Saturday, December 24, 2016

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दिसम्बर, कोहरा और उसके खेल

काफी सालों बाद इस बार दिसंबर में शहर में इस कदर कोहरा मेहरबान हुआ है, वरना कोहरे ने तो जैसे ये ठान लिया था कि जनवरी के पहले अपनी शक्ल दिखानी नहीं है. तुम्हे याद है ऐसे कोहरे के मौसम में तुम कैसे फरमान जारी कर दिया करती थी? एक दिन सुबह ठीक पाँच बजे तुमने कॉल किया था और एकदम हड़बड़ी में कहा था, "सुनो.. दिसंबर जाने वाला है..बस पाँच दिन बचे हैं, और तुम सो रहे हो...? उठो, फ़ौरन उठो और जल्दी से तैयार होकर पार्क आ जाओ". कसम से , मेरा तो दिल किया था फोन में घुस जाऊं और तुम्हारी चोटी काट लूँ. जाड़े की सुबह सुबह जब कोई  गहरी नींद में रजाई के अन्दर दुबके हुए इत्मिनान से सो रहा हो तो कोई जगाता है क्या ऐसे किसी को? तुम्हें लेकिन इन सब बातों की परवाह ही कहाँ थी..तुम्हें तो बस ये मालूम था कि तुम्हें सुबह कोहरे में घूमना है और घुमाने वाला एकमात्र मैं ही था. तुम्हारी ऐसी बदमाशियों पर अक्सर मुझे गुस्से के बजाये प्यार आ जाता था. लेकिन उस दिन तुम्हारा कॉल पर ऐसे हड़बड़ाना बदमाशी या बेवकूफी नहीं थी. ये मुझे बहुत बाद में तुम्हीं से पता चला था. तुम सच में बहुत उदास हो जाया करती थी साल के आखिरी दिनों में ये सोचकर कि अब कुछ ही दिनों में दिसंबर जाने वाला है और फिर ग्यारह महीने का लम्बा इंतजार करना पड़ेगा. . दिसंबर से तुम्हें बेंतेहा प्यार था, तुम्हारा बस चलता तब तो दिसंबर को तुम ग्यारह महीने का और एक्सटेंसन दे देती. तुम्हारे मुताबिक तो साल भर बस दिसंबर का ही महिना होना चाहिए.

उन दिनों मेरे लिए सुबह के कोहरे में तुम्हारे साथ घुमने से ज्यादा मैजिकल कुछ भी नहीं था. हाँ तुम्हारे कई सारे नखरे झेलने पड़ते थे मुझे और अक्सर घर में बहाने भी बनाने पड़ते थे लेकिन इन सब के बावजूद सुबह कोहरे में तुम्हारे हाथ में हाथ डाले घुमने का वो एहसास ही बिलकुल अलग सा था. तुम्हे तो कोई दिक्कत नहीं थी, घर में उन दिनों सिर्फ तुम्हारी माँ और दीदी ही थी और तुम उन्हें जाने क्या क्या कहानियाँ बता कर सुबह हर रोज़ निकल आया करती थी.. लेकिन मैं फँस जाता था, हर दिन कोई नया बहाना सोचना पड़ता था मुझे. दिसंबर और कोहरे के कॉम्बिनेशन वाले मौसम में तुमपर अक्सर कोई न कोई सनक चढ़ जाया करती थी. याद है एक दिन तुमने फरमान जारी कर दिया कि कल से अपना बैडमिन्टन किट लेते आना. ये सोचने की तुमने जहमत भी नहीं उठाई थी कि मैं इतनी सुबह घर में क्या बोल कर बैडमिन्टन किट हर दिन लाया करूँगा? पूरे एक डेढ़ महीने मेरे घरवालों को लगता रहा था कि मैं कॉलेज के बैडमिन्टन चैम्पैन्शिप में भाग ले रहा हूँ और उसी की तैयारी के लिए सुबह इतने कोहरे में भी निकल जाता हूँ. उन्हें क्या पता था कि मैं तुम्हारे आदेशों का पालन कर रहा था.

बैडमिन्टन खेलने का तुम्हें कभी शौक नहीं रहा था. लेकिन एक सुबह तुमने पार्क के एक कोने में किसी लड़के-लड़की को देख लिया था बैडमिन्टन खेलते हुए, तब से ही तुम्हारे मन में ये सनक बैठ गयी थी. तुम भी हर सुबह खेलती थी बैडमिन्टन. लेकिन तुम्हारे साथ बैडमिन्टन खेलना भी आसन कहाँ था? बैडमिन्टन के तुम्हारे अपने नियम थे. तुम्हारे ही जैसे यूनिक नियम जैसे, बैडमिन्टन खेलने समय मैं तुम्हें जोर से कोई शॉट नहीं  मार सकता था, वरना मेरे पॉइंट कट जाते. ना ही तुम्हें कोई शॉट मैं ज्यादा ऊपर या नीचे खेलवा सकता था. मतलब ये कि तुम्हारे बैडमिन्टन रैकेट के आसपास ही कॉर्क आना चाहिए जिससे तुम आराम से शॉट मार सको, और इतने पर भी तुम्हारा कोई शॉट मिस हुआ तो भी पॉइंट मेरे ही कटते थे. कभी गलती से मैंने शॉट मारने में थोड़ी हीरोगिरी दिखा दी तो पॉइंट तो कटते ही कटते, जाड़े के मौसम में, ऐसे कोहरे में, बैडमिन्टन रैकेट से मार अलग से पड़ती थी तुमसे.

ऐसे ही सनक तुम्हें चढ़ी थी एक दफा क्रिकेट खेलने की भी. एक दो तीन तो हमारे दोस्तों की गैंग भी आई थी क्रिकेट खेलने. लेकिन तुम्हारे नियम...वो तो इस खेल में भी अजीबोगरीब थे. बस एक दिन में ही सब दोस्त तुमसे तंग आकर भाग गए थे. तुम्हें हर ओवर का पहला बॉल ट्राई बॉल चाहिए था. हर बॉल तुम्हारे बैट पर ही आना चाहिए था. अगर गलती से शॉट मिस हो जाता तो वो बॉल 'इनवैलिड' हो जाता था. तुम्हें बोलिंग करना आसान कहाँ था? बोलिंग करते समय रन अप लेने की तो सोचना भी अपराध था. तीन चार क़दमों की चहलकदमी कर के भी तुम्हें गेंद फेंकने आता तो तुम एकदम झल्ला जाती थी और बैट फेंक देती थी. तुम्हें बस इतना चाहिए था कि खड़े होकर सीधा सपाट बॉल तुम्हें फेंका जाए जिसे तुम आराम से बाउंड्री पार भेज सको. तुम्हें आउट करना भी तो टेढ़ी खीर थी. दुनिया का महानतम गेंदबाज तुम्हें आउट नहीं कर सकता था. उन दिनों हम इंटों का विकेट बनाते थे. कुछ आठ-दस इंटें लगते थे विकेट बनाने में, और तुम जब बैटिंग करती तो सभी इंटों को नीचे गिरा देती थी. बस दो इंटें एज अ विकेट लगे रहते थे और यदि उन इंटों पर तुम्हारे नियमों के मुताबिक बॉल लगे तो ही तुम आउट होगी.

जहाँ तक तुम्हारे बोलिंग करने का सवाल था, उसका मुझे ज्यादा इक्स्पिरीअन्स नहीं है. तीन चार बार ही हुआ होगा ऐसा जब तुमने मुझे बैटिंग करने का मौका दिया था. इतना बस मुझे याद है कि मैं बैटिंग और फील्डिंग एक साथ किया करता था. इधर मैंने शॉट मारा नहीं कि तुम चिल्लाती थी, "अरे जल्दी पकड़ो बॉल को, वरना चार रन हो जायेंगे और तुम जीत जाओगे" और मुझे भाग कर गेंद पकड़ना पड़ता था. गलती से अगर मेरे बैट से लगी बॉल बाउंड्री पार चली जाती तो तुम्हारे ताने अलग सुनने पड़ते थे मुझे, "ठीक से फील्डिंग भी नहीं कर सकते तूम...कुछ काम के लायक नहीं हो".  ऐसी तो थी तुम. कौन तुम्हारे ऐसे नियमों के साथ क्रिकेट खेलता. तुम्हारे इन नखरों को सिर्फ मैं ही झेलता था, और किसी में इतनी हिम्मत कहाँ थी? लेकिन तुम्हारे इन सब नखरों के बावजूद तुम्हारे साथ सुबह के ये दो ढाई घंटे मेरे लिए दिन के बेहतरीन पल होते थे.

तुम्हें याद है मेरे पास उन दिनों एक छोटा टू-इन-वन था जो एक क्विज कम्पटीशन में मुझे इनाम में मिला था. जैसे तुमने बैडमिन्टन और क्रिकेट किट लाने का फरमान जारी किया था, ठीक ऐसे ही तुमने एक दिन टू-इन-वन लाने का फरमान जारी कर दिया था. क्रिकेट और बैडमिन्टन तक तो ठीक था, लेकिन ये टू-इन-वन लाने का मैं घर में क्या बहाना बनता? कि मैं किसी म्यूजिक कम्पटीशन में भाग ले रहा हूँ? दो दिन तो किसी को पता नहीं चला था कि मैं हर सुबह अपने उस छोटे से टू-इन-वन को बैग में रख कर ले जाता हूँ. लेकिन एक दिन माँ ने देख लिया तो पूछा, तुम तो सुबह खेलने जाते हो? ये टू-इन-वन किसलिए? अब मैं क्या कहता? हमेशा एक ही बहाना बनाता था, कि दोस्तों के साथ सुबह क्रिकेट की कमेंटरी सुनता हूँ. सोचो ज़रा, इतने पापड़ बेलने पड़ते थे मुझे तुम्हारे हर आदेश का पालन करने में.

तुम्हारी एक ख्वाहिश थी, कि हम और तुम इस पार्क में टहलते रहे, या कुछ खेलते रहे या बस कहीं किसी बेंच पर बैठे रहे और बैकग्राउंड में संगीत बजते रहना चाहिए. याद है एक दिन तुमने कहा था मुझसे "पता करो इस पार्क का रख-रखाव कौन करता है और उसे मेरे पसंद की गानों की एक सीडी बना कर दे दो और कहो कि पार्क में हर जगह लाउडस्पीकर लगवा दे और वो सारे गाने एक एक कर के बजाये". खैर ये तो मुमकिन नहीं था शायद इसलिए तुमने पार्क में गाने सुनने का एक दुसरा रास्ता निकाल लिया था. मुझे तुमने टू-इन-वन लाने का फरमान सूना दिया था और मेरे उसी छोटे से टू-इन-वैन पर ही तुम अपनी हसरत पूरी कर लिया करती थी. तुम अपने मन पसंद गाने बजा लेती थी और टू-इन-वन को वहीँ किसी बेंच पर रख कर हम दोनों बैडमिन्टन खेलते थे और खेलने के बाद बहुत देर तक वहाँ बैठ कर गाने सुनते थे. उन दिनों ऐसा लगता था अक्सर कि ये टू-इन-वन हमारा कोई दोस्त हो जो हम दोनों के बीच बेंच पर चुपचाप बैठे हुए हमारी बातें सुन रहा है और हमें गाना सुना रहा है.

एक छोटा सा खेल भी तुमने इजाद किया था उन दिनो. मेरे पास कुछ इन्स्ट्रमेन्टल गानों की कैसेट थी. तुम उन कैसेट्स को टेप पर चलाती और कहीं भी बीच में रेंडमली फॉरवर्ड या रिवाइंड कर के बस तीन या पाँच सेकण्ड के लिए प्ले करती और मुझे पहचानना होता था कि वो गाने की कौन सी लाइन थी. मैं अक्सर हार जाया करता था लेकिन तुम हमेशा ही जीतती थी. इस एक खेल में ना तो तुम्हारे कोई वीयर्ड नियम थे और नाही तुम्हारे कोई नखरे. मुझे हैरानी भी होती थी उस वक़्त कि ऐसे कैसे तुम्हें हर गाने इतने अच्छे से पता हैं. मेरे लिए इस  खेल में एक फायदा ये था, कि तुम हर गाने को पहचान लेती थी और फिर उसे मेरे सामने गुनगुनाती थी. तुम्हारे साथ दिसंबर के कोहरे वाली सुबह की शायद ये मेरी सबसे मीठी याद है.

आज तुम्हारी उन बातों को याद कर के चेहरे पर एक मुस्कराहट तैर जाती है. सच कहूँ तो तुम्हारी जितनी भी अजीबोगरीब फरमाइशें थीं, जितने भी आदेश थे उनसे मुझे कभी इरिटेशन महसूस नहीं हुई. मैं तुम्हारी उन हरकतों पर उन दिनों कभी कभी हँसने की गुस्ताखी जरूर कर देता था लेकिन मुझे सच में बहुत अच्छा लगता था जब तुम ऐसे मुझपर हुक्म चलाती थी. इस बार दिसंबर के मौसम में शहर के उस पार्क में जहाँ हम और तुम जाया करते थे हर सुबह, एक बड़ा प्यारा सा बदलाव हुआ है जिसे देखकर मैं कुछ देर के लिए दंग रह गया था. पार्क के हर कोने पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए थे और सुबह सुबह रोमांटिक इंस्ट्रुमेंटल और कभी कभी रफ़ी के रोमांटिक गाने बजते हैं. मुझे ये सोच कर हँसी भी आ गयी कि चलो तुम्हारी फरमाइश को पार्क के मैनेजमेंट ने इतने सालों के बाद ही सही, माना तो आखिर. मुझे उस समय तुम्हारी कमी बहुत शिद्दत से महसूस हुई थी और मुझे लगा काश तुम यहाँ होती और ये प्यारा सा बदलाव तुम देखती. तुम्हारे चेहरे की ख़ुशी ऐसे में देखने लायक होती. पार्क के ही एक कोने पर मेरी मेरी नज़र गयी दो लड़के लड़कियों पर जो सुबह के कोहरे और ठण्ड में बैडमिन्टन खेल रहे थे. मुझे तुम्हारी और ज्यादा याद आने लगी, और मैं पार्क की बेंच पर बैठा आँखें बंद कर लेता हूँ और बहुत पीछे उस साल में पहुँच जाता हूँ जब तुम और मैं यहाँ बैडमिन्टन खेलते थे. बीच बीच में पार्क में बजता हुआ एक रोमांटिक गाने के बोल सुनाई दे रहे हैं.

निगाहों में छुपकर दिखाओ तो जानें
ख़यालों में भी तुम न आओ तो जानें
अजी लाख परदे में छुप जाइयेगा
नज़र आइयेगा नज़र आइयेगा

अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा
जहाँ जाइयेगा हमें पाइयेगा




5 comments:

  1. अजब लडकी की गज़ब कहानियाँ...है न...:P :P

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 26 दिसम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बदलता मौसम बीतें यादें ताज़ी कर जाता है
    बहुत खूब

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  4. तुम्हारी कहानियाँ पढते-पढते मुझे बहुत सी पुरानी कहानियाँ याद हो आती हैं... जी में आता है कि लिखूँ... किसी और के लिये न सही, तो मेरे अपने लिये ही. लेकिन तब लगता है कि काश ऊपरवाला मुझे कुछ दिनों के लिये ही सही, मेरी बीती उम्र वापस दे देता या मेरी उम्र को दसेक साल पीछे ले जाता तो मैं वो सब लिख पाता जो लिखने से रह गया!
    बस तुम्हारी कहानियों में खुद को तलाशता हूँ.

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  5. आपकी रचना पढ कर एक अजीब सा सुकून मिलता है.

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया