Saturday, September 6, 2014

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स्वीट एम्बैरेसमेन्ट


मुझे लगता है कि बहुत सालों बाद भी जब भी दिल्ली या दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस का जिक्र होगा, मुझे तुम्हारी वो तमाम चिट्ठियाँ याद आएँगी जो यहाँ बैठकर तुम्हें मैं लिखा करता था, या फिर तुम्हारी लिखी वो तमाम चिट्ठियाँ जो यहाँ बैठकर मैं पढ़ा करता था. बीच के कुछ सालों में ईमेल, चैट और फ़ोन की आदत लगने की वजह से हम दोनों ने चिट्ठी लिखना एक दूसरे को लगभग बंद ही कर दिया था. तुम्हें फिर से चिट्ठी लिखने का सिलसिला भी इसी कॉफ़ी हाउस से शुरू था.

जिस ख़त से तुम्हें फिर से मैंने चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, वो तुम्हारे जन्मदिन पर लिखा एक बेहद लम्बा खत था, जिसे लिखने में मुझे तकरीबन तीन घंटे का वक़्त लग गया था. यहीं इसी कॉफ़ी हाउस से बैठकर तुम्हें वो खत लिखा था मैंने. अरसे बाद किसी को मैंने वैसा लम्बा खत लिखा था. लम्बे खत लिखने की आदत हम दोनों को तब से थी जब हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. मजेदार बात ये थी कि दोनों का लम्बे खत लिखना बंद होने की वजह और फिर इस आदत के शुरू होने की वजह एक ही थी. हम दोनों के कुछ ख़ास अपनों ने ही हमारी लम्बी चिट्ठी लिखने का अकसर मजाक उड़ाया, जिससे चिढ़ कर हम दोनों ने ही लोगों को लम्बे खत लिखने बंद कर दिए थे. तब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. लम्बे खत फिर से लिखने की वजह हम दोनों ही बने एक दूसरे के लिए. तुम्हारे वजह से मैं लम्बे खत लिखने लगा था और मेरी वजह से तुम. हम दोनों की ये भूली हुई आदत फिर से लग गयी थी, यूँ  लम्बे खत लिखने की. तुमने एक खत में ये लिखा भी था न, और कितना सही लिखा था तुमने. तुमने कहा था - “देखो तो, मौका पाते ही पुरानी आदतें  उभर आती हैं...है न?? और आदत भी इतनी खूबसूरत. लम्बे खत लिखने की...” 

जानती हो, तुमने जिस खत से दोबारा चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, उस खत को मैंने इसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर पढ़ा था. वो लम्बी चिट्ठी तुम्हारी दरअसल चिट्ठी नहीं बल्कि रोचनामचे टाइप की चिट्ठी थी, एक डायरी जैसा था वो...हर दिन कुछ न कुछ जोड़ा था तुमने उस चिट्ठी में और तब मुझे भेजा था तुमनें. मैं कॉफ़ी हाउस में ही बैठकर वो चिट्ठी पढ़ रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था उस दिन कुछ ऐसा होगा मेरे से जिसकी उम्मीद खुद मैंने भी नहीं की थी. चिट्ठी पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा मैं कर गया था, जानबूझकर नहीं बल्कि अनजाने में ही मेरे से वो हो गया था. अपनी  उस हरकत पर मैं बड़ा शर्मिंदा सा हो गया था. 

कॉफ़ी हाउस में बैठा मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था. एक हाथ में तुम्हारी चिट्ठी थी और एक हाथ से मैं सांभर वड़ा खा रहा था. तुम्हारी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता हूँ, बाकी कुछ भी ध्यान नहीं रहता मुझे. उस शाम भी मुझे बिलकुल ध्यान नहीं रहा था कि मेरे प्लेट में वड़ा रखा है जिसे मैं चम्मच से काट कर खा रहा हूँ. मेरा सारा ध्यान तुम्हारी चिट्ठी के ऊपर था, तभी पता नहीं कैसे वड़ा काटते हुए मेरे हाथ से चम्मच फिसल गया, और वड़ा का एक टुकड़ा सीधा उछल कर सामने वाले टेबल पर रखे प्लेट में जा गिरा. दो बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे उस टेबल पर. मेरे तो होश उड़ गए थे. ये क्या हो गया मुझसे. मैं समझ गया था, आज अच्छी खासी बात बेवजह सुननी पड़ जायेगी. लेकिन वो दोनों बुजुर्ग बड़े मीठे स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उन्होंने गुस्से से नहीं बल्कि मुस्कुराकर बड़े प्यार से कहा, “कोई बात नहीं बेटा, बस थोड़ा ध्यान रखा करो...”. उन्होंने तो बुरा नहीं माना लेकिन मेरे अन्दर हद दर्जे की एम्बैरेसमेन्ट फील आने लगी थी. मैं झटपट वहाँ से उठा और सीधा कैफे के बाहर आ गया. 

ऐसा मेरे साथ अकसर होता है, खासकर जब भी तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा होता हूँ मैं या फिर तुम्हारे ईमेल्स या मेसेज. कितनी ही बार मुझे ऐसे एम्बैरेसमेन्ट का सामना करना पड़ा है. वैसे मैं इसे एम्बैरेसमेन्ट नहीं बल्कि `स्वीट एम्बैरेसमेन्ट' कहता हूँ. मुझे उस वक़्त बड़ी हँसी सी आती है खुद पर. कॉफ़ी हाउस की ये घटना पहली घटना नहीं थी, एक और दिलचस्प किस्सा तब हुआ था, जब तुम्हारी ही लिखी एक चिट्ठी मैं यहाँ पढ़ रहा था, इसी कॉफ़ी हाउस में. 

उस शाम काफी भीड़ थी कॉफ़ी हाउस में. कुछ बुजुर्ग लोग एक लम्बे टेबल पर बैठे थे. बैठने की कहीं और जगह नहीं देखकर मैंने वहाँ बैठे लोगों से इजाज़त ली और उनके टेबल पर ही एक कोने में बैठ गया. मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी टोली के साथ बातों में मगन थे और मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ने में. पास वाले बुजुर्ग ने एक प्लेट पकौड़ियाँ मँगवाई खाने को. वो पकौड़ियाँ मेरे हाथों के पहुँच के दायरे में थीं. मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था, और पढ़ते वक़्त ये भी ख्याल नहीं रहा कि मैंने सिर्फ कॉफ़ी आर्डर की है. मैं पास बैठे अंकल के प्लेट से पकौड़ियाँ लेकर बड़े इत्मिनान से खा रहा था. तीन चार पकौड़ियाँ मेरे पेट के अन्दर चली गयीं थी तब मुझे एकाएक ख्याल आया, ये मैं क्या कर रहा हूँ. बगल वाले अंकल मेरा ये गिल्ट भांप गए, और वो एकाएक हँसनें लगे. “कोई बात नहीं बेटा, हो जाता है. अब जब खा ही रहे हो, तो रुक क्यों गए, खाओ न..और आ जायेंगे”. उन्होंने कहा. लेकिन मैं इतना शर्मिंदा हो गया था, कि उनसे माफ़ी मांगी मैंने और तुरंत फिर वापस चला आया था.

सच में मुझे हैरत होती है कि मैं ऐसी हरकतें कैसे करने लगता हूँ. तुम्हें पता है न कितना डिसिप्लिन्ड पसंद व्यक्ति हूँ मैं. किसी से बात करने से लेकर सड़क पर चलने तक, गाड़ी चलाने तक हर बात कायदे से करने की आदत है मुझे. खोया खोया नहीं रहता सड़क पर चलते वक़्त. चिढ होती है जब देखता हूँ कोई मोबाइल में आँख गड़ाए सड़क पर चले जा रहा है. ऐसे लड़के या लड़कियों से कितना चिढ़ता था मैं, ये तुम जानती ही हो. लेकिन क्या ये पता है तुम्हें, जब मेरे पास नया स्मार्टफोन आया था, तो मैं भी अकसर ऐसे ही हरकतें कर दिया करता था. एक दो बार इन हरकतों की वजह से भी मुझे थोड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है. जैसे एक शाम का एक किस्सा है. 

मैं अपने भैया के साथ अपने मोहल्ले के मार्केट के किनारे बने पेवमेंट पर चल रहा था. वो पेवमेंट समतल नहीं थीं, कहीं ज्यादा स्लोप तो कहीं बिलकुल ऊँचा. ऐसी हालत उस पेवमेंट की थी. तुमने मुझे कुछ जरूरी मेसेज भेजे थे फेसबुक पर, मोबाइल पर फेसबुक का मेसेज टोन सुनाई दिया और मैंने झट से अपना मोबाइल पॉकेट से निकाला और चलते हुए ही मेसेज पढ़ने लगा. मेरा ध्यान चलने पर कम और तुम्हारे मेसेज पर ज्यादा था. यूँ कहो कि मेरा सारा ध्यान मेसेज पढ़ने पर ही था. जाने कहाँ से मेरा पैर फिसला, किस चीज़ से टकरा गया था मैं, मेसेज पढ़ते हुए ही, मोबाइल हाथ में लिए सड़क पर मैं फिसल गया, धम्म से नीचे गिरा सड़क पर. भैया आगे आगे चल रहे थे. उनके पीछे मुड़ने से पहले ही मैं झट से उठ गया, हाथ पैर झाड़ कर मैं उनके साथ हो लिया. चोट तो मुझे नहीं लगी थी लेकिन अपने मोहल्ले में गिरना, ऐसी जगह जहाँ आसपास के दुकान वाले मुझे अच्छे से जानते हैं, मुझे शर्मिंदा कर गया. ज्यादा शर्मिंदगी मुझे अगले दिन हुई थी, जब मार्केट के कोना पर चाट बनाने वाले लड़के ने पूछ दिया था मुझसे “भैया आप कल गिर गए थे...चोट तो नहीं लगी  थी आपको ज्यादा?” उस दिन के बाद लेकिन मैंने तय किया था कि अब कभी राह चलते हुए ऐसे मोबाइल का प्रयोग नहीं करूँगा मैं. उसके बाद से तुम्हारे मेसेज मुझे यूँ मिलते भी हैं, तो मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर मेसेज पढ़ लेता हूँ लेकिन चलते हुए मेसेज करना उस दिन के बाद से मैं भूल ही गया.

जाने कितने सारे इस तरह के किस्से हैं मेरे. जाने कितनी बार अजीब अजीब हरकतें मेरे तरफ से हुई हैं. एक दिलचस्प किस्सा है, एक दिलचस्प से दिन का. मेरे लिए ये किस्सा एक यादगार किस्सा इसलिए भी है कि इसमें तुम भी हो. तुम्हें तो याद होगा ही वो दिन न जब कश्मीरी गेट बस अड्डे पर तुमसे मिला था मैं? 

दरअसल हम मिले नहीं थे उस दिन. बस एक दूसरे को दूर से ही देखे थे. बस एक घंटे के लिए तुम दिल्ली आई थी, तुम्हारी बस थी दोपहर में अम्बाला के लिए, और मैं तुमसे मिलने, बस तुम्हें एक झलक देखने के लिए बस स्टैंड आ पहुँचा था. तुम्हारे कुछ रिश्तेदार तुम्हारे साथ थे, वही कुछ रिश्तेदार जिनकी वजह से मुझे और तुम्हें जाने कितनी परेशानियों से गुज़ारना पड़ा था, वही कुछ रिश्तेदार जिनके वजह से हमने तय किया था कि उस दिन एक दूसरे के सामने नहीं आयेंगे हम. मैंने तुम्हें पहले से निर्देश दे तो दिए थे, कि मैं कहाँ पर खड़ा रहूँगा. तुम बस नज़रें उठा कर मेरी तरफ देख लेना, और यदि मौका मिला तो हम एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए एक दूसरे को ‘हेल्लो’ भी बोल सकेंगे. लेकिन फिर भी तुम घबराई हुई थी. तुम्हारे मन में ये डर था, कहीं मुझे तुम्हारे रिश्तेदारों ने वहाँ बस स्टैंड पर देख लिया, तो बेवजह कहीं कुछ बात न बढ़ जाए. लेकिन मैंने तुम्हें आश्वस्त किया था कि मैं इन्विज़बल रहने में उस्ताद हूँ. तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं देख पायेगा, इसकी जिम्मेदारी मेरी. तुम मेरे इस बात से निश्चिंत हो गयी थी. जैसा कि हमने तय किया था, उस दिन सभी कुछ वैसा ही हुआ था. हमनें दूर से ही एक दूसरे को देखा था, तुम मुझे देख कर मुस्कुराई थी उस दिन. मन में लेकिन हम दोनों के एक खलिश रह गयी, कि इतने करीब होने के बावजूद, कुछ मीटर की दूरी पर ही हैं हम दोनों और एक दूसरे से मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन मन की इस एक चुभन के बावजूद हम दोनों बेहद खुश थे. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा था, और हमें किसी ने नहीं देखा एक दूसरे को देखते हुए. हम दोनों दूर से ही एक दूसरे को देखकर खुश थे. 

कुछ देर बाद तुम्हारी बस अम्बाला के लिए रवाना हो गयी. तुम्हारे जाने के बहुत देर बाद तक मैं बस स्टैंड के उस प्लेटफोर्म पर बैठा रहा था जहाँ से तुम्हारी बस अम्बाला के लिए निकली थी. एक तो मैं तुम्हारे ख्यालों में गुम था, और दूसरा ये कि हर बार जब भी तुम मेरे सामने आती हो, जाने क्या हो जाता है मुझे, एक नशा सा छा जाता है आँखों पर. उस दिन भी शायद तुम्हारा ही नशा आँखों पर छाया हुआ था, शायद इसलिए मैं प्लेटफोर्म पर लगे एक बड़े से शीशे से जाकर टकरा गया था. हाँ, उस दिन यही हुआ था. कश्मीरी गेट बस अड्डे के प्लेटफोर्म से एक्जिट करने के लिए बेसमेंट में बने वेटिंग हॉल से गुज़रना पड़ता है. वेटिंग रूम में बड़े से शीशे के दरवाज़े बने हुए हैं, और मैं जाने तुम्हारे किन ख्यालों में गुम था, कि सीधा जाकर उस शीशे के दरवाज़े से ही मैं टकरा गया था, और जोर से टकराया था मैं. मेरे दरवाज़े से टकराने के साथ ही कुछ लोगों की निगाहें मुझपर उठ गयी थीं. कुछ की दबी सी हँसी भी निकल आई थी. मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लिया, बाहर जब आया, तो खुद पर बेहद हँसी आ रही थी. मैं कैसे ऐसे टकराने लगा हूँ चलते हुए, लड़खड़ाने लगा हूँ चलते हुए...सच में बड़ा तगड़ा हैंगोवर होता है तुम्हारा मुझपर. 

ऐसे जाने कितने और किस्से मेरे साथ होते ही रहते हैं और हर बार ऐसे किस्से या ऐसे हादसों के बाद मैं तुम्हें मन ही मन गरिया भी देता हूँ, “बदतमीज़ लड़की, फिर से मुझे एम्बैरस करवा गयी”. लेकिन इन सब बातों के बावजूद, तुम्हारे ऊपर या तुम्हारी यादों के ऊपर या खुद के ऊपर कभी गुस्सा नहीं बल्कि हँसी आती है.. मैं बस मुस्कुरा देता हूँ ऐसे स्वीट एम्बैरेसमेन्ट पर.

3 comments:

  1. जैसा कि हमेशा होता है, तुम्हारी `अहसास...' की पोस्ट आते ही हम उसे पढ़ डालते हैं, आज भी वही हुआ न...:) एक साँस में पढ़ डाली...| तमीज तो कहती है कि किसी के शर्मिन्दगी वाले टाइप की बातों पर हंसना नहीं चाहिए...पर तुम्हारे साथ तमीज कब निभाते हैं हम जो आज निभाते...??? :p
    तो इन शार्ट...शुरू से आखिर तक इस पोस्ट को पढ़ के हम हँसते रहे...कई बार पेट पकड़-पकड़ के भी...जब दृश्यात्मक रूप में तुम्हारे वो पल आँखों के सामने आ गए...|
    वैसे अच्छा किया बता दिया ये सब...अब आइन्दा अपनी पकौड़ी की प्लेट सतर्कतावश तुमसे दूर रखेंगे हम...:) :p
    बहुत मजेदार यादों से भरी पोस्ट है....| काश! जब भी कोई याद आए तुम्हारे जेहन में...तुम यूँ ही मुस्करा के गरियाते रहो...:) :)

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  2. वाह...सुन्दर पोस्ट...
    समस्त ब्लॉगर मित्रों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हिन्दी
    और@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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  3. लो जी...आज दुबारा पेट पकड़ पकड़ के हँस लिए हम...:P
    वैसे अब तुमको समझ आया न कि हम कभी तुम्हारे बगल में बैठ के खाना क्यों नहीं खाते...??? :P :P

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया