Wednesday, December 24, 2014

गिरहें यादों की...

वो एक धूप का दिन था. कई दिनों बाद उस दिन धूप निकली थी. वैसे उन्हें तो सर्दियों के मौसम में धूप से कुछ ज्यादा प्यार न था, लेकिन फिर भी कभी कभी जाड़ों की नर्म धूप में उन्हें घूमना टहलना, पार्क में बैठकर सैंडविच खाना पसंद था.

बस के अन्दर बैठा वो खुश था ये सोच के कि आज वे बहुत देर तक पार्क में बैठ सकेंगे. वो यही सोच कर बस से उतरा था कि वो सीधा पार्क चले जाएगा, लेकिन हवा ठंडी थी. बेहद ठंडी. उसने बैग से अपना मफलर निकाल के कान और गले पर लपेट लिया. इतनी ठंडी हवा में आज पार्क में बैठना संभव नहीं होगा, उसने सोचा. बस के अन्दर से उसे बाहर कि सर्दी का आभास नहीं हुआ था. 

अपनी घड़ी देखी उसने. समय काफी है.. वो अभी चाहे तो बेकरी से दो सैंडविच पैक करवा सकता है, लेकिन उसे डर था कि वो पहले न आ जाए. पाँच मिनट का रास्ता था और वो तेज़ी से चलने लगा था. वो रीगल के पास आएगी. वो वहीँ उसका हमेशा इंतजार करती थी. 

लड़के को हमेशा डर रहता कि कहीं लड़की उससे पहले न आ जाए और उन दिनों अकसर ये होता था, वो उसके पहले पहुँच जाया करती थी. उस दिन भी वो खड़ी थी रीगल के सामने. कोई नयी फिल्म लगी थी और वो एक कोने में खड़ी होकर उस फिल्म के पोस्टर को देख रही थी. वो चुपके से उसके पास आकर खड़ा हो गया. लड़की उसे देखकर मुस्कुराने लगी लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे से मुसकराहट गायब हो गयी और एक चिढ़ उभर आयी चेहरे पर. लड़का समझ गया उसके गुस्से की वजह, वो मुस्कुराने लगा. 

“ऐसे क्या मुस्कुरा रहे हो बेवकूफों की तरह...ये दुनिया का सबसे आसान काम है और तुमसे ये भी नहीं होता...” लड़की ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा और लड़के के कानों पर बंधा मफलर उतार कर उसके गले में डाल दिया और नए सिरे से गिरह लगाने लगती. देखो हो गया बस. देखो अब कितना स्टाइलिश दिखता है ये. लड़की हमेशा चिढ़ जाती थी जब वो सर और कान पर मफलर लपेटे सामने आता था. ऐसे बूढ़े लोग पहनते हैं मफलर, वो कहती. और फिर थोड़ा गुस्से का नाटक करते हुए वो मफलर को बड़े एहतियात से उसके गले में एक टाई के जैसे बाँध देती. 

दोनों फिर निकल पड़ते घूमने. वे दिन भर कनॉट प्लेस घूमते थे. इनर सर्कल का एक चक्कर, आउटर सर्कल का एक  चक्कर और फिर इनर सर्कल.. दोनों तब तक कनॉट प्लेस के चक्कर लगाते रहते जब तक वे थक नहीं जाते. जब थक जाते तो वहाँ लगी सीमेंट की बेंचों पर बैठ जाते. सर्दियों में दिल्ली कितनी खूबसूरत लगती है न? कनॉट प्लेस को एक नज़र देखकर लड़की कहती. कनॉट प्लेस उसे दिल्ली का सबसे खूबसूरत इलाका लगता था. कनॉट प्लेस की ऊपरी मंजिल पर बने दुकानें, दफ्तरों और रेस्तरां को देखकर वो कहती, काश हमें ऊपरी मंजिल पर कोई कमरा मिल जाए किराये पर... कितना खूबसूरत व्यू होगा न? लड़का उसकी इस बात पर हँसने लगता, वो समझता कि वो मजाक कर रही है लेकिन लड़की का चेहरा एकदम शांत और गंभीर रहता. नहीं...ये मजाक नहीं कर रही है, लड़का सोचता. चलो एक आखिरी चक्कर लगाकर हम कॉफ़ी पीने चलते हैं, वो लड़की से कहता और वे दोनों फिर निकल जाते उस कैफे की तरफ जहाँ वे अकसर अपनी खाली दोपहरें बिताया करते थे. वे उन दोनों के खाली दिन थे, और दोनों अपना खाली वक़्त बिताने वहाँ जाया करते थे.

दो तीन गलियारों से चलते हुए वो कैफे आता जहाँ वो जाते थे, उन गलियारों में चलते हुए किसी किसी दुकान को देखकर लड़की ठिठक जाती, वो कुछ सोचने लगती. वहाँ के हर दुकान से उसकी कुछ न कुछ यादें जुड़ी हुई थी, वो शायद उन्हीं बातों को याद करती लेकिन कभी लड़के को बताती नहीं कि वो क्या सोच रही है. आर्चीज़  गैलेरी को देखकर उसे उस बूढ़ी औरत की याद आती जिसका एक बार लड़के ने उससे जिक्र किया था, जो उस दुकान में काउंटर पर रहती थी और लड़के के खरीदे एक तोहफे को देखकर उसने कहा था, “जिसके लिए ये खूबसूरत तोहफा खरीद रहे हो वो जरूर कोई स्पेशल होगी”. उस दिन लड़की इस बात को सुनकर बेहद खुश हो गयी थी.
कॉफ़ी हाउस के बाहर लड़की रुक जाती. वो उस कैफे के नाम के ऊपर लगे सिम्बल को देखने लगती. वो सिम्बल उसे कभी समझ नहीं आया. ‘ये क्या बकवास सिम्बल है?’ वो लड़के से पूछती. ‘ये दिल्ली टूरिज्म का सिम्बल है’. लड़का कहता. बकवास. वो कहती...‘इसमें डी और टी तो नज़र ही नहीं आ रहा तो कैसे हुआ दिल्ली टूरिज्म का सिंबल?हाँ टी तो दिख रहा है लेकिन डी तो किसी एंगल से नहीं, ये तो पी लग रहा है’. लड़के के पास लड़की के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता. वो चुप रहता. लड़की फिर उसे उस सिम्बल के जाने कितने अलग अलग अर्थ उसे बताने लगती और लड़का मुस्कुराते हुए सुनते रहता. 

कैफे में दोनों एक ही टेबल पर अकसर बैठते, वो उन दोनों का एक तरह से रिजवर्ड सीट था. वो कोने में लगी एक टेबल थी, जहाँ पीछे जाने का दरवाज़ा था. वहाँ हवा आते रहती थी, और ठंड में वहाँ कोई बैठना नहीं चाहता था. लगभग वो टेबल खाली ही रहती थी. दोनों वहीँ बैठते थे, अगर किसी दिन उन्हें वो टेबल खाली नहीं मिलता तो लड़की कहीं और बैठने को तैयार नहीं होती और कैफे से बाहर आ जाती. उस टेबल पर लड़की अपने सारे समान ऐसे फैला कर रखती जैसे ये कैफे न हो उसका घर हो. बड़े ही करीने से एक के बाद एक सारे सामन वो टेबल पर रखती. स्कार्फ, दस्ताने, बैग, मोबाइल, एक छोटी डायरी जिसे वो हमेशा अपने ओवरकोट के जेब में रखती थी.
दिल्ली का ये इलाका, इस कैफे का इलाका लड़की को बहुत पसंद था, उन दिनों वे दिसंबर और जनवरी की दोपहरें यहीं बिताते थे. कैफे में दोनों बहुत देर तक बैठे रहते, और फिर जब वहाँ बैठे बैठे वे ऊब जाते, तो दोनों कैफे के ठीक सामने हनुमान मंदिर के पास आ जाते. वहाँ धूप आती थी और दोनों को वहाँ धूप में बैठना पसंद था. हनुमान मंदिर के सामने लोगों ने छोटे छोटे अपनी दुकानें खोल रखी थीं. टैटू बनाने वाले, भविष्य बताने वाले ज्योतिषी, मेहँदी लगाने वाले, चाय बेचने वाले, समोसे और कचौड़ियों की दुकानें. 

लड़की हर दुकान को बड़े गौर से देखती. ज्योतिषों को वहाँ टेबल कुर्सी लगाए बैठे हुए देखती तो अकसर सोचती, मैं भी किसी दिन अपना हाथ दिखवाऊंगी, लेकिन दिखलाती कभी नहीं थी. उसे भविष्य जानने की उत्सुकता थी लेकिन कभी खुद का हॉरस्कोप अख़बार में नहीं देखती थी, हाँ दूसरे लोगों का..उस लड़के का हॉरस्कोप हर रोज़ पढ़ती अख़बार में. लेकिन खुद का कभी जानने की कोशिश भी नहीं करती. जो होगा देख लेंगे, अभी से क्यों जानूँ मैं कि क्या होने वाला है ज़िन्दगी में. इससे तो इक्साइट्मन्ट ही खत्म हो जाएगा, वो कहती. सरप्राइज उसे पसंद थे. अच्छे बुरे दोनों तरह के सरप्राइज. ‘देखते हैं क्या होगा ज़िन्दगी में, अच्छा बुरा जो भी. अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, एक अच्छी मेमोरी दे जाएगा...एक यादगार पल, बुरा हुआ तो कुछ सिखा ही जाएगा’, वो कहती.

मेहँदी लगाने वालों को देखकर उसे भी मन करता मेहँदी लगवाने का, लेकिन लगवाती कभी नहीं थी. उसे बड़ा नाज़ था खुद पर. ‘मैंने तो मेहँदी लगाने का कोर्स किया है, इनसे कहीं बेहतर मेहँदी मैं लगा सकती हूँ’, वो कहती. ‘सोचती हूँ कि मैं भी यहाँ अपनी एक दुकान खोल लूँ? हम दोनों जो दिन भर में इतनी कॉफ़ी पी जाते हैं वो आराम से कवर हो जायेंगे, वो लड़के को कहती और सच में बैठकर दुकान खोलने की अपनी प्लानिंग लड़के को बताने लगती. 

देखो यहाँ चावल पर नाम लिखे जाते हैं. एक स्टाल के पास खड़ी होकर वो कहती लड़के से. सोचो, दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. सोचो चावल पर नाम लिखते हैं ये, कैसे लिखते होंगे? उसके मन में उथल पुथल होने लगतीं, उसका मन करता उस दुकान वाले से जाकर एक सवाल करने का, ‘मेरा जन्मदिन है, मैं आपको खूब सारे चावल लाकर दे दूँगी, आप हर दाने पर मेरा नाम लिख दोगे? मेरे जन्मदिन पर जो आयेंगे वो देखेंगे चावल पर मेरा नाम लिखा है, ये कितना यूनिक लगेगा न? मैं पूछूं इनसे?’ वो लड़के से पूछती. लड़के को उसका ज़रा भी भरोसा नहीं था, वो सच में पूछ सकती थी ये बात उस दुकानदार से, वो उसे जबरदस्ती खींच कर उस स्टाल से दूर ले जाता. लड़की अकसर ऐसी यूनिक चीज़ें सोच लिया करती थी शायद इसलिए कि वो हमेशा खुद के लिए यूनिक चीज़ें चाहती थीं. 

यहाँ पर बन्दर कितने हैं, बंदरों को देखकर वो कहती. ‘उछलते कूदते इन बंदरों को देखो, बिना किसी फ़िक्र के बिना किसी चिंता के, फुल ऑफ़ लाइफ लगते हैं न ये बन्दर’. उसे बंदरों से बहुत डर लगता था लेकिन उन्हें देखकर वो खुश भी होती थी. 

एक बन्दर यूँहीं जब उसके पास उछल कर आया, वो बेहद डर गयी. लड़के का कोट पकड़ कर उस  में खुद को छुपा लिया उसने. लड़के ने बन्दर को भगा दिया लेकिन फिर भी वो कुछ देर तक उसी अवस्था में रही. तुम तो डर गयी देखो. डरती हो तुम इतना बंदरों से, लड़का उसे छेड़ने लगा. डरी नहीं मैं साहब, ये तो एक प्यारा मोमेंट था. वो कहती. ‘ये मोमेंट जो था अभी जिसे तुम डर कह रहे हो ये बंदरों की बदमाशी के वजह से था न. मैं तुम्हारे कोट में छिप  गयी थी, मुझे कितना अच्छा लगा. तुम्हें अच्छा लगा न? देखो कितना प्यारा सा वंडरफुल मोमेंट था ये. थैंक्स टू बंदर्स फॉर दिस वंडरफुल मोमेंट’. वो खिलखिलाकर हँस देती. 

दोनों बस स्टैंड की तरफ बढ़ जाते. चलते हुए वो लड़के के कोट के जेब में हाथ डाल देती. सर्दियों में ये उसकी आदत थी. दस्ताने वो सिर्फ एक हाथ में पहनती, एक हाथ उसका हमेशा लड़के की कोट में घुसा रहता था. बस स्टैंड तक जाने के दौरान वो अकसर लड़के से अपने एक सपने के बारे में बात करती. लगभग हर रोज़ ही. उसका एक अरमान था. वो लड़के से कहती, ‘चलो एक स्लीपिंग किट खरीदते हैं और उसे लेकर निकल जाते हैं कहीं भी, किसी भी दूसरे शहर, एक शहर से दूसरे शहर घूमते हैं, जहाँ मन किया वहीं अपना डेरा डाल लेंगे हम. 

हम जहाँ भी जायेंगे ये स्लीपिंग किट अपने कन्धों पर डाल के ले चलेंगे. जहाँ मन किया वहीं सो जायेंगे. किसी पार्क के किसी कोने में, किसी झील के किनारे, पहाड़ों पर. होटल में रुकना ही नहीं है हमें. कितनी भी सर्दी हो हम बाहर ही सो जायेंगे, जानते हो बहुत कम्फी होता है स्लीपिंग बैग, तुम्हें पता है मैं एक बार सो चुकी हूँ एक स्लीपिंग बैग में. 
‘ठण्ड में मर जायेंगे हम बाहर सोने से’. लड़का कहता उससे. 
बेकार की बातें न करो. लड़की चिढ़ जाती. ‘सोचो ये बेचारे बेघर लोग कैसे ठंड में रात गुज़ार देते हैं, हम तो फिर भी इतने कम्फी कम्फी स्लीपिंग बैग में सोये रहेंगे, कुछ भी पता नहीं चलेगा. वो कहती. बोलो चलोगे? बोलो? चलो निकलते हैं घूमने, आज ही शाम निकल जाते हैं. रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड जाकर देखते हैं जो पहली ट्रेन या बस मिली उससे निकल जायेंगे कहीं भी.. बोलो. चलोगे? बोलो जल्दी बोलो. वो जिद करने लगती. 

मजा आएगा. बहुत मज़ा आएगा. ठण्ड में खुले आकाश के नीचे सोना. सोचो तुम ज़रा. हाउ  फैसनेटिंग. गर्मियों में तो लोग सोते ही हैं लेकिन हम ठण्ड में बाहर सोयेंगे, दिसंबर और जनवरी की सर्दियों वाली रात में. हाउ वंडरफुल आईडिया इज दिस. हम दोनों स्लीपिंग बैग में कवर रहेंगे और बस हमारे चेहरे  बाहर ताक रहे होंगे आसमान को. हाउ रोमांटिक न? 

वो लड़के की तरफ देखने लगती. वो ऐसे ही अकसर लड़के को किसी विचित्र मायावी सपनों के देश में लेकर चली जाती, और लड़के को भी उसके साथ ये सब कल्पना करना अच्छा लगता था. वो भी खो जाता लड़की की इस सपनों की दुनिया में. वो दिल से चाहता, कि सच में हमें निकल जाना चाहिए  ऐसे ही घूमने, जैसे लड़की कह रही है. वो भी खो जाता लड़की के साथ साथ उसकी कल्पनाओं में. 

बस स्टैंड के ठीक सामने वाले दुकान में लड़की देखती कि स्लीपिंग किट बिकते हैं, वो जिद करने लगती, चलो न खरीदते हैं. लड़के की जवाब की प्रतीक्षा किये बैगर वो दुकान में घुस जाती. लड़का भी उसके पीछे पीछे दुकान में चला आता. 

दुकान वाले व्यक्ति से वो बोलती, हमें सबसे अच्छा स्लीपिंग किट दिखाईये, जिसमे कितनी भी ठण्ड हो, चाहे हम हिमालय पर चले जाएँ, हमें सर्दी न लगे. दुकान वाला उसके सवालों से कन्फ्यूज हो जाता. वो दिखाता जो उसके स्लीपिंग बैग होते वो. 

‘हम एक ही स्लीपिंग बैग लेते हैं, हमारे पैसे बच जायेंगे, वो कहती’. दुकान वाला लड़की की शरारती बातों से अंजान, कहता मैडम ये बस एक ही व्यक्ति के लिए बना है. ‘ओफ्फ्हो...मैं तो इतनी हलकी फुलकी हूँ, मैं इसमें एडजस्ट  कर जाऊंगी. है न? वो लड़के के तरफ देखती. 
‘बेशर्म हो तुम..’, लड़का कहता.
लड़की मुस्कुराने लगती.
दुकानदार कन्फ्यूजन में कभी लड़के को देखता तो कभी लड़की को और कभी उस स्लीपिंग बैग को जिसे देखकर लड़की ने कहा था कि हम दोनों एक में ही सो जायेंगे. 

शाम में दोनों बस से वापस लौटते थे. बस में खिड़की के पास बैठकर बाहर सड़कों को देखना, चल रहे लोगों को, गाड़ियों को देखना लड़की को पसंद था. वो खिड़की के बाहर देखकर जाने क्या क्या बोलती जाती, कभी खुद से कभी लड़के से. लड़के को ये समझ कभी नहीं आता कि कौन सी बात वो लड़के से बोल रही है और कौन सी बात खुद से. वो सो जाती लड़के के कन्धों पर. स्टॉप आने पर लड़का उसे उठाता. वो जागने से इंकार कर देती, ऐसे ही रहने दो न मुझे, वो लडके से कहती. ये मेरा सबसे बड़ा सुख है तुम्हारे कन्धों पर ऐसे सोना, लड़की कहती.

बस स्टैंड से लड़की के घर तक का रास्ता थोड़ा लम्बा था, लेकिन फिर भी वे रिक्शा नहीं लेते. वो बहुत चौड़ी और अच्छी सड़क थी. दोनों तरफ बड़े बड़े पेड़ लगे थे, पार्क थे सड़क के दोनों तरफ और उन दोनों को उस सड़क पर शाम के अँधेरे में चलना अच्छा लगता था. 

लड़का लड़की के अपार्टमेंट के अन्दर कभी नहीं जाता, वो बाहर  गेट के पास ही खड़ा रहता और तब तक खड़ा रहता जब तक लड़की अपार्टमेंट की सीढ़ियों से ऊपर न चले जाए, तब तक वो देखते रहता लड़की को. लड़की लेकिन गेट से अन्दर घुसने के बाद कभी पलट कर उसे नहीं देखती. वो हर दिन सोचता कि शायद लड़की पलट के देखेगी लेकिन नहीं देखती. वो मुस्कुरा देता, ‘ये नहीं देखने वाली’, खुद से ही कहता और आगे बढ़ जाता.

वापस उस लम्बी सड़क पर चलते हुए लड़के को बहुत अच्छा महसूस होता, उसका मन बहुत हल्का लगने लगता. वो मफलर खोलकर कान में लपेट लेता...और फिर याद आती लड़की की सुबह की फटकार. वो मुस्कुरा देता. वापस कान से मफलर निकाल कर गले में लपेट कर गिरह बाँधने की कोशिश करता, जैसे लड़की बाँधती थी. लेकिन उससे गिरह नहीं बंधती. ‘ये दुनिया का सबसे भारी काम है’, वो बुदबुदाता और गले में मफलर को यूँही लपेट लेता. 

दिल्ली के ये दिन, दिल्ली के सर्दियों के ये दिन उसके ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से हैं, वो सोचता और अपने घर की तरफ बढ़ जाता. 

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Sunday, December 14, 2014

कोहरा...ठण्ड और चाय की चुस्कियों में घुली यादें...


दिसंबर तुम्हारे लिए हमेशा खुशियाँ लेकर आता था. तुम्हें दिसंबर से प्यार था ये हम सब जानते थे. दिसंबर के आते ही तुम खुश हो जाया करती थी. बेसब्री से इंतजार रहता था तुम्हें दिसंबर की पहली सुबह का. हाँ लेकिन जितना खुश तुम दिसंबर के आने पे होती थी, उतनी ही उदास तुम ये बात सोच कर हो जाया करती थी कि ये दिसंबर सिर्फ इकत्तीस दिनों में वापस चला जाएगा. मुझसे अकसर कहती थी तुम, कि जो तुम अगर दिसंबर के दिन बढ़वा दो तो दुनिया की सारी दौलत तुम्हारे नाम कर दूँगी.

तुम्हें सर्दियों में सुबह पार्क में टहलना अच्छा लगता था. सुबह के कोहरे में सड़कों पर चलना तुम्हें पसंद था. गर्मियों की सुबह जब लोग चार पाँच बजे जाग कर टहलने निकलते थे, तुम देर तक सोयी रहती थी लेकिन सर्दियों की सुबह जब सारे लोग रज़ाई में दुबके सोये रहते थे, तुम जाग जाया करती थी और मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ जागना पड़ता था. कितनी मिन्नतें करता था मैं तुमसे, कि सर्दियों में मुझे देर तक सोने दो, लेकिन तुम तो बस हुक्म दे दिया करती थी... एक घंटे में मिलो पार्क में. 

सुबह की शुरुआत हमारी उसी पार्क से होती थी, वो पार्क जो हमारे मोहल्ले का सबसे बड़ा पार्क था और जहाँ आते हुए हमेशा मुझे इस बात का डर रहता था कि कहीं मुझे किसी ने तुम्हारे साथ देख लिया तो? वैसे इसकी ज्यादा चिन्ता नहीं थी, सर्दियों में इतनी सुबह लोग भी कम आते थे, और मैं ख़ास सावधान भी रहता था. हम उस पार्क में पहुँचने वाले सबसे पहले लोगों में से रहते थे. तुम जहाँ टहलने में और बातें करने में मशगूल रहती थी, मैं तुम्हारी बातें सुनने में और आसपास नज़र दौड़ा कर ये देखने में व्यस्त रहता था कि कोई हमें देख तो नहीं रहा है. वैसे कोई जान पहचान वाले लोग भले न देखें, यूँ लोग तो हमें देखते थे ही. मुझे लगता है कि सुबह पार्क में हम दोनों को यूँ घूमते टहलते, बातें करते देख लोग शायद थोड़े हैरान भी होते होंगे, या क्या पता हँसते भी होंगे हम पर. पार्क में आये सभी लोगों में से सिर्फ हम दोनों ही ‘आउट ऑफ़ प्लेस’ लगते थे. एक तुम, जो सज धज कर सुबह आती थी. और दूसरा मैं, लेदर शू, लेदर जैकेट और जींस पहन कर सुबह मॉर्निंग  वाक करने आता था. ये तो तय था कि लोग हमें लवर्स समझते होंगे, वो भी मैड फॉर एच अदर टाइप लवर्स, जो एक दूसरे के लिए इतने पागल हैं कि सर्दियों की सुबह इतनी ठंड में भी पार्क में टहलने आ जाते हैं, हाथों में हाथ डाले टहलते हैं, बातें करते हैं. तुम कितना चिढ़ती थी जब मैं तुम्हें ये बात कहता था, कि देखो वे सारे हमें लवर्स समझते हैं. तुम चिढ कर कहती थी “लवर्स? ह्म्म्म...? हाँ यही समझते होंगे, मोरोन!! दोस्त हैं, ये तो समझते नहीं होंगे कोई”. बोल के तो देखे कोई लवर्स हमें, मेरे सामने... उसका जबड़ा  न तोड़ दूँ फिर कहना.. ये बोलते ही तुम सच में अपने मुक्के को दिखाती थी मुझे जिससे मैं डर जाता था. तुम्हारा कोई भरोसा भी कहाँ था, मजाक में ही सिर्फ ये दिखाने के लिए कि तुम्हें मुक्के चलाना आता है, कितनी  बार मुझपर बॉक्सिंग कर चुकी हो तुम.

उसी पार्क के पीछे वाला  गेट जो हनुमान मंदिर के तरफ खुलता था  वहाँ इम्तियाज चचा की चाय दुकान थी. सुबह टहलने आये सभी बुजुर्ग, महिलाएं और लड़के लड़कियाँ  वहाँ सुबह की पहली चाय पीते थे. हर सुबह उनके दुकान खुलने से पहले हम दोनों वहाँ पहुँच जाते थे. इम्तियाज चचा भी हमें पहचान गए थे. वो अकसर सुबह हमें देखकर एक ही बात दोहराते थे, मुझसे हँसते हुए कहते, ये लड़की मेरे दुकान के जागने से पहले जाग जाती है और चली आती है चाय पीने”. चचा की इस बात पर तुम चचा से कहती “सिर्फ आपके दुकान से पहले नहीं, इस लड़के और इस शहर से भी पहले मैं जाग जाती हूँ. यकीन न आये तो पूछ लीजिये इससे. मुझसे तो बड़ा परेशान रहता है ये लड़का. 
चचा हँसने लगते थे और उनके साथ मैं भी.

सच कहूँ तो मैं तुमसे परेशान तो बिलकुल नहीं था. तुमसे भला कभी परेशान हो सकता था मैं? लेकिन हाँ हर सुबह की तुम्हारी ये जिद कि पार्क में मिलना है, टहलना है, कोहरे में घूमना है, इस वजह से घर पर अकसर मुझे अजीब सिचुएशन का सामना करना पड़ता था. 

तुम तो तुम थी. बात मानना तो दूर, अपनी मर्ज़ी का करती थी. उन दिनों जबकि हम दोनों के पास मोबाइल फ़ोन था, तुम फिर भी मुझे हर सुबह लैंडलाइन फोन पर ही कॉल कर के जगाती थी. मेरे घर का वो पुराना लैंडलाइन फोन था, उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि तुम्हारे कॉल से घर के सभी लोग जाग जाते थे. अकसर पापा मुझे छेड़ने के अंदाज में कह भी देते थे, ये फ़ोन अब हमारे घर का मॉर्निंग  अलार्म हो गया है, ठीक पाँच बज कर पैंतीस मिनट पर ये हम सब को जगाता है.

कितनी बार तुम्हें मैं डांट चुका था कि तुम मेरे मोबाइल पर फोन किया करो. लेकिन तुम मानती कब थी? लैंडलाइन पर फोन करने की तुम्हारी सिर्फ एक वजह होती थी, तुम जानती थी कि ये फोन मेरे बिस्तर के पास वाले टेबल पर रखा होता था और तुम्हें यकीन था कि उसकी रिंग सुनकर मैं जाग जरूर जाऊँगा. मोबाइल का तुम्हें कोई भरोसा नहीं था. दरअसल मोबाइल का भरोसा तो था, लेकिन तुम्हें मेरा भरोसा नहीं था. तुम्हें जाने क्यों अकसर लगता था कि मैं सुबह जागने से बचने के लिए मोबाइल साइलेंट मोड में कर के न सो जाऊँ.
सुबह जब तुमसे मिलकर मैं वापस आता मैं जानता था कि मुझपर कैसे कैसे व्यंग बाण चलने वाले हैं, वापस आते ही पापा का सवाल होता “इतनी सुबह सुबह किसका फोन आता है आजकल? और फ़ोन के आते ही हड़बड़ाए हुए से कहाँ निकल जाते हो? पापा के ये पूछते ही, पीछे से माँ भी चुटकी लेने में देर न करती... “सुबह सुबह और कहाँ जाएगा? जॉगिंग करने ही जाता होगा...है न?” उधर से बहन बोलती “हाँ, वो बात तो है, लेकिन सुबह सुबह जॉगिंग करने लेदर शू, जीन्स और जैकेट पहन कर भाई क्यों जाता है? पापा भी एक आखिरी  तीर छोड़ते, “तो गर्मियों में भी किया करो जॉगिंग. सेहत के लिए अच्छा होता है न. गर्मियों के सुबह तो तुम घर से निकलते नहीं हो...”

सिर्फ इस एक वजह से तुम्हें जाने कितनी बार कह चुका था मैं, तुम सुबह की अपनी ये जिद छोडो, शाम में तो हम रोज़ मिलते हैं. मुझे घर में कितने सवालों का सामना करना पड़ता है मालूम भी है तुम्हें?

लेकिन तुम्हें मेरी इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता. तुम कहती “तुम बेशक परेशानियों का सामना करते रहो, लेकिन सुबह की चाय और पार्क में टहलने के वक़्त में कोई बदलाव नहीं होगा”. हाँ, वन्स इन अ ब्लू मून तुम्हें मुझपर दया आती या किसी दिन तुम मुझपर जरूरत से ज्यादा मेहरबान रहती तो कहती... “चल शॉपिंग पर चलते हैं, तुम्हारे लिए ट्रैक सूट और जूते खरीद लाती हूँ, फिर तो कोई सवाल नहीं पूछेगा न कि सुबह कहाँ जाते हो? तुम कह सकते हो बेझिझक कि जॉगिंग पर जाते हो, या इवन बेटर, आंटी से मैं बात करती हूँ, कहती हूँ कि रोज़ हमारी मॉर्निंग डेट होती है, आप प्लीज सवाल न पूछा कीजिये इससे”. 
नो  वे. मैं गुस्से में कहता. 
तुम समझ जाती थी कि तुम्हारी जीत हुई है और तुम मुस्कुराने लगती. मुझे मनाते हुए कहती, बस अप्रैल भर तो तुम्हें सुबह परेशान करूँगी मैं.. उसके बाद कहाँ? 

हम दोनों का हर दिन का कमोबेश यही शिड्यूल रहता था, कम से कम सुबह का शिड्यूल तो यही था, एकदम फिक्स्ड. बिना किसी बदलाव के. हाँ कभी कभी इस शिड्यूल में तुम या मैं एक दूसरे को सर्प्राइज़ देने के लिए थोड़ा बदलाव कर देते थे. जैसे की उस दिन हुआ था, वो जो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और उस दिन सुबह के शिड्यूल में बदलाव मैंने किया था. 

तुम्हारे जन्मदिन की सुबह की प्लानिंग मैंने दो दिन पहले से कर रखी थी जिसकी तुम्हें कोई खबर नहीं थी. तुम तो अपने जन्मदिन की सुबह भी बेखबर सोयी हुई थी. एक शाम पहले जो मैंने तुमसे कह दिया था कि सुबह आना मेरा मुमकिन नहीं है घर में कुछ काम है. तुम उदास तो बहुत हो गयी थी क्योंकि वो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और तुम चाहती थी कि मैं तुम्हारे साथ रहूँ. लेकिन घर पर काम की बात सुनकर तुमने भी कोई जिद नहीं की थी. 

उस सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे मैंने तुम्हें फोन किया था. 

तुम गहरी नींद में थी. तुमने नींद में ही फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ मैं था. फोन पर तुम्हारे लिए सड़क किनारे चाय दुकान पर खड़ा होकर फोन पर हैप्पी बर्थडे सॉंग गा रहा था, बिना इस बात की परवाह किये हुए कि आसपास वाले लोग देखेंगे मुझे, यूँ गाते सुनेंगे तो क्या सोचेंगे. और जिसके लिए मैं ये जन्मदिन का गाना गा रहा था, वो समझ रही थी कि वो कोई सपना देख रही है. हाँ मैडम, आपने उस सुबह यही तो समझा था.. कि आप कोई सपना देख रही हैं. “तुम यार सपने में इतने बेसुरे नहीं सुनाई देते..” यही इग्ज़ैक्ट शब्द थे जो तुमने उस सुबह नींद में कही थी मुझसे और जिसके वजह से तुम्हें जाने कितने समय तक मैं छेड़ता रहा था.. “तुम्हें तो मेरी आवाज़ बेसुरी लगती है..” और तुम जाने कितनी बार इस एक बात के लिए मुझसे माफ़ी माँग चुकी थी... “अरे यार मैं नींद में थी न...” 

तुम नींद में वैसे अकसर बातें करने लगती थी. रात में तो लगभग तुम्हारी आदत थी ये, तुम बातें करते हुए सो जाया करती थी.. कब तुम्हें नींद आ जाती थी ये तुम्हें खुद पता नहीं होता था, और तुम नींद में ही मुझसे बातें करते रहती थी. तुम्हारे कितने राज़ की बातें मैंने इस तरह ही तो जाना था. 

उस सुबह भी तुम नींद में थी और मुझसे बातें कर रही थी.. तुम्हें मैं नींद से जागने के लिए, उठने के लिए, बाहर आने के लिए फोन पर कह रहा था, और तुम समझ रही थी कि तुम फिर से कोई सपना देख रही हो.. और नींद में ही मुझसे बार बार कह रही थी.. “चुप भी रहो प्लीज, सुबह यूँ आर्डर देने का काम मेरा है. तुम क्यों मुझे आर्डर दे रहे हो और वो भी सपने में. मैं सोयी हुई हूँ अभी”. 

बड़ी मेहनत करनी पड़ी थी उस दिन तुम्हें ये यकीन दिलावाने के लिए कि मैं सच में तुम्हारे अपार्टमेंट के गेट के बाहर खड़ा हूँ. नींद में ही तुम चलते हुए अपनी खिड़की के पास आई थी, और जब मुझे तुमने खड़े देखा तब तुम्हें सच में यकीन आया था कि मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ. 

किस तरह से तुम भागते हुए नीचे आई थी, कितनी हड़बड़ी में और आते ही कैसे मुझपर बरस पड़ी थी. “मरवा दिया था तुमने, ऐसे कोई शार्ट नोटिस देता है क्या? जानते भी हो कैसे आई हूँ मैं? माँ से बोलना पड़ा कि रश्मि ने अचानक बुला लिया...तुम सच में पागल हो”. 

मेरा तो मन किया उस वक़्त कि उलटे तुमसे पूछूं, अच्छा बताओ रोज़ सुबह ऐसे मुझे शोर्ट नोटिस देती हो तो मैं कैसे मैनेज करता हूँ? लेकिन वो तुम्हारा जन्मदिन था और मैं चाहता था कि जो भी छोटी प्लानिंग सुबह की मैंने की है उसे तुम एन्जॉय करो. 

तुम्हारा सारा गुस्सा वैसे तो काफूर हो गया था उसी वक़्त जब तुम्हें मैंने नीचे आने पर तुम्हारे ही अपार्टमेंट के गार्डन में खिला गुलाब का वो फूल दिया था, और तुम्हें जन्मदिन की बधाई दी थी. हाँ लेकिन तुम्हारे मन में कई सवाल अब भी उमड़े हुए थे... “तुम आज गाड़ी लेकर क्यों आये हो? और तुम कैसे आये आज? आज तो तुम्हें काम था?” गाड़ी के पिछली सीट पर रखे एक नए बैग को देखकर तुम्हें और आश्चर्य हुआ. ये बैग किसका है? और तुम इसे सुबह क्यों लेकर आये हो? तुम सुबह की बहुत सी बातों से कन्फ्यूज्ड हो रही थी और मैं तुम्हारे इस कन्फ्यूज अवस्था का मजा ले रहा था.

चलो चाय की दुकान पर, वहाँ चाय पीते हैं और तुम्हारे सभी सवालों का जवाब तुम्हें वहीं मिलेगा. मेरे इस जवाब से तुम और कन्फ्यूज हो गयी थी. 

चाय दुकान पहुँच कर तो तुम्हें और भी आश्चर्य हुआ. आमतौर पर इनकी चाय दुकान सुबह खुलती नहीं है, बस एक ठेले पर ये चाय बनाते हैं और हम वहीँ ठेले के पास खड़े होकर चाय पीते थे, लेकिन तुमने देखा कि दुकान खुली थी और बेंचे लगी हुई थीं. ये हो क्या रहा है आज? तुमने मेरी तरफ देखकर कहा था. सुबह से एक के बाद एक हर बात पर तुम्हें आश्चर्य हो रहा था – सुबह यूँ मेरा तुम्हारे घर आ जाना, पीछे वाली सीट पर उस रहस्मयी बैग का होना, और अब ये चाय दुकान का खुला होना, और उसपर भी सबसे बड़ी आश्चर्य की बात थी, चाय दुकान पर गाने बजते रहना... और वो भी तुम्हारी पसंद के गाने और दुकान पर आते ही चचा का तुम्हें जन्मदिन की बधाई देना. 

ये सब मेरे प्लानिंग का ही एक हिस्सा था. मैंने पहले ही शाम में आकर सब समझा दिया था इम्तियाज़ चचा को. सुबह सब मेरे प्लान के हिसाब से हो, इसके लिए मुझे थोड़ी मेहनत करनी पड़ी थी इम्तियाज चचा को मनाने में, लेकिन वो जल्द ही मान गए थे. एक कैसेट मैंने दे दिया था उन्हें जिसमें तुम्हारे पसंद के गाने रिकार्डेड थे.
हम्म...जन्मदिन की सुबह, ड्राइविंग थ्रू द सिटी, ठण्ड, कोहरा, चाय, अ पोसिबल गिफ्ट इन द बैग....अब? अब क्या? तुमने यही पूछा था न मेरे से. 

मैंने तुम्हें जवाब नहीं दिया बल्कि सड़क के तरफ इशारा किया, तुमने उधर देखा.. उधर से हमारे तीन दोस्त, समर, शिवी और अवि आ रहे थे. तुम लगभग ख़ुशी से उछल पड़ी थी, “अरे ये तो सरप्राइज बर्थडे पार्टी हो गयी मेरी...”

हाँ, वो सरप्राईज बर्थडे पार्टी ही थी तुम्हारी जिसे मैंने प्लान किया था. ये सब मैंने दो दिन पहले ही शाम में सोच लिया था, जब तुम अपने स्विट्ज़रलैंड की छुट्टियों के बारे में बता रही थी. वहाँ जिस होटल में तुम रुकी थी, उसके सामने ही एक कैफे था, जो चौबीसों घंटे खुला रहता था, और जहाँ तुम हर दिन सुबह की ठण्ड और कोहरे में कॉफ़ी पीती थी और जहाँ एक सुबह तुमने अपनी छोटी बहन का जन्मदिन सेलिब्रेट किया था. तुम्हारे ऊपर उस सुबह का हैंगोवर अब तक हावी था, और हर शाम तुम उस सुबह का जिक्र करती थी. शायद तब से ही मैंने ये सोचा था कि कुछ ऐसा अपने शहर में करूँगा, तुम जब रहोगी यहाँ.. तुम्हारे जन्मदिन की सुबह. और आज वही सुबह थी. 

मैं खुश था कि  जो मैंने सोचा था वो सब ठीक वैसा ही हुआ. हम पाँच दोस्त, चाय दुकान पर बैठे तुम्हारे जन्मदिन को सेलिब्रेट कर रहे थे. केक जो मैं पहले ही लेते आया था, और मैगी नूडल्स जो चचा की मेहरबानी से सुबह उनके दुकान पर ही बनी थी और चाय. तुम सुबह की इस छोटी सी पार्टी से बहुत खुश थी. “वन ऑफ़ द बेस्ट बर्थडे मॉर्निंग ..” तुमने कहा था. तुम खुश थी, तो मैं भी खुश था. 

हाँ, लेकिन फिर भी एक सवाल तो तुम्हारे मन में अब भी था, कि मेरी गाड़ी के पीछे वाली सीट पर कौन सा बैग रखा है? और वो बैग किसका है? हाँ तुम्हारा वो अंदाज़ा सही था, कि उसमें तुम्हारे लिए तोहफें रखे थे. एक नहीं बल्कि कई सारे तोहफे...एक वूलेन स्कार्फ, ईअररिंग , दो किताबें, एक डायरी, दो फिल्म के सीडी, बहुत से चॉकलेट्स  और मेरी बनाई वो आखिरी पेंटिंग, जिसमें लिखा था.. “Dare to Dream !


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