Thursday, January 2, 2014

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यादों में एक दिन - क्रिसमस

पच्चीस दिसंबर की वो सुबह थी. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी...मेरी नींद अचानक किसी आवाज़ से टूटी. पहले मुझे शक हुआ था कि कमरे में कोई है..क्योंकि बातें करने की आवाज़ आ रही थी. शायद पापा-माँ या फिर भैया या बहन होंगे, मैंने सोचा...लेकिन ठंड इतनी थी कि रजाई से बाहर मुहँ निकाल कर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. आवाज़ें लगातार आ रही थीं और मुझे इस बात से थोड़ी चिढ़ सी भी होने लगी कि इस वक़्त इतनी ठंड में ये लोग यहाँ बैठ कर क्या बातें कर रहे हैं...कुछ देर तक जब आवाजें आनी बंद नहीं हुई तो थक हार कर मैंने रजाई से बाहर झाँका....कमरे में कोई नहीं था...एक नीली रौशनी कमरे में पसरी हुई थी. मेरा ध्यान टीवी की ओर गया...टीवी चल रहा था और मेरे कानों में टीवी की आवाज़ आ रही थी....मुझे एकाएक ख्याल आया कि रात को सोते वक़्त लाइट चली गयी थी और मैं बिना टीवी बंद किये सो गया था. लाइट कब वापस आई ये मुझे पता भी नहीं चल सका था. मैंने घड़ी देखा, सुबह के चार बज रहे थे.

रात में शायद ठंड अचानक बढ़ गयी थी, मैंने एक पतली रजाई ओढ़ी हुई थी. सोते वक़्त मुझे उम्मीद नहीं थी कि रात में यूँ अचानक ठंड बढ़ जायेगी. मैं उस पतली लेकिन गर्म रजाई में भी ठिठुर रहा था..लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि मैं दूसरे कमरे जहाँ माँ और पापा सोते थे, वहाँ तक जाऊं और उनके कमरे से मोटी वाली रजाई लाकर ओढ़ लूँ. मैंने सोचा कि थोड़ी देर और सो लेता हूँ....लेकिन उसका भी ख़ास फायदा नहीं था. हर दिन सुबह साढ़े पांच बजे उसका फोन आता था और मैं ठीक छः बजे स्कूटर से कोचिंग के लिए निकल जाता था. मैं रजाई में ही पड़े हुए टीवी देखने लगा...टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, मैं वही देखने लगा था..फिल्म थी "तेरी मेहरबानियाँ”. फिल्म का नाम मुझे इस वजह से याद रह गया क्योंकि उस दिन इस फिल्म का नाम लेकर मैं उसे दिन भर छेड़ता रहा था.

ठीक साढ़े पांच बजे फोन की घंटी बजी
हर सुबह यही वक़्त होता था जब उसका फोन आता था. उसे सुबह के साढ़े पाँच बजे फ़ोन करना अच्छा लगता था, सुबह के इस वक़्त उसे इस बात की फिक्र नहीं रहती थी कि कोई और फोन उठा लेगा, क्योंकि वो जानती थी कि फोन जिस कमरे में है वहाँ मैं सोता था और दूसरे लोग इतनी ठंड में सुबह सिर्फ एक फोन रिसीव करने तब तक नहीं आयेंगे जब तक फोन लगातार बज कर उनकी नींद न ख़राब कर दे.

“मैं तो ठंड से मर गयी..
तैयार होकर मैं तो फिर से रज़ाई में दुबक गयी.....
वाऊ, यु सी आई एम सो पोएटिक.”
हर सुबह फोन पर वो ये बात कहती...ये एक तरह से उसका ओपनिंग डायलॉग होता था....वो ‘हाय’ ‘हेल्लो’ कुछ भी नहीं बोलती, सीधे यही कहती थी. इस ओपनिंग डायलॉग की आदत उसे दो साल पहले की सर्दियों में लगी थी. उस साल उसे ये डायलॉग कहने की आदत इस कदर पड़ गयी थी, कि अकसर गर्मियों के दिनों में भी वो सुबह फोन पर यही डायलॉग दोहरा देती थी...और तब मैं फोन पर बहुत देर हँसता रहता और वो बिलकुल झेंप सी जाती.
सुबह उसका ये नियम था, वो कोचिंग के लिए तैयार हो जाती और फिर कुछ देर रज़ाई में दुबकी रहती, जब तक घड़ी में साढ़े पाँच न बजता....वो रज़ाई में ही दुबकी हुई अपने कोर्डलेस फोन से मुझे फोन करती...अपने उसी ओपनिंग डायलॉग से वो बातों की शुरुआत करती....कभी उसका ये डायलॉग चेंज हुआ हो, ये मुझे याद नहीं आता. उसे चिढ़ाने के लिए कभी कभी मैं मजाक में कुछ कह भी दिया करता था...लेकिन उस मजाक को अक्सर वो सिरिअसली ले लेती थी, कभी वो मेरे मजाक को डांट समझ कर चुपचाप सुनते रहती तो कभी एकदम इरिटेट होकर गुस्से में वो फोन काट देती....और फिर ठीक आधे-एक मिनट बाद खुद ही फोन कर के फोन काटने के लिए मुझसे सॉरी कहती..
उस दिन जब उसने फोन पर ये डायलॉग कहा, उसे छेड़ने के इरादे से मैंने जानबूझकर कहा...."तमाम सुविधाएं तुम्हारे पास, कोर्डलेस फोन, जिसे रजाई के अन्दर लेकर बैठ जाओ और बातें करो, गर्म पानी के लिए गीजर, रूम हीटर, ब्लोवर और पता नहीं कैसा है वो इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट है जिसकी तुम इतनी तारीफ़ करती हो....और फिर भी तुम मर गयी ठंड से? ?हमारा क्या?सोचा है कभी?? फोन उठाने के लिए रजाई से निकलते ही लगता है ठंड से जान निकल जायेगी...ठंडे पानी से काम चलाना पड़ता है....इतनी सुबह कौन पानी गर्म करने के लिए गैस ऑन करे?टूटी खिड़की के फाट से ठंडी हवा रात में आती रहती है, हर रात सोने के पहले उसके दरारों को कागज़ से ठीक से ढंकना पड़ता है…सुविधा सभी तुम्हारे पास और ठंड से भी तुम ही मरो??ये अच्छा है..."
उधर फोन पर वो बिलकुल चुप....एकदम खामोश हो गयी....कुछ बोलने की कोशिश की उसने लेकिन कुछ कह नहीं सकी... थोड़ी देर बाद सिर्फ उसकी एक धीमी आवाज़ सुनाई दी मुझे...
"सॉरी.......मैं तो......."
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि सुबह के मेरे इस मजाक को उसने फिर से डांट समझ लिया है, और अब पूरे दिन वो ये कहने से भी नहीं चूकेगी कि "सुबह तुम कित्ते जोल छे मेलेको डांट दिए थे?". मैं समझ गया था कि अब इससे आगे अगर मैंने एक भी शब्द कहा तो वो रो देगी....थोड़े प्यार से मैंने उसे समझाया... “यार तुम्हे मैंने डांटा नहीं था वो तो बस थोड़ा मजाक किया सुबह सुबह...बस्स्स”....
मेरे ये कहते ही वो एकदम चिढ़ सी गयी, गुस्से में उसने कहा....”यू  नो यू  आर सच अ डेविल....मेरे को कित्ते जोर से डरा दिए तुम...देखते हो कितनी तेज़ी से मेरी धड़कने चलने लगी....जाओ नहीं बात करुँगी तुमसे...”
“अच्छा यार चलो माफ़ कर दो.....मुझे क्या पता था कि  तुम फिर से इस मजाक को डांट समझ जाओगी. फ़िलहाल फोन रखो और कोचिंग के लिए निकलो वरना देर हो जायेगी....सी यू ”
"हाँ, सी यू .....तुम निकलते वक़्त दस्ताने रख लेना, और आज मुझे कोचिंग नहीं जाना...घूमना है..." कह कर उसने फ़ोन रख दिया....उसे कोचिंग क्यों नहीं जाना, कहाँ घूमना है ये पूछने का उसने मुझे मौका ही नहीं दिया. दो पल वहीँ फोन के पास खड़ा होकर मैं सोचने लगा, कि  आज ऐसा क्या है जो उसे घूमना है....कि तभी मेरी नज़र सामने दीवार पर टंगे  कैलेण्डर पर गयी, और फिर तुरंत मुझे पिछले शाम की कही उसकी बाद याद आई...आज क्रिसमस का दिन है, और उसे आज ये दिन सेलिब्रेट करना है.आज उसके साथ मुझे दिन भर घूमना होगा, ये मैं समझ गया था. एक तो क्रिसमस और उसपर से सुबह वो मेरे मजाक से चिढ़ गयी थी...अब पूरे दिन वो जो भी कहेगी उसे मुझे मानना पड़ेगा. ये भी एक नियम सा था...जब भी वो नाराज़ होती, उस दिन उसकी हर एक बात मानना मेरे लिए कम्पल्सरी होता था.
मैं जल्दी जल्दी अपना समान समेटने लगा..….बैग, स्कूटर की चाभी, मफलर और दस्ताने…सब निकाल कर कुर्सी पर रख दिया, ताकि मैं कुछ भी भूलूँ नहीं…कुछ और भूल भी जाऊं तो कोई बड़ी बात नहीं थी, दस्ताने ले जाना जरूरी था…मुझे कभी समझ नहीं आया की दस्ताने से उसे इतनी मुहब्बत क्यों थी, उससे कभी मैंने मफलर, टोपी या स्वेटर पहनने के लिए इतनी डांट नहीं सुनी होगी जितनी दस्ताने नहीं पहनने पर सुननी पड़ती थी.
वैसे मैं कभी कभी ये कोशिश करता था कि  मैं दस्ताने ले जाना जानबूझकर भूल जाऊं...दस्ताने घर में भूल जाने में एक सुख था, लेकिन उस सुख को एक अच्छी खासी डांट से होकर गुज़ारना पड़ता था. जब भी मैं दस्ताने ले जाना भूल जाता, वो मुझे अपने हाथों को इस्तेमाल नहीं करने देती...उसके साफ़ इन्स्ट्रक्शन रहते थे...कि  तुम अपने हाथों को अपने जैकेट के पॉकेट में घुसाए रखो, तुम्हे चाय पीना हो, या कुछ खाना हो या कुछ लिखना हो...सब मैं करूँगी. मैं इस सुख के लालच में कभी दस्ताने जानबूझकर घर भूल जाता तो कभी मैं दस्तानों को स्कूटर के डिक्की में या अपने बैग में छुपा देता...वैसे शायद उसे हर बार ये पता चल जाता था, कि  मैंने दस्ताने छिपाये हैं या सच में घर पर मैं उसे भूल गया हूँ...हालाँकि उसने कभी बताया नहीं मुझे ये बात, ये बस मेरा एक अनुमान ही है.
उस सुबह भी ठीक सवा छः बजे मैं कोचिंग क्लास के नीचे खड़ा होकर उसका इंतजार ही कर रहा था कि  मेरे मन को एक शरारत सूझी.....उसके आने के ठीक पहले ही मैंने जानबूझकर अपने दस्ताने छिपा कर बैग में रख लिए..
उसने मुझे दूर से ही देख लिया था, और शायद ये भी कि मैंने हाथों में दस्ताने नहीं पहने हैं....उसके चेहरे के भाव को मैंने दूर से ही पढ़ लिया था. पास आते ही उसने बिना कुछ पूछे बिना कुछ सुने, एक ज़ोर की डांट लगायी...."निकलते वक़्त फोन पर तुम्हें याद दिलाया था, कि दस्ताने रख लेना...लेकिन फिर भी भूल गए तुम...देखते हो कितनी ठंड है आज??स्कूटर चला कर आये हो? हाथ सुन्न पड़ गए होंगे तुम्हारे...”

उसे मैंने कोई एक्स्प्लनेशन नहीं दिया...यूँ भी ऐसे जब जानबूझकर मैं शरारत करता था तो उसे कोई एक्स्प्लनेशन मैं देता नहीं था...शायद इसी से वो ये समझ जाती होगी की कब मैं शरारत कर रहा हूँ और कब नहीं..
वो मुझे डांट रही थी, एक तो दस्ताने नहीं पहनने की वजह से, दूसरी उसे फोन पर डरा देने की वजह से...मैं चुपचाप बिना कुछ कहे उसकी डांट सुनते रहा....उस सुबह उसकी डांट इतनी प्यारी लग रही थी, कि  मैं मन ही मन सोचता कि ये अपना डाँटना ययूँ हीं कन्टिन्यू रखे.....और मैं बस इसके सामने खड़े होकर इसकी डांट सुनता रहूँ....वो मुझे ऐसे डांट रही थी, कि अगर कोई दूसरा देखता हमें तो उसे लगता कि  कोई टीचर अपने स्टूडेंट को डांट रही है...
उसकी डांट अब तक खत्म नहीं हुई थी, लेकिन उसने जब नोटिस किया कि मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूँ और चुपचाप उसकी डांट सुन रहा हूँ तो शायद एक हल्का गिल्ट उसके मन में आ गया और तब वो अचानक डांटते हुए रुक गयी....कहने लगी “चलो तुम्हें बहुत डांट दिया न, अब चाय पिलाती हूँ....” मैं मुस्कुराने लगा था, “चलो”, मैंने कहा....और हम दोनों चाचा की दुकान की तरफ बढ़ गए.
“सुनो तुम अपने दोनों हाथ जैकेट के पॉकेट में डाल लो....खबरदार इतनी ठंड में अपने हाथों को पॉकेट से बाहर निकाला तो....” चलते हुए उसने कहा...
“अरे तो मैं चाय कैसे पियूँगा?” मैं जवाब जानते हुए भी ये सवाल उससे पूछ बैठा.. वो थोड़े गुस्से में, थोड़े प्यार से कहती... “चाय पीने के लिए तुम्हे हाथ बाहर निकालने की क्या जरूरत है?मैं जो हूँ तुम्हे चाय पिलाने के लिए...”
मैं यही चाहता था...सर्दियों की सुबह जब भी मैं अपने दस्ताने भूल जाता, वो मुझे यूँ हीं अपने हाथों से चाय पिलाती...मेरे लिए ये सर्दियों के सुबह का सबसे बड़ा सुख था....जिसके लिए मैं अकसर थोड़ी बहुत डांट सुन लिया करता था....
हम दोनों चाचा के दुकान पहुँच गए थे....ये दुकान मुख्य सड़क से थोड़ी दूर एक गली में थी जहाँ हम सर्दियों में हर सुबह चाय पीने आते थे. चाचा की चाय दुकान में चाय के अलावा थोड़ी बहुत मिठाइयाँ और स्नैक्स भी मिलते थे. उनके चाय की दुकान के ठीक सामने एक कंप्यूटर  कोचिंग क्लास थी, और वहाँ के अधिकतर लड़के-लडकियाँ चाचा के दुकान पर सुबह-शाम नज़र आते थे...कंप्यूटर कोचिंग के स्टूडेंट्स के अलावा और बाहरी कोई उस चाय दुकान पर कम ही दिखाई देता था. यहाँ आने की हमारी आदत कुछ एक दो साल पहले पड़ी थी, जब हम दोनों ने कंप्यूटर कोचिंग क्लास में एड्मिसन लिया था और सामने चाचा के चाय की दुकान पर हर सुबह चाय पीते थे. वे सर्दियों के ही दिन थे.
हम चाचा के दुकान में सिर्फ सर्दियों के मौसम में सुबह की चाय पीने आते थे, गर्मियों के दिन में उस गली में हम कभी जाते भी नहीं थे....मैं फिर भी कभी गर्मियों की शाम भूले भटके चचा के दुकान चला भी आता था लेकिन वो सिर्फ सर्दियों की सुबह ही चाचा के चाय दुकान पर आती थी.
चाचा को लेकर उसके कई सारे आश्चर्य थे. पहला तो उसे इस बात से हद हैरानी होती थी की चाचा की याददाश्त इतनी अच्छी कैसे है. हम उनके दुकान पर सिर्फ नवम्बर से मार्च के महीने में ही आते थे फिर भी वो हमेशा हमें हमारे नाम से पहचान जाते थे, ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, लेकिन फिर भी उसे इस बात पर बड़ी हैरानी होती थी. चाचा थे भी ऐसे, जैसे हमारे घर के ही वो कोई बुजुर्ग हों....वो सब लोगों का हाल चाल वैसे ही लिया करते थे. उसे वो बिटिया कह कर बुलाते थे, वो बहुत खुश हो जाया करती थी जब चाचा उसे बिटिया कह कर बुलाते थे. उसे चाचा की दाढ़ी को देखकर भी थोड़ी हैरानी होती थी....वो उनकी दाढ़ी की तुलना बर्फ से कर देती….वो कहती “इनकी दाढ़ी तो देखो, लगता है चचा के चेहरे पर दाढ़ी नहीं बर्फ उग आई है….”
सुबह हम चाचा की दुकान पर जैसे ही पहुंचे, उसने मेरे कानों में कहा “चाचा को आज हम अगर सांता क्लॉज का गाउन पहना दें तो वो परफेक्ट सांता दिखेंगे न....” मेरी हाँ या ना का इंतजार किये बिना ही उसने यही बात चाचा से कह दी.... “चाचा आपको अगर सांता के कपड़े पहना दें तो आप बिलकुल सांता क्लॉज जैसे दिखेंगे”
चाचा ज्यादा कुछ समझ नहीं पाए....उन्होंने पूछा “सांता कौन है?”
वो पूरे आश्चर्य में कहती है.... “अरे चाचा, आपको सांता नहीं पता???वही जो क्रिसमस पर तोहफे और खुशियाँ बांटता है...और बच्चों को चॉकलेट्स देता है....” चाचा को कुछ ख़ास समझ में नहीं आया, दो पल सोचने के बाद वो कहते... “अच्छा, मैं वो तो नहीं, लेकिन हाँ देखो मैं चाय जरूर बांटता हूँ, पिलाता हूँ....और ये लो तुम्हे चॉकलेट भी दे रहा हूँ.....” कह कर उन्होंने सामने रखी टॉफी के डिब्बे से एक टॉफी निकाल कर उसे दे दी.....
वो बहुत खुश हो गयी..
“अरे आप तो सच में आज मेरे लिए सांता बन गए, वो भी बिना सांता के रेड गाउन के ही...क्रिसमस के सुबह देखिये आपने मुझे टॉफी दे दी.....” वो हँस रही थी.. मुझे लगा था कि  चाचा के साथ बात करने में वो अपने गुस्से को भूल गयी है...और शायद अब मुझे आगे डांट नहीं पड़ेगी.लेकिन ये मेरा भ्रम था.
उसने टॉफी खायी नहीं, बल्कि उसे उसने अपने बैग में रख लिया. चाय का कप अपने हाथों में पकड़े हुए वो कुछ देर जाने क्या सोचने लगी.....
वो ऐसा करती थी, चाय पीने से पहले वो अकसर कुछ देर तक चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़े रहती थी.....मैं जब भी उसे यूँ चाय हाथ में पकड़े देखता, तो उसे कहता “हाथों में दस्ताने पहन कर तुम चाय के कप से अपना हाथ सेंक रही हो...” उसे मेरी ये बात शायद ज्यादा अच्छी नहीं लगती थी....मेरी इस बात का वैसे तो वो जवाब नहीं देती थी लेकिन कभी कभी वो तुरंत पलट कर कह देती “दैट वाज अ पी.जे....” 

“चचा आपको पता है, आज कल के कुछ बच्चे बहुत लापरवाह हो गए हैं...” हाथों में चाय का कप लेते हुए कुछ सोचते हुए उसने चाचा से कहा....
चाचा को फिर से कुछ समझ नहीं आया.... “हाँ बेटी सो तो है, सब तुम्हारे जितने समझदार नहीं होते...” उन्होंने कहा. चाचा की इस बात से उसका चेहरा थोड़ा खिल सा गया. अपनी तारीफ़ सुनने के बाद यूँ भी उसके चेहरे पर 880 वाल्ट की स्माइल आ जाती थी.
लेकिन अपनी ख़ुशी को छिपाते हुए उसने फिर आगे कहा... “हाँ चाचा देखिये न, कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, उन्हें कितना भी याद दिलाओ आप, वो दस्ताने हमेशा भूल जाते हैं...” उसके सीधे निशाने पर मैं था....मेरी तरफ देखते हुए उसने ये कहा था.
वो जब भी ऐसे मेरी शिकायत करती, चाहे वो चाचा से, या मेरी बहन से या फिर अपनी दीदी से...मुझे हमेशा वो अपने उम्र से दस साल बड़ी दिखने लगती.
चाचा को थोड़ा बहुत अंदाज़ा था की वो किसके तरफ इशारे कर रही है.....उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा “क्यों बाबु, आज दस्ताने फिर से भूल गए तुम? सुन लो आज फिर बिटिया की डांट......वैसे तुम दोनों की ये मीठी लड़ाई अच्छी लगती है, तुम दोनों की दोस्ती बने रहे...” चाचा ने कहा...वो ये सुन कर खुश हो गयी...."देखो चाचा की प्यारी बातों ने तुम्हें आज बचा लिया है...वरना आज मैं इतनी जल्दी मानने वाली नहीं थी...."उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा...
"हाँ, वैसे भी तुम गुस्सा होने का अच्छा नाटक कर लेती हो, तुम्हारी सभी हरकतों से वाकिफ हूँ मैं".
वो मुस्कुराने लगी.

उस दिन जैसा उसने फोन पर कहा था, वैसा ही हुआ...हम क्लास नहीं गए....हमारी क्लास तो थी, लेकिन उसका तर्क था, कि क्रिसमस की सुबह भी कोई पढ़ता है क्या? वो चाहती थी कि क्रिसमस की सुबह वो मेरे साथ शहर घूमे...कोहरे में लिपटी सुबह उसे पसंद थी...हम दोनों बहुत देर तक घूमते रहे थे....गणेश की दुकान की जलेबियाँ और कचौड़ियाँ हमने खायी...उसकी पेस्ट्री खाने की जिद थी, लेकिन उतनी सुबह, साढ़े सात-आठ बजे कम ही दुकान खुलते थे.....एक दुकान पर हमारी नज़र गयी, जहाँ हमने देखा कि दुकानदार दुकान खोल ही रहा है...हम वहीँ गए पेस्ट्री खाने.हम जैसे ही दाखिल हुए दुकान में, उसने सीधे दुकानदार से कहा “क्या भैया, क्रिसमस के दिन भी कोई इतनी देर दूकान बंद रखता है क्या?” बेचारा दुकानदार अपने चेहरे पर हैरानी के एक्स्प्रेशन लेकर हमें देखता रहा...पेस्ट्री खा कर हम वहाँ से वापस चाचा के दुकान आ गए.
“चाचा एक कप चाय और पिलाइये न..” उसने चाचा से कहा...
“आज तुम दोनों की क्लास नहीं थी क्या? बहुत जल्दी आ गए तुम दोनों?” चाचा को हमारी टाईमिंग पता होती थी, जब भी हम दस बजे के पहले पहुँच जाते उनके दुकान, वो समझ जाते थे कि  हम क्लास नहीं गए और घूम रहे थे....उन्होंने फिर पूछा... “जब तुम लोगों को क्लास नहीं जाना होता तो यहाँ आकर क्यों बैठे रहते हो इतनी ठंड में?
मैंने उसकी तरफ इशारा कर के कहा , “इसे कहिये चाचा...मुझे तो वैसे भी जाड़ों के सुबह की नींद बहुत प्यारी है...सिर्फ इसी की मेहरबानी है कि  मुझे हर सुबह आना पड़ता है, इसके साथ घूमना पड़ता है..”
“अरे....तो क्या हुआ? देखिये चाचा मेरे दो ही तो सच्चे दोस्त हैं...बारिश और दिसंबर...और मैं इस महीने में घूमूं भी नहीं?” उसने बड़े मासूमियत से चाचा को देखते हुए ये बात कही...
"हाँ घूमो, लेकिन धूप निकली रहे तब....ऐसे ख़राब मौसम में क्यों घूमती हो?" चाचा ने कहा...
“अरे चाचा...ये ख़राब मौसम है??इसे आप ख़राब मौसम कहते हैं???ये तो सबसे सुन्दर मौसम है..जो इस मौसम को ख़राब कहते हैं उनका दिमाग ख़राब होता है...डरपोक लोग दुबके रहते हैं इस मौसम में रज़ाई और कम्बल में...मैं तो घूमती हूँ....” उसने एक ही सुर में ये कह दिया...
चाचा भी समझ गए थे, इस लड़की से बहस करने का कोई फायदा नहीं...वो बस मुस्कुरा कर रह गए.


सुबह के नौ बज गए थे, और चाचा के दुकान भी अब खाली नहीं थी...सामने कंप्यूटर कोचिंग क्लास की पहली क्लास दस बजे लगती थी, तो वहाँ पढ़ने वाले लड़के लड़कियों की भीड़ दुकान पर होने लगी थी.....वो ऐसे में ज्यादा देर तक दुकान पर बैठती नहीं थी...वो तभी वहाँ बैठती जब वहाँ कोई और न हो, या फिर कम लोग बैठे हों..

हम चाचा के दुकान से वापस कोचिंग कोम्प्लेक्स आ गए. चाचा के दुकान से कोचिंग तक आने में जितना समय लगा, उतने समय में उसने पूरे दिन का कार्यक्रम भी बना लिया था....मुझे उसने सिर्फ ढाई घंटे का वक़्त दिया था और कहा था कि सीधे बारह बजे तुम मुझे अशोक थिएटर के सामने मिलना, वहाँ एक अच्छी फिल्म लगी है, तुम टिकट लेकर रखना...शहर का वो एकमात्र थिएटर था, जहाँ फ़िल्में देखने वो जाया करती थी...वरना बाकी थिएटर उसे कुछ ख़ास पसंद नहीं थे..
उस पूरे दिन मैं उसके साथ घूमता रहा था, लगभग सुबह के सवा छः बजे से शाम के साढ़े छः बजे तक हम साथ घूमे थे.वो मेरी पहली क्रिसमस थी जो उसके साथ बीती थी, इसके पहले कभी इस दिन को मैंने सेलिब्रेट नहीं किया था...वैसे भी उन दिनों हमारे शहर में क्रिसमस से ख़ास मतलब किसी को था नहीं...शायद इसलिए जब उसने पेस्ट्री दूकान में दुकानदार से ये कहा था कि  क्रिसमस के सुबह भी आप इतनी देर से दूकान खोलते हो, तो दुकानदार ने हमें हैरानी से देखा था. सुबह के पेस्ट्री के बावजूद शाम में हमने क्रिसमस केक खाया...शाम को बाकी दोस्त भी मौजूद थे.सभी दोस्तों को फोन पर धमका कर उसने शाम में कोचिंग क्लास बुलाया था...किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि  उसकी धमकी को इग्नोर कर सके, शाम की कड़कती ठंड में भी सब बिलकुल तय समय पर कोचिंग पहुँच गए थे...और फिर हमने कोचिंग कोम्प्लेक्स के टेरेस पर क्रिसमस केक काटा था. नाश्ते का भी प्रबंध किया गया था और वो हमारी एक छोटी सी पार्टी हो गयी थी.

उसी रात हम बहुत देर तक बातें करते रहे थे.वो मेरे से कहानियाँ और मेरी लिखी उस समय की कवितायेँ सुनना चाहती थी.उस रात उसके कमरे में उसके साथ उसकी बड़ी बहन भी सोयी थी...वो उधर से कुछ कह नहीं सकती थी, उसने शाम में मुझे फोन पर बस इतना कहा था....की रात में ग्यारह के बाद मैं फोन करुँगी, और सिर्फ एक शब्द का सिग्नल दूंगी...(उसने कहा था, की वो सिर्फ हेल्लो बोलेगी) और तुम समझ जाना कि  ये मेरा फोन है, तुम अपनी कवितायें और डायरी में लिखी अपनी बातें मुझे सुनाते रहना, जब तक तुम्हे नींद न आ जाए....और मैं सुनती रहूंगी, रज़ाई में दुबक कर...रात में, ठीक ग्यारह बजे उसने मुझे फोन किया और जैसा उसने कहा था, ठीक वैसे ही डेढ़ घंटे तक मैं उससे इकतरफा बात करते रहा था.वो हमारे बीच हुई पहली साईलेंट कॉल थी. 


वो एक यादगार क्रिसमस का दिन था मेरे लिए !

7 comments:

  1. जाने कितनों के दिलों में एक हूक-सी उठा दोगे तुम...कि काश! दास्ताने भूल जाने पर कोई उनको भी अपने हाथों से चाय की एक गर्म प्याली पिला दे...। और बाइ द वे, ये साइलेण्ट-कॉल का भी आइडिया अच्छा है...:) पता करना, कितने लोगों ने आजमाया...???
    अब सीरियसली, बहुत प्यारी पोस्ट...पढ़ने बैठी तो एक साँस में पढ़ कर दम लिया...इत्ता जाड़ा होने के बावजूद...। लिखते रहो यूँ ही सर्दी की नर्म-ठण्डी रातों में ऐसी गुनगुनी धूप सी बातें...यादें...:)

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  2. यादों को कितनी सुन्दरता से सहेजा है...!
    सुनहरी यादें यूँ ही कलमबद्ध होती रहे... शुभकामनाएं!

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  3. अपना ज़माना याद आ गया.. इससे कुछेक डिग्री ऊपर!! मगर अब लिखना मुमकिन नहीं!! वैसे भी तुमने मेरे ब्लॉग पर आना छोड़ रखा है तो पढ़ भी नहीं पाओगे!! :)

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  4. उफ़ ये दस्ताने, गरम चाय, "वो" और ये कम्बख्त दिसंबर :) । बहुत ही अच्छा लिखा है अभि।

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  5. पोस्ट पढ़कर लग रहा था जैसे कि अनुभव कर रहे हों वह ठंडक।

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  6. sach main thand lagne lage yeh sunkar :) :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया