Sunday, October 19, 2014

बस्स...रिमेम्बर मी...

वो लड़के के उँगलियों से खेल रही थी. उसी उँगली से जिसपर कुछ देर पहले लड़की की शैतानी की वजह से एक हलकी खराश लग गयी थी, और लड़की ने अपने बैग से लाल रिबन निकाल कर लड़के के उस उँगली पर बाँध दिया था. वो लड़के की उँगली को हाथ में लेकर, अपनी आँखें बंद कर के जाने कौन सा मंतर पढ़ रही थी, या शायद खुद से बातें कर रही थी...

“ये क्या पागलपन है, बस एक छोटी सी खराश ही तो है, ये रिबन बाँधने की क्या जरूरत है?”, लड़के ने कहा.
“देखो, मेरे बैग में एक बैंड-एड भी रखा है, मैं चाहती तो तुम्हारी उँगली पर उसे भी बाँध सकती थी, लेकिन वो कितना अन-रोमांटिक होता.. कम से कम थोड़ा तो फ़िल्मी टाइप फील लेने दो मुझे. देखते नहीं कैसे हीरोइन हीरो की कटी उँगली पर अपने साड़ी के पल्लू का एक हिस्सा फाड़ कर बाँध देती है?
“अच्छा, तुम तो लेकिन साड़ी नहीं पहनी हो, चलो साड़ी न सही, अपने दुपट्टे का ही कोना फाड़ कर बाँधती. और भी फ़िल्मी टाइप फील आता न?”.

लड़की शायद चिढ़ गयी इस बात से. वो अजीब शक्ल बनाकर लड़के को देखने लगी. थोड़ी देर चुप रही वो और फिर मुहँ बिचकाकर कहती है..
“जाओ मिस्टर ये मेरा फेवरिट दुपट्टा है, तुम्हारी इस स्टुपिड उँगली की वजह से मैं अपना दुपट्टा फाड़ दूँ? ना...नेवर..! और दूसरी बात ये कि फिल्म में जाने क्या गलत-सलत दिखाते हैं. पता नहीं फिल्म में कैसे हीरोइन अपने दुपट्टे या साड़ी के पल्लू को इतने आसानी से फाड़ लेती है, और वो भी इतना ऐक्यूरट कि हीरो के उँगली पर उसके साड़ी के पल्लू का वो टुकड़ा एक बैंड-एड की तरह  फिट आये, न बड़ा न छोटा. मुझे तो लगता है जरूर हीरोइन के उँगलियों में ब्लेड लगा होता होगा, वरना इतने आसानी से साड़ी या दुपट्टे का पल्लू फटता है क्या? मुझसे तो नहीं फटता, इसलिए मैंने आसान उपाए सोचा, ये रिबन बाँध दिया..!

उँगली में बंधे रिबन का एक सिरा हाथ में लेकर वो कहने लगी... जानते हो इस दुनिया में कितनी ही छोटी छोटी चीज़ें हैं जिनके बारे में हम नहीं सोचते, लेकिन अगर देखो तो वो कितने मायने रखती है. एक साधारण सा लाल रिबन, एक रिंग, एक किताब, कुछ कवितायें, किसी कागज़ पर पड़े कुछ कॉफ़ी के धब्बे, किसी के बोले महज दो शब्द ‘रिमेम्बर मी’..! कभी कभी इंसान के लिए कितनी जरूरी सी हो जाती हैं ये छोटी छोटी बातें, ये तुमने सोचा है कभी? कुछ के लिए तो अपनी ज़िन्दगी वापस पाने का ये जरिया बन जाती हैं.

तुम्हें वो फिल्म तो याद होगी न जिसमें भविष्य की कहानी थी, जिसमें दिखाया गया था कि आज से बहुत साल बाद कुछ ऐसा होगा कि लोग इमोशनलेस हो जायेंगे. एक ऐसा विश्व युद्ध होता है उस फिल्म में, जिसके बाद दुनिया से प्यार, मोहब्बत, एहसास सब खत्म हो जाते हैं. जहाँ इमोशनल होना एक अपराध माना जाता है. हँसने वालों को रोने वालों को प्यार करने वालों को पकड़ लिया जाता है, रस्सी से जकड़ा जाता है, कोड़े बरसाए जाते हैं उनपर, मार दिया जाता है उन्हें. ऐसी दुनिया बन बन जाती है. हँसना, रोना, गाना, नाचना, कहानियां पढ़ना, किताबें पढ़ना, कवितायें पढ़ना... सब अपराध हो जाता है उस दुनिया में. यहाँ तक कि अपनी पसंदीदा पेंटिंग रखना भी या अपने बीवी, प्रेमी या बेटे बेटियों की तस्वीर पास में रखना भी गुनाह माना जाता है, और जिसकी सज़ा बस मौत होती है.

उसमें जो नायक है, वो उसी निर्दयी पुलिस का हिस्सा है जो इमोशनल लोगों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें पकड़ते हैं और उन्हें मार देते हैं. लेकिन कुछ ऐसा होता है फिल्म के नायक के साथ जिससे उसमें वापस से वही एहसास जीवित हो जाते हैं, उसमें फिर से प्यार जागने लगता है. जानते हो न कैसे? उसकी बीवी के एक लाल रिबन से, जिसे वो अपने पॉकेट में बाकी पुलिस वालों से छुपा कर रख लेता है, अपने दोस्त के पास मिली एक कविताओं की किताब से, जिसे वो पढ़ता है हर रात, उस छोटे से प्यारे से ‘पपी’ के वजह से, जिसे उन निर्दयी पुलिस वालों से बचा लाता है अपने पास, अपनी बीवी के कहे दो शब्द ‘‘रिमेम्बर मी’ से, जो उसे तब याद आता है जब वो उस लाल रिबन को अपने हाथों में लेता है.

सोचो ज़रा, यही वो व्यक्ति था जिसे अपने दोस्त को मारने का हुक्म मिला था. इसके दोस्त की बस इतनी खता थी कि उसमें एहसास जीवित थे, वो साहित्य पढ़ता था, वो सबसे छुप कर कवितायें पढ़ता था, एक लड़की से प्यार करता था. और इसने अपने दोस्त को मारने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कुछ. बस इसे हुक्म मिला, और अपने दोस्त को मारने चला आया था. इसने दोस्त को मारने से पहले उससे माफ़ी माँगी, दोस्त का जवाब था, ‘तुम्हें माफ़ी माँगने की जरूरत ही नहीं. तुम माफ़ी शब्द का अर्थ ही नहीं समझते, तुम एक मशीन हो’. और सोचो, अपने दोस्त को मारने के बाद उसमें कैसे बदलाव होते हैं, एक मशीन से इंसान बन जाता है वो, अपने दोस्त के पास मिली उस किताब से, लाल रिबन से, उस ‘पपी’ के वजह से. 

वैसे तो ये कहानी है, लेकिन सोचो दुनिया कितनी क्रूर हो सकती. ये कहते हुए लड़की काँप जाती है. लड़खड़ाई आवाज़ में वो आगे कहती है, सोचो अगर कभी ऐसा हुआ तो ऐसी दुनिया कितनी भयानक होगी. लोग कितने निर्दयी हो जायेंगे? अगर देखो तो शुरुआत अभी से ही हो गयी है, तुम्हें नहीं लगता ऐसा? अभी ही कौन सा लोगों को किसी के एहसास की कद्र है? बचे कितने हैं एहसास वाले लोग? वो लोग जिन्हें दूसरों की सच में फ़िक्र है, जो प्यार करना जानते हैं.. ऐसे लोग बचे ही कितने हैं? मेरे और तुम्हारे जैसे चंद लोग. बस. इसलिए मैं कहती हूँ, मेरे और तुम्हारे जैसे लोगों का होना इस दुनिया के लिए बेहद जरूरी है. ताकि लोगों में प्यार बचा रहे. लोग विश्वास कर सकें प्यार पर. आने वाले पीढ़ियों को ये न लगे कि प्यार महज एक शब्द है, और फिल्म पर दिखाए जाने वाला एक फार्मूला. 

तुम जानते हो? लोग कहते हैं न, ये प्यार, ये शायरी, ये कवितायें, कमज़ोर होती हैं, इंसान को कमज़ोर बनाती हैं... ये सच नहीं है, बल्कि ये इंसान को बहुत मजबूत बनाती हैं. तुम कविताओं को देख लो, तुम लिखते हो न कवितायें? क्या तुम जानते हो कवितायें खुद में कितनी स्ट्रोंग होती हैं? उनका कितना बड़ा प्रभाव पड़ता है इंसान पर? एक फिल्म थी, शायद तुमने भी देखी हो वो फिल्म.. उसमें कहा गया था “We don't read and write poetry because it's cute. We read and write poetry because we are members of the human race. And the human race is filled with passion. Poetry, beauty, romance, love, these are what we stay alive for.
तुम उस एक और फिल्म की ही बात ले लो न, तुमने और हमने एक साथ देखा था उसे, जिसमें पृथ्वी पूरी बर्बाद हो जाती है, लोग मंगल ग्रह पर रहने चले जाते हैं, लोगों की याददाश्त को भी हमेशा के लिए मिटा दिया जाता है, उस फिल्म में भी उस लड़के को बर्बाद हुए पृथ्वी के किसी कोने से एक कविताओं की किताब मिलती है, और उन कविताओं को पढ़कर उसमें कैसा बदलाव आता है. इंसानी रिश्तों पर उसे यकीन होने लगता है.

वो फिल्म याद है तुम्हें?? जहाँ लड़की की दी हुई  अंगूठी को छूते ही उस लड़के को अपनी पिछली कहानी याद आ जाती है? और वो उस लड़की को याद कर के रोने लगता है. वो फिर कैसे ढूँढ लाता है उस लड़की को, या फिर वो फिल्म ही ले लो, जिसमें लड़की के किताब में पड़े एक सूखे गुलाब के फूल को छूते ही वो एकदम से कैसे बेचैन हो जाती है, एक एक कर के उसके आँखों के सामने उसकी सारी पुरानी स्मृतियाँ वापस आने लगती है और अगले ही दिन वो निकल जाती है मीलों दूर अपने उस दोस्त को खोजने के लिए जिसने उसे वो गुलाब का फूल दिया था. 

जानते हो, इसलिए मैं कहती हूँ तुमसे, मेरी तरह छोटी छोटी बातों पर भी ध्यान दिया करो. कभी ऐसा हो जाये, किसी भी वजह से, ऐसी ही कोई बात हो जाए जो उन फिल्मों में हुआ था, और तुम भूल जाओ मुझे, तो मेरी वही छोटी छोटी इललॉजिकल बातें तुम्हें वापस मेरे पास लेकर आ जायेंगी, मेरी यही छोटी बेकार सी बातें , हरकतें देखना उस वक़्त तुम्हारी ज़िन्दगी का कितना बड़ा सहारा बन जायेगी. कभी कोई लड़की तुम्हें सड़क पर चीटियों को देखते मिले, उनसे बातें करते मिले तो तुम्हें याद आएगा, कि ऐसी कोई लड़की थी भी जिसे मैं जानता था, जो घंटों चीटियों से बातें करती थी, कभी आसमान में हवाई जहाज को उड़ते गौर से देखो तो तुम्हें याद आएगा कि कोई ऐसी लड़की थी, जो एरोप्लेन के पीछे बनते इन कॉनट्रेल्स को आसमान में बनी सड़क कहती थी...और न जाने ऐसी कितनी ही बातें तुम्हें याद आती रहेंगी, तुम तो जानते हो मेरे ऐसे हरकतें, काउंटलेस हैं, लेकिन इन हरकतों को तुम बेकार न समझना. कब मेरी कौन सी बात तुम्हारी ज़िन्दगी को कैसे बदल दे, ये तुम्हें अंदाजा भी नहीं हो पायेगा. ! 

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लड़का उतने आगे की बात नहीं सोचता कभी, किसे पता है आने वाले सालों में क्या हो? लेकिन एक बात वो जानता है, वो लड़की के उस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि कभी भी ऐसा हो सकता है कि वो लड़की को भूल जाए. लड़की समझती है कि लड़का उसकी इललॉजिकल बातों को इग्नोर कर दिया करता है, लेकिन जाने कितनी ही ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जो लड़का आज भी याद रखे हुए है, वो बातें जो शायद लड़की को भी याद न हो, वो बातें जिसे सुन शायद लड़की को भी आश्चर्य हो कि कोई ये सब बातें भी याद रख सकता है.



नगमें हैं शिकवे हैं किस्से हैं बातें हैं
बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं
ये यादें किसी दिल-ओ-जानम के
चले जाने के बाद आती हैं

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Saturday, October 4, 2014

मिस्टिरीअस अक्तूबर!

अक्टूबर का महीना बड़ा ही खुशनुमा सा एक एहसास लेकर आता है. गर्मियों के दिन विदा होने को होते हैं, पेड़ों से पत्ते झर के गिरने लगते हैं, सर्दियों के आने की आहट सुनाई देने लगती है, मौसम अचानक थोड़ा ठंडा हो जाता है और हवाओं में चारों तरफ त्योहारों की खुशबू  बसी होती है.

हम दोनों के लिए ये अक्टूबर हमेशा बेहद खास रहा है. तुम्हारे लिए तो शायद बहुत पहले से ही अक्टूबर खास रहा होगा, लेकिन मेरे लिए अक्टूबर बस तब से ख़ास हुआ है जब से तुमसे मुलाकात हुई. तुमसे मिलने से पहले मौसमों के आने जाने से, महीनों के आने-जाने से मुझे फर्क नहीं पड़ता था. तुम्हारे आने के बाद ही हुआ कि हर मौसम से, हर महीने से एक रिश्ता बन गया. तुम्हें जानने के बाद ही मैंने ये जाना था कि मौसम भी इतने ख़ास हो सकते हैं कि उनका कोई नाम रख सकता है. तुम रखती थी मौसमों के नाम...तरह तरह के नाम, और हर नाम के पीछे तुम्हारी एक मजेदार लॉजिक होती थी. मिस्टिरीअस अक्टूबर, नॉस्टैल्जिक नवम्बर, टेंडर दिसम्बर, जैज़ी जनवरी जैसे नाम तुमने हर मौसम को दे रखे थे. लेकिन शायद जितना महत्वपूर्ण अक्टूबर और दिसम्बर महीना रहा है हम दोनों के लिए उतना शायद और कोई महीना नहीं रहा. 

किसे पता था कि दो अजनबी चलते हुए टकरा जायेंगे, इसी अक्टूबर महीने के आखिरी एक शाम में, जब तुम्हें जाना था पहली बार. किसे पता था कि इसी अक्तूबर की वो पहली तारीख होगी जब तुम्हें करीब से समझा था, तुम्हारे हर एक दर्द को महसूस किया था, तुम्हारे मुसकराहट के पीछे छुपे उस सच को, तुम्हारी उन तकलीफों को, उन बेचैनियों को महसूस किया था मैंने. 

तुम्हें याद है, अक्टूबर की ही वो आखिरी शाम थी न? तुम्हारी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण दिन था वो. आखिरी ही कुछ पल बाकी थे अक्टूबर के विदा होने में, जब तुम्हें फ़ोन किया था मैंने और पहली बार फोन पर गाकर मैंने सुनाये थे बहुत से गाने तुम्हें, रात भर. फोन के दूसरे तरफ तुम बिलकुल चुप थी. लगातार रो रही थी, तुम्हारे आँसू गिर रहे थे, किसी तकलीफ से नहीं बल्कि ख़ुशी के आँसूं थे वो. “I am Overwhelmed”, तुम बस यही तीन शब्द कह पायी थी...मात्र ये तीन शब्द, इसके अलावा तुम कुछ भी बोल नहीं पायी थी. “तुम्हारे इन सब बातों पर रोने से, तुम्हारे इन आँसुओं की मुझे फिक्र नहीं होती. ये अच्छे आँसू हैं, ऐसे आँसू प्यारे लगते हैं..” यही कहा था न मैंने तुम्हें उस रात?

लोग नहीं समझेंगे इस बात को, ये नहीं समझ पायेंगे वे की तुम उस रात उस छोटी सी बात पर क्यों इतनी खुश हो गयी थी कि तुम लगातार बस रोये जा रही थी. बस गाना ही तो गाया था मैंने. लेकिन मेरे उस गाने की अहमियत क्या थी ये तुम जानती थी. सालों पहले जब किसी एक वजह से जिस लड़के ने गुनगुनाना छोड़ दिया था, तनहाई में भी कभी शायद ही कभी वो गुनगुनाया हो, वो सिर्फ एक लड़की की एक प्यारी, मासूम जिद के लिए उसे रात भर गाना सुनाते रहेगा. इसका शायद तुम्हें भी यकीन नहीं था. वो रात जो तुम्हारे लिए बहुत अहमियत रखती थी, तुम्हारे उस स्पेशल दिन पर वो मेरा तोहफा था. तुमने कहा था मुझसे, “कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है कि अपने कम्फर्ट ज़ोन से कोसों बाहर जाकर वो कोई ऐसा काम कर दे उस लड़की के लिए. ये सबसे अनमोल तोहफा दिया है तुमने आज मुझे” 

इसी अक्टूबर की वो तमाम खूबसूरत शामें थी न जब कॉफ़ी हाउस में तुम्हें मैं निर्मल वर्मा की कहानियां, फ़राज़ और ग़ालिब के शेर, गुलज़ार की नज्में, शमशेर की कवितायें सुनाता था. तुम बड़े ध्यान से बैठकर मुझसे सुनती थी कहानियां, कवितायें और बाद में मुझसे बहस करती. तमाम फ़ालतू सवालात तुम किया करती थी, “इस कहानी में ऐसे क्यों हुआ... वैसे क्यों नहीं हुआ?”, “तुम्हारे इन लेखक, शायरों को लिखना नहीं आता.. उल्टा पुल्टा शेर लिख डालते हैं”, और फिर तुम ग़ालिब के शेरो को गलत ठहरा कर उन्हें एडिट कर अपना वर्जन लिखती और फिर कहती, “देखो, शायरी ऐसे की जाती है, उन फ़ालतू शायरों को मत पढ़ा करो तुम...मुझे पढ़ा करो.......आई मीन मेरी शायरी को पढ़ा करो..” 

उन दिनों जब तुम दिल्ली में थी, इसी महीने के आसपास तुम्हें कुछ काम से आठ दस दिन लगातार गोल मार्केट के पास बेयर्ड लेन जाना पड़ता था. तुम चिढ़ती थी उस रोड से, और वहाँ के लोगों से. जिन दफ्तरों में तुम्हें काम होता वहाँ जाने से पहले और वहाँ से निकलने के बाद कितना कोसती थी वहाँ काम कर रहे लोगों को तुम. एक शाम जब एक दफ्तर से निराश वापस आ रही थी तुम, तुमने कहा था इस सड़क का नाम बेयर्ड लेन नहीं बल्कि बेदर्द लेन होना चाहिए..दिल ही नहीं यहाँ के लोगों के पास, और लगभग चिल्लाते हुए तुमने कहा था, “Get a life you idiots, morons..!” मैं इधर उधर देखने लगा था, कहीं कोई तुम्हें यूँ चिल्लाते हुए देख न ले... “बड़े बेआबरू होकर इस बेदर्द लेन से हम निकले...” ये गाते हुए तुम चली आ रही थी. ऐसे झूम रही थी तुम कि अगर आसपास उस वक़्त कोई हमें देख लेता तो समझता तुम नशे में हो. 

उन सारे मीठे पलों के अलावा भी कुछ बुरे पल इस महीने ने हमें दिए हैं. हमारे लिए सुख और दुःख का अजीब संगम होते रहा है इस महीने में. जहाँ एक तरफ हमारी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी हमारी ज़िन्दगी के, और खासतौर पर तुम्हारी ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी. इसी महीने की वो तीसरी तारीख थी जब तुम्हारी दीदी हमेशा के लिए हम सब से बहुत दूर चली गयीं थीं. और इसी महीने की वो आखिरी तारीख होती थी जब तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन होता था, जिसे तुम कितने शानदार तरीके से सेलिब्रेट करती थी. इस महीने का ही वो कोई दिन था, जब तुमने पहली बार मुझे संकेत दिया था कि तुम्हें शहर छोड़कर हमेशा के लिए जाना पड़ सकता है. 

अक्टूबर की रात तो याद होगी न तुम्हें, जब हम दोनों दिल्ली से वापस अपने शहर लौट रहे थे. तुम उदास थी, क्योंकि वो अक्तूबर का वही दिन था, तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन था जो कुछ साल पहले तुमसे दूर चली गयीं थीं. तुम्हें जाने कितने किस्से याद आ रहे थे, ट्रेन पर तुम उन तमाम किस्सों को मुझे सुना रही थी जो तुम्हारी दीदी से जुड़े हुए थे. तुम उदास हो गयी थी, तुम्हारे मन में जाने क्या चल रहा था....तुम्हें अपनी दीदी की कमी अचानक बहुत ज्यादा खलने लगी थी. “वो अपने साथ मुझे क्यों नहीं लेते गयीं”, तुमने पूछा था मुझसे और फिर मेरे काँधे पर अपना सर टिकाकार ट्रेन के खिड़की से बाहर देखती रही थी, जाने क्या सोचती रही थी तुम. मैंने तुम्हारे चेहरे को देखा, तुम्हारा पूरा चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था. मैं चुपचाप बस तुम्हारे पास बैठा हुआ था. कुछ ऐसे दुःख होते हैं जिसमें आप कुछ भी कह नहीं सकते. वो वक़्त मेरे लिए भी वैसा ही था. मैं कुछ भी नहीं कर सकता था. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उस वक़्त तुम्हें क्या कहूँ? कौन सा ऐसा दिलासा दूँ मैं तुम्हें जो तुम्हारे आँसुओं को रोक सके. 

मुझे एक पल ये भ्रम भी हुआ कि जैसे तुम अपनी दीदी की वो तमाम कहानियां मुझे नहीं बल्कि उन्हें ही सुना रही हो, जैसे की वो तुम्हारे सामने बैठी हों, तुमसे बातें कर रही हों. मुझे अचानक लगने लगा कि तुम कहीं बहुत दूर निकल गयी हो.. मेरे सारे शब्द, मेरी सारी वो बातें जो तुम्हें समझाने के लिए मैं तुमसे कह रहा था, अचानक मुझे निरर्थक से लगने लगे थें. तुम बहुत देर तक बोलती रही थी और जब तुम शांत हुई, तो देखा मैंने तुम्हारे आँसू भी थम चुके थे. शायद तुम्हारी दीदी की कहानियों में ही तुम्हें कोई ऐसी कड़ी मिल गयी होगी जिसे पकड़ कर तुम वापस लौट आई थी. 

अगली सुबह बेहद खूबसूरत हुई थी. हम रात भर सोये कहाँ थे. बस बैठे हुए थे पूरी रात एक दूसरे के पास. “देखो नवम्बर का महीना आ गया...., हेल्लो बोलो उसे”, उसने उगते हुए सूरज को देखकर कहा था. वो पूरी कोशिश कर रही थी, कि मुझे लगे वो वापस उस मस्ती वाले मूड में आ गयी है, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर मैं पिछली रात के बातों का हैंगओवर साफ़ देख रहा था. उसने अपने बैग से अपना एमपीथ्री प्लेयर निकाल लिया था, और इयरफ़ोन का एक टुकड़ा मेरे कान में ठूंस दिया था उसने, और एक अपने कान में. एक गाना बजने लगा था, और उस गाने को सुनते हुए मुझे अचानक उसकी पुरानी कही एक बात याद आ गयी थी, इस गाने को पहली बार सुन कर उसने पूछा था मुझसे, अच्छा बताओ... “पानी में गिरके सूरज कैसे बुझ सकता है, और हाथ में धूप कैसे मला जाता है?”. हम दोनों ही गाना सुनते हुए एक दूसरे को देखकर हँसने लगते हैं....वो गुनगुनाने लगती है...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में
आ सजदा करूं मैं तेरे हाथों में




ये महीना अक्टूबर का ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से, कुछ बेहद प्यारी यादें तो कुछ बेहद बुरी यादें भी. तुम्हें याद है न तुमने इस महीने को ये नाम क्यों दिया था? तुम कहती थी की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर हद दर्जे का बुरा. बड़ा अजीब महीना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ न आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस अक्टूबर!


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