Tuesday, September 23, 2014

जेब में रखी कुछ यादें


अकसर पुरानी अलमारियों में जाने कितनी यादें बंद होती हैं. उन अलमारियों को खोलना पुराने दिनों में वापस लौटना होता है, वापस उन दिनों में लौटना जो शायद आपके सबसे खूबसूरत दिन थे. अलमारी के किसी दराज में अगर कोई पोटली मिल जाए, जिसमें आपके जाने कितने लम्हे, कुछ किताबें, ग्रीटिंग्स, फोटोग्राफ बाँध कर रखी हुई हों तो आप ना चाहते हुए भी यादों के उन पगडंडियों पर चलने लगते हैं. पोटली में बाँध कर रखी एक रोमांटिक नॉवेल पर नज़र पड़ती है, जिसे आपकी सबसे अच्छी दोस्त ने आपको तोहफे में दिया था, और उस किताब पर नज़र पड़ते ही आपको सितम्बर की वो शाम याद आ जाती है जब अपने देर से आने की आदत से चिढ़कर उस किताब के कवर पर उसने लिख दिया था “मैं दुनिया की सबसे बड़ी पापी हूँ, हे भगवान, मुझे सज़ा देना, ऐसी कि मैं देर से आने की अपनी आदत ही भूल जाऊँ...” और फिर उसके नीचे छोटे अक्षरों में उसने लिखा था.... “लेकिन प्लीज, कोई सख्त सज़ा मत देना मुझे”. किताब के कवर पर लिखी  उसके इन मासूम बातों को पढ़कर चेहरे पर एक मुसकराहट आ जाती है और आँखों के सामने सितम्बर की वो शाम चली आती है जो आज से छः साल पहले बीती थी.

वे मेरे अच्छे दिन थे, कुछ पैसे हाथ में आ गए थे उन दिनों. पैसे हाथ में आ जाना उन दिनों मेरे लिए एक बड़ी बात हुआ करती थी. हलकी बारिश हो रही थी और हम दोनों दिल्ली के साउथ इक्स्टेन्शन मार्केट में घूम रहे थे. “आज बहुत खुश हूँ मैं, चलो तुम्हें उसी डिज़ाइनर शो रूम में शॉपिंग करवाता हूँ जहाँ पिछले शाम तुमने वो लहँगा पसंद किया था”, मैंने कहा उससे. उसने मेरी तरफ देखा, उसे एक पल लगा कि मैं मजाक कर रहा हूँ. लेकिन अगले ही पल जैसे ही मैंने उसका हाथ थामा और उस शोरूम की तरफ बढ़ने लगा, वो हैरान हो गयी थी. मुझे रोकने की कितनी कोशिश की उसने, “सुनो.. सुनो.. मेरी बात सुनो.. मैं बस मजाक कर रही थी.. वो लहँगा मुझे ख़ास पसंद भी नहीं आया था..” वो जानती थी वो शोरूम काफी महँगा था और मुझे उस शोरूम की तरफ जाने से रोकने के लिए जल्दबाजी में जाने कितने बहाने उसने बना दिए थे. लेकिन मैं पहले से सोच कर आया था कि मुझे क्या करना है. आखिर एक शाम पहले उसने पहली बार इतने सालों में मुझसे कुछ माँगा था, वो भी पूरे अधिकार से. मैं उसकी ये छोटी सी ख्वाहिश कैसे पूरा नहीं करता? “अगर तुम्हें वो लहँगा पसंद नहीं तो तुम बेशक उस लहँगे को ज़िन्दगी भर न पहनना, लेकिन आज तो मैं खरीदूंगा उसे”, मैंने कहा उससे और दुकान की तरफ बढ़ गया. 

वो भी अनमने भाव से मेरे पीछे पीछे उस शोरूम में दाखिल हुई. जो लड़की एक शाम पहले इस शोरूम में आने के बाद कपड़े देखने में इतनी व्यस्त हो गयी थी कि मुझसे सिर्फ हाँ ना में बात कर रही थी, वो आज उसी शोरूम के प्रति पूरी तरह से उदासीन थी. शोरूम में दाखिल होते ही उसने मुझसे कहा “जाने कितने का होगा लहँगा, मैं तो कल कीमत भी नहीं देख पायी थी..” मैं बस मुस्कुरा कर रह गया. कल शाम ही मैंने उस लहँगे की  कीमत पता कर ली थी, वाकई काफी महँगा था. लेकिन मुझे कीमत की परवाह नहीं थी. मैं बस जानता था कि उसने इतने सालों में पहली बार मुझसे कुछ माँगा है और मुझे उसकी वो ख्वाहिश पूरी करनी है.

शोरूम के उस कोने के तरफ हम पहुँच गए, जहाँ वो लहँगा था. मजेदार बात ये हुई कि उस लहँगे के प्राइस टैग में उसकी कीमत में एक शून्य कम था. शायद मिसप्रिंट की वजह से, लेकिन प्राइस टैग के इस मिसप्रिंट की वजह से ही वो ख़ुशी से उछल पड़ी थी. “सिर्फ 950 इसकी कीमत है? इस खूबसूरत लहँगे का? देखा? तुमने देखा? इतना खूबसूरत लहँगा और सिर्फ 950.. वाऊ!! मैं अभी ट्रायल कर के आती हूँ”, उसने कहा और अगले ही पल वो ट्रायल रूम में चली गयी. उसने मुहँ से लहँगा का ये कीमत सुनने के बाद एक पल के लिए मैं भी चौंक गया था, कल तो यहाँ का सेल्समैन 20% डिस्काउन्ट के बाद उस लहँगे का कीमत मुझे उतना बता चूका था. ये क्या माजरा है? मुझे ये समझते देर न लगा कि ये मिसप्रिंट का मामला है. लहँगे की कीमत उतनी ही थी...9500 लेकिन मिसप्रिंट की वजह से वो ये समझ बैठी थी कि लहँगे की कीमत सिर्फ 950 है. 

मुझे इस बात पर काफी हँसी आ रही थी, कि कुछ ही देर पहले यही लड़की मुझे ज्ञान दे रही थी.. “तुम्हारा ध्यान कहाँ रहता है? छोटी छोटी बातों पर जैसे मैं ध्यान देती हूँ, तुम भी ध्यान दिया करो. वैसी तुम्हारी गलती नहीं है, लेखक लोग वैसे भी खोये रहते हैं”, उसने मुझे ताना देते हुए कहा था और अभी यही लड़की अपनी ख़ुशी और इक्साइटमेंट में इतना भी कॉमन सेन्स नहीं लगा पायी, कि इतने महँगे स्टोर में मिल रहा इतना खूबसूरत लहँगा सिर्फ 950 में कैसे मिल सकता है? रुको, उसे आने देता हूँ उसके बाद उसकी खबर लेता हूँ, बहुत बड़ी अब्ज़र्वर बनती है वो. उसे इस बात पर छेड़ने का दिल किया लेकिन वो लहँगे की कीमत 950 समझ कुछ ज्यादा ही खुश हो गयी थी. उसकी वो ख़ुशी, उसके उस इक्साइटमेंट को मैं बुझाना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने उसे कुछ भी नहीं बताया. भरपूर कोशिश की थी मैंने कि उसे इस ड्रेस की असली कीमत पता न चले, यहाँ तक कि लहँगा का बिलिंग करवाते समय भी उसे मैंने अपने आसपास भटकने नहीं दिया था, लेकिन बहुत सालों बाद एक दिन जब यूँहीं बातों के दौरान मेरे ही ज़बान से उस लहँगे की असली कीमत निकल गयी तो वो काफी गिल्ट में चली गयी थी. “खुद के लिए तो 950 के ड्रेस को भी खरीदने से पहले साढ़े नौ सौ बार सोचते हो और मेरे लिए दस हज़ार का लहँगा खरीद लिया, जस्ट लाइक दैट? "उसने कहा था.

उस शाम वैसे तो वो बहुत कारणों से खुश थी, एक लम्बे समय बाद वो मेरे साथ वक़्त बिता रही थी. दूसरा उसे दो दिन से लगातार तोहफे मिल रहे थे और तीसरा कि उसे एक बेहद खूबसूरत लहँगा मैंने तोहफे में दिया था जिसकी कीमत उसके हिसाब से साढ़े नौ सौ थी. एक रेस्टोरेन्ट में मुझे वो ले आई थी ये कहते हुए “चलो अब तुम मुझे लंच कराओ. पैसे तुम्हारे बचा दिए हैं मैंने. 

जब तक हम रेस्टोरेन्ट में बैठे रहे थे, वो दुनिया जहान की उलजुलूल बातें करती रही थी. कुछ ऐसे लॉजिक थे उसके जो सिर्फ वही दे सकती थी “तुम कभी मुझे किसी चॉकलेट के नाम से मत बुलाना, टैफी, बेरी, चेरी, चॉको-केक वगैरह कह कर तो मुझे हरगिज़ न बुलाना तुम. मानो तुम्हारा मन कर गया मुझे खाने का तो? मैं क्या करुँगी?” इस तरह की बच्चों सी बातें सिर्फ वही सोच सकती थी, सिर्फ वही कर सकती थी. मेरी बातों पर कभी कभी टोक भी दे रही थी मुझे, कभी डांट दे रही थी. “साहब ये जरूरी नहीं कि लड़कियों को गुलाबी रंग ही पसंद आते हैं, देखो मैं लड़की हूँ और मुझे ब्लैक, रेड, ब्लू और पर्पल पसंद हैं. गुलाबी मेरे लिस्ट में भी नहीं है. उसने जाने किस बात पर मुझसे कहा था.

उसकी बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं उस शाम. रेस्टोरेन्ट से लेकर जब तक हम मेट्रो स्टेशन न पहुँच गए, तब तक वो नॉन-स्टॉप अपने तमाम तोहफों का जिक्र करते जा रही थी, इन तीन चार दिनों में किसने उसे क्या गिफ्ट दिया, वो सारी बातें पूरे डिटेल में मुझे बताती जा रही थी. 

रास्ते में हलकी बारिश भी शुरू हो गयी थी, जो हमारे मेट्रो स्टेशन पहुँचने तक तेज़ हो गई थी. बारिश उसके साथ अकसर अजीब खेल खेलती थी. जहाँ अकसर उसे बारिशें उदासी से खींच बाहर लाती, उसके मूड को अच्छा कर देती तो कभी ये बारिशें ही उसके लिए उदासी का सबब बन जाती थीं. उसका मन बड़ा ही फ्रैजल था. हँसी-मजाक के मूड से बुरे मूड में आने में उसे वक़्त नहीं लगता था तो कभी बुरा मूड भी उसका चुटकियों में अच्छे मूड में तबदील हो जाता था. कब किस समय किस बात से वो अचानक सिरिअस  हो जायेगी इसका अनुमान लगा पाना नामुमकिन था. वो बिलकुल बच्चों जैसी बे-सिर पैर की बातें करते हुए भी अचानक सिरीअस हो सकती थी तो कभी बेहद गंभीर बातें करते हुए भी अचानक बे-सिर पैर की बातें करने लगती थी. खुद कहती थी वो.. मेरा मन बड़ा ही अन्प्रिडिक्टबल है.

मेट्रो के पूरे सफ़र के दौरान वो मेरा हाथ थामे हुए थी. रेस्टोरेन्ट में बैठकर वो जितनी उलजुलूल बातें कर रही थी, मेट्रो में वो उतनी ही शांत बैठी हुई थी. बस मेरा हाथ थामे वो सामने बैठे लोगों को देख रही थी. मेट्रो के उस कोच में कम भीड़ थी, सामने एक बूढ़े अंकल कोई किताब पढ़ रहे थे, तो एक व्यक्ति बड़े ही अजीब मुद्रा बनाये ऊंघ रहा था, जिसे देखकर उसे हँसी आ गयी थी, एक लड़का जो लगातार उसकी तरफ देखे जा रहा था, और जिसे देखकर उसने मुहँ बिचकाते हुए मुझसे कहा था ‘ब्लडी टपोरी.. देखो तो लाइन मार रहा है’. वहीं उसी कम्पार्ट्मन्ट में एक लड़की, अपने एक साल की बेटी और पति के साथ बैठी थी. “देखो तो कितना प्यारा परिवार है न इनका, उसकी बेटी कितनी प्यारी है..” उसने उनके तरफ देखते हुए कहा. “हम तीनों भी कभी ऐसे ही शॉपिंग कर के लौट रहे होंगे...है न? वो मेरी तरफ देख रही थी, मेरे जवाब के इंतजार में. मैं उसकी बातों का अर्थ समझ गया था, फिर भी अनजान बन कर मैंने पूछा, हम तीनों कौन? तुम और मैं तो दो ही हुए न? तीसरा कौन? 

तुम अभी से ही भूल गए? हमारी बेटी नहीं होगी क्या? देखना वो मेरी तरह ही खूबसूरत होगी, और बेहद समझदार. मैं उसे बिलकुल अपने जैसा बनाऊंगी. वो लगातार और एकदम तेज़ी से बोलते जा रही थी, जैसे कोई अपना सपना याद कर के उसे दोहरा रही हो. ये हमारा सपना ही तो था, जिसे हम दोनों कभी अपने बचपन के दिनों में दसवीं के पढ़ाई के दिनों में एक साथ देखे थे, तब जब हम दोनों आने वाले विपत्ति से बिलकुल ‘सेफ’ थे. थोड़ा भी अंदाज़ा होता हमें कि आने वाले दिन कैसे होंगे तो शायद हम दोनों खुली आँखों से ये सपना कभी नहीं देखते. वैसे मुझे लगता है उस उम्र में सभी कभी न कभी वैसा सपना देखते ही हैं. 

“नहीं, मुझे अब इतनी दूर का सोचना नहीं चाहिए न”, उसे जाने क्या याद आ गया. जितनी तेज़ी से वो अपने सारे सपने दोहरा रही थी, उतनी ही तेज़ी से उसने उन सब बातों पर ब्रेक लगा दिया था. बोलते बोलते एकदम से रुक गयी थी वो. 

“सुनो.. देखो, तुम उदास मत हो. देखना सब ठीक होगा”, मैं उसे दिलासा दे रहा था, जबकि मुझे खुद मालूम नहीं था कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला था. आगे कुछ और कहने की मैंने बहुत कोशिश की लेकिन हर वाक्य अधूरा ही रह जा रहा था मेरा. उसकी नज़रें लगातार उन तीनों पर जमी हुई थी जिनके वजह से उसे अचानक अपना इतना पुराना, अपना सबसे बड़ा सपना याद आया था. 

“रहने दो, आज ये बातें नहीं करेंगे हम. आज के खूबसूरत दिन जब मेरी इस खूबसूरत सी गुड़िया ने मेरे इतने पैसे बचा दिए, उसे इतने सारे तोहफे मिले हैं और देखो बारिश भी हो रही है, तो आज के इस खूबसूरत दिन हम खूबसूरत बातें ही करेंगे, नो डिप्रेसिंग टॉक, वरना तुम्हें सच में चॉकलेट समझकर खा जाऊँगा मैं. समझी तुम?” वो हँसने लगी थी. वो खुश हो जाती थी जब भी मैं उसे गुड़िया कह कर पुकारा करता था, और जब कभी उसके सिरिअस होने पर मैं यूँ उसे डांट दिया करता था. भूल जाती थी वो अपनी सारी तकलीफ सारी परेशानी कुछ पल के लिए, जब भी मैं मजाक में यूँ उसे डांटा करता था. 

“Aye Aye कैप्टन.. समझ गयी मैं.” कहा उसने और खड़ी हो गयी. “मेरी ट्रेनिंग का, मेरे संगत का देखो तुमपर कितना अच्छा असर हो रहा है. अब ऐसे मजाकिया डांट लगाना भी तुम सीख गए, पहले कितने बोरिंग थे तुम...मेरा जादू है ये”, उसने कहा. मैं मुस्कुराने लगा था. हमारा स्टेशन भी आ गया था तब तक और वो मेट्रो कोच से बाहर निकलते समय कुछ दिन पहले आई एक फिल्म का एक गीत गुनगुनाने लगी थी.. “मैं जो संग हूँ/ तेरे रंग हूँ / राहों से तेरी चुन लूँ मैं ख्वाब / हर लम्हा यूँ गुज़रे / के गहराता जाए प्यार”.

मेट्रो का ये बीस मिनट का सफ़र कुछ ज्यादा ही जल्दी पूरा हो गया था. उसके जाने का वक़्त आ गया था. राजीव चौक मेट्रो की सीढ़ियों के पास खड़े होकर हम दोनों उसकी गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे. हम दोनों एकाएक चुप हो गए थे, जब कभी शाम में यूँ अलग अलग अपने रास्तों पर जाना होता था, हमारे बीच बातें बिलकुल खत्म हो जाती थीं, बस एक चुप्पी चली थी हम दोनों के बीच. शाम का वो पल बड़ा सख्त पल होता था. बातों का स्टॉक दोनों के ही पास खत्म हो जाता था. बिलकुल बेमतलब और व्यर्थ की बातें करने लगते थे “इस जगह का नाम कनॉट प्लेस है तो मेट्रो स्टेशन का ना राजीव चौक क्यों?”, “ट्रैफिक आजकल कुछ ज्यादा हो गया है न”, ऐसी बातें जिनका हम दोनों से कोई सम्बन्ध नहीं था, हम एक दूसरे से पूछते थे, बस इसलिए कि हमारा ध्यान शाम के जुदाई के पल से डाइवर्ट रहे. 

उसकी गाडी आ चुकी थी, आकर रुकी हुई थी. ड्राईवर दो बार उसे इशारा कर चुका था चलने के लिए. लेकिन फिर भी वो मेट्रो की सीढ़ियों पर कुछ देर बैठी रही थी. दो बार उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन बस इतना कह कर रह गयी, कि “कल तो तुम्हारी ट्रेन है वापसी का...” मैंने कहा “हाँ....” 

“ह्म्म्म....”. उसने एक निःश्वास भरी...अपने बैग से अपना गागल्ज़ निकाला और उठकर जाने के लिए खड़ी हो गयी.

वो ठीक से खड़ी भी नहीं हुई थी अभी कि मैंने उसकी कलाई पकड़ ली. वो बिलकुल चौंक गयी. वो असमंजस में मेरी तरफ देखने लगी. “क्या हुआ?” नज़रों से उसने पूछा था मुझसे. 

मैं मुस्कुरा रहा था, वो बिलकुल क्लूलेस हो गयी थी. इसे क्या हुआ..? शायद यही सोच रही होगी वो. आगे वो कुछ कहती इससे पहले ही मैंने अपनी जेब से वो कंगन निकाला जो दिल्ली हाट में घूमते वक़्त उससे नज़रें बचा कर मैंने खरीद ली थी, वही कंगन जिसे देखते ही उसने कहा था, अहा कितना खूबसूरत कंगन है, ऐसा खूबसूरत कंगन मैंने आज तक नहीं देखा था. मैंने वो कंगन उसकी कलाइयों में सरका दिया. 

वो शॉकड होकर देखती रह गयी. 

“स्पीचलेस आई एम !!” उसने कहा था. फिर से वो वापस मेरे पास बैठ गयी. इसे तुमने कब खरीदा? शायद इतना ही कहा था उसने.. शायद कुछ और कहती वो, लेकिन इसका मौका नहीं मिल पाया. उसका ड्राईवर जो कि उसे चलने के लिए दो बार इशारा कर चूका था, शायद उसका सब्र टूट चुका था, आकर उसने पूछ लिया कि चलेंगी आप या अभी रुकेंगी? “चलूंगी मैं..” उसने कहा ड्राईवर से. 

उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसे अभी जाने का मन नहीं था. लेकिन शाम में उसके पूरे परिवार को किसी फंक्शन  में जाना था, शायद इसलिए वो ड्राईवर जल्दबाजी दिखा रहा था. ड्राईवर के इस जल्दबाजी से वो थोड़ा इरिटेट हो गयी थी. 

“ये तुम्हारा ड्राईवर आज विलेन बन कर आ गया बीच में, देखो तो इस रोमांटिक मोमेंट को उसने बिलकुल बर्बाद कर दिया...जाते ही अपने अंकल से कह कर नौकरी से निकलवा देना इसे, फाइन वाइन लगा देना इसपर ढेर सारे...” , मैंने कहा. वो मुस्कुराने लगी. कहा कुछ भी नहीं उसने, बैग से जो उसने गागल्ज़ निकाला था, उसे पहना और अपनी गाड़ी के पिछली सीट पर जाकर बैठ गयी. 

अकसर ऐसा होता है कि जाते वक़्त वो मुड़ कर मुझे जरूर देखती है, लेकिन उस दिन उसने नहीं देखा मुड़ कर मुझे. मैं उसकी गाड़ी को दूर तक जाते देखता रहा, कुछ देर तक उसकी गाड़ी आगे एक रेड सिग्नल पर रुकी थी. गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी वो दिख रही थी, लेकिन वो ना ही अगल बगल देख रही थी ना सामने. मुझे ऐसा लगा कि वो लगातार बस उस कंगन को देखे जा रही थी जो उसकी कलाइयों में मैंने पहना दिया था. मुझे जाने क्यों ऐसा भ्रम हुआ कि उसने गागल्ज़ उतार कर अपनी आँखों को पोछा था. शायद आँखों में उसके कोई “इन्फेक्शन” हो गया, मैंने सोचा.


याद है तुम्हें
बारिश की वो शाम
हाथ में तेरे
थी मेरी भी हथेली
काँधे पे टिका
वो मासूम चेहरा
भीगी थी तुम
मैं भी भीगा-भीगा-सा
गीली ज़मीन
मन भी पनियारा
खामोश तुम
बारिश की बूँदों को
सुनती हुई
जैसे पाजेब कोई
तेरी हँसी-सी
छनकती हो कहीं
मैं भी खामोश
सुमधुर संगीत
सुनता रहा
सतरंगी कंगन
तेरे हाथ में
जिसे लिया था तूने
ज़िद करके
सावन के मेले से
वो नीली ड्रेस
जो पसन्द थी तुम्हें
मैं चाहता था
खरीदवा दूँ तुम्हें
जानता था मैं
परी लगोगी तुम
पहन उसे
तेरी नज़रें चुरा
झाँकी थी जेबें;
उसे पहन तुम
इतराई थी
चिड़िया-सी चहकी,
हिचकिचाई;
मैं मुस्करा के बोला,
सस्ती है, ले ली
संतुष्ट हुई तुम
धीमे से बोली
हाथ थाम के मेरा
जो पैसे बचे
चलो दावत खाएँ
मैं मुस्कराया
कैसे कह देता मैं
तुम्हारी हँसी
मेरी खाली जेबों में
खनक रही;
बीत गए बरसों
पर आज भी
जेब में तेरी हँसी
खनक ही जाती है...।

[ प्रियंका गुप्ता ] 

एक लम्बी पोस्ट से अगर आप बोर हो गए होंगे, तो इतना  विश्वास है कि मेरी दीदी की ये कविता आपको खुश कर जायेगी. असल में दीदी से पता चला इसे कविता नहीं बल्कि 'चोका' कहा जाता है. मुझे उतनी समझ नहीं इन विधाओं की तो मैं तो कविता ही कहूँगा इसे. बहुत ही प्यारी कविता है दीदी, इस कविता की वजह से पोस्ट खूबसूरत दिख रही है! 
continue reading जेब में रखी कुछ यादें

Saturday, September 6, 2014

स्वीट एम्बैरेसमेन्ट


मुझे लगता है कि बहुत सालों बाद भी जब भी दिल्ली या दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस का जिक्र होगा, मुझे तुम्हारी वो तमाम चिट्ठियाँ याद आएँगी जो यहाँ बैठकर तुम्हें मैं लिखा करता था, या फिर तुम्हारी लिखी वो तमाम चिट्ठियाँ जो यहाँ बैठकर मैं पढ़ा करता था. बीच के कुछ सालों में ईमेल, चैट और फ़ोन की आदत लगने की वजह से हम दोनों ने चिट्ठी लिखना एक दूसरे को लगभग बंद ही कर दिया था. तुम्हें फिर से चिट्ठी लिखने का सिलसिला भी इसी कॉफ़ी हाउस से शुरू था.

जिस ख़त से तुम्हें फिर से मैंने चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, वो तुम्हारे जन्मदिन पर लिखा एक बेहद लम्बा खत था, जिसे लिखने में मुझे तकरीबन तीन घंटे का वक़्त लग गया था. यहीं इसी कॉफ़ी हाउस से बैठकर तुम्हें वो खत लिखा था मैंने. अरसे बाद किसी को मैंने वैसा लम्बा खत लिखा था. लम्बे खत लिखने की आदत हम दोनों को तब से थी जब हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. मजेदार बात ये थी कि दोनों का लम्बे खत लिखना बंद होने की वजह और फिर इस आदत के शुरू होने की वजह एक ही थी. हम दोनों के कुछ ख़ास अपनों ने ही हमारी लम्बी चिट्ठी लिखने का अकसर मजाक उड़ाया, जिससे चिढ़ कर हम दोनों ने ही लोगों को लम्बे खत लिखने बंद कर दिए थे. तब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. लम्बे खत फिर से लिखने की वजह हम दोनों ही बने एक दूसरे के लिए. तुम्हारे वजह से मैं लम्बे खत लिखने लगा था और मेरी वजह से तुम. हम दोनों की ये भूली हुई आदत फिर से लग गयी थी, यूँ  लम्बे खत लिखने की. तुमने एक खत में ये लिखा भी था न, और कितना सही लिखा था तुमने. तुमने कहा था - “देखो तो, मौका पाते ही पुरानी आदतें  उभर आती हैं...है न?? और आदत भी इतनी खूबसूरत. लम्बे खत लिखने की...” 

जानती हो, तुमने जिस खत से दोबारा चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, उस खत को मैंने इसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर पढ़ा था. वो लम्बी चिट्ठी तुम्हारी दरअसल चिट्ठी नहीं बल्कि रोचनामचे टाइप की चिट्ठी थी, एक डायरी जैसा था वो...हर दिन कुछ न कुछ जोड़ा था तुमने उस चिट्ठी में और तब मुझे भेजा था तुमनें. मैं कॉफ़ी हाउस में ही बैठकर वो चिट्ठी पढ़ रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था उस दिन कुछ ऐसा होगा मेरे से जिसकी उम्मीद खुद मैंने भी नहीं की थी. चिट्ठी पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा मैं कर गया था, जानबूझकर नहीं बल्कि अनजाने में ही मेरे से वो हो गया था. अपनी  उस हरकत पर मैं बड़ा शर्मिंदा सा हो गया था. 

कॉफ़ी हाउस में बैठा मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था. एक हाथ में तुम्हारी चिट्ठी थी और एक हाथ से मैं सांभर वड़ा खा रहा था. तुम्हारी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता हूँ, बाकी कुछ भी ध्यान नहीं रहता मुझे. उस शाम भी मुझे बिलकुल ध्यान नहीं रहा था कि मेरे प्लेट में वड़ा रखा है जिसे मैं चम्मच से काट कर खा रहा हूँ. मेरा सारा ध्यान तुम्हारी चिट्ठी के ऊपर था, तभी पता नहीं कैसे वड़ा काटते हुए मेरे हाथ से चम्मच फिसल गया, और वड़ा का एक टुकड़ा सीधा उछल कर सामने वाले टेबल पर रखे प्लेट में जा गिरा. दो बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे उस टेबल पर. मेरे तो होश उड़ गए थे. ये क्या हो गया मुझसे. मैं समझ गया था, आज अच्छी खासी बात बेवजह सुननी पड़ जायेगी. लेकिन वो दोनों बुजुर्ग बड़े मीठे स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उन्होंने गुस्से से नहीं बल्कि मुस्कुराकर बड़े प्यार से कहा, “कोई बात नहीं बेटा, बस थोड़ा ध्यान रखा करो...”. उन्होंने तो बुरा नहीं माना लेकिन मेरे अन्दर हद दर्जे की एम्बैरेसमेन्ट फील आने लगी थी. मैं झटपट वहाँ से उठा और सीधा कैफे के बाहर आ गया. 

ऐसा मेरे साथ अकसर होता है, खासकर जब भी तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा होता हूँ मैं या फिर तुम्हारे ईमेल्स या मेसेज. कितनी ही बार मुझे ऐसे एम्बैरेसमेन्ट का सामना करना पड़ा है. वैसे मैं इसे एम्बैरेसमेन्ट नहीं बल्कि `स्वीट एम्बैरेसमेन्ट' कहता हूँ. मुझे उस वक़्त बड़ी हँसी सी आती है खुद पर. कॉफ़ी हाउस की ये घटना पहली घटना नहीं थी, एक और दिलचस्प किस्सा तब हुआ था, जब तुम्हारी ही लिखी एक चिट्ठी मैं यहाँ पढ़ रहा था, इसी कॉफ़ी हाउस में. 

उस शाम काफी भीड़ थी कॉफ़ी हाउस में. कुछ बुजुर्ग लोग एक लम्बे टेबल पर बैठे थे. बैठने की कहीं और जगह नहीं देखकर मैंने वहाँ बैठे लोगों से इजाज़त ली और उनके टेबल पर ही एक कोने में बैठ गया. मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी टोली के साथ बातों में मगन थे और मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ने में. पास वाले बुजुर्ग ने एक प्लेट पकौड़ियाँ मँगवाई खाने को. वो पकौड़ियाँ मेरे हाथों के पहुँच के दायरे में थीं. मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था, और पढ़ते वक़्त ये भी ख्याल नहीं रहा कि मैंने सिर्फ कॉफ़ी आर्डर की है. मैं पास बैठे अंकल के प्लेट से पकौड़ियाँ लेकर बड़े इत्मिनान से खा रहा था. तीन चार पकौड़ियाँ मेरे पेट के अन्दर चली गयीं थी तब मुझे एकाएक ख्याल आया, ये मैं क्या कर रहा हूँ. बगल वाले अंकल मेरा ये गिल्ट भांप गए, और वो एकाएक हँसनें लगे. “कोई बात नहीं बेटा, हो जाता है. अब जब खा ही रहे हो, तो रुक क्यों गए, खाओ न..और आ जायेंगे”. उन्होंने कहा. लेकिन मैं इतना शर्मिंदा हो गया था, कि उनसे माफ़ी मांगी मैंने और तुरंत फिर वापस चला आया था.

सच में मुझे हैरत होती है कि मैं ऐसी हरकतें कैसे करने लगता हूँ. तुम्हें पता है न कितना डिसिप्लिन्ड पसंद व्यक्ति हूँ मैं. किसी से बात करने से लेकर सड़क पर चलने तक, गाड़ी चलाने तक हर बात कायदे से करने की आदत है मुझे. खोया खोया नहीं रहता सड़क पर चलते वक़्त. चिढ होती है जब देखता हूँ कोई मोबाइल में आँख गड़ाए सड़क पर चले जा रहा है. ऐसे लड़के या लड़कियों से कितना चिढ़ता था मैं, ये तुम जानती ही हो. लेकिन क्या ये पता है तुम्हें, जब मेरे पास नया स्मार्टफोन आया था, तो मैं भी अकसर ऐसे ही हरकतें कर दिया करता था. एक दो बार इन हरकतों की वजह से भी मुझे थोड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है. जैसे एक शाम का एक किस्सा है. 

मैं अपने भैया के साथ अपने मोहल्ले के मार्केट के किनारे बने पेवमेंट पर चल रहा था. वो पेवमेंट समतल नहीं थीं, कहीं ज्यादा स्लोप तो कहीं बिलकुल ऊँचा. ऐसी हालत उस पेवमेंट की थी. तुमने मुझे कुछ जरूरी मेसेज भेजे थे फेसबुक पर, मोबाइल पर फेसबुक का मेसेज टोन सुनाई दिया और मैंने झट से अपना मोबाइल पॉकेट से निकाला और चलते हुए ही मेसेज पढ़ने लगा. मेरा ध्यान चलने पर कम और तुम्हारे मेसेज पर ज्यादा था. यूँ कहो कि मेरा सारा ध्यान मेसेज पढ़ने पर ही था. जाने कहाँ से मेरा पैर फिसला, किस चीज़ से टकरा गया था मैं, मेसेज पढ़ते हुए ही, मोबाइल हाथ में लिए सड़क पर मैं फिसल गया, धम्म से नीचे गिरा सड़क पर. भैया आगे आगे चल रहे थे. उनके पीछे मुड़ने से पहले ही मैं झट से उठ गया, हाथ पैर झाड़ कर मैं उनके साथ हो लिया. चोट तो मुझे नहीं लगी थी लेकिन अपने मोहल्ले में गिरना, ऐसी जगह जहाँ आसपास के दुकान वाले मुझे अच्छे से जानते हैं, मुझे शर्मिंदा कर गया. ज्यादा शर्मिंदगी मुझे अगले दिन हुई थी, जब मार्केट के कोना पर चाट बनाने वाले लड़के ने पूछ दिया था मुझसे “भैया आप कल गिर गए थे...चोट तो नहीं लगी  थी आपको ज्यादा?” उस दिन के बाद लेकिन मैंने तय किया था कि अब कभी राह चलते हुए ऐसे मोबाइल का प्रयोग नहीं करूँगा मैं. उसके बाद से तुम्हारे मेसेज मुझे यूँ मिलते भी हैं, तो मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर मेसेज पढ़ लेता हूँ लेकिन चलते हुए मेसेज करना उस दिन के बाद से मैं भूल ही गया.

जाने कितने सारे इस तरह के किस्से हैं मेरे. जाने कितनी बार अजीब अजीब हरकतें मेरे तरफ से हुई हैं. एक दिलचस्प किस्सा है, एक दिलचस्प से दिन का. मेरे लिए ये किस्सा एक यादगार किस्सा इसलिए भी है कि इसमें तुम भी हो. तुम्हें तो याद होगा ही वो दिन न जब कश्मीरी गेट बस अड्डे पर तुमसे मिला था मैं? 

दरअसल हम मिले नहीं थे उस दिन. बस एक दूसरे को दूर से ही देखे थे. बस एक घंटे के लिए तुम दिल्ली आई थी, तुम्हारी बस थी दोपहर में अम्बाला के लिए, और मैं तुमसे मिलने, बस तुम्हें एक झलक देखने के लिए बस स्टैंड आ पहुँचा था. तुम्हारे कुछ रिश्तेदार तुम्हारे साथ थे, वही कुछ रिश्तेदार जिनकी वजह से मुझे और तुम्हें जाने कितनी परेशानियों से गुज़ारना पड़ा था, वही कुछ रिश्तेदार जिनके वजह से हमने तय किया था कि उस दिन एक दूसरे के सामने नहीं आयेंगे हम. मैंने तुम्हें पहले से निर्देश दे तो दिए थे, कि मैं कहाँ पर खड़ा रहूँगा. तुम बस नज़रें उठा कर मेरी तरफ देख लेना, और यदि मौका मिला तो हम एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए एक दूसरे को ‘हेल्लो’ भी बोल सकेंगे. लेकिन फिर भी तुम घबराई हुई थी. तुम्हारे मन में ये डर था, कहीं मुझे तुम्हारे रिश्तेदारों ने वहाँ बस स्टैंड पर देख लिया, तो बेवजह कहीं कुछ बात न बढ़ जाए. लेकिन मैंने तुम्हें आश्वस्त किया था कि मैं इन्विज़बल रहने में उस्ताद हूँ. तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं देख पायेगा, इसकी जिम्मेदारी मेरी. तुम मेरे इस बात से निश्चिंत हो गयी थी. जैसा कि हमने तय किया था, उस दिन सभी कुछ वैसा ही हुआ था. हमनें दूर से ही एक दूसरे को देखा था, तुम मुझे देख कर मुस्कुराई थी उस दिन. मन में लेकिन हम दोनों के एक खलिश रह गयी, कि इतने करीब होने के बावजूद, कुछ मीटर की दूरी पर ही हैं हम दोनों और एक दूसरे से मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन मन की इस एक चुभन के बावजूद हम दोनों बेहद खुश थे. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा था, और हमें किसी ने नहीं देखा एक दूसरे को देखते हुए. हम दोनों दूर से ही एक दूसरे को देखकर खुश थे. 

कुछ देर बाद तुम्हारी बस अम्बाला के लिए रवाना हो गयी. तुम्हारे जाने के बहुत देर बाद तक मैं बस स्टैंड के उस प्लेटफोर्म पर बैठा रहा था जहाँ से तुम्हारी बस अम्बाला के लिए निकली थी. एक तो मैं तुम्हारे ख्यालों में गुम था, और दूसरा ये कि हर बार जब भी तुम मेरे सामने आती हो, जाने क्या हो जाता है मुझे, एक नशा सा छा जाता है आँखों पर. उस दिन भी शायद तुम्हारा ही नशा आँखों पर छाया हुआ था, शायद इसलिए मैं प्लेटफोर्म पर लगे एक बड़े से शीशे से जाकर टकरा गया था. हाँ, उस दिन यही हुआ था. कश्मीरी गेट बस अड्डे के प्लेटफोर्म से एक्जिट करने के लिए बेसमेंट में बने वेटिंग हॉल से गुज़रना पड़ता है. वेटिंग रूम में बड़े से शीशे के दरवाज़े बने हुए हैं, और मैं जाने तुम्हारे किन ख्यालों में गुम था, कि सीधा जाकर उस शीशे के दरवाज़े से ही मैं टकरा गया था, और जोर से टकराया था मैं. मेरे दरवाज़े से टकराने के साथ ही कुछ लोगों की निगाहें मुझपर उठ गयी थीं. कुछ की दबी सी हँसी भी निकल आई थी. मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लिया, बाहर जब आया, तो खुद पर बेहद हँसी आ रही थी. मैं कैसे ऐसे टकराने लगा हूँ चलते हुए, लड़खड़ाने लगा हूँ चलते हुए...सच में बड़ा तगड़ा हैंगोवर होता है तुम्हारा मुझपर. 

ऐसे जाने कितने और किस्से मेरे साथ होते ही रहते हैं और हर बार ऐसे किस्से या ऐसे हादसों के बाद मैं तुम्हें मन ही मन गरिया भी देता हूँ, “बदतमीज़ लड़की, फिर से मुझे एम्बैरस करवा गयी”. लेकिन इन सब बातों के बावजूद, तुम्हारे ऊपर या तुम्हारी यादों के ऊपर या खुद के ऊपर कभी गुस्सा नहीं बल्कि हँसी आती है.. मैं बस मुस्कुरा देता हूँ ऐसे स्वीट एम्बैरेसमेन्ट पर.
continue reading स्वीट एम्बैरेसमेन्ट