Friday, March 4, 2016

// // 9 comments

वे दिन, स्पेगेटी और वो दाग - [ दिल्ली डायरीज ]


ठण्ड और कोहरे से लिपटी दिल्ली की सड़कों पर जैसे जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही थी मुझे वो तमाम दिन दिल्ली के याद आ रहे थे जो तुम्हारे साथ इस शहर में बीते थे. नयी दिल्ली स्टेशन से घर जाने का रास्ता उन्हीं सब जगहों से होकर जाता था जहाँ कभी तुम्हारे साथ पूरी शाम घूमता था. कनौट प्लेस, मंडी हाउस, इंडिया गेट, पुराना किला, हुमाऊं का मकबड़ा, महरानी बाग़ और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, जहाँ तुम रहा करती थी. जिस भी रास्ते से टैक्सी गुज़र रही थी, हर कोने पर तुम्हारी यादें टंगी दिख रही थी. फिर वो मंडी हाउस की सड़कों पर तुम्हारा मेरा घंटों पैदल चलना हो या तुम्हारा वहाँ के थिएटरों में हर शाम कोई प्ले देखना..इसलिए नहीं कि तुम्हें प्यार था प्ले से. बल्कि इसलिए कि जाने किन कारणों से तुम्हें हमारा एक साथ प्ले देखना रोमांटिक लगता था. इंडिया गेट के पास घास पर तुम्हारा नंगे पावँ चलना हो, या पुराने किले के गेट के पास खड़े होकर तुम्हारा ये कहना कि मैं वापस जरूर आउंगी...सुबह के कोहरे में मुझे तुम्हारी इन स्मृतियों के सिवा कुछ और दिख नहीं रहा था.

शाम में तुम्हारे पसंदीदा कैफे में जाना भी प्री-प्लांड नहीं था. नए घर में पहुँचते ही मैं सामान अनपैक करने लगा था. वैसे तो ज्यादा सामान नहीं थे मेरे पास लेकिन कुछ कीमती कार्टन थे जिसमें मेरी किताबें, फिल्मों और गानों के सीडी और मेरी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पलों के गवाह रहे तुम्हारे दिए तोहफे थे. किताबों का वो कॉर्टन खोल कर उन्हें अलमारी पर रख ही रहा था कि एक किताब हाथ से छूट नीचे गिर पड़ी. अपने आप कुछ पन्ने खुल गए. किताब उठाने बढ़ा हाथ और मेरी नज़रें, दोनो उस खुले पन्ने पर कुछ पल को ठहर गई. सामने ही एक दाग़ था, किताब के पूरे पन्ने पर पसरा बड़ा और गहरा सा दाग. पन्ने पर कुछ लिखा था. – “जो दाग मैंने तुमको दिया, इस दाग से किताब का चेहरा खिला, रखना इसे तुम निशानी बनाकर, पन्ने पर इसको हमेशा सजाकर..ओ प्रीतम बिन तेरे मेरे औ’ इस दाग के सिवा, इस जीवन में कुछ भी नहीं..कुछ भी नहीं..” पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया, ये दाग कैसा और ये क्या लिखा है पन्ने पर? लेकिन दूसरे ही पल सब याद आ गया. तुम्हारी शरारत थी ये. किताब के पन्ने पर ये दाग तुम्हारी वजह से ही लगा था और फिर दाग लग जाने के बाद तुमनें पन्ने पर एक गाने को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया था. सोच भी नहीं सकती तुम इसे पढ़ते ही अकेले कमरे में कितने ज़ोरों से हँस पड़ा था मैं. याद है तुम्हें तुम्हारी ये शरारत? क्या हाल किया था मेरे निर्मल वर्मा के उपन्यास “वे दिन” का तुमने? ये याद है न तुम्हें? 

तुम हमेशा हैरान होती थी न इस बात से कि मैं हमेशा इस किताब को क्यों पढ़ते रहता हूँ..मुझसे हर बार पूछा करती, “आखिर है क्या इस किताब में जो तुम इससे इतने अब्सेस्ट हो?” और मैं तुम्हें हर बार यही जवाब देता था – “पढ़ो और घुमो उस लड़के जिसे उसके दोस्त प्यार से इंडी बुलाते थे और रायना रैमन के साथ प्राग की गलियों में, तब समझोगी तुम कि क्या है इस किताब में...जादू है ये किताब.”. तुम लेकिन कभी इस किताब के तरफ ज्यादा आकर्षित हो ही नहीं सकी थी, फिर भी मैं दिल से चाहता था कि तुम ये किताब जरूर पढ़ो. मेरी तरह अब्सेस्ट भले न हो लेकिन एक बार तो जरूर पढ़ो और महूसस करो वो जो मैं किताब पढ़ते हुए महसूस करता हूँ.

उस शाम जब हम दोनों कैफे में बैठे हुए थे, इसी किताब पर बातें हो रही थी. मैं तुम्हें किताब के कुछ अंश पढ़ के सुना रहा था. तुम भी दिल से सुन रही थी. जाने अचानक तुम्हें क्या हुआ, प्रभावित हुई किताब के अंश से या जाने क्या ख्याल आया तुम्हारे मन में. मेरे हाथों से किताब तुमनें छीन लिया था, और कहा “मैं भी तो देखूँ पढ़कर वे दिन कैसे थे, कौन है ये रायना रायना रैमन और इंडी”. 

किताब के कुछ पन्नों पर तुमनें नज़र डाली थी और फिर जाने क्यों एक पन्ने पर आकर तुम अटक सी गयी. काफी देर तक तुम्हारी नज़रें उसी पन्ने पर जमी थीं. मैंने कनखियों से देखा था तुम्हें ये जानने के लिए तुम पढ़ क्या रही हो. वैसे उस पन्ने पर ऐसा बहुत कुछ था जहाँ तुम अटक सकती थी लेकिन मेरे लिए ये अंदाज़ा लगा पाना काफी कठिन था कि तुम असल में अटकी कहाँ हो? ये भी हो सकता था कि तुम्हें कोई भाग, कोई बात उस पन्ने पर ऐसी लग गयी हो जो तुम्हें काफी भा गयी हो. ऐसे में तुम अक्सर उन पक्तियों को दोबारा..तिबारा..चौबारा..तब तक पढ़ती रहती थी जब तक तुम्हारा मन न भर जाए और उसके बाद ही तुम आगे बढ़ती थी. अक्सर कहा करती थी तुम कि “किताब पढ़ो तो धीरे-धीरे, पूरा जायका लेकर पढ़ो. मिठाई की तरह होती हैं कुछ बातें किताबों में..तुम धीरे धीरे पढ़ना चाहते हो ताकि ये जल्दी खत्म न हो जाए.” इसके अलावा एक और वजह हो सकती थी तुम्हारे अटके रहने की. तुम अक्सर शब्दों में खो जाती थी. शब्दों को समझने में नहीं बल्कि शब्दों को देखने में, उनसे जान पहचान करने में और फिर उनसे दोस्ती करने में. ये भी तुम्हारे उन सारे लॉजिक में से एक था जो मुझे कभी समझ नहीं आया था. तुम अक्सर कहती थी मुझसे “देखो..ऐसा है कि तुम ‘आम लोगों’ के जैसे मैं तो हूँ नहीं, तुम सब से अलग, बहुत ख़ास हूँ मैं. मैं पहले शब्दों को देखती हूँ...अगर मुझे उनसें पोजिटिव वाइब्स मिलते हैं तो फिर मैं दोस्ती कर लेती हूँ, बातें करती हूँ उनसे.. उसके बाद आगे का पढ़ना तय होता है मेरा..”

पोजिटिव वाइब्स..? शब्दों से दोस्ती..? ये सब तुम्हारी बातें किसी भी नार्मल इंसान के समझ से बाहर की बातें थीं. मुझे कहाँ से समझ में आती?

तुम फिर अपने ट्रेडमार्क तरीके से मुझे और समझाने लगती... “देखो बात ऐसी है, कि तुम्हारे और मेरे में बहुत से बेसिक डिफरन्सेस हैं. तुम बाकी लोगों की तरह इस दुनिया के बेहद साधारण से प्राणी हो लेकिन मैं तो इस दुनिया की हूँ ही नहीं, किसी और दुनिया से आई हूँ मैं. तुम्हारे और मेरे अब्ज़र्व करने के तरीके भी अलग हैं. आब्वीअस्ली मेरी बातें तुम्हारे समझ से बाहर होंगीं.. फिर भी समझाती हूँ – देखो, तुम्हें पता है, तुम किताब में शब्दों को पढ़ते हो, समझते हो, महसूस भी करते हो. लेकिन मैं..मैं किताब में शब्दों को देखती हूँ, फिर उनसे दोस्ती कर लेती हूँ, फिर पढ़ती हूँ, समझती हूँ और महसूस करती हूँ.दोस्ती करना बहुत जरूरी है शब्दों से. बिना इसके कोई काम पूरा नहीं हो सकता..सब कुछ आधा अधुरा सा रहता है. So you see, I am complete reader. तुम सब से कहीं ज्यादा कम्प्लीट और डेडीकेटेड रीडर हूँ मैं..."

इस बार भी शायद इस किताब में तुम ऐसा ही कुछ कर रही थी. मशगुल थी किताब पढ़ने में पूरी तरह से तुम और मैं.. मैं तुम्हारी उन पुरानी बातों को तुम्हारे सामने बैठा याद कर रहा था. काफी देर तक जब तुम्हारे तरफ से मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने टोका तुम्हें, “पसंद आ रही है किताब तुम्हें? कैसी लगी?”.
तुम बिलकुल चौंक सी गयी थी मेरे पूछने पर. तुम्हारे एक हाथ में किताब थी और एक हाथ में “स्पगेटी”. मेरे बोलने से तुम अचानक हड्बडा सी गयी थी और अचानक तुम्हारे हाथों से वो स्पगेटी का बाईट नीचे किताब पर गिर पड़ा था. 

मैं जब तक कुछ बोलता तुम्हें, तुम चिल्ला पड़ी थी... “ओह सॉरी सॉरी...सब इस उल्लू के वजह से हुआ है. मैंने जान बुझकर कुछ भी नहीं किया है..”. जानती हो, शुरू में तो मुझे लगा था कि तुम मुझसे सॉरी बोल रही हो. मैं लगभग बोलना ही वाला था कि “कोई बात नहीं..ये सब होते रहता है..” तुमनें तुरंत मेरी गलतफहमी दूर गयी थी.. “ओ साहब..मैं आपको सॉरी नहीं बोल रही हूँ बल्कि आप पर ही गुस्सा हूँ मैं. नुकसान कर दिया मेरे एक बाईट का और ‘स्पगेटी’ को भी नीचे गिरा दिया. बेचारा स्पेगेटी......मेरे मुहँ तक आया भी नहीं था कि टेबल पर दम तोड़ दिया इसने..”

मैंने पूरे हैरत भरे नज़रों से तुम्हें देख रहा था. कमाल की लड़की है ये...एक तो किताब पर पूरा स्पेगेटी गिरा दिया और अब बातें बना रही है ये लड़की. थोड़ा नकली गुस्सा दिखाने की मैंने कोशिश की और डांटा तुम्हें - “जानती भी हो कितना सम्हाल के रखता हूँ मैं ये किताब...और देखो क्या कर दिया तुमनें इसका..अब क्या करूँ इसका? बोलो? ”

मुझे लगा था तुम थोड़ा गिल्ट फील करोगी लेकिन तुमनें तो उल्टा ताव दिखाते कहा – “अब क्या करूँ से तुम्हारा मतलब क्या है? दिमाग जो थोड़ा सा इधर उधर कोने में बचा हुआ है उसका इस्तेमाल करो. किताब लो, सामने वाशरूम है.. जाओ..जाकर धो लो किताब को?”
सच कहूँ? बड़ी जोरों की हँसी आई थी मुझे. लेकिन जैसे तैसे खुद को सम्हालते हुए फिर से गुस्से में मैंने पूछा तुमसे – “किताब को धो दूँ? दिमाग तो सही है न तुम्हारा?”

इस बार भी तुम उसी तरह ताव दिखाते, थोड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहने लगी - “तुम्हें आखिर इंजिनियर बना किसने दिया? हाथ तुम्हारे गंदे हो जाते हैं तो धोते हो न हाथों को? तो किताब अगर गंदे हो जायेंगे तो धोयोगे नहीं क्या तुम किताब को? मतलब इतने आसन सवालों को भी सोल्व नहीं कर सकते तो बड़े बड़े इंजीनियरिंग प्रोब्लम को कैसे सोल्व कर सकोगे तुम? मेन्टेन सम स्टैण्डर्ड... जाओ अब किताब को धो कर लाओ वरना मैं धो लेती हूँ.”

मैं अब ज्यादा देर तक अपने चेहरे पर नकली गुस्सा नहीं रख पाया था और जोरों से हँस पड़ा था तुम्हारी इस बेवकूफीपने पर.. प्यार भी आने लगा था तुम्हारी इन मासूम सी नादान सी बातों पर. हाँ किताब को तुमनें बर्बाद कर दिया था, लेकिन उसका ज्यादा गम नहीं था. वैसे भी तुम्हारे सामने इस बात का गम करना या गुस्सा दिखाना मैं अफोर्ड भी नहीं कर सकता था. याद है उस दिन भी तुमनें अपनी गलती नहीं मानी थी और अंत तक अपनी ही बात पर डटी रही कि तुम्हारी कोइ गलती नहीं थी, वो तो मेरी गलती की वजह से किताब पर स्पेगेटी गिरा था. अंत में किताब पर से वो स्पेगेटी भी मैंने ही साफ़ किया था और तुम्हारे मुताबिक़ जो मैंने “घोर अपराध” किया था उस शाम, उसकी सजा भी तुमनें उसी शाम मुझे दे दी थी..... मेरे जेब से मेरा वालेट निकाल लिया था तुमनें और कहा था, “चलो.. देखते हैं आज तुम्हारे वालेट में कितने पैसे बचते हैं...” .

आज किताब का वही पन्ना सामनें खुला है, वही शब्द किताब से झाँक रहे हैं जहाँ तुम्हारी नज़रें अटकी थीं और जिसके ऊपर तुमनें एक गाने के कुछ लाइन तोड़ मरोड़ कर लिख दिए थे इस उद्देश्य के साथ कि किताब का ये दाग मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाता रहेगा -

हवा से उसका स्कार्फ बार बार फडफडा जाता था.उसके बाहर कुछ भूरी लटें माथे पर छितर आयीं थीं-धुप में चमकती हुईं."पास आ जाओ, वरना तुम हवा में उड़ जाओगी."मैंने हँसते हुए कहा.वह बिलकुल मुझसे सट गई.मुझे लगा वह ठिठुर रही है.मैंने अपना मफलर उतारकर उसके गले में लपेट दिया.उसने कुछ कहने के लिए मुहँ उठाया.उसे मालुम नहीं था, मेरा चेहरा उसके सिर पर है..तब अचानक मेरे होंठ उसके मुहं पर घिसटते गए...फिर वे ठहर गए, कनपटियों के नीचे कुछ भूरे बालों पर...."सुनो"...उसने कहा.किन्तु इस बार मैंने कुछ नहीं सुना.मेरे होंठ इस बार उसके मुहं पर आए आधे वाक्य पर जम गए.उसका उठा मुहँ निर्वाक-सा उठा रहा.कुछ देर तक मैं साँस नहीं ले सका.हवा बहुत थी, लेकिन हम उसके नीचे थे.हम बार बार साँस लेने के लिए ऊपर आते थे...हाँफते हुए एक दुसरे की और देखते थे...दीखता कुछ भी न था-अधखुले होंठ, ओवरकोट के कॉलर का एक हिस्सा, हम दोनों पर फडफडाता हुआ बेचैन सा स्कार्फ....

बातें बाकी..

9 comments:

  1. लड़के...लौट आया रे !!!
    लव यू भैय्यू...हमको फिर से अपनी पोस्ट का हैंगओवर देने के लिए...<3

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " देशद्रोह का पूर्वाग्रह? " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. देख जमाने के रंग हजार नही कुछ सिवा प्यार के ----।
    Seetamni. blogspot. in

    ReplyDelete
  4. हेलो अभि, आपके ब्लाॅग की रचनाएं बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोई गई है। जिन्हे पढ़कर ऐसा अहसास होता है जो घटनाएं कि वो हमारे सामने हुई हो। ऐसी मोहक और शालीन रचनाओं के लिए बधाई और आपको आपकी मंजिल जरूर मिलें। साथ ही आपको सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है आपके ब्लाॅग को iBlogger.in पर Best Hindi Blogs कैटेगिरी में शामिल किया है।
    -Editor iBlogger

    ReplyDelete
  5. नमस्ते मेरा नाम सागर बारड हैं में पुणे में स्थित एक पत्रकारिकता का स्टूडेंट हूँ.
    मेंने आपका ब्लॉग पढ़ा और काफी प्रेरित हुआ हूँ.
    में एक हिंदी माइक्रो ब्लॉग्गिंग साईट में सदस्य हूँ जहाँ पे आप ही के जेसे लिखने वाले लोग हैं.
    तोह क्या में आपका ब्लॉग वहां पे शेयर कर सकता हूँ ?
    या क्या आप वहां पे सदस्य बनकर ऐसे ही लिख सकते हैं?
    #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर हिंदी का अपना मंच ।
    कसौटी आपके हिंदी प्रेम की ।
    #मूषक – भारत का अपना सोशल नेटवर्क

    जय हिन्द ।

    वेबसाइट:https://www.mooshak.in/login
    एंड्राइड एप:https://bnc.lt/m/GsSRgjmMkt
    आभार!

    ज्यादा जानकरी के लिए मुझे संपर्क करे:09662433466

    ReplyDelete
  6. Digital India से जुडेा
    ��अगर आप 2-3 महीने बाद 5000-8000 की income चाहते हैं !
    ��अगर आप 7-8 महीने बाद 12000-18000 की income चाहते हैं !
    ��अगर आप 1 साल बाद 35000-50000 की income चाहते हैं !
    ��अगर आप 1.5 साल बाद 80000-100000 की income चाहते हैं !
    ��2 साल बाद अगर 1.5 लाख की sallery चाहते हैं !
    ��तो join कीजिये CHAMPCASH��

    ➡ वो भी बिना किसी ��investment�� के ⬅
    ➡ बिना किसी FORMALITIES के ⬅
    ➡ बिना किसी RISK के ⬅

    ⬆ इस job में कोई भी join हो सकता है ⬆

    ➡Housewife
    ➡Girls
    ➡Students
    ➡Govt employee
    ➡No age limit
    ➡No qualification needed

    और किसी business में लाखो रूपैये Invest करने पर भी success की कोई guarantee नही मिलेगी

    इस business में सिर्फ 6 महीने तक दिल लगाकर काम करने पर

    ❗SUCCESS की 100% nhi 110% GUARANTEE है❗

    जोइनिँग के लिए :- ��������������������
    ����Play store से CHAMPCASH iNSTALL कीजिये
    ���� जब आप इस एप्प को खोलेंगे तब इसमें आपको Signup with champcash पे click करना है आपको इसमें जो डिटेल पूछी जाये वो भरनी है

    जैसे = Name
    = Email address
    = Pasword जो आप याद रख सके
    = Date of Birth
    = Mobile No.

    इसके बाद आपको इसमें Proceed पे क्लीक करना है

    अब इसमें आपसे sponsor ID पूछा जायेगा जिसमे आपको मेरी Refrl ID ~ 446344 लिखनी है

    याद रहे sponser id में ~ 446344 डालने पे ही हम आपकी help कर पायेंगे !

    whatsapp ~ +91 9827749660

    ReplyDelete
  7. 🙏नौकरी करने वाले ओर नौकरी ढूँढने🙏 वाले ध्यान से पढ़े फिर जोइन किजिए जोइन करके आप 30000/50000 हजार महिने कमा सकते हैं विश्वास रखिए कोई झुठ नहीं है एक बार करके देखिए झूठा निकला तो छोड दिजिगा जोइन होने मे कोई पैसा नही लगेगे एकदम फ्री जोइनिंग है। किया करना है ध्यान से पढिए
    1⃣. Play Store मैं जाकर Champcash Install करो और उसे Open करो।
    2⃣. Sing Up with Champcash पर click करो और अपनी Details डाल दो। 👇🏿
    1. आपका नाम
    2. आपकी जीमेल
    3. आपका कोई भी पासवर्ड
    4. आपकी बर्थडे डेट
    5. आपका whats app नंबर

    फिर आपको Process पर Click करना है।
    आपसे जब Sponsor ID मागे तो 1887507👈 डालना हैं।

    3⃣. अब आपको Champcash कुछ Application Install के लिए देगा उन Apps को Install करनी है अपने फोन मैं जो भी आप। Application install करते हो उन्हे 2 से 3 मिनट
    तक open करना ज़रूरी है।

    4⃣. जब आपका Challenge Complete हो जायेगा तो आप Free में Join कर पाओगे।
    5⃣. आपको फिर 1 dollar मिलेगा मतलब 62₹ और आप हमारी कंपनी मैं active हो जाओगे । आपको अपनी Refer ID मिलेगी जिससे आप हजारो लाखो लोग join करके करोड़ो कमा सकते हो
    याद रहे Refer ID ये डालो
    👉 1887507

    इसे यहां से install कीजिए

    https://m.apkpure.com/by/com.ens.champcash
    Link पर click करके 👆🏿
    Apne play store se champcash ko search Krke use instell krlo
    Refer ID (1887507)
    जब मागे id तो ये डालना है 👆🏿
    Whatapp (9716655249)

    ReplyDelete
  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति ..
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया