Sunday, February 21, 2016

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आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं.. [दिल्ली डायरीज ]

काफी सालों बाद इस शहर में आ रहा हूँ. वैसे ज्यादा साल तो नहीं हुए, बस तीन चार साल ही तो हुए हैं अभी लेकिन ऐसा लगता है जैसे जाने कितना अरसा बीत गया हो. तुम जब तक इस शहर में रही मुझे हमेशा बुलाती रही. कितनी बार रूठी भी मुझसे. गुस्से में लड़ बैठती थी…“तुम्हें अपने शहर से ऐसा क्या लगाव है कि तुम मेरे लिए भी उसे छोड़ नहीं सकते?” और मैं अक्सर तुम्हें ये कहकर बहलाने की कोशिश करता कि बस तीन चार महीने की बात है, फिर हम और तुम एक ही शहर में रहेंगे.” तुमने लेकिन कभी मेरी इस बात का भरोसा नहीं किया. जवाब में कहती थी “यहाँ से हमेशा के लिए चली जाऊँगी तब आना तुम इस शहर में.” देखो नियति का खेल...हुआ भी तो कुछ ऐसा ही न. तुम्हें इस शहर से गए अभी दो महीने ही तो हुए थे कि मेरा तबादला यहाँ हो गया.

दिल्ली में तुम अब नहीं हो, और शायद मेरी ज़िन्दगी में भी. सोचा तो था कि कम से कम इस शहर में तो रहने नहीं आऊंगा. तुम्हारे जाने के बाद शहर के हर कोने से तुम्हारी आवाजें सुनाई देंगी मुझे. आसान नहीं होगा यहाँ के उन्हीं सड़कों पर घूमना जहाँ कभी हम तुम साथ घूमते थे. लेकिन दिल्ली आने का फैसला लेना मेरी मजबूरी थी. होता है न कि कभी कभी आपके पास कोई रास्ता नहीं होता, सिवाए उसके जो सामने हो और हमें ना चाहते हुए भी उसी रास्ते को चुनना पड़ता है. कुछ ऐसा ही हुआ दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला लेने में भी. अब सोचता हूँ तो लगता है सच में मुझे बहुत पहले ही दिल्ली आ जाना चाहिए था. शायद कुछ और हो सकता था.. शायद जो हुआ उसे बदला जा सकता था.. 

आज भी जैसे मुझे तीन साल पहले का वो वक्त अच्छे से याद है जब आखिरी बार इस शहर में आया था मैं. तुम भी थी मेरे साथ. तुम एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरे शहर आई थी और फिर मुझे बिना बताये ही तुमने अपने साथ साथ मेरा भी दिल्ली तक का टिकट बुक करवा लिया था. याद है न तुम्हें? कितनी जिद्दी थी तुम. एकदम इम्पल्सिव. “ये चाहिए तो चाहिए.. तुम्हें चलना है मेरे साथ तो चलना है.” इसके आगे कुछ सूझता भी कहाँ था तुम्हें? कितने हथकंडे अपनाये थे तुमने मुझे अपने साथ दिल्ली लाने के लिए. मेरे ऑफिस में धरने पर बैठ गयी थी कि तुम्हें तो दिल्ली अपने साथ ले जाऊँगी. ब्लैकमेल करना भी तो खूब आता था तुम्हें. कभी खाना पीना छोड़ने की धमकी देती तो कभी मुझसे ज़िन्दगी भर बात न करने की धमकी देती. वैसे इन दोनों बातों में से तुम कर तो कुछ भी नहीं पाती ये मैं अच्छे से जानता था फिर भी तुम्हारी बात मान कर दिल्ली आने के लिए राजी हो गया था. तुम लेकिन मुझे इतने आसानी से कहाँ छोड़ने वाली थी. याद है न पूरे सफ़र के दौरान तुम कैसे चिढ़ाती आई थी मुझे.. “तुम्हें किडनैप कर के दिल्ली ले जा रही हूँ. अब तुम्हें वापस तुम्हारे शहर मैं जाने नहीं दूँगी”.

रास्ते भर मुझे बेवकूफ बनाते, मुझे डराते और मुझसे लड़ते आई थी तुम. तुम जानती थी न कि कैसे मैं तुम्हारी झूठी मुठी नाराजगी से डर जाया करता था. तुम बस इसका फायदा उठाया करती थी. याद है कैसे ट्रेन में तुम नाराज़ हो गयी थी. मैंने ज़रा चाँद की तारीफ़ क्या कर दी थी तुम तो एकदम रूठ गयी थी. हुआ कुछ यूँ था कि रात में बातें करते हुए तुम थक गयी थी और आँखें बंद कर के तुम लेट गयी थी. मेरे हाथ में मेरे प्रिय शायर की किताब थी. ट्रेन की खिड़की के बाहर आसमान में चाँद नज़र आ रहा था. मैंने तुम्हें धीरे से कहा, देखो कितना खूबसूरत लग रहा है वो चाँद. एक शेर सुनाता हूँ उस चाँद के ऊपर. शेर तो तुमने सुन लिया और तारीफ़ भी कर दिया तुमने. लेकिन उसके बाद? उसके बाद कैसे गुस्सा हो गयी थी तुम. उलाहना भरे अन्दाज़ मे तुमनें शिकायत की थी.. “हाँ बस आसमान में लटके उस चाँद की ही तारीफ़ करते रहो तुम..इस अपने इस चाँद को तो देखो भी न जो तुम्हारे सामने है.” मैं तो एकदम जैसे निरुत्तर सा हो गया था. “अरेssरेss....मैं तो...” ही मेरे मुहँ से बस निकल पाया था. सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी मेरी. मैं जान रहा था कि ये तुम्हारी एक नयी बदमाशी है लेकिन फिर भी मैं बेतरह डर गया था. 

वो तो कहो कि अच्छा हुआ एक शेर उसी वक़्त याद आ गया था मुझे... “तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है / तेरे आगे चाँद पुराना लगता है”. थोड़ी खुश हो गयी थी तुम ये शेर सुनते ही. लेकिन हाथ आये इस मौके को इतने आसानी से कैसे जाने देती तुम. उस शेर के अलावा पूरी ग़ज़ल सुनी थी तुमने मुझसे और फिर जाकर कहा था, “चलो अभी के लिए माफ़ करती हूँ लेकिन मेरे बजाये उस चाँद की तारीफ़ करने का जो गुनाह तुमनें किया है न उसकी सजा तुम्हें दिल्ली में मिलेगी...दिल्ली में.”.

ऐसी ही थी तुम. मुझे ना तो कभी ये पता लग पाता था कि किस बात पर तुम गुस्सा हो और न ये कि तुम्हारा गुस्सा कब झूठा मुठा है और कब सच में गुस्सा हो गयी तुम. 

तुम तो इस बात पर भी गुस्सा हो जाती थी कि रेलवे डिपार्टमेंट ने ट्रेन में साइड-लोअर बर्थ क्यों नहीं अलोट किया तुम्हें? जब कभी तुम्हारे कहने पर मैंने तुम्हारा टिकट बुक करवाया है और अगर गलती से भी साइड लोअर बर्थ की जगह कोई दूसरी बर्थ तुम्हें अलोट हो जाती कभी, तब तो मेरी शामत आ जाती थी. बताओ ज़रा, रेलवे डिपार्टमेंट की गलती की सजा भी तुम मुझे ही देती थी. वैसे तुम अब्सेस्ट थी साइड लोअर बर्थ के लिए. साइड लोअर बर्थ ट्रेन के डब्बे के तुम्हें इतने पसंद थे कि तुम कहा करती “यार कोई ऐसा सिस्टम नहीं है कि मैं हर ट्रेन में ये साइड लोअर बर्थ अपने नाम से बुक करवा लूं ज़िन्दगी भर के लिए? रेलवे डिपार्टमेंट उस बर्थ पर रिजर्व का बोर्ड लगा दे मेरे नाम से. मैं जब भी आऊं, मेरे लिए ये बर्थ खाली रहे.कोई और न बैठे.” मेरी जान खा जाती थी तुम इस बात पर. मुझसे कहती “जाओ जाकर पता लगाओ ऐसा कोई सिस्टम है या नहीं.” मैं बात टालने की कोशिश करता तो तुम फिर मुझे ताने सुनाने लगती.. “शाहजहाँ ने मुमताज के लिए ताजमहज बनवा दिया और तुम मेरे लिए ये एक छोटा सा काम नहीं कर सकते? और बातें करते हो ज़िन्दगी भर मेरी ख्वाहिशों को पूरा करने की? डोंट टॉक टू मी..” और तुम फिर गुस्सा हो जाती.

सच में पागल थी तुम!

तुम्हारी उन बातों को और उस ट्रेन के सफ़र के छत्तीस घंटों को याद करते हुए इस बार के पैतालीस घंटे कैसे बीत गए पता भी नहीं चला. रात में पहुँचने वाली ट्रेन सुबह छः बजे दिल्ली पहुँची थी. पूरे नौ घंटे की देरी से.

मैं जानता हूँ अगर ये बात भी तुम्हें बताऊंगा तो तुम खूब हंसोगी. मेरा मजाक भी उड़ा दोगी. जाने कहाँ से तुम्हें वो लॉजिक सुझा था. मैंने जब भी ट्रेन का सफ़र अकेले किया है हमेशा ट्रेन देर से ही रही है..आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी ट्रेन ने मुझे एकदम सही वक़्त पर पहुँचा दिया हो. यहाँ तक कि राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेन भी नहीं. लेकिन जब कभी तुम्हारे साथ मैं आया हूँ तो ट्रेन हमेशा राईट टाइम पर.. राईट टाइम भी ऐसी वैसी नहीं, अगर चार पचपन ट्रेन का वक़्त है तो इधर घड़ी की सुई चार पचपन पर गयी और उधर ट्रेन प्लेटफोर्म पर लगी. ये सच में कमाल का इत्तेफाक था. इत्तेफाक नहीं बल्कि चमत्कार था. मुझे कभी समझ नहीं आया इसके पीछे का लॉजिक. लेकिन तुम तो तुम थी. इसमें भी तुमने एक लॉजिक ढूँढ निकाला था. कहती थी मुझसे “तुम थोड़े खडूस टाइप हो न, एकदम सीरियस और नॉन रोमांटिक. देखो इसलिए ट्रेन तुम्हारे अकेले रहने पर देर करती है” और मैं इस दुनिया की सबसे प्यारी, रोमांटिक, सेंसिबल और इमोशनल लड़की हूँ न. मेरे साथ जब भी आये हो कभी ट्रेन ने देर की? नहीं न? फिर...?

मैं जवाब भी क्या देता तुम्हारी इन बातों का. सच कहूँ तो अक्सर तुम्हारी इन बेवकूफी भरी बातों को मैं एन्जॉय करना चाहता था, इसलिए अक्सर मैं कुछ नहीं कहता तुम्हारे अजीबोगरीब लॉजिक पर. 

पैतालीस घंटे के ट्रेन के सफ़र ने वैसे ही बैंड बजा दिया था मेरा और ट्रेन से उतरने के बाद ठण्ड ने हालत ख़राब कर दी थी मेरी. जब तक ट्रेन पर था ठंड का पता नहीं चल पाया था, लेकिन टैक्सी पर बैठते ही ठण्ड ने जैसे चारों ओर से जकड़ लिया था. दो स्वेटर और एक जैकेट के बाद भी मैं ठिठुर रहा था. मौसम भी तुम्हारे पसंद का था. सुबह का वक़्त, घना कोहरा और ठिठुरने वाली सर्द हवा. 

जैसे जैसे टैक्सी कैनौट प्लेस के आउटर सर्कल से गुज़र रही थी, मुझे याद आ रही थी वो आखिरी शाम जब हम कैनौट प्लेस में घूम रहे थे. सीपी के एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक और फिर तीसरे...जाने कितनी बार हमनें चक्कर लगा लिया था कनौट प्लेस का. ना तुम थक रही थी ना मैं. चलते हुए हम कितनी बातें कर रहे थे. मैं तुम्हें पुराने किस्से सुना रहा था. बहुत पहले के किस्से, बारह साल पहले जब हम और तुम मिले थे तब की बातें.. तुम्हें हमेशा लगता था कि ये असंभव है. सब कुछ ऐसे याद रखना जैसे मैं याद रखता हूँ, हर एक मोमेंट, जो जब हुआ था...जैसे हुआ था. उन सभी बातों को मैं कैसे याद रख लेता हूँ तुम हमेशा हैरान होती थी. तुम कहती थी अगर मैं तुम्हें नहीं जानती तो कभी इस बात पर यकीन नहीं कर सकती थी कि किसी को इतनी बातें इतनी यादें इतने डिटेलिंग के साथ याद रह सकती हैं. 

मेरे लिए लेकिन तुम्हारी बातों को याद रखना बड़ा ही सहज रहा है हमेशा से. कभी कोई एफर्ट नहीं लगाना पड़ा मुझे. कभी ये भी खुद से नहीं कहना पड़ा कि हाँ ये बातें तुम्हारी मुझे याद रखनी है, या इसे नहीं भूलूँगा कभी. बस ऐसे होते गया कि तुमसे जुड़ी छोटी से छोटी बात भी याद रहते गयी मुझे. तीन साल पहले की भी सभी बातें मुझे ठीक वैसे ही याद है जैसे हुई थी, उसी क्रम में. तुम्हारा मेरा कनौट प्लेस में घूमना, सेन्ट्रल पार्क में लकड़ी के बेंच पर एक दूसरे के कंधे पर सर टिकाये बैठे रहना और डूबते हुए सूरज को देखकर तुम्हारा कहना... "दिन ख़त्म हो गया, डूब गया सूरज...." और फिर मेरा तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहना "कल फिर से नयी उम्मीद लिए नयी सुबह आएगी... और वो सुबह हमारी होगी." तुमनें बड़ी विश्वास भरी नज़रों से मुझे देखा था, और कहा था कि मुझे तुमपर यकीन है..तुम कभी मुझे खुद से दूर नहीं जाने दोगे..और मैंने भी तुमसे वादा किया था..कभी दूर नहीं जाने दूंगा तुम्हें.


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टैक्सी पर बैठे और भी कुछ याद आने लगता है, उसी शाम की तुम्हारी और मेरी कुछ और बातें.. लेकिन मैं अब ज्यादा बातें याद करना नहीं चाहता. बस आँख बंद कर के टैक्सी के शीशे से सर टिकाये बाहर देख रहा हूँ.. कनौट प्लेस कब का गुज़र चूका है...टैक्सी के स्टीरियो पर एक खूबसूरत गाना बज रहा है, वही गाना जिसे हम दोनों ने उस आखिरी शाम सुना था वाकमैन पर, और तुमसे मैंने कहा था..डोंट वरी, ऐसे इमोशनल गाने सुनकर मैं सड़कों पर तुम्हारी यादों में इधर उधर फिरता रहूँ, ऐसा वक़्त नहीं आने दूँगा.


आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं... 




बातें बाकी... 


5 comments:

  1. काश!!! कभी तो वक़्त भी ठहर जाता...जिस वक़्त को कभी आना ही नहीं चाहिए था, वो न ही आता...। पर वक़्त भी क्या अजीब शय है, न रुकता है...न कभी वापस जाता है...। ये तो हम ही हैं जो इतनी शिद्दत से ऐसी खूबसूरत यादों को वक़्त के हाथों धूमिल नहीं होने देते...।
    यादें यूँ ही सम्हाले रहना, क्योंकि कुछ बेनाम-बेरहम से पलों में ये यादें ही हमको सम्हालती हैं।
    एक-एक शब्द दिल में उतरता चला गया है...। क्या कहूँ, बस बैठी हूँ...स्क्रीन ताकते, निःशब्द सी...।

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  2. बहुत ही दिल से लिखी , अन्तस में उतर जाने वाला संस्मरण है अभि .तुम कितने प्यारे और संवेदनशील हो .

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  3. बहुत सुंदर संस्मरण ...पहली बार आपके ब्लॉग पर आई आज ..अब आना होता रहेगा :)

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  4. Mere bahut saare pasandida gaano ko aapke shabdon ne naye maayne diye hai Bhaiya!

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया