Monday, December 25, 2017

पुराने किले में बिता अक्टूबर का एक दिन

"मैं पुराने किताबों के अलमारी के पास चला आया..जैसे वहां कोई छिपा खज़ाना हो. हर कमरे में कितने भेद भरे कोने होते हैं, वही किताबें होती हैं जो हर घर में होती हैं, कहीं से चाक़ू बहार निकल आता है, कहीं हाथ छुआते ही एक दूसरा घर खुल जाता है, एक तस्वीर, एक किताब, एक तोहफा – घर के भीतर एक दूसरा घर... एक रौशनी, एक दरवाज़ा, दिल्ली के पुराने किले में बिता अक्टूबर का वो दिन, एक अधूरी कहानी और प्रिया. ..जाने इस बार की दिवाली में घर की सफाई ने क्या क्या याद दिला दिया. "

वह प्रिया के दिल्ली आने के दिन थे. वो अपनी छुट्टियों में दिल्ली आई थी. मेरे घर वो पहली बार भैया और भाभी की एनिवर्सरी के दिन आई थी. उस रात ज़ोरदार बारिश हुई थी. रात के ढाई बजे प्रिया ने मुझे फ़ोन कर के धमकाया था और अगले दिन सुबह उसनें लोदी गार्डन घुमने के लिए बुला लिया था. खान मार्केट के एक कैफे में हमनें सुबह की कॉफ़ी पी थी और लोदी गार्डन के झील के पास चले आये थे. बहुत देर तक हम दोनों झील के किनारे लगी सीमेंट की एक बेंच पर एक दुसरे का हाथ थामे बैठे रहे थे. झील में तैरती बत्तखों को देखकर प्रिया को अपनी दीदी की याद आ गयी थी, और उसनें मेरे कंधे पर अपना सर टिका कर अपनी आखें बंद कर ली थी. हलकी बारिश होने लगी थी और उसकी आँखें भींग आई थी. हम बहुत देर तक उस बेंच पर बैठे रहे, भींगते हुए.

भींगते हुए ही हम दिल्ली गेट के पास डिलाइट सिनेमा हॉल पहुचे, जहाँ एक फिल्म की टिकट प्रिया ने पहले से ले रखी थी. प्रिया के फिल्म देखने के प्लान से मैं थोड़ा चिढ़ सा गया था, इतने रूमानी मौसम में हॉल में बैठकर फिल्म देखने से ज्यादा डिप्रेसिंग चीज़ दूसरी कोई नहीं हो सकती. लेकिन प्रिया पर तो फिल्म देखने का भूत सवार था. डिलाइट सिनेमा हॉल कुछ ख़ास वजह से प्रिया के सबसे पसंदीदा थिएटर में से एक था. हम दोनों डिलाइट पहुँच तो गए थे, लेकिन प्रिया ने मुझे अब तक नहीं बताया था कि उसनें कौन सी फिल्म की टिकट ले रखी है. डिलाइट में दो सिनेमा के स्क्रीन हैं, दोनों पर दो अलग अलग फ़िल्में लगी थी. एक मेरी देखी हुई थी, और दूसरी मैंने नहीं देखी थी. मुझे लगा तो था कि जिस फिल्म को मैंने नहीं देखी है, प्रिय ने उसी फिल्म की टिकट ली होगी. लेकिन प्रिया ने मेरी देखी हुई फिल्म की ही टिकट ले रखी थी. थोडा सा मैं इरिटेट भी हो गया, “तुम्हें तो मालूम था मैंने ये फिल्म देख ली और फिर भी तुमनें उसी फिल्म की टिकट दोबारा से ले ली..” मैंने प्रिया से कहा. लेकिन प्रिया ने मेरी इस इरिटेसन पर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया. बड़े बेपरवाही से उसनें कहा, “दूसरी बार देख लेने में जेल नहीं हो जाएगी तुम्हें...”

प्रिया मुझे ये फिल्म दोबारा क्यों दिखाने को उत्सुक थी, ये बात मुझे फिल्म के दौरान मालूम चल गयी. फिल्म का टाइटल उस शहर के नाम पर था, जहाँ प्रिया उन दिनों पढ़ रही थी. प्रिया चाहती थी फिल्म के जरिये वो मुझे अपना शहर लन्दन दिखाए. उसके इस पागलपन पर मुझे ऐक्चूअली हँसी आ गयी थी. “क्या मतलब है यार? तुम बस एक शहर दिखाने के लिए मुझे तीन घंटे इस सिनेमा हॉल में बिठाए रहोगी? इससे तो बेहतर होता कि घर पर आराम से बैठकर तुम मुझे लन्दन की डाक्यूमेन्टरी दिखा देती..” प्रिया ने मेरी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि मुझे ऐसे आँखें तरेर कर देखा कि मैंने आगे कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा और चुपचाप उसके पीछे पीछे हॉल के अन्दर चला आया. पूरे फिल्म के दौरान उसनें अपने उस शहर के बारे में बहुत कुछ बताया. कुछ तो मेरी समझ में आया भी, बाकी बाउंसर की तरह मेरे सर के ऊपर से निकल गया.

जब हम डिलाइट से निकले तो बारिश लगभग थम चुकी थी. फिल्म देखने के बाद का प्लान बड़ा सिंपल और सीधा सा था. फिल्म के बाद हमें चांदनी चौक जाना था, जहाँ प्रिया को पराठे वाली गली के ‘ओवररेटेड’ पराठे खाने थे, उसके बाद हमें लाल किला जाना था, और फिर पुराने किले में शाम बितानी थी.

सुनने में बड़ा सिंपल प्लान लग रहा है न? बिना किसी पेंच के? लेकिन जब बात प्रिया की हो रही हो तो कोई भी प्लान उतना सिंपल नहीं होता जितना आप एक्स्पेक्ट कर रहे होते हैं. एक्चुअली प्रिया के साथ तो आप कुछ भी पहले से एक्स्पेट कर ही नहीं सकते, वो कहते हैं न, ‘Expect The Unexpected’, वही होता है प्रिया के साथ हमेशा.

दिल्ली गेट से चांदनी चौक ज्यादा दूर नहीं थी. दरयागंज वाली सीधी सड़क थी जो चांदनी चौक जाती थी. रिक्शा या ऑटो से जाए तो दिल्ली गेट से चांदनी चौक पहुँचने में मुश्किल से दस मिनट का वक़्त लगता है. लेकिन प्रिया और मुझे ये दस मिनट की दूरी तय करने में करीब दो घंटे का वक़्त लग गया था. हम दरयागंज की गलियों में भटक गए थे. हमारा वैसे तो भटकने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मैं प्रिया के ओवर कांफिडेंस कॉन्फिडेंस के झांसे में आ गया था.

डिलाइट से निकलते ही मैंने प्रिया से कहा कि बस या फिर ऑटो से हम चांदनी चौक जा सकते हैं. बस का आप्शन तो प्रिया ने सिरे से ही खारिज कर दिया था. उलटे उसनें मुझे डांट दिया था. दिल्ली के बसों में चढ़ना उसे बिलकुल पसंद नही था और ऑटो की बात पर प्रिया ने ये कह कर मुझे चुप करा दिया कि ”जो पैसे ऑटो में खर्च करोगे, उतनी की मुझे कॉफ़ी पिला देना...कितना रोमांटिक मौसम है, चलो न पैदल चलते हैं..”

“पैदल”? मैं थोड़ा चौंक सा गया.
“हाँ, पास में ही तो है..”, प्रिया ने पूरे विश्वास के साथ कहा.

हालाँकि मैं जानता तो था कि दरयागंज वाली सीधी सड़क से पैदल भी जायेंगे तो घूमते टहलते बीस पच्चीस मिनट में चांदनी चौक आराम से पहुँच जायेंगे.. लेकिन प्रिया को सीधे रास्ते पर चलना आता ही नहीं था. डिलाइट के पीछे से जो गली निकल रही थी, उसकी और इशारा करते हुए उसनें कहा, “चलो न, उस गली से चलते हैं. जल्दी पहुँच जायेंगे चांदनी चौक..”

मुझे थोड़ा शक हुआ... “तुम ये रास्ता जानती हो?”, मैंने पूछा.

“अरे बड़ा सीधा सा रास्ता है. बस सीधे चलना है हमें, दो-तीन गलियों को पार करो और सामने चाँदनी चौक का सिसगंज गुरुद्वारा दिख जाएगा तुम्हें..” उसने कुछ ऐसे कॉंफिडेंट होकर रास्ते के बारे में बताया कि जैसे दरयागंज की गलियों से बहुत वाकिफ है. मुझे उस समय दिल्ली आये हुए कुछ ही महीने हुए थे, तो मैं रास्तों से ज्यादा वाकिफ नहीं था. प्रिया के ऐसे कॉन्फिडेंस को देखकर मुझे लगा, दिल्ली में बचपन से रही है, तो शायद रास्तों का आईडिया हो.

प्रिया को लेकिन दरयागंज या पुरानी दिल्ली की गलियों के बारे में कुछ भी अंदाज़ा नहीं था. पराठे वाली गली के अलावा तो प्रिया को पुरानी दिल्ली की किसी गली का नाम तक नहीं पता था. ये बात मुझे तब पता चली जब लगभग एक घंटे तक दरयागंज की गलियों में भटकने के बाद हम वापस दरयागंज के मुख्य सड़क पर गोलचा के पास निकल आये थे. मैं उसी वक़्त समझ गया था, ये बस ऐसे ही मुझे टहला रही है, रास्ते वास्ते का इसे कोई आईडिया नहीं है.

थोडा डांटते हुए उसे मैंने रिक्शे पर बिठाया और वहां से पराठे वाले गली के तरफ हम चल दिए. रिक्शा पर बैठते ही प्रिया बड़ी रुखाई से मुझसे कहा, “तुम्हारी वजह से मैं गलियों में भटक गयी थी. तुमनें मुझे बातों में उलझा लिया था... वरना मैं तो जाने कितनी बार इस रास्ते से आई हूँ”. उसकी इस बात पर मुझे बड़ी तेज़ हँसी आई, जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से रोका.

तीन घंटे की फिल्म, और दो घंटे रास्ते में भटकने के बाद हमारे पास इतना वक्त नहीं था कि लाल किला और पुराना किला दोनों घूम लें, दोनों में से किसी एक जगह ही हम जा सकते थे. हालाँकि प्रिया ने तो खूब जिद की, कि वो दोनों जगह घूमेगी, लेकिन मैं अड़ा रहा, कि कोई एक जगह जाना है.

बहुत सोच विचार कर प्रिया ने पुराने किले को चुना. लाल किले से प्रिया को कोई ख़ास लगाव नहीं था. हाँ, पुराना किला प्रिया के दिल के ज्यादा करीब था. हमारी न जाने कितनी यादें पुराने किले से जुड़ी थी. ऐसी बात भी नहीं थी कि सिर्फ मेरे साथ बिताये दिनों की वजह से प्रिया को पुराना किला से लगाव था. शुरुआत से ही पुराना किला उसके दिल के बेहद करीब रहा है. अब इसकी क्या वजह है, ये तो खुद प्रिया को भी नहीं मालूम थी.

वैसे तो प्रिया को दिल्ली के हर ऐतिहासिक ईमारत से प्यार था. हुमायूँ का मकबरा, क़ुतुब मीनार, अग्रसेन की बाउली, लाल किला, हौज़ खास फोर्ट, तुगलकाबाद फोर्ट या फिर पुराना किला.. ये दिल्ली में प्रिया के हैंगआउट प्लेस थे और उसे इन सब जगह जाना और समय बिताना खूब पसंद था. इन सब में लेकिन पुराना किला एक ऐसी जगह थी जहाँ आकर प्रिया को हमेशा ख़ुशी मिलती थी. वो अक्सर कहा करती थी, कि जब भी मैं उदास होती हूँ, यहाँ वक़्त बिताने आ जाती हूँ. यहाँ मेरी उदासियाँ भाग जाया करती हैं.

अब कभी सोचता हूँ तो बड़ा अजीब लगता है, स्कूल के दिनों में प्रिया को इतिहास बिलकुल पसंद नहीं था. अक्सर वो हिस्ट्री के क्लास में सो जाया करती थी. इस वजह से मैडम से खूब डांट भी सुनती थी, लेकिन फिर भी ऐसे हिस्टॉरिकल जगहों से उसे खूब लगाव था. राजा रानियों की ऐतिहासिक कहानियाँ या पुराने हिस्ट्री के नोट्स से वो फैसनेट हो जाया करती थी. वो अक्सर इतिहास की कहानियों से खुद को रिलेट भी कर लेती थी. किसी भी राजा या रानी की कहानी उसनें कहीं पढ़ी या सुनी.. वो उस कहानी में खुद को भी घुसा लेती थी, और फिर अपनी मॉडिफाइड कहानी मुझे सुनाती.


जितने भी ऐसे ऐतिहासिक इमारतें दिल्ली में थीं, वहाँ प्रिया ने अपनी स्टोरी-टेलिंग सेशन के लिए एक ख़ास जगह चुन रखी थी, जहाँ मैं और वो अक्सर बैठते थे, और वो मुझे अपनी मॉडिफाइड कहानियाँ सुनाती थी. पुराने किले में प्रिया की सबसे पसंदीदा जगह थी किला ए कुहना मस्जिद के ठीक सामने लगे पत्थर के रेलिंग, जिनपर बैठना उसे खूब पसंद था. वहाँ से शहर दिखाई देता था. सामने भैरव मंदिर और आईटीओ जाने वाली सड़क साफ़ दिखाई देती थी. उन पत्थरों के नीचे सीढ़ियाँ बनी थी जहाँ किले के पुराने खंडहर थे, प्रिया को उन खंडहरों में घूमना भी खूब पसंद था. खंडहरों में घूमते हुए न जाने कितनी कहानियाँ वो तलाश लिया करती थी, और फिर ऊपर आकर जब हम उन पत्थरों पर बैठते, वो मुझे अपनी तलाश की हुई मनगढ़त कहानियाँ सुनाया करती थी. मुझे ये उसका पागलपन लगता था. कभी कभी उसकी कहानियां एकदम इललॉजिकल होती, तो कभी कभी उसकी कहानियों पर प्यार भी आता था.

“जानते हो? मैं सोचती हूँ काश हमें एक टाइममशीन मिल जाए और हम दोनों फिर से उन्हीं दिनों में चले जाए तो?” उन्हीं पत्थरों के रेलिंग पर बैठे हुए प्रिया ने मेरी तरफ देखा.
“ह्म्म्म...”, मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, बस एक उबाऊ सी हामी भर दी.
उसनें बिना मेरी परवाह किये अपनी बात आगे बढ़ाई.. “सोचो, मैं अगर दिल्ली की रानी होती, और तुम....तुम होते मेरे दुश्मन.....”
“दुश्मन.....?? यार तुम हमेशा अपनी कहानियों में मुझे विलन क्यों बना देती हो...” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“चुप करो, और आगे सुनो.. “ उसनें कहा, “तुम यहाँ दिल्ली पर आक्रमण करने आते हो लेकिन तुम्हें ठीक से लड़ना भी नहीं आता. मेरी पूरी सेना पीछे खड़ी रहती है और मैं अकेले ही तुम्हें और तुम्हारी सेना को हरा देती हूँ. उसके बाद मैं तुम्हें बंदी बना लेती हूँ और हर रोज़ लोहे के बेड़ियों से तुम्हारी खूब कुटाई करती हूँ, और साथ ही साथ तुमसे अपने अपने महल के बर्तन भी धुलवाती हूँ....I mean Just Imagine, अगर ये कहानी सच में हो जाए तो? और क्या पता ऐसा कुछ हुआ भी हो पहले कभी...लोगों ने थोड़े न पूरा इतिहास पढ़ रखा है..” उसनें शरारत भरी नज़रों से मेरी और देखा.

“हम्म...”, मैंने एक लम्बी साँस ली.. “लेकिन ये तो बताया नहीं कि मुझे दुश्मन क्यों बनाया तुमनें? तुम हमेशा अपनी कहानियों में मुझे ऐसे ही रोल क्यों देती हो? कभी जल्लाद बना देती हो, कभी घोड़ा, तो कभी ऐसा गधा जो महल के बहार जंजीरों में जकड़ा रहता है और हर आने जाने वाला व्यक्ति उसे चप्पलों से मारते जाता है. यार कभी ऐसी कहानी भी तो सुनाओ जिसमें तुम रानी बनो और मैं तुम्हारा राजा, महल के बागों में हम रोमांटिक डुएट गायेंगे...सोचो कितनी स्वीट सी होगी हमारी वो कहानी..”

उसनें झाल्लाई सी दृष्टि से मेरी ओर देखा, “अरे यार तुम भी न...Out of the Box सोचो..वही घिसी-घिसाई कहानी अब नहीं अच्छी लगती, और वैसे भी, कहानी में भी तुमसे प्यार करूँ, और ज़िन्दगी में भी? अभी तो तुमसे प्यार कर ही रही हूँ न. एक में ही खुश रहो.. इतने भी अच्छे नहीं हो तुम कि तुम्हें दो बार झेल सकूँ..” ये कहते ही वो सहसा चुप हो गयी. शायद खुद के ही कहे कुछ शब्दों से वो चौंक गयी थी.

चौंक तो मैं भी गया था.

बातों बातों में ही सही, उसनें आज पहली बार ‘प्यार’ शब्द का प्रयोग किया था. मुझसे लड़ने और चिढ़ाने के फ्लो में ही आज उसनें पहली बार इन्डरेक्ट्ली मुझसे कहा था कि वो मुझसे प्यार करती है. वो भी ये बात समझ रही थी. हम दोनों अचानक चुप से हो गए.

उसकी लम्बी ख़ामोशी को मैंने ही तोड़ा.. “चलो मजाक में ही सही, तुमने आज पहली बार इकरार तो किया. मैं भी कह दूँ अब?”
“शट अप..”, उसनें कहा और मेरे होटों पर अपनी उँगलियाँ रख दी. “प्लीज आगे कुछ मत कहना..” वो एकदम चुप हो गयी. उसकी आँखें भींग आई थी. उसका मानना था कि प्यार का ऐसे इज़हार करने से प्यार टूट जाता है. अधुरा रह जाता है. हलाकि उसके इस विश्वास को अक्सर मैं ‘व्हाट रबिश’ कह कर मजाक में उड़ा दिया करता था.

मैंने उसे कई उदाहरण देकर समझाने की कोशिश की थी, कि ये सिर्फ तुम्हारा वहम है..और कुछ नहीं. लेकिन अपने इस विश्वास पर वो अडिग थी. उसनें अपनी ज़िन्दगी में ये देखा था, उसके अन्दर इस बात का भय था कि अगर वो किसी से भी ये कहे कि वो उसे प्यार करती है तो वो उससे दूर चला जाता है. पहले साल उसकी नानी, फिर उसके दुसरे साल दीदी और तीसरे साल छोटा भाई.. तीन साल में ये तीनों अचानक से प्रिया की ज़िन्दगी से बहुत दूर चले गए थे, और इत्तेफाक इतना भयानक था कि तीनों के जाने के एक दो दिन पहले, किसी न किसी तरह से प्रिया ने सबसे कहा था कि वो उनसे कितना प्यार करती है, और तीनों इस दुनिया से चले गए थे. इस बात ने प्रिया को बुरी तरह से झकझोर दिया था.

मैंने बहुत समझाया प्रिया को, कि जो पहले हुआ वो महज एक इत्तेफाक था. लेकिन वो ऐसा नहीं मानती थी. उसके दिल में तो एक डर बैठ गया था. मुझसे दुनिया भर की बातें करती थी वो, हज़ार तरह के रूमानी किस्से सुनाती थी, फिल्मों में हीरो को प्यार का इज़हार करने समय डरते देख थिएटर में ही चिल्ला कर कहती थी, कितना डरपोक आदमी है, आई लव यू भी नहीं कह सकता हीरोइन से? लेकिन खुद उसनें मुझसे कभी प्यार के ये ढाई शब्द कभी नहीं कहे थे, और आज मजाक के फ्लो में ही सही, उसनें मुझसे पहली बार ये बात कही थी. उसका डर अपनी जगह था, लेकिन मैं सिर्फ इस बात से बहुत खुश था कि जो मैं सुनना चाहता था, उसनें आख़िरकार मुझसे कह डाला.

प्रिया बिलकुल खामोश हो गयी थी. उसके चेहरे पर हल्का संकोच और भय घिर आया था. वो मेरी तरफ न देखकर सड़क की तरफ देखने लगी थी.

अक्टूबर की शाम थी, और बारिश की वजह से हवा में हलकी ठंडक आ गयी थी. हम दोनों पत्थरों की रेलिंग पर ही बैठे थे कि अचानक से तेज़ हवा का एक रेला आया, लगा जैसे आँधी चली हो और प्रिया मेरे एकदम करीब आ गयी. उसनें कस कर मेरा कन्धा पकड़ लिया, और अपनी आँखें बंद कर ली. जब हवा थमी, उसने आँखें खोली..वो कुछ देर तक अपलक मुझे देखते रही. “हमारे साथ कुछ गलत तो नहीं होगा...”, उसनें मुझसे पूछा.. “तुम रहोगे न मेरे पास हमेशा...”

उसकी आँखें डबडबा सी गयी थी. मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया, “हमारे साथ कुछ भी नहीं होगा.. जैसे मैं अभी तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ हूँ..वैसे ही हम दोनों उम्र भर एक दुसरे के साथ रहेंगे.”

एक रुखी सी मुस्कराहट उसकी आँखों से झाँकने लगी थी. हम दोनों बहुत देर तक ऐसे ही बैठे रहे, एक दुसरे का हाथ थामे.

शाम घिर आई थी, और किले के चारों तरफ बत्तियां जलने लगी थीं. किले के बंद होने का समय हो चला था. चौकीदार सभी लोगों को अब निकलने के लिए कह रहे थे.

“चलो, हमें अब चलना चाहिए..”, मैंने प्रिया से कहा. वो उठी लेकिन मेरे हाथों को अब तक उसनें अपने हाथों में जकड़े रखा था. कुछ देर तक हम वहीँ खड़े रहे, पत्थरों से सटे हुए.. सामने भैरव मंदिर था और आईटीओ की सड़क..मैंने बहुत धीरे से उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें ऊपर उठाई, हलकी मुस्कराहट उसके आँखों में सिमट आई थी. एक दुसरे का हाथ थामे हम दोनों किले के दरवाज़े के बाहर आ खड़े हुए.

कुछ देर तक मैं और प्रिया किले के उस बड़े से दरवाज़े के पास ही खड़े रहे.. कुछ देर तक प्रिया उस दरवाज़े को देखती रही और फिर जोर से, लगभग चिल्लाते हुए कहा उसनें, “मैं फिर आऊंगी, बहुत जल्दी...”, मेरी बाहों को प्रिया ने कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया, “इसे भी लेते आउंगी. हम दोनों एक साथ आयेंगे, बहुत जल्दी...” कह कर वो चुप हो गयी और कुछ देर तक किले को बस देखती रही, और फिर एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ उसनें किले को हाथ हिलाते हुए विदा कहा और हम दोनों एक खूबसूरत दिन बिता कर वापस लौट आये.


[ Opening Paragraph : A Nirmal Verma Inspiration ]
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Monday, October 30, 2017

तुम्हारे नाम पर एक कविता - प्रियंका गुप्ता की तीन कवितायें

आज बेहद ख़ास दिन है मेरे लिए. आज जन्मदिन है मेरी दीदी, प्रियंका गुप्ता का. इस ब्लॉग से वो मेरे से ज्यादा जुड़ी हुई हैं. वो नहीं होती तो शायद ये ब्लॉग बहुत पहले बंद हो चुका होता. आज उनके जन्मदिन पर उन्हीं की तीन अप्रकाशित कविताएँ यहाँ साझा कर रहा हूँ.. 

1.  चलो कुछ देर खामोश बैठते हैं 

चलो,
कुछ देर खामोश बैठते हैं
और सुनते हैं
हमारे दिलों के
धड़कनों  को;
या फिर
दूर से आती किसी ट्रेन की
सीटी की गूँज
और उसके साथ
अपने पाँव के नीचे
हल्के से थरथराती
ज़मीन का कम्पन;
सुनना हो तो सुनो
घर के पिछवाड़े बने
उस छोटे से बगीचे में
एक अनदेखे कोने में छिपे
झींगुरों का संगीत;
और अगर कुछ देर फुरसत हो
तो सुन सकते हो
नदियों को गुनगुनाते हुए;
तुम जब चाहो तब
सुन सकते हो इनमें से कुछ भी
अपनी पसंद के हिसाब से
पर कभी कोशिश करना
अपनी पूरी ताकत लगा के सुनने की
मेरे अबोली अनगिनत आवाज़ें...।

2. चलो लौट चलते हैं फिर 

चलो,
लौट चलते हैं फिर
उसी दोराहे पर
जहाँ से अलग हुए थे
हमारे रास्ते
बदल गईं थीं
हमारी मंजिलें
चलो,
थोड़ा और पीछे चला जाए
कुछ दूर साथ चलते हुए
मिल जाएँ फिर से कहीं
किसी दोस्त से अजनबी की तरह
जिनके बीच खामोशियाँ हों
पर अबोला नहीं
चलो,
एक बार फिर
विदा लेते हुए
वादा करें कोई
और
एक बार फिर
भूल जाएँ
उन्हें निभाना...।

3. तुम्हारे नाम पर एक कविता 

मैं रचूँगा
तुम्हारे नाम पर एक कविता
उकेरूँगा अपने मन के भाव
कह दूँगा सब अनकहा
और फिर
बिना नाम की उस कविता को
कर दूँगा
तुम्हारे नाम
क्योंकि
मैं रहूँ न रहूँ
कविता हमेशा रहेगी
तुम्हारे नाम के साथ...|



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Monday, June 26, 2017

झील में तैरती बत्तखें

कौन ऐसा खुशनुमा दिल न होगा जिसे बारिश की रुमानियत न पसंद हो, और बात जब उस दीवानी सी प्रिया की हो, तो बारिश में घूमने से कौन मना कर सकता है ? पिछली पोस्ट में आपने प्रिया के दिल्ली आने और मेरे भैया भाभी की शादी की सालगिरह में शामिल होने के किस्से पढ़े, और साथ ही मुझे रात के ढाई बजे जगा के दी गई उसकी धमकी की दास्तां भी...अब आगे पढ़िए उसके साथ बिताई गई अक्टूबर की सात ऑसमाशामों में से एक किस्सा और...(अब ये 'ऑसमाशामें ' क्या बला है, इसे जानने के लिए तो आपको यहाँ जाना पड़ेगा...)

सुबह अलार्म बजने के पहले ही मेरी नींद खुल गयी थी. रात में प्रिया से बात करने के बाद मुझे सही से नींद ही नहीं आयी. नींद न आने की वजह प्रिया के बदमाशियों के प्रति इरिटेसन, गुस्सा या उसकी धमकियों का डर नहीं था, बल्कि मुझे गिल्ट हो रहा था कि रात नींद में मैंने बेवजह ही प्रिया को डांट दिया था. हालाँकि मैं जानता था कि उसे मेरी डांट का कभी बुरा नहीं लगता, और वो मेरी डांट का बदला अक्सर मुझे वापस डांट कर ले लिया करती है. लेकिन फिर भी मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. इतने बेसब्री से मैं प्रिया का इंतजार कर रहा था, और जाने कितना कुछ सोच रखा था, कि दिल्ली में कहाँ कहाँ घुमना है, कैसे वक़्त बिताना है, और अब जब वो दिल्ली आ गयी थी, मैंने उससे एक दिन की मोहलत माँगी थी आराम करने के लिए? ये मेरी बेवकूफी की हद ही तो थी. वो तो अच्छा हुआ रात में अचानक बारिश हुई और प्रिया ने मुझे डांट लगाकर सुबह मिलने बुलाया, वरना एक पूरा दिन मैं बस सोने में बरबाद कर डालता.

सुबह मैं जब घर से निकला तो मौसम बड़ा सुहावना हो चुका था. रात भर मुसलाधार बारिश हुई थी और सुबह सुबह खूब ठंडी हवा चल रही थी. मैं समय से काफी पहले खान मार्केट पहुँच गया था. खान मार्केट के गेट नंबर एक के ठीक सामने कैफे “ब्लू नाम” का एक कैफ़े था. प्रिया ने वहीँ आने के लिए कहा था. पहले तो मैंने सोचा कि कैफे के बाहर ही उसका इंतजार करूँ लेकिन प्रिया के आने में आधे घंटे का वक़्त बाकी था. मैं कैफे के अन्दर चला आया. कैफे लगभग खाली ही था. कोने वाली मेरी पसंदीदा जगह भी खाली थी, मैं जल्दी से जाकर वहाँ बैठ गया. सुबह सुबह वैसे भी इस कैफ़े में ज्यादा भीड़ नहीं होती. यहाँ बस वही आते हैं जो सुबह लोदी गार्डन से टहल कर लौट रहे होते हैं या फिर साइकलिस्ट जो साइकलिंग के बाद कुछ देर यहाँ सुस्ताने के लिए बैठते हैं. मैंने एक सरसरी निगाह कैफे पर डाली. मेरे सामने तीन लड़कियां बैठी थीं जो तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं. उनमें से एक लड़की ने शायद अपनी बाहों पर टैटू बनवाया था जिसके बारे में वो अपनी बाकी दोनों सहेलियों को बता रही थी. उनके ठीक बगल में दो बुजुर्ग दोस्त बैठे थे जो सतरंज की बाजी पर झुके थे. मेरे ठीक बगल में एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. लड़की ने जाने किस बात पर लड़के को मजाक में एक थप्पड़ मार दिया था.  उन्हें देख मुझे थोड़ी हँसी आ गई. मैंने शुक्र मनाया कि प्रिया अभी नहीं आई है, वरना इस लड़की को देखकर वो भी ऐसा करने को इन्स्पाइर हो जाती. कैफे के काउंटर के दूसरी तरफ कुछ विदेशी टूरिस्ट का एक ग्रुप था जिनमें से शायद किसी का जन्मदिन था और वे खूब मस्ती मजाक कर रहे थे और तरह तरह के लहजे में बर्थडे जिंगल गा रहे थे. मेरा सारा ध्यान उनके सेलिब्रेशन पर ही था कि तभी मुझे पीठ पर हलकी थपथापाहट महसूस हुई. मैं चौंक गया. मुड़ा, तो देखा प्रिया खड़ी थी.

“क्या बात है मिस्टर..कब से यहाँ बैठे हो? बड़े फ्रेश दिख रहे हो? रात में खूब सोये क्या?” प्रिया ने शरारती अंदाज़ में मुझे छेड़ते हुए कहा.
“बस मैडम, मेहरबानी है आपकी. पूरे ढाई घंटे सोया हूँ मैं..पूरे ढाई घंटे! कैन यू बिलीव इट?” प्रिया को छेड़ने के लिए थोड़े शरारत से मैंने भी कहा.
“हुंह....सब समझती हूँ मैं. ताना देने की कोई जरूरत नहीं है. In fact, you should thank me, वरना इतने रोमांटिक मौसम में भी तुम बाकी लोगों की तरह अपने बिस्तर में दुबके पड़े होते..” 

प्रिया की इस बात का मैंने कोई विरोध नहीं किया. उसकी बात वैसे सही भी थी. सच में मौसम बहुत खूबसूरत हो गया था, और अगर उसनें जिद न की होती, तो मैं सही में घर में सोया होता.

“अच्छा चलो बताओ, आगे का प्लान क्या है?” मैंने प्रिया से पूछा. प्रिया ने पूरे दिन का प्लान सुना डाला - “देखो मिस्टर, यहाँ ब्रेकफास्ट करने के बाद  हम लोदी गार्डन में बैठने मोर्निंग वाक के लिए जायेंगे. वहाँ अपने अड्डे पर बैठेंगे और फिर हमारी सवारी निकलेगी डिलाइट, मैटिनी शो के लिए और......
“डिलाइट? दिल्ली गेट वाला डिलाइट? बेवकूफ लड़की !! इतने अच्छे मौसम में बाहर घूमना चाहिए और तुमनें डिलाइट में फिल्म देखने का प्लान बना डाला..” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“अरे यार, डांटो नहीं,  मुझे कहाँ पता था कि आज मौसम ऐसा ऑसम हो जाएग. मैंने तो कल दोपहर में ही राहुल से टिकट मँगवा ली थी. तुम्हें इसलिए नहीं बताया था कि तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी मैं..” 
"कल टिकेट मंगवा लिया था तुमने? और आज बारिश न होती और मैं न आता तो?" मैंने पूछा. 
“तो क्या..टिकट और पैसे बेकार हो जाते ”. उसनें बेचारी सी शक्ल बनाते हुए कहा, जिससे मुझे हँसी आ गयी.   
“अच्छा !! कैन सी फिल्म है? ये तो बताओ...”
“कुछ देर में पता चल जाएगा तुम्हें. ट्रस्ट मी, बहुत अच्छी फिल्म है..” उसनें कहा. 
“लेकिन यार नाम तो बताओ ?” मैंने दोबारा पूछा तो वो थोड़ा झल्ला सी गयी. 
“यार तुमने एक तो बीच में मुझे टोक दिया, फिर डांट दिया और अब इतने सावल कर रहे हो. देख लेना जो भी फिल्म होगी,  Now Shut Up and LISTEN -  डिलाइट से निकलने के के बाद हम कुछ देर के लिए लाल किला जायेंगे, वहाँ से चाँदनी चौक जहाँ मुझे कुछ शौपिंग करनी है और फिर आखिर में पराठे वाली गली. बस..इतना ही” कहकर वो चुप हो गयी, और मेरी तरफ ऐसे घूर कर देखने लगी कि जैसे अगर मैंने इसके प्लान में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की कोशिश की तो ये मुझे खा जाएगी. 

सच बताऊँ, तो प्रिया के इस तरह से घूरने से मैं हमेशा डर जाता हूँ. मैंने जल्दी जल्दी अपना ब्रेकफ़ास्ट खत्म किया, और प्रिया के साथ लोदी गार्डन की तरफ चल दिया. मौसम बड़ा खूबसूरत था, इसलिए हम पैदल ही चल दिए थे. आसमान में काले बादल छाने लगे थे, और किसी भी वक़्त बारिश शुरू हो सकती थी. मेरा लॉजिकल दिमाग बार बार ये कह रहा था कि ऐसे मौसम में लोदी गार्डन जाना बेवकूफी है, किसी कैफ़े में ही बैठकर गप्पे लड़ाओ, लेकिन दिल इस बात पर अड़ा था कि यार कभी कभी ऐसे मौसम में ऐसी बेवकूफी करनी चाहिए. 

हम दोनों सीधा लोदी गार्डन के झील के पास आ गए. प्रिया को लोदी गार्डन में कहीं और घुमने की कभी उत्सुकता नहीं रहती, लोदी गार्डन में दो तीन ही जगह होंगे जहाँ उसे समय बिताना पसंद था, लेकिन इस झील के किनारे बैठना उसे सबसे ज्यादा अच्छा लगता था. झील के किनारे हमारा अपना एक बेंच था. टेक्निकली वो हमारा बेंच नहीं था, लेकिन संजोग की बात थी कि हम जब भी यहाँ आये हैं, ये बेंच हमेशा खाली रही है.हमनें इसपर किसी को भी कभी बैठे नहीं देखा. प्रिया तो ये तक कहती थी कि इस बेंच पर सिर्फ हमारा अधिकार है, यहाँ किसी और ने बैठने की कोशिश की तो उसे मज़ा चखा दूँगी. उसका बस चलता तो वो बेंच के आगे एक तख्ता लगा कर मेरा और खुद का नाम उसपर लिख देती.



हम उसी बेंच पर बैठ गए. प्रिया एकदम मेरे करीब आ बैठी.  उसनें अपने बंधे बालों से क्लिप निकाल ली, और वो उसके कन्धों पर बिखर आये थे. सामने झील में बहुत सी बत्तखें तैर रही थी. प्रिया की आँखें झील में तैरती उन बत्तखों पर ठिठक गयीं. "देखो उधर - उसनें मेरे हाथ को झिंझोड़ते हुए कहा - कितनी सुन्दर लग रही हैं न ये  बत्तखें, एक कतार में चलते हुए. उजली और बेहद प्यारी. इन्हें हम अपने साथ ले चले? अपने घर ?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा. उसकी उस मुस्कराहट में लेकिन कोई शरारत या हँसी नहीं थी. उसकी आँखें स्थिर थीं, चमकती हुईं. मैं उसका चेहरा देखकर समझ जाया करता हूँ, कि कब वो शरारत कर रही है और कब गंभीर है. 
“तुम कहो तो मैं इन्हें बैग में डाल के ले चलूँ”? मैंने प्रिया से कहा. वो हँसने लगी, “आई रियली विश यार”.  उसनें धीरे से कहा और फिर उन्हीं बत्तखों की तरफ देखने लगी, “जानते हो? दीदी को बत्तखें बहुत क्यूट लगती थी और मुझे बेहद स्टुपिड. अपने शहर की सचिवालय वाली सड़क याद है न तुम्हें? कैसे अक्सर गर्मियों की शामों में बत्तखें सड़कों से अपनी फ़ौज लेकर गुज़रती थीं. पता है एक बार दीदी ने गाड़ी रुकवा दी थी और कैमरे से बत्तखों की तस्वीर लेने लगी थी. मुझे इतना गुस्सा आया था न उस समय दीदी पर. मैं तो उनसे लड़ पड़ी थी, कैमरे की रील लगभग खत्म होने को थी, मुश्किल से चार पाँच फोटो और लिए जा सकते थे और दीदी ने वो रील बत्तखों पर खर्च कर दिए थे. रात में मैं खूब लड़ी थी उनसे, मेरा फोटो सेसन हो जाता बचे हुए रील में. जानते हो उन दिनों मुझे लगता था कि बत्तखें स्टुपिड हैं, लेकिन असल में स्टुपिड बत्तखें नहीं थी..मैं थी”.
“हम्म..सब जानता हूँ मैं.." मैंने फिर से शरारत भरे लहजे में कहा, 
"अच्छा..? क्या जानते हो तुम? बताओ ज़रा..  
"यही कि तुम उन दिनों सच में स्टुपिड थी. मतलब ऐसा नहीं है कि अब समझदार हो गयी हो, बस उन दिनों ज्यादा स्टुपिड थी तुम...” मैंने कहा. 
“हाँ, ये तो सच है यार, !! इस बात पर तो आई एम विद यू !!” उसनें कहा, और हम दोनों एक साथ हँसने लगे थे. 

कुछ देर तक हम दोनों झील में तैरती उन बत्तखों को देखते रहे थे. “अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हें याद है इस झील के पास हम दोनों पहली बार कब आये थे?” प्रिया ने पूछा.
“हाँ बिलकुल याद है, बारहवीं के इम्तिहान के बाद. दीदी भी थीं हमारे साथ, वही हमें घुमाने लायीं थीं”.
प्रिया के चेहरे पर मुस्कान उभर आई, “हाँ...लेकिन उस वक़्त हमें नहीं पता था न कि वही आखिरी साल होगा जब दीदी साथ रहेंगी. जानते हो, उसके अगले साल मैं लोदी गार्डन अकेले आई थी, ऐसा ही बारिशों वाला दिन था वो भी, और इसी पत्थर पर बैठकर मैं खूब रोई थी. 

प्रिया के अचानक इस तरह संजीदा होने से मैं थोड़ा घबरा सा गया था. "प्रिया तुम ठीक तो हो?"
वो हँसने लगी.. “अरे डरो नहीं, मैं एकदम ठीक हूँ, बस यूहीं कुछ याद आ गया था". उसनें कहा और कुछ देर तक बेंच पर किसी अदृश्य दाग को कुरेदते हुए उसनें पूछा “तुम्हें मुकेश का वो गाना याद है न? तुम्हारा तो पसंदीदा है - जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले?” 
“हाँ, तुम्हें मैंने ही तो सुनाया ये गाना पहली बार...”
“यस...! अपने उस मर्फी वाले टेपरिकॉर्डर पर. मुझे याद है.." कहकर वो चुप हो  गयी. कुछ देर चुप रहने के बाद उसनें मेरी ओर देखा, “जानते हो दीदी के जाने के एक साल बाद जब मैं यहाँ आई थी न, उस दिन यहाँ बैठे-बैठे मैं भी कुछ-कुछ उस गाने जैसा ही सोच रही थी, कि दीदी कहाँ गयीं होंगी? क्या सच में कोई ऐसी जगह है, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं, और दीदी वहाँ चली गयीं हैं? कैसी जगह होगी यार वो? क्या ये नहीं हो सकता कि मैं बस एक बार, सिर्फ एक बार वहाँ जाऊं, और उन्हें देख कर वापस आ जाऊं. बस एक झलक. कैसी हैं वो ये पता कर के वापस यहाँ आ जाऊं..” कहते हुए उसकी आँखें मुझपर उठ आयीं थी.

मुझे समझ नहीं आया कि मैं प्रिया से क्या कहूँ. मुझे यूँ असमंजस में पड़ा देख उसनें कहा, एक मजेदार बात बताऊँ तुम्हें. हँसोगे तो नहीं न?
“नहीं बाबा..नहीं हसूँगा ..बोलो तो....” मैंने उसकी हथेली को अपने हाथों में ले लिया.

“तुमने कभी गौर किया है कि इस झील के किनारे इस बेंच पर या किसी भी और झील के किनारे, किसी भी और बेंच पर बैठने वक़्त मैं हमेशा अपने बगल में इतना 'स्पेस' क्यों छोड़ देती हूँ?”
“हाँ, ताकि तुम मेरे और करीब बैठ सको....”
“नो इडियट! तुम इतने भी स्पेशल नहीं हो. यू नो, ये जगह मैं हमेशा दीदी के लिए छोडती हूँ. ताकि वो मेरे बगल में बैठ सके. जानते हो वो रहती हैं हमेशा मेरे आसपास. हर जगह.”

“जानता हूँ मैं...” मैंने कहा.

“पता है, मैं जब पिछली बार यहाँ आई थी इसी बेंच पर बैठी थी, अकेली थी, और दीदी को याद कर के खूब रो रही थी. तब वो पहली बार मुझे दिखी थी. पूरे एक साल बाद, उन्हीं कपड़ों में जिसमें उन्हें मैंने आखिरी बार देखा था. तुम नहीं थे उस वक़्त दिल्ली में, उस दिन उन्होंने ही मुझे चुप करवाया था. हमनें खूब बातें की थी.." एक चमकीली सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी थी.. कुछ देर के पौज के बाद उसनें फिर कहा, यू नो, उस दिन एक और अजीब बात हुई थी. मैं इसी बेंच पर बैठी थी, और मुझे पता भी नहीं चला ये बत्तखें कब मेरे इतने करीब चली आई थी. बिलकुल मेरे पैरों के पास. और पता है, मुझे डर नहीं लगा. मुझे डर लगना चाहिए था न इन बत्तखों से? मुझे हमेशा इनके चोंच बड़े क्रीपी लगते थे, तो मुझे डरना चहिये था? राईट? लेकिन यू नो व्हाट? मुझे इन बत्तखों पर प्यार आने लगा था. और मुझे ये बत्तखें स्वीट लगने लगी. लेकिन सबसे बड़ा रेवलेशन मुझे उस दिन रात में नींद में हुआ, मुझे सपनें में एक आवाज़ सुनाई दी थी, वे बत्तखें तुम्हारे पास नहीं आई थी, बल्कि तुम्हारे बगल में जो पीले समीज सलवार में लड़की बैठी थी उसके पास आई थी. यू नो, पीले समीज सलवार में दीदी थी, जो मेरे बगल में बैठी थीं.." कहते हुए प्रिया चुप हो गयी. एकदम चुप.  मैंने प्रिया के हथेलियों को अपनी हथेलियों में जकड़ लिया.  

“पता है यार, कुछ दिनों पहले मैं अपनी पुरानी अल्बम देख रही थी, And I was really amazed, कि मेरी शक्ल कितनी बदल गयी है, लेकिन दीदी, वो अब भी वैसी ही हैं. डिट्टो.. सेम टू सेम! जानते हो मैं बूढी हो जाउंगी और बड़ी  वीयर्ड सी दिखने लगूंगी. तुम भी बूढ़े हो जाओगे, दांत झड़ जायेंगे तुम्हारे, हमारे आसपास के सभी लोगों पर उम्र का असर दिखेगा, लेकिन दीदी...वो वैसी ही दिखेंगी हमेशा. जैसे एल्बम की उस आखिरी तस्वीर में वो दिखती हैं, मस्त..हंसमुख..सुन्दर..स्वीट एंड ईटर्नली ब्यूटीफुल ! यू नो, उनकी एक बड़ी सी तस्वीर मेरे कमरे की दीवार पर लगी है, जिसे तुमने फ्रेम करवाया था, याद है न तुम्हें वो तस्वीर उनकी? पहले जब वो थीं, मुझे उनकी वो तस्वीर बेहद आम सी लगती थी लेकिन अब असाधारण तस्वीर लगती है. एक सम्मोहित कर देने वाली मुस्कराहट है उसमें दीदी की. मैं जब भी उदास होती हूँ उनकी उस तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर वो मुझे बहुत समझाती हैं, कभी कभी गुस्से में डांट भी देती हैं – ‘ये क्या बेवकूफी है प्रिया? क्या हुआ है तुम्हें? शक्ल क्यों लटकी हुई है तुम्हारी? बस इतने में ही घबरा गयी? देखो मैं इस दुनिया से बाहर आकर भी नहीं घबराई, अब भी वैसे ही हँस रही हूँ जैसे पहले हँसती थी और तुम? तुम्हारी वो हँसी कहाँ चली गयी? तुम्हारी हँसी तो मुझसे भी प्यारी है, वापस लाओ अपनी उस हँसी को एंड बी ब्रेव!' जानते हो फिर मैं सच में खूब हंसती हूँ. उनकी डांट के बाद I Feel So Relaxed. वो अब भी  रहती हैं मेरे आसपास..हर जगह..हर समय. जैसे कल रात, जब मैंने तुम्हें कॉल किया था. मेरे बगल में ही थीं वो. डांट रही थी मुझे, कि मैं क्यों तुम्हें इतनी रात गए परेशान कर रही हूँ. यू नो न, अन्फॉर्चनट्ली तुम्हारी बात जब भी आती है, वो मुझे छोड़ कर हमेशा तुम्हारी साइड ले लेती हैं, ऑल्वेज़ !! " कहते हुए प्रिया ने एक बार अपनी दायीं तरफ देखा और मुहँ बिचका दिया, जैसे सच में वो अपनी दीदी से इस बात की शिकायत कर रही हो.

मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी, मैंने कहा कुछ नहीं, बस प्रिया को अपने एकदम करीब खींच लिया. उसनें अपना सर मेरे कंधे पर टिका लिया और आँखें मूँद ली. मैंने झील में तैरती बत्तखों को देखा, और फिर गरजते बादलों की आवाज़ सुनी. बारिश किसी भी वक़्त हो सकती है, मैंने प्रिया से कहा. प्रिया ने लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. उसकी साँसें मेरे गालों को सहला रही थीं. धीरे से मैने उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें खोल दी. “मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती”, उसनें कहा.

“हम भींग गए तो?” मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों से उठा दिया.

“तो हम गल थोड़े ही जायेंगे...” उसनें कहा. एक बहुत हलकी सी शरारत वाली मुस्कान उसके चेहरे पर चली आई थी.
“और वो तुम्हारी फिल्म? जो तुम मुझे दिखाना चाहती हो? उसका वक़्त हो रहा है न..” मैंने कहा. वो कुछ देर तक मुझे अपलक देखती रही जैसे तय नहीं कर पा रही हो कि वो वाकई फिल्म देखने जाना चाहती है या यहीं बैठी रहना चाहती है. फिर अगले ही पल वो एकदम उठ खड़ी हुई, “हाँ हाँ चलो चलो, यहाँ बैठे-बैठे बारिश में भींग कर मैं बीमार होना नहीं चाहती, अभी पूरे सप्ताह तुम्हारे साथ घूमना जो है.


बातें बाकी...
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Saturday, June 17, 2017

आँधी, बारिश और रिमझिम फुहारों सी यादें

baarish nazm gulzar
सुबह के तीन बज रहे हैं. बाहर ज़ोरदार बारिश शुरू हो गयी है. बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट से मेरी नींद एकदम से खुल गयी. “यार ये भी कोई वक़्त है आने का?” मैंने खिड़की खोल के बाहर बरसती बारिश की बूँदों से कहा.. “ज़रा देर से आते तो नींद भी पूरी हो जाती और तुम्हारे साथ खुल के मज़े भी ले पाता”. लेकिन इस कमबख्त बारिश को तो बे-वक्त ही आना है, ठीक वैसे ही जैसे उस स्टुपिड प्रिया की यादें आ जाती है, वक़्त बे-वक्त...कभी भी, कहीं भी.

मौसम अगर आशिकाना हो जैसे अभी सुबह-सुबह का मौसम है. बाहर अभी तक अँधेरा ही है, बारिश खूब तेज़ हो रही है और बेहद ठंडी हवा चल रही है. ऐसे सिचूएशन में प्रिया की यादें कुछ ज्यादा ही बदतमीज़ और अन-प्रिडिक्टबल हो जाती हैं. अक्सर मुझे वे बातें याद दिला जाती हैं जिनके बारे में एक अरसे से मैंने सोचा नहीं था. आज भी सुबह प्रिया की ये स्टुपिड यादों ने जाने कहाँ से वर्षों पहले दिल्ली में बिताये उन सात खूबसूरत शामों के किस्से याद दिला गयीं, जिन्हें प्रिया "दिल्ली की सात ऑसमाशामें’ कह कर बुलाती थी.

"ऑसमाशामें" शब्द आपको थोड़ा अजीब लग रहा होगा. कंफ्यूज भी हो रहे होंगे आप कि ये “ऑसमाशामें” क्या बला है? इससे पहले कि आप दुनिया के सारे डिक्शनरी खंगाल डाले, आपको बता दूँ कि ऐसे किसी शब्द का अस्तित्व ही नहीं है. ये तो प्रिया के ईजाद किये हजारों शब्दों में से एक शब्द है. बस फर्क इतना है कि जहाँ उसके ईजाद किये बाकी के शब्द बेमतलब और अजीब लॉजिक के होते हैं, इस शब्द के पीछे वाकई में एक लॉजिक था. प्रिया ने “ऑसम” और “शामें” शब्द का फ्यूजन कर “ऑसमाशामें” को ईजाद किया था. मैं वैसे तो प्रिया के ईजाद किये शब्दों की कोई खास इज्जत नहीं करता था और उसके उन शब्दों की धज्जियाँ उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहा लेकिन प्रिया का ये “ऑसमाशामें” शब्द मुझे भी बड़ा प्यारा सा लगता था. ख़ास कर जब प्रिया इस शब्द का उच्चारण करती, तब बड़ा खूबसूरत साउंड करता था ये शब्द.

प्रिया के साथ बीते ये सात "ऑसमाशामें" आज से करीब सात-आठ साल पहले की बात है. प्रिया उन दिनों लन्दन में एमबीए की पढ़ाई कर रही थी और छुट्टियों में वो दिल्ली आई थी. अक्टूबर का महिना था वो और तारीख आज की ही थी, यानी की १७ अक्टूबर. मुझे ये तारीख इसलिए याद है कि १७ अक्टूबर को मेरे भैया की शादी की सालगिरह होती है. उस साल भैया के सालगिरह के दिन मैं और प्रिया दोनों दिल्ली पहुँचने वाले थे. प्रिया सत्रह अक्टूबर की सुबह लन्दन से दिल्ली आने वाली थी और मैं चंडीगढ़ से एक जरूरी काम निपटा कर दिल्ली वापस लौट रहा था.

शाम में भैया ने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी. मैं उस पार्टी में प्रिया को बुलाना चाहता था. वैसे तो भैया और भाभी पहले जब हैदराबाद में रहते थे, तब एक बार वे प्रिया से मिल चुके थे, इसलिए प्रिया को पार्टी में बुलाने में मुझे कोई झिझक होनी नहीं चाहिए थी लेकिन फिर भी मैं असमंजस में था कि भैया भाभी से प्रिया को इन्वाइट करने की बात करूँ या न करूँ? पता नहीं क्यों मुझे शक था कि भैया कहीं मना न कर दे, लेकिन मेरा ये डर बेवजह ही था. भैया ने तो तुरंत हामी भर दी, भाभी तो इक्साइटड भी हो गयी ये सुनते ही कि प्रिया दिल्ली आ रही है और पार्टी में वो प्रिया से मिल पाएंगी. मुझे थोड़ा आश्चर्य तो हुआ, कि ये दोनों प्रिया की बात सुन कर इतने खुश क्यों हो गए? फिर याद आया, कि पिछली बार जब प्रिया भैया-भाभी से मिली थी, तो उसनें जी भर कर दोनों की बटरिंग की थी. शायद उसी का परिणाम था कि प्रिया के बारे में सुनते ही भैया भाभी उससे मिलने को बेसब्र हो गए थे. भैया ने तो यहाँ तक कह दिया था कि फोन कर के प्रिया से पूछो, अगर बिजी नहीं है, तो उसे अभी ही बुला लो.

शाम को प्रिया अपनी आदत के विपरीत समय से काफी पहले हमारे घर आ गयी. प्रिया को देखते ही भैया और भाभी के चेहरे खिल उठे. दोनों ने एक सुर में कहा “प्रिया, तुमनें तो आज आकर इस पार्टी की रौनक बढ़ा दी”. मैंने प्रिया को पहले से ही हिदायत दे रखी थी कि भैया-भाभी तुम्हें चने की झाड़ पर चढ़ाने की भरपूर कोशिश कर सकते हैं, इसलिए उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान न देना. लेकिन मेरी कोई भी बात प्रिया सुनती कब है? भैया-भाभी के इस डायलॉग को उसनें काफी सिरिअसली ले लिया और जिसका नतीजा ये हुआ कि पूरी शाम वो पार्टी में ऐसे टहल रही थी जैसे वो सच में कोई ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ हो. मुझे तो एकदम नज़र अंदाज़ कर दिया था इसनें.

अपने घर की पार्टी में ही मेरी कोई अहमियत नहीं रह गयी थी, भाभी ने सारे कमांड प्रिया को सौंप दिए थे. वो मुझपर लगातार हुक्म चला रही थी. जहाँ मैं उसे टोकता या उसके मर्ज़ी के विपरीत कोई भी काम करने की कोशिश करता, सीधे धमकी दे देती मुझे, "मेरे सब-ओर्डिनिट हो तुम, जैसा कह रही हूँ वैसा करो वरना रात में खाना भी नसीब नहीं होगा". मतलब मेरे ही घर में आकर वो मुझपर ऐसे हुक्म चला रही थी, और इतनी हिम्मत उसमें सिर्फ इस वजह से आई थी कि भाभी ने उसे “कुछ भी करने” की परमिशन दे रखी थी.

प्रिया अक्सर ऐसे मौकों के तलाश में रहती है कि वो मेरे ऊपर धौंस जमा सके, लेकिन उसे ऐसे मौके कम ही नसीब होते हैं. इस पार्टी में भाभी की वजह से ही सही उसे ये मौका मिल गया था और वो इस मौके को किसी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती थी. भरपूर फायदा उठा रही थी वो अपनी 'गेस्ट ऑफ़ ऑनर' के टैग का. पूरी पार्टी के दौरान प्रिया ने हर तरह की अपनी मनमानी की, मुझे हर एक पॉसिबल तरीके से परेशान और इरिटेट किया, तरह तरह के हथकंडे अपना रही थी वो जिससे मैं तंग आकर उसे डांट दूँ और वो मेरे ही घर में मेरा दाना-पानी बंद करवा दे और फिर जब भूख से मेरी हालात ख़राब हो जाए, वो मुझपर तरस खा कर मुझे खाना खिलाये और फिर लम्बे समय तक मुझे ये किस्सा सुना सुना कर पकाती रहे कि कैसे उसनें खाना खिलाकर मुझपर अहसान किया था.

लेकिन पार्टी खत्म होने के थोड़ी देर पहले, जब हम डिनर के लिए बैठे, अचानक से प्रिया के सुर बदल गए थे. पूरी पार्टी में जहाँ वो हर छोटी छोटी बातों में मुझपर हुक्म चला रही थी, वहीं डिनर के समय वो मुझसे बड़े प्यार से पेश आ रही थी. पहले तो मैंने समझा कि शायद उसे मेरे ऊपर दया आ गयी हो इसलिए वो इतने प्यार से पेश आ रही है, लेकिन ये मेरी गलतफहमी थी. उसे तो बाकी के सात दिनों की अपनी प्लानिंग सेट करवानी थी.

बड़े प्यार से डिनर के बाद उसनें मेरे हाथों में एक लिस्ट थमा दी और कहा - "ये देखो, अगले सात दिनों तक हम दिल्ली में यहाँ-यहाँ घूमेंगे..मैंने लिस्ट बना ली है..और कल सुबह हम जाएंगे गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स"

मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा – “कल सुबह?”
“हाँ..एनी प्रॉब्लम?” आइसक्रीम खाते हुए, एक टफ लुक उसनें मुझे दिया.
“यार, एक सप्ताह जयपुर और चंडीगढ़ के चक्कर लगा कर थक गया हूँ. कल बक्श दो, परसों से दिल्ली में जहाँ बोलोगी, तुम्हारे साथ भटकता फिरूँगा.”
“नो..नोट पॉसिबल..” उसनें कहा और वापस अपना ध्यान अपने आइसक्रीम पर कंसन्ट्रेट कर दिया.

गुस्सा तो बड़ा आया इस स्टुपिड लड़की पर. आखिर समझती क्या है खुद को? दिल किया कि डांट कर बोल दूँ कि कल कहीं नहीं घूमना है, चुपचाप घर में बैठो और आराम करो. लेकिन प्रिया को ऐसे पार्टी में डाँटना, जहाँ वो ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ थी, काफी खतरनाक हो सकता था इसलिए मैंने बड़े प्यार से प्रिया को अपने पास बिठाया, थोड़ी बटरिंग की और फिर धीरे से प्रिया के सामने एक दिन का लीव ऍप्लिकेशन री-कन्सिडर करने को डाल दिया और उससे हाथ जोड़ कर(लिटरली) विनती की - “यार बस कल बक्श दो...”

प्रिया के सामने ऐसे बटरिंग करना और हाथ जोड़ कर विनती करने वाली ट्रिक दस में से आठ दफे तो एकदम काम कर जाती है, उस दिन भी ये ट्रिक अपना काम कर गयी होती अगर रात में बिना नोटिस दिए भयानक आँधी तूफान और बारिश न आ धमकती.

पार्टी के बाद प्रिया तो वापस घर चली गयी, भैया, भाभी और मुझे सारे काम समेट कर सोने जाते हुए रात के करीब एक बज गए थे. थकान इस कदर मुझपर हावी थी कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद ने अपनी आगोश में ले लिया मुझे. ठीक ढाई बजे मेरी नींद अचानक एक फोन-कॉल से टूटी. मैं थोड़ा चौंक गया था. प्रिया का कॉल था.

“क्या हुआ? सब ठीक तो है?” मैंने थोड़ा चिंतित होकर पूछा...
“अरे बाहर देखो...बाहर...”
“बाहर? क्यों? क्या हुआ?”
“अरे बहुत तेज़ आँधी उठी है..”
“आँधी??”
“हाँ..”
“तो खिड़की बंद करो और सो जाओ...”
"बेवकूफ!!! तुम्हारी तरह कंजूस नहीं हूँ, कमरे में एसी है. खिड़की बंद ही रहती है.."
"गुड! तो फिर सो जाओ.."
"नहीं...पहले तुम अपनी आँखें खोलो...और बाहर देखो.."
"यार नींद आ रही है, क्यों परेशान कर रही हो?"
“अरे देखो तो सही...बहुत तेज़ आँधी है, और जबरदस्त बिजली कड़क रही है. बारिश होने वाली है..”
“होने दो बारिश..हु केयर्स !चुपचाप सो जाओ, और मुझे भी सोने दो...ढाई बज रहे हैं..” मैंने थोड़ा इरिटेट होकर कहा.
“पर सुनो तो..”
“अब क्या हुआ? जल्दी बोलो..”
“यार देखो न, झमाझम बारिश शुरू हो गयी है. कल की सुबह डेफनिट्ली रोमांटिक होगी. सुबह मोर्निग वाक पर लोदी गार्डन चलें?”
“लोदी गार्डन? कल सुबह?? तुम पागल हो? रात के ढाई बजे तुम्हें लोदी गार्डन जाने की सूझती है? चुपचाप सो जाओ” कह कर मैंने थोड़ा झिड़क दिया प्रिया को.

ये झिड़कना मुझे महंगा पड़ गया. अगर प्यार से समझाया होता तो शायद मामला हाथों से नहीं निकलता, लेकिन प्रिया को ऐसे झिड़कने पर तो आपको नतीज़े झेलने पड़ेंगे.

“दैट्स इट!! कल मोर्निंग! शार्प एट सेवन! खान मार्किट!!” उसनें अपनी आवाज़ को बेहद स्टर्न बनाकर कहा.
“अरे यार, प्लीज ऐसा करो. ये तो ज़्यादती है...” मैं एकदम डिफेंसिव मोड में आ गया था.
“ज्यादती नहीं एकदम सही है! बॉर्डर पर जब जंग छिड़ जाए तो सैनिकों की छुट्टी कैंसल हो जाती है न? ठीक वैसे ही जब बारिश होगी तो तुम्हारी छुट्टियाँ भी ऐसे ही कैंसल हो जायेंगी..” उसनें कहा.
"प्रिया..दिस इज नॉट फेयर. बेहद थका हुआ हूँ, सुबह नहीं उठ पाऊंगा..” मैंने उससे विनती की.
"तुम्हारे जैसों के साथ ऐसा ही होना चाहिए. चार घंटे हैं तुम्हारे पास, इन चार घंटों में जितना सोना है सो लो. मैं ठीक सुबह छः बजे तुम्हें कॉल कर के जगा दूँगी.” इतना कह कर उसनें फोन कट कर दिया.

इधर मेरी नींद उड़ चुकी थी.

उसनें हुक्म जारी कर के फोन तो रख दिया लेकिन मुझे नींद कहाँ से आती? एक तो वो नाराज़ हो गयी थी, और उसपर से उसका गणित हमेशा से कमज़ोर रहा है. मुझे सोने के लिए चार घंटे नहीं बल्कि सिर्फ तीन घंटे का वक़्त मिला था. मैंने कमरे के दोनों अलार्म क्लॉक, और मोबाइल में सुबह छः बजे का अलार्म लगा दिया ताकि सुबह समय पे उठ जाऊं..और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि उसके मूड को ज्यादा न बिगाड़े, वरना वो मेरी शक्ल बिगाड़ देगी. सब कुछ ऊपरवाले के भरोसे छोड़कर मैं वापस नींद की आगोश में चला गया.


बातें बाकी...
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Sunday, February 12, 2017

मैजिशियन


दोपहर बीत चली थी लेकिन बारिश थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी. लड़का अपने कमरे में बैठे बारिश के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा था. दो दिन से तेज़ ज़ुकाम और हलके बुखार की वजह से वो घर में कैद था और इन दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. अपने बालकनी में बैठे बारिश की बूँदों को देख वो सोच रहा था कि कभी जनवरी की बारिश कितनी ख़ास होती थी लेकिन अब तो जैसे जनवरी की बारिश भी कोई मायने नहीं रखती. पिछले कुछ सालों में बहुत कुछ बदल गया था. कई यकीन, कई सपनें टूट गए थे. एक के बाद एक उसे अपनी हर नाकामी याद आ रही थी. दिन में कई बार उसने सोचा कि घर पर बात कर ले, लेकिन वो जानता था कि घर पर उसकी हलकी बिमारी की खबर भी सबको बेचैन कर देती है. अपने घरवालों को वो अब और कोई तकलीफ नहीं देना चाहता था. वो उस लड़की से भी बात करना चाहता था जो उसके सुख दुःख की साथी थी. लड़के के माँ-बाप, छोटे भाई और बहन के अलावा पूरे दुनिया में एक वही तो थी जो उसकी हर बात समझती थी. लेकिन जाने किस हिचक से या अनजाने डर से वो उसे फोन नहीं कर पाया था.

दो दिन पहले उसकी लड़की से बात हुई थी और तब लड़की का मन बेहद अशांत था. लड़की  के परिवार में उन दोनों को लेकर खूब हंगामा हुआ था. लड़की उस रात फोन पर बहुत देर तक रोती रही थी और बस यही दोहराते रही थी – “आई विल डाई विदआउट यू....एंड आई मीन इट!” पूरे दिन लड़के के मन में भी बस यही पाँच शब्द घूमते रहे थे जो लड़की ने दो रात पहले कहे थे और जिन्हें वो तोड़ मरोड़ के पूरे दिन दोहराता रहा था...आई विल डाई.....विदआउट यू.....विदआउट यू...आई विल डाई.

शाम होते होते लड़के को उसका अकेलापन, उसकी नाकामी और लड़की के कहे शब्द इस कदर बेचैन करने लगे कि घर में और रुकना संभव न हो सका. वो बारिश में ही घर से बाहर निकल आया था. बारिश में भीगता हुआ वो सड़कें पार करने लगा. एक जगह से दुसरे जगह वो घूमता रहा. घर से बाहर, सड़कों पर उसे ये तसल्ली थी कि वो अकेला नहीं है. बहुत से लोगों के बीच में वो भी एक है. देर रात तक वो उन भीड़ भरी सड़कों पर इधर उधर निरुद्देश्य घूमता रहा और जब घर लौटा तो ठण्ड से उसका शरीर काँप रहा था. कमजोरी और थकान इस कदर हावी हो गयी थी उसपर कि वो बिना कुछ खाए सो गया. 

सुबह जब आँख खुली उसकी, तो उसका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था. उसमें इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि बिस्तर से उठ कर वो पानी तक पी सके. शाम के अपने पागलपन के लिए वो खुद को कोसने लगा था. रात सड़कों पर घुमने से कुछ देर के लिए जिस अकेलेपन से उसे छुटकारा मिला था उस अकेलेपन ने उसे फिर से जकड़ लिया था. दिन भर के बुरे ख्याल फिर से आने लगे थे. वो ये सोचते ही काँप गया कि इस शहर में वो अकेला है..बिलकुल अकेला. उसे अगर कुछ हो भी जाए तो भी उसकी मदद करने कोई नहीं आने वाला.

उसे अपने एक चाचा की याद आने लगी, जो काफी साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे. तब वो काफी छोटा था. उसे बहुत दिनों तक ये लगता रहा था कि चाचा की मौत बुखार से नहीं बल्कि अकेले रहने से हुई थी. वो भी लड़के की तरह अकेले रहते थे. उसी की तरह वो भी समाज के बनाये गए सफलता के पैमाने पर खड़े नहीं उतरे थे और घरवालों के तानों से बचने के लिए कलकत्ता चले गए थे जहाँ वो कोई छोटी मोटी नौकरी करते थे. उसे बहुत पहले की चाचा की लिखी चिट्ठी याद आई थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि इस तरह जीने से तो कहीं बेहतर है मर जाना. उसकी माँ वो चिट्ठी पढ़ के बहुत देर तक रोई थी.

लड़के को याद आया कि चाचा भी एक शाम बारिश में भीगे थे और उसी रात उन्हें तेज़ बुखार ने जकड़ लिया था. पूरे दिन तक वो घर में अकेले पड़े रहे थे और कमजोरी की वजह से उन्हें दो बार चक्कर आये थे और वो बेहोश हो गए थे, कोई आसपास था भी नहीं जो उन्हें संभाल पाता...खुद ही होश में आये. अगले दिन किसी तरह पड़ोस के एक लड़के ने उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती करवाया था लेकिन तबियत ठीक होने की बजाये और बिगडती चली गयी थी, और एक हफ्ते बाद उनकी मौत हो गयी थी. चाचा की याद आते ही वो घबरा सा गया. बारिश...बुखार और मौत...ये तीनो शब्द उसके मन में घुमने लगे थे. पिछली शाम पढ़ा एक शेर भी ना चाहते हुए उसे याद आ गया 
"रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो / हम सुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो 
 पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार / और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो"

अचानक आये इस ख्याल से वो घबरा गया. चाचा के आखिरी दिनों को वो अनचाहे ही खुद से जोड़ने लगा था. कमरे में उसे घुटन सी महसूस होने लगी. घर से बाहर निकलने के लिए वो बेचैन हो उठा था. उसने सोचा अगर कुछ होना भी हो तो सड़कों पर हो तो ज्याद बेहतर है. यहाँ अकेले कमरे में कुछ हो भी जाए तो किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा. उसके घरवाले, वो लड़की उसे फोन करते रहेंगे और उन्हें कुछ जवाब नहीं मिलेगा. वो जोड़ने लगा कि अगर उसे कुछ हो गया तो उसके घरवालों को भी उसके पास पहुचने में कम से कम अट्ठारह घंटे लगेंगे. इन अट्ठारह घंटों में वो ऐसे ही पड़ा रहेगा...अपने कमरे के बिस्तर पर बेजान. उसने सोचा जो लोग अकेले कमरे में मरते हैं वो कितने बदनसीब होते हैं कि आखिरी वक़्त कोई भी उनके पास नहीं होता. ये सोचते ही वो एकदम आतंकित सा हो गया. अकेलेपन के बारे में तो लड़के ने पहले भी कई बार सोचा था लेकिन मौत के बारे में उस दिन उसने पहली बार सोचा था.

सामने टेबल पर रखी लड़की की तस्वीर पर उसकी नज़र गयी तो उसे याद आया पहले जब कभी ऐसी बातें वो मजाक में भी लड़की को कह देता तो वो उससे रूठ जाया करती थी. वो तो शायरी और कविताओं में भी मौत जैसे शब्दों को झेल नहीं पाती थी और चिढ़ कर कहती कि ऐसे नेगटिव शब्दों का इस्तेमाल करने वाले कवि और शायरों को जेल में बंद कर देना चाहिए. पॉजिटिव थिंकिंग की वो खुद को एक मिसाल समझती थी. ऐसा था भी. फुल ऑफ़ लाइफ लड़की थी वो. लेकिन वही फुल ऑफ़ लाइफ लड़की ने उससे कहा था “आई विल डाई विदआउट यू”.

लड़के को बहुत पहले का एक दिन भी याद आया जब वो बहुत बीमार था और लड़की उसकी बीमारी की खबर सुन कर उससे मिलने आई थी. लड़के ने मजाक में कहा था “ये बुखार तो मेरी जान ले लेगी”. ये सुनते ही लड़की ने उसे दो तीन मुक्के जड़ दिए थे और गुस्से में कहा था, ‘बीमार हो और तब भी मार खाने की तुम्हारी तलब शांत नहीं होती’. उस एक छोटे से मजाक से लड़की पूरे दिन रूठी रही थी.

लड़के को अक्सर लगता था कि लड़की के पास कोई जादू का पिटारा है. उस दिन जब वो अपने घर में बीमार पड़ा था तब लड़की ने इरिटेट होकर कहा था, "कितने प्लान बनाये थे हमनें आज के लिए और तुम बिस्तर पर पड़े हो...रुको मैं तुम्हें ठीक करने का कुछ उपाय करती हूँ". लड़के को इस बात पर हँसी आ गयी थी.. “तुम क्या करोगी? तुम कोई डॉक्टर थोड़े हो?” लड़के ने कहा. लड़की फिर बेपरवाह ढंग से हँसते हुए कहने लगी.. “मैं डॉक्टर नहीं...मैजिशियन हूँ....मैजिशियन. मैं वो भी कर सकती हूँ जो डॉक्टर्स नहीं कर सकते...” 
ये कहते हुए उसने लड़के के माथे और गालों को ऐसे सहलाया जैसे वो कोई फ़रिश्ता हो और उसके बस छू लेने से कोई चमत्कार होगा और लड़के की बीमारी गायब हो जायेगी. उस वक्त लेकिन लड़के को सही में ऐसा महसूस हुआ कि जैसे लड़की की हाथों की मसीहाई धीरे धीरे उसके समूचे शरीर में उतर रही है और वो अब ठीक है. उसे उस दिन ये यकीन था कि उसका बुखार दवा खाने की वजह से नहीं बल्कि उस लड़की की वजह से उतरा था. 

शायद टेलीपैथी जैसी कोई चीज़ होती जरूर है. लड़का अपनी उस मैजिशियन को याद कर ही रहा था कि तभी फोन की घंटी सुनाई दी. लड़के ने हड़बड़ा के अपना मोबाइल देखा. लेकिन मोबाइल खामोश था, उसपर कोई कॉल नहीं था.. लड़के की नज़र सामने खुले लैपटॉप पर गयी तो वो चौंक गया. लैपटॉप पर लड़की का विडियो कॉल आ रहा था.

लड़के को याद आया कि हमेशा की तरह रात में वो लैपटॉप बंद करना भूल गया था और विडियो चैट का एप्लीकेसन लॉग इन था. लड़की दुसरे टाइम जोन के शहर में रहती थी. जब लड़के के शहर में सुबह होती तो लड़की के शहर में रात. लड़की अक्सर इस वक़्त लड़के को विडियो कॉल करती थी. विडियो कॉल से दोनों को तसल्ली रहती कि वो दोनों दूर नहीं हैं. लड़की कहती लड़के से कि तुम्हें देखकर सोती हूँ तो मुझे बड़ी अच्छी नींद आती है और लड़का कहता, कि तुम्हें सुबह देख लेता हूँ तो मेरा दिन बहुत अच्छा हो जाता है.

लैपटॉप पर लड़की का कॉल देखकर लड़का असमंजस में पड़ गया कि वो क्या करे? वो ये नहीं चाहता था कि लड़की उसे इस हालत में देखे. उसने सोचा कि वो कॉल रिसीव न करे और बाद में बहाना बना दे कि वो सो रहा था. लेकिन लड़की लगातार कॉल कर रही थी. वो जानता था कि उसने बहाना बनाया तो लड़की उसका झूठ ताड़ जायेगी. खुद को थोड़ा संभाल कर, हिम्मत जुटा कर उसने कॉल रिसीव किया.

लड़के ने पूरी कोशिश की थी कि वो अपना हाल छुपा ले, लेकिन उसकी एक झलक से ही लड़की ने सब समझ लिया था. दो दिनों से लड़की वैसे ही परेशान थी और अब लड़के की ऐसी हालात देख कर वो एकदम टूट गयी. लड़की को ये समझते देर न लगी कि दो दिन पहले उसने जो डिप्रेसिंग बातें की थी, उस वजह से लड़के की ऐसी हालत हुई है. हालाँकि लड़के ने उसे खूब समझाने की कोशिश की कि वो गलत सोच रही है और बारिश में भीग जाने की वजह से उसे बुखार चढ़ आया था. लड़की लेकिन जानती थी कि बुखार में जहाँ अधिकतर लोग बिस्तर पर पड़े रहते हैं वहीँ लड़का आराम से घूमते रहता था.

लड़की कहती नहीं थी लेकिन लड़के के अकेलेपन को वो अच्छे से समझती थी..तभी तो वो दो दिन से इस गिल्ट में रही कि उसे लड़के से ऐसा नहीं कहना चाहिए था. वो जानती थी कि ऐसी बातों को लड़का काफी गंभीरता से ले लेता है और फिर अक्सर उसकी तबियत बिगड़ जाती है. लड़की ने धीमी आवाज़ में लड़के से कहा "सुनो, मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था". लड़के ने लड़की को फिर तसल्ली देनी चाही कि वो गलत सोच रही है और उसकी बातों का उसपर कोई असर नहीं हुआ था.

लड़की लेकिन इस बार थोड़ी उखड़ सी गयी "तुम क्या सोचते हो कि मैं कुछ नहीं जानती..सब जानती हूँ मैं कि कौन सी बातें तुमपर कैसे असर करती हैं. तुम कैसे रहते हो...वो भी जानती हूँ मैं. लेकिन सुनो...ऐसे जिया नहीं जाता..इतनी तकलीफ किस लिए? मैं नहीं जानती कि तुम अक्सर पूरी पूरी शाम सड़कों पर बस इसलिए बिता देते हो ताकि घर के अकेलेपन और सूनेपन से बचे रहो. तुम ये सब क्यों सहते हो? सुनो..तुम वापस अपने घर क्यों नहीं चले जाते..कम से कम मुझे तसल्ली रहेगी. वरना जब तक ऐसे रहोगे मैं भी चैन से नहीं रह पाऊँगी.." कहते हुए लड़की का गला रुंध आया था.

लड़के की आँखें भी भींग आई थी. वो जानता था कि लड़की उसकी फ़िक्र करती है. वो नहीं चाहता था कि लड़की उसकी तकलीफों से परेशान हो इसलिए वो जानबूझकर लड़की से कुछ भी नहीं कहता था. लड़की लेकिन फिर भी समझ समझ जाती थी. ऐसे समय में लड़का हमेशा चुप हो जाया करता था और लड़की असहाय सा महसूस करती कि वो लड़के के पास नहीं है. लड़की को लड़के की बीमारी कि उतनी चिंता नहीं होती थी, वो जानती थी कि लड़का खुद का ख्याल रख सकता है. लेकिन लड़के को जब भी यूँ अकेलेपन का एहसास होता, बुरे ख्याल जब भी लड़के को परेशान करते तो लड़की को हमेशा लगता कि काश वो उसके पास, उसके साथी होती.

लड़की बार बार अपनी उँगलियों को वेबकाम तक ले जा रही थी. वो लड़के को छूना चाहती थी. पागल थी वो. बहुत पहले कभी किसी दिन पार्क में बैठे हुए उसनें लड़के की हथेलियों को खुद की हथेलियों से लॉक कर लिया था और अपना दुपट्टा लपेट दिया था इस उम्मीद के साथ कि दोनों के हाथ हमेशा के लिए जुड़ जायेंगे और जब उसने दुपट्टा हटाया और हथेलियाँ अलग हो गयी तो वो उदास हो गयी थी..और आज वो चाह रही थी कि किसी तरह कोई चमत्कार हो जाए और वो इस वेबकैम से हाथ निकाल ककर लड़के को छू सके.

हर बार जब वो अपने इस पागलपन में असफल हो रही थी, इरिटेट होकर लड़के से कहने लगी “सुना है किसी सॉफ्टवेर इंजिनियर ने अपनी गर्लफ्रेंड को ढूँढने के लिए एक सोशल नेटवर्किंग साईट ही बना दी थी.तुम भी मेरे लिए कोई ऐसी तकनीक का अविष्कार क्यों नहीं कर देते कि मैं जब चाहूँ तुम्हारे पास पहुँच सकूँ.?

वो ऐसी सिचुएशन तो नहीं थी कि लड़के को हँसी आये लेकिन लड़की की इस प्यारी नादानी पर उसकी हँसी छुट गयी.."मैं उतना क्वालफाइड नहीं हूँ. तुम कोशिश करो. इंजीनियरिंग की डिग्री तो तुम्हारे पास भी है.."

लड़के के ऐसे हलके फुल्के मजाक से लड़की अन्दर ही अन्दर खुश हुई, लेकिन चेहरे पर नकली गुस्सा दिखाते हुए उसनें लड़के को डांटा.. "तुम्हें तो अच्छा लगता है न मुझे यूँ परेशान होता देखकर? तभी तो हँस रहे हो. खुद अकेले रहकर बेवजह की बातें सोचते हो और मुझे उदास कर देते हो. पता है तुम्हें आज माँ के बर्थडे की पार्टी थी और सजने-सँवरने में मुझे पूरे दो घंटे लगे थे. सबने कितना कॉम्प्लीमेंट भी दिया कि बहुत सुन्दर दिख रही हूँ और तुमनें रुलाकर देखो सब बर्बाद कर दिया. सोचा था तुम्हें आकर अपनी ये नयी साड़ी दिखंगी. तुमसे परसों रात के लिए माफ़ी भी तो मांगनी थी...लेकिन तुम..तुम तो खुद की ऐसी हालत बनाये हुए हो कि क्या कहूँ मैं?और अब हँस रहे हो? बेशर्म कहीं के..

बीमार हालत में भी लड़का हड़बड़ा गया. वो तुरंत माफी माँगने के मोड में आ गया. “अच्छा चलो माफ़ कर दो और ये गुस्सा छोड़ो.अब नहीं सोचूँगा ऐसा वैसा कुछ भी. अब बस तुम्हारे बारे में सोचूँगा...ठीक? देखो तुम आज कितनी प्यारी लग रही हो..ये नाराज़गी तुम्हारे इस प्यारे चेहरे पर बिलकुल सूट नहीं करती.” लड़के ने लड़की को मनाने की पूरी कोशिश की. लड़की लेकिन उसे इतनी आसानी से माफ़ करने के मूड में नहीं थी. अपनी बड़ी बड़ी आँखों को और बड़ा कर के वेबकैम के एकदम नज़दीक अपने चेहरे को लाकर उसने गुस्से में कहा "ना..मत सोचो मेरे बारे में.. तुम्हें तो मुझसे नहीं, अकेलेपन से प्यार है न...और नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी तारीफ़. .तुमने तो कसम खा रखी है न कि बिना मुझसे डांट सुने मेरी तारीफ़ नहीं करोगे...अभी भी और डांट सुनने का इरादा है या चुपचाप दवा खाओगे मेरे सामने? जानती हूँ मैं कि तुमनें दवा नहीं खायी होगी अब तक".

लड़का मुस्कुराने लगा. थोड़ा फ़िल्मी होते हुए उसने कहा “मुझे वैसे दवा खाने की अब क्या जरूरत? तुम जो हो मेरे सामने...देखना मेरी मैजिशियन सब ठीक कर देगी. ये बुखार कहाँ टिक पायेगा मेरी मैजिशियन के सामने? है न? देखना डर के भाग जाएगा बुखार”. लड़की के गुस्से वाले चेहरे पर अब हलकी मुस्कान उभर आई थी..अपने बारे में ऐसी बातें सुनकर वैसे भी उसका चेहरा एकदम खिल जाता था. फिर भी ऐटिटूड दिखाते हुए उसने कहा “मस्का लगा रहे हो मुझे?”
“हाँ बिलकुल...तुम्हें तो मस्का बहुत पसंद है न?” लड़के ने उसे छेड़ते हुए कहा.
“हुहं...व्हाटेवर......” लड़की ने कन्धों को उचकाकर, लड़के के सवाल को गोल कर दिया.

लड़के को लगा जैसे उसके सामने फिर से उसकी वही पुरानी दोस्त खड़ी है जो बात बे बात पर गुस्सा हो जाया करती थी और लड़के को उसे मनाने के लिए फिर कितने जतन करने पड़ते थे. लड़के को लगा जैसे दो दिन का सारा बोझिलपन, अकेलापन और उसके अंदर का भारीपन धीरे पिघलने लगा है. उदासी के बादल उसके चेहरे से तो लड़की को देखते ही छटने शुरू हो गए थे, लेकिन अब उसे लगा जैसे उसकी तबियत भी ठीक है और वो हल्का महसूस कर रहा है. उसे लगा कि ये लड़की सच में उसकी मैजिशियन है जो सब कुछ ठीक कर देती है. 

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Sunday, January 22, 2017

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है



इतवार का दिन शायद यादों का दिन होता है..वरना सुबह से तुम्हारी बातें एक के बाद एक यूँ याद न आती. तुमसे बातें करने को बड़ा दिल चाहा आज, लेकिन वो अब तो मुमकिन नहीं, तो तुम्हें खत लिखने ही बैठ गया. शेखर का गर्दनीबाग का वो घर भी याद आ रहा है आज जहाँ दिसंबर और जनवरी के दिनों में अक्सर हम लोग अड्डा जमाया करते थे. उसका वो इम्पोर्टेड स्टीरियो भी याद आ रहा है जो उसके भैया लन्दन से उसके लिए लेकर आये थे और जिसपर हम सब का बराबर का अधिकार था.

याद है तुम्हें कैसे हर इतवार हम शेखर के घर पर पूरा पूरा दिन बीता देते थे. हर इतवार हम सब कुछ भूल कर, इंजीनियरिंग एंट्रेंस की किताबों को एक कोने में रखकर सिर्फ मस्ती करते थे. इतवार एक पिकनिक जैसा ही तो होता था हमारा. हम फिल्मों के गाने बजाते, नाचते, गाते, अन्ताक्षरी खेलते, दोपहर को आंटी हमें बढ़िया बढ़िया पकवान बना कर खिलाती और शाम में तुम और पिया अपनी नयी नयी शरारतों से हमारा मनोरंजन करती. कुल मिलकर वो एक ऐसा दिन होता था जब शाम में हमें घर लौटने का दिल नहीं करता था.

तुम्हें उन दिनों गज़ल की बिलकुल भी समझ नहीं थी..शेखर को छोड़कर बाकी हमारे किसी दोस्त को ग़ज़ल समझ आती कहाँ थी. तुम्हारी तो जाने क्या दुश्मनी थी गजलों से...हमेशा एक ही लॉजिक होता था तुम्हारा, ‘कोई भी गाने को सुपरस्लो स्पीड में रोंदू से आवाज़ में गाओ तो हो गयी वो ग़ज़ल’. तुम्हें कितना डांटता था मैं लेकिन तुम मानती कहाँ थी. जब भी कहीं ग़ज़ल तुम सुनती बस गजलों का मजाक उडाना शुरू कर देती थी.

वो दिन तो तुम्हें याद ही होगा जब मैंने कितने प्यार से गुलाम अली की वो ग़ज़ल शेखर के स्टीरियो में बजाई थी ‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’?

गुलाम अली की गाई मेरी फेवरेट ग़ज़ल धीमी धीमी आवाज़ में बज रही थी. पूरा माहौल, वो ग़ज़ल के बोल...उसका दर्द...सब कुछ अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था मुझे, पर ऐसे में तुम्हें जाने क्या हो गया था. तुम पर जैसे कोई भूत हावी हो गया था. बुरा सा, अजीब सा, कुछ-कुछ बिसूरता सा मुँह बना कर तुमनें गज़ल के बोलों के साथ अपने हाथों और चेहरे से अजीब-अजीब एक्शन करने शुरू कर दिए थे...पल भर तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया...हो क्या गया इस लड़की को...?

पर फिर जब तुम्हारे हाव भाव और गज़ल के बोलों को मिलाया तब जाकर सारी तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो गई...अजीब सी रोनी सूरत पर अदृश्य आँसू पोंछ कर उन्हें मेरी ओर फेंकती हुई तुम अपना दिमाग़ी सन्तुलन नहीं खोई थी बल्कि मेरे इतने पसन्दीदा गज़ल की ऐसी की तैसी करने के मूड में थी...जितना मैंने तुम्हें पहले डांटा था ग़ज़लों का मजाक उड़ाने पर, तुम उन सब का बदला ले रही थी मुझसे. सच कहूँ तो तुम्हारी वो बदमाशी देख कर एक बार तो मन किया था कि तुम्हें वहीं दौड़ा-दौड़ा कर मारूँ, पर हमेशा की तरह मेरे गुस्से पर तुम्हारे लिए मेरा प्यार ही भारी पड़ गया था.

हद तो तब हो गयी थी जब तुम्हारी हरकतों को देखकर पिया और श्रुति ने भी ये अजीबोगरीब हरकतें शुरू कर दी थी. तुम्हारी दुश्मनी इस कैसेट के बाकी गजलों से नहीं थी, तुम तो बेचारे इसी एक खूबसूरत ग़ज़ल के पीछे पड़ गयी थी. ये ग़ज़ल खत्म हो भी जाती तो तुम इसे फिर से रिवाइंड करती और तुम तीनों मिलकर फिर से अजीबोगरीब मुद्राएँ बनाकर ग़ज़ल की ऐसी तैसी कर डालती.

लेकिन बात सिर्फ अजीबोगरीब एक्सन और मुद्राओं तक ही सिमित कहाँ थी. ग़ज़ल के हर शेर पर तुम्हारे एक्सपर्ट कमेन्ट भी तो मुझे सुनने को मिल रहे थे. याद है तुम्हें वो कमेंट्स?

“दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये / वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है”, को तुमनें कुछ ऐसे समझाया था मुझे, “हो सकता है कि तुम्हारे शायर साहब ने बेचारी उस लड़की का कुछ कीमती समान अपने पास रख लिया हो, वरना वो शायर कोई सलमान खान थोड़े हैं जो उनके बुलाने के लिए लड़की नंगे पाँव दौड़े दौड़े आ जायेगी”. और फिर तुम मुझे धमका के कहती “भूल जाओ साहब कि कभी मैं ऐसे कोठे पर नंगे पाँव आऊँगी..मुझसे ये सब ‘ग़ज़ली’ नौटंकियों की उम्मीद बिलकुल न करना तुम”.

‘गजली’ असल में तुम्हारा इन्वेंट किया हुआ शब्द था. चलो मान लिया कि ये शब्द तुमनें ‘फ़िल्मी’ शब्द के तर्ज पर इन्वेंट किया था.. लेकिन इस ग़ज़ल के बाकी लफ़्ज़ों का क्या कसूर था कि तुमनें उन तमाम उर्दू के शब्दों को जाने कैसे बकवास और बेतुके मानी दे दिए थे.. जैसे “देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से” को तुमनें बना दिया था, “देखना मुझको जो बर्गर का नास्ता करते हुए तो सौ सौ नाज़ से”. सच पूछो तो तुम्हारे इन्वेंट किये उन शब्दों के मानी इतने बकवास थे कि बहुत तो मुझे याद भी नहीं, और तुम बाकायदा उन अजीब मानी को अपने डायरी में नोट कर के रखती थी. मुझे आज तक समझ में ये बात नहीं आई कि तुम्हें इस बेचारी एक ग़ज़ल से इतनी नफरत आखिर हुई क्यों थी.

तुम मुझे सालों तक बस एक इसी ग़ज़ल को लेकर चिढ़ाती रही. सच बोलूं तो मैंने एक वक्त के बाद तुम्हारे सामने इस ग़ज़ल का जिक्र तक करना छोड़ दिया था..कभी तुम मुझे इरिटेट करने के लिए इस ग़ज़ल का जिक्र करती तो मैं बात किसी दुसरे टॉपिक पर मोड़ दिया करता था. नहीं, किसी चिढ़ या गुस्से से नहीं...बस यूहीं...

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फिर बहुत सालों बाद जनवरी का वो दिन आया. जब तुम्हारे और मेरे सबसे बुरे दिन चल रहे थे. जब ये बात लगभग पक्की थी कि तुम अब कभी वापस नहीं आओगी और जब मैं खुद को ये समझा रहा था कि बाकी की ज़िन्दगी मुझे तुम्हारे बगैर ही काटनी है.

इतवार का ही दिन था वो भी जब मैं शहर के उसी कैफे में बैठा हुआ था जो तुम्हारा और मेरा पसंदीदा कैफे था. ये जानते हुए भी कि हमारा और तुम्हारा साथ अपने अंतिम पड़ाव पर था, और कुछ ही दिनों में तुम एक अलग सफ़र पर निकल जाओगी, मैं बहुत पीछे छुट जाऊँगा... ये जानते हुए भी कि सभी दरवाज़े बंद हो गए हैं. फिर भी उस दिन कैफे में बैठे जाने मैं कौन से रास्ते तलाश कर रहा था, कि कहीं से तो कोई उम्मीद दिखे, कहीं से तो कोई राह निकले जिसपर चलकर तुम्हें मैं वापस अपनी ज़िन्दगी में ला सकूँ. लेकिन ये मैं भी जानता था और तुम भी कि सभी रास्ते, सभी दरवाज़े बंद थे.

ऐसे में तुम्हारा उस दिन फोन करना मुझे चौंका गया था. सच कहूँ तो तुम्हारे उस फोन की मुझे उम्मीद बिलकुल नहीं थी. बेहद कांपती आवाज़ में तुमनें कहा था, “मै सोना चाहती हूँ...लेकिन सो नहीं पा रही हूँ..बहुत बेचैनी सी, बहुत अकेलापन सा लग रहा है...”

पहले का कोई दिन होता तो मैं तुम्हें मजाक में कह देता “सोना तो है नहीं मेरे पास, चाँदी से काम चला लो” और तुम खिलखिलाकर हँस देती. लेकिन उस दिन मैं एकदम खामोश रहा. मैं तो ये सवाल भी नहीं पूछ सकता था कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही, बेचैनी और अकेलापन सा क्यों लग रहा है.

“तुम सुन रहे हो?” मेरी चुप्पी को सुनकर तुमने मुझसे पूछा था.
“हाँ, बोलो न..मैं सुन रहा हूँ..” मैंने कहा था.
“सुनों, अब मैं सब समझती हूँ..मुझे पता है वो क्या कहती है? मैं सब जानती हूँ अब..” तुमनें कांपती हुई आवाज़ में कहा था.
“क्या बोल रही हो तुम? क्या समझती हो? क्या जानती हो?” मैंने तुमसे पूछा था. मुझे एक पल लगा था कि तुम फिर नींद में मुझसे बात कर रही हो. लेकिन ऐसा नहीं था.
“वो ग़ज़ल..याद है तुम्हें? वो ग़ज़ल? चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना? मैं अब समझ गयी हूँ. बहुत पहले समझ गयी थी. तुम्हें बस बताया नहीं था.” तुमनें सिसकती आवाज़ में कहा था.

इधर मैं एकदम चुप था. तुमसे क्या कहूँ ये समझ नहीं पा रहा था.

कुछ देर तुम एकदम चुप रही. फिर तुम्हारी वही सिसकती की आवाज़ मुझे सुनाई दी..इस बार लेकिन सिसकते हुए तुम उस ग़ज़ल को धीरे धीरे गुनगुना रही थी..पूरी की पूरी ग़ज़ल तुम्हें याद थी, ये मैं नहीं जानता था. हर बार तुम बस एक लाइन पर आकर रुक जा रही थी “वो तेरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है...हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...”

इधर शहर के इस कॉफ़ी हाउस में जहाँ इतनी भीड़ थी, मैं बेचैन हो उठा था. तुम्हारी सिसकने की आवाज़ और इस ग़ज़ल के बोल मेरे सीने के जैसे आर पार हो रही थी. सिसकने की आवाज़ ऐसे भी बहुत भयानक होती है. तब और भी ज्यादा जब वो आपके किसी अपने की आवाज़ हो...और बेचैनी अपने चरम पर तब पहुँच जाती है जब आप सिर्फ आवाज़ सुन रहे हैं और उसे देख नहीं पा रहे हों. मैं जानता था कि उस समय मैं ऐसा कुछ भी नहीं कह सकता था या कर सकता था जिससे तुम चुप हो सको. उस समय सारे शब्दों ने मुझे दगा दे दिया था. कहता भी क्या मैं तुमसे? बस तुम्हारे साथ अन्दर ही अन्दर मैं भी सिसकता रहा..बेचैन होता रहा. भगवान ही जानता है कितनी शिद्दत से मैंने उस वक़्त चाहा था कि काश तुम मेरे पास होती तो तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता और कहता कि तुम उदास मत हो, मैं सब ठीक कर दूंगा. लेकिन ना तो उस वक़्त मैं तुम्हें बाहों में भर सकता था और ना तो चाह कर भी तुम्हें ये कह सकता था कि मैं सब ठीक कर दूंगा. कितना हारा हुआ कितना बेबस महसूस कर रहा था मैं उस वक़्त. खुद से बेइन्तेहां नफरत भी होने लगी थी मुझे.

तुम जानती हो, तुमसे कभी कहा नहीं मैंने. लेकिन बहुत दिन तक तुम्हारी वो बातें, तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती रही हैं...आज भी तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती हैं. आज भी जाने क्यों आधी रात को मैं चौंक कर जाग जाता हूँ.. लगता है तुम मेरे बिलकुल पास बैठी हो, और ये ग़ज़ल गुनगुना रही हो. उस समय मैं जाने क्यों बेहद डर जाता हूँ..तुम्हें बेहद याद करता हूँ उस समय..मैं जानता हूँ कि अब ये ग़ज़ल मुझे सारी ज़िन्दगी हांट करेगी, ऐसे ही मुझे डराएगी और तुम्हारी याद दिलाएगी..



चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है,

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा,
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है,

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है,

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है,

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है,

देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से,
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है,

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है,

बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां,
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है,

वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये,
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है,

बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा ‘हसरत’ मुझे,
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है,
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