्करा रहा था, “तुम्हें क्या लगता है, कैसे और किसके किस्से सुनाऊँगा मैं...? प्यार के किस्से... तुम्हारे और मेरे किस्से...बस यही सुनाता हूँ मैं”

“तुम्हारे और मेरे किस्से?? व्हाट डू यू मीन?” लड़की थोड़ी देर तक असमंजस में लड़के को देखती रही... “क्या सुनाते हो मेरे बारे में तुम?”

“तुम्हारी शरारतों के, बदमाशियों के और तुम्हारी तरह तरह की प्यारी बातों के किस्से कहता हूँ इनसे...यहाँ तक कि तुम्हारी बेवकूफियों के किस्से भी पता हैं इन सबको..."

लड़के को लगा था, लड़की उसका हाथ थाम अपनी उदासियों के भँवर से बाहर निकल आई है, पर वह ग़लत साबित हो गया... वह फिर खामोश हो गई थी, बस कॉफ़ी के कप के चारो तरफ गोल गोल अपनी उँगलियाँ घुमाते रही. “क्या ये जानते हैं मुझे? मुझे पहचानते हैं ये?” कुछ देर बाद लड़की ने धीमे से लड़के से पूछा.

लड़का मुस्कुराने लगा... “वो देखो, बिलिंग काउंटर पर जो लड़की बैठी है न, निशा... मैंने उसे तुम्हारी कोई तस्वीर नहीं दिखाई है, लेकिन फिर भी उसने तुम्हें देखते ही पहचान लिया. मैं जब आर्डर दे रहा था, तब उसने मुझसे पूछा था, "इज शी हर?”

लड़की चुप सी रही. लड़के ने ही बात आगे बढ़ाई, “जानती हो, इस कैफ़े में तुम्हारे किस्से ये लोग खूब पसंद करते हैं. अक्सर सुबह सिर्फ मैं यहाँ आता हूँ और जब भी तुम्हारे किस्से सुनाता हूँ ये लोग मंत्रमुग्ध होकर तुम्हारे बारे में सुनते हैं, थोड़ी इर्ष्या भी होती है इन्हें हमसे... एक दिन निशा ने मुझसे कहा था, बहुत ही किस्मतवाली हैं आपकी दोस्त, जो उन्हें आप जैसा साथी मिला है...और आपको उनका साथ...पता है, जिस दिन से इनको ये पता चला कि मेरी कहानियों की एक किताब छपवाने का तुम्हारा सपना है, तब से ये लोग मेरे पीछे पड़ गए हैं कि इस साल तो मेरी किताब पब्लिश हो ही जानी चाहिए... बोलो, तुम क्या कहती हो?”

लड़के की बातों का जवाब देने के बजाये लड़की थोड़ा परेशान सी हो गयी. वो इधर उधर ताकने लगी फिर उसकी नज़र नीचे काउंटर पर बैठी उस लड़की पर अटक गयी... “सुनो, एक बात कहूँ तुमसे? तुम अब कहानियाँ नहीं लिखना, मेरे किस्से तो बिलकुल नहीं...”

“अरे, तुम्हें क्या हो गया अचानक? ऐसे क्यों कह रही हो?”लड़का उसके जवाब से थोड़ा शॉक्ड हो गया था...वह बेहद हैरत में देखने लगा उसे.

“तुम्हें याद है कल दोपहर जब हम लोदी गार्डन में थे. हम दोनों घास पर लेटे हुए थे.. फिर तुम उठ कर सामने लगी एक बेंच पर बैठ गए थे. तुम्हारे बैग की उपरी  चेन में एक किताब रखी थी, जिसकी एक कहानी पर तुमने बुकमार्क लगाया हुआ था. मैं वही कहानी पढ़ने लगी थी. ज्यादा लम्बी कहानी नहीं थी,  लेकिन खत्म होने पर जाने क्यों मेरा दिल बैठ सा गया. वो कहानी जिस लेखक के बारे में थी, वो और तुम मुझे एक से ही लगते हो, एकदम ज़ेरॉक्स कॉपी. उसे भी दुनिया से कोई मतलब नहीं था और हजारों के भीड़ में अकेला एक चेहरा.

“बस इसलिए?” लड़के ने मुस्कुराने की कोशिश की...

“तुम्हें पता है, कहानी एकदम ठीक  चल रही थी और मैं भी ठीक थी. लेकिन आखिरी पन्ने पर जब पढ़ा कि उस लेखक की मौत हो गयी है तो जाने क्यों मुझे बड़ा अजीब सा लगा. एक अजीब-सा, न समझ आने वाला डर मन में समा गया है. कहानी जब खत्म हुई और मैंने तुम्हें आवाज़ दी, तो तुमने सुना ही नहीं, मेरे सामने बेंच पर बैठे होने के बावजूद जाने कहाँ देख रहे थे तुम. जिस तरफ तुम्हारी नज़रें थीं उस तरफ कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे तुम इतने ध्यान से देखते. मैंने तुम्हें पहले कभी ऐसे नहीं देखा. इतनी शांत और उदास नज़रें थी तुम्हारी कि मैं एकदम घबरा सी गई...और मेरी आँखों से आँसू निकल आए थे.”

लड़का कुछ देर के लिए उसे देखता रहा, “तो इस वजह से तुम परेशान थी...”

“जानते हो, उस कहानी में तुमने एक सेंटेंस पेन से अंडरलाइन की थी... 'सूखा क्या सिर्फ बाहर पड़ता है...' मैं बहुत देर तक इस एक वाक्य को देखती रही थी और फिर ना चाहते हुए भी मैंने उस लेखक और तुम्हें एक दूसरे से रिलेट कर लिया...उसके बाद कुछ ऐसी बातें मन में उठने लगी कि मेरा मन दहल सा गया और पूरी रात जाने क्या क्या मैं सोचती रही..."

लड़का कुछ देर तक कुछ भी कह नहीं सका, बस उसके काँपते हाथों पर उसने अपना हाथ रख दिया, “वो बस एक कहानी थी...” लड़के ने कहा.

“और ये ज़िन्दगी है...” लड़की ने लड़के की बात को काटते हुए कहा, “इसे ऐसे नहीं जिया जाता, जैसे तुम जीते हो...सब से कट कर, सब से लड़ कर...बस खुद में रहते हो...”

लड़के की हथेलियों के नीचे लड़की का हाथ अब तक काँप रहा था. उसकी आँखों से आँसू की एक दो बूँद लड़के की हथेलियों पर गिर आई थी. वो उसे समझाना चाहता था कि वो गलत सोच रही है. वो तसल्ली देना चाहता था लड़की को कि वो ठीक है...और उसे कोई तकलीफ नहीं है... लेकिन वो जानता था कि इस वक़्त लड़की उसकी कोई बात नहीं सुनेगी. वो जानता था कि लड़की को सबसे ज़्यादा तकलीफ लड़के के अकेले रहने से है, वो अक्सर कोई भी फिल्म देखती या अवसाद भरी कोई कहानी पढ़ती तो अनजाने ही उसके किरदार को वो लड़के से जोड़ लिया करती थी, और सोचती थी कि जो उन किरदारों के साथ होता है, लड़के के साथ भी अंत में वही सब होने वाला है....वो पागल थी, लड़के ने उसे कितनी बार समझाने की कोशिश की थी कि ये तुम्हारा वहम है...फिल्में या कहानियों में जो होता है, ज़रूरी नहीं कि किसी की असल जिंदगी में भी वैसा ही कुछ हो...लेकिन वो कभी कुछ सुनती नहीं थी. इसी लिए उस दिन लड़के ने उसे कुछ भी समझाने की कोशिश नहीं की, बस उसका हाथ थामे उसके सामने बैठा रहा.

लड़का लगातार लड़की को देख रहा था, लेकिन लड़की की नज़रें कैफ़े में किसी अदृश्य सी चीज़ पर टिकी थी. “मेरी बात मानोगे... तुम कभी अकेले मत रहना” लड़की की आवाज़ कांपने लगी थी...

इस बार लड़के की आँखों से न चाहते हुए भी आँसू निकल आये थे, वो उठ कर उसके पास आया और उसे गले से लगा लिया... लड़की ने कस कर उसे पकड़ लिया. जाने कितनी देर तक वो उसके कंधे पर अपना सिर टिकाये रोती रही थी.

लड़के ने खुद को सम्हालने के लिए खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की, पर शायद ये कॉफ़ी से उठते भाप का असर था या कुछ और...उसे कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था...
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Wednesday, January 16, 2019

लव इन दिसम्बर: साड़ी, कोहरा और उतरता बुखार


"तुम पागल हो क्या? बस कुछ ही दिन बचे हैं दिसम्बर में और तुम्हें अपनी नींद की पड़ी है? ज़ुकाम की चिन्ता है? शर्म आनी चाहिए तुम्हें..." कह कर उसनें गुस्से में फोन काट दिया.

मैं भी इधर गुस्से में रजाई तान कर फिर से सो गया. सुबह-सुबह उस बेवकूफ लड़की ने जगा दिया था ये कह कर कि आज फ़ॉगी मोर्निंग है तो हम घूमेंगे. दो दिन से बुखार और सर्दी ने तबाही मचा रखी है, और उसे ये पता भी है लेकिन फिर भी इस मौसम में उसे घूमने की पड़ी है. रात में इसी बात को लेकर लम्बी बहस हुई थी उससे और मैंने साफ़ कह दिया था कि अभी दो दिनों तक मुझे आराम करना है, घर पर ही रहूँगा. लेकिन वो तो अपने जिद पर अड़ी थी. सुबह से दूसरी बार उसनें कॉल कर के मेरी नींद ख़राब की थी.

मतलब कि हद है..किसी भी सेंसिबल इंसान से इस लड़की की ऐसी जिद के बारे में कहूँगा तो उसकी राय यही होगी कि ऐसी लड़की को फ़ौरन से पेश्तर दिमागी अस्पताल में दाखिल करवा देना चाहिए. दिसम्बर की कंकपाती ठंड और सुबह कोहरे में कौन घूमता है भला?

बहुत ज्यादा गुस्सा आया था उसपर. अच्छी खासी नींद की उसने बैंड बजा दी थी. सोने का मूड तो एकदम बिगड़ गया था, मैं गुस्से में बिस्तर से उठ कर तैयार होने लगा. उसे एक टेक्स्ट कर दिया कि एक घंटे में उसके घर पहुँच रहा हूँ. जवाब में उसने सिर्फ "लव यू" लिख कर भेज दिया.

भयंकर ट्रिकबाज थी वो लड़की. हर तरह के ट्रिक वो जानती थी. उसे पता था कि चाहे मैं कितने भी गुस्से में रहूँ, उसके ये दो शब्द मेरे सारे गुस्से को बहा ले जाते हैं और मेरा मूड इन्स्टन्ट्ली ठीक हो जाता है. वो हमेशा इस ट्रिक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल करती थी. उस दिन भी उसके उस जवाब से मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी थी.

घर से निकलते वक़्त माँ ने पूछा कि इतनी ठंड में अचानक कहाँ निकल रहे हो? मैंने भी जल्दबाजी में कह दिया  कि एक इंटरव्यू है, शाम तक आऊँगा. शुक्र था कि माँ ने ये नहीं पूछा कि टी-शर्ट, जीन्स और जैकेट पहन कर कौन सा इंटरव्यू दिया जाता है?

बाइक पर पूरे रास्ते मेरी हालत ख़राब रही. हल्का बुखार अब भी था, और मैं बुरी तरह काँप रहा था. पूरे रास्ते मैं उसको कोस रहा था. खुद पर भी थोड़ा गुस्सा आ रहा था. कब तक उसकी ऐसी सनकी ज़िद और इलॉजिकल बातों के साथ मैं भी बहकते रहूँगा.

लेकिन  वो वक़्त भी कुछ ऐसा ही था कि जब ये सब करना अच्छा लगता था. गुस्सा होने, इरिटेट होने के बावजूद सुबह के कोहरे में कंपकपाते हुए चाय पीने में भी एक एडवेंचर महसूस होता था. एक अजीब तरह का सम्मोहन जैसा कुछ था. उसे भी ये पता था कि मैं चाहे कितना भी गुस्सा करूँ, सुबह उसके साथ घूमना मुझे भी पसंद था. वो अक्सर कहती थी कि तुम चाहे जितना कोस लो मुझे, पर मैं जब नहीं रहूँगी, तब तुम ये दिन याद करोगे और मेरी इस सनक को मिस करोगे.

कितनी सही थी वो...

मैंने दूर से ही उसे देख लिया था, और उसे  देखते ही मेरी हँसी छूट गयी थी. दिसम्बर की सुबह, कोहरा और कड़ाके की ठंड में वो पागल लड़की काले रंग की साड़ी और मैचिंग शाल पहन कर मिलने आई थी. दिल तो किया कि पूछ लूँ, यश चोपड़ा की किसी फिल्म का ऑडिशन देना है क्या?

मैंने जब जानना चाहा कि सुबह के कडकडाती ठंड में साड़ी पहनने की क्या वजह है? तो उसने बस दो शब्द का बेतुका सा जवाब दिया..."इट्स रोमांटिक.."

मैंने आगे और कोई सवाल नहीं पूछा. फ़िल्मी भूत चढ़ा हुआ था उसपर. उसे रोमांटिक फिल्मों की हर बात अच्छी लगती थी. हमेशा उन्हीं फिल्मों की नक़ल वो असल ज़िन्दगी में करती थी. मैंने खुद ही अंदाज़ा लगा लिया कि हो सकता है रात में इसनें फिर से 'चाँदनी' देख ली हो जिसमें श्रीदेवी साड़ी पहने स्विट्ज़रलैंड की वादियों में रोमांटिक गाने गाती है और इसी बात से इसने समझ लिया हो कि ठंड में साड़ी पहनना रोमांटिक होता है.

जो भी हो, आज इतने सालों के बाद सोचता हूँ तो लगता है कि उस सुबह ठंड में साड़ी पहन कर पार्क में टहलना उस लड़की की सनक हो सकती है, लेकिन मुझे उसका साथ उस सुबह बड़ा अच्छा लग रहा था. साड़ी में वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी. हल्का कोहरा, ठंड, दिसम्बर और वो मेरे साथ...इससे बेहतर सुबह और नहीं हो सकती.

वो मेरे साथ चलते हुए पार्क के पीछे वाले गेट के पास आ गयी थी. उससे जब पूछा कि इधर क्यों आई हो, तो उसने सिर्फ इतना कहा, "तुम्हें कुछ दिखाना है..."

हम पार्क के पिछले गेट से निकल कर सड़क पर आ गए थे. उसने सड़क के आखिरी छोर की तरफ इशारा करते हुए कहा, "हम उस मंदिर में जा रहे हैं." पहले तो मुझे लगा कि वो मजाक कर रही है. मेरी जानकारी में इस सड़क पर कोई मंदिर था ही नहीं, लेकिन कुछ दूर जाते ही मुझे एक मंदिर जैसा कुछ दिखने लगा.

जब पास आया तो मैं हैरान था. उस सड़क पर वाकई एक छोटा, लेकिन खूबसूरत मंदिर था, जिसके अस्तित्व के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी. उस सप्ताह मेरे मोहल्ले की ये तीसरी ऐसी चीज़ थी जिसके अस्तित्व के बारे में मुझे उससे पता चला था.

"तुम आजकल मेरे मोहल्ले की तहकीकात कर रही हो क्या? तुम्हें कैसे पता इस मंदिर के बारे में?" मैंने उससे सवाल किया.

वो हँसने लगी,  "ढूँढने जाओ तो भगवान खुद भी मिल जाते हैं दोस्त...तो ये तो सिर्फ उनका घर ही है"

भयंकर फ़िल्मी डायलॉग मारा था उसने, जिसे काउंटर करने में उस वक़्त मेरी ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी.

