Sunday, October 4, 2015

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बारिश, सनशाइन और कोलकता - कोलकता डायरी


दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी. सारे काम रुके पड़े थे. बाहर आने जाने के सारे कार्यक्रम टल गए थे. यूँ तो उसे बहुत काम थे, लेकिन ये बारिश एक बहाना बन कर आई थी उन कामों से फुर्सत निकालने के लिए. वैसे भी आजकल वो खुद के लिए वक़्त नहीं निकाल पाता, पिछले कुछ महीनों से व्यस्तता जो बढ़ गयी है.. ऐसे में बारिश का यूँ आ जाना उसे बड़ा अच्छा लग रहा था. “मौसम इतना अच्छा है...आज कुछ भी नहीं करना है मुझे. सिर्फ बारिश का आनंद लेना है” उसने खुद से ही कहा और हाथ में कॉफी का कप लिए बाहर टेरेस पे आ गया. आज कितने दिनों बाद वो टेरेस पे आया था, उसे खुद आश्चर्य हो रहा था. यूँ भी पिछले कुछ महीनों से जैसे इस व्यस्तता ने उसका पूरा शेड्यूल ही बदल के रख दिया है. कितनी चीज़ें वो पहले कर लेता था, फ़िल्में, किताबें और गजलों में उसकी रातें बीतती थी, अब तो रातें सिर्फ कंपनी के डाक्यूमेंट्स तैयार करने में निकल जाती हैं. लेकिन आज वो बिलकुल फुर्सत में था. बाहर होती बारिश, प्लेलिस्ट पर लगी गुलाम अली की ग़ज़लें और पुराने कुछ एल्बम जिसे उसने आज कई दिनों बाद अलमारी से निकाला था, ये सब उसे फिर वापस उसके पुराने दिनों में ले जा रहे थे, जो उसके सबसे प्यारे दिन थे. एलबम के ऊपर ही तो लिखा था उसने कभी, ब्रायन एडम्स के गाने की एक लाइन... “दोज वर द बेस्ट डेज़ ऑफ़ माय लाइफ..”.


आज जाने क्या क्या उसे याद आने लगा था, बहुत पहले की कई सारी बातें... उसका वो पुराना घर, बारिश के मौसम में घर के आगे की सड़क पर वाटरलॉगिंग की समस्या, उसके दोस्त जिनके साथ वो घर के पास के मैदान में बारिशों में क्रिकेट खेलता था और जिसकी वजह से घर में माँ से डांट सुनता था. उसे अपनी उस साथी की भी याद आ रही है जिसे वो प्यार से अपनी `सनशाइन' कहता था और बारिशों में प्यार से `मानसून प्रिंसेज'. एल्बम की पहली तस्वीर उसकी मानसून प्रिंसेज की ही थी, जिसे उसने कोलकता के `प्रिन्सेप घाट' पर तब खींचा था जब वे दोनों एक साथ कोलकता घूमे थे. उस तस्वीर को देखकर लड़के को एकदम हँसी आ गयी. कितनी शैतानी की थी इस लड़की ने उस दिन, सेल्फी लेने का फैशन आज का है लेकिन इस लड़की ने आज से दस साल पहले ही अपने पुराने याशिका के कैमरे से सेल्फी लिया था. दोनों बैठे हुए थे कोलकता के प्रिन्सेप घाट पर, लड़का कितना मना करते रहा था उसे...अरे इतने क्लोज अप से ली गयी तस्वीर में मैं हमेशा कॉन्शेस हो जाता हूँ, तस्वीर बेकार निकलती है, लेकिन लड़की ने उसकी एक नहीं सुनी थी... और फिर कुछ दिन बाद जब तस्वीर बन कर स्टूडियो से आई थी तो लड़की ने उस तस्वीर पर ग़ालिब का एक शेर लिख दिया था. “कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं / इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय “. वो तस्वीर और उसके नीचे लिखे इस शेर को देखकर लड़के को कोलकता के उन दो दिनों की तमाम बातें याद आने लगी जब वो अपनी मानसून प्रिंसेज के साथ, अपनी सबसे अच्छी दोस्त के साथ, दिन भर कोलकत्ता के सड़कों पर घूमता रहा था. वैसे तो आठ साल बीत गए लेकिन फिर भी मानो जैसे लड़के की ज़हन में वो बातें अब भी वैसी ही ताज़ा है जैसे कल की बात हो कोई.


ऐसी ही बारिश उस दिन भी हो रही थी जैसे आज हो रही. पूरे दिन हलकी बारिश होते रही थी और वे पूरे दिन भीगते हुए शहर घूमते रहे थे.

कोलकता , जो लड़के के लिए अंजान सा शहर था वहीँ लड़की उस शहर से बहुत अच्छे से वाकिफ थी. लड़की का जन्म उसी शहर में हुआ था लेकिन बाद में उसके पिता का तबादला हो गया और वो लड़के के शहर में रहने आ गयी. लड़के को उन दिनों कोलकता में काम लगा ही रहता था, और लड़की भी हर चार पाँच महीने में एक बार तो जाती ही थी अपने शहर. लेकिन ऐसा कभी इत्तेफाक नहीं हुआ कि दोनों एक समय पर ही कोलकता में रहे हों, हाँ दोनों की सबसे बड़ी ख्वाहिशों में से एक ये भी थी..कि कभी इत्तेफाक हो कि दोनों एक ही समय कोलकता में रहे और एक साथ कोलकता घूमें. दोनों प्रार्थना करते कि ये ख्वाहिश उनकी पूरी हो. वैसे तो उन दोनों की बहुत सी ख्वाहिशें अधूरी रह गयी थी लेकिन छोटी छोटी ख्वाहिशें अकसर पूरी भी हो जाती थी और वो भी इतने अजीबोगरीब तरीके से कि दोनों हैरान रह जाते थे.

जुलाई का महीना था वो, लड़की महीने भर के लिए अपने घर चली गयी थी और इसी बीच लड़के का एक काम कोलकता में निकल आया था. लड़का बड़ा उत्सुक था उसे यह खबर सुनाने के लिए, लेकिन ये खबर लड़की को जाने कैसे पहले ही मिल चुकी थी. लड़की की माने तो वो अपने कई “जासूस” लड़के के आसपास छोड़े रहती थी जिससे लड़के की पल पल की जानकारी लड़की को मिलते रहती थी. लड़के ने फोन पर जैसे ही कहा, तुम्हारे लिए खुशखबरी है, उधर से लड़की चहकती हुई बोली – जानती हूँ मिस्टर...जानती हूँ, आप कोलकता आ रहे हैं अगले सप्ताह. लड़के के बस इतना बोलने भर की देर थी, शुक्र है, मेरी दुआ कबूल तो हुई. लडकी ने तुरंत फोन पर ही मुँह बिचका दिया...सुनो मिस्टर, ये तुम्हारी नहीं, मेरी दुआओं का असर है...तुम फ़ालतू में क्रेडिट न लिया करो. लड़का हँस पड़ा. वो उसकी ऐसी बातों को बिना विरोध के चुपचाप स्वीकार कर लेता. उसके बाद लडकी का चहकन जैसे किसी मंदिर की घंटियों की तरह बस उसके कानो में रस घोलती रहती. लड़के का दिल ऐसे में चुपके से एक दुआ और मांग लेता...लड़की का ये चहकना कभी बंद न हो. लडकी का यह बचपना कभी न बड़ा हो....वो बड़ी होकर बिलकुल अच्छी नहीं लगती.

दोनों के पास तीन दिन का समय था, लेकिन तीन दिन बस नाम के थे, पहला दिन जिस दिन लड़का कोलकता पहुचने वाला था, वो पूरा दिन तो काम में ही निकल जाएगा, दूसरे दिन वो लड़की से मिलेगा और तीसरे दिन दोपहर बारह बजे की गाडी थी. लड़की इस बात से थोड़ी उदास हो गयी थी, लेकिन फिर भी दोनों खुश थे कि साथ में हैं कोलकता में, चाहे वो एक दिन का ही साथ क्यों न हो. एक दूसरे के साथ बिताए हुए कुछ लम्हें भी उनके लिए हमेशा बहुत महत्वपूर्ण होते थे, इसलिए चाहे एक दिन ही सही दोनों साथ तो रहेंगे, इस एक बात से दोनों बड़े खुश थे. दोनों ने साथ घूमने का प्लान बनाया. लड़का तो शहर से अंजान था, सारा प्लान लड़की ने ही बनाया. लड़के को एक दिन पहले ही फोन पर हिदायत मिल गयी थी लड़की से... सुनो मिस्टर..तुम सुबह नौ बजे मेरे घर पहुच जाना, मेरे साथ तुम ब्रेकफास्ट करोगे और फिर हम घूमने निकल जायेंगे...”. अब लड़की ने आदेश दे दिया था जिसे लड़के को हर हालत में मानना ही था. उसने धमका भी जो दिया था लड़के को.. “जानती हूँ..जानती हूँ तुम्हें बहुत काम है लेकिन ख़बरदार जो आने में नौ बजे से ज़रा भी देर की...शार्प एट नाइन आई विल बी वेटिंग फॉर यू...” हालाँकि लड़की के घर आकर ब्रेकफास्ट करने की बात सोच कर लड़का थोड़ा तो असहज हो गया था लेकिन ये लड़की का आदेश था, उसके पास उसकी बातों को उसके आदेशों को मानने के सिवा दूसरा कोई चारा भी नहीं था.

लड़की का घर बिलकुल एक ट्रेडिशनल बंगाली स्टाइल का बहुत पुराना लेकिन बड़ा खूबसूरत घर था. सामने छत के पूरे एक हिस्से पर एक कतार में बैगनी रंग के फूल लगे थे जो नीचे बालकनी तक लटक रहे थे. सिर्फ इन फूलों की वजह से उस पूरे सड़क में उसका मकान अलग दीखता था. दूर से ही पहचान में आ जाता. लड़का जो पहली बार आ रहा था, उसने दूर से ही मकान देखकर पहचान लिया था. लड़की ने पहले भी जाने कितनी बार कहा था, तुम बस मेरे मोहल्ले में कदम तो रखो...मेरा घर सामने दिख जाएगा तुम्हें...सबसे अलग, सबसे सुन्दर....जैसे मैं. मैं भी तो तुम्हें दिख जाती हूँ न दूर से ही, भीड़ में भी पहचान लेते हो मुझे, देखना वैसे ही तुम मेरे घर को भी पहचान लोगे. लड़का उसे छेड़ने के लिए कह देता, हाँ क्यों नहीं...जैसे तुम एंटिक पीस वैसे ही तुम्हारा घर भी होगा, एकदम एंटिक पीस. उसका घर लेकिन सच में उस पूरे सड़क में सबसे अलग दिख रहा था. घर के नज़दीक जैसे ही वो आया, सामने लड़की दिखी जो अपने लॉन के झूले पर बैठे हुए एक किताब हाथों में लेकर उसके आने का इंतजार कर रही थी. गेट के पास पहुँच कर बिना हाय हेल्लो किये उसने लड़की को छेड़ने के इरादे से कहा, “क्या बात है? लगता है किसी चौकीदार की तरह तुम बाहर बैठ कर घर की रखवाली कर रही हो या मेरा इंतजार हो रहा था???” लड़की ने भी फट से नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा.. “नौ बजे आना था न आपको.....साढ़े नौ आये हो.. बोलो मर्डर कर दूँ तुम्हारा?“. लड़का भी कहाँ चुप रहने वाला था.. “अच्छा जी, आप कर ही दो मर्डर, आपके शहर में आये हैं...जो चाहे वो कर लो..”. लड़की का नकली गुस्सा भी काफूर हो गया. दोनों एक साथ हँस पड़े.

लड़की के दादा और दादी घर पर थे जिन्होंने लड़के का बड़े अपनेपन से स्वागत किया. लड़की अपने दादाजी के बेहद करीब थी और उनकी बेहद लाडली भी. उसके दादा थे भी बड़े सुलझे दिल वाले व्यक्ति और बेहद बातूनी. वो लड़के से बातें करने लगे...पुराने ज़माने की, कब वो इस शहर में आये, कैसे ये घर बनाया, अपने घर परिवार की बातें और जाने क्या क्या. पूरा घर घुमाया उन्होंने लड़के को... लगभग सारे फर्नीचर पुराने ज़माने के थे घर में, वो सब के बारे में बड़े विस्तार से लड़के को बता रहे थे. एक बेहद पुराना आईना दिखा, जिसे देखकर लड़की ने लड़के के कानों में धीरे से कहा , ये देखिये साहब, बचपन से इसी आईने के सामने खड़े होकर खुद को संवारते आई हूँ, मुझे खूबसूरत इसी आईने ने बनाया है. चमत्कारी आईना है ये. लड़के ने इस बात का जवाब देना चाहा लेकिन सामने दादाजी खड़े थे, वो बस मुस्कुरा के रह गया.

बँगला, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य की किताबों से मकान का एक कमरा भरा पड़ा था, जिसे लड़की के दादा लड़के को दिखाने लगे. लड़की तो जैसे इस मौके के ताक में थी. कमरे में घुसते ही उसने अपने दादा को कहा.. “दादू..आप तो बस इस लड़के पर नज़र रखियेगा, बहुत बड़ा आशिक है ये साहित्य का..कहीं किताबें जेब में भर के न ले जाए.” लड़के ने आँखें तरेर के लड़की को देखा. उसके दादा हँसने लगे. शुरू के आधे एक घंटे में ही इतना अपनत्व मिला लड़के को कि जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी. वो शायद इसी वजह से लड़की के घर आने में थोडा झिझक रहा था कि जाने उसके दादा दादी क्या सोचे. ब्रेकफास्ट के समय उसने धीरे से लड़की के कानों में कहा भी, यहाँ आना बड़ा अच्छा लग रहा है..मैं बेवजह कॉन्शेस हो रहा था. लड़की उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई और फिर कुछ विजयी अंदाज़ में अपने कुर्ते के कॉलर को गर्वीले भाव में हिलाती बोली," टोल्ड यू न..."

लड़की के घर पूरे बंगाली स्टाइल का ब्रेकफास्ट(जो कि ब्रेकफास्ट कम लंच ज्यादा लग रहा था) के बाद वे नेशनल लाइब्रेरी की तरफ निकल आये थे, जो कि लड़की के घर से नज़दीक ही था. रास्ते में लड़का उससे ये पूछने की हज़ार कोशिश करता रहा कि ब्रेकफास्ट घर में किसने तैयार किया था. लड़की लेकिन अपनी बात पर अडिग रही..कि ब्रेकफास्ट उसने ही बनाया था. लेकिन लड़के को इस बात पर ज़रा भी भरोसा नहीं था. इतने स्वादिष्ट पकवान वो खुद बनाई है इस बात पर यकीन करना लड़के के लिए थोडा मुश्किल था. यकीन होता भी कैसे लड़के को? उन दिनों चाय और मैगी बनाने के सिवा लड़की को सिर्फ आलू के पराठे, जो कि गोल कम और भारत का नक्शा ज्यादा दीखते थे, बस यही बनाने आते थे. लड़के ने लड़की को छेड़ने के इरादे से एक सवाल किया, “अच्छा ये बताओ, वो जो सन्देश और रसगुल्ले थे वो भी तुमने बनाये थे क्या?”. लड़की आँख तरेरते हुए कहती है.. “शेफ समझे हो क्या तुम मुझे? वो बाज़ार से आये थे...”. लड़का फिर से छेड़ने के इरादे से कुछ पूछना चाहता है इससे पहले ही लड़की वार्निंग देते हुए कहती है, कोई भी ऐसा वैसा सवाल अब किये वो यहीं ऑटोरिक्शा से उतार के पिटाई कर दूंगी तुम्हारी...बस अक्ल ठिकाने आ जाएगी ” लड़का चुप हो गया. उसने चुप रहना ही उचित समझा, वैसे भी लड़की का भरोसा नहीं. वो कुछ भी कर सकती है.

नेशनल लाइब्रेरी दोनों दोपहर में पहुँचे थे. वहां लड़की के कोई रिश्तेदार काम करते थे जिससे पास लेने में ज्यादा दिक्कत नहीं आई. लड़की शायद नेशनल लाइब्रेरी बहुत बार आ चुकी थी.. वो इस जगह के बारे में एक कुशल गाइड की तरह लड़के को सब कुछ बता रही थी. नेशनल लाइब्रेरी के अन्दर घूमते हुए लड़की उस जगह की जाने कितनी कहानियां उसे सूना रही थी. डरावनी कहानियां...भुत प्रेतों की कहानियां. उसने बताया कि नेशनल लाइब्रेरी सिर्फ लाइब्रेरी होने के वजह से ही नहीं बल्कि शहर के सबसे चर्चित हॉटेड हाउस होने के वजह से भी मशहूर है. यहाँ रात में एक औरत की आत्मा भटकती है. वो लड़के को किसी सीक्रेट चैंबर के बारे में बताने लगी जो लाइब्रेरी में है. पहले तो लड़के ने उसकी बात को मजाक में टाल दिया, लेकिन लड़की सिरिअस थी. उसने बताया कि कैसे रातों में यहाँ जिसने ये लाइब्रेरी बनवाया था उसकी बीवी के क़दमों की आहट सुनाई देती है. लड़की ने एक और प्रचलित कहानी सुनाई, कि जिस औरत की आत्मा यहाँ भटकती है उसे सभी चीज़ों को उसके जगह पर रखने की आदत थी. जब भी कोई व्यक्ति यहाँ अकेले किताब पढ़ रहा होता है और किताबों को वो ठीक शेल्फ पर नहीं रखता तो उसे वो औरत उस व्यक्ति को अपने होने का एहसास करवाती है. लड़का थोड़ा सहम गया. वो हालांकि डर तो नहीं रहा था लेकिन फिर भी जाने कैसे ऊसके मुहं से अचानक निकल पड़ा कि चलो चलते हैं यहाँ से. बस फिर क्या था..लड़की को तो वैसे भी मौका चाहिए होता है, और वो मौका उसे मिल गया, “साहब..आप डर गए?? ..अरे रे...डरिये नहीं..मैं हूँ न आपके साथ. आपको कुछ नहीं होने दूंगी..अरे बहुत याराना है अपना आत्माओं से..और तो और सुना है शरीफ आत्मा है वो, किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया उसने, और क्या पता वो सुन्दर हो और आपको डराने के बजाये आप पर लाइन मारने लगे..”. लड़की की बे सिरपैर वाली बातें सुनकर लड़का थोड़ा झेंप सा गया और फिर हंसने लगा.

लाइब्रेरी के अन्दर लड़की को बैठने की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, वो तो लाइब्रेरी के लॉन में टहलना चाहती थी, बाहर सीढ़ियों पे बैठना चाहती थी. फुहारों में भीगना चाहती थी. लड़का दो पल सोचने लगा, बाहर टहलने का इरादा सही है या नहीं. लेकिन लड़की बाहर लॉन में टहलने की जिद पर अड़ी रही.. “अरे हुज़ूर ये बादल आपकी मानसून प्रिंसेज के बड़े अच्छे दोस्त हैं, एग्रीमेंट है इनका मेरे साथ... जब मैं चाहूंगी तभी बारिश होगी...तुम्हें क्या लगता है? आज बारिश अपने मर्जी से हो रही है? नहीं साहब...ख़ास आज के लिए मैंने प्लान बनाया है, बादलों को पहले से हिदायत मिल गयी थी मुझसे, कि दिन भर हलकी फुहार होते रहे और हम बारिश में भीगते रहे..अब चलो मेरे इस प्लान की बैंड न बजाओ तुम. लड़का लड़की की ऐसी प्यारी जिदों को मुस्कुराकर स्वीकार कर लेता. दोनों बहुत देर तक नेशनल लाइब्रेरी के लॉन में टहलते रहे. लड़की उसे इस जगह से जुडी अपनी यादें बताती रही और लड़का लड़की की बातों में खो सा गया. हलकी फुहारों में भीगना, लड़की का हाथ थामे नेशनल लाइब्रेरी के लॉन में टहलना उसे बहुत सुकून दे रहा था. बहुत देर तक दोनों नेशनल लाइब्रेरी के सीढ़ियों पर बैठे रहे थे. मन ही मन लड़का दुआ करता कि ये पल बस थम सा जाए यहीं.

नेशनल लाइब्रेरी के बाद लड़की उसे जाने कहाँ कहाँ घुमाती रही.. पूरा वो इलाका, वहीँ वो बड़ी हुई थी...कितने दुकान वालों से तो उसके परिचय थे. सड़क पर टहलते हुए वो कभी कभी लड़के को धमका भी देती, मेरे शहर में आये हुए हो और वो भी मेरे इलाके में...जैसा मैं कहूँ वैसा करते चलो बस..वरना उठवा लूँगी तुम्हें. विक्टोरिया मेमोरियल, काली घाट, प्रिन्सेप घाट जो उसकी सबसे प्रिय जगह में से एक थी... प्रिन्सेप घाट जो कि जाने कितने वजहों से लड़की के दिल के बेहद करीब रहा लड़की उसे वहां ले आई थी. इस जगह लड़का पहले कभी नहीं आया था. इतना शांत, इतना खूबसूरत जगह कि लड़के को पहली नज़र में ही प्यार हो गया था उस जगह से. प्रिन्सेप घाट पर टहलते हुए लड़की अपनी एक और ख्वाहिश की बात करने लगी, जो थोडा तो फ़िल्मी थी लेकिन बेहद प्यारी ख्वाहिश थी वो उसकी. सोचो ज़रा, काश कभी ऐसा हो बारिश होती रहे दिन भर और हम तुम भीगते हुए शहर घूमते रहे वो जैसे अमिताभ और मौशमी चैटर्जी घूम रहे थे न उस फिल्म में, वो गाना था न “रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन...” ठीक वैसे ही. बस शहर मुंबई की जगह कोलकाता हो और अमिताभ के जगह तुम...वैसे ही कोट टाई पहने और मौसमी चटर्जी की जगह मैं, साड़ी में. लड़के ने कहा, तुम बस ऑब्सेस्ड हो उस गाने से. लड़की ने जवाब दिया... “बारिश में भीगते हुए छप छप कर पैरों से पानी उड़ाते दोनों पूरा शहर घूमे थे...यू नो इट्स द मोस्ट रोमांटिक थिंग टू डू. लड़के ने उसका हाथ अपनी हाथों में ले लिया, उसके माथे को चुमते हुए कहा उसने, वो है या नहीं मोस्ट रोमांटिक थिंग टू डू ये मैं नहीं जानता, लेकिन ये पल, ये मोमेंट हमारे...मेरे लिए तो यही प्यार के पल हैं.. द मोस्ट रोमांटिक मोमेंट फॉर मी इज राईट नाउ...दिस मोमेंट.....

वो जुलाई की आखिरी शाम थी लड़की के साथ प्रिन्सेप घाट पर बैठकर सनसेट देखना, ये सबसे सुखद था. वे अनमोल पल अपनी पूरी अमिटता के साथ लड़के की दिलो दिमाग पर हमेशा के लिए अंकित हो गया था.

सूर्यास्त के समय दोनों का मन थोड़ा बोझिल हो गया था, दोनों ये बात जानते थे कि बस यही एक दिन था उनके पास जो अब खत्म होने को आया था. लड़की अपने घर चली जायेगी, और लड़का वापस रेलवे स्टेशन. प्रिन्सेप घाट पर लड़के के कंधे पर सर रख कर लड़की ने फिर एक दुआ मांगी, काश कल की ट्रेन हमारी कैंसल हो जाए या कोई भी ऐसा चमत्कार हो कि बस एक..सिर्फ एक और दिन हम साथ रहे. लड़का उसकी इस नादानी पर मुस्कुराने लगा. वो कुछ कहता इससे पहले ही लड़की ने समझ लिया क्या कहना है उसे, और फिर मुँह बिचकाते हुए कहती है, तुम जानते ही क्या हो मिस्टर? चमत्कार हमारे आसपास होते रहते हैं. यूं जस्ट हैव टू बिलीव इन मिरेकलस. इस बार शायद लड़का भी लड़की की इस नादानी पर विश्वास करना चाहता था..लड़की का हाथ अपने हाथ में लिए दूर ढलते हुए सूरज को देखकर उसने भी एक दुआ मांगी, बस एक..सिर्फ एक और दिन हमें साथ रहने का मौका मिल जाए...काश..!”


लड़की लगातार गुनगुना रही थी और लड़के के कानों में लड़की की आवाज़ गूंज रही थी...
पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल
पहले भी यूँ तो भीगा था आँचल
अब के बरस क्यों सजन,
सुलग सुलग जाये मन




...जारी

3 comments:

  1. कुछ अमिट से सुखद पल सच में हमेशा के लिए दिलो-दिमाग पर अंकित हो कर रह जाते हैं...| भुलाए नहीं भूलते, और सच कहूँ तो उन पलों को कभी भूलना चाहिए भी नहीं...| कई बार किन्हीं अनजान...सुनसान राहों में कोई रास्ता इन्हीं से होकर हमे मंजिल तक पहुँचा देता है...|

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  2. अच्छी कहानी .......... सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

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