Friday, January 31, 2014

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दिल्ली डायरी (४)


जनवरी का ये आखिरी दिन है. मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर कुछ तारीखें याद कर रहा हूँ. कुछ खत याद आ रहे हैं, जो यहाँ बैठ कर तुम्हें लिखा करता था. कुछ लम्हे जो यहाँ हमने और तुमने एक साथ बिताये थे. तुम्हें याद है न? जब से तुम्हें मैंने कॉफ़ी होम के बारे में बताया था तब से तुम कितनी बेताब हो गयी थी यहाँ आने के लिए और यहाँ की कॉफ़ी पीने के लिए. यहाँ मिलने वाली फ़िल्टर कॉफ़ी के बारे में जब भी तुम्हें बताया और जब कभी शाम में तुम मुझे फोन करती और तुम्हें मैं कहता कि मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर फ़िल्टर कॉफ़ी पी रहा हूँ. तुम कितनी जल सी जाती थी. तुम प्यार से चिढ़ते हुए कहती “जला लो मुझे...और तुम्हें आता ही क्या है..” और मैं बस मुस्कुराते रहता था.

आज बड़े दिनों बाद कॉफ़ी होम आया हूँ तो मुझे अचानक कुछ बातें याद आ गयीं. असल में उन बातों का याद आना अचानक नहीं बल्कि स्वाभाविक था. आखिरी बार कॉफ़ी होम तुम्हारे साथ ही आया था और उस दिन के बाद सीधे आज आया हूँ. कॉफ़ी होम में आते ही दिसंबर के उस खूबसूरत दिन के साथ कुछ और बातें भी याद आते चली गयीं. मैं इस कैफे में आज उसी टेबुल पर जा बैठा था जहाँ बैठकर मैंने तुम्हें वो लम्बा सा खत लिखा था. याद है न तुम्हे वो खत? ऑफकोर्स तुम्हें याद होगा. तुम भूल भी कैसे सकती हो. वो खत तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा था जो यहाँ बैठकर मैंने तुम्हारे लिए लिखा था.

अक्टूबर के आखिरी कुछ दिन थे वे. शायद बाईस या तेईस अक्टूबर का दिन था. याद नहीं सही से मुझे. उस दिन मैं बहुत बीमार था. सुबह जब आँख खुली तो पूरा बदन बुखार से तप रहा था. तुमने सुबह ही मुझे हिदायत दे दी थी कि दो दिन से तुम्हारी तबीयत ख़राब है, आज घर पर ही आराम करना. लेकिन मैं घर पर आराम करना नहीं चाह रहा था. तुम्हें ख़त लिखने का वो आखिरी दिन था. वरना एक दिन भी और देर करता मैं तो तुम्हें वक़्त पर शायद खत ना मिलता. उस दिन मैं चाहता तो घर में भी बैठकर तुम्हें खत लिख सकता था, लेकिन घर में बैठ कर कुछ भी लिखना मेरे लिए हमेशा मुश्किल काम रहा है. ख़त, कवितायें या डायरी लिखने के लिए मैं अकसर किसी पार्क या कैफे में चला आता हूँ.

कुछ चालीस मिनट का वक़्त लगता है मुझे अपने घर से कॉफ़ी होम आने में. शहर का ये मेरा सबसे पसंदीदा कैफे हैं जहाँ अकसर शाम में मैं देर तक बैठता हूँ. यहाँ आने के लिए चालीस मिनट की दूरी कभी अखरी नहीं मुझे. लेकिन उस दिन उस चालीस मिनट में कम से कम मैंने चालीस बार ये सोचा था कि आज मुझे घर पर ही रुक जाना चाहिए था. हिम्मत जवाब दे रही थी. कमजोरी इस कदर थी. लेकिन तुम्हें खत लिख कर पोस्ट करना था. मैं कैफे पहुँचा और एक फ़िल्टर कॉफ़ी, स्नैक्स आर्डर कर कैफे के अपने फेवरिट जगह पर आकर बैठ गया. बैग से मैंने वो लम्बा सा लेटर पैड निकाला और तुम्हें ख़त लिखना शुरू कर दिया. लिखना जो मैंने शुरू किया तो बस लिखते गया, बीच में सिर्फ एक बार एक कप और फिल्टर कॉफ़ी आर्डर करने के लिए मेरे हाथ रुके थे. मैं बहुत देर तक लिखता रहा था और लेटर पैड के नौवें पेज पर आकर मेरी कलम रुकी थी. उससे आगे लिखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. शायद तबीयत थोड़ी बिगड़ने लगी थी. मैंने खत लिखना वहीँ बंद कर दिया. तुमने गौर भी किया होगा न कि उस खत का कोई अंत था ही नहीं. वैसे खतों का अंत होता भी नहीं है...लेकिन उस खत को मैंने अचानक ही बंद किया था. तबीयत साथ देती अगर मेरी तो शायद मैं और कई पन्ने लिखते रहता.

कॉफ़ी होम से जब मैं निकल रहा था तो मुझे ये सोच बड़ी हैरत हो रही थी कि मैं पिछले दो दिन बिस्तर पर पड़ा रहा था. बैठने की हिम्मत नहीं थी, और यहाँ बैठकर ढाई घंटे में तुम्हें इतना बड़ा खत लिखा दिया. उस शाम घर पहुँचते पहुँचते बुखार थोड़ा और बढ़ गया था. लेकिन मुझे इसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं थी. तुम्हें खत लिख कर भेजना था, सो मैं भेज चूका था. कैसे भूल सकता हूँ, जब तुम्हें वो खत मिला था. तुम कितनी खुश हो गयी थी...तुमने उसी वक़्त मुझे फोन किया था और कहा था “दिल्ली से मेरे लिए एक ख़त आया है...”. तुम्हारी आवाज़ से तुम्हारी ख़ुशी का अंदाज़ा हो रहा था मुझे. मैं शायद भूल भी नहीं पाऊँगा खत मिलने पर तुम्हारा वो रिएक्शन . उस समय मुझे लगा की तुम्हें ख़त लिखने में जो भी थोड़ी बहुत तकलीफ हुई थी मुझे, वो बिलकुल “वर्थ” थी.

तुम पहली बार यहाँ जब आई थी, वो दिसंबर का एक दिन था न? सात दिसंबर का दिन था वो. हम उस दिन पूरा शहर घूमे थे. सुबह से शाम तक. उसके आसपास के दिन बड़े संघर्ष के दिन थे. उलझनों से भरे हुए. कुछ अपनों की बातों ने तुम्हें बहुत दुःख पहुँचाया था. उन बातों से तुम्हारे दिल को बहुत ठेस पहुंची थी. तुम बिलकुल टूट गयी थी. रात भर तुम फोन पर रोती रही थी और मैं तुम्हें समझाने की, तुम्हें सँभालने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से रात के एक बजे तुम्हें नींद आ पायी थी. लेकिन मैं पूरी रात जागा रहा था. अचानक जो बातें सामने आई थी वो कैसे सुलझेगी ये सोच रहा था. तुम्हारे बारे में सोच रहा था. कल का दिन कैसे बीतेगा उसके बारे में सोच रहा था. हमने पूरा दिन दिल्ली घूमने का प्लान बनाया था, लेकिन वो घूमना अब “आउट ऑफ़ क्वेश्चन” था. मैं बस इतना चाह रहा था कि तुम्हारी सभी परेशानियाँ खत्म हो जाए. रात भर मैं प्रार्थना करते रहा था, कि तुम जब सुबह जागो तो सब कुछ ठीक हो जाए. शायद ऊपर बैठा कोई खुदा है जरूर. प्रार्थनाओं में असर भी होता है, ये हमने उस दिन देखा था. चमत्कार जैसा ही कुछ कहेंगे न उसे कि सुबह तुमने मुझे फोन किया था और कहा था “आ जाओ, हम चलेंगे घूमने”. तुम्हारी आवाज़ थोड़ी बेहतर लगी थी मुझे और मैं तुमसे मिलने के लिए निकल पड़ा था.

पूरे रास्ते मैं सोचता रहा था कि आज क्या होगा? कैसा बीतेगा आज का दिन? तुमने तो कह दिया कि हम चलेंगे? लेकिन उन बातों का क्या होगा? वो उलझन कैसे सुलझेगी? जब तक दिमाग में वो बातें चलती रहेंगी तब तक क्या हम दोनों पूरे मन से शहर घूम भी पायेंगे? एन्जॉय कर पायेंगे? लेकिन तुमने बड़े विश्वास से कहा था कि “चले आओ, हम घूमने चलेंगे...ना भी चले तो कम से कम तुम्हारा साथ रहेगा पूरे दिन....मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात होगी”

तुम जब मेरे सामने आई थी तो तुम्हारा चेहरा देख कर मेरा दिल एकदम बैठ सा गया था. हमेशा खिला हुआ सा रहने वाला तुम्हारा चेहरा मुरझाया हुआ था. एक फीकी मुसकराहट तुम्हारे चेहरे पर थी. मुझे देखते ही तुमने थोड़ा और मुस्कुराने की थोड़ी कोशिश की, लेकिन पूरी तरह कामयाब नहीं हो पायी. दिल ने कहा कि तुम्हें उसी वक़्त गले लगाकर कहूँ “घबराओ मत, सब ठीक हो जायेगा”.

तुम जानती हो मैंने कितनी मुश्किल से खुद को सँभाला था उस वक़्त. सोचता हूँ आज कि अगर मेरे चेहरे पर
तुम्हें वो भाव दिख जाते जो तुमसे मिलने के आधे घंटे पहले तक थे, तो तुम क्या करती ? तुम खुद को संभाल पाती या नहीं? मैं तुम्हें सम्हाल पाता या नहीं? बहुत जतन करना पड़ा था मुझे अपने चेहरे पर वो मुसकराहट लाने के लिए. मेरी वो कोशिश लेकिन व्यर्थ नहीं थी. मुझे यूँ मुस्कुराता देख तुम्हारे उस मुरझाये चेहरे पर एक अलग रौनक , एक अलग ही चमक आ गयी थी....है न?

बातें करते हुए तुम थोड़ी शांत दिख रही थी... हालांकि रात की बातों का असर तो तुम्हारे चेहरे पर था लेकिन फिर भी तुम मुसकुरा रही थी. ये तुम्हारे उसी फाईटिंग स्पिरिट की ही बदौलत था जिसका मैं हमेशा से कायल रहा हूँ. दुखों तकलीफों से कैसे उबरा जाता है...हज़ार दर्द हों दिल में, फिर भी उन सब को इग्नोर करते हुए कैसे मुस्कुराया जाता है और कैसे खुश रहा जाता है ये कोई तुमसे सीखे. इस मामले में मुझे तो तुमसे हमेशा एक इन्स्परेशन मिलती रही है.

उस दिन भी तुम्हारी यही सोच थी कि जो भी हो, हमें दिन हँसते हुए बिताना है..एक दूसरे के साथ. हम घूमने निकल गए थे, सारी उलझनों को पीछे छोड़कर. और कमाल की बात देखो, मेरे आते ही वो सारी परेशानियां, वो सारी उलझनें बहुत हद तक सुलझते गयी थी. तुम इस बात से बहुत खुश हो गयी थी. तुमने कहा था मुझसे, कि देखो भगवान भी कितने चमत्कार करते हैं न. “थैंक यू गॉड ” तो तुमने उस दिन जाने कितनी बार कहा होगा.
हम पूरे दिन पुराना किला, जंतर मन्तर, इंडिया गेट और कनॉट  प्लेस घूमते हुए हम वापस आये थे. पुराने किले में बिताया समय कितना अच्छा था न. मैं तुम्हें एक गाइड की तरह सब कुछ दिखा रहा था. दीवारों की नक्काशी तुम्हें दिखाते हुए मैंने कहा था, ये देखो ये नक्काशी नहीं, आयतें लिखी हुई हैं. और वो बात कहते ही मुझे अचानक “आंधी” फिल्म का वो गाना “तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं” याद आ गया. मैं सही सही नहीं कह सकता लेकिन मुझे लगता है कि उस वक़्त तुम्हें भी इस गाने की याद आई होगी. तुमने भी मन में इसे गुनगुनाया होगा न? ये तो वैसे भी तुम्हारे पसंदीदा गानों में से एक है...है न? याद है एक सुबह जब मैंने तुम्हें फोन किया था और तुम्हें बताया था कि ये गाना मैं अभी सुन रहा हूँ, तो तुम फोन पर ही इस गाने को गुनगुनाने लगी थी और मैं जो भी काम कर रहा था और जो बातें तुमसे कहनी थी, वो सब भूल चूका था. बस तुम्हारे गाने में, तुम्हारी आवाज़ में मैं खो गया था. तुम नहीं मानती हो न तुम्हारी आवाज़ कितनी अच्छी है. ये मेरे से पूछो. दिल को कितना सुकून पहुंचती है तुम्हारी आवाज़. ये तुम नहीं जानती. तुम जान भी नहीं पाओगी कभी. तुम्हारी आवाज़ के लिए मेरी डिक्शनरी में सिर्फ एक ही शब्द है... सोलफुल.

पुराना किला और जंतर मंतर घूम कर जब हम कॉफ़ी होम पहुंचे, तब तक तुम थोड़ी थक चुकी थी. तुम सीधे वहीं चली गयी थी, जो कैफे का मेरा पसंदीदा कोना था. तुम उसी टेबुल पर जाकर बैठ गयी थी. मैंने अपना बैग तुम्हारे पास छोड़ दिया था और आर्डर देने काउंटर की तरफ गया. तुम्हें अचानक बदमाशी सूझ गयी थी. मैं फ़ूड काउंटर पर डोसा और कॉफ़ी के इंतजार में खड़ा था कि तुम मौका देखते ही झट से मेरे बैग में ताक-झाँक करने लगी. मेरी डायरी निकाल कर तुम पढ़ने लगी थी. काउंटर से मैं तुम्हें देखकर मुसकुरा रहा था और फिर तुम्हें थोड़ा चौंकाने के लिए मैं दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ पहुँचा था और लगभग स्किड करते हुए तुम्हारे पास आ रुका था. तुम बिलकुल चौंक सा गयी थी. शायद थोड़ा डर भी गयी थी तुम. तुमने डायरी पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली, कि  कहीं मैं उसे छीन ना लूँ तुमसे. “जाओ...जाओ जाकर काउंटर के पास खड़े रहो, मैं तुम्हारी नहीं, अपनी डायरी पढ़ रही हूँ, तुम्हें क्या?” तुमने कहा था और मैंने तुम्हारे पीठ पर एक थपकी देते हुए कहा “पढ़ लो बदमाश”. उस समय तुम बिलकुल वैसे ही मुस्कुराई थी जैसे तुम अकसर मुस्कुराती हो. मुझे लगा कि जैसे जो मुस्कराहट तुम्हारे चेहरे से गायब हो गयी थी वो अब धीरे धीरे वापस लौट रही है.

तुम उस दिन बातें करते वक़्त मेरी तरफ नहीं देख रही थी. तुम्हारी नज़रें कभी डोसे की तरफ जाती तो कभी आसपास बैठे दूसरे लोगों की तरफ....लेकिन तुम साफ़ तौर पर मुझे नहीं देख रही थी...और जब कभी बातों के बीच हमारी नज़रें मिल जाती, तुम्हारे चेहरे पर एक मुसकराहट फ़ैल जाती थी. तुम क्यों मेरी तरफ नहीं देख रही थी, ये भी मैं अच्छे से समझता हूँ, जानता हूँ. लेकिन मैं...मैं तो पूरे वक़्त सिर्फ तुम्हें ही देखता रहा था. कुछ बातों से कैसे तुम इरिटेट होकर शक्लें बनाने लगी थी..,कैसे मेरी कुछ बदमाशी वाली बातों पर तुम मन ही मन मुसकुरा रही थी...मैं वो सब देख रहा था. तुम खुल के कुछ भी नहीं कह रही थी, लेकिन मैं सब समझ रहा था.
हम लोग शायद एक घंटे कॉफ़ी होम में बैठे होंगे न? तुम्हें भी वो जगह काफी पसंद आई थी, और तुमने कहा था कि  अगर  मैं यहाँ रहती तो तुम्हारे साथ अकसर यहाँ चली आया करती शाम में, कॉफ़ी पीने . वहाँ से निकल कर हम इंडिया गेट की तरफ बढ़ गए थे. मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ था मैंने पहले ही उधर जाने का प्लान बना लिया था और तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना था. तुमने कहा भी था न मुझसे. सच कहो तो मैं भी चाहता था तुम्हारे साथ कनॉट  प्लेस का एक चक्कर लगाना. तुम्हे मैं वो आर्चीस गैलरी दिखाना चाहता था जहाँ से मैंने तुम्हारे लिए तोहफे खरीदे थे. तुम्हारे गले के लिए एक खूबसूरत सा चेन भी तो मैंने वहीं से खरीदा था. उस दिन अर्चिस गैलरी के काउंटर पर बूढ़ी महिला बैठीं थीं. उन्हें जब मैं पैसे देने पहुँचा तो उन्होंने उस चेन को देखते ही कहा था “बहुत सुन्दर तोहफा है. फॉर समवन स्पेसिअल?”. मैंने हाँ में सर हिलाया. उन्होंने कहा “उसे बहुत पसंद आएगा.” मैंने उन्हें धन्यवाद कहा और बाकी पैसे लेकर दुकान के बाहर आ गया. एक पागलपन वाला ख्याल था. मैं चाहता था कि तुम्हें भी वहाँ ले जाऊं और उसी बूढ़ी महिला से मिलवाऊं. उन्हें बताऊँ कि इसी ख़ास लड़की के लिए मैंने कल आपके दुकान से वो तोहफा खरीदा था. अगर रात में अचानक वो सारी बातें ना हुई होतीं, तो मैं सच में तुम्हे अर्चिस गैलरी ले जाता और उस बूढ़ी महिला से मिलवाता तुम्हें

लेकिन हम कनॉट  प्लेस ना जाकर इंडिया गेट आ गए थे. हम कुछ देर तक इंडिया गेट घूमते रहे थे. तुमने वहाँ भी मुझसे कहा था कि तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना है. मैंने तुम्हारी इस बात को इग्नोर कर दिया था. क्योंकि हमारे पास समय कम था. “वापस जाकर मैं करुँगी भी क्या? इससे अच्छा है यहीं घूम लूँ मैं..” तुमने कहा था. लेकिन मैं अड़ा रहा था अपनी बात पर...कि यहाँ से हम वापस लौट जायेंगे. तुम थोड़ी उदास सी हो गयी थी. तुम वहाँ लगी एक सीमेंट की बेंच पर जाकर बैठ गयी थी. तुम्हारा चेहरा हल्का बुझा हुआ सा दिख रहा था. तुम कुछ कह नहीं रही थी, लेकिन तुम वहाँ से वापस नहीं जाना चाहती थी. तुम्हारे मन में उस वक़्त जो बातें चल रही थी वो सिर्फ मैं जान रहा था लेकिन खुल कर तुमसे कुछ कह नहीं पा रहा था. तुम भी खुल कर मुझसे कहाँ कुछ कह पा रही थी. तुम अपना ध्यान बँटाने के लिए वहाँ खेलते कुछ बच्चों को देखने लगी थी. तुमने कहा था मुझसे “यहाँ कितना अच्छा लग रहा है. कितना अच्छा माहौल है. और तुम इस खूबसूरत ऐट्मस्फिर को छोड़कर जाने के लिए कह रहे हो..यहाँ से मेरा तो जाने का दिल भी नहीं कर रहा. ऐसे खूबसूरत माहौल से जाना कितना उदास और बोरिंग सा ख्याल है”

लेकिन वक़्त सच में हो चला था और मैं चाहता था कि हम समय रहते ही वापस लौट जाएँ. वापस लौट आने पर भी तुम मेरे साथ एक डेढ़ घंटे तक रही थी. शाम के उस वक़्त तुम बहुत हद तक शांत हो चुकी थी. तुम्हारे मन के अन्दर जो तूफान उठे हुए थे, वो शांत हो गए थे. तुम्हारा मन स्थिर था. तुम अपनी युज्वल बदमाशी वाली बातें करने लगी थी. तुम खेलने लगी थी मेरे हाथों से. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर तुम नाप रही थी.. “तुम्हारा हाथ सच में मेरे से बड़ा है” तुमने कहा था. फिर मैं तुम्हें तुम्हारे हाथों की रेखाओं से पहचान करवा रहा था... “ये देखो, इसे भाग्य रेखा कहते हैं,” ये देखो इस रेखा को ये कहते हैं....और जाने क्या क्या....” तुम मेरी बातें ऐसे सुन रही थी जैसे मैं सच में मैं हाथ की रेखाएं पढ़ना जानता हूँ.

तुम नहीं चाहती थी कि मैं तुम्हे छोड़ कर वापस इतनी जल्दी लौट जाऊं. लेकिन मेरा लौटना जरूरी था. डेढ़ घंटे बस तुम्हारे लिए मैं रुक गया था. मैं जब वापस आ रहा था तो तुम बाहर गेट तक मुझे छोड़ने आई थी. जब तक मैं गली से मुड़ न गया था तब तक तुम देखती रही थी मुझे. बस पर जब बैठा मैं अपने घर की ओर जा रहा था तो कई सारी बातें दिमाग में चल रही थी. लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य और ख़ुशी की बात ये थी कि हमने आज का पूरा दिन साथ बिताया था. कल रात जो बातें हो गयी थी, उससे दिन भर साथ रहना नामुमकिन सा लग रहा था. लेकिन ये तुम भी जानती हो और मैं भी कि हम दोनों का एक-साथ पूरा दिन बिताना कितना जरूरी था. वापस लौटते वक़्त मेरी नज़र मेरी पॉकेट में पड़ी एक कागज़ पर नज़र गयी. उमसे मैंने शहर के उन जगहों के बारे में लिखा था जहाँ तुम्हारे साथ मैंने जाने का प्लान बनाया था. मैंने उस नोट को एक बार पढ़ा और मन ही मन मन सोचा, अच्छा जब तुम अगली बार आओगी दिल्ली तो तुम्हें इन सब जगह मैं घुमाऊंगा.

4 comments:

  1. कुछ चीज़ें...कुछ बातें सिर्फ महसूस ही की जा सकती हैं न...??? शब्द कम पड़ जाते हैं अक्सर उन जज्बातों को ज़बान देने के लिए...| मेरे पास इस समय एक भी सही शब्द नहीं है तारीफ़ के लिए...| शायद ऊपर...उस उपरवाले की ओर देख कर यही कहूँगी...Thank you God...:) :)

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  2. अपने चेहरे पर लिखवा लो - Fragile! Handle with care!!
    तुम्हारी पोस्ट्स पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि दौड़कर तुम्हें समेट लूँ अपने दामन में 'मेरे बच्चे' कहकर..
    अगले ही पल महसूस होता है कहीं मेरे दामन में तुम चूर-चूर होकर न बिखर जाओ!! देखता तो मैं भी हूँ ऊपरवाले की ओर, मगर कभी यह नहीं कहता कि Thank you God!!
    मैं तो हमेशा यही कहता हूँ कि
    तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर
    तूफ़ाँ ये प्यार का मन में बसाकर
    कोई छबि तो होगी आँखों में तेरी
    आँसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
    बोल क्या सूझी तुझको
    , काहे को प्रीत बनाई!!
    Love you my son!!

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  3. याद करने का बड़ा ही रोचक अंदाज, मन के अनुकूल यदि कुछ हो रहा हो तो तन की अक्षमता विस्मृत हो जाती है।

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया