Sunday, November 24, 2013

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सफ़र की शुरुआत...


ज़िन्दगी की कुछ अच्छी चीज़ों की शुरुआत युहीं हो जाती है...अचानक ही. मेरे लिए लिखने की शुरुआत ऐसे ही हुई थी...एकदम रैंडमली...युहीं बातों बातों में...दो दोस्तों के साथ मजाक में लिखी गयी एक कहानी से...नवम्बर की एक सर्द शाम में, लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहलते हुए...चानू चाचा के चाय की दूकान में बैठकर चाय पीते हुए.

वो बाईस नवम्बर की एक शाम थी.छठ पूजा सुबह के अर्ध्य के साथ समाप्त हुआ था.शाम में हम तीन दोस्त(मैं, सुदीप और शिखा) बोरिंग रोड के लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहल रहे थे...और पुरानी यादें ताज़ा कर रहे थे.छठ पूजा की शाम आमतौर पर सड़के सुनसान सी हो जाती हैं..दुकानें बंद रहती हैं.बोरिंग रोड का भी कुछ वैसा ही नज़ारा था...पटना के सबसे भीड़ भरे इलाकों में से एक बोरिंग रोड बिलकुल सुनसान सा था..कुछेक दुकानें खुली हुई थी, सड़कों पर लोग भी काफी कम नज़र आ रहे थे और ऐसे में शाम की हलकी सर्द हवा में बोरिंग रोड में टहलना हमें बहुत अच्छा लग रहा था..हम बहुत देर तक घूमते रहे थे...तीनों में से किसी को भी वापस घर जाने की जल्दी नहीं थी.हम तीनों अपनी गाड़ियों से आये थे, तो ये चिंता किसी को नहीं थी की देर हो गयी तो घर कैसे जायेंगे.मेरा घर तो खैर पास में ही था, बाकी दोनों के घर दूर थे.

कुछ देर घूमते घूमते जब हम थोड़े थक गए तो वहीँ लक्ष्मी काम्प्लेक्स के पास ही एक चाय की दूकान पर जाकर बैठ गए.वो चानू चाचा की चाय दूकान थी...जहाँ पहले हम अक्सर चाय पिया करते थे और बहुत बहुत देर तक बैठ कर बातें करते थे.चानू चाचा की चाय की दूकान पर हमें हमेशा गज़ब के आईडियाज आते थे.सबसे ज्यादा शिखा को.वो अजीब अजीब बातें यहाँ बैठ कर सोच लिया करती थी, और खुश होकर कहती थी..."ये मेरे लिए थिंकिंग पॉइंट है, जहाँ बैठकर मुझे अच्छी अच्छी बातें सूझती हैं".सुदीप बाबु नॉर्मली कभी कोई बहकी बातें सोचते नहीं थे, लेकिन उस शाम वहाँ जब हम तीनों एक अरसे बाद बैठ कर चाय पी रहे थे, तो उन्हें एक गज़ब की बात सूझी....वो अचानक से बहुत एक्साईटेड हो गए...कहने लगे "अभि...शिखा...लेट्स प्रोड्यूस अ फिल्म टूगेदर.....".
एक तो सुदीप बाबु की मुहँ से इस तरह की बातें सुनना बड़ा आश्चर्यजनक था दूसरा की उसने कुछ इस अंदाज़ में इस बात को कहा था, अपने दोनों हाथों को पुरे एक्साईटमेंट में हवा में ऐसे उछाल दिया था उसने की मुझे एकाएक बहुत जोरों की हँसी आ गयी.आगे मैं कुछ कह पाता इससे पहले ही मेरे बगल में बैठी शिखा ने एक मुक्का मेरी पीठ पर दे मारा और डांटते हुए कहा मुझे..."ख़बरदार तुमने कुछ कहा तो..............हाँ सुदीप, तुम कुछ कह रहे थे न यार...कहो.....इग्नोर हिम".
सुदीप बाबु को अब शिखा का सपोर्ट मिल गया था, वो थोड़े तन से गए...एक कोंफीडेंस आ गयी थी उनमे...उन्होंने मुझे देखा, थोड़ा चिढ़ाया मुझे और शिखा की तरफ मुखातिब होकर कहने लगे...  "मेरे पास एक सिच्युएसन है, एक कहानी, एक लव स्टोरी...लव ट्रायंगल...क्या कहती हो?? एक फिल्म बनाया जाए?.....सोचो अगर....."
सुदीप की बातें अभी खत्म भी नहीं हुई थी, शिखा ने झट से कहा "वाऊ...दैट्स ग्रेट यार!! वैस भी ज़िन्दगी काफी बोरिंग हो गयी है..कुछ तो नया करना ही चाहिए, मैं तुम्हारे साथ हूँ, चलो फिल्म बनाते हैं...तुम कहानी सुनाओ मुझे अपनी...लेट्स डिस्कस स्टोरी".
वैसे दोनों हमेशा मजाक के मूड में रहते हैं लेकिन उस शाम दोनों में से कोई भी मजाक के मूड में नहीं था....फिर भी दोनों की की बातें सुन कर जाने क्यों मुझे थोड़ी हँसी आ रही थी..मैंने बीच में टोकते हुए उन्हें कहा "वो कहानी बाद में डिस्कस कर लेना यार, अभी शाम इतनी अच्छी है, क्यों बर्बाद कर रहे हो तुम दोनों इसे?"
लेकिन मेरी बात को दोनों में से किसी ने लिफ्ट नहीं दिया....और दोनों कहानी डिस्कस करने में व्यस्त हो गए.

ना चाहते हुए मुझे भी उनकी कहानी सुननी पड़ रही थी.सुदीप की कहानी की शुरुआत लक्ष्मी काम्प्लेक्स के उसी कोक-शेप्ड दूकान से हुई, जहाँ हम पहले फाउन्टेन कोक पीने जाया करते थे.उसकी कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे वैसे मुझे भी उस कहानी में इंटरेस्ट आने लगा था.मैंने बीच में कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप इस वजह से रहा की कुछ देर पहले मैंने कहानी का मजाक उड़ा दिया था.लेकिन थोड़ी देर बाद जब खुद को कंट्रोल नहीं कर सका तो बेशर्मों की तरह मैं भी कहानी के बीच में कूद पड़ा और अपने इनपुट देने लगा.कुछ एक-डेढ़ घंटे के  डिस्कसन के बाद एक अच्छी खासी लव स्टोरी तैयार हो गयी थी.बाकायदा एक कागज़ पर कहानी के पॉइंट्स लिखे गए थे ताकि हमें याद रहे.कहानी में सब कुछ ठीक था, सब बातें बहुत अच्छी थीं...लेकिन कहानी का क्लाइमैक्स तय नहीं हो पा रहा था.लड़की दोनों में से किस लड़के की होगी इस बात पर मेरी और सुदीप की राय अलग अलग थी..शिखा की कोई राय ही नहीं थी.बेसक्ली वो न्यूट्रल रहना चाह रही थी.हमने जब गेंद उसके पाले में फेंक दिया..की तुम ही अब फैसला करो, की कहानी का अंत क्या होगा....तो वो बेचारी धर्मसंकट में फँस गयी...किस दोस्त का पक्ष ले वो? किसके क्लाइमैक्स को बेहतर बताये...? कुछ देर वो सोचती रही थी और फिर कहती है वो "यु नो व्हाट ...लड़की किसी को नहीं मिलेगी....मैं तो सोच रही हूँ की कहानी का सबसे अच्छा क्लाइमैक्स ये हो सकता है की दोनों लड़के और वो लड़की पागल हो जाए और किसी मेंटल हॉस्पिटल चले जाए.इस तरह प्यार करने वाले लोगों को दुनिया वैसे भी पागल ही तो कहती है न". शिखा ने पूरी कोशिश की की इस बात को एक मजाक की तरह ही कहे वो, उसने हँसते हुए चुटकी लेते हुए इस बात को कहा था लेकिन फिर भी हम दोनों में से किसी को भी इस बात पर हँसी नहीं आ सकी..क्यूंकि कहानी सच में बहुत भावुक बन गयी थी और कहानी डिस्कस करते वक़्त हम तीनों ही काफी सेंटीमेंटल से हो गए थे.

कुछ देर हम तीनों चाय दूकान पर युहीं बैठे रहे..एकदम चुप..बस चाय पीते हुए और सड़कों पर आ जा रही गाड़ियों को देखते हुए.तीनों के बीच अचानक आ गयी इस चुप्पी को सुदीप ने ही तोडा..."कम ऑन यार....हम तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे सच में एक फिल्म बन जायेगी इस बकवास कहानी पर..." सुदीप की कही इस बात पर शिखा थोड़ी चिढ़ सी गयी, एक मुक्का उसने उसे भी दे मारा और उसके हाथों से वो कागज़ छीन कर उसने मुझे थमा दिया.."इसे तुम रखो, इस पागल लड़के को इतनी बेहतरीन कहानी बकवास लग रही है......किसे पता यार, कभी हम साथ मिलकर इसपर एक फिल्म बना ही दें".
सुदीप मुस्कुराने लगा, उसने शिखा के कंधे को हिलाकर कहा, हाँ रे..जरूर बनायेंगे फिल्म एक दिन और फिल्म की डाईरेक्टर तुम ही बनोगी..सुदीप की इस बात से शिखा मुस्कुराने लगी....हम तीनों सुदीप के इस छोटे से मजाक के सहारे उस सेंटीमेंटल मूड से बहार निकल आये थे.

उस शाम शिखा ने वो कागज़ मेरे को ये कह कर थमाई थी की इसे मैं अपनी डायरी में अच्छे से सहेज कर रख लूँ ताकि फिर कभी जब हम तीनों मिले तो इस कहानी को फाईनल टच दे पायें.बहुत दिनों तक वो कहानी रही भी मेरे साथ, लेकिन फिर पता नहीं कैसे अन्फॉर्चूनट्ली वो कागज़ मेरे से खो गया.वो जो अच्छी सी कहानी बन गयी थी, उसके पॉइंट्स सही सही याद नहीं थे, लेकिन फिर भी उस कागज़ के गुम हो जाने के बाद मैंने एक दिन उस कहानी को लिखना शुरू किया, लेकिन कहानी उस तरह से लिख नहीं पाया...युहीं आधी अधूरी बातें उस शाम की जो याद थी बस वो ही लिख पाया मैं.सोचता हूँ की कभी ये दोनों मिलें अगर फिर से, हमारे पास फिर से बैठ कर बातें करने का वक़्त हो, तो वहीँ चानू चाचा की चाय की दूकान पर हम फिर से एक बार बैठ कर कहानी को डिस्कस करें और पूरी कहानी अच्छे से लिखें, उस अधूरी कहानी को एक मुक्कमल शक्ल दें.

जिस शाम की ये बातें मैं बता रहा हूँ आपको, उन दिनों मैं कुछ लिखता नहीं था, हाँ ब्लॉग थे मेरे...दोनों ब्लॉग थे...लेकिन बस कॉलेज टाईम में मस्ती में लिखी हुई एक दो कवितायें ही ब्लॉग पर डाला करता था...अक्सर अपनी कविताओं को मैं अपनी डायरी में लिखा करता था...लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं.फिर भी पता नहीं कैसे कुछ दोस्तों को विश्वास था की एक दिन मैं लिखूंगा, कुछ भी लिखूंगा लेकिन लिखूँगा जरूर.दिव्या, शिखा, सुदीप और शायद प्रभात ऐसे दोस्त थे जिन्हें ये भरोसा था की मैं कभी न कभी कुछ न कुछ तो लिखूंगा ही.उस शाम  जब हमने वो कहानी डिस्कस की थी, शिखा ने चानू चाचा की चाय की दूकान पर बैठे हुए अचानक कहा था मुझसे..."तुम्हे सब काम वाम छोड़कर राईटर बन जाना चाहिए, तुम बहुत अच्छा लिखते हो...और कम से कम एक किताब तो तुम्हारी पब्लिश होनी ही चाहिए".सुदीप जो आमतौर पर इन सब बातों से दूर ही रहता है, किताबों का भी ज्यादा शौक नहीं उसे...सिर्फ अपने विषय की ही समझ रखता है...उसने भी शिखा का फुल सपोर्ट करते हुए कहा था "हाँ, सिरिअसली यार, यु सूड कंसीडर राईटिंग...तुम्हे लिखना चाहिए". दोनों ने ये बातें इस तरह कही थी की मुझसे आगे कुछ भी नहीं कहा गया.मैंने बस ये कहा की "I will try".

उस साल, छठ पूजा के आसपास कई लोगों ने रैंडमली मुझे इस तरह की बातें कही थी....सबसे पहले मेरी बहन मोना ने, जिसने बैंगलोर के एक रेस्टुरेंट में, कहा था मुझसे...जब किसी नए फिल्म का एक बकवास सा गाना बज रहा था वहाँ...मोना ने कहा था मुझसे "देखो तो आजकल कैसे वाहियात से गाने बनने लगे हैं...भैया तुम तो इन सब से अच्छे गाने लिख सकते हो..तुम लिखते क्यों नहीं?".दिवाली के दुसरे दिन दिव्या का जब फोन आया तो उसने भी एक्जैक्टली यही बातें कही थी मेरे से....."तुम लिखा करो यार, कितनी बार कहा है तुम्हे लिखना शुरू कर देना चाहिए". मैं अब सोचता हूँ तो लगता है की कहीं इन सब लोगों ने पहले से कोई प्लान तो नहीं बना रखा था की एक साथ सब मुझे लिखने के लिए यूँ इंस्पायर करेंगे? खैर, जो भी हो...दिव्या, शिखा,सुदीप और मोना की ये बातें कहीं न कहीं मेरे दिमाग में ठहरी हुई थी...और मैं सच में कुछ लिखना चाहता था...फिर करीब दो महीने बाद मौका मिला मुझे जब जनवरी की एक शाम मैं अपनी बहन सोना के साथ बैठकर कुछ पुराने किस्से, अपने स्कुल कॉलेज की पुरानी यादें उसे सुना रहा था.उसे किस्से सुनाते हुए एकाएक कुछ लिखने का ख्याल आया...एक कविता लिखने का मन किया....और इस तरह उस रात मैंने ये कविता लिखी थी जिसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट भी किया था.....उस दिन मैंने ये भी तय किया की आज के बाद से मैं लगातार ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिखते जाऊँगा...चाहे मेरी लिखी बातें अच्छी हों या बकवास...चाहे उसे कोई पढ़े या न पढ़े..और उस दिन किया गया खुद से वादा अब तक कायम है.
शिखा ने उस शाम, जब हम कहानियाँ डिस्कस कर रहे थे तो एक और बात कही थी, "तुम एक दिन बहुत बड़े राईटर बनोगे, लोग तुम्हे जानेंगे". ये एक दोस्त का प्यार था...उसका मेरे पर ब्लाईंड फेथ..., बड़ा राईटर का तो कुछ अता पता नहीं, लेकिन मुझे लगता है उस शाम ने जो ट्रिगर किया था मेरे अन्दर, उससे अब एक स्माल टाईम ब्लॉगर तो बन ही चूका हूँ मैं.

सच कहूँ, तो इस ब्लॉग पर जब से लिखना शुरू किया था, तो एकदम नहीं सोचा था की लोग मेरी ये बातें पढेंगे भी....मुझे इतना प्यार देंगे......और ये तो कभी सपने में भी सोचा भी नहीं था की मेरी ये बातें अखबारों में भी छपेंगी.इस ब्लॉग की अब तक की आठ पोस्ट चार अखबारों में छप चुकी है.ये बातें दिल को खुश तो करती ही है, और लिखने के लिए उत्साहित भी करती हैं.अभी कुछ दिनों पहले कुछ ऐसा हुआ जिससे लगा की इस ब्लॉग पर जो भी छोटी मोटी कहानियाँ मैं लिखता हूँ, वो लिखना सच में सफल हुआ.मेरी दोस्त शिखा, जो अभी बोस्टन में रह रही है, उसने वहाँ एक कम्युनिटी फंक्सन में इस ब्लॉग की दो पोस्ट्स अपनी आवाज़ में लोगो को सुनाई...एक स्टोरी-टेलिंग सेसन में...और शिखा को इसके लिए पहला पुरुस्कार भी मिला था.जब शिखा ने मुझे ये बात बताई थी की वो मेरी कहानी एक फंक्सन में पढने वाली है, तो मैंने मजाक में कह दिया था उससे...तुम अगर चाहो, तो सबको ये कह कर सुना सकती हो की ये कहानियाँ तुमने लिखी हैं, या अगर चाहो तो कोई दूसरी कहानी लिख कर मैं तुम्हे भेज सकता हूँ....लेकिन उसने मना कर दिया...खुद के पसंद की दो कहानियाँ उसने उस फंक्सन में सबको सुनाई और अंत में उसने मेरा भी नाम लिया, ये कह कर की इन दोनों कहानियों को मेरे एक दोस्त ने लिखा है, जो दिल्ली में रहता है.ये मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात थी.



जब से यहाँ मैंने लिखना शुरू किया है, बहुत से लोग मिले हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बहुत जायदा उत्साह बढ़ाया है मेरा...यहाँ लिखी जिनकी बातें पढ़कर और बेहतर लिखने का मन करता है.आज कुछ वैसे ही लोगों को थैंक्स कहने का दिल कर रहा है...वैसे ये थैंक्स कहकर फोर्मलिटी करने में मैं यकीन नहीं रखता लेकिन फिर भी, आज के दिन जब ये लिख रहा हूँ...बाईस नवम्बर का समय भी है और सौ पोस्ट इस ब्लॉग के पूरे भी हो चुके हैं तो दिल की बात सुन रहा हूँ, और ये थैंक्स आप सब के नाम....

सबसे पहले तो प्रियंका दीदी, अगर आप ना होती...तो ये ब्लॉग शायद कब का इनएक्टिव हो गया होता...कितने ही पोस्ट्स इस ब्लॉग पर सिर्फ आपकी वजह से लग पाए हैं.मुझे डांट डांट कर आप पोस्ट्स लिखवाती हैं...और ये पोस्ट के लिए भी मुझे आप कई दिनों से डांट रहीं हैं....मेरा होमवर्क था की इसे मैं बाईस तारीख के शाम में लगाऊं...लेकिन अपना होमवर्क पूरा नहीं कर पाया समय पर.आपने मुझे आज तक का ग्रेस टाईम दिया है, तो देखिये मुझे पनिशमेंट न झेलनी पड़े, इस वजह से मैं इसे आज रात पोस्ट कर रहा हूँ..ये जानता हूँ की इसे पोस्ट कर भी दूँ, तो आप एक दूसरा होमवर्क लेकर मेरे सर पर बैठ जायेंगी...लेकिन कोई बात नहीं, मुझे अच्छा लगता है आपके दिए गए टास्क को पूरा करना.
दीदी, आप युहीं मेरे से पोस्ट लिखवाते रहिये, मैं बहुत आलसी हूँ लिखने में...आप हैं तो ये विश्वास भी है की ये ब्लॉग अब कभी इनएक्टिव नहीं होगा.

सलिल चचा.....इस ब्लॉग का ही शुक्रिया अदा करूँगा की आपसे मुलाकात हुई.सबसे खूबसूरत बातें आपकी ही होती हैं मेरे हर पोस्ट्स पर...कई कई बार तो आपकी तारीफ़ सुन कर दिल बहुत खुश हो जाता है, तब यकीन दिलाना मुश्किल होता है खुद को की क्या मैंने सही में अच्छा लिखा है? लेकिन आप तारीफ़ के साथ साथ गलतियाँ भी बता देते हैं, और मुझे बहुत अच्छा लगता है....लगता है जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे बता रहा हो की देखो तुमने यहाँ यहाँ गलतियाँ की हैं.इस ब्लॉग के कुछ पोस्ट्स के लिए ख़ास तौर पर आपने दो तीन कवितायें लिखी हैं...जो की मेरे लिए अनमोल है.

शिखा वार्ष्णेय दीदी..आप तो हैं ही बहुत स्वीट, और आपके कमेंट्स भी आपकी ही तरह स्वीट होते हैं....दीदी, आपकी छोटे से स्वीट कमेन्ट का इंतजार हमेशा रहता है मुझे...कुछ ऐसे भी कमेंट्स हैं आपके जिन्हें पढ़कर मैं सिर्फ मुस्कुराता हूँ...नहीं, मैं नहीं बताने वाला वो कौन कौन से कमेंट्स हैं, आपको जानना हो तो आप खुद ढूँढ लें वो कमेंट्स.आप ऐसे ही स्वीट सी बातें यहाँ करते रहिये...इस ब्लॉग को आपके स्वीट कमेंट्स की जरूरत है, और हाँ, मेरी गलतियाँ भी सुधारते रहिये(यु नो व्हाट आई मीन)...मैं काफी गलतियाँ करता हूँ.

अनुपमा पाठक.....आपके बारे में क्या कहूँ मैं....आप खुद इतना सुन्दर इतना "अवसम" टाईप लिखती हैं, की मुझे कुछ भी कहने को शब्द नहीं मिलते...अक्सर आपकी कवितायें पढ़ते हुए लगता है की आपने हमारे ही मन की बातें कही हो कविताओं में.और आप जैसी लेखिकाएं जब इतने सुन्दर कमेन्ट करती हैं तो बता नहीं सकता मन कितना खुश हो जाता है.आपके कमेंट्स गज़ब का हौसला देते हैं बेहतर लिखने को.आप इस ब्लॉग का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं.

अर्चना बुआ...रश्मि दीदी....यूँ तो आप दोनों के कमेंट्स यहाँ कम मिले हैं, लेकिन उसे क्या फर्क पड़ता है? आप दोनों की बातें हमेशा बहुत खुश कर जाती हैं मुझे.रश्मि दीदी, आप तो शायद अब ब्लॉग की साईलेंट रीडर बन चुकी हैं, और कभी कभी अर्चना बुआ भी साईलेंट रीडर का रोल निभा देती हैं.अर्चना बुआ, आपके कहे अनुसार मैंने सोचा है जल्द ही एक पॉडकास्ट इस ब्लॉग पर लगाऊं.आप दोनों अपना स्नेह युहीं बनाये रखिये.

अनु जी(अनुलाता जी)..आपके कमेंट्स थोड़े "हट-के" होते हैं न,. भीड़ से एकदम अलग...अपनापन झलकता है आपके हर कमेंट्स से..चाहे वो फेसबुक पर हो या ब्लोग्स पर...बिना < 3 सिंबल के पूरे नहीं होते...खूब सारा प्यार भरा होता है आपके कमेन्ट में....और कभी कभी शायद ये प्यार थोड़ा ज्यादा दिख जाता है, जैसे की एक दफे आपने एक पोस्ट में कहा था "पढ़ते हुए मुझे लगा आप बिलकुल गुलज़ार के जैसा लिखते हैं". ये बहुत बड़ी बात आपने कह दी थी पोस्ट में....और मैं बहुत खुश हो गया था, उस दिन तीन चार बार पढ़ा था आपका ये कमेन्ट...युहीं अपना प्यार बनाये रखिये आप.

दिगम्बर नासवा...आप तो खुद ही इतने शानदार शायर हैं..कमाल की ग़ज़लें कवितायें लिखते हैं आप..एक दो नहीं कई बार पढ़ता हूँ आपकी कविताओं और गजलों को...आपकी यहाँ लिखी बातें कितना उत्साह बढाती हैं ये मैं बता नहीं सकता...आप नियमित रूप से हर पोस्ट पर अपना प्यार बरसा कर चले जाते हैं..बहुत अच्छा लगता है आपकी प्यार भरी बातों को अपने पोस्ट्स में पढना.

स्नेहा...आपका इंग्लिश ब्लॉग है, मैं ज्यादा इंग्लिश ब्लॉग नहीं पढ़ता, लेकिन आप कमाल लिखती हैं.आपसे युहीं एक दिन घूमते फिरते टकरा गया था मैं, और तब से आज तक हमारी दोस्ती कायम है और रहेगी.शिखा दीदी के लिए जो बातें कही है मैंने, वही दोहराना चाहूँगा, आप जितनी स्वीट हैं, उतने ही स्वीट आपके कमेंट्स भी होते हैं...एक बड़ा सा शुक्रिया आपको स्नेहा.


दिव्या...तुम्हे क्या कहूँ दोस्त? एक समय था जब ये ब्लॉग नहीं था तब भी मेरी हर कविताओं को तुमने झेला है, हमने गाँधी मैदान के आसपास घूमते टहलते जाने कितनी कहानियां बनायीं होंगी...अगर उस समय पता होता की कभी ब्लॉग पर लिखना शुरू करूँगा तो उन कहानियों को मैं सहेजते जाता...तुम एक समय इस ब्लॉग की सदस्य थी, लेकिन फिर बाद में तुमने ये कहकर ब्लॉग को अलविदा कह दिया की यहाँ सिर्फ मेरा नाम अच्छा लगता है, वापस इस ब्लॉग से जुड़ने के बारे में सोचना तुम....

अकरम...दोस्त, तुम्हे शुक्रिया कहे बिना ये पोस्ट पूरी नहीं हो सकती.तुमने हर पोस्ट पर अपनी राय दी है, और हर पोस्ट पर तुमने अच्छी बातें ही कही है.तुमसे तो कई कहानियाँ यूँ भी कह चूका हूँ मैं, और बाद में उन्हें ब्लॉग पर लगाया है.शुक्रिया दोस्त.

रुचिका, वरुण, अतिप्रिया , शुभ्रा, अनिल, प्रभा.....तुम सब बच्चों को मैं क्या कहूँ...तुम सब का ब्लॉग से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है...नाही तुम हिंदी की किताबें या कहानियां पढ़ते हो.....फिर भी मेरी लिखी बातों को, यहाँ लिखी कहानियों, कविताओं को तुम सब नियमित पढ़ते आये...और यकीन मानो, शुरू के कुछ पोस्ट इस ब्लॉग को सिर्फ और सिर्फ तुम सब के लिए ही लिखे थे मैंने...तुम सब हमेशा मुझे बहुत खुश कर देते हो.शुक्रिया तुम बच्चों का, और युहीं मेरी कहानियों को झेलते रहो...

इन सब के अलावा और भी कई लोग मिले हैं, जिनका शुक्रिया मैं अदा करना चाहता हूँ की उन्होंने इतना प्यार दिया मुझे....कुछ लोग जिन्हें आज याद कर रहा हूँ....
श्रेया, निवेदिता भाभी, वाणी गीत जी, स्नेहा, संगीता स्वरुप जी, ऋता दीदी, सोनल जी, प्रवीण भैया,  अनुराग शर्मा जी, ऋचा गुप्ता जी, गुंजन दीदी, अर्चना बुआ, प्रशांत, स्तुति, रश्मि दीदी, स्मृति, पूजा, अजय भैया, देव भैया, वंदना, आराधना जी ,समीर चाचा, शिवम् भैया, अनूप शुक्ल जी, देवेद्र पाण्डेय जी, अमिता नीरव जी, अमृता तन्मय जी, देवांशु, शेखर , गिरिजा जी , गायत्री गुप्ता जी, मोनिका जी, रश्मि प्रभा जी, अभिषेक भाई, मोनाली जी, माही जी, रीना मौर्य,रूचि जैन, पल्लवी जी, नितीश,मुकेश भाई, निर्मला कपिला जी.

बहुत से लोग मिले हैं इस ब्लॉग के सफ़र में अब तक...बहुत लोग ऐसे भी हैं शायद जिनका नाम मैं यहाँ लेना भूल रहा हूँ...जिनका नाम मैं यहाँ न ले पाया हूँ...उन सबको कहना चाहता हूँ की आपके बिना ये सफ़र मुश्किल होता..आप सब का शुक्रिया, साथ ही उन सभी लोगों का जो ब्लॉग नहीं लिखते हैं फिर भी ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...उन तमाम साईलेंट रीडर्स का जो ब्लॉग पढ़ते हैं......सभी उन साथियों को शुक्रिया जो किसी भी तरह से इस ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...ये ब्लॉग मेरे लिए बहुत ख़ास है, अपना स्नेह बस युहीं बनाये रखिये.......!


अभि 

23 comments:

  1. क्या रे...:) इतना शुक्रिया...वैसे किसी ने सिखाया है हमें कि कभी कभी अपनी तारीफ़ (थोड़ी ज्यादा ही सही...) स्वीकार कर लेनी चाहिए...। वैसे बेट्टा, कभी मेरा भी मौका आएगा...तब कहाँ जाओगे...???
    अब ऑन अ सीरियस नोट...बहुत अच्छे तरीके से ये `थैंक्स-गिविंग पोस्ट’ लिखी है...हमेशा की तरह यादों की चाशनी में पगी हुई...|

    और हाँ...एक नया हैंगओवर हुआ तो है, पर इसको उतारने का इंतज़ाम भी करवा ही लेंगे न हम...:P

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  2. अभि, बहुत अच्छा लिखा है . और मुझे साइलेंटली टोका भी है ...लेकिन अब तुम ब्लॉगजगत को सरप्राईज़ देने के लिए अपने आपको तैयार कर लो ...इतनी रात को जागकर तुम्हारी पोस्ट पर कमेंट कर रही हूँ, ये बताने के लिए कि अभिषेक बाबू अब तो मान ही लो कि आप हो चुके हैं "सेलिब्रिटी बाबू" ... और हम सब यूँ ही पीछे पड़े रहेंगे क्योंकि हम जानते हैं कि तुम क्या हो .........बहुत बहुत बधाई स्नेहाशीष के साथ ...यूँ ही लिखते रहो हमेशा ............

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  3. Commenting with a very BAAAAD mood.. Itni sweet si post aur main roman me comment kar raha hoon.
    .
    Seriously... Bus me travel kar raha hoon aur tumhari post padhkar apne kurte ki aastin se apni aankhe ponchh raha hoon.. Hamesha kehta aaya hoon aur aaj bhi kahunga ki ye sachche emotions tumhare dil ki seep me chhipe wo moti hain jiska mukabla duniya ki koi daulat nahin kar sakti..
    Chacha hoon magar Ghalib nahin, varna kahta ki apni ye post mere naam kar do aur badle me meri sau sawaa sau posts le lo!!
    Kuchh log dil ke kareeb hote hain.. Magar kuchh log dil me hote hain.. Tum dil me ho mere.
    Is post ki timing aur writting par khade hokar taaliyan baja raha hoon.
    WO KHUSHNASIB HAI JISKO TU INTIKHAB KARE!! Jeete Raho!!

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    1. कोई नी भैया मैं हूँ ना-- :-)
      इतनी स्वीट सी पोस्ट और मुझे रोमन में कमेंट करना पड़ा सबसे पहले उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ ......
      सही बताउँ तो -बस में सफ़र कर रहा हूँ, और तुम्हारी पोस्ट पढ़कर अपने कुर्ते की आस्तीन से अपनी आँख पोंछ रहा हूँ.... हमेशा कहता आया हूँ और आज भी कहूँगा कि ये सच्ची भावनाएँ तुम्हारे दिल की सीप में छिपे वो मोती हैं,जिसका मुकाबला दुनियाँ की कोई दौलत नहीं कर सकती..
      चाचा हूँ मगर "गालिब" नहीं, वरना कहता कि अपनी ये पोस्ट मेरे नाम कर दो और बदले में मेरी सौ सवा सौ पोस्ट ले लो !!
      कुछ लोग दिल के करीब होते हैं.. मगर कुछ लोग दिल में होते हैं.. तुम दिल में हो मेरे ..
      इस पोस्ट की टाईमिंग और राईटिंग पर खडे़ होकर तालियाँ बजा रहा हूँ...
      " वो खुशनसीब है जिसको तू इन्तिखाब करे!!" जीते रहो !!
      (गलतियों के लिए मुझे बःई माफ़ कर देना ...दोनों ... ) ...:-)

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  4. एहसासों का सुन्दर तानाबाना बुनते हैं आप...
    सहज सुन्दर और प्यारा...

    आपकी कलम हमेशा यूँ ही चलती रहे... रिश्तों की शीतलता से महकता चहकता रहे आपका जीवन!
    अनंत शुभकामनाएं...!!!

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  5. मन की बातें सुंदर शब्दों में ढलीं .... लिखते रहें यूँ ही , शुभकामनायें

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  6. लिखो ,लिखो और भी खूब सारा लिखो ..... कई शतक बनाओ :)

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    1. साइलेंट रीडर और शायद सेलेक्टेड पोर्शन रीडर भी कह सकते हो :) (जैसे अभी भी थोडा सा ही पढ़ा ) फेसबुक से क्लिक कर के यहाँ आती हूँ ,जल्दी में एक नज़र देख ,कई बार फेसबुक पर ही कमेन्ट कर सोचती हूँ ,पूरी पोस्ट पढ़कर ब्लॉग पर कमेन्ट करुँगी और रह ही जाता है...सॉरी :(
      {स्पेलिंग मिस्टेक थी इसलिए डिलीट कर दुबारा कमेन्ट किया }

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  9. The fever of sachin has gripped the whole nation.......This post seems to be inspired from his farewell speech... While its good to be inspired from someone ( sachin in case of this post), it would be better if you become your own role model.....

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    1. दुनिया में किसी दूसरे को अपनी प्रतिभा के लिए भी शुक्रिया कहने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए...| सचिन निःसंदेह ऐसे ही बड़े दिल वाले शख्स हैं...| खुद के लिए ही रोल मॉडल बन के रहे तो क्या रहे...मज़ा तो तब है जब इंसान कुछ ऐसा करे कि बाकी दुनिया उसे रोल मॉडल मानने लगे...| वैसे ये पोस्ट बिलकुल दिल से लिखी गयी है और सब बड़े दिल वालों के बड़े-बड़े काम भी एक-दूसरे से इंस्पायर्ड लगें तो इसमें आश्चर्य कैसा...???

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  10. तुमने नहीं बताए कौन से कमेन्ट , तो जाओ हम भी नहीं देते कोई कमेन्ट :P.
    वैसे ये हमने भी कहा था तुम्हें कि सब कुछ छोड़कर तुम्हें सिर्फ लिखना चाहिए :)

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  11. बहु अच्छा लिखते हैं सर... अगली पोस्ट का के इन्तज़ार में

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  12. Bhaiya...I was so happy aapne mera naam yahan liya :) :) <3
    u have no idea how I much Iove reading ur stories...
    u write sooooooooo lovely.....ap maan lo ki aap bht achhaaa likhte ho.... :) :)
    m soo proud on having a person lyk u in my life....thankzzzzz bhaiya fr all yr love and all yr lovely STORIES :)

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  13. Emotional aur khoobsurat!
    Kamaal likhte hai aap :)

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  14. एहसास का बवंडर ... खूबसूरत शब्द एहसास का जाल बुन के फंसा लेते हो यार ...
    एक ही सांस काफी होती है पूरी पोस्ट पढ़ने को ...

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  15. हमेशा की तरह अब भी कहना पडेगा कि अभिषेक आपकी अभिव्यक्ति बडी सहज और रोचक होती है । बहुत ही भाव पूर्ण । जब भी इन्टरनेट खोलती हूँ कुछ खास ब्लागों की नई पोस्ट देखती ही हूँ । उनमें आपका ब्लाग भी है ।

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  16. हम कमेन्ट नहीं करेंगे... कोई परेशानी है आपको ??? मतलब हद ही है, जब तब सेंटी पोस्ट ठेलते रहते हैं... भक्क....

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  17. और हाँ ये जो छोटा सा कमेन्ट सिर्फ और सिर्फ इसलिए किए दिया क्यूंकी एक छोटे से कोने में अपना नाम भी लिखा दिखाई दिया.... ज्यादा खुश मत हो जाईएगा...

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया