Thursday, January 25, 2018

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वापस आओ ओ कोहरे, तुम्हारा इंतजार है

वो दिसंबर के आखिरी दिन थे और ठंड अचानक से शहर से गायब हो गयी थी. दिसंबर की धूप में मार्च की धूप का असर साफ़ दिख रहा था. दिसंबर में महीने में मौसम की ऐसी बदतमीजी पर तुम्हें बड़ा गुस्सा आ रहा था. याद है कैसे तुमनें एक शाम अपने इसी गुस्से में आकर अपने बैग से मुझे इतनी जोर से मार दिया था कि पूरे हफ्ते तक मेरे कंधे में दर्द होता रहा था. याद भी है तुम्हें कि तुमने मुझे अपनी बैग से कब कहाँ, कैसे और किसलिए मारा था?

मेरे ख्याल से वो क्रिसमस के एक दो दिन पहले की बात रही होगी. तुम और मैं अपने शहर के एक कॉफ़ी हाउस में बैठे थे. उन दिनों ऐसे कैफ़े शहर में बहुत कम थे जहाँ लोग कुछ देर इत्मिनान से बैठ सकते थे. ये कैफ़े उन्हीं चुनिन्दा कैफ़े में से एक था जहाँ कॉलेज के लड़के लडकियाँ अक्सर हैंगआउट किया करते थे. दिसंबर के मौसम में भले ही ठंड नदारद थी, लेकिन मौसम खूब सुहाना हो गया था. क्रिसमस और नए साल का वक़्त था तो कैफ़े भी खूब सजा हुआ था. मुझे पूरा सेटिंग बड़ा रोमांटिक सा लग रहा था, लेकिन तुम एकदम गुस्से में थी. “बताओ, सर्दी का मौसम है और ऐसे मौसम में गर्मी महसूस हो रही है. कोट उतारने का दिल कर रहा है मेरा..” कॉफ़ी पीते हुए अचानक एकदम झल्ला कर तुमने कहा था. मौसम का सारा गुस्सा तुमने मेरे ऊपर निकालते हुए मुझे जोर से डांटा था, “इधर मौसम दिसंबर की धज्जियाँ उड़ा रहा है और तुम चुपचाप कॉफ़ी पी रहे हो?”

तुम्हारी ऐसी डांट पर मैं हर बार कंफ्यूज हो जाता था, “यार अब इसमें मैं क्या करूँ? मौसम की ऐसी बदतमीजी है तो इसमें मेरी क्या गलती?” मैंने बड़े मासूमियत से तुमसे ये वैलिड और लॉजिकल सवाल पूछा था, और तुमनें मुझे एक टफ लुक देते हुए फिर से डांट दिया था “तुम कुछ मत करो...बस तमाशा देखते रहो..नालायक कहीं के..”

उस वक़्त तुम भरपूर गुस्से में थी, तुम्हारे हाथ में कॉफ़ी का मग भी था, और एक पल के लिए मुझे डर भी लगा कि कहीं गुस्से में तुम मेरे ऊपर वो कॉफ़ी का मग ही न फेंक दो, जैसे एक दफे तुमनें कोल्डड्रिंक फेंक दिया था मेरे शर्ट के ऊपर. लेकिन तुमनें इस बार वैसी कोई बदमाशी नहीं की. बल्कि बड़े प्यार से तुमने कॉफ़ी के कप को टेबल पर रखा, और एक अच्छी सी मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए पास में रखे अपने बैग को तुमने उठाया और उसे घुमाकर तेज़ी से मेरे कंधे पर दे मारा था.. ”स्टॉप स्माइलिंग, इडियट” तुमने कहा था.

तुम्हारे रूल्स एंड रेगुलेशन के अंतर्गत मुझे तुम्हारे मारने पर/गुस्सा होने पर/अत्याचार करने पर विरोध जताने का या तुम पर गुस्सा दिखाने का हक़ नहीं था. नियम के मुताबिक मुझे तुम्हारे हर मार को/गुस्से को/अत्याचार को हँसते हुए सहना था. मैंने उस रूल्स एंड रेगुलेशन की लाज रखने में उस दिन भी कमी नहीं की थी. मैं बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए बस इतना कह पाया था.. “अरे...” इसके आगे कुछ भी कहना मेरे लिए और खतरनाक हो सकता था, और शायद नियम के बाहर भी. इसलिए वहीं रुक गया मैं और बस अपना कन्धा सहलाने लगा.

तुम अचानक से शायद बड़े गिल्ट में आ गयी. मुझे बैग से मारने के बाद एकदम घबरा गयी थी तुम. तुम्हें शायद अपनी गलती का एहसास हुआ था, और तुमने तेज़ी से अपने बैग को खोलते हुए कहा था, “शिट यार! लैपटॉप, कैमरा, पानी का बोतल सब था इसमें, देखूँ लैपटॉप सही तो है न मेरा?”, और तुम जल्दी से लैपटॉप ऑन कर के देखने लगी थी,. जब लैपटॉप के स्क्रीन पर विंडोज एक्सपी का लोगो लहराया, तब जाकर कहीं तुम्हारी जान में जान आई थी. हाँ, फोर्मलिटी निभाते हुए तुमने मुझसे पूछा भी था, “यार लगी तो नहीं तुम्हें...?”

जानती हो, बड़ा तेज़ गुस्सा आया था उस वक़्त तुम पर, लेकिन अपने इमोशन को अपने काबू में रखकर मैंने हँसते हुए फ़िल्मी टाइप जवाब दिया था, “डोंट बी सिली, तुम्हारी मार कभी लग सकती है भला?”

लेकिन मैडम, गुस्सा उस वक़्त तो मेरे अन्दर पूरा भरा हुआ था. माना कि तुम्हारा लैपटॉप काफी महंगा था,और उस वक़्त कम लोग लैपटॉप लेकर घूमते थे, लेकिन वो लैपटॉप, तुम्हारा वो नया डिजिटल कैमरा और यहाँ तक कि पानी की बोतल भी मेरे कंधे से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गया था तुम्हारे लिए.. ? मेरे कंधे पर जाने कितने बार सिर रख कर रोई थी तुम, लैपटॉप पर कितनी बार सिर रख कर रोई थी? और उतने भारी लैपटॉप से मेरे कंधे पर दे मारा था तुमने और तुम्हे मेरे कंधे की नहीं, बल्कि अपने लैपटॉप की पड़ी थी...'स्टुपिड कहीं की...'

कैफे से बाहर निकलते समय तुमने मुझे चेतावनी दी थी, “मौसम का कुछ करो, वरना तुम्हारी शामत आ जायेगी..” सच कहूँ तो मुझे उस वक्त भी गुस्सा आया था, और “खुद को क्या समझती है, इतना अकड़ती है” गाना भी मेरे मन में ऑटोमेटिकली प्ले होने लगा था.

कैफ़े से निकलने के बाद तुम्हें घर छोड़ते हुए और एक दो काम निपटाते हुए मुझे देर हो गई थी. वापस घर लौटते वक़्त मुझे हलकी सिहरन महसूस हुई थी, लगा कि जैसे मौसम में थोड़ी ठंडक वापस आ गयी है, लेकिन इस बारे में मैं ज्यादा श्योर नहीं था, क्योंकि स्कूटर चलाते वक़्त ऐसे भी थोड़ी ठंड महसूस होती है.

घर लौटते हुए पूरे रास्ते तुम्हारी मार की वजह से मुझे कंधे में दर्द महसूस होता रहा. स्कूटर चलाने में, गियर बदलने में बड़ी तकलीफ हो रही थी. रास्ते में मन ही मन भगवान जी से मैंने दुआ तक मांग ली थी, कि कुछ भी कर के दिसंबर की इज्ज़त वापस दिला दो, वरना ये लड़की मेरी शामत लेते आयेगी.

घर पहुंचा तो सभी लोग सो चुके थे. अपने कमरे में आकर टीवी पर न्यूज़ देखा, तो पता चला कि शिमला में सुबह से भयंकर बर्फ़बारी हो रही है. वो खबर देखते हुए मुझे तुम्हारी याद आ गयी थी. ये सोच कर मुझे हँसी आने लगी कि तुम अगर अभी ये खबर देख रही होगी तो तुम्हारे दिल पर क्या बीत रही होगी? कितना कमाल का रिएक्शन हो रहा होगा न तुम्हारा और कितना भला-बुरा कह रही होगी तुम मुझे और इस मौसम को..
”शिमला में बर्फ़बारी, और यहाँ कोहरे की झलक तक नहीं..बड़ी नाइंसाफी है..” यही सोचा होगा न तुमने? एक पल सोचा कि तुम्हें कॉल कर लूँ, और थोड़ा तुम्हें चिढ़ा दूँ, तुमसे डांट फिर से सुन लूँ, लेकिन तुम शायद सो गयी थी. कुछ देर पहले मेरे गुड नाईट के एसएमएस का भी तुमने जवाब नहीं दिया था. मैंने सोचा, कि चलो कोई बात नहीं, आज रात में ना सही, कल दोपहर में तुम्हें ये खबर सुना कर खूब चिढाऊंगा. फिर भले तुम मेरा एक और कन्धा तोड़ दो, परवाह नहीं. लेकिन तुम्हें चिढ़ा पाने का एक भी मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता था.

सुबह अचानक कुछ आहट हुई और मेरी नींद टूट गयी थी. तुम्हें तो पता ही है कि पापा हमेशा सुबह चार बजे ही जाग जाते हैं, और उन्हीं के जागने से मेरी नींद खुल गयी थी. खिड़की से बाहर नज़र डाला तो हल्का कोहरा दिखा. मुझे लगा मेरा भ्रम है. मैंने आँखें मल के दोबारा देखा, तो भी बाहर वही नज़ारा था. कन्फर्म करने के लिए कि बाहर कोहरा ही है, मेरा भ्रम नहीं, मैंने पापा से पूछा, “आज बाहर कोहरा है क्या पापा?”
“हाँ, खूब घना कोहरा है, शिमला में हुई बर्फ़बारी का नतीजा है..” पापा ने कहा.

मैं एकदम से खुश हो गया, सोचा चलो मेरी रात की दुआ कुबूल हुई और मैं तुम्हारे ‘मार’ से बच गया. बाहर बालकनी में गया मैं कि मौसम का थोड़ा जायजा लूँ, तो एकदम ठिठुर सा गया. मेरे उम्मीद से ज्यादा भयंकर ठंड हो गयी थी, और कोहरा भी एकदम घना सा छाया हुआ था. गज़ब की करवट ली है मौसम ने, मैंने सोचा.

सबसे पहले मुझे तुम्हारा ही ख्याल आया. मैं जल्दी से वापस कमरे में आया, बिस्तर पर पड़ा मोबाइल उठाया. सोचा तुम्हें कॉल करूँ. लेकिन सुबह के साढ़े चार बज रहे थे और तुम सोयी हुई होगी. रात भी तुम्हारे एसएमएस का कोई जवाब नहीं आया था मुझे. मैं सोचने लगा तुम्हें कॉल लगाऊं या नहीं?

तुम्हें इतनी सुबह जगाने में भी तो बहुत बड़ा रिस्क था. तुम्हारी नींद में खलल डालना मतलब सीधे डेंजर जोन में फुल स्पीड के साथ दाखिल होना होता है. लेकिन ‘जो होगा देखा जाएगा’ की थ्योरी अपनाते हुए मैंने तुम्हारा नंबर मिला दिया.

पहली घंटी पूरी बजी, लेकिन तुमने रिसीव नहीं किया.
दूसरी बार मैंने फिर से तुम्हारा नंबर मिलाया. इस बार भी पूरी घंटी बजी लेकिन तुमने रिसीव नहीं किया. मेरा दिल थोड़ा सा बैठ गया. थोड़ा डर भी आ गया था मन में. 
तीसरी बार डरते हुए मैंने फिर से तुम्हारा नंबर मिलाया. इस बार तुमने रिसीव किया, और.. “स्टुपिड..सोने दो मुझे” कह कर फोन काट भी दिया.
भगवान का नाम लेकर मैंने फिर से चौथी बार तुम्हारा नंबर मिलाया, और इस बार तुम मुझे डांट पाओ, इसका मैंने तुम्हें मौका ही नहीं दिया और तुम्हारे कुछ बोलने के पहले ही मैंने “हैप्पी फ़ॉगी  मोर्निंग कहा” और कहते ही मैंने फोन काट दिया और मुस्कुराने लगा.

एज एक्सपेक्टेड, अगले ही पल तुम्हारा कॉल बैक आया, “सिरिअसली... फ़ॉगी मोर्निंग?“ तुमने पूछा
“बाहर निकल के देखो ज़रा, ठिठुर न जाओ तो मेरा नाम बदल देना तुम..” मैंने एकदम कांफीडेंटली और फुल एटीट्यूड के साथ कहा.

तुमने फिर अपनी खिड़की खोली होगी शायद और बाहर कोहरा देखते ही तुम चिल्ला बैठी थी, “यार, आई जस्ट कांट बिलीव इट. इतना गहरा कोहरा, दिल खुश कर दिया तुमने ये खबर सुना कर, लव यू नालायक” तुम एकदम खुश हो गयी थी. 

“जानती हो, कल दिन भर शिमला में बर्फ़बारी हुई है, ये उसी का नतीजा है..”, सुबह पापा से मिला ज्ञान मैंने तुम्हें चेपने की कोशिश की.
तुमनें फिर से डांट दिया था मुझे, लेकिन इस बार प्यार से  “शिमला में हुई बर्फ़बारी का नहीं, मेरी डांट का नतीजा है ये बेवकूफ..” तुमने कहा था.

मैं जानता था कि मौसम अगर अचानक ऐसे करवट ले ले, तो तुम्हारा नेक्स्ट 'प्लान ऑफ़ एक्शन' क्या होगा. असल में सर्दियों में तुम बिलकुल प्रेडिक्टेबल हो जाया करती थी. मैं एकदम से जान लेता था कि तुम कब क्या करने वाली हो. तो इस बार तुम मुझे कोई भी आदेश देती, उससे पहले ही मैंने पूरे दिन का आइटिनरेरी बना लिया था. .

"एक घंटे में तैयार होकर अपने घर के बाहर मिलो मुझे, वी आर हिटिंग द रोड..." कहते हुए मैंने फोन पर एकदम तुम्हारे अंदाज़ में तुम्हें फरमान सुना दिया था.

3 comments:

  1. आ गयी ठण्ड लौट के
    बहुत अच्छी प्रस्तुति
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप को ६९ वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं |

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ६९ वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. वैसे इतनी मज़ेदार पोस्ट पढ़ने के बाद दिल तो मेरा भी एकदम खुश हो गया...नालायक ! 😜😂

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया