Saturday, September 7, 2013

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वो शाम कुछ अजीब थी....

(२)

वो शाम कुछ अजीब थी..
.....पार्क में बैठी हुई वो अपनी दोनों आँखें बंद कर पूरी तन्मयता से कवितायें सुन रही थी.मैं उसे कवितायें पढ़ के सूना रहा था और उसके चेहरे के भाव भी पढ़ने की कोशिश कर रहा था.उसे आज से पहले कविताओं पर इतना भावुक और गंभीर होते मैंने नहीं देखा था.वो हमेशा कविताओं को मजाक में उड़ा दिया करती थी, कहती की कविता समय की बर्बादी है.लेकिन मैं जानता था की उसे कवितायें पढ़ना अच्छा लगता है.स्कुल के दिनों में लंच ब्रेक में वो नज़र बचा कर चुपके से मेरे बैग से शायरी और कविता की पतली सी किताब निकाल कर अपने पास रख लेती और उसे अपनी कॉपी के बीच रख कर क्लास के दौरान चुपके चुपके पढ़ती रहती..और फिर छुट्टी होते ही बड़े चालाकी से उस किताब को वापस मेरे बैग में रख भी देती.उसे लगता था की मुझे ये बात पता नहीं..लेकिन मैंने बहुत पहले ये बात जान ली थी.बाद के सालों में भी जब पढाई के लिए वो बाहर गयी तब भी अक्सर खतों(ईमेल)में वो कविताओं की फरमाइश करती थी.फरमाईश करने का उसका तरीका अलग सा होता था.वो कभी सीधे कुछ भी नहीं कहती...बात को घुमा कर कहा करती थी..जैसे वो कहती - "क्या बात है? पिछली चिट्ठी में तुमने कोई कविता नहीं लिखी, लगता है इधर कोई कविता पढ़ी नहीं तुमने जिससे तुम्हे मेरी याद आये?". वो ये कहती और मैं समझ जाता की अगली चिट्ठी में उसे कोई कविता लिख कर भेजनी होगी.सच तो ये है की वो लाख दिखावा करे, लाख बिंदास, कुल और डेविल मे केअर ऐटिटूड का लबादा ओढ़े रहे लेकिन उसके मन का एक कोना ऐसा है जो बेहद सेंसिटिव है खासकर इन कविताओं और शायरी के मामले में...उसके मन का ये कोना कविताओं और गजलों पर जान झिड़कता है..और उस शाम कवितायें सुनते वक़्त उसकी आँखों में ये बात एकदम साफ़ नज़र आ रही थी...

शाम गहराई..और आसमान में काले बादल उमड़ आये थे.ऐसा लग रहा था की जोरों की बारिश आने वाली है.वो बादलों की तरफ देखने लगी.."नेचर इज एन अमेजिंग पेंटर...देखो तो लगता है की आसमान पर कोई एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग सी हो आई है"..उसने बादलों को देखते हुए कहा.."बहुत ज़ोरों की बारिश आने वाली है, देखो शाम पांच बजे ही इतना घना अँधेरा हो गया है.चलो अब चलते हैं...."
"क्यों, आज बारिश में तुम्हे भींगना नहीं है?" मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की..
वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी..
"नहीं...." कहकर वो उठी, अपना बैग उठाया और धीरे धीरे पार्क की गेट की तरफ बढ़ने लगी....

मैं भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा.

बारिश थोड़ी तेज़ हो गयी थी.हम गाड़ी में आकर बैठ गए.उसने गाड़ी में बैठते ही सीट को थोड़ा पीछे खींच लिया और अपने पैरों को डैशबोर्ड पर टिका दिया...और एक लम्बी अंगडाई लेते हुए उसने कहा "आई कैन डाई राईट नाऊ...आई एम सो हैप्पी, एट दिस मोमेंट....."
उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा...मैं मुस्कुराने लगा.वो भी मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी.
वो कुछ गुनगुना रही थी..याद नहीं कौन सा गाना..लेकिन कोई अंग्रेजी गाने के बोल थे.वो कार के खिड़की से बाहर देख रही थी और मैं.....मैं कभी डैशबोर्ड पर रखे उसके पांव को, उसपर लगे आसमानी नेलपॉलिश को, और कभी शीशे पर गिरती बारिश की बूंदों को देख रहा था.
तुम तो आज आसमानी दिख रही हो, मैंने मजाक के लहजे में कहा...
"और नहीं तो क्या, वो गाना भूल गए तुम...तुमने ही तो सुनाया था...आसमानी रंग है, आसमानी आँखों का...तो देखो हमने अपना रंग आज आसमानी कर लिया है..."
"कोई गाना सुनाओ न तुम मुझे?" उसने मुझसे कहा...
"मैं गाता नहीं हूँ, वो तुम्हारा काम है, या तो तुम गाना सुनाओ मुझे या स्टीरेओ ऑन कर खुद ही सुन लो.."
"मैं अभी गाने के मूड में नहीं हूँ, स्टीरेओ ही ऑन करती हूँ..." उसने कहा.

उसने गाड़ी का स्टीरेओ ऑन किया.मैंने एक सी.डी पहले से स्टीरेओ में लगा रखा था.उसने पूछा की कौन सी सी.डी लगी हुई है?
मैंने कहा "खुद ही सुन लो...चुन चुन कर गाने डाले हैं मैंने, ख़ास तुम्हारे लिए.."
उसने प्ले का बटन दबाया और पहला गाना चलने लगा...."आपकी आँखों में कुछ महके हुए से ख्वाब हैं..."
वो ख़ुशी से उछल पड़ी..."हाय राम ये तो मेरे फेवरिटेस्ट गानों में से है.....बहुत बदमाश हो तुम"
"अब तुम्हारे लिए इतना तो कर ही सकते हैं" मैंने उसकी तरफ देखा...वो बहुत खुश हो गयी थी....बस इस एक छोटी सी बात पर वो इतनी खुश हो जायेगी मैंने सोचा नहीं था.
वो गायिका के सुर में सुर मिलाते हुए गाने लगी...और मेरे कन्धों को झकझोरते हुए गाने के बहाने मुझसे पूछने लगी..."आपकी बातों में फिर कोई शरारत तो नहीं?" और फिर जब मैंने उसे डांटा तो खुद ही खिलखिलाकर हंस दी.
उसे यूँ खुल कर हँसता देख मुझे बहुत अच्छा लगा.पार्क में वो उदास थी और मुझे अच्छा लगा की एक गाना के बहाने ही सही उसके चेहरे पर रौनक वापस तो आई.

बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन उतनी तेज़ नहीं.उसने गाडी के शीशे को नीचे कर दिया...हवा बहुत तेज़ चल रही थी जिससे बारिश की बहुत सी बूँदें तेज़ हवा के साथ अन्दर आ गयी और एक एक कर सभी बूँदें उसके चेहरे पर ठहर गयीं.वो बारिश की बूंदों से खेलने लगी..दोनों हथेलियों को बाहर निकालकर बूंदों को पकड़ने की कोशिश करने लगी.बारिशों में ये उसका प्रिय खेल था.
उसने अपने बालों को खोल लिया था और क्लिप मुहं में दबाये अपने बालों को सँवारने लगी.सामने पड़ा अपना गॉगल्स उसने उठाया और उसे बालों में हेअर बैंड की तरह फंसा दिया...वो फिर आराम के मुद्रा में बैठ गयी...उसकी इस हरकत से मुझे हंसी आ गयी. मैंने सोचा की अच्छा मौका है उसे छेड़ने का, लेकिन जब तक मैं कुछ कह पाता वो मेरे तरफ देखने लगी..मुझे हँसते देख वो शायद समझ गयी की मैं कुछ विशेष टिप्पणी करने के मूड में हूँ...बनावटी गुस्से में सड़क की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा "सामने देखो..सामने... कंसंट्रेट प्लीज.."

उसने पांव अब तक डैशबोर्ड पर जमा रखे थे....और उसने देख लिया था की मेरी नज़र उसके पैरों पर है...उसे थोडा अजीब लगा की मैं उसके पैरों को यूँ देख रहा हूँ.उसे शायद ये डर था की इस चक्कर में कहीं मेरा ध्यान न बिगड़ जाए और मैं गाड़ी से किसी को ठोक न दूँ...
उसने मुझसे कहा "बत्तमीज लड़के..सामने देखकर गाड़ी चलाओ...मेरे पैर को यूँ क्या देखते हो?किसी सुन्दर लड़की के सुन्दर पैरो को कभी नहीं देखा क्या?"
मैं हँसने लगा..."मुझे तुम्हारे पैरो को देखकर एक फिल्म का डायलोग याद आ रहा है.."
वो भी हंसने लगी..."बदमाश!!जानती हूँ मैं..तुम्हे कौन सा डायलोग याद आया है.पाकीज़ा का डायलोग न?"
"हाँ..."
"तो कह दो, इतना सोचते क्या हो..." वो अब मुझे छेड़ रही थी.
"अब रहने भी दो, तुमने तो गेस कर लिया.अब क्या फायदा?"
"ह्म्म्म..." उसने बुझे हुए मन से कहा, शायद वो मेरे से कुछ और सुनना चाह रही थी..शायद वो डायलोग ही  सुनना चाह रही थी जो सच में उसके पैरों को देखते हुए मुझे याद आया था..

हालांकि उसके पैरों को देखते हुए मुझे वो डायलोग ही नहीं बल्कि कुछ और बातें भी याद आ रही थी...और उन बातों को याद करते हुए मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था.पहले स्कूल और कोचिंग के दिनों में उसे क्लास ना आने का बहाना बनाना होता तो वो हमेशा अपने पैर का बहाना बनती थी..कभी कहती "मेरे पैरों में बड़ा दर्द है", तो कभी "मेरे पांव में चोट लग गयी है.." एक बार तो उसने हद कर दिया था..एक दोस्त के जरिये उसने संदेशा भेजा था - "मेरे पैर की सर्जरी होने वाली है इसलिए मैं दो हफ्ते क्लास नहीं आउंगी.." हम सब ये बात सुनकर सन्न हो गए थे..की अचानक उसे क्या हो गया. बाद में जब पता चला की ये उसका सफ़ेद झूठ था तो हम सबने उसे खूब डांटा भी..इस हिदायत के साथ की वो अब फिर ऐसा बहाना कभी नहीं बनाएगी.
इसी तरह...एक दफे जब उसके पांव में हलकी सी खराश लग गयी थी, कोचिंग क्लास के दरवाज़े में ठुकी एक कील से, तो उसने इस जरा सी बात पर पूरा क्लास सर पर उठा लिया था...बाद में उसको सर ने उसे दो चोकलेट दिए तब जाकर उसका रोना कम हुआ था.

मैंने सोचा ये बातें उसे याद दिलाऊं.लेकिन एक तो वो किसी दुसरे ही ख्यालों में खोयी हुई थी,दूसरा मुझे ये डर भी था कहीं वो मेरी इस बचकानी हरकत पर हँसने न लगे की मुझे हर छोटी बड़ी चीज़ों पर पहले की कोई बात याद आ जाती है.

मैंने जब उसकी तरफ देखा तो वो सड़क की ओर देख रही थी...वो जाने किस सोच में थी...सड़क पर उसे जाने क्या नज़र आया रहा था जिसे वो लगातार देख रही थी और उसके चेहरे के भाव भी फ्रीक्वेंटली बदल रहे थे...कभी गुस्सा दिखाती कभी मुस्कुराने लगती...बहुत देर तक मैं सोचता रहा की आखिर वो देख क्या रही है, फिर बाद में मैंने गौर किया की वो डैशबोर्ड पर बैठे 'टेडी' को देखकर वैसी शक्लें बना रही थी.

वो टेडी से बातें करने लगी थी.उसने उसे एक नाम(चेरी) भी दे दिया था और मुझे हिदायत दी की मैं उसे आगे से इसी नाम से बुलाऊं.वो उसे कवितायें सुनाने लगी..मुझे थोडा आश्चर्य हुआ.टेडी को कविता सुनाने के बहाने वो पहली बार वो मुझे कोई कविता सुना रही थी.जब एक दो जानी पहचानी कविता के बाद एक टूटी फूटी कविता उसके ज़बान से निकली, तो मैंने आश्चर्य में पूछा उससे , ये कहाँ पढ़ा तुमने?किसने लिखा है?
उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा "एक पागल लड़की ने एक उदास शाम अपनी डायरी में ये कविता लिखी थी, सोचा तुम्हे सुना दूँ..कहो कैसी लगी?
"ये तुमने लिखा है? इतनी अच्छी कविता?सिरिअसली तुमने? वाऊ!!इट्स वंडरफुल!! आई मीन इट!"
मेरी इस तारीफ़ से वो बहुत खुश हो गयी.उसका चेहरा सुर्ख हो आया था, उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गयी थी.उसने बहुत कोशिश की अपनी ख़ुशी को छिपाने की..लेकिन उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कराहट फ़ैल आई थी जिसे छुपाने की कोशिश करना व्यर्थ था.
उसकी कविता सुनने के बाद मुझे पुरानी एक बात याद आई...जब बहुत पहले कुछ ऐसा हुआ था, मैंने एक छोटी सी कविता एक कागज़ पर लिखकर उसे दिया था.वो कविता पढ़ कर पहले तो बहुत खुश हुई फिर अचानक उदास हो गयी, कहने लगी..."काश तुम्हारी तरह मैं भी लिख पाती.."
मैंने तब उससे कहा था..."तुम जब चाहो मेरी तरह लिख सकती हो, मच मच बेटर देन मी..यु नो, हर लड़की बाई डिफाल्ट एक पोएटेस होती है". उस समय भी उसके चेहरे पर एक चमक दिखी थी और उसने कहा था उस दिन की वो जरूर कभी कोई कविता लिखेगी और मुझे सुनाएगी.

कविता सुनाने के बाद कुछ देर तक वो चुप रही, टेडी को देखकर शक्लें बनाती रही, फिर उसकी पलकें मेरी ओर उठ आयीं - "क्या सोच रहे हो तुम? मेरी कविता सुनकर अचानक चुप क्यों हो गए?
मैं चुपचाप उसकी ओर देखता रहा..मन में बहुत सी बातें थी, सोचा सब उससे कह दूँ, उसे ये भी बता दूँ की सुबह उसके मना करने के बावजूद मैं एअरपोर्ट गया था, बस उसकी एक झलक देखने के लिए...लेकिन मैं चुप रहा ये सोच कर की वो फिर से उदास हो जायेगी और मैं एअरपोर्ट गया था इस बात से मेरे से नाराज़ भी हो जायेगी..
एक शेर याद आ रहा है, मैंने धीरे से बात को बदलते हुए कहा.
"कौन सा शेर? तुमने तो वैसे ही आज कमाल कमाल की कवितायें और ग़ज़लें सुनाई है मुझे...सुना डालो ये शेर भी.."
"है एक शेर बशीर बद्र साहब का बड़ा मशहूर शेर है जिसे मैंने कल ही पढ़ा था किसी मैगजीन में और तब से मेरे मन में वो शेर घूम रहा है....सुनो, सुनाता हूँ...- "सर से पांव तक वो गुलाबों का शजर लगता है / बावज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है".
उसने मेरी तरफ अपना चेहरा किया, वो हंस रही थी..पूछती है मुझसे "वो" या "मैं".
मैं थोडा झेंप सा गया, बिना उसकी तरफ देखे मैंने मुस्कुराते हुए कहा "तुम"
"तब ठीक है..." वो कुछ देर तक मेरे चेहरे को देखती रही इस इंतजार में की शायद मैं कुछ और बोलूं.लेकिन मैं चुपचाप गाड़ी चला रहा था.

वो टेडी को देखकर कहने लगी "देख लो चेरी, तुम्हारे साहब आज मेरी जान लेकर रहेंगे, पूरी शाम ऐसे कातिलाना शेर और कवितायें सुनाये हैं ये"


बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी और ठंडी हवा चल रही थी..मौसम बहुत सुहावना और रोमांटिक हो गया था.अगस्त के महीने में ही सर्दियों का हल्का अहसास हो रहा था.हमने उस शाम रेस्टुरेंट जाने का अपना प्लान कैंसल कर दिया था, हम दोनों नहीं चाहते थे की ऐसी खूबसूरत शाम हम किसी रेस्टुरेंट में बैठ कर बर्बाद करें..हम शहर के उस कोने में आ गए थे, जो सबसे शांत..सबसे कम भीड़ वाला इलाका था, जो उसे और मुझे दोनों को पसंद था.वो शहर के एअरपोर्ट का इलाका था, जहाँ बहुत कम भीड़ होती है..और आप गाडी पुरे रफ़्तार में चला सकते हैं.मैंने भी गाड़ी की स्पीड एकदम से बढ़ा दी...वो रोमांचित हो गयी - "ये कार इतनी तेज़ भी जा सकती है.., लेट मी ड्राईव".उसने मुझसे आग्रह किया लेकिन मैं उसके ड्राईविंग स्किल के प्रति ज्यादा आश्वस्त नहीं था और मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था..इसलिए उसके आग्रह पर मैंने ज्यदा ध्यान नहीं दिया.

एअरपोर्ट, गवर्नर हॉउस, सेक्रटेरिअट, बेली रोड, चिड़ियाखाना और फिर एअरपोर्ट...हम इसी लूप में घूम रहे थे...और अजीबोगरीब बातें कर रहे थे..फिल्मों की, गानों की, रिश्ते की, दोस्तों की, प्रेम की...यहाँ तक की पुनर्जनम की भी बातें हमने उस शाम की थी..वो मुझे अपने शहर में, जहाँ से वो पढाई कर रही थी वहां के खूबसूरत सड़कों के बारे में बता रही थी....विक्टोरिया रोड, क्लैपहैम, रीजेंट कैनाल और पता नहीं कौन कौन से सड़कों के नाम उसने लिए थे.वो हर जगह के डिटेल्स मुझे एक टूर गाईड की तरह बता रही थी..और वहां की हर छोटी बड़ी खासियत मुझे समझा रही थी.

हम अपनी बातों में इतना मशगुल थे की कब शाम के साढ़े सात बज गए ये पता भी नहीं चला.उसने घर में कह रखा था की वो सात बजे तक वापस आ जायेगी, और आधा घंटा वो वैसे ही लेट हो गयी थी.
हमें और देरी हो जाती अगर बातों बातों में वो ये न बताती की उसने अपनी घड़ी वहां के किस मार्किट से खरीदा है और उस बहाने मुझे अपनी घड़ी न दिखाती(जिसमे साढ़े सात बज रहे थे) तो संभव था की हमें वक़्त का कुछ और देर ख्याल नहीं आता और जिससे उसको इंडिया में पहले ही दिन घर में अच्छी खासी डांट सुननी पड़ती.

हमारे पास अब मात्र पंद्रह बीस मिनट का वक़्त था...बस पंद्रह से बीस मिनट में उसके घर पहुँच जायेंगे और वो अपने घर चली जायेगी..और मैं? नहीं, मैं इतनी जल्दी घर नहीं जाऊँगा.घर में कहकर आया था की आज मुझे आने में देर हो जायेगी.मैं कुछ देर सड़कों पर और भटकूँगा...सीधे रात में डिनर के समय घर पहुंचूंगा.

हम दोनों सहसा चुप हो गए.ऐसा अक्सर होता था, पहले के दिनों में भी, जब उसके जाने की घड़ी आ जाती थी तो उसके कुछ देर पहले से ही हम दोनों के बीच चुप्पी आ जाती थी...और हम चुपचाप प्रतीक्षा करते थे उस समय का जब दोनों अलग अलग अपने घरों के लिए निकल जाएँ.

उस शाम भी जब से घडी में वक़्त देखा था की साढ़े सात बज रहे हैं तब से ही हम दोनों चुप थे..वो दूसरी तरफ देख रही थी, जाने क्या सोच रही थी वो? और मैं..? मैं सोच रहा था की "वो घर जाकर क्या करेगी? याद आया की उसने बताया था की आज पूरी रात वो अपनी बहनों के साथ गप्पें करने वाली है.
लेकिन मैं? मैं क्या करूँगा? घर पहुँच कर मैं क्या करूँगा? मैं ये सोचने लगा...मैं घर जाते ही अपने कमरे में घुस जाऊँगा, दरवाज़ा बंद कर लूँगा और सो जाऊँगा.....माँ आएगी मेरी पास, मेरे कमरे में...ये पूछने के लिए की कल जन्मदिन में क्या क्या तैयारियां करनी है...और मैं हमेशा की तरह उनसे कहूँगा, की कुछ भी ख़ास करने की जरूरत नहीं है.माँ फिर अपनी लिस्ट सुनाने लगेगी की उसे कल क्या क्या तैयारियां करनी हैं...और कौन कौन सी मिठाइयाँ वो बनाने वाली हैं....और फिर...और फिर वो जाते जाते मुझसे तुम्हारे बारे में पूछेगी..सुबह ही उन्हें बताया था मैंने की तुमसे आज मिलूँगा...और वो जब भी तुम्हारे बारे में पूछती है मुझसे, मैं बड़ा असहज सा हो जाता हूँ..फिर भी मैं उन्हें बताऊंगा...क्या बताऊंगा ये पता नहीं...शायद ये की हम आज बहुत देर तक घूमते रहे थे...माँ फिर और भी दुसरे सवाल करेगी जिसका जवाब मेरे पास नहीं होगा और मैं उन सवालों को टाल दूंगा...."तुम कभी पूरी बात नहीं बताते मुझे" ये शिकायत कर वो अपने कमरे में चली जायेंगी....फिर..फिर..मैं भी सो जाऊँगा.....नहीं, मैं सोयुंगा नहीं...मैं एक कविता लिखूंगा...हाँ, आज की रात मैं एक कविता लिखूंगा...बहुत दिनों बाद एक कविता लिखने का मन कर रहा है...और वो कविता मैं तुम्हे सुनाऊंगा अगली मुलाकात में..."

मैंने सोचा मन में आई ये बातें उसे बताऊँ, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं था...रात के आठ बज चुके थे और हम उसके अपार्टमेंट के सामने पहुँच भी चुके थे और वो जल्दी में थी...वो तेज़ क़दमों से चलते हुए अपने अपार्टमेंट के गेट के अन्दर चली गयी..जल्दबाजी में ठीक से बाय कहने का मौका भी नहीं मिला...बस उसने इतना कहा की कल सुबह वो फोन करेगी.
मैं वहीँ उसके अपार्टमेंट के सामने वाली चाय की दूकान में बैठ गया और जो वक़्त उसके साथ बिताया उसके बारे में सोचने लगा...चाय दूकान पर रेडिओ पर एक गाना चलने लगा था..."वो शाम कुछ अजीब थी..." मैं सोचने लगा, की ये शाम सच में अजीब ही थी....कितने ही रंग थे इस एक शाम में...




8 comments:

  1. "नेचर इज एन अमेजिंग पेंटर..."
    And so are you:)

    You paint so beautifully with words!!!

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  2. दिन भर भावनात्मक रूप से जुड़े होने के बाद शायद शाम अजीब ही लगती है ... बहुत खूबसूरती से एहसास लिखे हैं ।

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  3. जब तक पढ़ रही थी इतनी सारी बातें ज़हन में गूँज रहीं थीं ,पर अब सब भूल गयी ...... शुभकामनाएं !

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  4. उफ़ ... क्यों ले बैठे उस शाम का किस्सा ...
    हर किसी के दिल के कोने से सुलगने लगेंगे लम्हे ... सीली सीली यादें पानी की बूंदों से छन् कर उठेंगी ...
    सबकी शामें कुछ अजीब हो उठेंगी ...

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  5. एक आम दिन को यूँ खास शब्दों समेटकर लिखना सरल नहीं है ..... ऐसे भाव जो कभी न कभी सभी जीते हैं ..... सुंदर पोस्ट

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  6. यार थोडा छोटा लिखा करो ... बहुत पढवाते हो तुम :)

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    1. हाँ मुझे भी लगता है बहुत लम्बा लिख देते हैं, जरूरत से ज्यादा ही! :)
      अगली पोस्ट छोटी होगी ये वादा ! :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया