Wednesday, February 28, 2018

दिसंबर की एक सुबह - कोहरा, चाय और उसके नखरे

सुह जैसे ही मेरी आँखें खुली और मैंने खिड़की से बाहर देखा तो खूब घना कोहरा छाया हुआ था. मैं एकदम खुश हो गया. यही तो चाहती थी न तुम कि शहर में कोहरा वापस लौट आये? दिसम्बर के महीने में शहर से ठंड और कोहरा गायब थे, और तुम इस बात से इतने गुस्से में थी कि पिछली शाम मेरे कंधे पर अपना बैग दे मारा था. तुम तो रात भर रजाई में आराम से सोती रही होगी, लेकिन पूरे रात उस कंधे में मुझे दर्द होता रहा था. रात भर ठंड और कोहरे को बहुत कोसा था मैंने.

शायद मेरे कोसने का असर था या तुम्हारी डांट का, कोहरा अचानक से शहर में वापस लौट आया था. वैसे तो अमूमन जब भी इस ठंड और कोहरे का डेडली कॉम्बिनेशन सामने आता है, कोहरे में घूमने का प्लान तुम बनाया करती थी, लेकिन उस सुबह जाने क्या सनक सवार हो गई थी मुझपर, मैंने जोश में आकर तुम्हें फोन कर दिया था और घूमने का प्लान भी बना लिया था.


याद है न तुम्हें, घूमने की बात सुनकर तुम कैसे चहकने लगी थी? तुम्हें उम्मीद नहीं थी न कि मैं सुबह घूमने का प्लान बना सकता हूँ? लेकिन जानती हो, तुम्हें कॉल करने के बाद जब मैं अपनी बालकनी में गया तो एकदम ठिठुर गया था. मेरे अंदाज़े से कहीं ज्यादा ठंड थी. एक पल तो मैंने सोचा भी कि आज घूमना कैंसिल कर देता हूँ. तुम्हें समझा लूँगा, थोड़ा तुमसे डांट सुन लूँगा. लेकिन फिर अगले ही पल जाने क्या हुआ, मैं वापस कमरे में आया और जल्दी जल्दी तैयार होने लगा.

मुझे यूँ तैयार होता देख, पापा ने टोका, "इतनी सुबह इस ठंड में कहाँ जाने की तयारी कर रहे हो?"

मैं क्या कहता पापा से? कि तुमसे मिलने जाना है? मेरी वहीं पर इन्स्टन्ट्ली कुटाई हो जाती. मैंने पापा से सिर्फ इतना कहा "कुछ जरूरी काम है...निकालना पड़ेगा."

पापा ने हलकी डांट लगा कर मुझे रोकना चाहा, "अरे ऐसा क्या अर्जेंट काम है? कोहरा छँटने दो, तब चले जाना.." मैंने लेकिन पापा के इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और बस ये बोल कर कि मैं शाम तक लौटूंगा, घर से निकल आया.

मैं तो एकदम कॉंफिडेंट था कि शाम तक लौटने की बात सुन कर पापा और माँ दोनों से डांट सुनना तो तय है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दोनों में से किसी ने नहीं डांटा मुझे. पापा ने तो डांटने के बजाय मुझे सौ रुपये के दो नोट थमा दिए, ये कहते हुए कि रख लो..दिन भर बाहर रहोगे, कुछ काम आ जाएगा.

सुबह सुबह मुझे दो सौ रूपए पापा के तरफ से मिल गए थे. मैं तो एकदम सातवें आसमान पर पहुँच गया था. उन दिनों दो सौ रुपये में तो मैं तुम्हें दो-तीन दिन आराम से 'ऐश' करवा सकता था.

घर से जब कुछ दूर मैं निकल आया, तब अचानक ख्याल आया कि मैंने अपने दस्ताने ही नहीं लिए हैं, और सुबह की इस ठण्ड में बाइक चलाने से मेरे हाथ अकड़ रहे थे. एक बार सोचा कि वापस घर जाकर दस्ताने ले लूँ, लेकिन वापस घर जाकर पापा से फिर डांट कौन सुनता? इसलिए घर जाने का प्लान मैंने ड्राप कर दिया.

तुम्हारे घर की गली में जैसे ही मुड़ा मैं, मैंने तुम्हें दूर से ही देख लिया था. अपने घर के गेट के बाहर खड़ी थी तुम. एकदम तैश में. फुल ऐटिट्यूड में. लेदर जैकेट, जीन्स, बूट्स, हैट, गले में मफलर और सुबह सात बजे के कोहरे में जब सूरज चाचू का दूर दूर तक कोई नामो निशाँ नहीं था, 'सनग्लासेज' लगा कर तुम एकदम कमाल लग रही थी.

पता है, उन दिनों मैं बहुत दूर से, या खूब भीड़ में भी तुम्हें आसानी से पहचान लिया करता था.
ना...ये ना समझना कि "तू धरती पर चाहे जहाँ भी रहेगी, तुझे तेरी खुशबु से पहचान लूँगा" वाले कांसेप्ट से तुम्हें पहचानता था, बल्कि तुम्हारी वो स्टाइलिश हैट जिसमें तुम किसी जादूगरनी सी लगती थी, लेदर जैकेट, बूट्स और एनीटाइम गौगाल्ज से तुम एकदम अलग दिखती थी. शहर में बहुत कम लड़कियां थीं जो उन दिनों बूट्स, सनग्लासेस और हैट पहनती थी. सनग्लासेज और बूट्स पहनने वाली तो फिर भी दिखती थी, लेकिन मेरे ख्याल से पूरे शहर तुम अकेली थी जो हैट पहनती थी और वो भी पूरे कांफिडेंस के साथ. तुमने एक बार तो मुझे भी हैट खरीद कर गिफ्ट किया था, लेकिन मैं वैसा हैट पहनने से हमेशा हिचकता था. मुझे बड़ा अजीब लगता था हैट पहन कर सड़कों पर निकलना. लेकिन तुम्हें कुछ अजीब नहीं लगता था. हैट हो या कोई भी और फैशन ऐक्सेसरीज़, तुम उसे इतने कॉंफिडेंटली कैरी करती थी, कि मैं अक्सर हैरान रह जाता था.

तुम हमेशा से मुझसे ज्यादा कॉंफिडेंट रही हो. सिर्फ फैशन में ही, बल्कि हर मामले में. कभी कभी तो जरूरत से जायदा कॉंफिडेंट, और जिसके वजह से हमेशा मैं फँस जाया करता था. अपने इसी कांफिडेंस के चक्कर में आकर याद है तुमने कैसे उस सुबह मुझे डांट लगाई थी? मैं तो समय से पहले ही तुम्हारे घर पहुँच गया था. मुझे क्या पता था कि तुम आधे घंटे से तैयार होकर अपने घर के गार्डन में टहल रही हो और मेरा इंतजार कर रही हो. इतनी जल्दी तुम तैयार हो सकती हो, मुझे इसका यकीन नहीं था. मेरे आते ही तुमने अच्छी खासी डांट सुना दी थी ये कहते हुए कि मैं लेट से आया हूँ. तुम्हारा मूड बिगड़ न जाए इसलिए घबरा कर जल्दी से मैंने तुमसे माफ़ी मांग ली थी.

बाइक पर बैठने से ठीक पहले तुमने अचानक हवा में हाथ लहरा कर कुछ इस तरह से उसे मुट्ठी बना कर मेरे चेहरे के आगे नचाया था कि पहले तो मैं कुछ समझ नहीं सका था. वो तो जब तुम्हारी ऊँगली मेरे आँखों के सामने नाची तब समझ आया कि तुम फिर से मुझे धमका रही हो.. “सुनो, आज मौसम और मैं, दोनो मूड में हैं, पैसे तो है न पॉकेट में?" कह कर तुमनें मेरी पैंट की जेब थपथपाई थी.

मैंने तुम्हें मुस्कुराते हुए जवाब तो दे दिया कि "हाँ है, डोंट वरी.. " लेकिन अगले ही पल सोचने लगा कि कहीं तुम किसी महंगे रेस्टोरेंट में जाने के लिए न कह दो. मन ही मन मैं जोड़ने लगा कि मेरे पर्स में कितने पैसे हैं - पापा ने दो सौ दिए..पहले के बचे भी अस्सी-नब्बे हैं पर्स में, बैग में भी चालीस-पचास तो होने चाहिए, बशर्ते बहन ने बैग पर रेड न मार दी हो. दिन भर तो आराम से निकल जाएगा, मैंने सोचा और बाइक बढ़ा दी.

हमारा पहला स्टॉप था अहमद चचा की चाय दूकान, जहाँ हम अक्सर सुबह जाया करते थे. चाय दुकान पहुँचते ही अहमद चचा ने मुस्कुराते हुए पूछा.. “बड़े दिन बाद आये हो बबुआ...? कहाँ थे इतने दिन?”

मैं कुछ कहता इससे पहले तुमने अपने ट्रेडमार्क अंदाज़ में चचा को जवाब दिया, "क्या करती चचा, कोहरा बड़ा बेईमान हो गया है इस साल. वो आ ही नहीं रहा था. आज आया है वो, तो मैं भी आ गयी उसके साथ साथ..."

अहमद चचा तुम्हारी इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गए. मुझे तो पक्का यकीन है उनके सिर के ऊपर से तुम्हारी बात किसी बाउंसर की तरह निकल गयी होगी.उन्होंने बस इतना ही पूछा आगे कि "तुम दोनों एकदम सुबह सुबह आ जाते हो यहाँ, इतने सवेरे तो कोई नहीं आता."

तुमनें स्टाइलिश सा जवाब दिया था. "अरे चचा, सुबह चाय पीना तो कंपल्सरी है, और वैसे भी जाड़े में, इट्स ऑलवेज अ चाय टाइम. "

इस बार तो तुम्हारी ये बात चचा को बिलकुल भी समझ नहीं आई, और वो अपने काम में लग गए. 

तुमने उस छोटे से चाय स्टाल पर भी अपना एक कोना खोज निकाला था. दीवार के पास लगी बेंच पर बैठना तुम्हें पसंद था. वजह थी कि वहाँ पर शाहरुख़ खान का बड़ा सा पोस्टर लगा था. और वहाँ बैठकर चाय पीने पर तुम्हें ये तसल्ली रहती कि सुबह की चाय तुमने शाहरुख़ के साथ पी है.

दीवार के पास जो बेंच लगी थी, वो थोड़ी टूटी हुई थी. तुम्हारे बैठते ही बेंच हिलने लगी थी. तुमने मुझे आदेश दिया - "देखो, इस बेंच को यहाँ से उठा कर वहाँ रख दो और वहाँ लगी उस बेंच को यहाँ ले आओ.."

तुमने मुझे ऐसे आदेश दिया था कि जैसे तुम चाय दुकान की मालकिन हो और मैं तुम्हारे चाय दुकान में काम करने वाला एक मामूली सा छोटू हूँ.

एक पल सोचा कि तुम्हें कहूँ, कि मैं क्यों बेंच हटाऊं? ये तो दुकानवाले का काम है. लेकिन तुम्हारे चेहरे पर टफ लुक को देखते हुए ये बात कहने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई.

मैं बेंच को खींच कर वहाँ से हटाने लगा .... चर्रर्रररररर की तेज़ आवाज़ आई..

तुम उस चर्रर- चर्रर की आवाज़ से एकदम इरिटेट हो गयी. कानों पर हाथ रखकर तुम उछलने लगी थी - "यार, इतनी आवाज़ क्यों कर रहे हो? खींच क्यों रहे हो? उठाई नहीं जाती क्या बेंच? कुछ खा कर नहीं आये हो घर से?”

"यार इतनी सुबह खा कर कौन आता है?” मैंने तुमसे कहा था, लेकिन तुमने फिर से एक टफ लुक दिया मुझे. मैंने आगे कुछ नहीं कहा, और बेंच को संभाल कर उसके जगह से उठा कर दूसरी जगह रख दिया.

“अब वहाँ रखी बेंच को यहाँ ले आओ...” तुमने दोबारा आदेश दिया.

इस बार पीछे से अहमद चचा ने तुम्हें टोका, "अरे रहने दो न बेटी, काहे परेशान कर रही हो इसे, हम बेंच लगा दे रहे अभी..."

"अरे नहीं चचा... वेल्ला है ये, इसे लगाने दीजिये न.." कहते हुए तुमने मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया था.

यार कसम से, बड़ा गुस्सा आया था मुझे तुम पर उस समय. थोड़ा इरिटेट भी हो गया था मैं, लेकिन मेरे पास और क्या चारा था? तुम्हारे ऊपर गुस्सा दिखाना मुझे अलाउड ही नहीं था. बेमन से बेंच को संभाल कर उठाया मैंने ताकि चरर्र की आवाज़ फिर न आये और तुम्हारी बताई जगह पर उसे रख दिया.

अहमद चचा की चाय भी तब तक तैयार हो चुकी थी. उन्होंने उधर से आवाज़ लगाई, "चाय के साथ क्या लोगे तुम लोग?"

तुम कुछ कहती, इससे पहले मैंने ही तुम्हें छेड़ने के इरादे से कहा, “चचा मेरे लिए तो एक ब्रेड-बटर और इसके लिए कुछ ऐसा जो इसके दिमाग को ठंडा रख सके”.

"शट अप... चचा आप इसकी बात मत सुनिए...ये तो कुछ भी कहता रहता है, मेरे लिए भी ब्रेड बटर..” तुमने चचा से कहा और मुड़ कर मेरी तरफ देखा.. “ज़रा तमीज से रहो तो तुम..वरना थप्पड़ लगेगा तुम्हें...” कहकर तुमने मुझे फिर धमकाया था.

सच कहूँ तो तुम्हारे ऐसे धमकाने पर मुझे थोड़ी हँसी और बहुत ज्यादा प्यार आ रहा था. तुमने मेरी तरफ से मुँह फेर लिया था, और अपने शाहरुख के साथ तुम चाय पीने लगी थी. मैंने पीछे से तुम्हें थोड़ा छेड़ा भी, "अरे...अकेले अकेले चाय पी रही हो, शाहरुख़ से चाय के लिए नहीं पूछोगी?"

"तुम ज़रा शांत रहो वरना टाँगे तोड़ दूंगी तुम्हारी", कहकर तुमने मुझे फिर से एक तगड़ी डांट लगाई थी और फिर से अपना बैग मेरे कंधे पर घुमा कर दे मारा था.

शुक्र था कि इस बार तुमनें ज्यादा जोर से नहीं मारा था, चाय और ब्रेड-बटर ने बचा लिया था मुझे. हाँ, फिर भी दोबारा उस कंधे पर बैग लगने से हल्का दर्द तो उठा था, लेकिन मुझे दर्द की फ़िक्र नहीं थी. तुम्हें देख देख मुस्कुरा रहा था मैं.
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