Saturday, June 17, 2017

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आँधी, बारिश और रिमझिम फुहारों सी यादें

baarish nazm gulzar
सुबह के तीन बज रहे हैं. बाहर ज़ोरदार बारिश शुरू हो गयी है. बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट से मेरी नींद एकदम से खुल गयी. “यार ये भी कोई वक़्त है आने का?” मैंने खिड़की खोल के बाहर बरसती बारिश की बूँदों से कहा.. “ज़रा देर से आते तो नींद भी पूरी हो जाती और तुम्हारे साथ खुल के मज़े भी ले पाता”. लेकिन इस कमबख्त बारिश को तो बे-वक्त ही आना है, ठीक वैसे ही जैसे उस स्टुपिड प्रिया की यादें आ जाती है, वक़्त बे-वक्त...कभी भी, कहीं भी.

मौसम अगर आशिकाना हो जैसे अभी सुबह-सुबह का मौसम है. बाहर अभी तक अँधेरा ही है, बारिश खूब तेज़ हो रही है और बेहद ठंडी हवा चल रही है. ऐसे सिचूएशन में प्रिया की यादें कुछ ज्यादा ही बदतमीज़ और अन-प्रिडिक्टबल हो जाती हैं. अक्सर मुझे वे बातें याद दिला जाती हैं जिनके बारे में एक अरसे से मैंने सोचा नहीं था. आज भी सुबह प्रिया की ये स्टुपिड यादों ने जाने कहाँ से वर्षों पहले की गर्मियों में दिल्ली में बिताये उन सात खूबसूरत शामों के किस्से याद दिला गयीं, जिन्हें प्रिया "दिल्ली की सात ऑसमाशामें’ कह कर बुलाती थी.

"ऑसमाशामें" शब्द आपको थोड़ा अजीब लग रहा होगा. कंफ्यूज भी हो रहे होंगे आप कि ये “ऑसमाशामें” क्या बला है? इससे पहले कि आप दुनिया के सारे डिक्शनरी खंगाल डाले, आपको बता दूँ कि ऐसे किसी शब्द का अस्तित्व ही नहीं है. ये तो प्रिया के ईजाद किये हजारों शब्दों में से एक शब्द है. बस फर्क इतना है कि जहाँ उसके ईजाद किये बाकी के शब्द बेमतलब और अजीब लॉजिक के होते हैं, इस शब्द के पीछे वाकई में एक लॉजिक था. प्रिया ने “ऑसम” और “शामें” शब्द का फ्यूजन कर “ऑसमाशामें” को ईजाद किया था. मैं वैसे तो प्रिया के ईजाद किये शब्दों की कोई खास इज्जत नहीं करता था और उसके उन शब्दों की धज्जियाँ उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहा लेकिन प्रिया का ये “ऑसमाशामें” शब्द मुझे भी बड़ा प्यारा सा लगता था. ख़ास कर जब प्रिया इस शब्द का उच्चारण करती, तब बड़ा खूबसूरत साउंड करता था ये शब्द.

प्रिया के साथ बीते ये सात "ऑसमाशामें" आज से करीब सात-आठ साल पहले की बात है. प्रिया उन दिनों लन्दन में एमबीए की पढ़ाई कर रही थी और छुट्टियों में वो दिल्ली आई थी. जून का ही महिना था वो और तारीख भी आज की ही थी, यानी की १७ जून. मुझे ये तारीख इसलिए याद है कि १७ जून को मेरे भैया की शादी की सालगिरह होती है. उस साल भैया के सालगिरह के दिन मैं और प्रिया दोनों दिल्ली पहुँचने वाले थे. प्रिया सत्रह जून की सुबह लन्दन से दिल्ली आने वाली थी और मैं चंडीगढ़ से एक जरूरी काम निपटा कर दिल्ली वापस लौट रहा था.

शाम में भैया ने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी. मैं उस पार्टी में प्रिया को बुलाना चाहता था. वैसे तो भैया और भाभी पहले जब हैदराबाद में रहते थे, तब एक बार वे प्रिया से मिल चुके थे, इसलिए प्रिया को पार्टी में बुलाने में मुझे कोई झिझक होनी नहीं चाहिए थी लेकिन फिर भी मैं असमंजस में था कि भैया भाभी से प्रिया को इन्वाइट करने की बात करूँ या न करूँ? पता नहीं क्यों मुझे शक था कि भैया कहीं मना न कर दे, लेकिन मेरा ये डर बेवजह ही था. भैया ने तो तुरंत हामी भर दी, भाभी तो इक्साइटड भी हो गयी ये सुनते ही कि प्रिया दिल्ली आ रही है और पार्टी में वो प्रिया से मिल पाएंगी. मुझे थोड़ा आश्चर्य तो हुआ, कि ये दोनों प्रिया की बात सुन कर इतने खुश क्यों हो गए? फिर याद आया, कि पिछली बार जब प्रिया भैया-भाभी से मिली थी, तो उसनें जी भर कर दोनों की बटरिंग की थी. शायद उसी का परिणाम था कि प्रिया के बारे में सुनते ही भैया भाभी उससे मिलने को बेसब्र हो गए थे. भैया ने तो यहाँ तक कह दिया था कि फोन कर के प्रिया से पूछो, अगर बिजी नहीं है, तो उसे अभी ही बुला लो.

शाम को प्रिया अपनी आदत के विपरीत समय से काफी पहले हमारे घर आ गयी. प्रिया को देखते ही भैया और भाभी के चेहरे खिल उठे. दोनों ने एक सुर में कहा “प्रिया, तुमनें तो आज आकर इस पार्टी की रौनक बढ़ा दी”. मैंने प्रिया को पहले से ही हिदायत दे रखी थी कि भैया-भाभी तुम्हें चने की झाड़ पर चढ़ाने की भरपूर कोशिश कर सकते हैं, इसलिए उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान न देना. लेकिन मेरी कोई भी बात प्रिया सुनती कब है? भैया-भाभी के इस डायलॉग को उसनें काफी सिरिअसली ले लिया और जिसका नतीजा ये हुआ कि पूरी शाम वो पार्टी में ऐसे टहल रही थी जैसे वो सच में कोई ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ हो. मुझे तो एकदम नज़र अंदाज़ कर दिया था इसनें.

अपने घर की पार्टी में ही मेरी कोई अहमियत नहीं रह गयी थी, भाभी ने सारे कमांड प्रिया को सौंप दिए थे. वो मुझपर लगातार हुक्म चला रही थी. जहाँ मैं उसे टोकता या उसके मर्ज़ी के विपरीत कोई भी काम करने की कोशिश करता, सीधे धमकी दे देती मुझे, "मेरे सब-ओर्डिनिट हो तुम, जैसा कह रही हूँ वैसा करो वरना रात में खाना भी नसीब नहीं होगा". मतलब मेरे ही घर में आकर वो मुझपर ऐसे हुक्म चला रही थी, और इतनी हिम्मत उसमें सिर्फ इस वजह से आई थी कि भाभी ने उसे “कुछ भी करने” की परमिशन दे रखी थी.

प्रिया अक्सर ऐसे मौकों के तलाश में रहती है कि वो मेरे ऊपर धौंस जमा सके, लेकिन उसे ऐसे मौके कम ही नसीब होते हैं. इस पार्टी में भाभी की वजह से ही सही उसे ये मौका मिल गया था और वो इस मौके को किसी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती थी. भरपूर फायदा उठा रही थी वो अपनी 'गेस्ट ऑफ़ ऑनर' के टैग का. पूरी पार्टी के दौरान प्रिया ने हर तरह की अपनी मनमानी की, मुझे हर एक पॉसिबल तरीके से परेशान और इरिटेट किया, तरह तरह के हथकंडे अपना रही थी वो जिससे मैं तंग आकर उसे डांट दूँ और वो मेरे ही घर में मेरा दाना-पानी बंद करवा दे और फिर जब भूख से मेरी हालात ख़राब हो जाए, वो मुझपर तरस खा कर मुझे खाना खिलाये और फिर लम्बे समय तक मुझे ये किस्सा सुना सुना कर पकाती रहे कि कैसे उसनें खाना खिलाकर मुझपर अहसान किया था.

लेकिन पार्टी खत्म होने के थोड़ी देर पहले, जब हम डिनर के लिए बैठे, अचानक से प्रिया के सुर बदल गए थे. पूरी पार्टी में जहाँ वो हर छोटी छोटी बातों में मुझपर हुक्म चला रही थी, वहीं डिनर के समय वो मुझसे बड़े प्यार से पेश आ रही थी. पहले तो मैंने समझा कि शायद उसे मेरे ऊपर दया आ गयी हो इसलिए वो इतने प्यार से पेश आ रही है, लेकिन ये मेरी गलतफहमी थी. उसे तो बाकी के सात दिनों की अपनी प्लानिंग सेट करवानी थी.

बड़े प्यार से डिनर के बाद उसनें मेरे हाथों में एक लिस्ट थमा दी और कहा - "ये देखो, अगले सात दिनों तक हम दिल्ली में यहाँ-यहाँ घूमेंगे..मैंने लिस्ट बना ली है..और कल सुबह हम जाएंगे गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स"

मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा – “कल सुबह?”
“हाँ..एनी प्रॉब्लम?” आइसक्रीम खाते हुए, एक टफ लुक उसनें मुझे दिया.
“यार, एक सप्ताह जयपुर और चंडीगढ़ के चक्कर लगा कर थक गया हूँ. कल बक्श दो, परसों से दिल्ली में जहाँ बोलोगी, तुम्हारे साथ भटकता फिरूँगा.”
“नो..नोट पॉसिबल..” उसनें कहा और वापस अपना ध्यान अपने आइसक्रीम पर कंसन्ट्रेट कर दिया.

गुस्सा तो बड़ा आया इस स्टुपिड लड़की पर. आखिर समझती क्या है खुद को? दिल किया कि डांट कर बोल दूँ कि कल कहीं नहीं घूमना है, चुपचाप घर में बैठो और आराम करो. लेकिन प्रिया को ऐसे पार्टी में डाँटना, जहाँ वो ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ थी, काफी खतरनाक हो सकता था इसलिए मैंने बड़े प्यार से प्रिया को अपने पास बिठाया, थोड़ी बटरिंग की और फिर धीरे से प्रिया के सामने एक दिन का लीव ऍप्लिकेशन री-कन्सिडर करने को डाल दिया और उससे हाथ जोड़ कर(लिटरली) विनती की - “यार बस कल बक्श दो...”

प्रिया के सामने ऐसे बटरिंग करना और हाथ जोड़ कर विनती करने वाली ट्रिक दस में से आठ दफे तो एकदम काम कर जाती है, उस दिन भी ये ट्रिक अपना काम कर गयी होती अगर रात में बिना नोटिस दिए भयानक आँधी तूफान और बारिश न आ धमकती.

पार्टी के बाद प्रिया तो वापस घर चली गयी, भैया, भाभी और मुझे सारे काम समेट कर सोने जाते हुए रात के करीब एक बज गए थे. थकान इस कदर मुझपर हावी थी कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद ने अपनी आगोश में ले लिया मुझे. ठीक ढाई बजे मेरी नींद अचानक एक फोन-कॉल से टूटी. मैं थोड़ा चौंक गया था. प्रिया का कॉल था.

“क्या हुआ? सब ठीक तो है?” मैंने थोड़ा चिंतित होकर पूछा...
“अरे बाहर देखो...बाहर...”
“बाहर? क्यों? क्या हुआ?”
“अरे बहुत तेज़ आँधी उठी है..”
“आँधी??”
“हाँ..”
“तो खिड़की बंद करो और सो जाओ...”
"बेवकूफ!!! तुम्हारी तरह कंजूस नहीं हूँ, कमरे में एसी है. खिड़की बंद ही रहती है.."
"गुड! तो फिर सो जाओ.."
"नहीं...पहले तुम अपनी आँखें खोलो...और बाहर देखो.."
"यार नींद आ रही है, क्यों परेशान कर रही हो?"
“अरे देखो तो सही...बहुत तेज़ आँधी है, और जबरदस्त बिजली कड़क रही है. बारिश होने वाली है..”
“होने दो बारिश..हु केयर्स !चुपचाप सो जाओ, और मुझे भी सोने दो...ढाई बज रहे हैं..” मैंने थोड़ा इरिटेट होकर कहा.
“पर सुनो तो..”
“अब क्या हुआ? जल्दी बोलो..”
“यार देखो न, झमाझम बारिश शुरू हो गयी है. कल की सुबह डेफनिट्ली रोमांटिक होगी. सुबह मोर्निग वाक पर लोदी गार्डन चलें?”
“लोदी गार्डन? कल सुबह?? तुम पागल हो? रात के ढाई बजे तुम्हें लोदी गार्डन जाने की सूझती है? चुपचाप सो जाओ” कह कर मैंने थोड़ा झिड़क दिया प्रिया को.

ये झिड़कना मुझे महंगा पड़ गया. अगर प्यार से समझाया होता तो शायद मामला हाथों से नहीं निकलता, लेकिन प्रिया को ऐसे झिड़कने पर तो आपको नतीज़े झेलने पड़ेंगे.

“दैट्स इट!! कल मोर्निंग! शार्प एट सेवन! खान मार्किट!!” उसनें अपनी आवाज़ को बेहद स्टर्न बनाकर कहा.
“अरे यार, प्लीज ऐसा करो. ये तो ज़्यादती है...” मैं एकदम डिफेंसिव मोड में आ गया था.
“ज्यादती नहीं एकदम सही है! बॉर्डर पर जब जंग छिड़ जाए तो सैनिकों की छुट्टी कैंसल हो जाती है न? ठीक वैसे ही जब बारिश होगी तो तुम्हारी छुट्टियाँ भी ऐसे ही कैंसल हो जायेंगी..” उसनें कहा.
"प्रिया..दिस इज नॉट फेयर. बेहद थका हुआ हूँ, सुबह नहीं उठ पाऊंगा..” मैंने उससे विनती की.
"तुम्हारे जैसों के साथ ऐसा ही होना चाहिए. चार घंटे हैं तुम्हारे पास, इन चार घंटों में जितना सोना है सो लो. मैं ठीक सुबह छः बजे तुम्हें कॉल कर के जगा दूँगी.” इतना कह कर उसनें फोन कट कर दिया.

इधर मेरी नींद उड़ चुकी थी.

उसनें हुक्म जारी कर के फोन तो रख दिया लेकिन मुझे नींद कहाँ से आती? एक तो वो नाराज़ हो गयी थी, और उसपर से उसका गणित हमेशा से कमज़ोर रहा है. मुझे सोने के लिए चार घंटे नहीं बल्कि सिर्फ तीन घंटे का वक़्त मिला था. मैंने कमरे के दोनों अलार्म क्लॉक, और मोबाइल में सुबह छः बजे का अलार्म लगा दिया ताकि सुबह समय पे उठ जाऊं..और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि उसके मूड को ज्यादा न बिगाड़े, वरना वो मेरी शक्ल बिगाड़ देगी. सब कुछ ऊपरवाले के भरोसे छोड़कर मैं वापस नींद की आगोश में चला गया.


बातें बाकी...

6 comments:

  1. बाकी बातें अगर जल्दी ही नहीं सुनाई तो फिर समझ जाओ...क्या नतीज़े भुगतने पड़ सकते हैं ऐसे इंतज़ार के :P :D

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  2. बातें बाकी...
    ये क्रम क्रमवत चले...

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  3. अलार्म सही वक्त पर बजा ना? :-)
    बताना ज़रूर...

    अनु

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  4. जितने तरतीबवार ढंग से तुम्हें सबकुछ याद रहता है, मैं चाहकर भी नहीं कर पाता! शायद यही वज़ह है कि मुझे तुम्हारे हर वाक़ये के साथ अपना माज़ी नज़र आता है!
    अब तो ऐसे पागल बनाना बंद कर दिया है परमात्मा ने!

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  5. Reading your blog after so many months! Still the same, took me back all the way to 5,6 years ago!

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया