Monday, June 26, 2017

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झील में तैरती बत्तखें

कौन ऐसा खुशनुमा दिल न होगा जिसे बारिश की रुमानियत न पसंद हो, और बात जब उस दीवानी सी प्रिया की हो, तो बारिश में घूमने से कौन मना कर सकता है ? पिछली पोस्ट में आपने प्रिया के दिल्ली आने और मेरे भैया भाभी की शादी की सालगिरह में शामिल होने के किस्से पढ़े, और साथ ही मुझे रात के ढाई बजे जगा के दी गई उसकी धमकी की दास्तां भी...अब आगे पढ़िए उसके साथ बिताई गई सात ऑसमाशामों में से एक किस्सा और...(अब ये 'ऑसमाशामें ' क्या बला है, इसे जानने के लिए तो आपको यहाँ जाना पड़ेगा...)

सुबह अलार्म बजने के पहले ही मेरी नींtद खुल गयी थी. रात में प्रिया से बात करने के बाद मुझे सही से नींद ही नहीं आयी. नींद न आने की वजह प्रिया के बदमाशियों के प्रति इरिटेसन, गुस्सा या उसकी धमकियों का डर नहीं था, बल्कि मुझे गिल्ट हो रहा था कि रात नींद में मैंने बेवजह ही प्रिया को डांट दिया था. हालाँकि मैं जानता था कि उसे मेरी डांट का कभी बुरा नहीं लगता, और वो मेरी डांट का बदला अक्सर मुझे वापस डांट कर ले लिया करती है. लेकिन फिर भी मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. इतने बेसब्री से मैं प्रिया का इंतजार कर रहा था, और जाने कितना कुछ सोच रखा था, कि दिल्ली में कहाँ कहाँ घुमना है, कैसे वक़्त बिताना है, और अब जब वो दिल्ली आ गयी थी, मैंने उससे एक दिन की मोहलत माँगी थी आराम करने के लिए? ये मेरी बेवकूफी की हद ही तो थी. वो तो अच्छा हुआ रात में अचानक बारिश हुई और प्रिया ने मुझे डांट लगाकर सुबह मिलने बुलाया, वरना एक पूरा दिन मैं बस सोने में बरबाद कर डालता.

सुबह मैं जब घर से निकला तो मौसम बड़ा सुहावना हो चुका था. रात भर मुसलाधार बारिश हुई थी और सुबह सुबह खूब ठंडी हवा चल रही थी. मैं समय से काफी पहले खान मार्केट पहुँच गया था. खान मार्केट के गेट नंबर एक के ठीक सामने कैफे “ब्लू नाम” का एक कैफ़े था. प्रिया ने वहीँ आने के लिए कहा था. पहले तो मैंने सोचा कि कैफे के बाहर ही उसका इंतजार करूँ लेकिन प्रिया के आने में आधे घंटे का वक़्त बाकी था. मैं कैफे के अन्दर चला आया. कैफे लगभग खाली ही था. कोने वाली मेरी पसंदीदा जगह भी खाली थी, मैं जल्दी से जाकर वहाँ बैठ गया. सुबह सुबह वैसे भी इस कैफ़े में ज्यादा भीड़ नहीं होती. यहाँ बस वही आते हैं जो सुबह लोदी गार्डन से टहल कर लौट रहे होते हैं या फिर साइकलिस्ट जो साइकलिंग के बाद कुछ देर यहाँ सुस्ताने के लिए बैठते हैं. मैंने एक सरसरी निगाह कैफे पर डाली. मेरे सामने तीन लड़कियां बैठी थीं जो तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं. उनमें से एक लड़की ने शायद अपनी बाहों पर टैटू बनवाया था जिसके बारे में वो अपनी बाकी दोनों सहेलियों को बता रही थी. उनके ठीक बगल में दो बुजुर्ग दोस्त बैठे थे जो सतरंज की बाजी पर झुके थे. मेरे ठीक बगल में एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. लड़की ने जाने किस बात पर लड़के को मजाक में एक थप्पड़ मार दिया था.  उन्हें देख मुझे थोड़ी हँसी आ गई. मैंने शुक्र मनाया कि प्रिया अभी नहीं आई है, वरना इस लड़की को देखकर वो भी ऐसा करने को इन्स्पाइर हो जाती. कैफे के काउंटर के दूसरी तरफ कुछ विदेशी टूरिस्ट का एक ग्रुप था जिनमें से शायद किसी का जन्मदिन था और वे खूब मस्ती मजाक कर रहे थे और तरह तरह के लहजे में बर्थडे जिंगल गा रहे थे. मेरा सारा ध्यान उनके सेलिब्रेशन पर ही था कि तभी मुझे पीठ पर हलकी थपथापाहट महसूस हुई. मैं चौंक गया. मुड़ा, तो देखा प्रिया खड़ी थी.

“क्या बात है मिस्टर..कब से यहाँ बैठे हो? बड़े फ्रेश दिख रहे हो? रात में खूब सोये क्या?” प्रिया ने शरारती अंदाज़ में मुझे छेड़ते हुए कहा.
“बस मैडम, मेहरबानी है आपकी. पूरे ढाई घंटे सोया हूँ मैं..पूरे ढाई घंटे! कैन यू बिलीव इट?” प्रिया को छेड़ने के लिए थोड़े शरारत से मैंने भी कहा.
“हुंह....सब समझती हूँ मैं. ताना देने की कोई जरूरत नहीं है. In fact, you should thank me, वरना इतने रोमांटिक मौसम में भी तुम बाकी लोगों की तरह अपने बिस्तर में दुबके पड़े होते..” 

प्रिया की इस बात का मैंने कोई विरोध नहीं किया. उसकी बात वैसे सही भी थी. सच में मौसम बहुत खूबसूरत हो गया था, और अगर उसनें जिद न की होती, तो मैं सही में घर में सोया होता.

“अच्छा चलो बताओ, आगे का प्लान क्या है?” मैंने प्रिया से पूछा. प्रिया ने पूरे दिन का प्लान सुना डाला - “देखो मिस्टर, यहाँ ब्रेकफास्ट करने के बाद  हम लोदी गार्डन में बैठने मोर्निंग वाक के लिए जायेंगे. वहाँ अपने अड्डे पर बैठेंगे और फिर हमारी सवारी निकलेगी डिलाइट, मैटिनी शो के लिए और......
“डिलाइट? दिल्ली गेट वाला डिलाइट? बेवकूफ लड़की !! इतने अच्छे मौसम में बाहर घूमना चाहिए और तुमनें डिलाइट में फिल्म देखने का प्लान बना डाला..” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“अरे यार, डांटो नहीं,  मुझे कहाँ पता था कि आज मौसम ऐसा ऑसम हो जाएग. मैंने तो कल दोपहर में ही राहुल से टिकट मँगवा ली थी. तुम्हें इसलिए नहीं बताया था कि तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी मैं..” 
"कल टिकेट मंगवा लिया था तुमने? और आज बारिश न होती और मैं न आता तो?" मैंने पूछा. 
“तो क्या..टिकट और पैसे बेकार हो जाते ”. उसनें बेचारी सी शक्ल बनाते हुए कहा, जिससे मुझे हँसी आ गयी.   
“अच्छा !! कैन सी फिल्म है? ये तो बताओ...”
“कुछ देर में पता चल जाएगा तुम्हें. ट्रस्ट मी, बहुत अच्छी फिल्म है..” उसनें कहा. 
“लेकिन यार नाम तो बताओ ?” मैंने दोबारा पूछा तो वो थोड़ा झल्ला सी गयी. 
“यार तुमने एक तो बीच में मुझे टोक दिया, फिर डांट दिया और अब इतने सावल कर रहे हो. देख लेना जो भी फिल्म होगी,  Now Shut Up and LISTEN -  डिलाइट से निकलने के के बाद हम कुछ देर के लिए लाल किला जायेंगे, वहाँ से चाँदनी चौक जहाँ मुझे कुछ शौपिंग करनी है और फिर आखिर में पराठे वाली गली. बस..इतना ही” कहकर वो चुप हो गयी, और मेरी तरफ ऐसे घूर कर देखने लगी कि जैसे अगर मैंने इसके प्लान में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की कोशिश की तो ये मुझे खा जाएगी. 

सच बताऊँ, तो प्रिया के इस तरह से घूरने से मैं हमेशा डर जाता हूँ. मैंने जल्दी जल्दी अपना ब्रेकफ़ास्ट खत्म किया, और प्रिया के साथ लोदी गार्डन की तरफ चल दिया. मौसम बड़ा खूबसूरत था, इसलिए हम पैदल ही चल दिए थे. आसमान में काले बादल छाने लगे थे, और किसी भी वक़्त बारिश शुरू हो सकती थी. मेरा लॉजिकल दिमाग बार बार ये कह रहा था कि ऐसे मौसम में लोदी गार्डन जाना बेवकूफी है, किसी कैफ़े में ही बैठकर गप्पे लड़ाओ, लेकिन दिल इस बात पर अड़ा था कि यार कभी कभी ऐसे मौसम में ऐसी बेवकूफी करनी चाहिए. 

हम दोनों सीधा लोदी गार्डन के झील के पास आ गए. प्रिया को लोदी गार्डन में कहीं और घुमने की कभी उत्सुकता नहीं रहती, लोदी गार्डन में दो तीन ही जगह होंगे जहाँ उसे समय बिताना पसंद था, लेकिन इस झील के किनारे बैठना उसे सबसे ज्यादा अच्छा लगता था. झील के किनारे हमारा अपना एक बेंच था. टेक्निकली वो हमारा बेंच नहीं था, लेकिन संजोग की बात थी कि हम जब भी यहाँ आये हैं, ये बेंच हमेशा खाली रही है.हमनें इसपर किसी को भी कभी बैठे नहीं देखा. प्रिया तो ये तक कहती थी कि इस बेंच पर सिर्फ हमारा अधिकार है, यहाँ किसी और ने बैठने की कोशिश की तो उसे मज़ा चखा दूँगी. उसका बस चलता तो वो बेंच के आगे एक तख्ता लगा कर मेरा और खुद का नाम उसपर लिख देती.



हम उसी बेंच पर बैठ गए. प्रिया एकदम मेरे करीब आ बैठी.  उसनें अपने बंधे बालों से क्लिप निकाल ली, और वो उसके कन्धों पर बिखर आये थे. सामने झील में बहुत सी बत्तखें तैर रही थी. प्रिया की आँखें झील में तैरती उन बत्तखों पर ठिठक गयीं. "देखो उधर - उसनें मेरे हाथ को झिंझोड़ते हुए कहा - कितनी सुन्दर लग रही हैं न ये  बत्तखें, एक कतार में चलते हुए. उजली और बेहद प्यारी. इन्हें हम अपने साथ ले चले? अपने घर ?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा. उसकी उस मुस्कराहट में लेकिन कोई शरारत या हँसी नहीं थी. उसकी आँखें स्थिर थीं, चमकती हुईं. मैं उसका चेहरा देखकर समझ जाया करता हूँ, कि कब वो शरारत कर रही है और कब गंभीर है. 
“तुम कहो तो मैं इन्हें बैग में डाल के ले चलूँ”? मैंने प्रिया से कहा. वो हँसने लगी, “आई रियली विश यार”.  उसनें धीरे से कहा और फिर उन्हीं बत्तखों की तरफ देखने लगी, “जानते हो? दीदी को बत्तखें बहुत क्यूट लगती थी और मुझे बेहद स्टुपिड. अपने शहर की सचिवालय वाली सड़क याद है न तुम्हें? कैसे अक्सर गर्मियों की शामों में बत्तखें सड़कों से अपनी फ़ौज लेकर गुज़रती थीं. पता है एक बार दीदी ने गाड़ी रुकवा दी थी और कैमरे से बत्तखों की तस्वीर लेने लगी थी. मुझे इतना गुस्सा आया था न उस समय दीदी पर. मैं तो उनसे लड़ पड़ी थी, कैमरे की रील लगभग खत्म होने को थी, मुश्किल से चार पाँच फोटो और लिए जा सकते थे और दीदी ने वो रील बत्तखों पर खर्च कर दिए थे. रात में मैं खूब लड़ी थी उनसे, मेरा फोटो सेसन हो जाता बचे हुए रील में. जानते हो उन दिनों मुझे लगता था कि बत्तखें स्टुपिड हैं, लेकिन असल में स्टुपिड बत्तखें नहीं थी..मैं थी”.
“हम्म..सब जानता हूँ मैं.." मैंने फिर से शरारत भरे लहजे में कहा, 
"अच्छा..? क्या जानते हो तुम? बताओ ज़रा..  
"यही कि तुम उन दिनों सच में स्टुपिड थी. मतलब ऐसा नहीं है कि अब समझदार हो गयी हो, बस उन दिनों ज्यादा स्टुपिड थी तुम...” मैंने कहा. 
“हाँ, ये तो सच है यार, !! इस बात पर तो आई एम विद यू !!” उसनें कहा, और हम दोनों एक साथ हँसने लगे थे. 

कुछ देर तक हम दोनों झील में तैरती उन बत्तखों को देखते रहे थे. “अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हें याद है इस झील के पास हम दोनों पहली बार कब आये थे?” प्रिया ने पूछा.
“हाँ बिलकुल याद है, बारहवीं के इम्तिहान के बाद. दीदी भी थीं हमारे साथ, वही हमें घुमाने लायीं थीं”.
प्रिया के चेहरे पर मुस्कान उभर आई, “हाँ...लेकिन उस वक़्त हमें नहीं पता था न कि वही आखिरी साल होगा जब दीदी साथ रहेंगी. जानते हो, उसके अगले साल मैं लोदी गार्डन अकेले आई थी, ऐसा ही बारिशों वाला दिन था वो भी, और इसी पत्थर पर बैठकर मैं खूब रोई थी. 

प्रिया के अचानक इस तरह संजीदा होने से मैं थोड़ा घबरा सा गया था. "प्रिया तुम ठीक तो हो?"
वो हँसने लगी.. “अरे डरो नहीं, मैं एकदम ठीक हूँ, बस यूहीं कुछ याद आ गया था". उसनें कहा और कुछ देर तक बेंच पर किसी अदृश्य दाग को कुरेदते हुए उसनें पूछा “तुम्हें मुकेश का वो गाना याद है न? तुम्हारा तो पसंदीदा है - जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले?” 
“हाँ, तुम्हें मैंने ही तो सुनाया ये गाना पहली बार...”
“यस...! अपने उस मर्फी वाले टेपरिकॉर्डर पर. मुझे याद है.." कहकर वो चुप हो  गयी. कुछ देर चुप रहने के बाद उसनें मेरी ओर देखा, “जानते हो दीदी के जाने के एक साल बाद जब मैं यहाँ आई थी न, उस दिन यहाँ बैठे-बैठे मैं भी कुछ-कुछ उस गाने जैसा ही सोच रही थी, कि दीदी कहाँ गयीं होंगी? क्या सच में कोई ऐसी जगह है, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं, और दीदी वहाँ चली गयीं हैं? कैसी जगह होगी यार वो? क्या ये नहीं हो सकता कि मैं बस एक बार, सिर्फ एक बार वहाँ जाऊं, और उन्हें देख कर वापस आ जाऊं. बस एक झलक. कैसी हैं वो ये पता कर के वापस यहाँ आ जाऊं..” कहते हुए उसकी आँखें मुझपर उठ आयीं थी.

मुझे समझ नहीं आया कि मैं प्रिया से क्या कहूँ. मुझे यूँ असमंजस में पड़ा देख उसनें कहा, एक मजेदार बात बताऊँ तुम्हें. हँसोगे तो नहीं न?
“नहीं बाबा..नहीं हसूँगा ..बोलो तो....” मैंने उसकी हथेली को अपने हाथों में ले लिया.

“तुमने कभी गौर किया है कि इस झील के किनारे इस बेंच पर या किसी भी और झील के किनारे, किसी भी और बेंच पर बैठने वक़्त मैं हमेशा अपने बगल में इतना 'स्पेस' क्यों छोड़ देती हूँ?”
“हाँ, ताकि तुम मेरे और करीब बैठ सको....”
“नो इडियट! तुम इतने भी स्पेशल नहीं हो. यू नो, ये जगह मैं हमेशा दीदी के लिए छोडती हूँ. ताकि वो मेरे बगल में बैठ सके. जानते हो वो रहती हैं हमेशा मेरे आसपास. हर जगह.”

“जानता हूँ मैं...” मैंने कहा.

“पता है, मैं जब पिछली बार यहाँ आई थी इसी बेंच पर बैठी थी, अकेली थी, और दीदी को याद कर के खूब रो रही थी. तब वो पहली बार मुझे दिखी थी. पूरे एक साल बाद, उन्हीं कपड़ों में जिसमें उन्हें मैंने आखिरी बार देखा था. तुम नहीं थे उस वक़्त दिल्ली में, उस दिन उन्होंने ही मुझे चुप करवाया था. हमनें खूब बातें की थी.." एक चमकीली सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी थी.. कुछ देर के पौज के बाद उसनें फिर कहा, यू नो, उस दिन एक और अजीब बात हुई थी. मैं इसी बेंच पर बैठी थी, और मुझे पता भी नहीं चला ये बत्तखें कब मेरे इतने करीब चली आई थी. बिलकुल मेरे पैरों के पास. और पता है, मुझे डर नहीं लगा. मुझे डर लगना चाहिए था न इन बत्तखों से? मुझे हमेशा इनके चोंच बड़े क्रीपी लगते थे, तो मुझे डरना चहिये था? राईट? लेकिन यू नो व्हाट? मुझे इन बत्तखों पर प्यार आने लगा था. और मुझे ये बत्तखें स्वीट लगने लगी. लेकिन सबसे बड़ा रेवलेशन मुझे उस दिन रात में नींद में हुआ, मुझे सपनें में एक आवाज़ सुनाई दी थी, वे बत्तखें तुम्हारे पास नहीं आई थी, बल्कि तुम्हारे बगल में जो पीले समीज सलवार में लड़की बैठी थी उसके पास आई थी. यू नो, पीले समीज सलवार में दीदी थी, जो मेरे बगल में बैठी थीं.." कहते हुए प्रिया चुप हो गयी. एकदम चुप.  मैंने प्रिया के हथेलियों को अपनी हथेलियों में जकड़ लिया.  

“पता है यार, कुछ दिनों पहले मैं अपनी पुरानी अल्बम देख रही थी, And I was really amazed, कि मेरी शक्ल कितनी बदल गयी है, लेकिन दीदी, वो अब भी वैसी ही हैं. डिट्टो.. सेम टू सेम! जानते हो मैं बूढी हो जाउंगी और बड़ी  वीयर्ड सी दिखने लगूंगी. तुम भी बूढ़े हो जाओगे, दांत झड़ जायेंगे तुम्हारे, हमारे आसपास के सभी लोगों पर उम्र का असर दिखेगा, लेकिन दीदी...वो वैसी ही दिखेंगी हमेशा. जैसे एल्बम की उस आखिरी तस्वीर में वो दिखती हैं, मस्त..हंसमुख..सुन्दर..स्वीट एंड ईटर्नली ब्यूटीफुल ! यू नो, उनकी एक बड़ी सी तस्वीर मेरे कमरे की दीवार पर लगी है, जिसे तुमने फ्रेम करवाया था, याद है न तुम्हें वो तस्वीर उनकी? पहले जब वो थीं, मुझे उनकी वो तस्वीर बेहद आम सी लगती थी लेकिन अब असाधारण तस्वीर लगती है. एक सम्मोहित कर देने वाली मुस्कराहट है उसमें दीदी की. मैं जब भी उदास होती हूँ उनकी उस तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर वो मुझे बहुत समझाती हैं, कभी कभी गुस्से में डांट भी देती हैं – ‘ये क्या बेवकूफी है प्रिया? क्या हुआ है तुम्हें? शक्ल क्यों लटकी हुई है तुम्हारी? बस इतने में ही घबरा गयी? देखो मैं इस दुनिया से बाहर आकर भी नहीं घबराई, अब भी वैसे ही हँस रही हूँ जैसे पहले हँसती थी और तुम? तुम्हारी वो हँसी कहाँ चली गयी? तुम्हारी हँसी तो मुझसे भी प्यारी है, वापस लाओ अपनी उस हँसी को एंड बी ब्रेव!' जानते हो फिर मैं सच में खूब हंसती हूँ. उनकी डांट के बाद I Feel So Relaxed. वो अब भी  रहती हैं मेरे आसपास..हर जगह..हर समय. जैसे कल रात, जब मैंने तुम्हें कॉल किया था. मेरे बगल में ही थीं वो. डांट रही थी मुझे, कि मैं क्यों तुम्हें इतनी रात गए परेशान कर रही हूँ. यू नो न, अन्फॉर्चनट्ली तुम्हारी बात जब भी आती है, वो मुझे छोड़ कर हमेशा तुम्हारी साइड ले लेती हैं, ऑल्वेज़ !! " कहते हुए प्रिया ने एक बार अपनी दायीं तरफ देखा और मुहँ बिचका दिया, जैसे सच में वो अपनी दीदी से इस बात की शिकायत कर रही हो.

मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी, मैंने कहा कुछ नहीं, बस प्रिया को अपने एकदम करीब खींच लिया. उसनें अपना सर मेरे कंधे पर टिका लिया और आँखें मूँद ली. मैंने झील में तैरती बत्तखों को देखा, और फिर गरजते बादलों की आवाज़ सुनी. बारिश किसी भी वक़्त हो सकती है, मैंने प्रिया से कहा. प्रिया ने लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. उसकी साँसें मेरे गालों को सहला रही थीं. धीरे से मैने उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें खोल दी. “मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती”, उसनें कहा.

“हम भींग गए तो?” मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों से उठा दिया.

“तो हम गल थोड़े ही जायेंगे...” उसनें कहा. एक बहुत हलकी सी शरारत वाली मुस्कान उसके चेहरे पर चली आई थी.
“और वो तुम्हारी फिल्म? जो तुम मुझे दिखाना चाहती हो? उसका वक़्त हो रहा है न..” मैंने कहा. वो कुछ देर तक मुझे अपलक देखती रही जैसे तय नहीं कर पा रही हो कि वो वाकई फिल्म देखने जाना चाहती है या यहीं बैठी रहना चाहती है. फिर अगले ही पल वो एकदम उठ खड़ी हुई, “हाँ हाँ चलो चलो, यहाँ बैठे-बैठे बारिश में भींग कर मैं बीमार होना नहीं चाहती, अभी पूरे सप्ताह तुम्हारे साथ घूमना जो है.


बातें बाकी...

6 comments:

  1. कभी किसी की मुस्कराहट से अंदाज़ा नहीं होता न कि उसके पीछे कितने आँसू भी हो सकते हैं...:)
    Loved it, as always...:*

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  2. मैं आपको पढ़ता हूँ काफी पहले से। मुझे मालूम हैं जब पहली बार आपको पढने लगा था वो मेरे किसी सेमेस्टर का कोई एग्जाम था और मैं दो तीन घंटे तक आपके ब्लॉग पे ही घूमता रहा। वैसे मैं कई बार आपके ब्लॉग पे आता हूँ पुराने किस्से कहानियाँ पढकर चला जाता हूँ। कभी कमेंट नही करता। क्यों की मैं आपकी कहानियो में इतने एहसास महसूस करता हूँ की बयाँ नही कर सकता लेकिन आज ये लोधी गार्डन की तस्वीर और जिस सीमेंट की बेंच का ज़िक्र हुआ हैं न। उसके साथ मेरी भी एक कहानी हैं तो बस आपको शुक्रिया बोलना था, मुझे मेरी कहानी याद दिलाने के लिए और अगले भाग का बेसब्री से इंतजार रहेगा। लव यू भैया.. आपका छोटा भाई :-)

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  3. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस पर आपका योगदान सराहनीय है. हम आपका अभिनन्दन करते हैं. हिन्दी ब्लॉग जगत आबाद रहे. अनंत शुभकामनायें. नियमित लिखें. साधुवाद.. आज पोस्ट लिख टैग करे ब्लॉग को आबाद करने के लिए
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  5. नाम वही, काम वही लेकिन हमारा पता बदल गया है। आदरणीय ब्लॉगर आपका ब्लॉग हमारी ब्लॉग डायरेक्ट्री में सूचीबद्व है। यदि आपने अपने ब्लॉग पर iBlogger का सूची प्रदर्शक लगाया हुआ है कृपया उसे यहां दिए गये लिंक पर जाकर नया कोड लगा लें ताकि आप हमारे साथ जुड़ें रहे।
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  6. कैसे लिख लेते हो इतना अच्छा

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया