Wednesday, October 30, 2013

// // 18 comments

मैंने परी को देखा है..



आज से ठीक चार साल पहले की ३१ अक्टूबर की बात है..युहीं घूमते हुए एक ब्लॉग पर जा रुका था..एक कहानी सामने दिखी थी..."ज़िन्दगी बाकी है".मुझे कहानी काफी पसंद आई, सोचा की कुछ कमेन्ट कर दूँ, की तभी ब्लॉगर प्रोफाइल के तरफ ध्यान गया.सोचा कमेन्ट करने से पहले देख तो लूँ की आखिर किसका ब्लॉग है, नाम क्या है इनका? और क्या करती हैं?लेखिका हैं कोई या हम लोग टाईप टाईमपास ब्लॉगर.इनका प्रोफाइल क्लिक किया तो सबसे पहले जिस चीज़ पर नज़र गयी थी वो थी इनके फोटो पर...फोटो से बड़ी सुन्दर लेखिका लग रही थी..इनका नाम जानना चाहा तो देखा नाम के जगह लिखा था "कही अनकही".मुझे थोड़ी हंसी आ गयी थी, मैंने सोचा कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं, ब्लॉगर प्रोफाइल में अपना नाम लिखने के जगह अपने ब्लॉग का नाम ही लिख दिया है इन्होने..फिर इनका प्रोफाइल आगे पढ़ा...'अबाउट मी' सेक्सन के तरफ नज़र गयी तो मैं थोड़ा सा संभला...लिखा था "I have got my five books published, out of which two are awarded...I write basically in my mother tongue-Hindi- but there are some stuffs in English too.".. जो इनके बारे में पहली सोच थी की कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं वो सोच अब तब्दील हो गयी थी, की "अरे ये तो बड़ी हॉट-शॉट टाईप कोई चीज़ हैं".पांच किताबें, दो सम्मानित और इंग्लिश में भी कुछ लिखती हैं.अब मैं सोचने लगा था की कमेन्ट करूँ या न करूँ?? लेकिन उसके पहले दुविधा ये थी की इन्हें बुलाऊं किस नाम से?नाम तो इनके पूरे ब्लॉग पर कहीं नहीं लिखा था, नाही प्रोफाइल पर...कमेंट्स मोडरेसन लगाया हुआ था इन्होने तो कोई कमेन्ट भी नहीं दिख रहा था जहाँ से हिंट ले सकूँ, की तभी ध्यान गया की इन्होने कहानी में अपना नाम तो लिख ही रखा है, जिसे पता नहीं क्यों मैंने देखा ही नहीं था.खैर, नाम जानने के बाद और काफी सोच विचार करने के बाद मैंने कहानी के ऊपर कमेन्ट कर दिया(एज युज्वल, विद अ ग्रमैटिकल मिस्टेक)..मैंने सोचा नहीं था की इनका कोई जवाब भी आएगा, लेकिन अगले ही दिन या शायद उसी दिन ई-मेल के जरिये इनका एक औपचारिक सा जवाब आया था.हम दोनों के बीच बातचीत उसी ई-मेल से शुरू हुई थी.उस वक़्त हम दोनों में से किसी को ये नहीं मालुम था की एक सिम्पल ई-मेल से शुरू हुआ रिश्ता ज़िन्दगी भर का साथ बन जाएगा.

पहले ईमेल पर हुई उस औपचारिक बातचीत के बाद(जिसमे मुख्यतः झूठी तारीफ़ शामिल थी.."प्रियंका जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं", "अभिषेक जी आपका आभार, आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं".) हमारे बीच बातें लगातार होती रहीं, हम लगातार ईमेल एक्सचेंज करते रहे.बहुत जल्दी ही हमारे बीच सारी औपचारिकतायें मिट गयीं और दोस्ती हो गयी.अब ये याद भी नहीं की कितने ख़त(ई-मेल) हमने एक दुसरे को लिखे थे.वैसे यहाँ मैं ये बता दूँ की ये मैं फेसबुक के ज़माने की बात कर रहा हूँ..साल २००९-२०१० में फेसबुक काफी सक्रीय था और सभी लोग इससे जुड़े हुए भी थे..मैं भी था, ये भी थीं फेसबुक पर...लेकिन फिर भी हम एक दुसरे के फेसबुक अकाउंट से जुड़े नहीं थे.हमने तो फेसबुक पर बहुत बाद में एक दुसरे को एड किया था...हमारे बीच जो भी एक रिश्ता बना था वो किसी सोशल नेटवर्किंग साईट, चैट या फोन के माध्यम से नहीं बल्कि खतों के माध्यम से बना था..और हमें पता भी नहीं चला की कब और कैसे हम एक दुसरे के इतने करीब आ गए की एक दुसरे से हर बात शेयर करने लगे...चाहे वो दोस्तों की बातें हों, शहर की या परिवार की..हम पारिवारिक फंक्सन की तस्वीरें भी एक दुसरे को भेजने लगे..और बाद में तो ऐसा हो गया था की अगर एक का जवाब वक़्त पर ना आये तो दूसरा परेशान हो जाता था की "आखिर बात क्या है?अब तक जवाब क्यों नहीं आया?".

एक दिन युहीं बातों बातों में  मैंने इनसे पूछ ही लिया था, "आपको मैं दीदी बुला सकता हूँ?".इनके ख़ुशी का तो फिर कोई ठिकाना ही नहीं था...बड़ा खुश होकर इन्होने एक प्यारा सा जवाब भेजा था मुझे और कहा था "क्यों नहीं, तुम भी तो मेरे छोटे भाई ही तो हो"
और फिर ये बन गयीं मेरी प्रियंका दीदी और मैं बन गया इनका छोटा अभि भैया.अब सोचता हूँ तो ये असंभव सा लगता है की कभी कोई ऐसा भी वक़्त था जब हम एक दुसरे को नहीं जानते थे.जब कभी पुराने खतों को देखता हूँ तो हँसी भी बहुत आती है, की पहले इन्हें मैं "प्रियंका जी" कहता था और ये मुझे "अभिषेक जी".मुझे ये पता भी नहीं चला की कब ये मेरे लिए प्रियंका जी से प्रियंका दीदी बन गयीं और प्रियंका दीदी से सिर्फ "दीदी".और मैं कब इनके लिए अभिषेक जी से अभि भैया बन  गया और अभि भैया से सिर्फ "भाई".

अब कभी सोचता हूँ तो लगता है की कहाँ से अचानक यूँ चलते चलते इनसे मेरी मुलाकात हो गयी और पता भी नहीं चला की कैसे ये मेरी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गयीं...इतना की मेरे पल पल की खबर रखती हैं...मैं कब क्या कर रहा हूँ, कहाँ हूँ, वक़्त पर खा रहा हूँ या नहीं, सही वक़्त पर सो रहा हूँ या नहीं...मेरी हर बात का ये ख्याल रखती हैं.छोटी छोटी बातों पर परेशान भी बहुत हो जाती हैं..इनका फोन भी अगर रिसीव करने में देरी करूँ तो ये बहुत घबरा जाती हैं.मैं इन्हें समझाता हूँ की दीदी इतना जल्दी परेशान नहीं होना चाहिए, इनका जवाब होता है..."तुम्हारे लिए कैसे न परेशान हों हम?" . मेरी हर लापरवाही पर वैसे ही पुरे अधिकार से डांटती हैं जैसे माँ डांटती हैं.खाने पीने में, या तबियत ख़राब हो जब तब....हर ढंग से हर समय ये मेरे पीछे पड़ी रहती हैं..अब तो लगता है ऐसा की दो दी निगाहें मुझपर हर वक़्त लगी रहती हैं...एक मेरी माँ की और दूसरी इनकी.

मेरे पर ये हर हुक्म चला लेती हैं.जब कहता हूँ, की "देखो भाई पर इतना हुक्म चलाना ठीक नहीं"..तो कहती हैं "ये 'दिदिगिरी' तो तुमको हमेशा झेलनी पड़ेगी रे".दीदीगिरी इनकी कम खतरनाक नहीं होती है..अक्सर ये मुझे इमोशनल ब्लैकमेल भी कर देती हैं...पता नहीं कहाँ कहाँ से आईडियाज लेकर आती हैं ये भाई को इमोशनल ब्लैकमेल कर अपना काम निकलवाने का? वो काम इनका चाहे भाई को वक़्त पर खाना खिलाने का हो या उसे समय पर सुला देने का, ऐसी धमकियाँ देती हैं की इनका भाई चुपचाप इनका बात मान लेता है.
कोई गलती करूँ तो ये थोड़ा डांट भी लगा देती हैं मुझे(हाँ, थोड़ा ही डांट लगाती हैं, क्यूंकि भाई को ये खुल कर डांट भी नहीं सकती न, इतना प्यार करती हैं अपने भाई से).इनकी डांट से वैसे मुझे थोडा डर भी लगता है, ये आज कन्फेस कर रहा हूँ(ये जानता हूँ अच्छे से की यूँ इनके सामने ये कन्फेस करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, फिर भी).

लेकिन आमतौर पर इनका एक अलग ही रूप मेरे सामने रहता है, उस वक़्त मुझे बिलकुल नहीं लगता की ये मेरे से बड़ी हैं, कभी कभी इनसे पूछ भी देता हूँ मैं "तुमने सच तो बताया था न मुझे की मेरे से बड़ी हो तुम, या झूठ कह दिया था".अक्सर एकदम बच्चों जैसी हरकतें और जिद होती हैं इनकी.बदमाशियां तो इनकी रूकती ही नहीं हैं..कभी कभी जब मैं प्यार से डांट देता हूँ..."बहुत बदमाशियां कर रही हो तुम आजकल"..तो ये और भी बच्ची बन जाती हैं और कहती हैं "हाँ तो?भाई हो, झेलो मेरे इन नखरों को...".

जब भी इनसे मिला हूँ, इनकी ढेर सारी इललोजिकल और बकवास बातों को झेलना पड़ा है...मुझे देखते ही इन्हें लगातार हँसी के दौरे पड़ते रहते हैं और अजीब अजीब हरकतें करती रहती हैं.....खूब बदमाशियां भी कर लेती हैं ये मेरे सामने..मुझे ही उलटे चुप हो जाना पड़ता है...कभी कभी तो इन्हें संभाल लेता हूँ, लेकिन अक्सर इनकी बदमाशियाँ, इनकी हंसी, और इनकी ईललॉजिकल बातें आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो जाया करती हैं....वैसे ये भी सच है की जब ये बदमाशियाँ कर रही होती हैं, उस समय मन ही मन ये भी दुआ करता हूँ की इनकी ये हरकतें, ये बदमाशियां और हंसी के ये दौरे तामुम्र पड़ते रहे.

इन्हें हमेशा मेरे से शिकायत रहती है की मैं जब इनसे मिलने आता हूँ तो इनके लिए चोकलेट लेकर नहीं आता...ये मुझे धमकाती भी हैं बहुत, मैं फिर भी भूल जाता हूँ.अगली बार भी हम जल्दी ही मिल रहे हैं और ये अभी से ही मुझे याद दिला रही हैं चोकलेट लाने को...और मैं हमेशा की तरह इस बार भी जान बुझकर चोकलेट लाना भूल जाऊँगा.इनसे हुई पहली मुलाकात का एक मजेदार किस्सा भी है...वो बहुत खूबसूरत सा एक दिन था.मुझे याद है, जब इन्हें मैंने पहली बार देखा था, ये मेरे इंतजार में गेट पर खड़ी थीं और मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहती हाँ..."स्वागत है"...इन्होने उस समय "स्वागत है" कुछ इस तरह से कहा था, अपने दोनों हाथों को फैला यूँ वेलकम किया था की जैसे कह रही हों..."आ जाओ बेट्टा, अब बचकर कहाँ जाओगे?".
मैंने इन्हें पैर छू कर प्रणाम किया, उस समय भी दीदी की हल्की "दीदीगिरी" झेलनी पड़ी थी...इन्होने मुझे और नीचे झुकाया और कहा की पैर को अच्छे से छुओगे तब आशीर्वाद मिलेगा.मैंने भी इनके मन मुताबिक ही पैर को अच्छे से छूकर प्रणाम किया, इनका आशीर्वाद लिया.घर में इत्मिनान से बैठा ही था..चाय पानी पीकर थोड़ा आराम कर ही रहा था की मुझे अहसास हुआ ये बड़े इक्साइट्मन्ट से मेरी तरफ देख रही हैं..मैंने पूछा, क्या बात है दीदी? ऐसे क्या देख रही हो? इन्होने कहा, चलो जल्दी से मुझे मेरा चोकलेट दो तो.मुझे हँसी आने लगी..मैंने कहा आपके लिए कोई चोकलेट नहीं लाये.इनका चेहरा उदास हो गया था...कहने लगीं..."मैं कब से इंतजार कर रही थी की भाई जेब से अब चोकलेट निकालेगा की तब निकालेगा और भाई को देखो...खाली हाथ हिलाते हुए आ गया मेरे पास...चोकलेट क्यों नहीं लाये? मैंने दीदी की बात का जवाब नहीं दिया और सामने जो स्नैक्स रखा था उनपर कान्सन्ट्रेट करते हुए कहा इनसे..."अगली बार". ये कहाँ मानने वाली थीं..कहने लगीं...अगली बार नहीं, अभी जाओ..सामने ही दूकान है". इन्होने जिद दिखाया तो मैं भी जिद पर अड़ गया और बेशर्मों की तरह बैठा रहा.अंत में तंग आकर ये कहती हैं...मुझे पता था तुम मुझे चोकलेट नहीं खिलाओगे.
इनसे बाद की मुलाकातों में भी ये बात होती रही है, हर बार ये उम्मीद करती हैं की मैं इनके लिए चोकलेट लेकर आऊंगा और हर बार मैं चोकलेट लाना जान बुझकर भूल जाता हूँ...
वैसे दीदी, आप तो ये पोस्ट पढ़ ही रही हैं और अब तक समझ भी चुकी होंगी, की हम आपके लिए चोकलेट नहीं लाने वाले...अगली बार भी ये उम्मीद छोड़ दीजियेगा की हम आपको चोकलेट खिलाएंगे, अरे..बड़ी बहन
चोकलेट खिलाती है या छोटा भाई?

ये मेरे से खूब लड़ाई भी कर लेती हैं, और खूब नखरे भी दिखाती हैं...लेकिन कितनी भी ये लड़ाईयां करे, अपने भाई से जुडी हर बात से इन्हें प्यार है."भाई सब काम सही ही करता है ये इनका विश्वास है".इनके भाई की जब कोई तारीफ़ करता है तो भाई से भी ज्यादा ख़ुशी इन्हें होती है....भाई के लिखे स्टुपिड ब्लॉग पोस्ट्स की तो ये तारीफ़ करते नहीं थकती.वैसे भाई की तारीफ़ करना इनका फेवरिट काम है(और बड़ा गर्व भी है इन्हें इस पर).जब ये कहती हैं मुझसे(और अक्सर कहती ही हैं) की "काश भाई की तरह मैं लिख पाती", तो उस समय सच में मैं निशब्द हो जाता हूँ.खुद दीदी इतना अच्छा लिखती हैं, साहित्य की पता नहीं कौन कौन सी विधा जानती हैं ये, कहानियां, कवितायें, हाईकू और जाने क्या क्या में माहिर दीदी अपने भाई के लिए ऐसा कहती हैं तो ये उनका बस प्यार ही है.

सच में कुछ लोग होते हैं जो आपके ज़िन्दगी में जब आते हैं तब आपकी ज़िन्दगी बदल जाती है, और खूबसूरत हो जाती है..दीदी वैसे ही लोगों में से हैं.कभी कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता है की इतना प्यार करने वाली बहन से मिलना लिखा था.हर तरह से ये मेरे लिए एक सहारा बन जाती हैं...चाहे कितनी भी परेशानियों में रहूँ, ये मेरे साथ हर वक़्त रही हैं.अब खुद मैं अगर ज्यादा परेशान हो जाता हूँ तो इनके पास चला आता हूँ..कभी कभी तो ये यकीन होता है की इनकी बातों में सच में कोई मसीहा बसता है..थोड़ी देर भी इनसे बातें कर लेता हूँ तो सारी परेशानियां सारी चिंताएं पीछे छुट जाती हैं.मेरे लिए ये एक इन्स्परेशन भी हैं और मेरी स्ट्रेंथ भी.बहुत कुछ ऐसा है जो मैंने इनसे सीखा है.खासकर जिस जिन्दादिली से ये ज़िन्दगी जीती हैं, वो सच में कमाल है.हर परिस्थिति में, हर हालात में ये मुस्कुराते रहती हैं, हँसते रहती हैं.मैं सच में चाहता हूँ की काश मैं भी खुद में ये ऐटिटूड डेवलप कर सकूँ.

इनके कुछ बेहद करीबी लोग इन्हें कभी कभी "परी" कह कर भी बुलाते हैं...ये सच भी है, ये हैं भी परी जैसी...जो मेरी उदासियों और तकलीफों को ही नहीं बल्कि जाने कितनों की उदासियों को अपने प्यार की छड़ी घुमा कर छूमंतर कर चुकी हैं.कभी कभी लगता है की मेरे लिए तो ये एक परी ही हैं जो जाने कितनी आसानी से मेरी सारी चिंताओं को दूर कर देती हैं...

आज के दिन, जब दीदी का जन्मदिन है...तो मैंने सोचा की दीदी के लिए ये एक छोटा सा तोहफा, एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में उन्हें दे दूँ मैं.कम से कम अपनी प्यारी परी जैसी दीदी के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ मैं...

तो,
अ वैरी हैप्पी बर्थडे टू यु दीदी....!
आप युहीं मुस्कुराती रहिये, हँसते रहिये और खूब बदमाशियां करते रहिये....! 

एक कविता जो कहीं पढ़ी थी कभी किसी मैगज़ीन में उसे आपके नाम कर रहा हूँ -

"भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,"


दीदी, तमाम उम्र दुआएं रहेंगी आपके नाम ! हमेशा खुश रहिये आप !




दीदी से जुडी इस पोस्ट को "मेरी बातें" पर ना लगाकर यहाँ लगाने की एक वजह भी है.ये जो ब्लॉग है,जितना मेरा है, उससे कहीं ज्यादा इस ब्लॉग पर दीदी का अधिकार है.पिछले कई पोस्ट्स ऐसे हैं जो सिर्फ दीदी के कहने पर मैंने लगाए हैं.मुझे बाकायदा धमकियाँ मिलती थी, "बहुत दिन हो गए पोस्ट लिखे, चलो आज कोई अच्छी पोस्ट लिख दो". जून में लिखी "दिल्ली डायरी" तो पूरे तौर पर इन्होने धमका धमका कर लिखवाया था मेरे से....फोन पर धमकियां देती थी.."तुम लिखोगे की नहीं?" और तब तक ये मेरे पीछे पड़ी रही थी जब तक मैंने वो तीनों पोस्ट लिख कर यहाँ लगा न दिया था.वैसे ये क्यों मुझे हमेशा नयी पोस्ट लिखने के लिए धमकाते रहती हैं ये भी अच्छे से जानता हूँ मैं...इन्हें भाई की तारीफ़ करने की एक और वजह जो मिल जाती है..मेरी एक नयी पोस्ट का हैंगओवर इनपर तब तक चढ़ा रहता है जब तक दूसरी कोई और पोस्ट न लगा दूँ..कहने का अर्थ इतना सा है की ये उस हैंगओवर से एक अरसे से बाहर नहीं निकली हैं...कभी कभी इनको दौरे चढ़ते हैं तो भाई की पुरानी सभी पोस्ट एक सिरे से पढ़ जाती हैं, और फिर मुझे अपने भाई की तारीफें सुना सुना कर पका डालती हैं..


आज इस ब्लॉग की ये सौवीं(100th)पोस्ट भी है, सेंचुरी पोस्ट, जो डेडीकेटेड है मेरी दीदी को !  




18 comments:

  1. भाई...क्या रे...:)
    सुबह-सवेरे मेन्टल से एकदम्मे सेन्टी-मेन्टल कर दिया...। इतना भावुक कर के रुलाएगा क्या रे...? :)

    अब On a serious note…
    जब से होश सम्हाला था, भगवान जी के बैंक में छोटे भाई की एक कल्पना दुआ के रूप में जमा करती आई थी...। देखो तो...बरसों बाद मेरी दुआओं का फ़िक्स्ड डिपॉज़िट का जब भुगतान किया उन्होंने, तो जाने कितना गुना ब्याज़ लगा दिया...। बिल्कुल कल्पनातिरेक...एक ऐसा भाई मिला मुझे तुम्हारे रूप में, जो कभी नहीं सोचा था...। ज्यादा कुछ कह नहीं पाएँगे, ये तुम भी अच्छे से जानते हो...।
    बहुत बहुत सारा प्यार और दुआएँ...तुम्हारी इस Dillogical दी की तरफ़ से...:) <3

    ReplyDelete
    Replies
    1. जन्मदिन की ढ़ेरों शुभकामनाएं प्रियंका जी...!!!

      Delete
  2. Afsos ho raja hai ki kis post par comment hindi mein karna chaahiye ths, Roman mein likh kar de raha hoon.. Main to kabhi mila nahin lekin tumhare tukda-tukda kisson ne inhein mere liye khas bana diya.. Ek line yaad aayi
    WO KHUSHNASEEB HAI JISKO TU INTIKHAAB KARE..
    Jab koi aisa smeh barasanewala mil jaaye to har din khas ho jata hai.. Aur ye to janmdin hai.. Meri zuban mein - AAJ TO MAZA AA GAYA PAIDA HOKAR!
    Main aashirwad doon, shubhkaamanaayen doon ya sneh..
    100th post ki PARI ke liye hazaron khishoyom bhare baras ki duayen! Amen!"

    ReplyDelete
  3. "सच में कुछ लोग होते हैं जो आपके ज़िन्दगी में जब आते हैं तब आपकी ज़िन्दगी बदल जाती है, और खूबसूरत हो जाती है.."
    Very well said, abhishek ji...!

    काश आपकी तरह लिख पाते हम भी... यूँ सहजता से सहेजे जाने वाले रिश्तों के बारे में!
    ये स्नेह दिग दिगंत तक बना रहे!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपको सौवीं पोस्ट की बधाई भी!!!

      Delete
  4. अभि तुम्हारी दीदी तो सच्ची परी हैं.....
    उनके लिए हमारी तरफ से भी ढेर सारी शुभकामनाएं ~
    तुम तो यूँ भी "अभिव्यक्ति मास्टर" हो......सो बात दिल को छूना ही थी....फिर ये तो दुनिया के सबसे प्यारे रिश्ते पर लिखी पोस्ट थी.
    ढेरों शुभकामनाएं आप दोनों को.....
    सस्नेह
    अनु

    ReplyDelete
  5. क्या बोलूं मैं ... जाने दो ,जरूरी थोड़े है हमेशा कुछ बोलना :)

    ReplyDelete
  6. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (01-11-2013) को "चर्चा मंचः अंक -1416" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

    ReplyDelete
  7. Aap sabka bahut bahut shukriya...dil se...:)

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    "भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
    संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
    यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
    यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,"
    --
    सुप्रभात...।
    आरोग्यदेव धन्वन्तरी महाराज की जयन्ती
    धनतेरस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

    ReplyDelete
  9. Bahut pyaari si post, aur bahut he pyari si hai aapki didi.
    God bless.

    ReplyDelete
  10. kahte hai n ki khoon ke riste hi riste nhi hote hai ...duniya me aur apne hai lekin unhe pane ke liye kismat lana padta hai jo sayad sabhi ka saath nhi deti ,,bahut achhi post
    itni pyar bhare sabdo me reply जब से होश सम्हाला था, भगवान जी के बैंक में छोटे भाई की एक कल्पना दुआ के रूप में जमा करती आई थी...। देखो तो...बरसों बाद मेरी दुआओं का फ़िक्स्ड डिपॉज़िट का जब भुगतान किया उन्होंने, तो जाने कितना गुना ब्याज़ लगा दिया...। बिल्कुल कल्पनातिरेक...एक ऐसा भाई मिला मुझे तुम्हारे रूप में, जो कभी नहीं सोचा था...। ज्यादा कुछ कह नहीं पाएँगे, ये तुम भी अच्छे से जानते हो......bahut bhawuk hai

    ReplyDelete
  11. १०० पोस्टों की बधाई ... ओर अच्छा लगा असल राज़ जानना ... कौन है जो आपको धमका के इतनी मस्त, अच्छी अच्छी पोस्टें तो पढवा रहा है हमें ... दीपावली के पावन पर्व की बधाई ओर शुभकामनायें ...

    ReplyDelete
  12. आप तो लाजवाब लिखते हो सर
    100 पोस्ट पूरी करने पर बधाई !
    एसेहि लिखते रहो !!

    ReplyDelete
  13. भाई बहन का यह रिश्ता यूँ ही मधुर बना रहे !
    100वीं पोस्ट की बहुत बधाई।
    शुभकामनायें

    ReplyDelete
  14. बहुत प्यारा और भावप्रवण वर्णन ...... शुभकामनायें !!!

    ReplyDelete
  15. bhaiya i am reading this post again...iitzzz so lovely!!
    ap mere bare me bhi likho na koi post :P

    ReplyDelete
  16. hmmmmmm.......bahut waqt ke baad...aayi blog jagat me...kam ho gya he aanaa...........aaj aayi ...aapke blog tak pahunchi.....aur ik kahaani aankhon ke saamne se guzri....bahut achaa kiya...aapne...apni baat share kr ke....:)....bahut..khoobsurat waqt aapne shabdon me smet diya..aur hum sab tak pahunchaa diya

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया