Wednesday, October 30, 2013

मैंने परी को देखा है..



आज से ठीक चार साल पहले की ३१ अक्टूबर की बात है..युहीं घूमते हुए एक ब्लॉग पर जा रुका था..एक कहानी सामने दिखी थी..."ज़िन्दगी बाकी है".मुझे कहानी काफी पसंद आई, सोचा की कुछ कमेन्ट कर दूँ, की तभी ब्लॉगर प्रोफाइल के तरफ ध्यान गया.सोचा कमेन्ट करने से पहले देख तो लूँ की आखिर किसका ब्लॉग है, नाम क्या है इनका? और क्या करती हैं?लेखिका हैं कोई या हम लोग टाईप टाईमपास ब्लॉगर.इनका प्रोफाइल क्लिक किया तो सबसे पहले जिस चीज़ पर नज़र गयी थी वो थी इनके फोटो पर...फोटो से बड़ी सुन्दर लेखिका लग रही थी..इनका नाम जानना चाहा तो देखा नाम के जगह लिखा था "कही अनकही".मुझे थोड़ी हंसी आ गयी थी, मैंने सोचा कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं, ब्लॉगर प्रोफाइल में अपना नाम लिखने के जगह अपने ब्लॉग का नाम ही लिख दिया है इन्होने..फिर इनका प्रोफाइल आगे पढ़ा...'अबाउट मी' सेक्सन के तरफ नज़र गयी तो मैं थोड़ा सा संभला...लिखा था "I have got my five books published, out of which two are awarded...I write basically in my mother tongue-Hindi- but there are some stuffs in English too.".. जो इनके बारे में पहली सोच थी की कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं वो सोच अब तब्दील हो गयी थी, की "अरे ये तो बड़ी हॉट-शॉट टाईप कोई चीज़ हैं".पांच किताबें, दो सम्मानित और इंग्लिश में भी कुछ लिखती हैं.अब मैं सोचने लगा था की कमेन्ट करूँ या न करूँ?? लेकिन उसके पहले दुविधा ये थी की इन्हें बुलाऊं किस नाम से?नाम तो इनके पूरे ब्लॉग पर कहीं नहीं लिखा था, नाही प्रोफाइल पर...कमेंट्स मोडरेसन लगाया हुआ था इन्होने तो कोई कमेन्ट भी नहीं दिख रहा था जहाँ से हिंट ले सकूँ, की तभी ध्यान गया की इन्होने कहानी में अपना नाम तो लिख ही रखा है, जिसे पता नहीं क्यों मैंने देखा ही नहीं था.खैर, नाम जानने के बाद और काफी सोच विचार करने के बाद मैंने कहानी के ऊपर कमेन्ट कर दिया(एज युज्वल, विद अ ग्रमैटिकल मिस्टेक)..मैंने सोचा नहीं था की इनका कोई जवाब भी आएगा, लेकिन अगले ही दिन या शायद उसी दिन ई-मेल के जरिये इनका एक औपचारिक सा जवाब आया था.हम दोनों के बीच बातचीत उसी ई-मेल से शुरू हुई थी.उस वक़्त हम दोनों में से किसी को ये नहीं मालुम था की एक सिम्पल ई-मेल से शुरू हुआ रिश्ता ज़िन्दगी भर का साथ बन जाएगा.

पहले ईमेल पर हुई उस औपचारिक बातचीत के बाद(जिसमे मुख्यतः झूठी तारीफ़ शामिल थी.."प्रियंका जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं", "अभिषेक जी आपका आभार, आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं".) हमारे बीच बातें लगातार होती रहीं, हम लगातार ईमेल एक्सचेंज करते रहे.बहुत जल्दी ही हमारे बीच सारी औपचारिकतायें मिट गयीं और दोस्ती हो गयी.अब ये याद भी नहीं की कितने ख़त(ई-मेल) हमने एक दुसरे को लिखे थे.वैसे यहाँ मैं ये बता दूँ की ये मैं फेसबुक के ज़माने की बात कर रहा हूँ..साल २००९-२०१० में फेसबुक काफी सक्रीय था और सभी लोग इससे जुड़े हुए भी थे..मैं भी था, ये भी थीं फेसबुक पर...लेकिन फिर भी हम एक दुसरे के फेसबुक अकाउंट से जुड़े नहीं थे.हमने तो फेसबुक पर बहुत बाद में एक दुसरे को एड किया था...हमारे बीच जो भी एक रिश्ता बना था वो किसी सोशल नेटवर्किंग साईट, चैट या फोन के माध्यम से नहीं बल्कि खतों के माध्यम से बना था..और हमें पता भी नहीं चला की कब और कैसे हम एक दुसरे के इतने करीब आ गए की एक दुसरे से हर बात शेयर करने लगे...चाहे वो दोस्तों की बातें हों, शहर की या परिवार की..हम पारिवारिक फंक्सन की तस्वीरें भी एक दुसरे को भेजने लगे..और बाद में तो ऐसा हो गया था की अगर एक का जवाब वक़्त पर ना आये तो दूसरा परेशान हो जाता था की "आखिर बात क्या है?अब तक जवाब क्यों नहीं आया?".

एक दिन युहीं बातों बातों में  मैंने इनसे पूछ ही लिया था, "आपको मैं दीदी बुला सकता हूँ?".इनके ख़ुशी का तो फिर कोई ठिकाना ही नहीं था...बड़ा खुश होकर इन्होने एक प्यारा सा जवाब भेजा था मुझे और कहा था "क्यों नहीं, तुम भी तो मेरे छोटे भाई ही तो हो"
और फिर ये बन गयीं मेरी प्रियंका दीदी और मैं बन गया इनका छोटा अभि भैया.अब सोचता हूँ तो ये असंभव सा लगता है की कभी कोई ऐसा भी वक़्त था जब हम एक दुसरे को नहीं जानते थे.जब कभी पुराने खतों को देखता हूँ तो हँसी भी बहुत आती है, की पहले इन्हें मैं "प्रियंका जी" कहता था और ये मुझे "अभिषेक जी".मुझे ये पता भी नहीं चला की कब ये मेरे लिए प्रियंका जी से प्रियंका दीदी बन गयीं और प्रियंका दीदी से सिर्फ "दीदी".और मैं कब इनके लिए अभिषेक जी से अभि भैया बन  गया और अभि भैया से सिर्फ "भाई".

अब कभी सोचता हूँ तो लगता है की कहाँ से अचानक यूँ चलते चलते इनसे मेरी मुलाकात हो गयी और पता भी नहीं चला की कैसे ये मेरी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गयीं...इतना की मेरे पल पल की खबर रखती हैं...मैं कब क्या कर रहा हूँ, कहाँ हूँ, वक़्त पर खा रहा हूँ या नहीं, सही वक़्त पर सो रहा हूँ या नहीं...मेरी हर बात का ये ख्याल रखती हैं.छोटी छोटी बातों पर परेशान भी बहुत हो जाती हैं..इनका फोन भी अगर रिसीव करने में देरी करूँ तो ये बहुत घबरा जाती हैं.मैं इन्हें समझाता हूँ की दीदी इतना जल्दी परेशान नहीं होना चाहिए, इनका जवाब होता है..."तुम्हारे लिए कैसे न परेशान हों हम?" . मेरी हर लापरवाही पर वैसे ही पुरे अधिकार से डांटती हैं जैसे माँ डांटती हैं.खाने पीने में, या तबियत ख़राब हो जब तब....हर ढंग से हर समय ये मेरे पीछे पड़ी रहती हैं..अब तो लगता है ऐसा की दो दी निगाहें मुझपर हर वक़्त लगी रहती हैं...एक मेरी माँ की और दूसरी इनकी.

मेरे पर ये हर हुक्म चला लेती हैं.जब कहता हूँ, की "देखो भाई पर इतना हुक्म चलाना ठीक नहीं"..तो कहती हैं "ये 'दिदिगिरी' तो तुमको हमेशा झेलनी पड़ेगी रे".दीदीगिरी इनकी कम खतरनाक नहीं होती है..अक्सर ये मुझे इमोशनल ब्लैकमेल भी कर देती हैं...पता नहीं कहाँ कहाँ से आईडियाज लेकर आती हैं ये भाई को इमोशनल ब्लैकमेल कर अपना काम निकलवाने का? वो काम इनका चाहे भाई को वक़्त पर खाना खिलाने का हो या उसे समय पर सुला देने का, ऐसी धमकियाँ देती हैं की इनका भाई चुपचाप इनका बात मान लेता है.
कोई गलती करूँ तो ये थोड़ा डांट भी लगा देती हैं मुझे(हाँ, थोड़ा ही डांट लगाती हैं, क्यूंकि भाई को ये खुल कर डांट भी नहीं सकती न, इतना प्यार करती हैं अपने भाई से).इनकी डांट से वैसे मुझे थोडा डर भी लगता है, ये आज कन्फेस कर रहा हूँ(ये जानता हूँ अच्छे से की यूँ इनके सामने ये कन्फेस करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, फिर भी).

लेकिन आमतौर पर इनका एक अलग ही रूप मेरे सामने रहता है, उस वक़्त मुझे बिलकुल नहीं लगता की ये मेरे से बड़ी हैं, कभी कभी इनसे पूछ भी देता हूँ मैं "तुमने सच तो बताया था न मुझे की मेरे से बड़ी हो तुम, या झूठ कह दिया था".अक्सर एकदम बच्चों जैसी हरकतें और जिद होती हैं इनकी.बदमाशियां तो इनकी रूकती ही नहीं हैं..कभी कभी जब मैं प्यार से डांट देता हूँ..."बहुत बदमाशियां कर रही हो तुम आजकल"..तो ये और भी बच्ची बन जाती हैं और कहती हैं "हाँ तो?भाई हो, झेलो मेरे इन नखरों को...".

जब भी इनसे मिला हूँ, इनकी ढेर सारी इललोजिकल और बकवास बातों को झेलना पड़ा है...मुझे देखते ही इन्हें लगातार हँसी के दौरे पड़ते रहते हैं और अजीब अजीब हरकतें करती रहती हैं.....खूब बदमाशियां भी कर लेती हैं ये मेरे सामने..मुझे ही उलटे चुप हो जाना पड़ता है...कभी कभी तो इन्हें संभाल लेता हूँ, लेकिन अक्सर इनकी बदमाशियाँ, इनकी हंसी, और इनकी ईललॉजिकल बातें आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो जाया करती हैं....वैसे ये भी सच है की जब ये बदमाशियाँ कर रही होती हैं, उस समय मन ही मन ये भी दुआ करता हूँ की इनकी ये हरकतें, ये बदमाशियां और हंसी के ये दौरे तामुम्र पड़ते रहे.

इन्हें हमेशा मेरे से शिकायत रहती है की मैं जब इनसे मिलने आता हूँ तो इनके लिए चोकलेट लेकर नहीं आता...ये मुझे धमकाती भी हैं बहुत, मैं फिर भी भूल जाता हूँ.अगली बार भी हम जल्दी ही मिल रहे हैं और ये अभी से ही मुझे याद दिला रही हैं चोकलेट लाने को...और मैं हमेशा की तरह इस बार भी जान बुझकर चोकलेट लाना भूल जाऊँगा.इनसे हुई पहली मुलाकात का एक मजेदार किस्सा भी है...वो बहुत खूबसूरत सा एक दिन था.मुझे याद है, जब इन्हें मैंने पहली बार देखा था, ये मेरे इंतजार में गेट पर खड़ी थीं और मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहती हाँ..."स्वागत है"...इन्होने उस समय "स्वागत है" कुछ इस तरह से कहा था, अपने दोनों हाथों को फैला यूँ वेलकम किया था की जैसे कह रही हों..."आ जाओ बेट्टा, अब बचकर कहाँ जाओगे?".
मैंने इन्हें पैर छू कर प्रणाम किया, उस समय भी दीदी की हल्की "दीदीगिरी" झेलनी पड़ी थी...इन्होने मुझे और नीचे झुकाया और कहा की पैर को अच्छे से छुओगे तब आशीर्वाद मिलेगा.मैंने भी इनके मन मुताबिक ही पैर को अच्छे से छूकर प्रणाम किया, इनका आशीर्वाद लिया.घर में इत्मिनान से बैठा ही था..चाय पानी पीकर थोड़ा आराम कर ही रहा था की मुझे अहसास हुआ ये बड़े इक्साइट्मन्ट से मेरी तरफ देख रही हैं..मैंने पूछा, क्या बात है दीदी? ऐसे क्या देख रही हो? इन्होने कहा, चलो जल्दी से मुझे मेरा चोकलेट दो तो.मुझे हँसी आने लगी..मैंने कहा आपके लिए कोई चोकलेट नहीं लाये.इनका चेहरा उदास हो गया था...कहने लगीं..."मैं कब से इंतजार कर रही थी की भाई जेब से अब चोकलेट निकालेगा की तब निकालेगा और भाई को देखो...खाली हाथ हिलाते हुए आ गया मेरे पास...चोकलेट क्यों नहीं लाये? मैंने दीदी की बात का जवाब नहीं दिया और सामने जो स्नैक्स रखा था उनपर कान्सन्ट्रेट करते हुए कहा इनसे..."अगली बार". ये कहाँ मानने वाली थीं..कहने लगीं...अगली बार नहीं, अभी जाओ..सामने ही दूकान है". इन्होने जिद दिखाया तो मैं भी जिद पर अड़ गया और बेशर्मों की तरह बैठा रहा.अंत में तंग आकर ये कहती हैं...मुझे पता था तुम मुझे चोकलेट नहीं खिलाओगे.
इनसे बाद की मुलाकातों में भी ये बात होती रही है, हर बार ये उम्मीद करती हैं की मैं इनके लिए चोकलेट लेकर आऊंगा और हर बार मैं चोकलेट लाना जान बुझकर भूल जाता हूँ...
वैसे दीदी, आप तो ये पोस्ट पढ़ ही रही हैं और अब तक समझ भी चुकी होंगी, की हम आपके लिए चोकलेट नहीं लाने वाले...अगली बार भी ये उम्मीद छोड़ दीजियेगा की हम आपको चोकलेट खिलाएंगे, अरे..बड़ी बहन
चोकलेट खिलाती है या छोटा भाई?

ये मेरे से खूब लड़ाई भी कर लेती हैं, और खूब नखरे भी दिखाती हैं...लेकिन कितनी भी ये लड़ाईयां करे, अपने भाई से जुडी हर बात से इन्हें प्यार है."भाई सब काम सही ही करता है ये इनका विश्वास है".इनके भाई की जब कोई तारीफ़ करता है तो भाई से भी ज्यादा ख़ुशी इन्हें होती है....भाई के लिखे स्टुपिड ब्लॉग पोस्ट्स की तो ये तारीफ़ करते नहीं थकती.वैसे भाई की तारीफ़ करना इनका फेवरिट काम है(और बड़ा गर्व भी है इन्हें इस पर).जब ये कहती हैं मुझसे(और अक्सर कहती ही हैं) की "काश भाई की तरह मैं लिख पाती", तो उस समय सच में मैं निशब्द हो जाता हूँ.खुद दीदी इतना अच्छा लिखती हैं, साहित्य की पता नहीं कौन कौन सी विधा जानती हैं ये, कहानियां, कवितायें, हाईकू और जाने क्या क्या में माहिर दीदी अपने भाई के लिए ऐसा कहती हैं तो ये उनका बस प्यार ही है.

सच में कुछ लोग होते हैं जो आपके ज़िन्दगी में जब आते हैं तब आपकी ज़िन्दगी बदल जाती है, और खूबसूरत हो जाती है..दीदी वैसे ही लोगों में से हैं.कभी कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता है की इतना प्यार करने वाली बहन से मिलना लिखा था.हर तरह से ये मेरे लिए एक सहारा बन जाती हैं...चाहे कितनी भी परेशानियों में रहूँ, ये मेरे साथ हर वक़्त रही हैं.अब खुद मैं अगर ज्यादा परेशान हो जाता हूँ तो इनके पास चला आता हूँ..कभी कभी तो ये यकीन होता है की इनकी बातों में सच में कोई मसीहा बसता है..थोड़ी देर भी इनसे बातें कर लेता हूँ तो सारी परेशानियां सारी चिंताएं पीछे छुट जाती हैं.मेरे लिए ये एक इन्स्परेशन भी हैं और मेरी स्ट्रेंथ भी.बहुत कुछ ऐसा है जो मैंने इनसे सीखा है.खासकर जिस जिन्दादिली से ये ज़िन्दगी जीती हैं, वो सच में कमाल है.हर परिस्थिति में, हर हालात में ये मुस्कुराते रहती हैं, हँसते रहती हैं.मैं सच में चाहता हूँ की काश मैं भी खुद में ये ऐटिटूड डेवलप कर सकूँ.

इनके कुछ बेहद करीबी लोग इन्हें कभी कभी "परी" कह कर भी बुलाते हैं...ये सच भी है, ये हैं भी परी जैसी...जो मेरी उदासियों और तकलीफों को ही नहीं बल्कि जाने कितनों की उदासियों को अपने प्यार की छड़ी घुमा कर छूमंतर कर चुकी हैं.कभी कभी लगता है की मेरे लिए तो ये एक परी ही हैं जो जाने कितनी आसानी से मेरी सारी चिंताओं को दूर कर देती हैं...

आज के दिन, जब दीदी का जन्मदिन है...तो मैंने सोचा की दीदी के लिए ये एक छोटा सा तोहफा, एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में उन्हें दे दूँ मैं.कम से कम अपनी प्यारी परी जैसी दीदी के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ मैं...

तो,
अ वैरी हैप्पी बर्थडे टू यु दीदी....!
आप युहीं मुस्कुराती रहिये, हँसते रहिये और खूब बदमाशियां करते रहिये....! 

एक कविता जो कहीं पढ़ी थी कभी किसी मैगज़ीन में उसे आपके नाम कर रहा हूँ -

"भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,"


दीदी, तमाम उम्र दुआएं रहेंगी आपके नाम ! हमेशा खुश रहिये आप !




दीदी से जुडी इस पोस्ट को "मेरी बातें" पर ना लगाकर यहाँ लगाने की एक वजह भी है.ये जो ब्लॉग है,जितना मेरा है, उससे कहीं ज्यादा इस ब्लॉग पर दीदी का अधिकार है.पिछले कई पोस्ट्स ऐसे हैं जो सिर्फ दीदी के कहने पर मैंने लगाए हैं.मुझे बाकायदा धमकियाँ मिलती थी, "बहुत दिन हो गए पोस्ट लिखे, चलो आज कोई अच्छी पोस्ट लिख दो". जून में लिखी "दिल्ली डायरी" तो पूरे तौर पर इन्होने धमका धमका कर लिखवाया था मेरे से....फोन पर धमकियां देती थी.."तुम लिखोगे की नहीं?" और तब तक ये मेरे पीछे पड़ी रही थी जब तक मैंने वो तीनों पोस्ट लिख कर यहाँ लगा न दिया था.वैसे ये क्यों मुझे हमेशा नयी पोस्ट लिखने के लिए धमकाते रहती हैं ये भी अच्छे से जानता हूँ मैं...इन्हें भाई की तारीफ़ करने की एक और वजह जो मिल जाती है..मेरी एक नयी पोस्ट का हैंगओवर इनपर तब तक चढ़ा रहता है जब तक दूसरी कोई और पोस्ट न लगा दूँ..कहने का अर्थ इतना सा है की ये उस हैंगओवर से एक अरसे से बाहर नहीं निकली हैं...कभी कभी इनको दौरे चढ़ते हैं तो भाई की पुरानी सभी पोस्ट एक सिरे से पढ़ जाती हैं, और फिर मुझे अपने भाई की तारीफें सुना सुना कर पका डालती हैं..


आज इस ब्लॉग की ये सौवीं(100th)पोस्ट भी है, सेंचुरी पोस्ट, जो डेडीकेटेड है मेरी दीदी को !  




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Monday, October 28, 2013

सर्दियों की आहट और मौसम का पहला खत..तुम्हारे नाम


बहुत दिनों बाद तुम्हे आज खत लिखने बैठा हूँ...ये खत तुम्हे क्यों लिख रहा हूँ ये मैं नहीं जानता.क्या लिखूंगा इस खत में ये भी नहीं जानता..बस जानता हूँ तो इतना की आज की रात तुम्हे एक ख़त लिखना है, सो खत लिख रहा हूँ.पिछले कुछ खतों की तरह इस ख़त को भी मैं तुम्हे दे तो नहीं पाऊंगा लेकिन फिर भी लिख रहा हूँ.जिस फोल्डर में तुम्हारे नाम लिखी बाकी की सभी चिट्ठियां रखी हुई हैं उसमे इस खत को भी रख दूंगा, कभी तुम आओगी अगर तो इन खतों को पढ़कर तुम्हे सुनाऊंगा.

आज शाम से ही तुम्हारी बड़ी याद आ रही है..तुम्हारी छोटी बड़ी शरारतों को याद कर के लगतार मुस्कुरा रहा हूँ.कुछ देर पहले एफएम पर एक गाना सुन रहा था, और उसे सुनते हुए लगा की सच में उस गाने की एक लाईन ख़ास तुम्हारे लिए ही लिखी गयी है..."जग मुझपे लगाए पाबंदी, मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की...".
सच में, तुम इस दुनिया की नहीं हो...इस दुनिया से अलग कोई लड़की हो तुम.सोचता हूँ कभी तो लगता है की तुम बाकी सभी लड़कियों से कितनी अलग हो.कहाँ बाकी लडकियाँ ऐसी बहकी बहकी बातें सोच लेती हैं जैसे तुम सोचती हो?तुम्हारी हरकतें भी तो अजीब होती हैं न, कहाँ सब लडकियाँ ऐसी हरकतें करती हैं? चींटियों को तुम देखती हो, उनसे बातें करने लगती हो?तुम आसमान में सड़क बनाने की बात करती हो...तुम्हे लगता है की तुम कोई जादू करोगी और दो हथेलियाँ हमेशा के लिए आपस में जुड़ जायेंगी...फुल और पत्तियों को तुम अपने बैग में जमा कर लेती हो..हर मौसम के अजीब अजीब लौजिक्स और नियम होते हैं तुम्हारे...कहाँ सब लडकियाँ ऐसी होती हैं? कहाँ सबकी ऐसी सोच और ऐसी हरकतें होती हैं? सच में तुम इस दुनिया की नहीं लगती हो...जितनी अजीब हो तुम उतने ही अजीब तुम्हारे लौजिक्स होते हैं....

एक दफे याद है, तुमने पता नहीं किस बात पर कहा था मुझसे की सर्दियों में पर्पल रंग 'लकी' होता है..और जितना संभव हो हमें पर्पल रंग का इस्तेमाल करना चाहिए.तुमने जिस दिन ये बात कही थी उसके अगले ही दिन तुमने मुझे एक पर्पल रंग की डायरी लाकर दी थी..उसे देते हुए तुमने कहा था, की इसमें तुम अपनी कवितायें लिखना, सर्दियों वाली कवितायें..किसी और मौसम की कवितायें इस डायरी में लिखना अलाउड नहीं है.याद है न तुम्हे, मैं कितना हँसा था इस बात पर..और मेरे हँसने पर तुमने कैसे अपने बैग को घुमा कर मेरी पीठ पर दे मारा था...और रूठ गयी थी तुम...
लेकिन सच में यार, क्या गज़ब की लौजिकल थिंकिंग थी तुम्हारी....? पर्पल रंग का इस्तेमाल सर्दियों में करना चाहिए???हैरत होती थी मुझे की तुम कैसे ये सब बातें सोच लिया करती हो? मुझे तो कभी भी तुम्हारी ऐसी लॉजिकल बातें समझ में नहीं आती थीं, और अगर गलती से भी मैं कुछ भी कहता तुम्हारे इन लौजिक्स पर तो तुम नाराज़ हो जाया करती थी....मुझे ही क्या??किसी को भी तुम्हारी ये बातें समझ में नहीं आती थीं.कोई अगर इन बातों को समझने की कोशिश भी करे तो कैसे?तुम तो इनका अर्थ बताने से रही..और कोई खुद से अंदाज़ा लगाए भी तो कहाँ तक? अरे पर्पल रंग का सर्दियों से क्या कनेक्सन होता है? पर्पल रंग के डायरी में सिर्फ सर्दियों में ही क्यों लिखना चाहिए? इन बातों को कोई समझे भी तो कैसे??अब हर के पास तो तुम जैसा यूनिक दिमाग है नहीं.

खैर...आज शाम तुम्हारी लौजिक्स के पीछे नहीं भागने वाला हूँ, आज तो बस युहीं बातें करने का मन कर रहा है...पता है यहाँ सर्दियाँ शुरू हो गयीं हैं.शायद तुम्हे मैंने सबसे ज्यादा खत सर्दियों में ही लिखे हैं...है न? तुम्हे जो पहला खत मैंने दिया था वो भी सर्दियों में ही लिखा था न और तुम्हे अपने हाथों से दिया था.शायद नवम्बर की पहली तारीख थी वो? है न? दिवाली के तीन दिन पहले की एक शाम थी.तुम दिवाली की छुट्टियों में कलकत्ता जा रही थी.और मैंने तुम्हे मिलने के लिए बुलाया था.मिलने का तो बस बहाना था, मैं तुम्हे एक लम्बा खत देना चाहता था...वो ख़त भी क्या था, पूरा एक नोटबुक ही तो था जिसे मैंने पता नहीं किन रैंडम बातों से पूरा भर दिया था...

याद है न तुम्हे? वो पतली सी स्पाईरल बाईंडिंग वाली एक नोटबुक थी और उसी में तुम्हे मैंने लेटर लिखा था(तुमने बाद में उसे एक नाम भी दे दिया था "नोटबुक लेटर"). सच कहूँ तो मेरा कोई इरादा नहीं था उस नोटबुक में लिखने का...एक दिन पहले मैं तो स्टेशनेरी गया था एक लेटर पैड खरीदने, लेकिन ये नोटबुक वहां दिख गयी...बड़ी खूबसूरत सी थी तो मैंने तुरंत खरीद भी लिया इसे.जाने क्या सोच कर मैंने पहले पन्ने पर तुम्हारा नाम लिखा और फिर तुम्हे खत लिखना शुरू कर दिया...पूरी शाम मैं लिखता रहा हूँगा, और जब रात में डिनर के लिए माँ ने आवाज़ लगाई थी तब तक मैं नोटबुक के आखिरी पन्ने पर पहुँच चूका था....मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई की तुम्हे मैं पहली चिट्ठी लिख रहा हूँ और वो भी इतनी लम्बी?ये तो जैसे एक डायरी ही लिख दिया था मैंने तुम्हारे नाम..लिखने के बाद मैंने जोड़ा तो नहीं था लेकिन बाद में तुमने ही एक दिन बताया था की उस नोटबुक में बत्तीस पन्ने थे.

वो शाम तो तुम्हे अच्छे से याद है न जब मैंने तुम्हे वो खत दिया था? ...ऑफ़कोर्स तुम्हे याद होगा.
हम दोनों चाहे भी तो उस शाम को भूल नहीं सकते हैं...दिल में फ्रिज होकर रह गयी है उस शाम की तस्वीर.कितनी खूबसूरत शाम थी न वो? नवम्बर की पहली तारीख थी और सर्दियों की शुरुआत हो गयी थी...सड़कों पर तो कुछ लोग गर्म कपड़ों में नज़र आने लगे थे...लेकिन बहुत से लोगों ने अब तक स्वेटर और जैकेट्स पहनने नहीं शुरू किये थे.मैं उनमे से था...सिर्फ एक टी-सर्ट पहन कर तुमसे मिलने चला आया था..
और तुम..तुम बाकायदा गर्म कपड़ों में थी...एक जैकेट, हाथों में दस्ताने(सिरसली यार? वो हाथों में दस्ताने पहनने के दिन थे क्या?) और एक बड़ा ही स्टाईलिश सा वूलेन कैप, जिसे तुम्हारी दीदी लन्दन के किसी हाईफाई दूकान से खरीद लायी थी(तुमने ही तो कहा था एक बार की मेरी हाईफाई दीदी आयीं हैं लन्दन से, मेरे लिए हाईफाई टोपी लायीं हैं).
उस शाम तुमने जैसे ही मुझे देखा था, बिना किसी स्वेटर या जैकेट के तो तुमने एक जबरदस्त डांट लगा दी थी मुझे "ऐसे हिरोगिरी दिखाओगे? ठण्ड लग जायेगी न तो सारी मस्ती निकल जायेगी". तुमने बिलकुल यही शब्द कहे थे और कुछ इतने ज़ोर से तुमने कहा था की पास ही खड़े कुछ लोग हमारी तरफ देखने लगे थे.


जैसे तैसे तुम्हे चुप करवा कर, तुम्हारी डांट सुन कर और अपनी गलती मानकर हम दोनों आगे बढे....शहर में एक नया कॉफ़ी शॉप खुला था.वो असल में कॉफ़ी शॉप तो था नहीं(ये नाम तो उसे हम दोनों ने दिया था न), वो फ़ास्ट फ़ूड का एक छोटा सा रेस्टुरेंट था, जहाँ कॉफ़ी भी मिलती थी...लेकिन हमने वहां कॉफ़ी या चिकन सूप के अलावा और कुछ कभी खाया हो ये याद नहीं आता.

एक तो तुम मेरे स्वेटर ना पहनने से नाराज़ थी और पहले की भी कुछ बातें थी जिससे तुम रूठी हुई सी थी..जैसे ही हम कोने वाली अपने रेगुलर टेबल की तरफ आगे बढे और वहां बैठते ही तुमने कहा था "साहब आजकल आप बहुत गलतियाँ कर रहे हैं, आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी मुझे मनाने के लिए"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा था, "मेरे पास भी तुम्हारी इस नाराजगी का एक गेरन्टीड ईलाज है", और ये कहते हुए मैंने बैग से उस नोटबुक को निकला और तुम्हारे आगे टेबल पर रख दिया..."लो, तुम्हारे लिए, दिवाली का तोहफा".
तुमने बड़े ही अजीब ढंग से उस नोटबुक को देखा था...जैसे वो नोटबुक ना होकर कोई रहस्मयी या जादुई किताब हो...फिर तुमने उसे अपने हाथों में लिया और बहुत देर तक तुम उसे हाथों में ही पकडे रही थी..जैसे ये तय नहीं कर पा रही हो की इसे खोले या न खोले..तुम बस उसे लगातार देख रही थी..नोटबुक के कवर पर मैंने हरे रंग के पेन से दो शब्द लिखे थे ..."फॉर यु".तुम शायद इन्ही दो शब्दों को लगातार देख रही थी..
कोई और वक़्त होता तो मैं शायद मजाक में ये भी कह देता..."चश्मा लगाने की नौबत आ गयी क्या?दो शब्द भी नहीं पढ़ा जा रहा तुमसे.."
लेकिन तुम्हारा चेहरा लाल सा हो आया था...तुम एकाएक बहुत इमोशनल सी हो गयी थी..उस नोटबुक को तुमने फिर वापस टेबल पर रख दिया और मेरी तरफ देखते हुए पूछा था तुमने "क्या है ये?क्या लिखा है इसमें?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया था...तुमने थोड़ा और सोचा और फिर कहा था "ओके, मैं इसे खोल कर देखने जा रही हूँ...आई डोंट नो इसमें क्या लिखा है तुमने? तुम्हारी कविताओं का कलेक्सन है क्या ? या वो जो मैं सोच रही हूँ? खोल कर देखती हूँ इसे...देखूं न?

और जैसे ही तुमने नोटबुक को खोला था, और उसपर लिखा अपना नाम पढ़ा था... "A letter to my princess ______ " तुम बिलकुल हैरान सी रह गयी थी.मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता उस वक़्त तुम्हारे चेहरा का क्या एक्स्प्रेसन था. तुमने कुछ भी नहीं कहा था, बस अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढँक लिया था और तुम्हारी आँखों में आंसूं आ गए थे...कुछ देर तक तुम कुछ भी बोल नहीं सकी थी..तुम बस मुझे देखती रही थी और फिर थोड़ी देर बाद तुमने कहा था "Oh My God! Its a notebook letter...मेरा ड्रीम था कोई मुझे ऐसा एक नोटबुक लेटर लिखकर दे..its my most precious gift...".कुछ देर तक तुम उसके पन्ने पलटते रही थी और फिर आँखों में जो कुछ बूंद आँसूं के आ गए थे उन्हें पोछते हुए तुमने कहा था..."बड़े क्रीएटिव हो गए हो यार...मेरी संगत का देखो तो कितना खूबसूरत असर हो रहा है तुमपर..."


आज भी जब उस शाम की बातें याद आती हैं तो चेहरे पर एक बड़ी मुस्कराहट आ जाती है...तुम्हारी बहुत याद भी आती है, जब इन बातो को याद करता हूँ...जानती हो तुम, अब अक्सर तुम्हे ख़त लिखने के बाद मैं किस चीज़ को सबसे ज्यादा मिस करता हूँ..तुम्हारे चेहरे के उस एक्स्प्रेसन को...बड़ी प्यारी सी मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर आ जाती थी....मेरी चिट्ठी को अपने हाथों में लेते ही कैसे तुम्हारा चेहरा खिल उठता था, आँखों में एक चमक आ जाती थी...तुम बहुत खुश हो जाया करती थी...शर्म और इक्साइट्मन्ट का मिला जुला भाव तुम्हारे चेहरा पर होता था...सच में मुझे तुम्हारा वो खुश चेहरा आज भी बहुत याद आता है...अभी ये चिट्ठी लिखते वक़्त भी मन में यही सोच रहा हूँ की काश तुम्हे मैं अपने हाथों से ये चिट्ठी दे पाता तो? लेकिन शायद अब ये मुमकिन नहीं है...

तुम्हे अपने हाथों से खत दे पाना अगर मुमकिन ना भी हो, तो भी तुम्हे चिट्ठी तो मैं लिख ही सकता हूँ न? इसमें तो कोई पाबन्दी नहीं है.......
तो देखो, आज इस मौसम की पहली चिट्ठी तुम्हे लिख रहा हूँ....इस बार सर्दियों में तुमसे ढेर सारी बातें करने का मन है...खूब चिट्ठियां लिखना चाहता हूँ तुम्हे...जाने कितनी और चिट्ठियां लिखूंगा इन तीन महीनों में....अभी तो ये पहली ही चिट्ठी है

बाकी और बहुत सी बातें हैं, वो अगले खत में.....!

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Thursday, October 24, 2013

टूटी हुई बिखरी हुई

शमशेर बहादुर सिंह की ये लम्बी कविता जाने कितनी बार पढ़ चूका हूँ..ये मेरी सबसे पसंदीदा कविताओं में से है!


टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पांव के नीचे
पत्तियां
मेरी कविता

बाल झड़े हुए, मैल से रूखे, गिरे हुए गर्दन से फिर भी
चिपके
....कुछ ऐसी मेरी खाल
मुझसे अलग सी, मिट्टी में
मिली -सी

दोपहर-बाद की धुप-छांह खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ...
खाली बोरे सूजों से रफ़ू किये जा रहे हैं....जो 
मेरी आँखों का सूनापन हैं

ठण्ड भी मुस्कराहट लिए हुए है
जो की मेरी दोस्त है !

कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...
मैं समझ ना सका, रदीफ़-काफिए क्या थे
इतना खफिफ़, इतना हल्का, इतना मीठा
उनका दर्द था!

आसमान में गंगा की रेत आइने की तरह हिल रही है
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं...
ना जाने कहाँ !

मेरी बांसुरी है एक नाव की पतवार-
जिसके स्वर गीले हो गए हैं
छप छप छप मेरा ह्रदय कर रहा है
छप.छप छप !

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है
वह दूकान मैंने खोली है जहाँ "प्वाइज़न" का लेबुल लिए हुए
दवाइयां हँसती हैं -
उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है

वह मुझ पर हंस रही है, जो मेरे होठों पर तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं

उसके चुम्बन की स्पष्ट परछाइयाँ मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्पे से मेरे मुह को कुचल चुकी हैं
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है !

मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ !
मुझको सूरज की किरणों में जलने दो -
ताकि उसकी आंच और लपट में तुम
फौव्वारों की तरह नाचो !

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो
ताकि उनकी दबी हुई खुश्बू से अपने पलकों की
उनिन्दी जलन को तुम भिगा सको, मुमकिन है तो !
हां, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाजे की शर्माती चूलें
सवाल करती हैं बार - बार .... मेरे दिल के
अनगिनत कमरों से

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
....जिनमें वो फंसने नहीं आती
जैसे हवाएं मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पाती
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ

आइनों, रोशनी में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो
आइनों, मुस्कुराओ और मुझे मार डालो
आइनों, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ !

उसमें काटें नहीं थे - सिर्फ एक बहुत
काली, बहुत लम्बी जुल्फ थी जो ज़मीन तक
साया किये हुए थी.... जहाँ मेरे पांव
खो गए थे !

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक ज़िन्दा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा !

और तब मैंने देखा की मैं सिर्फ एक साँस हूँ जो उसकी
बूंदों में बस गयी है
जो तुम्हारे सीनों में फांस की तरह ख्वाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी

मैं उसके पाओं पर कोई सिजदा ना बन सका
क्यूंकि मेरे झुकते ना झुकते
उसके पांव की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गई थी !

जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफाफा
तुम्हारे हाथ आया
बहुत उल्टा-पल्टा - उसमें कुछ ना था -
तुमने उसे फेक दिया - तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्हें 'मैं" लगा ! तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीँ छोड़ दिया!  मैं तुमसे
यों ही मिल लिया

मेरी यादाश्त को तुमने गुनाहगार बनाया - और उसका 
सूद बहुत बढाकर मुझसे वसूल किया ! और तब 
मैंने कहा -अगले जनम में ! मैं इस
तरह मुस्कुराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ ग़मगीन मुस्कुराते हैं!

मेरी कविता की तुमने खूब दाद दी - मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सूना रहे हो 
तुमने मेरी
कविता की खूब दाद दी

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया:
और जब लपेट ना खुले - तुमने मुझे जला दिया
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे: और वह
मुझे अच्छा लगता रहा !

एक खुश्बू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गई है, जैसे तुम्हारे नाम की नन्ही-सी
स्पेलिंग हो, छोटी-सी प्यारी सी, तिरछी स्पेलिंग,

आह, तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है !

अगर मुझे किसी से इर्ष्या होती तो मैं
दूसरा जन्म बार बार हर घंटे लेता जाता:
पर मैं तो इसी शरीर में अमर हूँ
तुम्हारी बरकत

बहुत से तीर, बहुत सी नावें, बहुत से पर इधर
उड़ते हुए आये, घूमते हुए गुज़र गए
मुझको लिए सबके सब | तुमने समझा
की उनमें तुम थे ! नहीं, नहीं, नहीं !
उनमें कोई ना था ! सिर्फ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं! फ़क़त !!
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