Sunday, June 22, 2014

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चर्च...वो शाम और एक चियर्स...


समय जैसे घूम कर फिर से वहीं आ पहुंचा है. मैं उसी बिल्डिंग के छत पर खड़ा हूँ जिस बिल्डिंग के तीसरी मंजिल पर कभी हमारी शाम गुज़रती थी. हम यहाँ मैथ्स टयूशन पढ़ने आया करते थे. इस बिल्डिंग की छत से एक रिश्ता सा बन गया था. मुझे आज भी याद है वो दिन, एक शाम वो मुझे खींचते हुए छत पर ले गयी थी, हम करीब तीन महीने से इस बिल्डिंग में टयूशन पढ़ने आया करते थे लेकिन छत पर जाने का ख्याल कभी मन में नहीं आया था. उसे जाने क्या सूझा था कि वो छत पर मुझे खींचते हुए लेते गयी थी, “देखो कितना खूबसूरत छत है ये..”. उसने मुझसे कहा. मैंने छत पर एक निगाह डाली, वो छत मुझे कहीं से भी खूबसूरत नहीं दिख रही थी, हर बड़ी बिल्डिंग की छत की तरह ही वो उदास वीरान और नीरस थी. लेकिन उस शाम वो वाकई खुश थी. उसकी बातों को काटने की इच्छा नहीं हुई.
“हाँ वाकई खूबसूरत छत है”. मैंने कहा. 
“है न? देखो, ये छत मेरी डिस्कवरी है”.. उसने चहकते हुए कहा था. वो खुश हो गयी थी छत पर आकर. वो ऐसी ही थी, ऐसी छोटी छोटी बातों में वो खुशियाँ ढूँढ लिया करती थी. 

उस शाम के बाद हम उस छत पर लगातार जाने लगे थे. छत के एक किनारे खड़े होकर नीचे की सड़कों को देखते थे. बोरिंग रोड की वही सड़कें बिल्डिंग की छत से देखने पर बिलकुल अलग दिखती थी. वहीं छत के किनारे दो बड़े से तख्ते रखे हुए थे. हम वहीं बैठते थे. हर शाम का हमारा ये प्रिय शगल था, हम छत के किनारे खड़े हो जाते और सड़कों पर चल रही गाड़ियों को देखते रहते. नीचे गाड़ियों का शोर होता और ऊपर छत एकदम सुनसान. वहाँ कभी कोई नहीं आता था. कम से कम जब तक हम वहां जाते रहे थे तब तक किसी और को वहाँ कभी देखा हो ये याद नहीं आता. 

जाने कितने सपने हम यहाँ देखे थे, इस छत पर. हम दोनों पागल थे. हम दोनों नादान थे. हम समझते थे हमारे सभी सपने पूरे होंगे. ये हमारा नहीं हमारी उम्र का दोष था. २०-२१ साल की उम्र में सभी यही सोचते हैं कि वो दुनिया जीत लेंगे. जो चाहेंगे वो पायेंगे. हम भी उन्हीं लोगों में से थे. हमें उन दिनों ये विश्वास था कि आज से बहुत साल बाद जब हम बूढ़े होकर अपने शहर लौटेंगे तो शामें इसी छत पर बिताएंगे. हाँ उन दिनों हमें ये भी विश्वास था कि हम पूरी ज़िन्दगी साथ रहेंगे. 

आज मैं यहाँ इस छत पर ठीक छः साल बाद आया हूँ. शहर छूटने के बाद यहाँ बस एक बार आया था. २००६ का जून महीना था वो. मैं उन दिनों अपनी छुट्टियाँ बिताने शहर आया था. वो भी उन्हीं दिनों शहर आई थी. ऐसा इत्तफाक कम ही होता था कि हम दोनों एक साथ शहर में रहें. लेकिन उस साल जून के महीने में तीन हफ्ते तक हम दोनों शहर में थे. हम दिन भर घूमते थे, दोपहर को लू चलती थी, हम दोनों लू के थपेड़े झेलते, लेकिन फिर भी घूमते थे. देर शाम तक मौर्या लोक के किसी कॉफ़ी शॉप या रेस्टोरेन्ट में बैठे रहते, दुनिया भर की बातें करते थे हम. तीन हफ्ते लगभग हम हर दिन मिले थे, लेकिन हमारी बातें कभी खत्म नहीं होती थीं. दोपहर से लेकर शाम तक हम बस बातें किया करते थे. बेहिसाब बातें. वे तीन हफ्ते यादगार बीते थे. 

१८ जून की सुबह थी वो. रविवार का दिन था, और मैं देर तक सोने के मूड में था. रात में सोने के वक़्त तक मौसम बहुत अच्छा हो गया था. मेरे सोने के बाद पूरी रात बारिश होते रही थी, लेकिन मैं ऐसी गहरी नींद में था कि इस बात से बेखबर था. कब माँ ने आकर मेरे कमरे की खिड़की बंद की, मुझे ये भी याद नहीं था. सुबह उसके कॉल से ही नींद खुली थी. ठीक साढ़े पाँच बजे उसने मुझे कॉल किया था. उसने कॉल पर ‘हाय..हेल्लो’ कुछ भी नहीं कहा.
भरपूर नींद में था मैं, जैसे ही कॉल रिसीव किया उधर से उसकी मधुर आवाज़ सुनाई दी...
वो गा रही थी फोन पर -
“रिमझिम रिमझिम..रुमझुम रुमझुम..भीगी भीगी रुत में, तुम हम, हम तुम...चलते हैं...मिलते हैं.....कहो चलोगे आज? मिलोगे आज मुझसे? भीगोगे मेरे साथ बारिश में आज?” उसने पूछा... 

ऐसी सुरीली आवाज़ कानों में सुनाई दे सुबह सुबह तो नींद तो काफूर हो ही जानी है. 
“इतना मीठा गाओगी तुम, तो बताओ हम जैसे भोले भाले दिल वाले लोगों का क्या होगा?” मैंने उसे छेड़ते हुए कहा. 
“बातें मत बनाओ तुम, बारिश में भीग रहे या नहीं ये बताओ”. 
“बारिश? बाहर बारिश हो रही क्या?” मैंने आँख मलते हुए खिड़की खोली. सच में बारिश हो रही थी. 
“ज़रा उठकर तो देखो साहब, बाहर जाओ...भीगो, गाना गाओ, बारिश में नाचो, सुबह की चाय पियो और ठीक दो घंटे में मुझे पिक करो...आज घूमना है, इतना रोमांटिक मौसम है, इतनी प्यारी सुबह है और सरकार उसे सो कर बर्बाद कर रहे हैं”. 
"दो घंटे में? अभी तो लेकिन सुबह के साढ़े पाँच बजे हैं..." 
“I dont care. Pick me at 7:30.” उसने कहा और बिना मेरी आगे कोई बात सुने उसने फोन काट दिया था. 

फोन रखने के बाद मैं मुस्कुराने लगा था. ये उसकी पुरानी आदत जो थी. जिस दिन भी बारिश होती थी उसका हुक्म आ जाता था, दिन भर साथ रहेंगे हम, घूमेंगे. थोड़ा आश्चर्य मुझे इस बात से हुआ था, रात में एक बजे तक उसने मेरे साथ बातें की थी. वो इतनी जल्दी सुबह कैसे जाग गयी? उसे जगाने की जिम्मेदारी तो मेरी थी. शायद बारिश की आवाज़ से नींद खुली होगी उसकी...मैंने सोचा. घड़ी में वक़्त देखा...छः बज रहे थे, मैं जल्दी से बिस्तर से उठ गया.
उससे मिलने जाना था. तैयार होना था मुझे. 

उसकी एक ख़राब आदत भी थी. वो मुझे कभी पूरी बात नहीं बताती थी. उस दिन भी उसने मुझे ये नहीं बताया था कि उसने मेरे लिए ब्रेकफास्ट बनाया है. मैंने उसके अपार्टमेंट के गेट के पास पहुँच कर उसे फोन किया...

 “बाहर आओ, मैं नीचे इंतजार कर रहा हूँ” 
“तुम आओ ऊपर, ब्रेकफास्ट कर लो..फिर चलेंगे” 
“ब्रेकफास्ट? लेकिन मैं तो ब्रेकफ़ास्ट घर से ही कर के आया हूँ...तुम बस आओ”. 

वो मेरी इस बात से थोड़ा चिढ़ गयी.. 
“तुम्हें वाकई मुझे इरिटेट करने में बड़ा मजा आता है न? आई डोंट केयर तुमने ब्रेकफास्ट किया है या नहीं, ऊपर आकर तुम ब्रेकफास्ट कर रहे हो....Thats it. मुझसे आगे बहस न करना.” उसने पूरे गुस्से में कहा. 

मैं भी चुपचाप सीढियाँ चढ़ के घर के अन्दर आया. सामने वो खड़ी थी, दरवाज़े पर ही... 
“बड़े नखरे हैं साहब आपके? मेरे साथ ब्रेकफास्ट कर लोगे तो पुलिस जेल में बंद कर देगी न...मैं तो आतंकवादी हूँ...है न?” उसने शिकायती अंदाज़ में कहा. 
“एक तो मुझे साढ़े सात बजे तुमने बुलाया और देखो अब तक तैयार नहीं हुई तुम...तीन फ्लोर चढ़ के आया हूँ, मुस्कुरा कर स्वागत करना चाहिए, वो तो किया नहीं और शिकायत कर रही हो...रौब जमा रही हो?” 
वो मेरी इस शिकायत से चिढ़ गयी – “हाँ हाँ जानती हूँ साहब आप बहुत बिजी बिजी रहते हैं, थोड़ी देर इंतजार करेंगे तो जाने क्या हो जाएगा.. एक तो घर में मैं अकेली, दीदी अब तक सोयी हुई हैं, सुबह उठकर तुम्हारे लिए इतने प्यार से ब्रेकफ़ास्ट बनाया, और तुम हो कि....” 
“अच्छा सॉरी, चलो अब जल्दी से ब्रेकफास्ट करवाओ, और तैयार होकर चलो..?”  मैंने उसे मनाते हुए कहा. उसने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा कर रह गयी. वो मुझे ड्राइंग रूम में बिठा कर अन्दर चली गयी. 

“तुम बोर होगे, तो टीवी देख लो...” 

उसने टीवी ऑन कर दिया. टीवी पर एक कार्टून चैनल लगाकर और रिमोट पता नहीं कहाँ छिपाकर(ताकि मैं चैनल बदल न सकूँ) वो तैयार होने चली गयी. ठीक एक घंटे बाद वो नज़र आई. मैंने बस एक छोटा सा मासूम सा सवाल किया उससे -
“एक तो मेरे को इतना इंतजार करवाया, और उसपर से ये सज़ा कि कार्टून चैनल दिखाया एक घंटे, मैं चैनल भी नहीं बदल सकूँ इसलिए रिमोट छिपा दिया तुमने. ऐसा ज़ुल्म क्यों?”.
उसने इस बात का कुछ जवाब नहीं दिया बल्कि ज़माने भर के टफनेस वाले एक्स्प्रेशन उसके चेहरे पर आ गए थे. मैं खुद ही इस डर से कि जाने गुस्सा का अब कौन सा बम फूटेगा, चुप हो गया. एक और सवाल उस वक़्त मन में आया था, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई कि वो सवाल उससे पूछूँ मैं.

पूरे दिन का कार्यक्रम पहले से तय था. उसने एक कागज़ का पुर्जा मुझे थमाया, जिसमें पूरे दिन क्या करना है इस बात का जिक्र था. उसी स्केजुल के हिसाब से सुबह १० बजे हम सिनेमा हॉल पहुंचे. ‘फना’ फिल्म जो कुछ दिनों पहले रिलीज हुई थी, उसे देखने. एक खूबसूरत सा इत्तफाक था फिल्म के साथ...उस फिल्म के शुरूआत के एक घंटे में बहुत से शेर कहे गए हैं. उनमें से कई शेर ऐसे थे जो मैंने पहले कहीं पढ़/सुन रखा था और उन्हें अपनी डायरी में मैंने नोट कर लिया था. उसे ये बात मालूम थी. उन दिनों मेरी डायरी में लिखी हर बात से वो वाकिफ थी. फिल्म में जब पहला शेर पढ़ा गया, वो शॉक्ड हो गयी...कस के उसने मेरे हाथों को भींच लिया...“अरेss देखो तुम्हारी शायरी चुराई है आमिर खान ने...केस करो इसपर तुम...केस करो...”, उसने इतने जोर से ये कहा था कि आसपास के दो तीन जोड़ी निगाहें हमपर उठ आयीं थी. मैंने उसे किसी तरह शांत रहने को कहा, इस आश्वासन के साथ कि मैं आमिर खान पर केस जरूर करूँगा. लेकिन उसे शांत और चुप रखने की मेरी कोई भी तरकीब उस दिन काम नहीं कर रही थी. फिल्म के पहले हिस्से में वो इतनी बातें कर रही थी कि मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि थोड़े ही देर में लोग हमें हॉल से बाहर धकेल देंगे. लेकिन हमारी खुशकिस्मती थी कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. 

थिएटर के बाहर निकलने पर हम जैसे ही कार पार्किंग के पास पहुंचे, उसने मेरे हाथ से गाड़ी की चाबी छीनते हुए कहा “I am driving”. और सीधे ड्राइविंग सीट पर जाकर वो बैठ गयी. 
मुझे उसने विरोध जताने का कोई मौका नहीं दिया. 

“आओ अन्दर आओ हुज़ूर, इस गाड़ी को अपना ही समझो और गाड़ी की इस ड्राईवरनी को भी” उसने शरारत भरे लहजे में कहा. 
मैं थोड़ा झेंप सा गया. 
“कहाँ चल रही हो??” मैंने पूछा 
“ड्राईवर मैं हूँ, मालिक भी, तुम्हारी गाड़ी की भी और तुम्हारी भी...है न? तो मैं जहाँ कहूँ वहां चलेंगे हम....” उसने कहा. 
मैंने उसकी तरफ देखा, थोड़ा मुस्कुराने लगा था मैं. 
“ठीक है मैडम, एज यु विश.” इससे आगे मैंने कुछ भी नहीं कहा. मन में कुछ आया जरूर था, सोचा कि कहूँ उससे, लेकिन मैं चुप ही रहा गया. उलटे उसने ही फिर से मुझे छेड़ने का एक और मौका ढूँढ लिया....
“मैडम? उफ़! हाउ अनरोमांटिक.....तुम मुझे मैडम की जगह ‘स्वीटहार्ट’ भी कह सकते थे..एनीवे, We are going for lunch, और आज की ट्रीट मेरे तरफ से..”उसने कहा और गाड़ी को उसी रेस्टोरेन्ट की तरफ मोड़ दिया जो उस सिनेमा हॉल से ज्यादा दूर नहीं था और जहाँ पहले हम अकसर आया करते थे. 

रेस्टोरेन्ट में वैसे तो वही मस्ती मजाक वाली बातें चल रही थी, वो अपनी आदत से मजबूर मुझे छेड़ने का कोई भी मौका छोड़ नहीं रही थी, लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ, कौन सी ऐसी बात उठी अचानक कि उसे अपनी दीदी की कही एक बात याद आ गयी. दीदी का जिक्र आते ही बातों का रुख ही मुड़ गया. कई दिशा में बातें होने लगी. दोस्ती, प्यार, रिश्ते, हम दोनों का साथ, दोनों के परिवार से जुडी कई बातें हुई, और सब अचानक ही हुई...हम दोनों नहीं चाहते थे कि वे बातें हम करें, कम से कम उस दिन तो नहीं. लेकिन बातें होती गयीं...अनचाहे ही. 

कुछ बातों को याद कर के वो काफी उदास हो गयी थी. उसने कहा मुझसे, “बहुत खालीपन सा लगता है मुझे उस शहर में, सब पास रहते हैं फिर भी जाने क्यों बहुत तनहा महसूस करती हूँ...यहाँ तुमसे दिल की बातें कह कर मन शाँत कर लिया करती थी, ये विश्वास तो था कि तुम पास हो, मेरे साथ हो. वहां तुम्हारी याद आती है. तुम चल सकते हो क्या मेरे साथ? तुम क्यों नहीं चल सकते मेरे साथ?” उसने भर्राए गले से ये एक मासूम सा सवाल पूछा था, जिसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था. 

मैं उसे समझाता भी तो क्या समझाता. मेरे पास उसे कहने के लिए कुछ भी नहीं था. वो भी समझती थी ये बात. मेरी हर मजबूरी को शायद मेरे से भी ज्यादा बेहतर वो समझती थी. हम दोनों बहुत देर तक उस रेस्टोरेन्ट में बैठे रहे. कहीं और जाने की, घूमने की, मस्ती करने की सभी इच्छाएँ मर सी गयी थी. कुछ देर बिलकुल चुप रहने के बाद उसने ही कहा था मुझसे 
“मुझे एक जगह जाना है, तुम चलोगे न मेरे साथ?” 
“तुम्हें ये पूछने की जरूरत है?” 

वो थोड़ा मुस्कुराई.
सामने टेबल पर रखे उस कागज़ के पुर्जे को देखा उसने जिसपर दिन भर का कार्यक्रम लिखा था. इस कागज़ के टुकड़े की मुझे जरूरत नहीं, उसने कहा और उस पुर्जे के कई टुकड़े कर वहीं टेबल पर रख दिया. 
बगल में रेस्टोरेन्ट का बिल रखा था. 
मैंने उसका मन बदलने के इरादे से कहा “वैसे शायद इस फ़ालतू से कागज़(बिल) के टुकड़े की भी तो तुम्हें जरूरत नहीं न...इसे मैं रख लूँ अपने पास?”
उसने एकदम झपटते हुए वो बिल उठा लिया... “हाथ तो लगाकर देखो ज़रा, हाथ न तोड़ दूँ तो कहना”.

मैं मुस्कुराने लगा. जो मैं करना चाहता था, वो मैंने कर दिया था. उसे उस उदास मोड से बाहर लाना जरूरी था, और मेरी वो ट्रिक थोड़ा काम कर गयी थी, लेकिन वो अब तक परेशान थी, उदास थी. 

रेस्टोरेन्ट से निकलने के बाद मैंने उससे पूछा भी नहीं कि वो कहाँ जा रही है....किस तरफ जा रही है, जो बातें हुई थी उससे शायद मुझे थोड़ा अंदाज़ा तो मिल ही गया था. मेरा अंदाज़ा ठीक भी निकला था....उसने शहर के उसी बड़ी चर्च के आगे गाड़ी रोक दिया था जहाँ से उसकी दीदी की कई सारी यादें जुड़ी हुई थी. 

गाड़ी चर्च के सामने खड़ी थी. हम गाड़ी में ही बैठे थे. एक पल मुझे लगा कि उसे चर्च के अन्दर जाने की इच्छा नहीं है. बाहर से ही वो लौट जायेगी. लेकिन मैं गलत था.

“तुम तो कभी चर्च नहीं आये न?” उसने पूछा. 
“सोचा तो बहुत बार था, लेकिन कभी कोई मौका ही नहीं मिला.” मैंने कहा. 
“मौका मिलने की क्या बात है साहब? बस आ जाया करो यहाँ. चलो आज मैं तुम्हें चर्च घुमाती हूँ.” उसने कहा,

लेकिन गाड़ी से निकलने के बजाय, अपने बैग से वो कुछ निकालने लगी. मुझे समझते देर न लगी कि उसने बैग से अपना मिनी मेकअप किट निकाला है. अपने सजे संवरे चेहरे को वो फिर से सजाने-संवारने लगी थी. मुझे एकाएक थोड़ी हँसी सी आ गयी. कैसे भी मूड में रहे ये लड़की, कैसी भी परिस्थितियाँ रहे श्रृंगार करना ये कभी नहीं छोड़ सकती है. उसकी ही कही एक बात याद आई मुझे “काश मरने के समय मेरे पास इतना वक़्त बचा हो कि कम से कम कोई अच्छा सा ड्रेस पहन सकूँ मैं, अच्छा मेकअप कर सकूँ. मैं अपने घर की गली में बिना मेकअप नहीं निकलती तो फिर भगवान् से पास ऐसे ही चली जाऊं क्या? विदआउट मेकअप? नॉट पोसिबल”. 

कोई और वक़्त होता तो मैं इस हरकत के लिए उसे जी भर चिढ़ाता. लेकिन उस दिन मैं चुप ही रहा. उस दिन उसे मेकअप करते देख मैं मन ही मन ये सोच रहा था कि ये दुनिया की सबसे अलग, सबसे ख़ास लड़की है. इसे क्या नहीं आता. मन्दिर में पूजा करती है, गुरूद्वारे जाती है, चर्च में पूजा करने आती है, और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो दो तीन दफे ये मस्जिद भी गयी है. जितने सुरीली आवाज़ में ये पुराने हिंदी गाने गाती है, उतनी ही मीठी आवाज़ में ये भजन भी गुनगुनाती है. अकसर जब कभी उसके साथ शाम में मैं मन्दिर गया, वो हर बार कोई न कोई भजन गुनुनाती थी. उस वक़्त मुझे लगता था कि बस वो पल वहीँ ठहर जाए. शाम का वक़्त, मन्दिर में पूजा करते, भजन गाते हुए उसे देखना, इससे खूबसूरत और कोई दृश्य नहीं था मेरे लिए.

"चलो...चलना नहीं है क्या?" मैं पता नहीं किन ख्यालों में खो गया था, ये भी ध्यान नहीं रहा कब वो गाड़ी से उतर गयी थी और मुझे पुकार रही थी. झटपट उठा मैंने, और गाड़ी के बाहर आ गया. 
हम चर्च के अन्दर दाखिल हुए..
यहाँ करते क्या हैं? चर्च के अन्दर घुसते ही मैंने एक बेतुका सा सवाल पूछा था. मैं जानता था वो अकसर ऐसी बेतुकी बातों पर इरिटेट होकर हँस दिया करती थी. 
“क्या करते हैं? अरे पूजा करते हैं और क्या करते हैं? बेवकूफ..बुद्धू...सच में बेवकूफ हो तुम.” वो मेरे उस बेतुके सवाल पर मुस्कुराने लगी थी. 
“अच्छा...लेकिन कैसे पूजा करते हैं यहाँ” मैंने फिर से एक बेतुका सवाल पूछा था उससे. 
“बस हाथ जोड़ कर पूजा करो. ठीक वैसे ही जैसे तुम हनुमान जी की पूजा करते हो. बस...और कुछ नहीं...जगह चाहे कोई सी भी हो, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा, चर्च, हर जगह पूजा एक सी ही होती है." उसने कहा.

चर्च के अन्दर दाखिल होते ही उसका मन जाने कहाँ अटक गया था. मैं लगातार उसे देख रहा था. मैं जानता था कि कोई बात है जो लगातार उसके मन में चल रही है. लेकिन मैं कोई जल्दबाजी करना नहीं चाहता था. मैं जानता था, मैं चाहता था कि जो कुछ भी उसके मन में है, वो खुद मुझसे कहे, बिना मेरे पूछे. मुझे यकीन था वो सारी बातें वो मुझे कह देगी. और यही हुआ भी. 

उसने कैंडल जलाया और फिर मेरे तरफ देखकर मुस्कुराने लगी. मैंने गौर किया, उसकी आँखें नम हो आई थी.
“तुम ठीक हो?” मैंने पूछा उससे. 

उसने मेरे हाथों को कस कर पकड़ लिया. 

“आज फिर से उन्हें देखा मैंने”. उसने कहा और वो मेरे और करीब आ गयी. मेरी बाँहों को उसने और कस के पकड़ लिया था. 
“किसे?” 
“दीदी को...” 
मैंने आगे कुछ नहीं कहा. “चलो चलते हैं यहाँ से, कहीं और चलते हैं...” 
मैंने उसके हाथों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली थी. वो कुछ देर चुप रही, फिर कहा उसने -
“पहली बार भी वो मुझे वहीं दिखी थी, वो जो सामने देख रहे हो न, येशु की बड़ी सी मूर्ति, क्रॉस के ऊपर...ठीक वहीँ...आज भी मुझे वहीं दिखी वो. मुझे याद है उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं आई थी इस चर्च में और प्रार्थना करते समय अचानक मुझे लगा की मेरे सामने वो खड़ी हैं, मैंने आँखें बंद कर रखी थी. उस दिन मुझे ऐसा लगा कि दीदी वहीँ उस बड़े से क्रॉस के पास से मुझे झाँक कर देख रही हैं....बड़ी बड़ी आँखों से मुझे देखकर वो मुस्कुरा रही हैं, जैसे पूछ रहीं हो मुझसे - तुम मुझे अब तक भूल नहीं पायी हो..तुम अब तक यहाँ आती हो, मैं तुम्हें यहाँ लेकर आई थी पहली बार, वो बारिश का एक दिन था...तुम अब भी मुझे याद कर के रातों में रोती हो न....रात भर तुम जागती रहती हो, आँसू बहाती रहती हो मेरे लिए लेकिन किसी से कुछ भी नहीं कहती...”

वो कहते हुए कुछ देर रुक गयी...फिर उसने आगे कहा 

“जानते हो उस शाम मुझे अजीब सा भ्रम हुआ था...मुझे ऐसा लगा था जैसे वो कहीं इसी चर्च में छुपकर बैठी हुई हों. जैसे वो कहीं नहीं गयी हैं, ये मेरा पागलपन था, मैं उस शाम यहाँ कैम्पस के बेंच में बहुत देर तक बस ये सोचकर बैठी रही थी कि शायद वो मेरे पास वापस आ जाए, लेकिन वो नहीं आई. जो चले जाते हैं दुनिया से वो फिर वापस नहीं आते न? कभी नहीं आते न वापस?” उसने पूछा 

मैंने उसे अपने और करीब खींच लिया, मेरी बाँहों में उसने अपना सर छिपा लिया, कहने लगी
“जानते हो, कितनी बार ऐसा हुआ है, मुझे ये एहसास होता है कि वो मेरे सामने हैं, मैं उनसे बातें करने लगती हूँ, और फिर कुछ देर बाद मुझे होश आता है....कि मेरे सामने कोई नहीं बैठा है. मैं अकेली हूँ. दीदी नहीं है यहाँ...फिर मैं सोचती हूँ कहाँ गयीं वो? शायद सच में वो कहीं इसी चर्च में छुप कर बैठी हुई हैं, ये विश्वास आज तक नहीं होता मुझे कि वो हमेशा के लिए हमारी दुनिया से दूर कहीं चली गयीं हैं....तुम्हें ये मेरा पागलपन लग सकता है, लेकिन सच कहूँ तो आज मैं बस यही देखने आई थी, कि दीदी मुझे दिखाई देती हैं या नहीं...और देखो वो दिख गयीं मुझे...ठीक वहीं, उसी जगह...वो मुझे देख मुस्कुरा रही थीं.” उसने उसी क्रॉस के तरफ इशारा करते हुए कहा. 

मेरे पास उसकी इन बातों का कोई जवाब नहीं था. उसकी बातें सुन एक ठंडी झुरझुरी सी मेरे अन्दर फ़ैल गयी.
“तुम जानती हो वो तुम्हें क्यों दिखीं आज? उस दिन भी क्यों दिखी थीं वो तुम्हें?”
"नहीं...क्यूँ?” 
“वो तुम्हें देखकर मुस्कुरा रही थीं न, जानती हो ये बस इस बात का इशारा है कि वो जहाँ भी हैं खुश हैं, और तुम्हें भी मुस्कुराते हुए कह रही हैं, कि खुश रहो हमेशा. उनकी यादें उनकी बातें उनके साथ बिताये वो अनगिनत पलों को याद कर के दुःखी न हो बल्कि मुस्कुराओ उन्हें याद कर के...उन्हें अच्छा लगेगा जब वो दिखेंगी वहां से कि तुम मुस्कुरा रही हो, खुश हो. तुम्हारी एक मुस्कान उनके लिए क्या मायने रखती थी ये जानती हो न तुम? तो तुम्हीं कहो तुम्हें ऐसे उदास देख उन्हें क्या अच्छा लगेगा??” 

वो एक छोटी बच्ची की तरह मेरी बातें सुन रही थी... 
“हाँ...शायद तुम ठीक कहते हो” उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा. 
“ऐक्चूअली यु नो व्हाट? तुम्हें पता है क्या करना चाहिए?” 
“क्या?” 
“तुम्हें तो आज सेलिब्रेट करना चाहिए. मेरी बात मानो तो जब जिस दिन वो तुम्हें ऐसे कहीं भी दिखें, घर में, मन्दिर में, किसी पार्क में, या इस चर्च में, उस दिन तो तुम्हें सेलिब्रेट करना चाहिए, इसलिए कि कम से कम वो तुम्हें नज़र तो आयीं. वो मुस्कुरा कर तुमसे बात तो कर रहीं थीं. ये क्या कम है? उन्हें सोचो कितना अच्छा लगेगा. इस तरह वो हर पल तुम्हारे साथ रहेंगी. चलो आज कहाँ तुम्हें डिनर करवाऊं? बोलो? कहाँ चलोगी सेलेब्रेट करने?” 
वो मुस्कुराने लगी थी. उसने मेरी बाँहों में अपना सर और ज्यादा छुपा लिया.. 
“तुम पागल हो” उसने कहा. 
“जो भी हो, हम आज सेलिब्रेट करेंगे....अच्छा बोलो उन्हें सबसे ज्यादा क्या पसंद था.?” 
बिना एक पल भी सोचे उसने तुरंत कहा... 
“जानते हो उन्हें कोल्डड्रिंक पीना बहुत पसंद था...कितनी बार तो माँ से वो डांट सुन चुकी है, इसी कोल्ड ड्रिंक के चक्कर में..मुझे तो वो हर दिन पिलाती थीं कोल्ड ड्रिंक...गोल्डस्पॉट और थम्प्स-अप उनकी फेवरिट कोल्ड ड्रिंक थी.” 
पता नहीं उसे बस इस एक कोल्ड ड्रिंक के जिक्र से कौन कौन सी बातें याद आने लगी थी. वो लगातार मुझे बताते जा रही थी, तरह तरह के किस्से, अपनी दीदी के, अपने बचपन के दिनों के. मैंने देखा उसकी आँखों में एक चमक आ गयी थी उन बातों को याद कर के. 

मुझे मौका मिल गया था, मैंने देखा चर्च के गेट के ठीक सामने, जहाँ हमने गाड़ी पार्क की थी, वहां एक छोटी सी दुकान थी. मैं उसे खींचते हुए, लगभग दौडाते हुए उस दूकान तक ले गया. वो मेरे इस बर्ताव से हतप्रभ थी. उसने ये कभी नहीं सोचा होगा की मैं ऐसे उसे बच्चों की तरह दौड़ाऊँगा. 
“क्या हो गया तुम्हें, कहाँ ले जा रहे मुझे खींचते हुए...अरे....रुको तो....” लेकिन मैं रुका नहीं...सीधे दुकान के पास आकर मैं रुका. 

"दो थम्प्स-अप देना भैया." मैंने दुकान वाले से कहा.
वो अविश्वास से मेरी और देख रही थी. वो हैरान थी. “तुम....” के आगे वो कुछ भी नहीं बोल सकी. 

थम्प्स-अप का एक बोतल मैंने उसे थमाया, एक खुद पकड़ा और ऊपर आसमान की तरफ बोतल उठा कर मैंने कहा “To smita di, we will always love you...Cheers” 
मैंने उसकी तरफ देखा...वो अब तक हतप्रभ सी मुझे देख रही थी...ऐसा पागलपन मैं कर सकता हूँ उसे ये विश्वास ही नहीं हो पा रहा था.... 
“क्या सोच रही हो? चियर्स करो...मैं इंतजार कर रहा हूँ...स्मिता दी इंतजार कर रही हैं” 

उसकी आँखें भर आयीं थी... 
“To didda...My one and only love...I love you...Cheers didda” उसने भी बोतल आसमान की तरफ उठा कर भर्राए आवाज़ में कहा. 
वो मेरी तरफ देख रही थी, कोल्ड ड्रिंक का एक घूँट उसने लिया, मेरी तरफ एक बार फिर से देखा उसने और कहा -  “तुम मुझे हमेशा संभाल लेते हो...”


आगे कहानी और भी है... !

7 comments:

  1. बिना पूरी पढ़े तो हम कुछ कहने वाले नहीं...बस इतना कि didda...इस एक शब्द ने किसी से कही एक बात याद दिला दी...| वैसे हूँ तो मैं भी किसी की didda ही...:)
    हाँ एक बात और...आख़िरी लाइन- “तुम मुझे हमेशा संभाल लेते हो...” बहुत कुछ कह जाती है...| है न...??? :) :)

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  2. जगह चाहे कोई सी भी हो, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा, चर्च, हर जगह पूजा एक सी ही होती है." ..... चश्मेबद्दूर !

    बहुत ही मासूम और प्रवाहमयी गति है भावों की उडान की ..... सस्नेह :)

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  3. ओह.... जीवन के समान बहती सी पोस्ट ..

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  4. क्या कहूँ अभि...................सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी पोस्ट है जो लम्बी होने के बाद भी एक सांस में पढ़ जाती हूँ और लगता है अरे ? ख़तम ?? इसमें बहुत सारी बातें बहुत प्यारी थीं....
    शाम का वक़्त, मन्दिर में पूजा करते, भजन गाते हुए उसे देखना, इससे खूबसूरत और कोई दृश्य नहीं था मेरे लिए.....
    बहुत बहुत सुन्दर...
    आगे के इंतज़ार में...
    अनु

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  5. अभिषेक , दूसरे संस्मरणों की तरह इसे भी पढकर कोई तल्लीन हुए बिना नही रह सकता । दरअसल कहानी कुछ है ही नही, फिर भी पाठक को अपने साथ बाँधे रखती है यही इसकी विशेषता है । इसे सुन्दर मार्मिक प्यारी या खूबसूरत जैसे विशेषणों से सजाना जितना आसान है पर लिखना उतना ही मुश्किल है । मैं अभिभूत हूँ इतने ठहरे हुए से अन्दाज में बहुत छोटी-छोटी बातों को बडी बना देने वाली अभिव्यक्ति को देखकर । कोई जल्दबाजी नही । अपने भावों को पूरी तरह जीते हुए , पूरी तरह एकान्त हुए बिना ऐसा नही लिखा जासकता , जो एक रचनाकार की उपलब्धि है । साथ ही यह एक सजल ,वत्सल, उदार और स्नेही हृदय की परिचायक भी है ।

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  6. प्यारे अभि... क्या कहूँ!! पहले साँस तो ले लूँ. पहले लगा कि बहुत बड़ी पोस्त है.. फिर लगा कि जब इंसान अपने गुज़रे एहसास को कागज़ पर उतारता है तो उसे वक़्त, स्पेस और जगह का ख़्याल कहाँ रहता है. वो तो बस यादों के समन्दर में ग़ोते लगाए सीपियाँ बटोरने में लगा होता है.. बहता रहता है एक बहाव के साथ.. रात भर कमल में बन्द भँवरे की तरह!

    तुम्हारी हर बात मुझे अपनी याद दिला देती है.. कभी वो सब शेयर नहीं किया, बस अपने तक ही रखा. लेकिन दावे के साथ कह सकता हूँ कि सब कुछ मुझे मेरी याद दिलाता है और मुँह चिढ़ाता है. उस लड़की का पागलपन देखकर यही लगता है कि मैं इजाज़त फ़िल्म की उस किरदार से मिल रहा हूँ, जो मेलोड्रामाटिक थी, मगर रियल थी.

    एक और बात... तुम्हें इतनी बातें याद कैसे रहती हैं! हू ब हू.. घटना दर घटना... बात दर बात?? अगर ऐसा है तो इससे बाहर निकलो मेरे बेटे... दुनिया की ज़मीनी हक़ीक़त बहुत सख़्त है. कई ख़्वाब टूटकर बिखरते देखे हैं!!
    परमात्मा तुम्हें सदा खुश रखे!!

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  7. वाकई ! एक जादुई अहसास..

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