Monday, October 10, 2016

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बारिशी मोमेंट्स


हम दोनों की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी. वो अक्सर कहती थी मुझसे, देखना हम दोनों के प्यार पर फ़िल्में बनेंगी और किताबें लिखी जायेंगी. वैसे तो हर किसी को लगता है कि उसकी प्रेम कहानी इस दुनिया की सबसे ख़ास कहानी है. लेकिन हमारे मामले में ये थोड़ा सच भी था कि हमारी कहानी किसी रुपहले परदे पर चल रही फिल्म जैसी थी. चाहे वो पहली मुलाकात हो या हम दोनों के ज़िन्दगी में आने वाले उतार-चढ़ाव, ट्विस्ट एंड टर्न. सब कुछ किसी फिल्म के स्क्रिप्ट सा लगता था. पहली मुलाकात हमारी तो सच में एकदम फ़िल्मी थी.

दो जुलाई का दिन था वो. उस साल हमारे शहर में बारिश ही नहीं हो रही थी. जून पूरा सुखा ही रह गया था. मौसम विशेषज्ञ बस अनुमान ही लगाते रहे थे कि बारिश अब हुई कि तब लेकिन बारिश थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठा जाने क्या सोच रहा था और लगातार आसमान की तरफ ताके जा रहा था. तभी वो आई मेरे पास और मेरे बगल में बैठ गयी. कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की जिससे मैं बात करने के मौका ढूँढ रहा था एकदम से पास में आकर बैठ जाए तो कैसा हाल हो जाता है? ठीक वैसा ही मेरा भी हुआ. अचानक से मैं एकदम सकपका सा गया. मेरे उड़े हुए चेहरे को देखकर उसने हलके से मुस्कुरा दिया. फिर आसमान की तरफ देखकर मुझसे जॉन एलिया के स्टाइल में पूछती है -"आसमान में क्या देख रहे हो? कोई रहता है आसमान में क्या? या ये सोच रहे हो कि बारिश कब होगी?" उसके ऐसे अजीब प्रश्न से मैं थोड़ा कन्फ्यूज़्ड हो गया और हड़बड़ी में एक बेमतलब सा जवाब दे दिया "हाँ, बारिश नहीं हो रही यही सोच रहा था". वो फिर हँसने लगी. मेरे कंधे पर थपकी देते हुए कहा उसने "घबराओ मत, मैं आ गयी हूँ...बारिश भी आ जायेगी..."

मैं समझने की कोशिश करता कि क्या कहा उसने इससे पहले ही जैसा फिल्मों में होता है न, ठीक वैसा ही हुआ. इधर उसके बोलने की देर थी कि उधर ज़ोरों से बरसात शुरू हो गयी. एकदम मुसलाधार. मैं तो एकदम चकित सा होकर उसे बस देखते ही रहा था.वो अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए कह रही थी मुझसे - "टोल्ड यू"!

फिर जाने कैसा संयोग रहा उसके बाद, कि अगले कुछ सालों तक ये इत्तेफाक बना रहा कि शहर में बारिश के मौसम की पहली बरसात दो जुलाई को ही हुई. मेरे लिए तो ये बस एक इत्तेफाक मात्र था लेकिन उसके लिए ये इत्तेफाक से कहीं ज्यादा था. मुझे याद है एक साल बाद जब हम दोनों अपने मिलने की पहली ऐनवर्सरी शहर के एक गार्डन रेस्टुरेंट में सेलिब्रेट कर रहे थे, ठीक उसी समय बारिश शुरू हुई. उसने बारिश को देखते ही कहा था - "लो आ गयी बारिश, हमारी और तुम्हारी ऐनवर्सरी सेलिब्रेट करने". उसके छोटे से, प्यारे से दिमाग में ये बात घुस कर बैठ गयी थी कि हमारे शहर में पहली बरसात दो जुलाई को ही होगी. ना उससे एक दिन पहले ना उससे एक दिन बाद. उसका बस चलता तो वो अखबार में इश्तेहार छपवा देती कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है.


बारिश के साथ उसके अब्सेशन की वैसे तो बहुत सी वजहें थी, लेकिन ये सबसे बड़ी वजह थी. इसके अलावा हमारे अनगिनत खूबसूरत पल जो बारिश के रहे हैं और जिसे वो "बारिशी मोमेंट्स" का नाम देकर बुलाती है वो भी एक बड़ी वजह थी कि उसे बारिश के महीने से प्यार था. वैसे तो उसके इस "बारिशी मोमेमेंट्स" में कई सारे  बेशकीमती पन्ने जुड़े हैं लेकिन एक पन्ना बड़ा ख़ास है.

हम दोनों उस  समय अलग अलग शहर में रहते थे और अपने बेहद अजीज दोस्त नितिन की शादी में अपने शहर वापस आये थे. इत्तेफाक भी इतना खूबसूरत था कि नितिन की शादी दो जुलाई को तय हुई थी. वो हमारे मिलने की पाँचवीं ऐनवर्सरी थी. शहर का हाल और  बारिश का सिचूएशन एक्जैक्ट वैसा ही था, जैसा जिस साल जब हम पहली बार मिले थे तब था.

दो दिन पहले हमनें प्लान बनाया था मिलने का, लेकिन मैं कुछ जरूरी काम में फँस कर रहा गया था और उसे मैंने कहा था कि शादी वाले दिन मैं पहुँच पाउँगा. वो मुझसे बेहद खफा हो गयी थी. जाने क्या क्या उसने प्लान किया था, शौपिंग का भी प्लान उसने मेरे साथ ही बनाया था और मेरे देर से आने की वजह से उसके सारे प्लानिंग पर पानी फिर गया था. वो मुझसे लड़ बैठी थी. मैंने उससे पहले से ही कह रखा था कि मेरे साथ चलना शादी में, लेकिन वो नाराज़ थी और उसने ये सजा मेरे लिए मुकर्र की थी कि वो मेरे साथ नहीं जायेगी और शादी में मुझसे मिलेगी भी नहीं. कभी कभी ऐसे ज़ुल्म वो मेरे पर बड़ी बेरहमी से कर दिया करती थी.

मुझे लगा था उसका गुस्सा शादी वाले दिन गायब हो जाएगा. गुस्सा तो गायब हो भी चूका था लेकिन नौटंकियाँ करने में और मुझे सताने में वो उस्ताद थी. शादी वाले दिन उसने मुझे पहले से ही फ़ोन कर दिया था कि वो नितिन के घर के बाहर गेट पर मेरा इंतजार करेगी. मैं वहां ठीक समय पर पहुँच गया था लेकिन वो वहाँ नहीं थी. फिर अगले ही पल उसका फोन आया, "अन्दर आ जाओ ऊपर छत पर दोस्तों की महफ़िल जमी है, वहीं पर हूँ मैं". छत तीसरी मंजिल पर थी. वहाँ पंहुचा तो वहाँ स्टीरियो-डेक वाले के सिवाए वहाँ कोई नहीं था. वहाँ से उसे मैंने कॉल किया तो उसने मुझे फिर दोबारा गेट के पास बुला लिया. भागते दौड़ते हुए मैं गेट तक पहुँचा तो वहाँ भी वो नहीं थी. अब तक मैं समझ गया था कि वो मुझे बस सता रही है. उसने आख़िरकार मुझे फोन किया और बस इतना बोल कर फोन काट दिया, "बैड लक...आज तो तुम मेरे दीदार को तरसो बस".
हालाँकि मुझे उसकी इस बदमाशी से इरिटेट होना चाहिए था लेकिन मैं मन ही मन उसकी इस  बदमाशी पर मुस्कुरा रहा था.

गेट पर ही मुझे एक दो दोस्त और मिल गए और उनके साथ मैं घर के अन्दर चला आया. नितिन का घर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी बहुत बार नितिन के घर मैं आ चूका था. अन्दर एक बड़ा सा आँगन था और वहीँ बीच में मंडप लगा था. मैं वहीँ मंडप के एक तरफ बैठ गया.

आखिरार वो सामने से आते दिखी मुझे. चेहरे पर अपनी ट्रेडमार्क शरारती मुस्कान लिए, सारे नखरे और अदा समेटे सामने की तरफ के सीढ़ियों से बाकी औरतों के साथ वो आ रही थी.

वो मंडप के दुसरे तरफ कोने में औरतों के ग्रुप में बैठ गयी. ये उसका एक और जुल्म था मेरे पर. मुझे तड़पाने का वो कोई मौका नहीं छोड़ रही थी. मैंने उसे इशारे से पास आने को कहा. पहले तो उसने मुहँ बिचका के बड़ी बेरुखी से हँस कर मेरी बात को इगनोर कर दिया, फिर उसने मुझे इशारा किया अपने पास आने का. वो जानती थी कि मैं वहां नहीं आऊंगा. मैंने इनकार किया. वो फिर से हँस दी. उसे बस दूर से देखने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था. अपने सभी लड़की दोस्तों को मैं जी भर कोस रहा था, अभी कुछ देर पहले सब यहीं पर महफ़िल जमाये बैठी थीं लेकिन अब कोई दिख क्यों नहीं रही है. वो होती अगर तो कम से कम उनके जरिये मैं उस तक सन्देश तो पहुँचा सकता.

औरतें सब गीत गा रही थी और मेरे और उसके बीच बड़े विएर्ड से एक्स्प्रेसन का आदान प्रदान हो रहा था. उसने मुझे फोन पर मेसेज किया, "आज यूहीं बस इशारों इशारों में बातें करो". 

मैंने मौका देखकर नितिन की छोटी बहन प्रिया को अपने पास बुलाया और कहा कि उसे मेरे पास लेकर आओ. प्रिया ने जाने क्या बात की उससे, कि वो मुस्कुराने लगी. थोड़ी देर बाद खुद उठ कर वो मेरे पास आ बैठी. बातें मुझसे वो फिर भी नहीं कर रही थी. तब तक वो मुझसे रूठी रही जब तक मैंने 'कान पकड़' के उससे माफ़ी नहीं मांग ली थी. 

कुछ देर तक हम मंडप के पास ही बैठे रहे. लगभग सब रस्म जब खत्म हो गये, हम दोनों टहलते हुए छत पर आ गए थे. नितिन के घर की इस छत से भी काफी यादें जुड़ी थी. हम सब दोस्तों में से सिर्फ नितिन ही एक ऐसा दोस्त था जिसके यहाँ हम सभी इकट्ठे होते थे और छत पर हमारी महफ़िल जमती थी. छत के एक कोने पर डेक(स्टीरियो) रखा था. डेक ऑपरेटर शायद अपना डेक वहीँ छोड़ कर सोने जा चूका था. हम वहीँ कोने पर लगी कुर्सियों पर बैठ गए. 

उसने गाने सुनने की फार्माइश की. मैंने एकदम धीमे आवाज़ में गाने चला दिए. अच्छी सुहानी सी हवा चल रही थी और ऐसे में उसके साथ बैठ कर रोमांटिक गाने सुनते हुए छत पर तारों को देखना, ये मेरे लिए सबसे हसीन पल में से एक था. गाने के बीच में वो कई बार उठ कर नाचने लगती...और मैं उसे देखते रहता. 

मैं बार बार सीढ़ियों की तरफ भी देख रहा था, कि कहीं कोई आ ना जाए. उसने मेरे इस डर को भांप लिया था. मुझे तसल्ली देते हुए उसने मुझसे कहा, "घबराओ नहीं..हमें यहाँ कोई गलत नज़रों से नहीं देखेगा..यहाँ वैसे भी सब हमें प्यार करते हैं.." कुछ पल वो चुप रही, फिर आगे कहा उसने "तुम जानते हो तुमनें जब प्रिया के जरिये मुझे संदेसा पहुँचाया था न, तब उसने आकर मुझे जबरदस्ती बाहें पकड़ के उठा लिया था और हँस के कहा था, 'चलिए मेरी होने वाली भाभी, आपको मेरे भैया बुला रहे हैं'. वो समझती है तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है. उसके ऐसे जिद करने पर मैं तो एकदम शरमा सी गयी थी".  कुछ रुक कर उसने आगे कहा, "जानते हो सिर्फ प्रिया ही नहीं, जो भी हमें यहाँ पहचानते हैं सब यही समझते हैं कि तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है."

"हाँ, कुछ लोग हैं जो हर हाल में हमें साथ देखना चाहते हैं.उन्हें ये यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि हमारी अब तक शादी नहीं हुई ही. ऐसे लोगों को और उनकी उम्मीदों को और तरसाना अच्छा नहीं है न? मैंने उसकी तरफ देखा. वो अब भी शरमा रही थी. 

छत पर लगी सीरिज बल्ब की रौशनी में उसकी हलकी डबडबाई आँखें चमक रही थी. उसकी लटें माथे पे उभर आई थीं...रौशनी में चमकती हुई. उसके माँग का टिका और उसके झुमके सीरिज बल्ब की रौशनी में चमक रहे थे. वो किसी दुल्हन से कम नहीं दिख रही थी. मेरी निगाहें उसके चेहरे पर ही ठिठकी रहीं.  

"क्या देख रहे हो?" उसने धीरे से मुझसे पूछा.  
"तुम आज बहुत सुन्दर दिख रही हो..जैसे कोई दुल्हन हो.." मैंने कहा.  
अपने आँखों में आई हलकी नमी को पोछते हुए उसने कहा - 
"ये तो कुछ भी नहीं है, शादी वाले दिन देखना तुम, तुम्हारे होश नहीं उड़ा दूंगी तो कहना. मैं दुल्हन के जोड़े में और तुम सूट-बूट में होगे. हम दोनों दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े होंगे, देखना हमारी शादी यादगार होगी..." 

कुछ पल की चुप्पी के बाद, ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए उसने कहा, "देखना ये चाँद ये सितारे हमारे मिलन के गवाह होंगे.."

जब भी हम दोनों ऐसे खुले आकाश के नीचे बैठे होते थे, उसे हमेशा लगता था कि आसमान से सारे देवता और सारी परियां हमें देखती हैं. वो अक्सर कहती थी, जानते हो ऊपर आसमान में जितने भी देवता और परियां मौजूद हैं, वे सब खुद को खुशनसीब समझते होंगे कि वे दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े के इस प्यार भरे पल में शरीक हैं.. देखो उधर उस तरफ, वहाँ पर सभी मौजूद हैं और हमें देख रहे हैं. उसने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा. 

उसे अपने इस लॉजिक पर पूर्ण विश्वास था. वो अक्सर कहती, मैं आसमान में चमकते इस चाँद में विश्वास करती हूँ, इन तारों पर विश्वास करती हूँ, आसमान से हमें हर पल कोई देख रहा है इस बात पर मैं विश्वास करती हूँ. मुझे ऐसा लगता है जैसे "वी आर पार्ट ऑफ़ समथिंग बिगर...", कुछ ऐसा जो ना तो तुम समझ सकते हो और नाही मैं. इस दुनिया में और सबसे ज्यादा ऊपर उस आसमान में कितना कुछ रहस्मयी है न? "

वो मेरे तरफ देखने लगी. मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उसने मेरे कंधे पर अपना सर टिका दिया. आसमान की तरफ फिर से देखकर मुझसे कहने लगी "मेरे बहुत से अपने मुझे छोड़ कर जा चुके  हैं, तुम कहीं मत जाना कभी. मैंने हलके से उसके माथे को चूम लिया." 

बारिश की हलकी बूँद बरसने लगी थी. वो जैसे अचानक ही खुश हो गयी. "ये तो होना ही था, दो जुलाई का दिन हो और मौसम की पहली बरसात न हो..नामुमकिन. 

इस बार शायद उसकी इस बात पर मुझे भी यकीन था, कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है. मैंने पूछा उससे, हम लोग नीचे चले? वो लेकिन नीचे जाने के मूड में नहीं थी. 
"थोड़ा भीग लोगे तो गल नहीं जाओगे", ये कहते हुए उसने अपने सर को वापस मेरे कंधे पर टिका दिया और आँखें बंद कर ली.  

एक प्यारा सा रोमांटिक गाना डेक में बजने लगा -

है तेरी चूड़ियों का खनकना मेरा 
और तेरे गेसूओं का महकना मेरा 
मेरी आँखों को बस तेरा दीदार हो 
कुछ मुझे और पाने की परवाह नहीं 

तू सुबह का उजाला मेरे वास्ते 
तू मेरे वास्ते दिलनशीं शाम है 
तेरे दिल में ठिकाना रहे उम्र भर
फिर किसी आशियाने की परवाह नहीं 

ऐ मेरी ज़िन्दगी, तू मेरे साथ है 
अब मुझे इस ज़माने की परवाह नहीं..

वो मेरे कंधे पर सर टिकाये, बातें करते हुए सो गयी लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी. उसके मासूम से चेहरे को निहारते हुए मैं पूरी रात जागा रहा. मैं भी उसके साथ साथ उसकी ऐसी बातों को मानने लगा था कि सच में आसमान से कोई हमें हर पल देख रहा है. बरबस ही मेरी आँखें ऊपर आसमान की तारफ उठ गयीं और मन ही मन बस यही दुआ करता रहा कि इस लड़की की हँसी, इसका विश्वास यूहीं बना रहे हमेशा और ये बेवकूफ, पागल और मासूम सी लड़की  हमेशा मेरे साथ रहे, मुझे यूहीं हमेशा सताती रहे.. 

सुबह चार बजे के आसपास उसकी आँख खुली.. वो मुझे देखकर मुस्कुराने लगी. उसने कहा "मैं चाहती हूँ कि मेरी हर सुबह ऐसी ही हो, मैं आँखें खोलूँ तो तुम्हें अपने सामने देखूँ". मैंने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में समेट कर "आमीन" कहा. वो फिर से आँखें बंद कर के सो गयी. 


3 comments:

  1. हम दोनों की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी

    ज़िंदगी किसी फिल्म से कम होती है क्या...अक्सर...किसी-किसी की...:)

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