उस दिन कोई भी त्यौहार, पूजा, या ख़ास दिन नहीं था लेकिन मंदिर जाकर पूजा करने की क्या वजह थी, ये मैं अब तक नहीं जान सका हूँ. कुछ ऐसी बातें हुआ करती थी, जिसकी वजह वो मुझे भी नहीं बताती थी. उसने उस दिन बाकायदा पूजा करने की ठानी थी. पास के दूकान से बीस रुपये के लड्डू उसने खरीदे, दान पात्र में ग्यारह रुपये की दक्षिणा डाली और प्रसाद चढ़ाने के पहले मंदिर के पंडित को चेताया, "सिर्फ चार लड्डू हैं, इसे चढ़ाना नहीं है... बस भगवान के चरणों में रखकर मुझे वापस दे दीजिये..."

"दो मेरे-दो तुम्हारे, इन्हें बेवजह क्यों दूँ? है न?", उसने मेरी कानों में चुपके से कहा. मैं मुस्कुराने लगा. पंडित हमें हक्का बक्का सा होकर देख रहा था.

हम वहीं मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गए और लड्डू खाने लगे. मंदिर छोटा सही लेकिन बेहद खूबसूरत था, जिसकी देखभाल और साफ़ सफाई संभवतः कॉलोनी वाले करते होंगे. मंदिर के आगे एक छोटी सी बगिया बनी थी जिसे बाँस से घेरा गया था. एक कोने पर हैण्डपम्प था और वहीं थोड़ी दूर पर कुछ बच्चे खेल रहे थे.

"अच्छा सुनो, तुम्हे क्या लगता है? भगवान से कुछ माँगो तो क्या वो मन्नत पूरी होती है?" उसने पूछा.
"शायद... लेकिन यार, मैंने कभी आज तक ट्राई नहीं किया है. कुछ माँगा क्या तुमने?"
"हाँ..."
"क्या?"
"तुम न पक्का हँसोगे सुन कर. इक्स्ट्रीम्ली क्लीशे डायलॉग लगेगा तुम्हें, लेकिन आज मैंने मंदिर में भगवान से तुम्हें माँग लिया है, देखो अब पूरी होती है मेरी ये मुराद या नहीं. " लड्डू को चूहे की तरह कुतरते हुए उसने बिना मेरी ओर देखे ही जवाब दिया...पर इन सबकर बीच उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान लगातार खेल रही थी.

मैं ऐसे वक़्त पर हमेशा हल्का सा ब्लश करने लगता हूँ. उस वक़्त भी मैंने उसकी उस बात पर कोई भी रिएक्शन नहीं दिया, बस मुस्कुरा कर रह गया.

हम दोनों कुछ देर तक खामोश बैठे रहे. मैं हैण्डपंप के पास बच्चों को खेलते हुए देख रहा था और वो दूर आकाश में न जाने क्या तलाश रही थी.

"देखो उधर देखो तो क्या है?" उसने मुझे झिझोड़ते हुए कहा.  मेरी आँखों ने अनायास ही उसकी ऊँगली का अनुसरण किया, लेकिन उधर कुछ भी विशेष नहीं था... बस खुला आसमान था और कोहरे के छंटने के बाद दिसम्बर की धूप आकाश पर फैल आई थी.

कुछ देर तक हम दोनों आकाश की तरफ देखते रहे. मेरी तरफ देखते हुए उसने कहा, "मुझे ऐसा ही घर चाहिए, जहाँ धूप आती हो...बेशुमार... और मेरा बेडरूम ऐसा होना चाहिए जहाँ जब मेरी आँख खुले तो मुझे ये खुला आकाश दिखे...". उसकी ऊँगली अब तक आसमान में धूप से चमकते बादल के उस टुकड़े के तरफ इशारा कर रही थी जो कोहरे के बाद उभर आया था.

वो बहुत देर तक अपने उस ड्रीम हाउस के बारे में तरह-तरह की बातें बताती रही, जैसे वो एक शीशे के घर सा होगा और जहाँ से पूरा आसमान दिखता हो. रात में जब वो सोये तो उसे चाँद नज़र आये और धूप की पहली किरण से सुबह आँख खुले.

मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ कर वो मेरे साथ बहुत देर तक अपने उस सपनों के घर के बारे में बातें करती रही. उस घर को सजाती रही जो उस वक़्त था ही नहीं और जिसके होने की शायद कोई उम्मीद भी नहीं थी. अपने ड्रीम हाउस की बातें करते हुए वो थोड़ी संजीदा हो गयी थी.

हम शायद बहुत देर तक वहाँ बैठे हुए बातें करते रहते लेकिन धूप के बावजूद हवा काफी सर्द चल रही थी. वो तो इत्मिनान से बैठ कर बातें कर रही थी लेकिन बुखार और जुकाम की वजह से मुझसे बैठा नहीं जा रहा था. मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, "यार चलो कहीं किसी रेस्टुरेंट में बैठकर कॉफी पिया जाए...ये हवा तो मेरी जान ले लेगी.."

वो मेरे तरफ देखकर हँसने लगी... "इतना अच्छा मौसम है और तुम कंपकपा रहे हो? तबियत तो ठीक है न?".

उसकी इस बात पर गुस्सा आने के बजाये मेरी हँसी छूट पड़ी..."हाँ बिलकुल... तबियत एकदम बढ़िया है, बस सौ डिग्री बुखार है, सर्दी और ज़ुकाम है...बाकी सब बढ़िया..."

"अच्छा... तभी तुम्हारी नाक इतनी लाल हो रखी है? बताओ...मुझे तो लगा कि यू हैव पेंटेड योर नोज रेड...", कह कर वो जोर से हँसने लगी. वैसे तो उसके इस मजाक से मुझे गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन जाने उस सुबह में क्या बात थी, या मंदिर का कोई असर था, कि मैं फिर हँसने लगा था.

वो मेरे बगल से उठ कर ठीक मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी. मेरी नाक को अपनी दोनों उँगलियों से पकड़ लिया..."अरे यार, तुम्हारी नाक तो एकदम अन्टार्टिका हो रही है... और तुम्हारा माथा भी तप रहा है... रुको रुको, मैं कुछ करती हूँ..." कह कर वो वहाँ खड़ी कुछ सोचने लगी..

मुझे उसकी हरकतों पर बड़ी हँसी आ रही थी, जिसे मैं नकली गम्भीरता के आवरण में छुपाए हुए था. मेरे सामने खड़े होकर वो कभी मेरी नब्ज़ देखती तो कभी मेरे कान, तो कभी मेरी आँखों का निरिक्षण करती. फिर अंत में उसने मेरे माथे पर अपना हाथ रखा और अपनी आँखें बंद कर के कुछ बुदबुदाने लगी, ठीक वैसे ही जैसे कोई तांत्रिक मंतर पढता है. बहुत देर तक वो अपने हाथों को मेरे माथे पर रखी रही, और जब उसका मंतर पढ़ना खत्म हुआ तो उसने अपनी आँखें खोली, "नाऊ यू आर कम्प्लीटली हील्ड, डॉक्टर के पैसे बच गए तुम्हारे, मुझे बस कॉफ़ी पिला देना", कह कर वो बड़ी मासूमियत से मुस्कुरा रही थी.

उसे ये नौटंकी करते देख मुझे उस समय उस पर बड़ा प्यार सा आ रहा था. एक बच्चे की तरह वो मुस्कुरा रही थी. मेरा ये भ्रम हो सकता है या शायद सच्चाई रही हो, पता नहीं लेकिन मुझे लगा कि उसका हाथ माथे पर लगते ही मेरा बुखार उतरने लगा है और मैं काफी हल्का महसूस कर रहा हूँ. हम मंदिर की सीढ़ियों से उठ खड़े हुए और कॉफ़ी के लिए एक रेस्टुरेंट की तरफ बढ़ गए. इस बार मैंने उसका हाथ पकड़ा हुआ था और मेरे ज़हन में उस वक्त एक यही पुराना शेर घूम रहा था.

"उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की"
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