Saturday, December 15, 2018

द रिकॉर्ड इज वन ट्वेंटी सेकंड - लव इन दिसम्बर - १५

सुनो, दिसम्बर की पहली तारीख है आज! याद है कुछ? याद है पहले जब हम साथ थे, हम दोनों मिल कर कैसे इस तारीख को सेलिब्रेट करते थे. देखो, ठीक वैसे ही आज पहली दिसम्बर सेलिब्रेट करने मैं सुबह सवेरे ही घर से निकल गया हूँ.

पता है, आज सड़कों पर खूब कोहरा भी था, और मुझे ये आश्चर्य वाली बात लगी. जानता हूँ, तुम कहोगी कि कोहरा सर्दियों में नहीं आएगा तो क्या जून की गर्मी में आएगा. लेकिन यहाँ कल तक कोहरे का नाम-ओ-निशाँ नहीं था और आज देखो सुबह से ही कैसा सड़कें कोहरे से ढँकी पड़ी हैं. दिसम्बर इफ़ेक्ट है ये...है न?

अच्छा एक बात बताना ज़रा, तुम्हें हमारे शहर की सर्दियाँ तो याद है न? याद है तुम्हें, पहले जब दिसंबर के किसी सुबह तुम्हें शहर में कोहरा नहीं दिखता था, तो तुम कैसे मेरी बैंड बजा दिया करती थी, जैसे कोहरा मेरे कहने पर आता था और मेरे कहने पर गायब हो जाता था. जानती हो, मैं तो हर रात सोने से पहले प्रार्थना करता था भगवान से, कि कुछ भी हो जाए, हर सुबह बस कोहरे के दर्शन करा दिया करो, वरना ये पागल लड़की मेरी बैंड बजाते रहेगी.

देखो, मैं अभी कनॉट प्लेस के उसी कैफ़े में आकर बैठा हूँ जहाँ हम दोनों ने जाने कितने कप कॉफी पी हैं. सच कहूँ तो मेरा यहाँ आने का आज कोई इरादा नहीं था, लेकिन जैसे ही मेट्रो के चार नंबर गेट से निकला तो इस कैफ़े पर नज़र गयी और कदम खुद ब खुद इधर की तरफ बढ़ते चले गए. अब मुझसे लड़ना मत तुम कि मैं अकेले इस कैफ़े में क्यों गया. करार कर रखा था न तुमने कि तुम्हारे बगैर मैं कभी इस कैफ़े में नहीं जाऊंगा. लेकिन यार, सच मानो, क़रार तोड़ने का मेरा ज़रा भी इरादा नहीं था. वो तो मजबूरी ये थी कि सुबह के इस वक़्त कोई और कैफ़े खुला भी तो नहीं रहता न.

इतवार का दिन है, सुबह के सात बज रहे हैं और कैफे पूरा खाली पड़ा है. वैसे भी इतवार को कोहरे वाली सुबह सिर्फ कॉफ़ी पीने इतनी दूर कोई क्यों आएगा भला? सब अपने घरों में कम्बल में पड़े होंगे, और मैं देखो बेवकूफों की तरह यहाँ चला आया.

तुम्हारी ही पसंदीदा जगह पर मैं बैठा हूँ. कैफे के दरवाज़े के बायीं तरफ के स्पॉट में, जहाँ बड़े शीशे वाली खिड़की है और यहाँ से कनॉट प्लेस का अच्छा ख़ासा नज़ारा दिखता है. यहाँ इन्हीं कुर्सियों पर हम सर्दियों की हर सुबह बैठा करते थे और कॉफ़ी पीते हुए अपने पुराने शहर की सर्दियों को और अहमद चचा के चाय को बड़ी शिद्दत से याद करते थे.

आज इस कैफ़े में मुझे कोई पहचान का चेहरा नहीं दिख रहा है. वैसे भी दो साल बाद यहाँ आ रहा हूँ मैं. शायद पुराने स्टाफ छोड़ कर चले गए, सिर्फ कैफे का दरबान वही है, लेकिन जब मैं आया तब उसने मुझे पहचाना भी नहीं.

वैसे भी यहाँ का पूरा स्टाफ तुम्हें पहचानता था और शायद जानने भी लगा था. मुझे तो कोई पहचानता भी नहीं था. तुम इस बात से शायद एग्री नहीं करोगी, लेकिन कई दफे इसके सबूत मिले हैं मुझे. याद है कैसे एक दफे जब वाईफाई का पासवर्ड पूछने तुमने मुझे काउंटर पर भेजा था? काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने मुझे पासवर्ड देने से मना कर दिया था, लेकिन फिर अगले ही पल तुम गई काउंटर पर और पासवर्ड लेकर आ भी गई थी. मैं आश्चर्यचकित था. दरबान भी हर बार तुम्हें सलाम ठोंकता, ‘वेलकम मैडम’, और मुझे तो बड़े आराम से वो इग्नोर कर देता था. मुझे हमेशा लगता रहा कि वो मुझे शायद तुम्हारा बॉडीगार्ड समझता होगा.

वैसे खैरियत है कि इस कैफ़े में कुछ भी नहीं बदला. टेबल कुर्सियां तक वही है जो पहले थीं. वरना इस कैफ़े से रिलेट करना थोड़ा मुश्किल हो जाता. यहाँ इस टेबल पर जहाँ अभी मैं बैठा तुम्हें खत लिख रहा हूँ और जहाँ हम दोनों अक्सर बैठते थे, यहाँ से कनॉट प्लेस का पार्किंग दिखता है. लेकिन जाने क्यों मुझे पहले जैसी हलचल यहाँ दिखाई नहीं दे रही है आज.

याद है पहले जब हम यहाँ आते थे तब यहाँ कॉलेज के लड़के लड़कियां टीम बना कर इसी पार्किंग में बैडमिंटन खेलते थे. कुछ लड़के तो यहाँ क्रिकेट भी खेलते थे. सुबह-सुबह यहाँ की पार्किंग पूरी खाली रहती थी और लोग इस खाली पार्किंग का भरपूर फायदा उठाते थे.


इस पार्किंग के एक तरफ कबूतर आए हुए थे. ठीक वैसे ही जैसे पहले आते थे. मुझे लगता है कि दिल्ली में सब कुछ बदल भी जाए लेकिन कबूतरों का कनॉट प्लेस में आना नहीं बदलेगा कभी. तुम्हें यहाँ सुबह कबूतरों को दाना खिलाना पसंद था न? मुझे याद है, कैफ़े में आने से पहले हर रोज़ तुम दस रुपये का दाना खरीदती और कबूतरों को खिलाती.

वैसे तो आधे से ज्यादा लोगों को कबूतरों को दाने खिलाने का शौक/बीमारी डी.डी.एल.जे से लगा था, लेकिन तुम्हारी इस आदत की वजह ये फिल्म नहीं, बल्कि एक कहानी थी.

एक दफे मैंने तुम्हें एक कहानी सुनाई थी. एक लड़का और लड़की की कहानी. दोनों हर सुबह कनॉट प्लेस आते थे और कबूतरों को दाना खिलाते थे. शुरू में वे दोनों एक दूसरे से अनजान थे और बस इत्तेफाकन हर दिन एक ही समय पर पहुँच जाते थे. धीरे धीरे लड़का और लड़की में बातें शुरू हुई और धीरे धीरे दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था. जाने क्यों ये दो लाइन की कहानी एक दिन तुम्हें मैंने तफसील से एक घंटे में सुनाई थी.

अक्सर तुम कहानियों से बोर हो जाया करती थी लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे तुम्हें ये कहानी बड़ी पसंद आई थी. हाउ रोमांटिक! तुम्हें कहा था, और तय किया था कि तुम भी अब से कबूतरों को दाना खिलाओगी.

ये सब छोटी छोटी बातें शायद मुझे याद नहीं रहती, लेकिन इसके लिए भी तुम्हें ही शुक्रिया कहना चाहूँगा मैं, कि तुमने मुझे जो डायरी दी थी उसमें ये सब बातें भी तुम दर्ज करते जाती थी. तुम अक्सर कहती थी, कभी तुम भूल भी जाओ मुझे तो ये डायरी तुम्हें मेरी याद दिलाएगी.

तुम्हारी वो डायरी भी लेकिन कमाल की थी. दिसम्बर की पहली तारीख ही थी जब तुमने मुझे ये कस्टमाइज्ड डायरी गिफ्ट की थी. इसे आज भी मैं हर समय अपने साथ रखता हूँ.

देखो, अभी भी टेबल पर ये डायरी मेरे सामने रखी हुई है. बड़े खूबसूरती से तुमने इसपर सुनहरे रंग से एन्ग्रेव करवाया था - टेंडर दिसम्बर. तुमने दिसम्बर को यही नाम दिया था न. और इसके नीचे लिखा था तुमने...स्टोरीज ऑफ़ यू, मी एंड दिसंबर...और इसके बिलकुल साथ में तुमनें मार्कर पेन से लिख दिया था, “ये हमारे दिन हैं...”

तुम्हारे हाथों से लिखे हुए ये चार शब्द कितने खूबसूरत लग रहे हैं अभी. कैफ़े के शीशे से हलकी धूप आना शुरू हुई है और इन्ही शब्दों पर उसकी चमकीली-सुनहरी किरणें गिर रही है, और ये सारे शब्द उनकी जगमगाहट में ठीक वैसे ही चमक रहे हैं, जैसे तुम्हारा चेहरा चमकता था सर्दियों की धूप में, जब तुम यहाँ मेरे सामने बैठे कॉफ़ी पी रही होती थी...उसी कुर्सी पर जो अब खाली है.

वो एक मोमेंट मुझे हमेशा बड़ा प्यारा लगता था, जब तुम यहाँ बैठे हुए कॉफ़ी पीती थी और खिड़की से झाँकते सूरज की किरणें तुम्हारे चेहरे को छूती थी. तुम्हारा गोरा चेहरा और खिल सा जाता था, और मुझे उस पल ये यकीन होता कि तुमसे ज्यादा प्यारा, खूबसूरत और खिला हुआ चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा है.

तुम्हारे चेहरे की तरफ मैं कभी ज्यादा देर एक टक से देख नही पाता था. वजह मुझे तो आज तक समझ नहीं आई, लेकिन भगवान जानें तुम्हें क्या समझ आ गया था जो तुम अक्सर इस बात पर मेरा मजाक भी उड़ा दिया करती थी.

देखो तो, इसी बात पर मुझे एक और किस्सा अभी याद आ रहा है. याद है उस सुबह हम दोनों यहाँ बैठे थे, और बातें कर रहे थे. तुम बार बार मुझे अपनी तरफ देखने के लिए कह रही थी लेकिन मेरी नज़रें तुम्हारे चेहरे पर ज्यादा देर टिक नहीं रही थी और मैं खिड़की की ओर देखने लगता था.

तुम मेरी इस बात से इरिटेट हो गयी थी और तुमने पूछ दिया था मुझसे, “कोई भूत छिप कर बैठा है क्या मेरी आँखों में?”

मैं तो एकदम हड़बड़ा सा गया था. “नहीं तो...”, लगभग लड़खड़ाते हुए मैंने कहा.

“तो फिर अपनी नज़रें तुम हमेशा दूसरी तरफ क्यों मोड़ लेते हो”, तुमने मुहँ बिचकाते हुए मुझसे सवाल किया था और फिर कॉफ़ी का सिप लेते हुए तुमने कहा, “वैसे आज पूरे एक सौ बीस सेकण्ड तक तुमने मेरी आँखों में देखा है...इट्स अ रिकॉर्ड यू नो...”

मैं हँसने लगा था तुम्हारी इस बात पर, "तुम क्या सेकेंड्स गिन रही थी?"

तुमने लेकिन फिर से रूठते हुए कहा था, "कम ऑन, यू कैन डू बेटर देन दिस..."

सच बताऊँ तो मैं थोड़ा ब्लश करने लगा था. कॉफ़ी का सिप लेते हुए और अपने ब्लश को छिपाते हुए मैंने फिर तुमसे कहा, "देखना, जिस दिन हमारी शादी होगी, ये जो आज का रिकॉर्ड है न, वो कुछ इस तरह टूटेगा कि उस वक़्त तुम शर्म से आँखें अपनी मोड़ लोगी और कहोगी मुझसे, अब बस भी करो मुझे यूँ देखना..."

मुझे लगा था तुम इस बात खुश हो जाओगी या जैसे दूसरी लड़कियां करती हैं, तुम शरमा जाओगी...लेकिन बस एक ठंडी उबासी लेकर तुमने कहा था...”विल सी...”

एक रूखी सी मुस्कराहट तुम्हारे आँखों से झाँकने लगी थी और मुझे अचानक गिल्ट सा होने लगा कि बेवजह मैंने शादी वाली बात तुमसे कर दी. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. मैं उस दिन तुमसे कुछ और भी कहना चाहता था, पर पता नहीं क्यों चुप रह गया.

जानती हो, अभी भी वही पन्ना मेरे सामने खुला है, जिसपर तुमने एक स्केच पेन से लिख दिया था-एंड द रिकॉर्ड इज वन ट्वेंटी सेकंड. और मजेदार बात देखो, कि वो रिकॉर्ड सच में उस दिन के बाद कभी टूट नहीं पाया.

इस पन्ने के नीचे तुमने कर्सिव राइटिंग में लिख दिया था, दिसम्बर जो प्यार का महीना है.. और नीचे मीना कुमारी की एक कविता जो तुम्हारी पसंदीदा थी..

यादें अचानक
मुकम्मल दर्द बन कर
हस्ती पर यूँ छा जाती हैं
जैसे
शदीद सर्द मौसम में
अचानक किसी पर
बर्फ़ीला पानी फेंका जाए...


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Edit and Inspiration - Priyanka Gupta 

1 comment:

  1. Bade dino babaad padha bhai tumko aisa laga meri bhi purani yaaden taaza ho gai

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