Sunday, December 11, 2016

कोहरे पर लिखा एक नाम

वह दिसंबर की एक सर्द सुबह थी. ठण्ड इतने कि रजाई से निकलने का मन न करे, पर जल्दी उठना लड़के की मजबूरी थी. क्या करता वह? लड़की ने उसे हुक्म दिया था.. सुबह ठीक साढ़े छः बजे मेरे घर पहुँच जाना, मुझे ड्राइव पर चलना है.

लड़के ने अधखुली आंखों से ही अपने मोबाइल पर एक नजर डाली, सुबह के 6:00 बजे थे. हारकर उसने रजाई अपने ऊपर से हटा दी और उठ कर एक अंगडाई लेता हुआ खिड़की के पास तक आ गया. खिड़की से बाहर देखा तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. धुंध इतनी गहरी थी कि उसे तो सामने वाले घर की बालकनी भी नजर नहीं आ रही थी. लड़के का मन हुआ कि वह फोन करके लड़की को मना कर दे कि वह आज नहीं आ पाएगा पर उसकी इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वह इस तरह का कोई कॉल करने की सोच भी सकता. हुक्म आखिर हुक्म था और उसकी तामील करना उसका फर्ज़... और हुक्म भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि गाड़ी लेकर लड़की के घर सुबह ठीक 6:30 बजे आकर उसे मोर्निंग ड्राइव पर ले जाने का हुक्म था.

यूँ तो लड़के को लड़की की हर अदा, हर ज़िद और हर नखरे पर बेइंतिहा प्यार आता था...पर जाने क्यों आज उसे थोड़ी सी इरिटेशन महसूस हो रही थी. ऐसे कोहरे में लड़की का उसके जैकेट में हाथ डाल कर टहलना एक बात थी और कोहरे में ड्राइव पर निकलना दूसरी बात थी. एक तो कोहरे में वैसे भी सड़क दिखाई नहीं देती. गाड़ी के शीशों पर भी धुंध आ जाती है और ऐसे में ड्राइव पर जाना खतरनाक आईडिया था. लड़के को कोहरे में गाड़ी चलाना कभी भाता नहीं था लेकिन लड़की को कोहरे में ड्राइव पर जाना बड़ा रोमांटिक लगता था.

लड़के ने मन ही मन तय किया कि आज कुछ भी हो जाए, वो लड़की को गाड़ी की चाभी तो नहीं देने वाला है. एक तो आम दिनों में लड़की गाड़ी सही से चलाती नहीं थी, हॉर्न देने के बजाये कार के अन्दर से ही चिल्लाती थी “हटो हटो...सामने से हटो..” और ऐसे मौसम में जब पूरा शहर कोहरे की गिरफ्त में है, उसे गाड़ी चलाने की सूझी है. लड़के ने ये तय कर लिया कि लड़की को तो वो गाड़ी चलाने नहीं देगा. लड़की को मोर्निंग ड्राइव पर जाना है तो वो ड्राइव कर के ले जाएगा. लड़का जानता था ये काम इतना आसान नहीं है.. लड़की को बहुत प्यार से मनाना पड़ेगा ताकि वो गाड़ी चलाने की जिद न करे. अपने इन्हीं ख्यालों में खोए लड़के की निगाह जब घड़ी पर गई तो वह चौंक गया...उफ़! छः पच्चीस तो यहीं बज गए...यानि अब उसको पक्का देर होनी थी और देर होने का मतलब, लड़की की तय की गई कोई अजीबोगरीब सजा झेलना . ऐसा नहीं था कि लड़की कभी देर से नहीं आती थी, वो अक्सर ही देर से आती थी और खुद की लेटलतीफी के लिए उसके पास हमेशा बेहद अजीब अजीब से लॉजिक मौजूद होते थे. मसलन...लड़कों का लेट होना बहुत बोरिंग होता है, जब कि लड़कियों का लेट होना बेहद रोमांटिक एक और तर्क तो इससे भी ज़्यादा अजीब था...लड़के जब देर से आते हैं तो वो बिलकुल जोकर लगते हैं और लड़कियाँ जितनी देर से आती हैं वो उतनी ही अधिक सुन्दर हो जाती हैं.

कभी कभी लड़की की ऐसी इललॉजिकल बातों पर लड़के का बहुत मन करता कि वह पेट पकड़ कर लोट लोट के हँसे, पर हँसना तो दूर अगर ऐसे में भूल से भी उसके चेहरे पर एक मुस्कान भी आ जाती तो उसकी शामत आना तय था. लड़की ऐसे में मुँह फुला के बैठ जाती...मेरी बात तुमको जोक्स लगती है न...और मैं कोई जोकर...लड़के का दिल करता, वह ज़ोर से अपनी गर्दन 'हाँ' में हिला दे, पर 'आ बैल मुझे मार' का ख़तरा कौन मोल लेता.

ये सब बातें याद करते हुए लड़के के चेहरे पर फिर एक मुस्कान खिल उठी. लड़की की यही सब बातें तो उसे उसकी उम्र की बाकी लड़कियों से अलग करती थी. सबसे ख़ास और अनोखी बात तो उसे यह लगती थी कि लड़की सिर्फ़ उसके सामने ही इस तरह ट्रांसफॉर्म होती थी...बाकी दुनिया के सामने उसका ये रूप नहीं आता था. एक बेहद हँसमुख पर संजीदा सी समझदार लड़की कैसे उसके सामने इतनी बचकानी हो जाती थी वह कभी जान नहीं पाया था. बहुत दिन पहले उसके अचानक हुए गंभीर रूप से रूबरू हो उसने धीरे से पूछा भी था...तुम जब इतनी समझदार हो तो मेरे ही सामने इतनी बच्ची क्यों बन जाती हो ? जवाब में वो फिर तुनक गई थी...तुमको तुम्हारी असली गुड़िया” ज्यादा पसंद है या “नकली”? बस बता दो, फिर तुम देखना... कहते-कहते उसकी आँख डबडबा आई थी तो वह एकदम से घबरा गया था। उसका यह मकसद बिलकुल नहीं था, न ही उसे अंदाज़ा था कि बेहद हल्के-फुलके रूप में पूछी गई उसकी यह बात उसे इस कदर हर्ट कर देगी. वह हड़बड़ा के उसको एक बच्चे की तरह मनाने लगा था...और उस दिन हमेशा की तरह देर तक नखरा दिखाने की जगह वह झट से मान भी गई थी.

लड़की के घर पहुँचते पहुँचते उसे सात बज गए थे. आधे घंटे देर से पहुँचने से लड़का वैसे ही डरा हुआ था. मन ही मन सोच रहा था, आज तो शामत आई अपनी. लड़के ने उसके अपार्टमेंट के गेट के पास इधर उधर निगाह दौड़ाई, पर लडकी का कोई अता-पता नहीं था. लड़के ने राहत की साँस ली. वो अपार्टमेंट के सामने वाली चाय दूकान में बैठ गया और लड़की का इंतजार करने लगा. दस प्रन्द्रह मिनट उसका इंतज़ार करके उसे चिंता होने लगी थी. फोन पर नजर दौड़ाई तो ना लड़की का कोई एसएमएस आया था ना ही उसने कॉल किया था. ऐसे कोहरे वाला मौसम तो उसका सबसे ज़्यादा पसंदीदा मौसम है, फिर इसको वह कैसे मिस कर सकती है भला...? कहीं उसकी तबियत फिर से ख़राब तो नहीं हो गयी? उसने मोबाइल पर लडकी का नम्बर डायल किया. उधर घंटी बस बंद ही होने वाली थी कि तभी लडकी की उनींदी आवाज़ में उससे भी ज़्यादा निन्दियाया हुआ एक बेचारा सा `हैल्लो' लड़के के कानों में पड़ा...

"तुम अभी तक सो रही हो...? भूल गई क्या तुमने आज मुझे यहाँ बुलाया था...?" लड़के की आवाज़ में न चाहते हुए भी थोड़ी नाराजगी झलक गई, "मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ और तुम वहाँ रजाई ओढ़ के आराम से सो रही..."

लड़के के कॉल से लड़की भी हडबडा के उठ गयी. उसकी आवाज़ की तल्खी लडकी भांप गई थी पर हमेशा की तरह डरने की बजाय वह भी गुस्सा गई,"तुमको किसने कहा था तुम इत्ती सुबह तुमको पहुँचने? अब भुगतो... एक तो मूवी देख कर वैसे ही मैं दो बजे सोई, ऊपर से तुमने भी जगा दिया... मुझे अभी आधा घंटा और लगेगा आने में...

लडकी को यूँ गुस्सा होते देख मानो लड़के के होश उड़ गए थे. ये लो..अब अगर ये गुस्सा हो गई तो इसको मनाना और भी टेढ़ी खीर होगी. सो वह झट से समझौते के मूड में आ गया,"अच्छा-अच्छा, ठीक है...मुझे क्या पता था ये सब...तुम आओ अब, मैं यहीं गेट के पास तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.."

लडकी जब वहाँ आई तो बेहद खुशनुमा मूड में थी. हलके नीले रंग की डेनिम की जींस पर ब्लैक लेदर जैकेट और गले में बेहद नफासत से लिपटे स्कार्फ के साथ वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. इतने कोहरे में भी उसे धूप का काला चश्मा लगाए देख कर लड़के की हँसी छूट गई, जिस पर उसने बड़ी मुश्किल से काबू पा लिया. चेहरे पर नकली गंभीरता ओढ़े उसने उसे फटाफट गाडी में बैठ जाने को बोला, पर लडकी तो लडकी थी...इतनी आसानी से कहाँ मानने वाली थी. इसलिए फिर तुनक गई...पहले कायदे से मेरी तारीफ करो...तब गाडी में बैठूंगी. लड़का तो कब से उसकी तारीफ करने का मौक़ा ढूँढ ही रहा था, तभी तो अपनी सारी शायराना जानकारी का इस्तेमाल करते हुए उसने लडकी की भरपूर तारीफ कर डाली...पर आखिर में उससे रहा नहीं गया तो इस समय भी धूप का चश्मा पहनने की वजह पूछ ही डाली. लडकी ने उसे कुछ ऐसे घूर के देखा मानो इस बेवकूफाना सवाल की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं थी. फिर बड़ी लापरवाही से कंधे उचका के बोली...तुम ही तो कहते हो मुझे सनशाइन...अपनी ही रोशनी से मेरी आँखें चौंधिया जाती तो...? तुमको इतना भी समझ नहीं आता...ओह गॉड!! कितने बुद्धू हो तुम...!! लड़का हमेशा की तरह बिलकुल क्लू-लेस था . ऐसे तर्क उसे हमेशा निरुत्तर कर देते थे.

लड़का ड्राइविंग सीट पर बैठने ही वाला था कि लड़की ने टोका.. “ऐ मिस्टर, उधर कहाँ? इधर आइये आप. आपकी सीट ये है. वो ड्राइविंग सीट अगले दो घंटे तक मेरे नाम पर बुक्ड है...”. लड़का इसके लिए तैयार था. उसने पहले तो सख्ती से साफ़ मना कर दिया और फिर बड़े प्यार से लड़की को समझाने लगा कि ऐसे कोहरे में अच्छे ड्राइवर्स को भी गाड़ी चलाने में दिक्कत होती है..कोहरे में गाड़ी चलाना कितना मुश्किल है वो एक एक कर के लड़की को समझाने लगा था. लड़की लेकिन कहाँ मानने वाली थी. इस बार वो गुस्सा होने के बजाये लड़के को इमोशनली ब्लैकमेल करने लगी. अंत में थक हार के लड़के ने न चाहते हुए भी गाड़ी की चाबी लड़की को थमा दी.

लडकी ने बड़ी प्रोफेशनली ड्राइविंग सीट सम्हाल ली थी | इग्नीशन ऑन करने से पहले लड़की ने लड़के से बड़े लापरवाही से पूछा...अच्छा ये क्लच है न और ये ब्रेक और ये एक्सलेटर...? लड़का हैरत से उसे देखने लगा.. तुम भूल गयी? लडकी ने इग्नीशन ऑन करते हुए बड़ी लापरवाही से कंधे उचका दिए...याद है याद है..थोड़ा कन्फ्यूज्ड थी..अभी चलाऊँगी तो सब फिर से याद आ जाएगा ...नहीं याद आया तो तुम तो बता ही दोगे न...

लड़के का दिल किया अपना माथा पीट ले...हद है यार, ये गाडी चलने बैठी है और इसको यही याद नहीं कि गाडी का ब्रेक, क्लच या एक्सीलेटर कहाँ है...एक बार फिर उसको सब बता कर सीट बेल्ट बाँध कर और उसको भी बंधवा कर लड़के ने भगवान् का नाम लिया और स्टेयरिंग उसके हवाले कर दिया.

कुछ दूर तक उसे ठीक-ठाक चलाते देख कर उसने राहत की साँस ली. पर अभी यह साँस वह ठीक से ले भी न पाया था कि लडकी के “रुक-रुक” और “हट-हट” की आवाज़ से एकदम हडबडा गया और जब तक वह कुछ समझ पाता, उसकी गाडी का एक कोना सड़क किनारे खड़े ऑटो से टकरा चुका था.

जब तक लड़का बाहर निकल कर गाडी को हुआ नुकसान आँक पाता, लडकी ने एक झटके से गाडी का दरवाज़ा खोला और अपने ऊपर इस अचानक हुए हमले से धक्का खा कर बौखलाए ऑटो-ड्राईवर पर बरस पडी," दिखाई नहीं देता, इतनी बड़ी गाडी आ रही? बेवकूफों की तरह चुपचाप गाड़ी बीच सड़क पर लगाये बैठे हुए थे...? ऑटो ड्राईवर भी थोड़ा तैश में आ गया और बहस करने लगा. लेकिन लड़की पूरे तरह से ऑटो ड्राईवर के ऊपर बरस पड़ी थी. आसपास के कुछ लोग भी वहाँ जमा हो गए थे. भीड़ इकट्ठी होते देख लड़के ने किसी तरह दोनों को शांत कराया और ऑटो वाले से माफ़ी माँग कर लड़की को बेहद मुश्किल से किसी तरह घसीट-घसाट के गाडी की पैसेंजर सीट पर बैठा दिया.

गाड़ी में दोनों कुछ देर तक चुप रहे. लड़का ये नहीं समझ पा रहा था वो लड़की की इस बेवकूफी पर हँसे या गुस्सा दिखाए. वो ये जानता था कि गलती पूरी लड़की की ही थी. वो बेचारा ऑटो तो बड़े आराम से सड़क के किनारे खड़ा था लेकिन उसके समझ में ये नहीं आ रहा था कि बीच सड़क पर चलती उसकी गाड़ी डाइवर्ट होकर किनारे लगे ऑटो में कैसे जा टकराई. उससे रहा नहीं गया तो उसने आख़िरकार पूछ ही दिया लड़की से.. “तुम्हारी उस ऑटो वाले से कोई पुरानी दुश्मनी तो नहीं थी?” लड़की उसके तरफ आँखें तरेर कर देखने लगी.. “क्या मतलब है तुम्हारा..? कहना क्या चाहते हो तुम...”

लड़के ने बड़े मासूमियत से कहा, “अरे दुश्मनी नहीं थी तो गाड़ी तो सड़क के बीचोबीच चल रही थी..सड़क के किनारे खड़े ऑटो को एकदम फॉर्टी फाइव डिग्री के एंगल से जाकर कैसे ठोक दिया तुमने?

लड़की ने गुस्से में जवाब दिया...”अरे वो तो मैं अपनी जुल्फें समेटने लगी थी तो गाड़ी उधर भाग गयी...मैं तुम्हारे इस खटारा सी गाड़ी को भी कितना रोक रही थी लेकिन रुकी ही नहीं...और वो ऑटो ड्राईवर..एकदम बहरा था. मैं कितना चिल्ला रही थी. वो सुन ही नहीं रहा था. पता नहीं कौन ऐसे-ऐसे लोगों को ऑटो चलाने का लाइसेंस दे देता है, बेचारी सवारियां तो ऐसे ऑटो में बैठ कर फ़ालतू में मर जाती होंगी". मुझे तुमने रोक लिया नहीं तो मैं उस पागल की ईंट से ईंट बजा देती...लाइसेंस ज़ब्त न करवा देती तो मेरा नाम बदल देते.

गाडी को हुए नुकसान को देख कर माँ-पापा क्या कहेंगे, लड़के को जाने क्यों इस समय उस बात की चिंता के बजाये लडकी के इस गुस्से पर बेहद प्यार आ रहा था..अच्छा, तो नाम बदल कर कौन सा नाम रखूँगा मैं तुम्हारा...?


'परी...’ लडकी ने दो मिनट बड़ी गंभीरता से उसकी बात पर गौर करने के बाद कहा और खिड़की पर छाई धुंध पर अपना नाम लिख दिया...|