Sunday, June 29, 2014

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तुम मेरे लाइटहाउस हो

आसमान में बादल छा गए थे. सुबह की बारिश के बाद जो हलकी धूप निकली थी, अब वो मिट चली थी, हवा अचानक बहुत तेज़ हो गयी थी. ऐसा लगता था कि आंधी आने वाली है. हम दोनों वहां से निकल चुके थे. उसने उसी बिल्डिंग के छत पर जाने की इच्छा जताई थी जहाँ हम पहले कभी शाम में जाया करते थे. वो गाड़ी में बिलकुल खामोश बैठी रही. किसी भी बातों में जैसे उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही. चर्च से निकलने के बाद उसने गाड़ी की चाबी भी मुझे थमा दी, ये कहते हुए कि अब वो आराम करेगी. इस बात के अलावा उसने मुझसे और कोई बात नहीं की. हाँ बस गाड़ी का एसी ऑफ कर के उसने दोनों तरफ की खिड़कियों को खोल दिया था और फिर आँखें मूंदे बैठी रही.

मुझे उसकी ये चुप्पी अखरने लगी थी. शायद उसकी आवाजें उसकी नॉन-स्टॉप बातें सुनने का मैं इतना आदी हो गया था, कि जब वो ऐसे बिलकुल शांत हो जाती थी तो मेरा मन बड़ा ही अशांत सा हो जाता था. मैं चाहता था कि वो बातें करें, कुछ भी कहे, बस ऐसे चुप न रहे. लेकिन वो खामोश थी. उसकी चुप्पी तुड़वाने का मुझे कोई भी तरीका सूझ नहीं रहा था. मैं शायद इसी कशमकश में था, मुझे ध्यान भी नहीं रहा था कब मैंने यूँ ही एक ग़ज़ल गुनगुनाना शुरू कर दिया था. 

उसने चौंक कर आँखें खोली.
“तुम गाना गा रहे थे??तुम??? तुम सच में गा रहे थे या बस मेरा वहम था?????” अपनी बड़ी बड़ी आँखों को उसने और बड़ा बना कर आश्चर्य में मुझे देखा. हाँ, उसके लिए तो ये दुनिया का आठवां अजूबा ही था न, मुझे गाते हुए सुनना. पहले जाने कितनी बार उसने जिद किया था लेकिन मजाल है मैंने कभी कोई गाना उसके सामने गाया हो. हाँ एक दो बार उसे यूं ही चिढ़ाने के लिए मैं खड़े होकर ‘जन गण मन’ गा देता था. वो हद इरिटेट हो जाती थी.

“हाँ, बस वो एक ग़ज़ल याद आ गयी थी तो....” मैंने कहा. 

“वाऊ !!!!!!!!!!!! I am so Lucky!! तुम गा रहे थे...और मैंने सुना तुम्हें गाते हुए. You have no idea what this means to me.” वो एकदम से इक्साइटेड हो गयी थी. मुझे अच्छा लगा उसे यूं खुश हुआ देखकर. एक पल के लिए उसके चेहरे पर वही मुस्कान आ गयी थी जो सुबह थी, जब वो गाड़ी की चाबी के लिए मुझसे झगड़ रही थी. मैंने गाना बंद किया तो उसने मुझे वो ग़ज़ल आगे गाने को कहा. मैं भी बिना कुछ सोचे, बिना उसकी बात टाले, गुनगुनाने लगा. 

कुछ देर वो मुझे सुनती रही “काश इस पल को मैं रिकॉर्ड कर के रख सकती अपने पास. काश !! काश!” उसने कहा. 

पूरे रास्ते मैं गुनगुनाते रहा था. वो बस आँखें बंद कर मेरा गुनगुनाना सुन रही थी. या वो सो रही थी ? मुझे पता नहीं चल पाया. पूरे रास्ते मैंने उसकी तरफ जब भी देखा उसकी आँखें बंद ही थीं. बिल्डिंग के पास पहुँच कर मैंने उसे धीरे से हिलाया “पहुँच गए हम...तुम सो रही थी?” 

“हम पहुँच भी गए? अभी तो निकले थे? तुम सच में बहुत तेज़ ड्राइव करते हो”.

मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा. रास्ते भर ट्रैफिक थी और गाड़ी २०-३० के रफ्तार से चल रही थी और इसे लग रहा था कि मैंने बहुत तेज़ गाड़ी चलाई है.

“क्या सोचने लगी थी तुम?” मैंने पूछा
“तुम्हें सुन रही थी. तुम गा रहे थे.” उसने कहा. 
“तुम क्या सोच रही थी?” मैंने दोबारा वही सवाल दोहराया..

वो कुछ देर खिड़की से बाहर देखती रही, उसी कोक के बोतल के आकार के दुकान को जहाँ पहले हम पाँच रुपये वाली फाउंटेन कोक पिया करते थे. 

“मैं उस दिन के बारे में सोचने लगी थी, जब तुमने लगभग मेरी जान निकाल दी थी, कितना तेज़ गाड़ी चलाया था तुमने. मैं तो डर गयी थी.”
मैं मुस्कुराने लगा. “आज सा ही मौसम था न उस दिन?” 
“हाँ बारिश हो रही थी..” उसने कहा

और फिर उस दुकान की तरफ देखकर वो जाने क्या सोचने लगी थी. मुझे शायद पता था कि वो क्या सोच रही है. उस दुकान के पास से ही तो उस दिन हमने अपने सफ़र की शुरुआत की थी. और वो उधर ही देख रही थी. 

हमने उसी दुकान से एक कोल्डड्रिंक की बड़ी बोतल खरीदी, और एक बड़ा चिप्स का पैकेट, और बिल्डिंग के छत पर आ गए थे.  इस छत पर हम दोनों पाँच साल बाद आ रहे थे. छत अब काफी बदला हुआ सा लग रहा था. उन दिनों जब हम आते थे तो कोई भी छत पर दिखता नहीं था. हमारे अलावा किसी और का दखल नहीं था यहाँ. लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी. छत के एक कोने में दो प्रेमी जोड़े बैठे थे. 

“चलो, चलते हैं यहाँ से...कहीं और..” मैंने कहा. जाने क्यों उन दो लोगों को बैठे देख वहां, मुझे अजीब सा लगा. वो जिस पोजीशन में बैठे थे, उन्हें देख शायद मैं थोड़ा असहज सा हो गया था. थोड़ी असहज तो वो भी हो गयी थी.

“जस्ट इग्नोर देम. मुझे तो इस छत पर आकर ऐसा लग रहा है जैसे वर्षों बाद अपने घर लौट आई हूँ मैं..” उसने कहा. 

छत के उसी कोने पर हम बैठे थे जहाँ पहले बैठा करते थे. ये हमारी खुशकिस्मती थी कि छत का हमारा कोना खाली था. वहां आसपास रंगबिरंगे तरह-तरह के इश्तहारों के कागज़ और पैम्फ्लट बिखरे हुए थे. शायद उस बिल्डिंग में जो कोचिंग इन्स्टिटूट थें ये उन्हीं कोचिंग इन्स्टिटूट के इश्तहार रहे होंगे, जिनका अब कोई काम नहीं होगा और वो यहाँ लाकर फेंक दिए गए होंगे. 

उनमें से एक रंगीन कागज़ को मैंने उठाया “कुछ याद आया तुम्हें इस रंगीन कागजों को देखकर?” मैंने उससे पूछा. 
“नहीं तो...क्या?”
“तुम रंगीन नक़्शे यहाँ इसी तरह बिखेर दिया करती थी..”
“अरे हाँ!! कैसे भूल सकती हूँ मैं. I was so crazy about maps”. एकाएक याद आई बात पर वो खुश हो गयी थी. हाँ उसे नक़्शे खरीदने का शौक था. स्कूल में जीआग्रफी विषय में जो हम मैप्स इस्तेमाल करते थे, अलग-अलग महादेश, देश, राज्य, शहर के मैप, वो उन्हीं नक्शों को खरीद लिया करती थी. जब भी वो किसी स्टेशनरी के दुकान के आगे से गुज़रती, हमेशा एक मैप खरीद लेती थी. उसे इन मैप्स की कोई जरूरत नहीं थी, बस ये उसका एक शौक था. 
“तुम उन नक्शों से खेलती थी. याद है तुम्हें, एक बार तुमने एक दुकान से दो नक़्शे खरीदे थे, एक भारत का और एक अमरीका का, और मुझे दिखाते हुए कहा था तुमने, देखो मैंने दो रुपये में दो देशों को खरीद लिया...याद है?”
“हाँ याद है मुझे. और वो दुकान वाले अंकल कैसे कन्फ्यूज हो गए थे न, जब मैंने उनकी तरफ देखकर कहा था, अंकल मेरे पास दो देश हैं, एक आपके नाम कर दूँ?”
“वो थके हुए थे. तुम्हारी इस बात से वो हँसने लगे थे. उनकी दिन भर की थकान तुम्हारी इस एक बात से उतर गयी थी...” मैंने कहा. 
“वो जानते थे मुझे, कि मैं ऐसे ही पागलपन कि बातें करती हूँ.” 

इस मैप के चक्कर में कितने लोगों को उसने उलझन में डाला था. उसका एक प्रिय खेल भी था. हर देश, शहर के नक़्शे को वो अपने मनपसंद रंग से रंग लिया करती और सारे नक्शों को इसी छत पर बिखेर दिया करती थी. छोटे-छोटे पत्थर उनपर रख देती, ताकि हवा उन्हें उड़ा न ले जाए...और फिर उसका खेल शुरू होता - 
उसे कौन से शहर घूमना है, वहां जाकर वो क्या करेगी...क्या देखेगी...उस शहर की खासियत क्या है, उस शहर या देश में कौन-कौन ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे वो मिलेगी, वो एक के बाद एक मुझे ये सब सुनाती. ऐसा नहीं था कि हर दिन वो मुझे एक ही बात कहा करती थी. हमेशा उसके पास कुछ नयी बातें होती थी कहने के लिए. एक दिन उसके इसी खेल के बीच एक जोरदार आंधी आई, उसके सारे नक़्शे हवा में उड़ने लगे थे. वो दौड़कर सारे नक़्शे बटोरने की नाकाम कोशिश करने लगी, लेकिन सभी हवा में उड़ चुके थे. उसने उदास होकर कहा था “देखो ये आंधी कितनी बेरहम है, मेरे सपनों को उड़ा ले जा रही है”. मुझे याद तो नहीं लेकिन उसकी इस बात पर शायद मैंने कहा था “इन कागज़ के सपनों को उड़ा ले जाए भी आंधी तो क्या, तुम्हारी आँखों में जो सपने बसे हैं, तुम्हारी ख्वाहिशों को कभी कोई आंधी उड़ा कर ना ले जाए कभी...” 
उसने मेरी इस बात पर “आमीन” कहा था. 


“अच्छा आज तुमने दुआ में क्या माँगा? मैं पूछना भूल गयी.” उसके नक़्शे के खेल की जो बातें हो रही थीं, उसे काटते हुए उसने पूछा मुझसे. मैंने बिना सोचे जवाब दिया -
“तुम्हें...”
“सच?”
“हाँ सच..”
“और तुमने?”
“मैंने?...मैंने? ये कि लन्दन न्यूयॉर्क बोस्टन का झंझट सब कहीं पीछे छूट जाए और मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे शहर जा सकूँ, जहाँ तुम रहते हो और जहाँ की तुम इतनी तारीफें किया करते हो. 

कुछ देर हम दोनों चुप रहे. उसने आगे कहा..

“तुम जा रहे हो तीन दिनों बाद. मैं साथ चलूँ तुम्हारे? बोलो...अभी इसी वक़्त बोलो. कुछ न सोचो, बस बोलो. मेरा दिल रखने के लिए ही बोल दो, भले तीसरे दिन तुम मना कर देना. डांट देना मुझे, मत ले जाना...लेकिन अभी हाँ बोल दो”

मैं कुछ बोलता उसके पहले उसने खुद कहा 

“कैन यू प्लीज इग्नोर ऑल दिस? मेरे पागलपन की बातें हैं ये...भूल जाओ..”

मैं चुप रहा. 

ऊपर आसमान में काले बादल घिर आये थे. लगता था किसी भी समय बारिश हो सकती है. लेकिन उस वक़्त मुझे आसमान से होने वाली बारिश की चिंता नहीं थी. उसके आँखों से बस बरसात न हो, इस बात का डर था. 

“एक शेर तुम सुनोगे?” उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा.
“हाँ सुनाओ...”

"तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा”.

उसकी आँखों से आंसू छलक आये थे, आंसू की कुछ बूँदें मेरी पलकें भी भिगो गयीं थी. 

“तुम कब से शायरी करने लगी शायरा साहिबा” मैंने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने की अपनी कोशिश की. 

“जब तुम्हारी बहुत याद आती थी तो अकसर उन बातों में खुद को उलझा लिया करती थी जो तुम्हें पसंद है... कविताओं, कहानियों और फिल्मों में. 
कभी सोचा है तुमने? आगे चल कर कहीं ऐसा हुआ हम महीनों-सालों बात न कर पाए, एक दूसरे की कोई खबर नहीं ले पाए हम तो?

मैंने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया.

“तुम्हें पता है होता है ऐसा कभी-कभी. मैं भी अकसर ऐसी बातें सोच कर परेशान होता हूँ. लेकिन तुम बताओ, क्या उम्र भर साथ निभाना ही सब कुछ होता है? हम साथ रहे या न रहे...ये वक़्त जो हम साथ बिता रहे हैं, ये वक़्त हमेशा हमारे साथ रहेगा, ये वक़्त जो हम एक दूसरे के साथ गुज़ार रहे हैं ये क्या कम है? तुमने मेरे लिए जो किया है, तुमने जिस तरह सम्हाला है मुझे, मैंने जिस तरह सम्हाला है तुम्हें, हर मोड़ पर, मुश्किल समय में हम साथ रहे, एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त बन कर, कभी एक दूसरे को हमने बिखरने नहीं दिया. एक दूसरे की सबसे बड़ी ताकत सबसे बड़ी प्रेरणा बने रहे. ये सब बातें, ये यादें, हमारा ये वक़्त हमसे कोई नहीं छीन सकता. आने वाला वक़्त भी नहीं. इन यादों पर सिर्फ और सिर्फ हमारा ही अधिकार रहेगा. हमेशा. आने वाले सालों में हम कहीं भी रहे, कितने भी दूर रहे, इन बातों को याद कर के मुस्कुरा तो सकेंगे, गर्व तो कर सकेंगे कि हमने कभी ऐसी दोस्ती निभाई थी जिसपर हमें नाज़ था, फख्र था. जो हर लिहाज से पवित्र है था, मासूम था...बहुत कम लोगों को ऐसी दोस्ती नसीब होती है. ये क्या कम है? तुम आज मुझसे एक वादा करो, आने वाले दिनों में चाहे कुछ भी हो, तुम हमेशा मेरी यादें को याद कर के मुसकुराओगी, कभी दुःखी नहीं होगी तुम. 

उसने मेरी बातों का कुछ जवाब नहीं दिया, बस वो मुस्कुराने लगी थी. आसमान से हलकी फुहारें होने लगी थीं. उसने अपने दोनों हथेलियों को आगे बढ़ा दिया, जैसे बारिश की बूंदों को पकड़ने की कोशिश कर रही हो. सामने के लैम्पपोस्ट पर बत्ती जल रही थी. बादल और बारिश के बीच उसकी रौशनी बड़ी अच्छी लग रही थी. वो उसी लैम्पपोस्ट को देखने लगी. 

“देखो तो लगता है ऐसे जैसे वो लैम्पपोस्ट न होकर एक लाइटहाउस हो.. तुम्हें पता है लाइटहाउस क्या होता है?” उसने कहा 

पाँचवीं क्लास के बच्चे भी इस सवाल का जवाब जानते थे, लेकिन मैं बिलकुल अंजान बना रहा... “लाइटहाउस? वो क्या होता है? मैंने पहली बार नाम सुना है”.

मेरी इस बदमाशी पर वो हँसने लगी. 

“जानते हो जब समंदर में जहाज खो जाते हैं, उन्हें रास्ता पता नहीं चलता, कोई उम्मीद नहीं नज़र आती कि अब वो कभी वापस अपने घर पहुँच पायेंगे, तब यही लाइटहाउस उनकी मदद करता है. लाइट हाउस उन्हें रास्ता दिखाता है और इसके रौशनी के सहारे वो किनारे तक आ जाते हैं, समंदर में खोने से, डूबने से बच जाते हैं वो. लाइटहाउस उन्हें बचा लेता है.” 

कुछ रुक कर कुछ सोचकर उसने आगे कहा 

“तुम मेरी ज़िन्दगी में भी एक लाइटहाउस की तरह ही तो हो...जाने कितनी बार तुमने मुझे रास्ता दिखाया है, मुझे अँधेरे से खींच बाहर निकला है. मुझे सम्हाला है. मुझे खोने से बचाते हो, मुझे डूबने नहीं देते. तुम मेरे लाइटहाउस हो. बस पूरी ज़िन्दगी मुझे तुम यूं ही रास्ता दिखाते रहना, खोने से, डूबने से बचाते रहना. तुम तो जानते हो कि मुझे डूबने से कितना डर लगता है. 

मैं उसके करीब आकर बैठ गया. उसने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया, बारिश रुक गयी थी, लेकिन फिर भी हम जाने कितनी देर तक वहां बैठे रहे. मेरे नज़रों के सामने वही शब्द घूम रहे थे जो उसने अभी कहा था “तुम मेरी ज़िन्दगी में एक लाइटहाउस की तरह हो..और वो आँखें बंद कर गुनगुनाना रही थी...


तुमको देखा तो ये खयाल आया
जिंदगी धूप तुम घना साया 

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की 
आज फिर दिल को हम ने समझाया 

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे 
हमने क्या खोया हमने क्या पाया 

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते 
वक़्त ने ऐसा गीत क्यों गाया


10 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अच्छी खबरें आती है...तभी अच्छे दिन आते है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. पढ़ते ही एहसास होने लगता है कि ये रेशमी से शब्द और कोमल भाव अभि के ही हैं ,

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  3. इस ब्लॉग का यह नाम एकदम सही है :) ... प्यार और एहसास दोनों मिलते हैं यहाँ :)

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  4. वक्त की आंधी कभी - कभी सपनो को उडाती ही नहीं है ,अपितु सपनों के देश का सिरा भी थमा देती है .... सस्नेह !

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  5. अभि बेटा! मुझे लगता है कि तुम मेरा तलाक़ करवा के ही दम लोगे. ये बात मैं बिल्कुल सीरियसली कह रहा हूँ. या फिर तुम्हारी पोस्टें पढना बन्द करना होगा मुझे. तुम्हारी इन बातों को सुनकर मुझे भी एक पागल लड़की याद आ जाती है! वो कहानी फिर कभी!
    तुम तो मेरे भी लाइटहाउस हो! बस फर्क इतना है कि मैं अब उन रास्तों पर नहीं जा सकता जो तुम्हारे इस लाइटहाउस की रोशनी दिखाती है!

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  6. Thanxxx for this post..avi g....bahot bahot dhanywaad aapko...dil ko chhu liya aapne apne sbdo se...param pita prmeswar ki kripa hmesa aap pr bni rhe..aur yu hi apni kusbuo ko bikherte rhiye..

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  7. बहुत सुंदर प्यार का अहसास!

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  8. पढ़ते ही एहसास होने लगता है

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया