Saturday, October 4, 2014

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मिस्टिरीअस अक्तूबर!

अक्टूबर का महीना बड़ा ही खुशनुमा सा एक एहसास लेकर आता है. गर्मियों के दिन विदा होने को होते हैं, पेड़ों से पत्ते झर के गिरने लगते हैं, सर्दियों के आने की आहट सुनाई देने लगती है, मौसम अचानक थोड़ा ठंडा हो जाता है और हवाओं में चारों तरफ त्योहारों की खुशबू  बसी होती है.

हम दोनों के लिए ये अक्टूबर हमेशा बेहद खास रहा है. तुम्हारे लिए तो शायद बहुत पहले से ही अक्टूबर खास रहा होगा, लेकिन मेरे लिए अक्टूबर बस तब से ख़ास हुआ है जब से तुमसे मुलाकात हुई. तुमसे मिलने से पहले मौसमों के आने जाने से, महीनों के आने-जाने से मुझे फर्क नहीं पड़ता था. तुम्हारे आने के बाद ही हुआ कि हर मौसम से, हर महीने से एक रिश्ता बन गया. तुम्हें जानने के बाद ही मैंने ये जाना था कि मौसम भी इतने ख़ास हो सकते हैं कि उनका कोई नाम रख सकता है. तुम रखती थी मौसमों के नाम...तरह तरह के नाम, और हर नाम के पीछे तुम्हारी एक मजेदार लॉजिक होती थी. मिस्टिरीअस अक्टूबर, नॉस्टैल्जिक नवम्बर, टेंडर दिसम्बर, जैज़ी जनवरी जैसे नाम तुमने हर मौसम को दे रखे थे. लेकिन शायद जितना महत्वपूर्ण अक्टूबर और दिसम्बर महीना रहा है हम दोनों के लिए उतना शायद और कोई महीना नहीं रहा. 

किसे पता था कि दो अजनबी चलते हुए टकरा जायेंगे, इसी अक्टूबर महीने के आखिरी एक शाम में, जब तुम्हें जाना था पहली बार. किसे पता था कि इसी अक्तूबर की वो पहली तारीख होगी जब तुम्हें करीब से समझा था, तुम्हारे हर एक दर्द को महसूस किया था, तुम्हारे मुसकराहट के पीछे छुपे उस सच को, तुम्हारी उन तकलीफों को, उन बेचैनियों को महसूस किया था मैंने. 

तुम्हें याद है, अक्टूबर की ही वो आखिरी शाम थी न? तुम्हारी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण दिन था वो. आखिरी ही कुछ पल बाकी थे अक्टूबर के विदा होने में, जब तुम्हें फ़ोन किया था मैंने और पहली बार फोन पर गाकर मैंने सुनाये थे बहुत से गाने तुम्हें, रात भर. फोन के दूसरे तरफ तुम बिलकुल चुप थी. लगातार रो रही थी, तुम्हारे आँसू गिर रहे थे, किसी तकलीफ से नहीं बल्कि ख़ुशी के आँसूं थे वो. “I am Overwhelmed”, तुम बस यही तीन शब्द कह पायी थी...मात्र ये तीन शब्द, इसके अलावा तुम कुछ भी बोल नहीं पायी थी. “तुम्हारे इन सब बातों पर रोने से, तुम्हारे इन आँसुओं की मुझे फिक्र नहीं होती. ये अच्छे आँसू हैं, ऐसे आँसू प्यारे लगते हैं..” यही कहा था न मैंने तुम्हें उस रात?

लोग नहीं समझेंगे इस बात को, ये नहीं समझ पायेंगे वे की तुम उस रात उस छोटी सी बात पर क्यों इतनी खुश हो गयी थी कि तुम लगातार बस रोये जा रही थी. बस गाना ही तो गाया था मैंने. लेकिन मेरे उस गाने की अहमियत क्या थी ये तुम जानती थी. सालों पहले जब किसी एक वजह से जिस लड़के ने गुनगुनाना छोड़ दिया था, तनहाई में भी कभी शायद ही कभी वो गुनगुनाया हो, वो सिर्फ एक लड़की की एक प्यारी, मासूम जिद के लिए उसे रात भर गाना सुनाते रहेगा. इसका शायद तुम्हें भी यकीन नहीं था. वो रात जो तुम्हारे लिए बहुत अहमियत रखती थी, तुम्हारे उस स्पेशल दिन पर वो मेरा तोहफा था. तुमने कहा था मुझसे, “कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है कि अपने कम्फर्ट ज़ोन से कोसों बाहर जाकर वो कोई ऐसा काम कर दे उस लड़की के लिए. ये सबसे अनमोल तोहफा दिया है तुमने आज मुझे” 

इसी अक्टूबर की वो तमाम खूबसूरत शामें थी न जब कॉफ़ी हाउस में तुम्हें मैं निर्मल वर्मा की कहानियां, फ़राज़ और ग़ालिब के शेर, गुलज़ार की नज्में, शमशेर की कवितायें सुनाता था. तुम बड़े ध्यान से बैठकर मुझसे सुनती थी कहानियां, कवितायें और बाद में मुझसे बहस करती. तमाम फ़ालतू सवालात तुम किया करती थी, “इस कहानी में ऐसे क्यों हुआ... वैसे क्यों नहीं हुआ?”, “तुम्हारे इन लेखक, शायरों को लिखना नहीं आता.. उल्टा पुल्टा शेर लिख डालते हैं”, और फिर तुम ग़ालिब के शेरो को गलत ठहरा कर उन्हें एडिट कर अपना वर्जन लिखती और फिर कहती, “देखो, शायरी ऐसे की जाती है, उन फ़ालतू शायरों को मत पढ़ा करो तुम...मुझे पढ़ा करो.......आई मीन मेरी शायरी को पढ़ा करो..” 

उन दिनों जब तुम दिल्ली में थी, इसी महीने के आसपास तुम्हें कुछ काम से आठ दस दिन लगातार गोल मार्केट के पास बेयर्ड लेन जाना पड़ता था. तुम चिढ़ती थी उस रोड से, और वहाँ के लोगों से. जिन दफ्तरों में तुम्हें काम होता वहाँ जाने से पहले और वहाँ से निकलने के बाद कितना कोसती थी वहाँ काम कर रहे लोगों को तुम. एक शाम जब एक दफ्तर से निराश वापस आ रही थी तुम, तुमने कहा था इस सड़क का नाम बेयर्ड लेन नहीं बल्कि बेदर्द लेन होना चाहिए..दिल ही नहीं यहाँ के लोगों के पास, और लगभग चिल्लाते हुए तुमने कहा था, “Get a life you idiots, morons..!” मैं इधर उधर देखने लगा था, कहीं कोई तुम्हें यूँ चिल्लाते हुए देख न ले... “बड़े बेआबरू होकर इस बेदर्द लेन से हम निकले...” ये गाते हुए तुम चली आ रही थी. ऐसे झूम रही थी तुम कि अगर आसपास उस वक़्त कोई हमें देख लेता तो समझता तुम नशे में हो. 

उन सारे मीठे पलों के अलावा भी कुछ बुरे पल इस महीने ने हमें दिए हैं. हमारे लिए सुख और दुःख का अजीब संगम होते रहा है इस महीने में. जहाँ एक तरफ हमारी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी हमारी ज़िन्दगी के, और खासतौर पर तुम्हारी ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी. इसी महीने की वो तीसरी तारीख थी जब तुम्हारी दीदी हमेशा के लिए हम सब से बहुत दूर चली गयीं थीं. और इसी महीने की वो आखिरी तारीख होती थी जब तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन होता था, जिसे तुम कितने शानदार तरीके से सेलिब्रेट करती थी. इस महीने का ही वो कोई दिन था, जब तुमने पहली बार मुझे संकेत दिया था कि तुम्हें शहर छोड़कर हमेशा के लिए जाना पड़ सकता है. 

अक्टूबर की रात तो याद होगी न तुम्हें, जब हम दोनों दिल्ली से वापस अपने शहर लौट रहे थे. तुम उदास थी, क्योंकि वो अक्तूबर का वही दिन था, तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन था जो कुछ साल पहले तुमसे दूर चली गयीं थीं. तुम्हें जाने कितने किस्से याद आ रहे थे, ट्रेन पर तुम उन तमाम किस्सों को मुझे सुना रही थी जो तुम्हारी दीदी से जुड़े हुए थे. तुम उदास हो गयी थी, तुम्हारे मन में जाने क्या चल रहा था....तुम्हें अपनी दीदी की कमी अचानक बहुत ज्यादा खलने लगी थी. “वो अपने साथ मुझे क्यों नहीं लेते गयीं”, तुमने पूछा था मुझसे और फिर मेरे काँधे पर अपना सर टिकाकार ट्रेन के खिड़की से बाहर देखती रही थी, जाने क्या सोचती रही थी तुम. मैंने तुम्हारे चेहरे को देखा, तुम्हारा पूरा चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था. मैं चुपचाप बस तुम्हारे पास बैठा हुआ था. कुछ ऐसे दुःख होते हैं जिसमें आप कुछ भी कह नहीं सकते. वो वक़्त मेरे लिए भी वैसा ही था. मैं कुछ भी नहीं कर सकता था. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उस वक़्त तुम्हें क्या कहूँ? कौन सा ऐसा दिलासा दूँ मैं तुम्हें जो तुम्हारे आँसुओं को रोक सके. 

मुझे एक पल ये भ्रम भी हुआ कि जैसे तुम अपनी दीदी की वो तमाम कहानियां मुझे नहीं बल्कि उन्हें ही सुना रही हो, जैसे की वो तुम्हारे सामने बैठी हों, तुमसे बातें कर रही हों. मुझे अचानक लगने लगा कि तुम कहीं बहुत दूर निकल गयी हो.. मेरे सारे शब्द, मेरी सारी वो बातें जो तुम्हें समझाने के लिए मैं तुमसे कह रहा था, अचानक मुझे निरर्थक से लगने लगे थें. तुम बहुत देर तक बोलती रही थी और जब तुम शांत हुई, तो देखा मैंने तुम्हारे आँसू भी थम चुके थे. शायद तुम्हारी दीदी की कहानियों में ही तुम्हें कोई ऐसी कड़ी मिल गयी होगी जिसे पकड़ कर तुम वापस लौट आई थी. 

अगली सुबह बेहद खूबसूरत हुई थी. हम रात भर सोये कहाँ थे. बस बैठे हुए थे पूरी रात एक दूसरे के पास. “देखो नवम्बर का महीना आ गया...., हेल्लो बोलो उसे”, उसने उगते हुए सूरज को देखकर कहा था. वो पूरी कोशिश कर रही थी, कि मुझे लगे वो वापस उस मस्ती वाले मूड में आ गयी है, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर मैं पिछली रात के बातों का हैंगओवर साफ़ देख रहा था. उसने अपने बैग से अपना एमपीथ्री प्लेयर निकाल लिया था, और इयरफ़ोन का एक टुकड़ा मेरे कान में ठूंस दिया था उसने, और एक अपने कान में. एक गाना बजने लगा था, और उस गाने को सुनते हुए मुझे अचानक उसकी पुरानी कही एक बात याद आ गयी थी, इस गाने को पहली बार सुन कर उसने पूछा था मुझसे, अच्छा बताओ... “पानी में गिरके सूरज कैसे बुझ सकता है, और हाथ में धूप कैसे मला जाता है?”. हम दोनों ही गाना सुनते हुए एक दूसरे को देखकर हँसने लगते हैं....वो गुनगुनाने लगती है...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में
आ सजदा करूं मैं तेरे हाथों में




ये महीना अक्टूबर का ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से, कुछ बेहद प्यारी यादें तो कुछ बेहद बुरी यादें भी. तुम्हें याद है न तुमने इस महीने को ये नाम क्यों दिया था? तुम कहती थी की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर हद दर्जे का बुरा. बड़ा अजीब महीना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ न आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस अक्टूबर!


7 comments:

  1. कोमल मन के सुंदर एहसास और उतनी ही सुंदर अभिव्यक्ति भी !!

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  2. bht si sunder.....abhiji aapme vo kala hai ki aap kisi ko bhi ek alag hi duniya me ja sakte ho aapne saath in posts k madhyam se....

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  3. कुछ लम्हें यूँ ही फ्रीज़ हो जाते हैं यादों में...

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  4. हमको अक्टूबर में पहुंचा दिए... बहुत सुन्दर लिखे हो. और हाँ, गाना एकदम नोस्टालजिक कर देता है :)

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  5. So Beautiful...really loved this post of yours. So nostalgic and lovely

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