Thursday, December 24, 2015

आधी नींद...अधूरे ख़्वाब और एक सुहावना सफ़र

पहले की कड़ियाँ  भाग एक, भाग दो 

शाम गहराने लगी थी.. दोनों टेरेस से नीचे उतर आये थे. बारिश अब जोरदार होने लगी थी. लड़की का मन तो बिलकुल नहीं था वापस आने का लेकिन दोनों को नीचे आना पड़ा. दोनों को प्लेटफॉर्म  के बीचोबीच एक बेंच मिल गयी थी बैठने के लिए. बेंच पर बैठे हुए लड़की ने एक ख्वाहिश लड़के को बताई....तुम पेंटिंग करते हो न, मेरे लिए कभी एक पेंटिंग बनाना तुम...हमारे इस एक पल की पेंटिंग, जब इतने बड़े से स्टेशन की भीड़ में बस एक मैं हूँ और एक तुम, मैं तुम्हारे कंधे पर सिर टिकाये बैठी हुई हूँ. इस एक पल की, और इसी तरह के हमारे अनगिनत पलों की मैं पेंटिंग चाहती हूँ जिसे मैं तुम्हारे और मेरे कमरे की दीवारों पर सजाऊँगी. तुम्हारा और मेरा कमरा...होगा वो? जाने कैसा होगा? लेकिन जैसा भी होगा बहुत खूबसूरत होगा...मैं खूब अच्छे से उस कमरे को सजाऊँगी, लेकिन अगर नहीं हुआ तो...इस एक वाक्य को बोलते बोलते जाने क्यों लड़की की मुस्कान काँपने लगी थी. उसकी झील सी गहरी आँखें अचानक भर आई जिसे लड़के से छिपाने के लिए उसने तेज़ी से मुँह  दूसरी ओर फेर तक दूर किसी अदृश्य चीज़ को दिखा कर हँसना शुरू कर दिया.


लड़का लेकिन उसकी इतनी कोशिशों के बावजूद सब देख गया था. उसके मासूम चेहरे से एक पल के लिए अपनी नज़रें जो नहीं हटाता था वो. इसलिए उसकी हँसी और आंसू दोनों को नज़रंदाज़ करते हुए उसने लड़की का चेहरा जबरदस्ती अपनी और घुमा लिया....बताओ क्या चलने लगा तुम्हारे मन में अचानक??? कितनी अच्छी प्लानिंग तो थी तुम्हारी...अभी पेंटिंग बनवा रही थी तुम, कमरे को सजा रही थी और कमरे को सजाते हुए रुक गयी...आँखों में ये आँसूं कहाँ से आ गए?

लड़की अब तक बड़ी चालाकी से आँखों के बहते आंसुओं को पोंछ चुकी थी, और अपनी नकली हँसी से लड़के को बहलाने की कोशिश कर रही थी. लड़का लेकिन एक पल को भी उसकी चाल में नहीं आया. वो अब भी गंभीर था...समझ तो वो रहा था कि बात क्या है लेकिन फिर भी लड़की से सुनना चाहता था. कुछ देर की नाकाम कोशिश के बाद आखिर लड़की ने हथियार डाल ही दिए. बिना आसपास के लोगों की परवाह किये वो लड़के के सीने में छुप गयी.रुलाई के बीच उसके शब्द लड़के को साफ़ साफ़ सुनाई दे रहे थे....मुझे रोक लो..मैं जाना नहीं चाहती. तुमसे अलग नहीं होना चाहती मैं.

लड़का बहुत बेबस महसूस कर रहा था. काश ! रोक पाता उसको हमेशा के लिए...अपने पास..अपने साथ..पर सच्चाई वो दोनों ही जानते थे. वो तो बस चुपचाप उसके चारों और अपनी बाँहों  का घेरा बनाए उसे सान्त्वना दिए जा रहा था...सब ठीक होगा...हम तुम हमेशा साथ रहेंगे.

कुछ देर उसे चुप कराने की नाकाम सी कोशिश करने के बाद लड़के ने अचानक ब्रह्मास्त्र फेंका..अच्छा अच्छा सुनो, एक मिनट चुप होकर ज़रा मेरी बात तो सुन लो...बेहद इम्पोर्टेंट बात है. लड़की अचानक सुबकियों के बीच खामोश हो उसका मुँह  निहार ही रही थी कि लड़के ने उसी गंभीरता से पूछा...अगर नहाने भर का पानी हो गया हो तो बस करो...टंकी खाली न हो जाए...पहले तो लड़की वैसे ही उसे ताकती रही फिर बात का मतलब समझ आते ही वो सबकुछ भूल खिलखिला पड़ी थी. लड़के का मकसद पूरा हो गया था. उसके हलके हलके घूंसे खाता वो मुस्कुरा रहा था.

वो ग्यारह घंटे कब कहाँ और कैसे फुर्र हो गए, पता ही नहीं चला था. ट्रेन जब तक खुली आधी रात हो चुकी थी. लेकिन दोनों सोना नहीं चाहते थे. एक दूसरे की बातों में खोये दोनों की आँखों से नींदें कोसो दूर थी. नींद के साथ साथ लड़की के मन से ‘कोई क्या सोचेगा’ का डर भी गायब था. लड़के ने एक बार हलके से उसे टोका भी था..मैं अपनी बर्थ पर जाऊं अब? लोग क्या सोचेंगे? लड़की ने पहले तो उसे अजीब तरह से घूर के देखा, फिर उसके सामने हाथ नचा दिया...सोच कर कोई क्या उखाड़ लेगा जी??? मेरी बर्थ..मेरा टिकट..मेरे तुम..कहती हुई वो अचानक थोड़ा शर्मा गई...लड़का बोगी के उस हलके अँधेरे में भी उसके चेहरे की लाली देख गया था. उस दमकते चमकते मासूम से चेहरे वाली लड़की को यूँ छोड़ कर सोना तो लड़का भी नहीं चाहता था, सो चुपचाप उसकी बात मान गया

रात गहराने के साथ साथ कई घंटों की थकी लड़की की पलकें नींद से बोझिल होने लगी थी. पर लड़की भी मानो लड़के के साथ के हर पल को पूरी शिद्दत से जीना चाह रही थी. वो लड़के को नहीं जताना चाह रही थी पर उसी की तरह वो भी जानती थी कि शायद उन दोनों के साथ की यह आखिरी रात होगी. एक तरफ उन पलों में वो दोनों ही बेहद खुश थे, वहीँ हर पल के साथ उन दोनों को ही एक अजीब सी बेचैनी घेरे जा रही थी. लड़का जानबूझकर उसे कोई भी ऐसी बात नहीं करने दे रहा था जो उसे उदास कर दे.. वो उदास बिलकुल अच्छी नहीं लगती, ऊटपटांग बातें करते हुए, अजीबोगरीब लॉजिक झाड़ते हुए ही अच्छी लगती है वो.

बहुत देर तक नींद से लडती लड़की आखिर हारने लगी तो लड़के ने उसे डांट के सुलाना ही उचित समझा. लड़की ने अबकी उसकी बात मान तो ली, पर उसकी एक शर्त थी..वो उसका तकिया होगा...अपने साथ के इन आखिरी पलों में वो उसकी गोद में सर रख कर सोने का सुख महसूस करना चाहती थी. जाने कब से देखा गया अपना एक और सपना पूरा करना चाहती थी. लड़का भी उसके इस सपने से अच्छी तरह वाकिफ था..और कहीं न कहीं वो भी उसके इस सपने को पूरा करना चाहता था. इसलिए लड़की की तरह उसने भी “कोई क्या उखाड़ लेगा” वाला फंडा अपना लिया..

लड़की बेहद तसल्ली से उसकी गोद में सिर रखे उसके हथेली में अपनी हथेली जकड़े गहरी नींद सो गयी थी और उसके उस मासूम चेहरे को निहारते लड़के ने उसके माथे पर से आवारा भटकती जुल्फों को धीरे से उसके कानों के पीछे खोंसा...ऊपर मानो किसी अदृश्य शक्ति की ओर देख अपनी सनशाइन के लिए, अपनी मानसून प्रिंसेज के लिए कोई दुआ माँगी और आँखें मूँद ली...



लड़के को अब कलकत्ता की बाकी कोई बात इतना नहीं याद आती, क्यों कि जब भी वो याद करता है, उसे कलकत्ता का अपना आख़िरी दिन याद आता है...जिस दिन वो और उसकी सनशाइन...दोनों वापस आ रहे थे...| हावड़ा का वो प्लेटफ़ॉर्म...वहाँ बना वो बड़ा सा टेरेस...उस टेरेस से लडकी के साथ हुगली नदी को निहारते हुए लडकी की बकबक से आनंदित होना...वहाँ खड़े होकर उस लडकी के बचकाने-से लगने वाले सपने, उन ख्वाहिशों को सुनना और उनका पूरी गंभीरता से समर्थन कर उसकी आँखों में वो खुशी की चमक देखना...
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