Tuesday, February 24, 2015

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तुम्हारी ख्वाहिशें..


तुम्हें याद तो है न तुम कितनी ऊट-पटांग हरकतें कभी करने लगती थी. किसी गाने को सुनकर उसमें कही बातों को इतना सिरिअसली ले लेती थी कि तुम्हें समझाना मुश्किल हो जाता था. गुलज़ार की वो नज़्म तो याद होगी ही तुम्हें? “एक दो चाँद से कूदे..” जनवरी की वो आखिरी शाम थी जब हम दोनों देर तक एक नए शहर के रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे थे, अपने शहर वापस जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे और उस शाम तुम्हें मैंने ये नज़्म पहली बार वाकमैन पर सुनाया था. तुम्हे ये नज़्म बहुत पसंद आई थी. कैसे बच्चों जैसी जिद करने लगी थी तुम कि “चलो न चाँद पर चलेंगे, वहाँ से कूदेंगे....” पहले तो मैं समझ नहीं पाया. मुझे लगा हमेशा की तरह तुम्हारा बस ये मजाक है...यूँहीं बेवजह मुझे सताने के लिए ये जिद लेकर बैठ गयी... थोड़ा झल्ला भी गया था मैं. लेकिन तुम अपने जिद पर कायम थी. तुम तब तक नहीं मानी जब तक मैंने तुमसे ये वादा नहीं किया कि एक दिन हम जरूर चाँद पर जायेंगे. सोचता हूँ अकसर मैं कितनी लड़कियां होंगी तुम्हारी जैसी जो इस तरह की जिद लेकर बैठती होंगी. तुम्हारी ऐसी बातें तुम्हारे ऐसे बेवकूफिपना वाले जिद तुम्हारे सपनों की दुनिया का हिस्सा थे...तुम्हारे सपनों की एक अलग ही दुनिया थी. तुम्हारी ख्वाहिशों की भी एक अलग दुनिया थी.  एकदम जुदा और अजीब ख्वाहिशें थीं तुम्हारी, कुछ तो बेहदं प्यारी सी तो कुछ बेहद वीयर्ड.

तुम्हारे पास एक डायरी थी, जिसमें तुमने अपनी सारी ख्वाहिशें लिखती थी. सारे अजीबोगरीब और पागलपन वाली ख्वाहिशें तुम्हारी उसमें थे. वो डायरी तुम्हारे पास हमेशा रहती थी, तुम कहीं भी जाओ तुम उस डायरी को अपने संग रखती थी. उस शाम रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठकर अपनी उस डायरी में तुमने ये ख्वाहिश भी जोड़ दी थी, “चाँद से कूदना..,"

एक डायरी तुमने मुझे भी खरीदवा दी थी, जिसमें मुझे भी अपनी ख्वाहिशें लिखने को तुमने कहा था. लेकिन मेरी ऐसी कोई ख़ास ख्वाहिशें या विशेज थी भी नहीं जो मैं उसमें लिखता. तुम्हारी तरह तो ख्वाहिशों की लिस्ट तो बिलकुल भी नहीं थी मेरे पास. तुमने तब खुद ही मेरी डायरी में ख्वाहिशें लिखना शुरू कर दिया था. जो भी ख्वाहिश तुम अपनी डायरी में खुद के लिए लिखती, ठीक वही ख्वाहिशें मेरी डायरी में तुम लिख दिया करती थी. कभी जो तुम्हें टोकने की जुर्रत करता,  कि तुम क्यों मेरी डायरी में अपनी सभी स्टुपिड ख्वाहिश लिख देती हो, तुम नाराज़ हो जाती थी और फिर बाद में बड़े प्यार से खुद ही मुझे समझाने लगती. देखो, यु=मी न? , तो मेरी ख्वाहिशें = तुम्हारी ख्वाहिशें वाला हिसाब किताब मुझे समझाने लगती तुम.


मुझसे अगर पूछो तो मुझे तो तुम्हारी सभी ख्वाहिशें एकदम अनोखी और अजीब लगती थी, लेकिन तुम्हारी कुछ ख्वाहिशें थीं जो वीयर्ड होते हुए भी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी. कभी कभी तो तुम उन ख्वाहिशों के जरिये मुझे अपने साथ पता नहीं कल्पनाओं के किस दुनिया में ले जाया करती थी.

एक तुम्हारी सबसे अलग सी विश जो तुमने लिखा था अपनी और मेरी डायरी में वो थी... टाईममशीन के जरिये पुराने दिनों में वापस जाना. ये ख्वाहिश वैसे तो बहुत से लोगों की हो सकती थी लेकिन इसके साथ तुमने इस ख्वाहिश को जिस तरह से डिस्क्राइब किया था, वो बिलकुल अलग सी और अनोखी थी. तुम्हारे पास एक पूरा प्लान तैयार था.

तुमने तो रिजर्व बैंक भी लूटने तक का ख्याल बना लिया था. कहा करती थी... उन दिनों के पुराने नोट्स रिजर्व बैंक में तो रखे मिल जायेंगे न हमें? तो जाने से पहले हमें वो भी अपने कब्ज़े में करना होगा. वे रुपये निकाल कर उसे अपने साथ ले जायेंगे. दो बहुत क्लियर लॉजिक थी तुम्हारी इस बात के पीछे, पहला तो ये कि आज के नोट उस ज़माने में चलेंगे नहीं, और दूसरा ये कि "जब आज के नोट उस ज़माने में नहीं चलेंगे तो हम क्या खाली हाथ जायेंगे वहाँ??ना..कभी नहीं.....हमें बैंक लूटना ही होगा..और पुराने दिनों के पैसे लेकर चलना ही होगा, दूसरा कोई ऑप्शन  नहीं है", तुम कहती थी.


तुम वापस उन दिनों में जाने की बात से ही बहुत इक्साइटड हो जाया करती थी. कहती मुझसे  "सोचो हम अगर उन दिनों में चले जायेंगे, तो हमारे कपड़े, यहाँ तक कि शक्ल सूरत देखकर भी उस समय के लोग बड़े हैरान होंगे, वे हमें एलिएंस समझेंगे. हम वहाँ उन दिनों में पहुच कर वहाँ के लोगों को बर्गर, पेस्ट्री और पिज़्ज़ा खिलाएंगे. उन्हें स्मार्टफोन और लैपटॉप दिखाकर हैरान कर देंगे. वो हमें जादूगर समझेंगे. हम उन दिनों में जाकर अपने अपने पसंदीदा फिल्मस्टार से भी मिलेंगे, उन्हें उनकी भविष्य में आने वाली फ़िल्में दिखाएँगे, वो चकित हो जायेंगे. वो जाने क्या समझेंगे हमें. हम उन दिनों में जाकर लोगों से ये भी कहेंगे, कि जितना अधिकतर लोगों का एक महीने का वेतन होता है, अपने ज़माने में हम तो कभी कभी उतने पैसे एक दिन में क्या एक घंटे में खर्च कर देते हैं. वो अजीब आश्चर्य में आँखें फाड़ के हमें देखेंगे हमारी बातों को सुनेंगे". इस तरह के जाने कितने ही प्लान तुम्हारे मन में पहले से तैयार थे.

तुम टाइममशीन के जरिये वापस अपने घर भी जाना चाहती थी, अपनी माँ को तुम उनके बचपन में देखना चाहती थी. तुम् अपनी परनानी को देखना चाहती थी, जिनकी न जाने कितनी कहानियां तुम अपनी माँ और नानी के मुहं से सुन चुकी थी. तुम उस दिन में वापस जाना चाहती थी जिस दिन तुम्हारा जन्म हुआ था, तुम मेरे बचपन को भी देखना चाहती थी. तुम मेरी माँ को भी उनके स्कूल और कॉलेज के दिनों में जाकर देखना चाहती थी. अक्सर तुम मेरी माँ की पुरानी तस्वीरों को देखकर कहा करती थी कि आंटी कितनी सुन्दर थी कॉलेज के दिनों में,  काश मैं आंटी जैसी सुन्दर होती. तुम चाहती थी कि तुम चुपचाप जाकर उन पुराने दिनों में अपनी माँ के आसपास कहीं बैठ जाओ, वो जहाँ जाएँ तुम उनके साथ साथ वहाँ जाओ. वो क्या कर रही हैं, क्या बातें कर रही हैं, किन लोगों से मिल रही हैं वो सब देखो तुम.

लेकिन जहाँ तुम्हारी ये ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारे मन में एक बात और अटकी रहती थी,  जो की मेरे हिसाब से भी एक वैलिड पॉइंट था. तुम कहती मान लो, जैसे मैं प्लान बना रही हूँ भविष्य में जाने की, वैसे ही कोई भविष्य का इंसान अभी इस वक़्त हमारे बीच मौजूद हो तो? और जैसे मैं सोच रही हूँ कि अपनी माँ के आगे पीछे घूमते रहने की बात, उनकी हर एक चीज़ को नोटिस करने की बात वैसे ही कोई हमारे बीच ही हो और हर पल हमें वो देख रहा हो. ये कहने के बाद तुम हर एक पर शक करने लगती...तुम्हें क्या लगता है? वो हो सकता है? देखो उसे...या वो लड़की जो हमें लगातार देख रही है? क्या लगता है तुम्हें? कुछ समय के लिए तुम्हारे इस खेल में मैं भी जुड़ जाता था और अपने इनपुट देने लगता.

तुम अपनी इस ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस थी, ऐक्चूअली इसी ख्वाहिश को लेकर नहीं, बल्कि तुम अपनी सभी ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस रहती थी. तुम्हें अपनी इन ख्वाहिशों पर मजाक करना पसंद नहीं था. जहाँ तुम्हारी ये टाईममशीन के जरिये वापस पुराने दिनों में जाने वाली ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारी एक और बड़ी ख्वाहिश थी जिसका जिक्र लगभग हर शाम मुझसे तुम करती थी. तुम्हारी एक अनोखी किताब की ख्वाहिश और फ़िल्में बनाने की ख्वाहिश. आज की शाम तुम्हारे इस ख्वाहिश के नाम कर रहा हूँ, अगली ख्वाहिश तुम्हारी अगले किसी शाम में.

...


आ चल डूब के देखें  एक दो चाँद से कूदें..

आँखों की कश्ती में रात बिताई जाए
झीलों के पानी से नींद बिछाई जाए

चल दरिया बाँध ले पैरों से
चल सनसेट के रंग पहने तन पे,
बुद्धम शरणम् गाए

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें

चल जेबें भर ले तारों से..दाने छिटकाते चलें,
चल मफलर पहन के बादल के बारिश बरसाते चले

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें
चलो न कूदें


4 comments:

  1. हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी... बहुत बढ़िया लिखा है आपने, पढ़ते-पढ़ते हम भी उसी जगह पहुंच गए थे।

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  2. बहुत बढ़िया।

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  3. बहुत ही अच्छा आपने लिखा हैं मैं आपके लेख को पढ़ कर बहुत ही हर्षित हुआ। gk in hindi----gk in hindi ----gk in hindi

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  4. बहुत ही अच्छा आपने लिखा हैं मैं आपके लेख को पढ़ कर बहुत ही हर्षित हुआ। gk in hindi----gk in hindi ----gk in hindi

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