Saturday, March 3, 2018

मोहब्बतें वाली एक सुबह

दिसंबर का महीना था, और शहर से कोहरा और ठंड एकदम गायब थे. ऐसा लगता था जैसे वसंत का मौसम दिसंबर के महीने में शिफ्ट हो गया हो. तुम्हें बड़ा गुस्सा आ रहा इस बात से कि ठंड शहर से ऐसे दुम दबाकर भागी है कि वापस लौटने का नाम ही नहीं ले रही है. इसी गुस्से में तुमने अपने उस भारी बैग को घुमा कर मेरे कंधे पर दे मारा था. मौसम का सारा गुस्सा तुमने मेरे ‘बेचारे कन्धों’ पर निकाल लिया था. 

तुम्हारे गुस्से के सामने मेरी क्या, ठंड की भी नहीं चलती थी. वो भी शायद तुम्हारे गुस्से से घबरा कर अगले सुबह ही शहर में वापस दाखिल हो गई थी. तुम्हारा मूड अच्छा करने के उद्देश्य से मैंने सुबह के कोहरे में घूमने का प्लान बना लिया था. सुबह सवेरे ही हम दोनों बड़े स्टाइल में बाइक पर सवार होकर शहर घूमने निकले थे. पहला स्टॉप था अहमद चचा की चाय दुकान, जहाँ हमने सुबह चाय के साथ ब्रेड-बटर का नाश्ता किया था. तुम वहाँ खुद को चाय दुकान की मालकिन समझने लगी थी, और मुझे चाय दुकान में काम करने वाला मामूली सा छोटू. मुझसे उस छोटे से चाय दुकान की बेंचें इधर से उधर करवाने लगी थी तुम. एक पल तो मैं इस बात से भी डर गया कि कहीं तुम मुझसे वहाँ कप-प्लेट साफ़ करवाने न लग जाओ. लेकिन शुक्र था कि उस दिन तुमने ऐसी कोई हरकत नहीं की.

जब हम अहमद चचा की चाय दुकान से आगे बढे, कोहरा तब तक हल्का छंट चुका था, और तुम्हारा दिमाग भी थोड़ा ठंडा हो चुका था. तुम प्यारी प्यारी बातें करने लगी थी. लेकिन हवा अब भी जमा देने वाली चल रही थी. दस्ताने मैं घर पर भूल आया था, और ठण्ड से ऐसा लग रहा था जैसे कलाई हाथ से कट कर गिर जायेगी. लेकिन मेरे इस हालत से बेखबर तुम बड़े आराम से अपने दस्ताने पहन कर मेरे पीछे बैठी थी.

मुझसे एकदम सटकर बाइक पर बैठी थी तुम. अपने दोनों हाथों को मेरे पीछे से घुमा कर मेरे जैकेट के जेब में तुमने डाल दिया था. अपने चेहरे को मेरे कंधे पर ला रखा था तुमने. सोचता हूँ तो लगता है कि कैसा खूबसूरत और रोमांटिक सा मोमेंट बन गया था वो, लेकिन यार उस वक़्त मुझे वो पल रोमांटिक या खूबसूरत मोमेंट तो बिल्कुल नहीं लग रहा था. उस वक़्त तो मेरा पूरा ध्यान मेरे हाथों पर था, जो मुझे लग रहा था कि किसी भी समय कट कर गिर सकता है.

बाइक पार्क करने के समय मेरी कलाइयों की हालत ऐसी हो गयी थी, कि वो मुड़ ही नहीं रही थीं. जैसे-तैसे मैंने बाइक पार्क की. तुम्हें लेकिन मेरी ऐसी हालत पर ज़रा भी दया नहीं आ रही थी. बड़े प्यार से तुमने मेरे हाथों को अपने हाथ में लिया जरूर था. मुझे लगा शायद तुम्हें इस बात का अफ़सोस हो रहा है कि तुम्हारे पास दस्ताने थे और तुमने अपने दस्ताने मुझे नहीं दिए थे. लेकिन तुमने कुछ दूसरी बात ही पूछ ली थी मुझसे, और वो भी कितने इन्सेन्सटिव तरीके से. याद है तुम्हें क्या पूछा था तुमने मुझसे?

"यार तुम्हारे हाथ बर्फ से कैसे हो गए...? कुछ देर पहले तो ठीक-ठाक थे..."

तुम्हारे इस इन्सेन्सटिव सवाल को ‘पूछने’ में तुम्हारी गहरी बदमाशी छिपी हुई थी. मैंने भी मौके पर चौका मारते हुए तुम पर कमेन्ट मारा, "अरे, तुम्हें नहीं पता? मेरे हाथ अभी आधे घंटे के अंटार्टिका के शोर्ट टूर पर गए थे न, इसलिए ठंडे हैं.. "

अमूमन मेरे ऐसे तानों को तुम अनसुना कर देती थी या समझ नहीं पाती थी, लेकिन उस दिन तुम्हें पता चल गया था कि मैंने तुम पर एक ज़ोरदार कमेन्ट मारा है. तुमने भी एक ज़ोरदार धौल जमा दी थी मेरी पीठ पर, “सार्कैस्टिक होने की जरूरत नहीं, मैंने कहा था तुमसे क्या कि दस्ताने घर पर भूल आओ?”
मैंने तुमसे उस वक़्त कहा तो कुछ भी नहीं था, बस मन ही मन बुदबुदाने लगा था. “इतना तो हो न सका लड़की से कि खुद के दस्ताने मुझे दे दे पहनने के लिए और अब रौब दिखा रही है..” जानती हो उस वक़्त, ‘खुद को क्या समझती है/ कितना अकड़ती है’ वाला गाना भी मन के प्लेलिस्ट पर एकदम फुल वॉल्यूम में बजने लगा था.

उस सुबह तुम्हें कहाँ जाना था, कहाँ घूमने का प्लान बनाया था तुमने इस बात से मैं एकदम बेखबर था. तुम्हारे किसी प्लान में मैं कुछ भी अंदाज़ा लगाना नहीं चाहता था क्यूंकि हर बार मेरा अंदाज़ा गलत हो जाता था. अपने प्लान को लेकर तुम अव्वल नंबर की अन्प्रिडिक्टबल लड़की थी.

तुम पूरे स्टाइल में, दोनों हाथों को अपने जैकेट में डाल कर मस्ती से चल रही थी, और तुम्हारे ठीक पीछे मैं तुम्हारा बैग थामे चल रहा था.

पूरे गाँधी मैदान का हमने लगभग एक चक्कर लगा लिया था और एक्सबिशन रोड की तरफ पैदल चलते हुए आ गए थे. लेकिन आगे कहाँ जाना है, ये तुमने अब तक तय नहीं किया था. उस इलाके में वैसे तो कुछ रेस्टोरेन्ट और कैफ़े भी थे, लेकिन सुबह के वक़्त सभी बंद रहते थे. बारह बजे के पहले कोई भी रेस्टोरेन्ट खुलता नहीं था.

प्रकाश बिल्डिंग के पास आकर तुम रुक गयी थी. पहले तो मुझे लगा था कि तुम फिल्म देखना चाहती हो. प्रकाश बिल्डिंग के ठीक बगल में अप्सरा सिनेमा हॉल था. मुझे लगा था कि तुम वहाँ जाना चाहती हो. हालाँकि मैं जानता था कि उस सिनेमा हॉल में तुम्हें फिल्म देखना एकदम पसंद नहीं था.

तुमने लेकिन फिल्म देखने की बात को ख़ारिज कर दिया था. तुम्हारे मन में तो कुछ और ही बात मेरी-गो-राउंड खेल रहे थे.

"यार प्रकाश बिल्डिंग की छत पर चलोगे? " तुमने मुझसे पूछा था.

तुम्हारे इस सवाल पर मैं चौंक गया था. प्रकाश बिल्डिंग में पहले हम दोनों कोचिंग क्लास के लिए आते थे, और उन दिनों यहाँ का छत ही हमारा हैंगआउट पॉइंट हुआ करता था, जहाँ हम पूरी पूरी शाम बिता देते थे. इस बिल्डिंग में करीब आठ-दस कोचिंग क्लास चलते थे और लभग हर बच्चे शाम के वक़्त इस बिल्डिंग के छत पर बैठकर बातें या डिस्कशन करते थे. लेकिन कोचिंग खत्म होने के बाद कभी हम इस बिल्डिंग में आये ही नहीं थे.

मैंने थोड़ा शक भी जताया कि पता नहीं, छत खुली होगी भी या नही..छत की कंडीशन कैसी होगी?

तुमने लेकिन ठान लिया था कि छत पर जाना ही है, "चलो न, चल कर देख आते हैं..छत बंद होगी तो लौट आयेंगे" तुमने कहा और बिना मेरी प्रतीक्षा किये, बिल्डिंग की सीढियां चढ़ने लगी थी.

मैं भी तुम्हारे पीछे पीछे छत पर आ गया. छत खुली हुई थी, लेकिन छत की हालत बड़ी ख़राब थी. पहले ये छत कितना साफ़ हुआ करती थी, हम छत के फर्श पर ही कितनी बार बैठ कर गप्पें करते थे. लेकिन उस दिन की छत की हालत देख मुझे बड़ी दया आ गयी थी. याद है तुम्हें? गंदगी, धूल और बेकार सामानों से भरी हुई थी वो छत.

बहुत देर तक हम यूँ ही एक दूसरे का हाथ थामे वहाँ टहलते रहे थे. हवा काफी सर्द चल रही थी, लेकिन वो हमें परेशान नहीं कर रही थी. बल्कि हम दोनों एन्जॉय कर रहे थे हलके कोहरे और ठंड में टहलना.

मैंने एक बात हमेशा नोटिस की थी, कि इस छत पर आने के बाद तुम्हारे अन्दर कुछ तो बदल सा जाता था. ना तुम गुस्सा दिखाती, ना ही कोई हुक्म जारी करती, बस एकदम चुपचाप सी, अपने में ही खोयी रहती थी तुम. ऐसे में मुझे बड़ा प्यार आ जाता था तुम पर. उस छत में जरूर कुछ मैजिकल पॉवर रहे होंगे कि तुम एकदम बदल सी जाया करती थी. सिर्फ वही छत नहीं, हमारे बहुत से ऐसे स्पेशल अड्डे थे, जहाँ जाते ही तुम ट्रांसफॉर्म हो जाया करती थी. किन्ही ख्यालों में खो जाती थी तुम.

सीढ़ी के पास के कोने पर कुछ बेंच डेस्क और लकड़ी की टूटी कुर्सियां लगी थी और उनके ऊपर बहुत से सामान, टिन के खाली डब्बे, पेंट के खाली डब्बे, अल्युमुनियम के चद्दर, कुछ हार्ड प्लास्टिक के शीट्स वगैरह रखे हुए थे. छत का एकमात्र कोना था ये जो साफ़ सुथरा सा लग रहा था.

तुमने बेंच पर बैठने की अपनी इच्छा जाहिर की थी. बेंचों के ऊपर काफी सामान रखे थे और इन्हें देख ऐसा लग रहा था जैसे ये कुछ दिन पहले ही छत पर रखे गए होंगे, क्यूंकि इनपर धूल ज़रा भी नहीं जमी हुई थी.

तुमने एक बेंच खींचना चाहा तो उसके ऊपर रखे डब्बे एक साथ गिर पड़े. मैंने तुमसे कहा, कि तुम रहने दो मैं बेंच को बाहर निकाल लाता हूँ, लेकिन तुम्हारे अन्दर तो सब्र कभी रहा ही नहीं. खुद ही सभी डब्बों को इधर उधर करने लगी थी तुम. अल्युमुनियम के एक बड़े शीट को तुम उठा कर दूसरी तरफ रखना चाह रही थी. इतना बड़ा शीट, और इतनी छोटी तुम... संभल तो रहा नहीं था वो शीट तुमसे, और फिर भी लगी पड़ी थी तुम उसे वहाँ से हटाने में. इसी चक्कर में और तुमने उसे ऐसे घुमाया कि वो शीट सीधा मेरे बाँहों पर जाकर लगा था.

बड़ा तेज़ लगा था वो शीट बाँहों पर. दर्द भी हुआ था. वैसे तो जैकेट पहना हुआ था मैंने, लेकिन मुझे आभास हो गया था कि उसके नुकीले भाग से बाँहों पर खरोंच लग गयी है. मैंने लेकिन इस दर्द के तरफ ध्यान ही नहीं दिया, ना जाहिर किया इस दर्द को. मैं नहीं चाहता था कि उस सुबह तुम बेवजह किसी गिल्ट में आ जाओ.

डेस्क और बेंच पर बैठते ही तुमने अपना खज़ाना यानी अपना लैपटॉप-बैग खोला. डेस्क पर अपना लैपटॉप निकाल कर रख दिया था तुमने. कुछ चॉकलेट्स थे तुम्हारे बैग में पड़े हुए, वो भी निकाल कर तुमने डेस्क पर रख दिया. छत पर आते वक़्त हमने कुछ कचौड़ियाँ पैक करवा ली थी, उन्हें भी तुमने डेस्क पर रख दिया था.

मुझे यकीन तो था कि तुम इतनी तैयारी कर रही हो, जरूर कुछ अजीब आइडिया ही तुम्हारे मन में चल रहा होगा. लेकिन एक्ज़ैक्ट्ली क्या तुमने प्लानिग की है, ये मैं समझ नहीं पा रहा था.

अपने बैग से तुमने एक डीवीडी निकाला, और मुझसे पूछा, “मोहब्बतें देखें?” हालाँकि तुम ये बात मुझसे पूछ नहीं रही थी, मुझे बस इन्फॉर्म कर रही थी कि तुम मोहब्बतें देखोगी. मेरे मन में दस तरह के सवाल उठने लगे.. फिल्म? इस समय? छत पर इस तरह इस ठंड में? लेकिन तुमने मेरे इन सवालों की परवाह नहीं की और लैपटॉप में फिल्म की डीवीडी इन्सर्ट कर प्ले कर दिया.

हाँ, तुमने मुझे इतनी तसल्ली जरूर दी थी, “डोंट वरी, तुम्हें तीन घंटे नहीं बैठाऊंगी इधर.. एक-डेढ़ घंटे का ही बैकअप है लैपटॉप का, बस सिलेक्टेड सीन्स देखेंगे हम..”

दिसंबर की सुबह हलके कोहरे में छत पर यूँ फिल्म देखना पागलपन वाली बात थी. लेकिन इस फिल्म का गज़ब का क्रेज था तुम्हें. फिल्म मुझे भी पसंद आई थी, लेकिन इस फिल्म को लेकर तुम्हारा क्रेजिनेस एक अलग ही लेवल पर था. फिल्म को रिलीज़ हुए चार साल हो गए थे, तब हम इंटर के दूसरे वर्ष में थे और अब कॉलेज के तीसरे साल में, लेकिन अब तक ये फिल्म तुम्हारे दिल के बेहद करीब थी.

याद है तुम्हें, तुम मुझसे कैसे हमेशा कहती थी कि “जाओ, वो शहर ढूँढ आओ जहाँ इस फिल्म की शूटिंग हुई थी, उस कैफ़े का पता लगाओ जो उस फिल्म में दिखाया गया है. मुझे वो शहर घूमना है..” तुम्हें कितनी बार मैंने समझाया था, और कई दफे डांटा भी था ये कहते हुए कि वो कोई शहर नहीं है. फिल्म का सेट था वो. लेकिन तुम मेरी ये बात समझने के लिए कभी तैयार ही नहीं थी. तुम तो उलटे मुझे डांट कर चुप करवा दिया करती थी, “बात तो ऐसे कर रहे हो जैसे पूरा इंडिया घूम लिए हो, मैं जानती हूँ ऐसे शहर के बारे में.. मैंने पढ़ा है, बस नाम याद नहीं रहता मुझे...”

मुझे तुम्हारी इस बात पर हँसी आ जाया करती थी, मैंने तो तुम्हें कितनी बार ये कह कर छेड़ा भी था कि वो शहर सिर्फ तुम्हारे सपनों में इग्ज़िस्ट करता है, असल में नहीं. तुम बड़ी भयंकर इरिटेट होती थी मेरी इस बात से.

उस सुबह भी जब फिल्म के शुरूआती सीन में वो कैफे दिखा मुझे, दिल किया कि तुम्हें फिर से छेड़ूँ, लेकिन तुम एकदम डूबी हुई थी फिल्म में. तुमने कहा तो था कि सिलेक्टेड सीन्स देखोगी, लेकिन ‘राज आर्यन जब लड़कों से पहली बार मिलता है’, हर बार की तरह वहीं से तुमने फिल्म देखना शुरू किया था और वहाँ से तुम वो फिल्म लगातार देख रही थी, बिना फॉरवर्ड किये. डेस्क पर चॉकलेट और कचौड़ियाँ रखी हुई थी, लेकिन फिल्म का कुछ ऐसा असर था तुम पर, कि तुमने इनकी तरफ देखा ही नहीं.

इंटरवल से ठीक पहले वाले सीन में जब गुस्से में राज आर्यन प्रिंसिपल नारायण शंकर के ऑफिस में डायलॉगबाजी कर बाहर निकल आता है, और मेघा उसका हाथ थामे चलने लगती है, और बैकग्राउंड में “जिंदा रहती है मोहब्बतें..” गाना बजने लगता है.. ठीक उसी वक़्त लैपटॉप की बैटरी ने दम तोड़ दिया था. मूवी वहीं रुक गयी और लैपटॉप का स्क्रीन ब्लैंक हो गया था.

तुम कुछ देर तक लैपटॉप के ब्लैंक स्क्रीन की तरफ ही ताकती रही थी और फिर मेरी तरफ देखते हुए तुमने कहा था, “यार कितने दर्द के साथ राज कहता है न कि आपके वजह से मेरी मोहब्बत अधूरी रह गयी”

तुम्हारी इस बात पर मैंने हाँ में सर हिला दिया था. 

जब तुम किसी फिल्म में इस तरह डूब जाती थी, तो मैं कभी तुम्हारे इन बातों का मजाक नहीं उड़ाता था, हालाँकि तुम्हारे कुछ दोस्त और तुम्हारी बहनें जरूर तुम्हें चिढ़ाती थी ये कह कर कि तुम अव्वल नंबर की फ़िल्मी इमोशन गर्ल हो. लेकिन मुझे कभी भी तुम्हारी ये बातें बचकानी या फ़िल्मी नहीं लगती थी, बल्कि मुझे तो अक्सर हैरानी होती थी, कि तुम वो बातें इतनी आसानी से कैसे सोच लेती हो जिनकी तरफ आमतौर पर लोगों का ध्यान जाता ही नहीं कभी.

याद है तुम्हें, पहली बार जब हम ये फिल्म देख रहे थे अशोक सिनेमा हॉल में, तुमने कितना मजाक उड़ाया था इस फिल्म का? तुम्हें ये फिल्म पहली बार देखने में एकदम पसंद नहीं आई थी. तुमने तो यहाँ तक कह दिया था, कि पता नहीं ऐसी बकवास फ़िल्में बनती क्यों हैं? हीरो एक भूतनी से प्यार करता है. वो भूतनी बिना बताये कहीं भी हीरो के आसपास नाचने लगती है, और हीरो को डर भी नहीं लगता इस भूतनी से.

लेकिन बाद में जाने कब हुआ कि तुम्हें इस फिल्म से प्यार हो गया. याद करने की कोशिश करूँ तो मुझे कॉलेज में दाखिला लेने के ठीक पहले का दिन याद आता है. तुम्हारे लिए एक बुरा दिन था वो. तुम इमोशनली ड्रैन्ड थी उस दिन. कुछ दिन पहले ही तुम्हें मैंने मोहब्बतें फिल्म की डीवीडी गिफ्ट की थी, और उस रात उसी डिप्रेस्ड मूड में तुमने ये फिल्म देखी थी. उस रात के बाद से इस फिल्म के प्रति तुम्हारा परसेप्शन पूरी तरह बदल गया था.

रात के एक बजे तुमने मुझे कॉल कर के जगाया था, “सुनो, मैं समझ गयी हूँ अब. वो भूतनी नहीं थी जिससे राज प्यार करता था...वो मेघा थी. एकदम ऐश्वर्य राय जैसी दिखती है मेघा. कुछ कुछ मेरी जैसी भी..” और फिर तुमनें अगले दिन मुझसे पूछा था, “तुम्हें क्या लगता है? राज आर्यन कहाँ होगा इस वक्त? क्या उसी शहर में? अब भी मेघा आती होगी उससे मिलने?”

तुमने ये सब ऐसे कहा था उस दिन, कि एक पल तो मैं डर गया था कि तुम्हें ये क्या हो गया है. क्यों ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम. उस दिन के बाद से इस फिल्म के प्रति तुम्हारा क्रेजीनेस बढ़ते ही गया.

छत पर भी तुम उस सुबह इस फिल्म के पूरे असर में थी. लैपटॉप की बैटरी गुल हो चुकी थी लेकिन तुम पर फिल्म का नशा कुछ ज्यादा ही चढ़ गया था. छत पर तुम गुनगुनाते हुए इधर उधर एकदम वैसे ही डोल रही थी जैसे शराब के नशे में शराबी डोलते हैं. फिल्म के गाने को एक के बाद एक गा रही थी और बेहद खुश थी तुम.

मोहब्बतें के नशे में ही तुमने अपनी एक थ्योरी की याद मुझे दिलाई. तुम्हारी उस थ्योरी के मुताबिक कोई भी टॉप क्लास रोमांटिक मूवी तब तक पूरी नहीं होती जब तक उस फिल्म के साथ एक उतना ही टॉप क्लास रोमांटिक डिनर या लंच न हो. जब भी हम थिएटर से फिल्म देखकर निकलते थे, ये थ्योरी तुम हर बार दोहराती थी, ताकि फिल्म देखने के बाद तुम्हें मैं एक बढ़ियां लंच करवाऊं.

उस दिन भी तुमनें अपनी ये थ्योरी मुझे इसी वजह से सुनाई थी. वैसे सच तो ये है कि अगर तुमने अपनी इस थ्योरी की याद न भी दिलाई होती, तो भी मैंने तय कर रखा था कि लंच किसी बेहद अच्छे रेस्टुरेंट में ही करेंगे. पापा ने सुबह दो सौ रुपये थमाए थे, उनके शहीद होने का वक़्त आ गया था.

उस दिन जब हम प्रकाश बिल्डिंग से निकल आये थे, तो मैंने तुमसे पूछा था कि ये छत पर तुम रैंडमली आई थी या तुम्हारी पहले से प्री-प्लानिंग थी. तुमने लेकिन कहा कि छत पर जाना और फिल्म देखना पूरे तरह से रैंडम था. हालाँकि अभी तक मुझे ये शक होता है कि ये सब तुम्हारी प्री-प्लानिंग थी.

अगर तुमने पहले से तय भी कर लिया था तो मैं तो ये कहूँगा कि तुमने गज़ब की प्लानिंग की थी उस दिन. चाहे अहमद चचा के चाय दुकान पर तुम्हारा वो मुझे तंग करना हो या फिर एक बिल्डिंग के छत पर तुम्हारे मेरे पास मेरे कंधे पर सर टिका कर मोहब्बतें देखना या फिर एक खूबसूरत रेस्टुरेंट में लंच करना.. सब कुछ मेरे लिए मैजिकल था उस दिन.

शाम में जब मैं घर लौटा तब घर का माहौल नार्मल था. मुझे यकीन था कि पापा माँ जरूर मुझे डांटने के ताक में बैठे होंगे, और मेरी बदमाश बहन आग में घी डालने का अपना काम बखूबी कर रही होगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. पापा और माँ का मूड उस शाम बहुत अच्छा था. हालाँकि मेरी छोटी बहन ने जरूर शिकायत करनी चाही, ये कह कर कि जरूर भैया अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गया होगा, लेकिन इस बात का माँ पर कोई असर नहीं हुआ. वो फिर भी तरह तरह से मुझे फंसाने और डांट सुनवाने की पूरी कोशिश कर रही थी.

बहन की इस बदमाशी पर मैंने उसे डांटा तो उसने मेरी बाँहें मरोड़ दी थी. उसकी इस शरारत से अचानक बाँहों में बहुत तेज़ दर्द उठा. मुझे याद आया कि छत पर मुझे तुम्हारी हरकत से चोट लग गयी थी, जिसके बारे में मैं एकदम भूल सा गया था. मुझे लगा था कि वो मामूली खरोंच होगी. लेकिन जब मैंने जैकेट और शर्ट उतरा तो देखा घाव बहुत गहरा हो गया था, और शर्ट उस घाव से चिपक गए थे.

घाव गहरा तो था, लेकिन जाने क्यों मुझे दर्द नहीं हो रहा था. बल्कि आईने में उस घाव को देखकर मैं मुस्कुराने लगा था. मैं सोचने लगा आज की सुबह के बारे में, जो एकदम मैजिकल थी. तुम्हारी भाषा में कहूँ तो "आउट ऑफ़ दिस वर्ल्ड..."

मैं सोचने लगा क्या कोई विश्वास करेगा कि हमने एक ऐसी रोमांटिक सुबह एक मार्केट काम्प्लेक्स की छत पर बिताई थी, एक ऐसी सुबह जिसके बारे में जाने कितने लोग बस सपने में ही सोचते हैं. एक ऐसी सुबह, एक ऐसा दिन जो सिर्फ तुम्हारे साथ ही मुमकिन था...


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2 comments:

  1. कुछ पल जिनके हम सिर्फ़ सपने देखते हैं, वो ज़िंदा हो गए अभी अभी...

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जाकी रही भावना जैसी.... : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया