Saturday, December 31, 2016

वर्ड्स - दिज वर्ड्स आर आल आई हैव टू टेक योर हार्ट अवे

दिल्ली के ग्रीन पार्क इलाके में वो एक छोटा सा कैफे था जो तुम्हें काफी पसंद था. शायद दिल्ली का सबसे पसंदीदा कैफे था तुम्हारा. उस कैफे से तुम्हारी दोस्ती कॉलेज के वक़्त से ही हो गयी थी और तब से ही वो कैफे दिल्ली में तुम्हारा अड्डा बन गया था. जाने कितनी शैतानियाँ की हैं तुमनें इस कैफे में और जाने कितने तुम्हारे खुफिया मिसन की प्लानिंग और एक्सक्यूशन भी इसी कैफे में हुए थे. कई खतरनाक आइडियाज भी तुम्हें इसी कैफे में आये थे, जिनकी वजह से हर बार मैं मुसीबत में फँस जाया करता था. मुझे याद है कॉलेज के बाद के दिनों में भी जब कभी तुम दिल्ली में रहती, तो पूरा पूरा दिन तुम इस कैफे में बिता देती थी. घर में तुम्हारे पैर टिकते कहाँ थे? इस कैफे को ही एक तरह से तुमने अपना घर बना लिया था. कैफे की तीन चीज़ें तुम्हें काफी पसंद थी - यहाँ कोने में मैगजींस और कुछ किताबें रखे होते थे कि अगर आप अकेले हैं तो कुछ देर के लिए इन्हें पढ़ सकते हैं, कुछ ख़ास कस्टमर्स के लिए काउंटर पर लूडो और चेस भी उपलब्ध मिल जाते थे और कैफे में बजता संगीत जो तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद था. कैफे के काउंटर के ठीक पीछे सिर्फ दो कुर्सी और एक टेबल लगी रहती थी, और तुम्हें वहाँ बैठना पसंद था.. इस कैफे की एक और बात थी जो तुम्हें बड़ी अच्छी लगती थी...हालाँकि वो बात मुझे उतनी अच्छी नहीं लगती थी. इस कैफे में जितनी बार भी तुम्हारे साथ मैंने चेस और लूडो खेला है उतनी बार तुमसे हारा हूँ मैं...मुझे तो अब तक याद है कैसे तुम पूरे टसन में राजकुमार स्टाइल डाइअलॉग मारती थी.... “जानी...ये मेरा इलाका है...यहाँ मुझे हराना मुमकिन ही नहीं...नामुमकिन है.”

कैफे का मालिक जिसका नाम रणवीर था, वो भी तुम्हें बड़े अच्छे से पहचान गया था. तुम्हें उसके म्यूजिक का टेस्ट काफी पसंद था. कैफे में बजता म्यूजिक तुम्हें बड़ा ‘सोल्फुल’ लगता था. रणवीर को तुमने एक निकनेम दे दिया था ‘डेविड’, जो किसी मशहूर डीजे का नाम था. तुम अक्सर कहती थी कि रणवीर भी डेविड जैसे मैजिकल गाने सुनाता है हमें. रणवीर से तो तुम्हारी खूब गहरी दोस्ती भी हो गयी थी, और तुम्हारे ही जरिये मेरी भी उससे दोस्ती हो गयी थी. रणवीर से तुम्हारी दोस्ती का किस्सा भी अजीब है. एक दिन जाने तुम्हें क्या सूझी, तुम मुझसे कहने लगी, चलो हम और तुम मिलकर एक ऐसा ही कैफे शुरू करते हैं और जब तक मैं तुम्हारे इस बात का कुछ जवाब दे पाता या तुम्हें कुछ समझा पाता, तुम काउंटर पर चली गयी थी और रणवीर से बातें करने लगी थी कि कैसे हम एक कैफे शुरू कर सकते हैं. तुम्हारी हरकतों और बदमाशियों से अनजान वो तुम्हें एक क्युरीअस आन्ट्रप्रनर समझ कर तुम्हें सब जानकारियां भी दे रहा था...और तुम..तुम तो ऐसे उसकी बातों पर सिर हिला रही थी जैसे तुम्हें उसकी सभी बातें समझ में आ रही हों. मैं जब काउंटर पर आया था तो मेरे प्रति तुम्हारा बर्ताव भी ऐसा था कि रणवीर को जरूर ये लगा होगा कि मैं तुम्हारा कोई असिस्टेंट हूँ. उस दिन के बाद तो तुम महीनों तक जिद पर अड़ गयी थी कि हम दोनों को एक कैफे शुरू करना ही चाहिए. बड़ी मुश्किल से तुम्हारी ये जिद छुट पायी थी.

इस कैफे में कभी कभी तुम अजीबोगरीब हरकतें भी करने लगती थी. तुम्हें याद है कैसे तुम यहाँ बैठे बैठे ही अक्सर किसी ‘नोस्टालजिक जर्नी’ पर चली जाया करती थी? वो दिन तो याद है न तुम्हें जब मेरी पढ़ाई खत्म हुई थी और मैं दिल्ली तुमसे मिलने आया था. तुम बहुत खुश थी उस दिन, हम करीब छः महीने बाद जो मिल रहे थे. ग्रीन पार्क के मेट्रो स्टेशन पहुँच कर जब मैंने तुम्हें फोन किया और ये जानना चाहा कि तुम कैफे पहुँची हो या नहीं, तो तुमने फोन पर मुझे बड़ा अजीब जवाब दिया था जो मुझे उस समय तो बिलकुल समझ में नहीं आया था..तुमने कहा था “मैं कैफे में ही बैठी हूँ और अब लौट रही हूँ..तुम आओ तब तक मैं भी लौट आऊँगी..”

मैं तो कुछ देर तक यही सोचता रहा कि तुम्हारा जवाब कितना कान्ट्रडिक्टरी है.. तुम्हारे बोलने का क्या अर्थ समझूँ मैं? तुम कैफे में बैठी हो और लौट भी रही हो? ये कैसे मुमकिन है? मेरी इस क्युरीआसटी को शांत भी तुमने ही किया था. तुमने उलाहना भरे स्वर में कहा था “तुम तो थे नहीं दिल्ली में और मैं यहाँ अकेली थी...क्या करती मैं? किसे परेशान करती? किसके साथ घुमती? अकेले तो कॉफ़ी पीने में भी मज़ा नहीं आता है..तो एक दिन यहाँ बैठे बैठे मैंने अपनी एक स्पेशल पावर्स का इस्तेमाल किया और आँखें बंद कर के उन दिनों में जाने लगी जब हम और तुम साथ घूमते थे, जब तुम थोड़े कम नालायक थे.”

स्पेशल पावर्स? तुम्हारे पास स्पेशल पावर्स भी है? मैंने तुमसे पूछा था, और फिर तुमने कुछ ऐसे मुझे घूर के देखा था कि आगे कोई बात पूछने की मुझमें हिम्मत ही बाकी नहीं रही.

तुमने इस कैफे को एक तरह से अपना घर ही बना लिया था. जहाँ पर हम तुम अक्सर बैठते थे, उस टेबल के चारों तरफ तुम्हारी सभी चीज़ें ऐसे बिखरी रहती थी जैसे वो कैफे का कोना नहीं बल्कि तुम्हारे ड्राइंग रूम का कोई कोना है.. तुम्हारा जैकेट, तुम्हारे सनग्लास, हेयरक्लिप्स, दस्ताने, तुम्हारी किताबें, डायरी, कैमरा, मोबाइल और तुम्हारे चॉकलेट्स..टेबल के चारों तरफ तुम्हारी चीज़ें बिखरी रहती और अक्सर टेबल पर सर रख कर तुम यहीं सो भी जाया करती थी. उस दिन भी मैं जब तुमसे मिलने आया तुम शायद अपने नोस्टालजिक जर्नी से थक गयी थी और वहीँ टेबल पर सर रख कर सो रही थी.

मेरे आते ही तुम झटके से उठी गयी थी. मैं तो बड़े एहतियात से कुर्सी पर बैठा था कि जरा सा भी आवाज़ न हो और तुम्हारी नींद में कोई खलल न पड़े लेकिन फिर भी हलकी आवाज़ हुई और तुम एकदम हड़बड़ा के उठ गयी थी. कुछ पल तो तुम ऐसे घूरते रही थी कि जैसे मुझे तुमने पहचाना ही न हो..और फिर अगले ही पल टेबल पर रखे अपने पर्स को उठा के तुमने मेरे चेहरे पे दे मारा था और गुस्से में कहा था ”तमीज नहीं है नालायक.. ऐसे कोई डराता है क्या आकर?”. मैंने फ़ौरन तुमसे माफ़ी माँग ली थी और भगवान का शुक्र अदा किया कि तुम्हारे हाथ में टेबल पर रखा वो कॉफ़ी का मग नहीं आया वरना मेरे शक्ल की जाने क्या हालत होती.

तुम उस दिन बड़े अच्छे मूड में थी और मुझे तुरंत माफ़ भी कर दिया था. लेकिन उस दिन मेरी किस्मत में तुमसे और डांट खाना लिखा था. उस नालायक रणवीर ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. जाने कहाँ से कैफे में उसने बॉयजोन का मशहूर एल्बम ‘अ डिफरेंट बीट’ कैफे में प्ले कर दिया था. वैसे तो इसके सभी गाने तुम्हारे फेवरिट थे लेकिन एक गाना ख़ास कर के तुम्हें पसंद था..’ वर्ड्स...दिज वर्ड्स आर आल आई हैव टू टेक योर हार्ट अवे...’.

उधर इस गाने की धुन तुम्हारे कानों में पड़ी नहीं कि तुम एकदम इक्साइटेड सी हो गयी और एकदम मेरे पास आकर बैठ गयी..”कितना खूबसूरत गाना है न...याद है तुम्हें ये गाना..मैं अक्सर गाया करती थी पहले न?” तुमने मुझसे पूछा था.

मेरी हालत थोड़ी ख़राब हो गयी. वो गाना उस समय मुझे सच में याद नहीं था. बड़े दिनों बाद भी तो सुन रहा था. मुझे ये भी नहीं याद था कि मैंने ये गाना तुम्हें कभी गाते हुए सुना भी है. मैं जानता था कि ‘ना’ में जवाब देना मेरे लिए बहुत हानिकारक साबित होगा लेकिन ‘हाँ’ में जवाब दे देना और बाद में इस गाने पर पूछे किसी सवाल को न बता पाना उससे भी ज्यादा हानिकारक होता. तो मैंने हिम्मत कर के बात थोड़ा घुमा कर तुम्हें कहा था...”ऐक्चूअली पूरा गाना तो याद नहीं है..काफी पहले सुना था न...”

तुम तो लेकिन मेरे बहाने और मेरे झूठ को भी एक सेकण्ड में पकड़ लिया करती थी. “तुम्हें बिलकुल याद नहीं है ये गाना न?” तुमने गुस्से में मुझसे पूछा था. मैंने सिर हिला के ना में जवाब दिया था.

बस फिर क्या था. तुम कुछ देर तक तो गुस्से और हैरत में मेरी तरफ देखती रह गयी. दोनों हाथ हवा में खड़े कर दिए थे तुमने जिससे मुझे और डर लगने लगा था कि कहीं इस कैफे में मेरी पिटाई न हो जाए. लेकिन तुमनें बस गुस्से और डांट से ही काम चला लिया था “मैंने तुम्हें इसका कैसेट भी दिया था.. सुने भी थे क्या उस कैसेट को कभी या उसका आचार बना के खा गए थे?”

मैं एकदम सकते में आ गया था. समझ गया था मेरे उस “ना” ने अपना कमाल कर दिया है और मैं तैयार था कि आज तो अच्छी सजा झेलनी पड़ेगी.

“और कितने गुनाह करोगे दोस्त? कैसे करोगे प्रायश्चित इन सब गुनाहों का?” तुमने मुझसे ऐसे पूछा था जैसे एक गाने को भूल जाना दुनिया का सबसे बड़ा अपराध हो. मैं चुप ही रहा. ऐसे मौकों पर तुम्हारे सामने मैं सफाई देने से बचता हूँ. अक्सर ऐसा हुआ है कि सफाई देने में मेरे मुहँ से कुछ और उलटी बात ही निकल गयी है और मुझे और डांट पड़ जाती थी. फिर भी मैंने सफाई देने की कोशिश की...धीरे से तुमसे कहा “अरे यार मुझे अंग्रेजी गाने वैसे भी ज्यादा समझ में नहीं आते न..इसलिए शायद याद नहीं आ रहा हो...”

तुम कुछ देर वैसे ही गुस्से में मुझे देखती रही. फिर पीछे मुड़ कर रणवीर से कहा, “भैया इस एल्म्बम को फिर से प्ले कर देंगे? रिपीट मोड में...मुझे इस इडियट को कुछ समझाना है........प्लीज़”. रणवीर तुम्हारी ऐसी हरकतों को अब जान गया था इसलिए उसने भी मुस्कुरा के हाँ कहा दिया.

एक मास्टरनी की तरह मेरी तरफ देखकर तुमने कहा था, बहुत पढ़ लिए इंजीनियरिंग तुम, "अब चलो मैं तुम्हें ज़िन्दगी की पढाई कराती हूँ, लव नोट्स देती हूँ तुम्हें. जेब से अपनी कलम निकालो और नोट करते जाओ जो भी मैं समझा रही हूँ तुम्हें..”.

मैंने मुहँ बना कर थोड़ी असहमति जताने की कोशिश की थी लेकिन तुम फिर गुस्सा हो गयी... “मेरे यही लव नोट्स ज़िन्दगी में काम आने वाले हैं..तुम्हारी वो इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं...समझे?? तो पे अटेन्सन....” पूरे डेढ़ घंटे तक मेरी क्लास चली थी उस दिन और करीब तीन बार वो एल्बम रिपीट मोड में प्ले हुआ था उस दिन.

मुझे तो बस ये लग रहा था कि चलो मेरा कसूर तो जो था सो था, लेकिन बाकी कैफे में बैठने वालों का क्या कसूर था कि उन्हें एक ही एल्बम डेढ़-दो घंटे तक तक सुनना पड़ा था. खैर, ये सब पूछने की तुमसे हिम्मत न तो तब थी और ना अब है.

शाम काफी हो गयी थी, और तुम्हारे घर से दीदी ने कॉल कर दिया था. वो तुम्हें जल्दी घर लौटने के लिए कह रही थी. दीदी का कॉल उस दिन मेरे लिए लाइफ-सेव्यर था..वरना मेरी क्लास कैफे बंद होने तक चलती रहती.

कैफे से निकलते वक़्त भी तुमने कमाल कर दिया था. चलते चलते तुमने रणवीर से पूछा था..”आपको बुरा तो नहीं लगा न भैया? मैंने एक एल्बम इतनी देर तक प्ले करवाया..?” रणवीर भी कम बदमाश नहीं था. वो मेरी ऐसी हालत पे जरूर हँसता होगा. उसने मुस्कुराते हुए कहा “अरे बिलकुल नहीं..”.

तुम तो लेकिन तुम ठहरी.. एकदम अन्प्रिडिक्टबल. कब क्या कर दो? कब किसे क्या कह दो ये तो तुम कभी सोचती भी नहीं थी. तुमने रणवीर से कहा “असल में यू नो बात क्या है.. इसकी इंजीनियरिंग पूरी हो गयी और पढ़ाई का असर तो देखिये इसपर कैसा हुआ है? अव्वल दर्जे का नालायक हो गया है ये लड़का. जवानी में देखो बोरिंग सा हुआ जा रहा है..रोमांटिक गाने नहीं सुनता...और देखो तो इसे ये गाना भी याद नहीं था. तो मैं चाहती थी इसे सुनाऊं ये गाना.. कुछ तो सीखे ये लड़का इस गाने से और....और, और......इसी कैफे में उस साइड टेबल पर रोमांटिक गाने सुनते हुए मुझे प्रपोज कर सके...ताकि आपका ये कैफे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाए. तो यू सी, बहुत जरूरी था ये एल्बम लगातार प्ले करवाना. कल भी आउंगी, आपके पास तो इतने रोमांटिक अल्बम है, उसमे से ही कोई प्ले कर दीजियेगा और मैं कल फिर से कोशिश करुँगी कि ये थोड़ा तो इंटरेस्टिंग और रोमांटिक बने...और....”

“और तुम्हें प्रपोज कर सके? है न?” रणवीर ने तुम्हारी बात पूरी कर दी थी...और तुम्हारे जगह शर्म से मेरे गाल लाल हो गए थे.

"हाँ..हाँ...हाँ..बिलकूल. तुमने एकदम इक्साइटेड होकर कहा था." रणवीर भी तुम्हारी इस बदमाशी में पार्टनर बन गया था. उसने भी आगे बढ़ के तुम्हारा हौसला और बढ़ा दिया था और कहा था “कल आओ तुम और इसको भी लेकर आओ इस कैफे में...और जब तक तुम्हें कल ये प्रपोज न कर दे तब तक इसे इस कैफे में ही हम दोनों बंदी बना कर रखेंगे.”

तुम खुश थी...एकदम एकदम विजयी मुस्कान देते हुए, अपने कॉलर को पूरे टसन में ऊपर उठाते हुए मुझे चिढ़ा रही थी.. “देख लिया न मेरी ताकत को? मेरी पहुँच को? ये मेरा शहर है...और ये मेरा इलाका है जानी, यहाँ तुम्हें मुझसे कोई नहीं बचा सकता...”


उस दिन के बाद से देखो वो गाना अब मुझे जबानी याद है. 

Smile an ever lasting smile
A smile can bring you near to me
Don't ever let me find you gone
'Cause that would bring a tear to me
This world has lost its glory
Let's start a brand new story
Now my love
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

Talk in ever lasting words
And dedicate them all to me
And I will give you all my life
I'm here if you should call to me
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

This world has lost its glory
Let's start a brand new story
Now my love
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

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Saturday, December 24, 2016

दिसम्बर, कोहरा और उसके खेल

काफी सालों बाद इस बार दिसंबर में शहर में इस कदर कोहरा मेहरबान हुआ है, वरना कोहरे ने तो जैसे ये ठान लिया था कि जनवरी के पहले अपनी शक्ल दिखानी नहीं है. तुम्हे याद है ऐसे कोहरे के मौसम में तुम कैसे फरमान जारी कर दिया करती थी? एक दिन सुबह ठीक पाँच बजे तुमने कॉल किया था और एकदम हड़बड़ी में कहा था, "सुनो.. दिसंबर जाने वाला है..बस पाँच दिन बचे हैं, और तुम सो रहे हो...? उठो, फ़ौरन उठो और जल्दी से तैयार होकर पार्क आ जाओ". कसम से , मेरा तो दिल किया था फोन में घुस जाऊं और तुम्हारी चोटी काट लूँ. जाड़े की सुबह सुबह जब कोई  गहरी नींद में रजाई के अन्दर दुबके हुए इत्मिनान से सो रहा हो तो कोई जगाता है क्या ऐसे किसी को? तुम्हें लेकिन इन सब बातों की परवाह ही कहाँ थी..तुम्हें तो बस ये मालूम था कि तुम्हें सुबह कोहरे में घूमना है और घुमाने वाला एकमात्र मैं ही था. तुम्हारी ऐसी बदमाशियों पर अक्सर मुझे गुस्से के बजाये प्यार आ जाता था. लेकिन उस दिन तुम्हारा कॉल पर ऐसे हड़बड़ाना बदमाशी या बेवकूफी नहीं थी. ये मुझे बहुत बाद में तुम्हीं से पता चला था. तुम सच में बहुत उदास हो जाया करती थी साल के आखिरी दिनों में ये सोचकर कि अब कुछ ही दिनों में दिसंबर जाने वाला है और फिर ग्यारह महीने का लम्बा इंतजार करना पड़ेगा. . दिसंबर से तुम्हें बेंतेहा प्यार था, तुम्हारा बस चलता तब तो दिसंबर को तुम ग्यारह महीने का और एक्सटेंसन दे देती. तुम्हारे मुताबिक तो साल भर बस दिसंबर का ही महिना होना चाहिए.

उन दिनों मेरे लिए सुबह के कोहरे में तुम्हारे साथ घुमने से ज्यादा मैजिकल कुछ भी नहीं था. हाँ तुम्हारे कई सारे नखरे झेलने पड़ते थे मुझे और अक्सर घर में बहाने भी बनाने पड़ते थे लेकिन इन सब के बावजूद सुबह कोहरे में तुम्हारे हाथ में हाथ डाले घुमने का वो एहसास ही बिलकुल अलग सा था. तुम्हे तो कोई दिक्कत नहीं थी, घर में उन दिनों सिर्फ तुम्हारी माँ और दीदी ही थी और तुम उन्हें जाने क्या क्या कहानियाँ बता कर सुबह हर रोज़ निकल आया करती थी.. लेकिन मैं फँस जाता था, हर दिन कोई नया बहाना सोचना पड़ता था मुझे. दिसंबर और कोहरे के कॉम्बिनेशन वाले मौसम में तुमपर अक्सर कोई न कोई सनक चढ़ जाया करती थी. याद है एक दिन तुमने फरमान जारी कर दिया कि कल से अपना बैडमिन्टन किट लेते आना. ये सोचने की तुमने जहमत भी नहीं उठाई थी कि मैं इतनी सुबह घर में क्या बोल कर बैडमिन्टन किट हर दिन लाया करूँगा? पूरे एक डेढ़ महीने मेरे घरवालों को लगता रहा था कि मैं कॉलेज के बैडमिन्टन चैम्पैन्शिप में भाग ले रहा हूँ और उसी की तैयारी के लिए सुबह इतने कोहरे में भी निकल जाता हूँ. उन्हें क्या पता था कि मैं तुम्हारे आदेशों का पालन कर रहा था.

बैडमिन्टन खेलने का तुम्हें कभी शौक नहीं रहा था. लेकिन एक सुबह तुमने पार्क के एक कोने में किसी लड़के-लड़की को देख लिया था बैडमिन्टन खेलते हुए, तब से ही तुम्हारे मन में ये सनक बैठ गयी थी. तुम भी हर सुबह खेलती थी बैडमिन्टन. लेकिन तुम्हारे साथ बैडमिन्टन खेलना भी आसन कहाँ था? बैडमिन्टन के तुम्हारे अपने नियम थे. तुम्हारे ही जैसे यूनिक नियम जैसे, बैडमिन्टन खेलने समय मैं तुम्हें जोर से कोई शॉट नहीं  मार सकता था, वरना मेरे पॉइंट कट जाते. ना ही तुम्हें कोई शॉट मैं ज्यादा ऊपर या नीचे खेलवा सकता था. मतलब ये कि तुम्हारे बैडमिन्टन रैकेट के आसपास ही कॉर्क आना चाहिए जिससे तुम आराम से शॉट मार सको, और इतने पर भी तुम्हारा कोई शॉट मिस हुआ तो भी पॉइंट मेरे ही कटते थे. कभी गलती से मैंने शॉट मारने में थोड़ी हीरोगिरी दिखा दी तो पॉइंट तो कटते ही कटते, जाड़े के मौसम में, ऐसे कोहरे में, बैडमिन्टन रैकेट से मार अलग से पड़ती थी तुमसे.

ऐसे ही सनक तुम्हें चढ़ी थी एक दफा क्रिकेट खेलने की भी. एक दो तीन तो हमारे दोस्तों की गैंग भी आई थी क्रिकेट खेलने. लेकिन तुम्हारे नियम...वो तो इस खेल में भी अजीबोगरीब थे. बस एक दिन में ही सब दोस्त तुमसे तंग आकर भाग गए थे. तुम्हें हर ओवर का पहला बॉल ट्राई बॉल चाहिए था. हर बॉल तुम्हारे बैट पर ही आना चाहिए था. अगर गलती से शॉट मिस हो जाता तो वो बॉल 'इनवैलिड' हो जाता था. तुम्हें बोलिंग करना आसान कहाँ था? बोलिंग करते समय रन अप लेने की तो सोचना भी अपराध था. तीन चार क़दमों की चहलकदमी कर के भी तुम्हें गेंद फेंकने आता तो तुम एकदम झल्ला जाती थी और बैट फेंक देती थी. तुम्हें बस इतना चाहिए था कि खड़े होकर सीधा सपाट बॉल तुम्हें फेंका जाए जिसे तुम आराम से बाउंड्री पार भेज सको. तुम्हें आउट करना भी तो टेढ़ी खीर थी. दुनिया का महानतम गेंदबाज तुम्हें आउट नहीं कर सकता था. उन दिनों हम इंटों का विकेट बनाते थे. कुछ आठ-दस इंटें लगते थे विकेट बनाने में, और तुम जब बैटिंग करती तो सभी इंटों को नीचे गिरा देती थी. बस दो इंटें एज अ विकेट लगे रहते थे और यदि उन इंटों पर तुम्हारे नियमों के मुताबिक बॉल लगे तो ही तुम आउट होगी.

जहाँ तक तुम्हारे बोलिंग करने का सवाल था, उसका मुझे ज्यादा इक्स्पिरीअन्स नहीं है. तीन चार बार ही हुआ होगा ऐसा जब तुमने मुझे बैटिंग करने का मौका दिया था. इतना बस मुझे याद है कि मैं बैटिंग और फील्डिंग एक साथ किया करता था. इधर मैंने शॉट मारा नहीं कि तुम चिल्लाती थी, "अरे जल्दी पकड़ो बॉल को, वरना चार रन हो जायेंगे और तुम जीत जाओगे" और मुझे भाग कर गेंद पकड़ना पड़ता था. गलती से अगर मेरे बैट से लगी बॉल बाउंड्री पार चली जाती तो तुम्हारे ताने अलग सुनने पड़ते थे मुझे, "ठीक से फील्डिंग भी नहीं कर सकते तूम...कुछ काम के लायक नहीं हो".  ऐसी तो थी तुम. कौन तुम्हारे ऐसे नियमों के साथ क्रिकेट खेलता. तुम्हारे इन नखरों को सिर्फ मैं ही झेलता था, और किसी में इतनी हिम्मत कहाँ थी? लेकिन तुम्हारे इन सब नखरों के बावजूद तुम्हारे साथ सुबह के ये दो ढाई घंटे मेरे लिए दिन के बेहतरीन पल होते थे.

तुम्हें याद है मेरे पास उन दिनों एक छोटा टू-इन-वन था जो एक क्विज कम्पटीशन में मुझे इनाम में मिला था. जैसे तुमने बैडमिन्टन और क्रिकेट किट लाने का फरमान जारी किया था, ठीक ऐसे ही तुमने एक दिन टू-इन-वन लाने का फरमान जारी कर दिया था. क्रिकेट और बैडमिन्टन तक तो ठीक था, लेकिन ये टू-इन-वन लाने का मैं घर में क्या बहाना बनता? कि मैं किसी म्यूजिक कम्पटीशन में भाग ले रहा हूँ? दो दिन तो किसी को पता नहीं चला था कि मैं हर सुबह अपने उस छोटे से टू-इन-वन को बैग में रख कर ले जाता हूँ. लेकिन एक दिन माँ ने देख लिया तो पूछा, तुम तो सुबह खेलने जाते हो? ये टू-इन-वन किसलिए? अब मैं क्या कहता? हमेशा एक ही बहाना बनाता था, कि दोस्तों के साथ सुबह क्रिकेट की कमेंटरी सुनता हूँ. सोचो ज़रा, इतने पापड़ बेलने पड़ते थे मुझे तुम्हारे हर आदेश का पालन करने में.

तुम्हारी एक ख्वाहिश थी, कि हम और तुम इस पार्क में टहलते रहे, या कुछ खेलते रहे या बस कहीं किसी बेंच पर बैठे रहे और बैकग्राउंड में संगीत बजते रहना चाहिए. याद है एक दिन तुमने कहा था मुझसे "पता करो इस पार्क का रख-रखाव कौन करता है और उसे मेरे पसंद की गानों की एक सीडी बना कर दे दो और कहो कि पार्क में हर जगह लाउडस्पीकर लगवा दे और वो सारे गाने एक एक कर के बजाये". खैर ये तो मुमकिन नहीं था शायद इसलिए तुमने पार्क में गाने सुनने का एक दुसरा रास्ता निकाल लिया था. मुझे तुमने टू-इन-वन लाने का फरमान सूना दिया था और मेरे उसी छोटे से टू-इन-वैन पर ही तुम अपनी हसरत पूरी कर लिया करती थी. तुम अपने मन पसंद गाने बजा लेती थी और टू-इन-वन को वहीँ किसी बेंच पर रख कर हम दोनों बैडमिन्टन खेलते थे और खेलने के बाद बहुत देर तक वहाँ बैठ कर गाने सुनते थे. उन दिनों ऐसा लगता था अक्सर कि ये टू-इन-वन हमारा कोई दोस्त हो जो हम दोनों के बीच बेंच पर चुपचाप बैठे हुए हमारी बातें सुन रहा है और हमें गाना सुना रहा है.

एक छोटा सा खेल भी तुमने इजाद किया था उन दिनो. मेरे पास कुछ इन्स्ट्रमेन्टल गानों की कैसेट थी. तुम उन कैसेट्स को टेप पर चलाती और कहीं भी बीच में रेंडमली फॉरवर्ड या रिवाइंड कर के बस तीन या पाँच सेकण्ड के लिए प्ले करती और मुझे पहचानना होता था कि वो गाने की कौन सी लाइन थी. मैं अक्सर हार जाया करता था लेकिन तुम हमेशा ही जीतती थी. इस एक खेल में ना तो तुम्हारे कोई वीयर्ड नियम थे और नाही तुम्हारे कोई नखरे. मुझे हैरानी भी होती थी उस वक़्त कि ऐसे कैसे तुम्हें हर गाने इतने अच्छे से पता हैं. मेरे लिए इस  खेल में एक फायदा ये था, कि तुम हर गाने को पहचान लेती थी और फिर उसे मेरे सामने गुनगुनाती थी. तुम्हारे साथ दिसंबर के कोहरे वाली सुबह की शायद ये मेरी सबसे मीठी याद है.

आज तुम्हारी उन बातों को याद कर के चेहरे पर एक मुस्कराहट तैर जाती है. सच कहूँ तो तुम्हारी जितनी भी अजीबोगरीब फरमाइशें थीं, जितने भी आदेश थे उनसे मुझे कभी इरिटेशन महसूस नहीं हुई. मैं तुम्हारी उन हरकतों पर उन दिनों कभी कभी हँसने की गुस्ताखी जरूर कर देता था लेकिन मुझे सच में बहुत अच्छा लगता था जब तुम ऐसे मुझपर हुक्म चलाती थी. इस बार दिसंबर के मौसम में शहर के उस पार्क में जहाँ हम और तुम जाया करते थे हर सुबह, एक बड़ा प्यारा सा बदलाव हुआ है जिसे देखकर मैं कुछ देर के लिए दंग रह गया था. पार्क के हर कोने पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए थे और सुबह सुबह रोमांटिक इंस्ट्रुमेंटल और कभी कभी रफ़ी के रोमांटिक गाने बजते हैं. मुझे ये सोच कर हँसी भी आ गयी कि चलो तुम्हारी फरमाइश को पार्क के मैनेजमेंट ने इतने सालों के बाद ही सही, माना तो आखिर. मुझे उस समय तुम्हारी कमी बहुत शिद्दत से महसूस हुई थी और मुझे लगा काश तुम यहाँ होती और ये प्यारा सा बदलाव तुम देखती. तुम्हारे चेहरे की ख़ुशी ऐसे में देखने लायक होती. पार्क के ही एक कोने पर मेरी मेरी नज़र गयी दो लड़के लड़कियों पर जो सुबह के कोहरे और ठण्ड में बैडमिन्टन खेल रहे थे. मुझे तुम्हारी और ज्यादा याद आने लगी, और मैं पार्क की बेंच पर बैठा आँखें बंद कर लेता हूँ और बहुत पीछे उस साल में पहुँच जाता हूँ जब तुम और मैं यहाँ बैडमिन्टन खेलते थे. बीच बीच में पार्क में बजता हुआ एक रोमांटिक गाने के बोल सुनाई दे रहे हैं.

निगाहों में छुपकर दिखाओ तो जानें
ख़यालों में भी तुम न आओ तो जानें
अजी लाख परदे में छुप जाइयेगा
नज़र आइयेगा नज़र आइयेगा

अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा
जहाँ जाइयेगा हमें पाइयेगा




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Sunday, December 11, 2016

कोहरे पर लिखा एक नाम

वह दिसंबर की एक सर्द सुबह थी. ठण्ड इतने कि रजाई से निकलने का मन न करे, पर जल्दी उठना लड़के की मजबूरी थी. क्या करता वह? लड़की ने उसे हुक्म दिया था.. सुबह ठीक साढ़े छः बजे मेरे घर पहुँच जाना, मुझे ड्राइव पर चलना है.

लड़के ने अधखुली आंखों से ही अपने मोबाइल पर एक नजर डाली, सुबह के 6:00 बजे थे. हारकर उसने रजाई अपने ऊपर से हटा दी और उठ कर एक अंगडाई लेता हुआ खिड़की के पास तक आ गया. खिड़की से बाहर देखा तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. धुंध इतनी गहरी थी कि उसे तो सामने वाले घर की बालकनी भी नजर नहीं आ रही थी. लड़के का मन हुआ कि वह फोन करके लड़की को मना कर दे कि वह आज नहीं आ पाएगा पर उसकी इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वह इस तरह का कोई कॉल करने की सोच भी सकता. हुक्म आखिर हुक्म था और उसकी तामील करना उसका फर्ज़... और हुक्म भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि गाड़ी लेकर लड़की के घर सुबह ठीक 6:30 बजे आकर उसे मोर्निंग ड्राइव पर ले जाने का हुक्म था.

यूँ तो लड़के को लड़की की हर अदा, हर ज़िद और हर नखरे पर बेइंतिहा प्यार आता था...पर जाने क्यों आज उसे थोड़ी सी इरिटेशन महसूस हो रही थी. ऐसे कोहरे में लड़की का उसके जैकेट में हाथ डाल कर टहलना एक बात थी और कोहरे में ड्राइव पर निकलना दूसरी बात थी. एक तो कोहरे में वैसे भी सड़क दिखाई नहीं देती. गाड़ी के शीशों पर भी धुंध आ जाती है और ऐसे में ड्राइव पर जाना खतरनाक आईडिया था. लड़के को कोहरे में गाड़ी चलाना कभी भाता नहीं था लेकिन लड़की को कोहरे में ड्राइव पर जाना बड़ा रोमांटिक लगता था.

लड़के ने मन ही मन तय किया कि आज कुछ भी हो जाए, वो लड़की को गाड़ी की चाभी तो नहीं देने वाला है. एक तो आम दिनों में लड़की गाड़ी सही से चलाती नहीं थी, हॉर्न देने के बजाये कार के अन्दर से ही चिल्लाती थी “हटो हटो...सामने से हटो..” और ऐसे मौसम में जब पूरा शहर कोहरे की गिरफ्त में है, उसे गाड़ी चलाने की सूझी है. लड़के ने ये तय कर लिया कि लड़की को तो वो गाड़ी चलाने नहीं देगा. लड़की को मोर्निंग ड्राइव पर जाना है तो वो ड्राइव कर के ले जाएगा. लड़का जानता था ये काम इतना आसान नहीं है.. लड़की को बहुत प्यार से मनाना पड़ेगा ताकि वो गाड़ी चलाने की जिद न करे. अपने इन्हीं ख्यालों में खोए लड़के की निगाह जब घड़ी पर गई तो वह चौंक गया...उफ़! छः पच्चीस तो यहीं बज गए...यानि अब उसको पक्का देर होनी थी और देर होने का मतलब, लड़की की तय की गई कोई अजीबोगरीब सजा झेलना . ऐसा नहीं था कि लड़की कभी देर से नहीं आती थी, वो अक्सर ही देर से आती थी और खुद की लेटलतीफी के लिए उसके पास हमेशा बेहद अजीब अजीब से लॉजिक मौजूद होते थे. मसलन...लड़कों का लेट होना बहुत बोरिंग होता है, जब कि लड़कियों का लेट होना बेहद रोमांटिक एक और तर्क तो इससे भी ज़्यादा अजीब था...लड़के जब देर से आते हैं तो वो बिलकुल जोकर लगते हैं और लड़कियाँ जितनी देर से आती हैं वो उतनी ही अधिक सुन्दर हो जाती हैं.

कभी कभी लड़की की ऐसी इललॉजिकल बातों पर लड़के का बहुत मन करता कि वह पेट पकड़ कर लोट लोट के हँसे, पर हँसना तो दूर अगर ऐसे में भूल से भी उसके चेहरे पर एक मुस्कान भी आ जाती तो उसकी शामत आना तय था. लड़की ऐसे में मुँह फुला के बैठ जाती...मेरी बात तुमको जोक्स लगती है न...और मैं कोई जोकर...लड़के का दिल करता, वह ज़ोर से अपनी गर्दन 'हाँ' में हिला दे, पर 'आ बैल मुझे मार' का ख़तरा कौन मोल लेता.

ये सब बातें याद करते हुए लड़के के चेहरे पर फिर एक मुस्कान खिल उठी. लड़की की यही सब बातें तो उसे उसकी उम्र की बाकी लड़कियों से अलग करती थी. सबसे ख़ास और अनोखी बात तो उसे यह लगती थी कि लड़की सिर्फ़ उसके सामने ही इस तरह ट्रांसफॉर्म होती थी...बाकी दुनिया के सामने उसका ये रूप नहीं आता था. एक बेहद हँसमुख पर संजीदा सी समझदार लड़की कैसे उसके सामने इतनी बचकानी हो जाती थी वह कभी जान नहीं पाया था. बहुत दिन पहले उसके अचानक हुए गंभीर रूप से रूबरू हो उसने धीरे से पूछा भी था...तुम जब इतनी समझदार हो तो मेरे ही सामने इतनी बच्ची क्यों बन जाती हो ? जवाब में वो फिर तुनक गई थी...तुमको तुम्हारी असली गुड़िया” ज्यादा पसंद है या “नकली”? बस बता दो, फिर तुम देखना... कहते-कहते उसकी आँख डबडबा आई थी तो वह एकदम से घबरा गया था। उसका यह मकसद बिलकुल नहीं था, न ही उसे अंदाज़ा था कि बेहद हल्के-फुलके रूप में पूछी गई उसकी यह बात उसे इस कदर हर्ट कर देगी. वह हड़बड़ा के उसको एक बच्चे की तरह मनाने लगा था...और उस दिन हमेशा की तरह देर तक नखरा दिखाने की जगह वह झट से मान भी गई थी.

लड़की के घर पहुँचते पहुँचते उसे सात बज गए थे. आधे घंटे देर से पहुँचने से लड़का वैसे ही डरा हुआ था. मन ही मन सोच रहा था, आज तो शामत आई अपनी. लड़के ने उसके अपार्टमेंट के गेट के पास इधर उधर निगाह दौड़ाई, पर लडकी का कोई अता-पता नहीं था. लड़के ने राहत की साँस ली. वो अपार्टमेंट के सामने वाली चाय दूकान में बैठ गया और लड़की का इंतजार करने लगा. दस प्रन्द्रह मिनट उसका इंतज़ार करके उसे चिंता होने लगी थी. फोन पर नजर दौड़ाई तो ना लड़की का कोई एसएमएस आया था ना ही उसने कॉल किया था. ऐसे कोहरे वाला मौसम तो उसका सबसे ज़्यादा पसंदीदा मौसम है, फिर इसको वह कैसे मिस कर सकती है भला...? कहीं उसकी तबियत फिर से ख़राब तो नहीं हो गयी? उसने मोबाइल पर लडकी का नम्बर डायल किया. उधर घंटी बस बंद ही होने वाली थी कि तभी लडकी की उनींदी आवाज़ में उससे भी ज़्यादा निन्दियाया हुआ एक बेचारा सा `हैल्लो' लड़के के कानों में पड़ा...

"तुम अभी तक सो रही हो...? भूल गई क्या तुमने आज मुझे यहाँ बुलाया था...?" लड़के की आवाज़ में न चाहते हुए भी थोड़ी नाराजगी झलक गई, "मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ और तुम वहाँ रजाई ओढ़ के आराम से सो रही..."

लड़के के कॉल से लड़की भी हडबडा के उठ गयी. उसकी आवाज़ की तल्खी लडकी भांप गई थी पर हमेशा की तरह डरने की बजाय वह भी गुस्सा गई,"तुमको किसने कहा था तुम इत्ती सुबह तुमको पहुँचने? अब भुगतो... एक तो मूवी देख कर वैसे ही मैं दो बजे सोई, ऊपर से तुमने भी जगा दिया... मुझे अभी आधा घंटा और लगेगा आने में...

लडकी को यूँ गुस्सा होते देख मानो लड़के के होश उड़ गए थे. ये लो..अब अगर ये गुस्सा हो गई तो इसको मनाना और भी टेढ़ी खीर होगी. सो वह झट से समझौते के मूड में आ गया,"अच्छा-अच्छा, ठीक है...मुझे क्या पता था ये सब...तुम आओ अब, मैं यहीं गेट के पास तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.."

लडकी जब वहाँ आई तो बेहद खुशनुमा मूड में थी. हलके नीले रंग की डेनिम की जींस पर ब्लैक लेदर जैकेट और गले में बेहद नफासत से लिपटे स्कार्फ के साथ वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. इतने कोहरे में भी उसे धूप का काला चश्मा लगाए देख कर लड़के की हँसी छूट गई, जिस पर उसने बड़ी मुश्किल से काबू पा लिया. चेहरे पर नकली गंभीरता ओढ़े उसने उसे फटाफट गाडी में बैठ जाने को बोला, पर लडकी तो लडकी थी...इतनी आसानी से कहाँ मानने वाली थी. इसलिए फिर तुनक गई...पहले कायदे से मेरी तारीफ करो...तब गाडी में बैठूंगी. लड़का तो कब से उसकी तारीफ करने का मौक़ा ढूँढ ही रहा था, तभी तो अपनी सारी शायराना जानकारी का इस्तेमाल करते हुए उसने लडकी की भरपूर तारीफ कर डाली...पर आखिर में उससे रहा नहीं गया तो इस समय भी धूप का चश्मा पहनने की वजह पूछ ही डाली. लडकी ने उसे कुछ ऐसे घूर के देखा मानो इस बेवकूफाना सवाल की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं थी. फिर बड़ी लापरवाही से कंधे उचका के बोली...तुम ही तो कहते हो मुझे सनशाइन...अपनी ही रोशनी से मेरी आँखें चौंधिया जाती तो...? तुमको इतना भी समझ नहीं आता...ओह गॉड!! कितने बुद्धू हो तुम...!! लड़का हमेशा की तरह बिलकुल क्लू-लेस था . ऐसे तर्क उसे हमेशा निरुत्तर कर देते थे.

लड़का ड्राइविंग सीट पर बैठने ही वाला था कि लड़की ने टोका.. “ऐ मिस्टर, उधर कहाँ? इधर आइये आप. आपकी सीट ये है. वो ड्राइविंग सीट अगले दो घंटे तक मेरे नाम पर बुक्ड है...”. लड़का इसके लिए तैयार था. उसने पहले तो सख्ती से साफ़ मना कर दिया और फिर बड़े प्यार से लड़की को समझाने लगा कि ऐसे कोहरे में अच्छे ड्राइवर्स को भी गाड़ी चलाने में दिक्कत होती है..कोहरे में गाड़ी चलाना कितना मुश्किल है वो एक एक कर के लड़की को समझाने लगा था. लड़की लेकिन कहाँ मानने वाली थी. इस बार वो गुस्सा होने के बजाये लड़के को इमोशनली ब्लैकमेल करने लगी. अंत में थक हार के लड़के ने न चाहते हुए भी गाड़ी की चाबी लड़की को थमा दी.

लडकी ने बड़ी प्रोफेशनली ड्राइविंग सीट सम्हाल ली थी | इग्नीशन ऑन करने से पहले लड़की ने लड़के से बड़े लापरवाही से पूछा...अच्छा ये क्लच है न और ये ब्रेक और ये एक्सलेटर...? लड़का हैरत से उसे देखने लगा.. तुम भूल गयी? लडकी ने इग्नीशन ऑन करते हुए बड़ी लापरवाही से कंधे उचका दिए...याद है याद है..थोड़ा कन्फ्यूज्ड थी..अभी चलाऊँगी तो सब फिर से याद आ जाएगा ...नहीं याद आया तो तुम तो बता ही दोगे न...

लड़के का दिल किया अपना माथा पीट ले...हद है यार, ये गाडी चलने बैठी है और इसको यही याद नहीं कि गाडी का ब्रेक, क्लच या एक्सीलेटर कहाँ है...एक बार फिर उसको सब बता कर सीट बेल्ट बाँध कर और उसको भी बंधवा कर लड़के ने भगवान् का नाम लिया और स्टेयरिंग उसके हवाले कर दिया.

कुछ दूर तक उसे ठीक-ठाक चलाते देख कर उसने राहत की साँस ली. पर अभी यह साँस वह ठीक से ले भी न पाया था कि लडकी के “रुक-रुक” और “हट-हट” की आवाज़ से एकदम हडबडा गया और जब तक वह कुछ समझ पाता, उसकी गाडी का एक कोना सड़क किनारे खड़े ऑटो से टकरा चुका था.

जब तक लड़का बाहर निकल कर गाडी को हुआ नुकसान आँक पाता, लडकी ने एक झटके से गाडी का दरवाज़ा खोला और अपने ऊपर इस अचानक हुए हमले से धक्का खा कर बौखलाए ऑटो-ड्राईवर पर बरस पडी," दिखाई नहीं देता, इतनी बड़ी गाडी आ रही? बेवकूफों की तरह चुपचाप गाड़ी बीच सड़क पर लगाये बैठे हुए थे...? ऑटो ड्राईवर भी थोड़ा तैश में आ गया और बहस करने लगा. लेकिन लड़की पूरे तरह से ऑटो ड्राईवर के ऊपर बरस पड़ी थी. आसपास के कुछ लोग भी वहाँ जमा हो गए थे. भीड़ इकट्ठी होते देख लड़के ने किसी तरह दोनों को शांत कराया और ऑटो वाले से माफ़ी माँग कर लड़की को बेहद मुश्किल से किसी तरह घसीट-घसाट के गाडी की पैसेंजर सीट पर बैठा दिया.

गाड़ी में दोनों कुछ देर तक चुप रहे. लड़का ये नहीं समझ पा रहा था वो लड़की की इस बेवकूफी पर हँसे या गुस्सा दिखाए. वो ये जानता था कि गलती पूरी लड़की की ही थी. वो बेचारा ऑटो तो बड़े आराम से सड़क के किनारे खड़ा था लेकिन उसके समझ में ये नहीं आ रहा था कि बीच सड़क पर चलती उसकी गाड़ी डाइवर्ट होकर किनारे लगे ऑटो में कैसे जा टकराई. उससे रहा नहीं गया तो उसने आख़िरकार पूछ ही दिया लड़की से.. “तुम्हारी उस ऑटो वाले से कोई पुरानी दुश्मनी तो नहीं थी?” लड़की उसके तरफ आँखें तरेर कर देखने लगी.. “क्या मतलब है तुम्हारा..? कहना क्या चाहते हो तुम...”

लड़के ने बड़े मासूमियत से कहा, “अरे दुश्मनी नहीं थी तो गाड़ी तो सड़क के बीचोबीच चल रही थी..सड़क के किनारे खड़े ऑटो को एकदम फॉर्टी फाइव डिग्री के एंगल से जाकर कैसे ठोक दिया तुमने?

लड़की ने गुस्से में जवाब दिया...”अरे वो तो मैं अपनी जुल्फें समेटने लगी थी तो गाड़ी उधर भाग गयी...मैं तुम्हारे इस खटारा सी गाड़ी को भी कितना रोक रही थी लेकिन रुकी ही नहीं...और वो ऑटो ड्राईवर..एकदम बहरा था. मैं कितना चिल्ला रही थी. वो सुन ही नहीं रहा था. पता नहीं कौन ऐसे-ऐसे लोगों को ऑटो चलाने का लाइसेंस दे देता है, बेचारी सवारियां तो ऐसे ऑटो में बैठ कर फ़ालतू में मर जाती होंगी". मुझे तुमने रोक लिया नहीं तो मैं उस पागल की ईंट से ईंट बजा देती...लाइसेंस ज़ब्त न करवा देती तो मेरा नाम बदल देते.

गाडी को हुए नुकसान को देख कर माँ-पापा क्या कहेंगे, लड़के को जाने क्यों इस समय उस बात की चिंता के बजाये लडकी के इस गुस्से पर बेहद प्यार आ रहा था..अच्छा, तो नाम बदल कर कौन सा नाम रखूँगा मैं तुम्हारा...?


'परी...’ लडकी ने दो मिनट बड़ी गंभीरता से उसकी बात पर गौर करने के बाद कहा और खिड़की पर छाई धुंध पर अपना नाम लिख दिया...|
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Monday, October 10, 2016

बारिशी मोमेंट्स


हम दोनों की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी. वो अक्सर कहती थी मुझसे, देखना हम दोनों के प्यार पर फ़िल्में बनेंगी और किताबें लिखी जायेंगी. वैसे तो हर किसी को लगता है कि उसकी प्रेम कहानी इस दुनिया की सबसे ख़ास कहानी है. लेकिन हमारे मामले में ये थोड़ा सच भी था कि हमारी कहानी किसी रुपहले परदे पर चल रही फिल्म जैसी थी. चाहे वो पहली मुलाकात हो या हम दोनों के ज़िन्दगी में आने वाले उतार-चढ़ाव, ट्विस्ट एंड टर्न. सब कुछ किसी फिल्म के स्क्रिप्ट सा लगता था. पहली मुलाकात हमारी तो सच में एकदम फ़िल्मी थी.

दो जुलाई का दिन था वो. उस साल हमारे शहर में बारिश ही नहीं हो रही थी. जून पूरा सुखा ही रह गया था. मौसम विशेषज्ञ बस अनुमान ही लगाते रहे थे कि बारिश अब हुई कि तब लेकिन बारिश थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठा जाने क्या सोच रहा था और लगातार आसमान की तरफ ताके जा रहा था. तभी वो आई मेरे पास और मेरे बगल में बैठ गयी. कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की जिससे मैं बात करने के मौका ढूँढ रहा था एकदम से पास में आकर बैठ जाए तो कैसा हाल हो जाता है? ठीक वैसा ही मेरा भी हुआ. अचानक से मैं एकदम सकपका सा गया. मेरे उड़े हुए चेहरे को देखकर उसने हलके से मुस्कुरा दिया. फिर आसमान की तरफ देखकर मुझसे जॉन एलिया के स्टाइल में पूछती है -"आसमान में क्या देख रहे हो? कोई रहता है आसमान में क्या? या ये सोच रहे हो कि बारिश कब होगी?" उसके ऐसे अजीब प्रश्न से मैं थोड़ा कन्फ्यूज़्ड हो गया और हड़बड़ी में एक बेमतलब सा जवाब दे दिया "हाँ, बारिश नहीं हो रही यही सोच रहा था". वो फिर हँसने लगी. मेरे कंधे पर थपकी देते हुए कहा उसने "घबराओ मत, मैं आ गयी हूँ...बारिश भी आ जायेगी..."

मैं समझने की कोशिश करता कि क्या कहा उसने इससे पहले ही जैसा फिल्मों में होता है न, ठीक वैसा ही हुआ. इधर उसके बोलने की देर थी कि उधर ज़ोरों से बरसात शुरू हो गयी. एकदम मुसलाधार. मैं तो एकदम चकित सा होकर उसे बस देखते ही रहा था.वो अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए कह रही थी मुझसे - "टोल्ड यू"!

फिर जाने कैसा संयोग रहा उसके बाद, कि अगले कुछ सालों तक ये इत्तेफाक बना रहा कि शहर में बारिश के मौसम की पहली बरसात दो जुलाई को ही हुई. मेरे लिए तो ये बस एक इत्तेफाक मात्र था लेकिन उसके लिए ये इत्तेफाक से कहीं ज्यादा था. मुझे याद है एक साल बाद जब हम दोनों अपने मिलने की पहली ऐनवर्सरी शहर के एक गार्डन रेस्टुरेंट में सेलिब्रेट कर रहे थे, ठीक उसी समय बारिश शुरू हुई. उसने बारिश को देखते ही कहा था - "लो आ गयी बारिश, हमारी और तुम्हारी ऐनवर्सरी सेलिब्रेट करने". उसके छोटे से, प्यारे से दिमाग में ये बात घुस कर बैठ गयी थी कि हमारे शहर में पहली बरसात दो जुलाई को ही होगी. ना उससे एक दिन पहले ना उससे एक दिन बाद. उसका बस चलता तो वो अखबार में इश्तेहार छपवा देती कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है.


बारिश के साथ उसके अब्सेशन की वैसे तो बहुत सी वजहें थी, लेकिन ये सबसे बड़ी वजह थी. इसके अलावा हमारे अनगिनत खूबसूरत पल जो बारिश के रहे हैं और जिसे वो "बारिशी मोमेंट्स" का नाम देकर बुलाती है वो भी एक बड़ी वजह थी कि उसे बारिश के महीने से प्यार था. वैसे तो उसके इस "बारिशी मोमेमेंट्स" में कई सारे  बेशकीमती पन्ने जुड़े हैं लेकिन एक पन्ना बड़ा ख़ास है.

हम दोनों उस  समय अलग अलग शहर में रहते थे और अपने बेहद अजीज दोस्त नितिन की शादी में अपने शहर वापस आये थे. इत्तेफाक भी इतना खूबसूरत था कि नितिन की शादी दो जुलाई को तय हुई थी. वो हमारे मिलने की पाँचवीं ऐनवर्सरी थी. शहर का हाल और  बारिश का सिचूएशन एक्जैक्ट वैसा ही था, जैसा जिस साल जब हम पहली बार मिले थे तब था.

दो दिन पहले हमनें प्लान बनाया था मिलने का, लेकिन मैं कुछ जरूरी काम में फँस कर रहा गया था और उसे मैंने कहा था कि शादी वाले दिन मैं पहुँच पाउँगा. वो मुझसे बेहद खफा हो गयी थी. जाने क्या क्या उसने प्लान किया था, शौपिंग का भी प्लान उसने मेरे साथ ही बनाया था और मेरे देर से आने की वजह से उसके सारे प्लानिंग पर पानी फिर गया था. वो मुझसे लड़ बैठी थी. मैंने उससे पहले से ही कह रखा था कि मेरे साथ चलना शादी में, लेकिन वो नाराज़ थी और उसने ये सजा मेरे लिए मुकर्र की थी कि वो मेरे साथ नहीं जायेगी और शादी में मुझसे मिलेगी भी नहीं. कभी कभी ऐसे ज़ुल्म वो मेरे पर बड़ी बेरहमी से कर दिया करती थी.

मुझे लगा था उसका गुस्सा शादी वाले दिन गायब हो जाएगा. गुस्सा तो गायब हो भी चूका था लेकिन नौटंकियाँ करने में और मुझे सताने में वो उस्ताद थी. शादी वाले दिन उसने मुझे पहले से ही फ़ोन कर दिया था कि वो नितिन के घर के बाहर गेट पर मेरा इंतजार करेगी. मैं वहां ठीक समय पर पहुँच गया था लेकिन वो वहाँ नहीं थी. फिर अगले ही पल उसका फोन आया, "अन्दर आ जाओ ऊपर छत पर दोस्तों की महफ़िल जमी है, वहीं पर हूँ मैं". छत तीसरी मंजिल पर थी. वहाँ पंहुचा तो वहाँ स्टीरियो-डेक वाले के सिवाए वहाँ कोई नहीं था. वहाँ से उसे मैंने कॉल किया तो उसने मुझे फिर दोबारा गेट के पास बुला लिया. भागते दौड़ते हुए मैं गेट तक पहुँचा तो वहाँ भी वो नहीं थी. अब तक मैं समझ गया था कि वो मुझे बस सता रही है. उसने आख़िरकार मुझे फोन किया और बस इतना बोल कर फोन काट दिया, "बैड लक...आज तो तुम मेरे दीदार को तरसो बस".
हालाँकि मुझे उसकी इस बदमाशी से इरिटेट होना चाहिए था लेकिन मैं मन ही मन उसकी इस  बदमाशी पर मुस्कुरा रहा था.

गेट पर ही मुझे एक दो दोस्त और मिल गए और उनके साथ मैं घर के अन्दर चला आया. नितिन का घर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी बहुत बार नितिन के घर मैं आ चूका था. अन्दर एक बड़ा सा आँगन था और वहीँ बीच में मंडप लगा था. मैं वहीँ मंडप के एक तरफ बैठ गया.

आखिरार वो सामने से आते दिखी मुझे. चेहरे पर अपनी ट्रेडमार्क शरारती मुस्कान लिए, सारे नखरे और अदा समेटे सामने की तरफ के सीढ़ियों से बाकी औरतों के साथ वो आ रही थी.

वो मंडप के दुसरे तरफ कोने में औरतों के ग्रुप में बैठ गयी. ये उसका एक और जुल्म था मेरे पर. मुझे तड़पाने का वो कोई मौका नहीं छोड़ रही थी. मैंने उसे इशारे से पास आने को कहा. पहले तो उसने मुहँ बिचका के बड़ी बेरुखी से हँस कर मेरी बात को इगनोर कर दिया, फिर उसने मुझे इशारा किया अपने पास आने का. वो जानती थी कि मैं वहां नहीं आऊंगा. मैंने इनकार किया. वो फिर से हँस दी. उसे बस दूर से देखने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था. अपने सभी लड़की दोस्तों को मैं जी भर कोस रहा था, अभी कुछ देर पहले सब यहीं पर महफ़िल जमाये बैठी थीं लेकिन अब कोई दिख क्यों नहीं रही है. वो होती अगर तो कम से कम उनके जरिये मैं उस तक सन्देश तो पहुँचा सकता.

औरतें सब गीत गा रही थी और मेरे और उसके बीच बड़े विएर्ड से एक्स्प्रेसन का आदान प्रदान हो रहा था. उसने मुझे फोन पर मेसेज किया, "आज यूहीं बस इशारों इशारों में बातें करो". 

मैंने मौका देखकर नितिन की छोटी बहन प्रिया को अपने पास बुलाया और कहा कि उसे मेरे पास लेकर आओ. प्रिया ने जाने क्या बात की उससे, कि वो मुस्कुराने लगी. थोड़ी देर बाद खुद उठ कर वो मेरे पास आ बैठी. बातें मुझसे वो फिर भी नहीं कर रही थी. तब तक वो मुझसे रूठी रही जब तक मैंने 'कान पकड़' के उससे माफ़ी नहीं मांग ली थी. 

कुछ देर तक हम मंडप के पास ही बैठे रहे. लगभग सब रस्म जब खत्म हो गये, हम दोनों टहलते हुए छत पर आ गए थे. नितिन के घर की इस छत से भी काफी यादें जुड़ी थी. हम सब दोस्तों में से सिर्फ नितिन ही एक ऐसा दोस्त था जिसके यहाँ हम सभी इकट्ठे होते थे और छत पर हमारी महफ़िल जमती थी. छत के एक कोने पर डेक(स्टीरियो) रखा था. डेक ऑपरेटर शायद अपना डेक वहीँ छोड़ कर सोने जा चूका था. हम वहीँ कोने पर लगी कुर्सियों पर बैठ गए. 

उसने गाने सुनने की फार्माइश की. मैंने एकदम धीमे आवाज़ में गाने चला दिए. अच्छी सुहानी सी हवा चल रही थी और ऐसे में उसके साथ बैठ कर रोमांटिक गाने सुनते हुए छत पर तारों को देखना, ये मेरे लिए सबसे हसीन पल में से एक था. गाने के बीच में वो कई बार उठ कर नाचने लगती...और मैं उसे देखते रहता. 

मैं बार बार सीढ़ियों की तरफ भी देख रहा था, कि कहीं कोई आ ना जाए. उसने मेरे इस डर को भांप लिया था. मुझे तसल्ली देते हुए उसने मुझसे कहा, "घबराओ नहीं..हमें यहाँ कोई गलत नज़रों से नहीं देखेगा..यहाँ वैसे भी सब हमें प्यार करते हैं.." कुछ पल वो चुप रही, फिर आगे कहा उसने "तुम जानते हो तुमनें जब प्रिया के जरिये मुझे संदेसा पहुँचाया था न, तब उसने आकर मुझे जबरदस्ती बाहें पकड़ के उठा लिया था और हँस के कहा था, 'चलिए मेरी होने वाली भाभी, आपको मेरे भैया बुला रहे हैं'. वो समझती है तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है. उसके ऐसे जिद करने पर मैं तो एकदम शरमा सी गयी थी".  कुछ रुक कर उसने आगे कहा, "जानते हो सिर्फ प्रिया ही नहीं, जो भी हमें यहाँ पहचानते हैं सब यही समझते हैं कि तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है."

"हाँ, कुछ लोग हैं जो हर हाल में हमें साथ देखना चाहते हैं.उन्हें ये यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि हमारी अब तक शादी नहीं हुई ही. ऐसे लोगों को और उनकी उम्मीदों को और तरसाना अच्छा नहीं है न? मैंने उसकी तरफ देखा. वो अब भी शरमा रही थी. 

छत पर लगी सीरिज बल्ब की रौशनी में उसकी हलकी डबडबाई आँखें चमक रही थी. उसकी लटें माथे पे उभर आई थीं...रौशनी में चमकती हुई. उसके माँग का टिका और उसके झुमके सीरिज बल्ब की रौशनी में चमक रहे थे. वो किसी दुल्हन से कम नहीं दिख रही थी. मेरी निगाहें उसके चेहरे पर ही ठिठकी रहीं.  

"क्या देख रहे हो?" उसने धीरे से मुझसे पूछा.  
"तुम आज बहुत सुन्दर दिख रही हो..जैसे कोई दुल्हन हो.." मैंने कहा.  
अपने आँखों में आई हलकी नमी को पोछते हुए उसने कहा - 
"ये तो कुछ भी नहीं है, शादी वाले दिन देखना तुम, तुम्हारे होश नहीं उड़ा दूंगी तो कहना. मैं दुल्हन के जोड़े में और तुम सूट-बूट में होगे. हम दोनों दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े होंगे, देखना हमारी शादी यादगार होगी..." 

कुछ पल की चुप्पी के बाद, ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए उसने कहा, "देखना ये चाँद ये सितारे हमारे मिलन के गवाह होंगे.."

जब भी हम दोनों ऐसे खुले आकाश के नीचे बैठे होते थे, उसे हमेशा लगता था कि आसमान से सारे देवता और सारी परियां हमें देखती हैं. वो अक्सर कहती थी, जानते हो ऊपर आसमान में जितने भी देवता और परियां मौजूद हैं, वे सब खुद को खुशनसीब समझते होंगे कि वे दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े के इस प्यार भरे पल में शरीक हैं.. देखो उधर उस तरफ, वहाँ पर सभी मौजूद हैं और हमें देख रहे हैं. उसने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा. 

उसे अपने इस लॉजिक पर पूर्ण विश्वास था. वो अक्सर कहती, मैं आसमान में चमकते इस चाँद में विश्वास करती हूँ, इन तारों पर विश्वास करती हूँ, आसमान से हमें हर पल कोई देख रहा है इस बात पर मैं विश्वास करती हूँ. मुझे ऐसा लगता है जैसे "वी आर पार्ट ऑफ़ समथिंग बिगर...", कुछ ऐसा जो ना तो तुम समझ सकते हो और नाही मैं. इस दुनिया में और सबसे ज्यादा ऊपर उस आसमान में कितना कुछ रहस्मयी है न? "

वो मेरे तरफ देखने लगी. मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उसने मेरे कंधे पर अपना सर टिका दिया. आसमान की तरफ फिर से देखकर मुझसे कहने लगी "मेरे बहुत से अपने मुझे छोड़ कर जा चुके  हैं, तुम कहीं मत जाना कभी. मैंने हलके से उसके माथे को चूम लिया." 

बारिश की हलकी बूँद बरसने लगी थी. वो जैसे अचानक ही खुश हो गयी. "ये तो होना ही था, दो जुलाई का दिन हो और मौसम की पहली बरसात न हो..नामुमकिन. 

इस बार शायद उसकी इस बात पर मुझे भी यकीन था, कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है. मैंने पूछा उससे, हम लोग नीचे चले? वो लेकिन नीचे जाने के मूड में नहीं थी. 
"थोड़ा भीग लोगे तो गल नहीं जाओगे", ये कहते हुए उसने अपने सर को वापस मेरे कंधे पर टिका दिया और आँखें बंद कर ली.  

एक प्यारा सा रोमांटिक गाना डेक में बजने लगा -

है तेरी चूड़ियों का खनकना मेरा 
और तेरे गेसूओं का महकना मेरा 
मेरी आँखों को बस तेरा दीदार हो 
कुछ मुझे और पाने की परवाह नहीं 

तू सुबह का उजाला मेरे वास्ते 
तू मेरे वास्ते दिलनशीं शाम है 
तेरे दिल में ठिकाना रहे उम्र भर
फिर किसी आशियाने की परवाह नहीं 

ऐ मेरी ज़िन्दगी, तू मेरे साथ है 
अब मुझे इस ज़माने की परवाह नहीं..

वो मेरे कंधे पर सर टिकाये, बातें करते हुए सो गयी लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी. उसके मासूम से चेहरे को निहारते हुए मैं पूरी रात जागा रहा. मैं भी उसके साथ साथ उसकी ऐसी बातों को मानने लगा था कि सच में आसमान से कोई हमें हर पल देख रहा है. बरबस ही मेरी आँखें ऊपर आसमान की तारफ उठ गयीं और मन ही मन बस यही दुआ करता रहा कि इस लड़की की हँसी, इसका विश्वास यूहीं बना रहे हमेशा और ये बेवकूफ, पागल और मासूम सी लड़की  हमेशा मेरे साथ रहे, मुझे यूहीं हमेशा सताती रहे.. 

सुबह चार बजे के आसपास उसकी आँख खुली.. वो मुझे देखकर मुस्कुराने लगी. उसने कहा "मैं चाहती हूँ कि मेरी हर सुबह ऐसी ही हो, मैं आँखें खोलूँ तो तुम्हें अपने सामने देखूँ". मैंने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में समेट कर "आमीन" कहा. वो फिर से आँखें बंद कर के सो गयी. 


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Friday, March 4, 2016

वे दिन, स्पेगेटी और वो दाग - [ दिल्ली डायरीज ]


ठण्ड और कोहरे से लिपटी दिल्ली की सड़कों पर जैसे जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही थी मुझे वो तमाम दिन दिल्ली के याद आ रहे थे जो तुम्हारे साथ इस शहर में बीते थे. नयी दिल्ली स्टेशन से घर जाने का रास्ता उन्हीं सब जगहों से होकर जाता था जहाँ कभी तुम्हारे साथ पूरी शाम घूमता था. कनौट प्लेस, मंडी हाउस, इंडिया गेट, पुराना किला, हुमाऊं का मकबड़ा, महरानी बाग़ और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, जहाँ तुम रहा करती थी. जिस भी रास्ते से टैक्सी गुज़र रही थी, हर कोने पर तुम्हारी यादें टंगी दिख रही थी. फिर वो मंडी हाउस की सड़कों पर तुम्हारा मेरा घंटों पैदल चलना हो या तुम्हारा वहाँ के थिएटरों में हर शाम कोई प्ले देखना..इसलिए नहीं कि तुम्हें प्यार था प्ले से. बल्कि इसलिए कि जाने किन कारणों से तुम्हें हमारा एक साथ प्ले देखना रोमांटिक लगता था. इंडिया गेट के पास घास पर तुम्हारा नंगे पावँ चलना हो, या पुराने किले के गेट के पास खड़े होकर तुम्हारा ये कहना कि मैं वापस जरूर आउंगी...सुबह के कोहरे में मुझे तुम्हारी इन स्मृतियों के सिवा कुछ और दिख नहीं रहा था.

शाम में तुम्हारे पसंदीदा कैफे में जाना भी प्री-प्लांड नहीं था. नए घर में पहुँचते ही मैं सामान अनपैक करने लगा था. वैसे तो ज्यादा सामान नहीं थे मेरे पास लेकिन कुछ कीमती कार्टन थे जिसमें मेरी किताबें, फिल्मों और गानों के सीडी और मेरी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पलों के गवाह रहे तुम्हारे दिए तोहफे थे. किताबों का वो कॉर्टन खोल कर उन्हें अलमारी पर रख ही रहा था कि एक किताब हाथ से छूट नीचे गिर पड़ी. अपने आप कुछ पन्ने खुल गए. किताब उठाने बढ़ा हाथ और मेरी नज़रें, दोनो उस खुले पन्ने पर कुछ पल को ठहर गई. सामने ही एक दाग़ था, किताब के पूरे पन्ने पर पसरा बड़ा और गहरा सा दाग. पन्ने पर कुछ लिखा था. – “जो दाग मैंने तुमको दिया, इस दाग से किताब का चेहरा खिला, रखना इसे तुम निशानी बनाकर, पन्ने पर इसको हमेशा सजाकर..ओ प्रीतम बिन तेरे मेरे औ’ इस दाग के सिवा, इस जीवन में कुछ भी नहीं..कुछ भी नहीं..” पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया, ये दाग कैसा और ये क्या लिखा है पन्ने पर? लेकिन दूसरे ही पल सब याद आ गया. तुम्हारी शरारत थी ये. किताब के पन्ने पर ये दाग तुम्हारी वजह से ही लगा था और फिर दाग लग जाने के बाद तुमनें पन्ने पर एक गाने को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया था. सोच भी नहीं सकती तुम इसे पढ़ते ही अकेले कमरे में कितने ज़ोरों से हँस पड़ा था मैं. याद है तुम्हें तुम्हारी ये शरारत? क्या हाल किया था मेरे निर्मल वर्मा के उपन्यास “वे दिन” का तुमने? ये याद है न तुम्हें? 

तुम हमेशा हैरान होती थी न इस बात से कि मैं हमेशा इस किताब को क्यों पढ़ते रहता हूँ..मुझसे हर बार पूछा करती, “आखिर है क्या इस किताब में जो तुम इससे इतने अब्सेस्ट हो?” और मैं तुम्हें हर बार यही जवाब देता था – “पढ़ो और घुमो उस लड़के जिसे उसके दोस्त प्यार से इंडी बुलाते थे और रायना रैमन के साथ प्राग की गलियों में, तब समझोगी तुम कि क्या है इस किताब में...जादू है ये किताब.”. तुम लेकिन कभी इस किताब के तरफ ज्यादा आकर्षित हो ही नहीं सकी थी, फिर भी मैं दिल से चाहता था कि तुम ये किताब जरूर पढ़ो. मेरी तरह अब्सेस्ट भले न हो लेकिन एक बार तो जरूर पढ़ो और महूसस करो वो जो मैं किताब पढ़ते हुए महसूस करता हूँ.

उस शाम जब हम दोनों कैफे में बैठे हुए थे, इसी किताब पर बातें हो रही थी. मैं तुम्हें किताब के कुछ अंश पढ़ के सुना रहा था. तुम भी दिल से सुन रही थी. जाने अचानक तुम्हें क्या हुआ, प्रभावित हुई किताब के अंश से या जाने क्या ख्याल आया तुम्हारे मन में. मेरे हाथों से किताब तुमनें छीन लिया था, और कहा “मैं भी तो देखूँ पढ़कर वे दिन कैसे थे, कौन है ये रायना रायना रैमन और इंडी”. 

किताब के कुछ पन्नों पर तुमनें नज़र डाली थी और फिर जाने क्यों एक पन्ने पर आकर तुम अटक सी गयी. काफी देर तक तुम्हारी नज़रें उसी पन्ने पर जमी थीं. मैंने कनखियों से देखा था तुम्हें ये जानने के लिए तुम पढ़ क्या रही हो. वैसे उस पन्ने पर ऐसा बहुत कुछ था जहाँ तुम अटक सकती थी लेकिन मेरे लिए ये अंदाज़ा लगा पाना काफी कठिन था कि तुम असल में अटकी कहाँ हो? ये भी हो सकता था कि तुम्हें कोई भाग, कोई बात उस पन्ने पर ऐसी लग गयी हो जो तुम्हें काफी भा गयी हो. ऐसे में तुम अक्सर उन पक्तियों को दोबारा..तिबारा..चौबारा..तब तक पढ़ती रहती थी जब तक तुम्हारा मन न भर जाए और उसके बाद ही तुम आगे बढ़ती थी. अक्सर कहा करती थी तुम कि “किताब पढ़ो तो धीरे-धीरे, पूरा जायका लेकर पढ़ो. मिठाई की तरह होती हैं कुछ बातें किताबों में..तुम धीरे धीरे पढ़ना चाहते हो ताकि ये जल्दी खत्म न हो जाए.” इसके अलावा एक और वजह हो सकती थी तुम्हारे अटके रहने की. तुम अक्सर शब्दों में खो जाती थी. शब्दों को समझने में नहीं बल्कि शब्दों को देखने में, उनसे जान पहचान करने में और फिर उनसे दोस्ती करने में. ये भी तुम्हारे उन सारे लॉजिक में से एक था जो मुझे कभी समझ नहीं आया था. तुम अक्सर कहती थी मुझसे “देखो..ऐसा है कि तुम ‘आम लोगों’ के जैसे मैं तो हूँ नहीं, तुम सब से अलग, बहुत ख़ास हूँ मैं. मैं पहले शब्दों को देखती हूँ...अगर मुझे उनसें पोजिटिव वाइब्स मिलते हैं तो फिर मैं दोस्ती कर लेती हूँ, बातें करती हूँ उनसे.. उसके बाद आगे का पढ़ना तय होता है मेरा..”

पोजिटिव वाइब्स..? शब्दों से दोस्ती..? ये सब तुम्हारी बातें किसी भी नार्मल इंसान के समझ से बाहर की बातें थीं. मुझे कहाँ से समझ में आती?

तुम फिर अपने ट्रेडमार्क तरीके से मुझे और समझाने लगती... “देखो बात ऐसी है, कि तुम्हारे और मेरे में बहुत से बेसिक डिफरन्सेस हैं. तुम बाकी लोगों की तरह इस दुनिया के बेहद साधारण से प्राणी हो लेकिन मैं तो इस दुनिया की हूँ ही नहीं, किसी और दुनिया से आई हूँ मैं. तुम्हारे और मेरे अब्ज़र्व करने के तरीके भी अलग हैं. आब्वीअस्ली मेरी बातें तुम्हारे समझ से बाहर होंगीं.. फिर भी समझाती हूँ – देखो, तुम्हें पता है, तुम किताब में शब्दों को पढ़ते हो, समझते हो, महसूस भी करते हो. लेकिन मैं..मैं किताब में शब्दों को देखती हूँ, फिर उनसे दोस्ती कर लेती हूँ, फिर पढ़ती हूँ, समझती हूँ और महसूस करती हूँ.दोस्ती करना बहुत जरूरी है शब्दों से. बिना इसके कोई काम पूरा नहीं हो सकता..सब कुछ आधा अधुरा सा रहता है. So you see, I am complete reader. तुम सब से कहीं ज्यादा कम्प्लीट और डेडीकेटेड रीडर हूँ मैं..."

इस बार भी शायद इस किताब में तुम ऐसा ही कुछ कर रही थी. मशगुल थी किताब पढ़ने में पूरी तरह से तुम और मैं.. मैं तुम्हारी उन पुरानी बातों को तुम्हारे सामने बैठा याद कर रहा था. काफी देर तक जब तुम्हारे तरफ से मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने टोका तुम्हें, “पसंद आ रही है किताब तुम्हें? कैसी लगी?”.
तुम बिलकुल चौंक सी गयी थी मेरे पूछने पर. तुम्हारे एक हाथ में किताब थी और एक हाथ में “स्पगेटी”. मेरे बोलने से तुम अचानक हड्बडा सी गयी थी और अचानक तुम्हारे हाथों से वो स्पगेटी का बाईट नीचे किताब पर गिर पड़ा था. 

मैं जब तक कुछ बोलता तुम्हें, तुम चिल्ला पड़ी थी... “ओह सॉरी सॉरी...सब इस उल्लू के वजह से हुआ है. मैंने जान बुझकर कुछ भी नहीं किया है..”. जानती हो, शुरू में तो मुझे लगा था कि तुम मुझसे सॉरी बोल रही हो. मैं लगभग बोलना ही वाला था कि “कोई बात नहीं..ये सब होते रहता है..” तुमनें तुरंत मेरी गलतफहमी दूर गयी थी.. “ओ साहब..मैं आपको सॉरी नहीं बोल रही हूँ बल्कि आप पर ही गुस्सा हूँ मैं. नुकसान कर दिया मेरे एक बाईट का और ‘स्पगेटी’ को भी नीचे गिरा दिया. बेचारा स्पेगेटी......मेरे मुहँ तक आया भी नहीं था कि टेबल पर दम तोड़ दिया इसने..”

मैंने पूरे हैरत भरे नज़रों से तुम्हें देख रहा था. कमाल की लड़की है ये...एक तो किताब पर पूरा स्पेगेटी गिरा दिया और अब बातें बना रही है ये लड़की. थोड़ा नकली गुस्सा दिखाने की मैंने कोशिश की और डांटा तुम्हें - “जानती भी हो कितना सम्हाल के रखता हूँ मैं ये किताब...और देखो क्या कर दिया तुमनें इसका..अब क्या करूँ इसका? बोलो? ”

मुझे लगा था तुम थोड़ा गिल्ट फील करोगी लेकिन तुमनें तो उल्टा ताव दिखाते कहा – “अब क्या करूँ से तुम्हारा मतलब क्या है? दिमाग जो थोड़ा सा इधर उधर कोने में बचा हुआ है उसका इस्तेमाल करो. किताब लो, सामने वाशरूम है.. जाओ..जाकर धो लो किताब को?”
सच कहूँ? बड़ी जोरों की हँसी आई थी मुझे. लेकिन जैसे तैसे खुद को सम्हालते हुए फिर से गुस्से में मैंने पूछा तुमसे – “किताब को धो दूँ? दिमाग तो सही है न तुम्हारा?”

इस बार भी तुम उसी तरह ताव दिखाते, थोड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहने लगी - “तुम्हें आखिर इंजिनियर बना किसने दिया? हाथ तुम्हारे गंदे हो जाते हैं तो धोते हो न हाथों को? तो किताब अगर गंदे हो जायेंगे तो धोयोगे नहीं क्या तुम किताब को? मतलब इतने आसन सवालों को भी सोल्व नहीं कर सकते तो बड़े बड़े इंजीनियरिंग प्रोब्लम को कैसे सोल्व कर सकोगे तुम? मेन्टेन सम स्टैण्डर्ड... जाओ अब किताब को धो कर लाओ वरना मैं धो लेती हूँ.”

मैं अब ज्यादा देर तक अपने चेहरे पर नकली गुस्सा नहीं रख पाया था और जोरों से हँस पड़ा था तुम्हारी इस बेवकूफीपने पर.. प्यार भी आने लगा था तुम्हारी इन मासूम सी नादान सी बातों पर. हाँ किताब को तुमनें बर्बाद कर दिया था, लेकिन उसका ज्यादा गम नहीं था. वैसे भी तुम्हारे सामने इस बात का गम करना या गुस्सा दिखाना मैं अफोर्ड भी नहीं कर सकता था. याद है उस दिन भी तुमनें अपनी गलती नहीं मानी थी और अंत तक अपनी ही बात पर डटी रही कि तुम्हारी कोइ गलती नहीं थी, वो तो मेरी गलती की वजह से किताब पर स्पेगेटी गिरा था. अंत में किताब पर से वो स्पेगेटी भी मैंने ही साफ़ किया था और तुम्हारे मुताबिक़ जो मैंने “घोर अपराध” किया था उस शाम, उसकी सजा भी तुमनें उसी शाम मुझे दे दी थी..... मेरे जेब से मेरा वालेट निकाल लिया था तुमनें और कहा था, “चलो.. देखते हैं आज तुम्हारे वालेट में कितने पैसे बचते हैं...” .

आज किताब का वही पन्ना सामनें खुला है, वही शब्द किताब से झाँक रहे हैं जहाँ तुम्हारी नज़रें अटकी थीं और जिसके ऊपर तुमनें एक गाने के कुछ लाइन तोड़ मरोड़ कर लिख दिए थे इस उद्देश्य के साथ कि किताब का ये दाग मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाता रहेगा -

हवा से उसका स्कार्फ बार बार फडफडा जाता था.उसके बाहर कुछ भूरी लटें माथे पर छितर आयीं थीं-धुप में चमकती हुईं."पास आ जाओ, वरना तुम हवा में उड़ जाओगी."मैंने हँसते हुए कहा.वह बिलकुल मुझसे सट गई.मुझे लगा वह ठिठुर रही है.मैंने अपना मफलर उतारकर उसके गले में लपेट दिया.उसने कुछ कहने के लिए मुहँ उठाया.उसे मालुम नहीं था, मेरा चेहरा उसके सिर पर है..तब अचानक मेरे होंठ उसके मुहं पर घिसटते गए...फिर वे ठहर गए, कनपटियों के नीचे कुछ भूरे बालों पर...."सुनो"...उसने कहा.किन्तु इस बार मैंने कुछ नहीं सुना.मेरे होंठ इस बार उसके मुहं पर आए आधे वाक्य पर जम गए.उसका उठा मुहँ निर्वाक-सा उठा रहा.कुछ देर तक मैं साँस नहीं ले सका.हवा बहुत थी, लेकिन हम उसके नीचे थे.हम बार बार साँस लेने के लिए ऊपर आते थे...हाँफते हुए एक दुसरे की और देखते थे...दीखता कुछ भी न था-अधखुले होंठ, ओवरकोट के कॉलर का एक हिस्सा, हम दोनों पर फडफडाता हुआ बेचैन सा स्कार्फ....

बातें बाकी..
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Sunday, February 21, 2016

आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं.. [दिल्ली डायरीज ]

काफी सालों बाद इस शहर में आ रहा हूँ. वैसे ज्यादा साल तो नहीं हुए, बस तीन चार साल ही तो हुए हैं अभी लेकिन ऐसा लगता है जैसे जाने कितना अरसा बीत गया हो. तुम जब तक इस शहर में रही मुझे हमेशा बुलाती रही. कितनी बार रूठी भी मुझसे. गुस्से में लड़ बैठती थी…“तुम्हें अपने शहर से ऐसा क्या लगाव है कि तुम मेरे लिए भी उसे छोड़ नहीं सकते?” और मैं अक्सर तुम्हें ये कहकर बहलाने की कोशिश करता कि बस तीन चार महीने की बात है, फिर हम और तुम एक ही शहर में रहेंगे.” तुमने लेकिन कभी मेरी इस बात का भरोसा नहीं किया. जवाब में कहती थी “यहाँ से हमेशा के लिए चली जाऊँगी तब आना तुम इस शहर में.” देखो नियति का खेल...हुआ भी तो कुछ ऐसा ही न. तुम्हें इस शहर से गए अभी दो महीने ही तो हुए थे कि मेरा तबादला यहाँ हो गया.

दिल्ली में तुम अब नहीं हो, और शायद मेरी ज़िन्दगी में भी. सोचा तो था कि कम से कम इस शहर में तो रहने नहीं आऊंगा. तुम्हारे जाने के बाद शहर के हर कोने से तुम्हारी आवाजें सुनाई देंगी मुझे. आसान नहीं होगा यहाँ के उन्हीं सड़कों पर घूमना जहाँ कभी हम तुम साथ घूमते थे. लेकिन दिल्ली आने का फैसला लेना मेरी मजबूरी थी. होता है न कि कभी कभी आपके पास कोई रास्ता नहीं होता, सिवाए उसके जो सामने हो और हमें ना चाहते हुए भी उसी रास्ते को चुनना पड़ता है. कुछ ऐसा ही हुआ दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला लेने में भी. अब सोचता हूँ तो लगता है सच में मुझे बहुत पहले ही दिल्ली आ जाना चाहिए था. शायद कुछ और हो सकता था.. शायद जो हुआ उसे बदला जा सकता था.. 

आज भी जैसे मुझे तीन साल पहले का वो वक्त अच्छे से याद है जब आखिरी बार इस शहर में आया था मैं. तुम भी थी मेरे साथ. तुम एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरे शहर आई थी और फिर मुझे बिना बताये ही तुमने अपने साथ साथ मेरा भी दिल्ली तक का टिकट बुक करवा लिया था. याद है न तुम्हें? कितनी जिद्दी थी तुम. एकदम इम्पल्सिव. “ये चाहिए तो चाहिए.. तुम्हें चलना है मेरे साथ तो चलना है.” इसके आगे कुछ सूझता भी कहाँ था तुम्हें? कितने हथकंडे अपनाये थे तुमने मुझे अपने साथ दिल्ली लाने के लिए. मेरे ऑफिस में धरने पर बैठ गयी थी कि तुम्हें तो दिल्ली अपने साथ ले जाऊँगी. ब्लैकमेल करना भी तो खूब आता था तुम्हें. कभी खाना पीना छोड़ने की धमकी देती तो कभी मुझसे ज़िन्दगी भर बात न करने की धमकी देती. वैसे इन दोनों बातों में से तुम कर तो कुछ भी नहीं पाती ये मैं अच्छे से जानता था फिर भी तुम्हारी बात मान कर दिल्ली आने के लिए राजी हो गया था. तुम लेकिन मुझे इतने आसानी से कहाँ छोड़ने वाली थी. याद है न पूरे सफ़र के दौरान तुम कैसे चिढ़ाती आई थी मुझे.. “तुम्हें किडनैप कर के दिल्ली ले जा रही हूँ. अब तुम्हें वापस तुम्हारे शहर मैं जाने नहीं दूँगी”.

रास्ते भर मुझे बेवकूफ बनाते, मुझे डराते और मुझसे लड़ते आई थी तुम. तुम जानती थी न कि कैसे मैं तुम्हारी झूठी मुठी नाराजगी से डर जाया करता था. तुम बस इसका फायदा उठाया करती थी. याद है कैसे ट्रेन में तुम नाराज़ हो गयी थी. मैंने ज़रा चाँद की तारीफ़ क्या कर दी थी तुम तो एकदम रूठ गयी थी. हुआ कुछ यूँ था कि रात में बातें करते हुए तुम थक गयी थी और आँखें बंद कर के तुम लेट गयी थी. मेरे हाथ में मेरे प्रिय शायर की किताब थी. ट्रेन की खिड़की के बाहर आसमान में चाँद नज़र आ रहा था. मैंने तुम्हें धीरे से कहा, देखो कितना खूबसूरत लग रहा है वो चाँद. एक शेर सुनाता हूँ उस चाँद के ऊपर. शेर तो तुमने सुन लिया और तारीफ़ भी कर दिया तुमने. लेकिन उसके बाद? उसके बाद कैसे गुस्सा हो गयी थी तुम. उलाहना भरे अन्दाज़ मे तुमनें शिकायत की थी.. “हाँ बस आसमान में लटके उस चाँद की ही तारीफ़ करते रहो तुम..इस अपने इस चाँद को तो देखो भी न जो तुम्हारे सामने है.” मैं तो एकदम जैसे निरुत्तर सा हो गया था. “अरेssरेss....मैं तो...” ही मेरे मुहँ से बस निकल पाया था. सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी मेरी. मैं जान रहा था कि ये तुम्हारी एक नयी बदमाशी है लेकिन फिर भी मैं बेतरह डर गया था. 

वो तो कहो कि अच्छा हुआ एक शेर उसी वक़्त याद आ गया था मुझे... “तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है / तेरे आगे चाँद पुराना लगता है”. थोड़ी खुश हो गयी थी तुम ये शेर सुनते ही. लेकिन हाथ आये इस मौके को इतने आसानी से कैसे जाने देती तुम. उस शेर के अलावा पूरी ग़ज़ल सुनी थी तुमने मुझसे और फिर जाकर कहा था, “चलो अभी के लिए माफ़ करती हूँ लेकिन मेरे बजाये उस चाँद की तारीफ़ करने का जो गुनाह तुमनें किया है न उसकी सजा तुम्हें दिल्ली में मिलेगी...दिल्ली में.”.

ऐसी ही थी तुम. मुझे ना तो कभी ये पता लग पाता था कि किस बात पर तुम गुस्सा हो और न ये कि तुम्हारा गुस्सा कब झूठा मुठा है और कब सच में गुस्सा हो गयी तुम. 

तुम तो इस बात पर भी गुस्सा हो जाती थी कि रेलवे डिपार्टमेंट ने ट्रेन में साइड-लोअर बर्थ क्यों नहीं अलोट किया तुम्हें? जब कभी तुम्हारे कहने पर मैंने तुम्हारा टिकट बुक करवाया है और अगर गलती से भी साइड लोअर बर्थ की जगह कोई दूसरी बर्थ तुम्हें अलोट हो जाती कभी, तब तो मेरी शामत आ जाती थी. बताओ ज़रा, रेलवे डिपार्टमेंट की गलती की सजा भी तुम मुझे ही देती थी. वैसे तुम अब्सेस्ट थी साइड लोअर बर्थ के लिए. साइड लोअर बर्थ ट्रेन के डब्बे के तुम्हें इतने पसंद थे कि तुम कहा करती “यार कोई ऐसा सिस्टम नहीं है कि मैं हर ट्रेन में ये साइड लोअर बर्थ अपने नाम से बुक करवा लूं ज़िन्दगी भर के लिए? रेलवे डिपार्टमेंट उस बर्थ पर रिजर्व का बोर्ड लगा दे मेरे नाम से. मैं जब भी आऊं, मेरे लिए ये बर्थ खाली रहे.कोई और न बैठे.” मेरी जान खा जाती थी तुम इस बात पर. मुझसे कहती “जाओ जाकर पता लगाओ ऐसा कोई सिस्टम है या नहीं.” मैं बात टालने की कोशिश करता तो तुम फिर मुझे ताने सुनाने लगती.. “शाहजहाँ ने मुमताज के लिए ताजमहज बनवा दिया और तुम मेरे लिए ये एक छोटा सा काम नहीं कर सकते? और बातें करते हो ज़िन्दगी भर मेरी ख्वाहिशों को पूरा करने की? डोंट टॉक टू मी..” और तुम फिर गुस्सा हो जाती.

सच में पागल थी तुम!

तुम्हारी उन बातों को और उस ट्रेन के सफ़र के छत्तीस घंटों को याद करते हुए इस बार के पैतालीस घंटे कैसे बीत गए पता भी नहीं चला. रात में पहुँचने वाली ट्रेन सुबह छः बजे दिल्ली पहुँची थी. पूरे नौ घंटे की देरी से.

मैं जानता हूँ अगर ये बात भी तुम्हें बताऊंगा तो तुम खूब हंसोगी. मेरा मजाक भी उड़ा दोगी. जाने कहाँ से तुम्हें वो लॉजिक सुझा था. मैंने जब भी ट्रेन का सफ़र अकेले किया है हमेशा ट्रेन देर से ही रही है..आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी ट्रेन ने मुझे एकदम सही वक़्त पर पहुँचा दिया हो. यहाँ तक कि राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेन भी नहीं. लेकिन जब कभी तुम्हारे साथ मैं आया हूँ तो ट्रेन हमेशा राईट टाइम पर.. राईट टाइम भी ऐसी वैसी नहीं, अगर चार पचपन ट्रेन का वक़्त है तो इधर घड़ी की सुई चार पचपन पर गयी और उधर ट्रेन प्लेटफोर्म पर लगी. ये सच में कमाल का इत्तेफाक था. इत्तेफाक नहीं बल्कि चमत्कार था. मुझे कभी समझ नहीं आया इसके पीछे का लॉजिक. लेकिन तुम तो तुम थी. इसमें भी तुमने एक लॉजिक ढूँढ निकाला था. कहती थी मुझसे “तुम थोड़े खडूस टाइप हो न, एकदम सीरियस और नॉन रोमांटिक. देखो इसलिए ट्रेन तुम्हारे अकेले रहने पर देर करती है” और मैं इस दुनिया की सबसे प्यारी, रोमांटिक, सेंसिबल और इमोशनल लड़की हूँ न. मेरे साथ जब भी आये हो कभी ट्रेन ने देर की? नहीं न? फिर...?

मैं जवाब भी क्या देता तुम्हारी इन बातों का. सच कहूँ तो अक्सर तुम्हारी इन बेवकूफी भरी बातों को मैं एन्जॉय करना चाहता था, इसलिए अक्सर मैं कुछ नहीं कहता तुम्हारे अजीबोगरीब लॉजिक पर. 

पैतालीस घंटे के ट्रेन के सफ़र ने वैसे ही बैंड बजा दिया था मेरा और ट्रेन से उतरने के बाद ठण्ड ने हालत ख़राब कर दी थी मेरी. जब तक ट्रेन पर था ठंड का पता नहीं चल पाया था, लेकिन टैक्सी पर बैठते ही ठण्ड ने जैसे चारों ओर से जकड़ लिया था. दो स्वेटर और एक जैकेट के बाद भी मैं ठिठुर रहा था. मौसम भी तुम्हारे पसंद का था. सुबह का वक़्त, घना कोहरा और ठिठुरने वाली सर्द हवा. 

जैसे जैसे टैक्सी कैनौट प्लेस के आउटर सर्कल से गुज़र रही थी, मुझे याद आ रही थी वो आखिरी शाम जब हम कैनौट प्लेस में घूम रहे थे. सीपी के एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक और फिर तीसरे...जाने कितनी बार हमनें चक्कर लगा लिया था कनौट प्लेस का. ना तुम थक रही थी ना मैं. चलते हुए हम कितनी बातें कर रहे थे. मैं तुम्हें पुराने किस्से सुना रहा था. बहुत पहले के किस्से, बारह साल पहले जब हम और तुम मिले थे तब की बातें.. तुम्हें हमेशा लगता था कि ये असंभव है. सब कुछ ऐसे याद रखना जैसे मैं याद रखता हूँ, हर एक मोमेंट, जो जब हुआ था...जैसे हुआ था. उन सभी बातों को मैं कैसे याद रख लेता हूँ तुम हमेशा हैरान होती थी. तुम कहती थी अगर मैं तुम्हें नहीं जानती तो कभी इस बात पर यकीन नहीं कर सकती थी कि किसी को इतनी बातें इतनी यादें इतने डिटेलिंग के साथ याद रह सकती हैं. 

मेरे लिए लेकिन तुम्हारी बातों को याद रखना बड़ा ही सहज रहा है हमेशा से. कभी कोई एफर्ट नहीं लगाना पड़ा मुझे. कभी ये भी खुद से नहीं कहना पड़ा कि हाँ ये बातें तुम्हारी मुझे याद रखनी है, या इसे नहीं भूलूँगा कभी. बस ऐसे होते गया कि तुमसे जुड़ी छोटी से छोटी बात भी याद रहते गयी मुझे. तीन साल पहले की भी सभी बातें मुझे ठीक वैसे ही याद है जैसे हुई थी, उसी क्रम में. तुम्हारा मेरा कनौट प्लेस में घूमना, सेन्ट्रल पार्क में लकड़ी के बेंच पर एक दूसरे के कंधे पर सर टिकाये बैठे रहना और डूबते हुए सूरज को देखकर तुम्हारा कहना... "दिन ख़त्म हो गया, डूब गया सूरज...." और फिर मेरा तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहना "कल फिर से नयी उम्मीद लिए नयी सुबह आएगी... और वो सुबह हमारी होगी." तुमनें बड़ी विश्वास भरी नज़रों से मुझे देखा था, और कहा था कि मुझे तुमपर यकीन है..तुम कभी मुझे खुद से दूर नहीं जाने दोगे..और मैंने भी तुमसे वादा किया था..कभी दूर नहीं जाने दूंगा तुम्हें.


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टैक्सी पर बैठे और भी कुछ याद आने लगता है, उसी शाम की तुम्हारी और मेरी कुछ और बातें.. लेकिन मैं अब ज्यादा बातें याद करना नहीं चाहता. बस आँख बंद कर के टैक्सी के शीशे से सर टिकाये बाहर देख रहा हूँ.. कनौट प्लेस कब का गुज़र चूका है...टैक्सी के स्टीरियो पर एक खूबसूरत गाना बज रहा है, वही गाना जिसे हम दोनों ने उस आखिरी शाम सुना था वाकमैन पर, और तुमसे मैंने कहा था..डोंट वरी, ऐसे इमोशनल गाने सुनकर मैं सड़कों पर तुम्हारी यादों में इधर उधर फिरता रहूँ, ऐसा वक़्त नहीं आने दूँगा.


आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं... 




बातें बाकी... 


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