Saturday, July 20, 2013

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होटल की एक रात

चंडीगढ़...द सिटी ब्यूटीफल
अपने प्रिय मित्र की सगाई के मौके पर मैं चंडीगढ़ आया हूँ.पहली बार में ही ये शहर भा गया मुझे.चंडीगढ़ में बस ने जैसे ही प्रवेश किया एक साईन बोर्ड ने मेरा स्वागत किया.."वेलकम तो द सिटी ब्यूटीफल.बस स्टैंड तक आते हुए बस ने शहर का अच्छा खासा चक्कर लगाया जिससे मुझे शहर को थोड़ा देखने का मौका मिला.मैं बहुत खुश था, जाने कब से तमन्ना थी ये शहर देखने की.बस स्टैंड पर दोस्त मुझसे मिलने आया, और फिर जहाँ उसने मुझे ठहराने का प्रबंध किया था हम उस होटल की तरफ बढे.

शाम छः बजे.. मुझे मेरे दोस्त ने एक होटल में ठहराया है.जिस कमरे में मैं ठहरा हूँ वो एक छोटा सा लेकिन खूबसूरत कमरा है.सामने की दीवार पर एक बड़ा एल.सी.डी टीवी लगा हुआ है, उसके ठीक बगल में एक स्टडी टेबल और एक खिड़की जहाँ से बाहर की सड़क दिखती है.
दोस्त मुझे होटल में छोड़कर वापस चला जाता है.मैं आराम से बिस्तर पर लेट जाता हूँ.अगले दिन होने वाली दोस्त की सगाई को लेकर मैं बहुत खुश और उत्सुक हूँ.उत्सुकता का एक व्यग्तिगत कारण भी है.मैं सोचता हूँ की थोड़ी देर आराम करूँगा और फिर फ्रेश होकर शहर घुमने निकलूंगा.

रात नौ बजे.. दो घंटे शहर घुमने के बाद मैं वापस अपने कमरे में आ गया हूँ.गर्मी ज्यादा नहीं है, एक पंखे से काम चल सकता है लेकिन फिर भी मैंने कमरे का ए.सी चला दिया है.एक दोस्त की कही बात याद आती है - "होटल में मिलने वाली हर सुविधा का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए".
होटल के मेनू कार्ड पर नज़र गयी, तो सभी चीज़ों के दाम देखकर मेरे होश उड़ गए, इसलिए मैं बाहर से डिनर लेकर होटल में आ गया.
टी.वी चालु किया तो किसी चैनल पर कुछ भी ख़ास देखने लायक कार्यक्रम नहीं आ रहा...एक चैनल पर देखा की एक बेहद पुरानी और शानदार फिल्म आ रही है..."जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली".फिल्म का बस कुछ ही हिस्सा बाकी है, मैं फिल्म देखने लगता हूँ.मैं सोचता हूँ की मुझे वी.शांताराम की फ़िल्में देखे बहुत समय हो गया है और उन्हें दोबारा देखना चाहिए.मैं निश्चय करता हूँ की वापस दिल्ली जाते ही मैं अपने डी.वी.डी कलेक्सन से उनकी फिल्मों की डी.वी.डी खोज के निकालूँगा और देखूंगा.

रात के दस बजे.. मैंने डिनर कर लिया है और फिल्म भी खत्म हो चुकी है.मैं टी.वी बंद कर देता हूँ और सोने के लिए बिस्तर पर आ जाता हूँ.मैं सोचता हूँ की एक अरसा हो गया है की मैं रात के दस बजे सोया हूँ...मैं मोबाइल में सुबह सात बजे का अलार्म लगा देता हूँ..मुझे हलकी सी ख़ुशी भी होती है की मैं आज की रात एक लम्बी नींद ले सकूँगा.कई महीनो हुए मैं चार पांच घंटे से ज्यादा सो ही नहीं पाता हूँ...तमन्ना ही रह जाती है की सात आठ घंटे की एक लम्बी नींद लूँ.
बेहद थके होने के बावजूद मैं सो नहीं पा रहा...मैं कभी उठ कर कमरे के कोने में पड़े एक बड़े से सोफे पर बैठ जाता हूँ तो कभी उस स्टडी टेबल पर...फिर अंत में खिड़की का पर्दा हटा कर मैं वापस बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ...बड़े शीशे की खिड़की से बाहर की रौशनी अन्दर कमरे में आती है, सड़क पर अभी भी ट्रैफिक नज़र आता है लेकिन बाहर की कोई भी आवाज़ कमरे में नहीं आती.एक बड़ा स्ट्रीट लैम्प सामने खिड़की के ठीक बहार दिखाई देता है, उसके ठीक बगल में एक बड़ा सा पेड़ खड़ा है..उस पेड़ की परछाई अन्दर कमरे की दिवार पर पड़ती है.मैं उस विशाल पेड़ और स्ट्रीट लैम्प को देखने लगता हूँ.मुझे नहीं पता चलता कब मुझे नींद आती है और मैं सो जाता हूँ.

रात के एक बजे.. मेरी नींद अचानक एक सपने से टूटती है.कोई बुरा सपना नहीं है बल्कि बड़ा विएर्ड सा सपना है.मुझे खुद पर बेहद गुस्सा आता है.."आखिर कब तक मैं ऐसे अजीबोगरीब और बेमतलब सपने देखते रहूँगा.मैं सोचता हूँ जिनके बारे में वो सपना देखा है उन्हें बताऊंगा, लेकिन फिर अपना ये ख्याल ये सोच कर टाल देता हूँ की कहीं वो मुझे पागल न समझे.
बिस्तर पर लेटे हुए मैं याद करने की कोशिश करता हूँ की मैं ऐसे विएर्ड सपने कब से देख रहा हूँ, लेकिन ठीक से कुछ याद नहीं आता.मुझे ख्याल आता है की एक अरसा हुआ मैंने कोई भयानक सपना नहीं देखा है.पहले जब भयानक सा कोई सपना देखता था तो डर से मेरी नींद टूट जाती थी.मैं बदहवास सा उठता था..पानी पीता था, दिल की धड़कन तेज़ चल रही होती थी..मैं कमरे की बत्ती जला देता था, लैपटॉप पर कुछ अच्छे गाने चला कर...बिस्तर पर एक साफ़ चादर बिछा कर इत्मिनान से सो जाता था.मुझे नींद फिर से आ जाती थी और मैं  फिर सीधे सुबह ही उठता था.लेकिन जब से ऐसे अजीबोगरीब सपने देखने लगा हूँ तब से जब कभीं सपने से जागता हूँ, मुझे जल्दी नींद नहीं आ पाती.मैं सोचता हूँ की इन विएर्ड सपने से तो अच्छे वो बुरे सपने ही थे, मैं डर के जागता था लेकिन कम से कम मुझे दोबारा नींद तो आ जाती थी.

रात के डेढ़ बजे.. मैं सोने की फिर से कोशिश करता हूँ, लेकिन नींद पता नहीं क्यों एकाएक रूठ गयी है.सोचता हूँ कहीं उस सपने की वजह से तो नींद नहीं रूठी हुई है.
कमरे में कोई शोर शराबा या फिर किसी तरह का कोई हस्तक्षेप भी नहीं है की नींद ना आये...बिलकुल शांत सा है कमरा...शायद जरूरत से कुछ ज्यादा ही शांत कमरा है...कमरे में एक भयानक शान्ति पसरी हुई है...शायद इतनी ज्यादा शान्ति में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कुछ ज्यादा ही साफ़ सुनाई देती है,बिलकुल थ्री-डी डिजटल साऊंड में..शायद यही वजह हो की नींद नहीं आ रही है.मैं कोशिश करता हूँ उस आवाज़ को ना सुनने की...लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता है.मैं इरिटेट सा हो जाता हूँ और बिस्तर से उठ कर उस स्टडी टेबल के पास चला जाता हूँ और वहीँ कुर्सी पर बैठ जाता हूँ..

खिड़की से बहार देखता हूँ, सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, कभी कभी कोई गाडी तेज़ी से गुज़रती है लेकिन उसकी कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती.मैं खिड़की से बाहर लगे उस पेड़ को देखने लगता हूँ, बहुत से मिक्स्ड ख्याल दिमाग में आते जाते हैं..मैं अपनी हथेलियों को देखता हूँ...अपने हाथों की लकीरों पर मेरी नज़र जाती है..एक भाग्यरेखा सी कोई लम्बी लकीर है...मैं देर तक उस लकीर को देखते रहता हूँ और फिर हाथों की दूसरी लकीरों में उस लकीर को पहचानने की कोशिश करता हूँ जिसने उसे मुझसे जुदा किया होगा.लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आता.यूँ भी हाथों की लकीरें कभी मेरे पल्ले नहीं पड़ती..लोग कहते हैं की मेरे हाथों में बड़े अनयुज्वल सी रेखाएं हैं.मुझे याद आता है की बचपन में माँ ने जितने पंडितों को मेरी कुंडली या हाथ दिखलाई थी सभी ने एक बात कही थी, की मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ.सभी ने कहा था की इसकी भाग्य रेखा तो कमाल की है..बिलकुल हथेलियों को चीर के भाग्यरेखा निकली है..ये जो चाहेगा वो इसे मिलेगा.मुझे एकाएक उन सभी पंडितों पर बेहद गुस्सा आने लगता है..दिल करता है की मैं उन सब पंडितों को बुलाऊं और एक लाईन से खड़ा कर के उनसे जवाब मांगूं, की क्यों उन्होंने मुझसे और मेरी माँ से ये झूठी बातें कही थी.

रात के दो बज रहे हैं, और मैं वहीँ कुर्सी पर बैठा हूँ..भगवान से प्रार्थना करता हूँ की कोई ऐसा चमत्कार हो जाए और मेरे पिछले पांच साल वापस मुझे मिल जाए.मैं ज्यादा समय नहीं मांग रहा..सिर्फ अपने पिछले पांच साल..मैं बस अपनी कुछ गलतियों को सुधारना चाहता हूँ...अपने द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसले को सुधारना चाहता हूँ...ये भी कितना अजीब है न...कैसे हम बस एक गलत फैसला ले लेते हैं और हमारी पूरी ज़िन्दगी ही बदल जाती है...वो एक गलत फैसला हमारे साथ हमारी पूरी उम्र तक घसीटते चला जाता है.
मैं खुद को बड़ा बेबस महसूस करने लगता हूँ..सोचता हूँ की जो भी मैं कर सकता था, जो मेरे हाथ में था वो मैंने नहीं किया..पता नहीं कितनों के सपनों और उम्मीदों को मैं पूरा नहीं कर पाया..मुझे अपने आप से थोड़ी घृणा  भी होने लगती है.

रात के तीन बजे.. मैं बिस्तर पर फिर से आ जाता हूँ...बगल में एक किताब रखी हुई है...सैकड़ों बार पढ़ी हुई किताब(गुनाहों का देवता).जाने क्या सोचकर चलते वक़्त मैंने उस किताब को अपने बैग में रख लिया था.रास्ते में भी किताब पढ़ते आया था..अभी जिस मोड़ पर किताब का वो पन्ना है, मुझे उससे आगे पढने की हिम्मत नहीं होती, मैं किताब बंद कर उसे वापस अपने बैग में डाल देता हूँ.मैं आँखें बंद कर के फिर से सोने की कोशिश करता हूँ.लेकिन...

सामने खिड़की के ठीक पास जो दिवार है, उसपर जो उस विशाल पेड़ की परछाई बन रही है, मेरी नजर उसपर जाती है.मैं अपलक उस परछाई को देखने लगता हूँ.मुझे उस परछाई के बीच सहसा एक चेहरा दिखाई देने लगता है.एक जाना पहचाना सा चेहरा..बहुत साल पहले का एक चेहरा, उसी लड़की का चेहरा जिसने एक दिन अपने पुराने घर की पुरानी और जर्जर हुई सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे एक कविता सुनाने की कोशिश की थी.उस दिन की स्मृति बिलकुल साफ़ साफ़ मेरे मन में है.मैं दिवार पर पड़ रही उस परछाई पर अपनी नज़रें और गड़ा देता हूँ, जैसे वो कोई स्क्रीन हो जहाँ उस दिन का, उस पल का विडियो चल रहा है...

"एक कविता है, मैंने लिखी है..सुनाऊं? "
"तुम और कविता? "
"हाँ, मैं और कविता..याद है, तुमने मुझे एकदिन किसी कवियित्री की एक कविता थमाई थी, बस उसी की पहली पंक्ति से इंस्पायर्ड है...सुनोगे?सुनाऊं?"
"हाँ सुनाओ.."
"तुम मुझको गुड़िया कहते हो / ठीक ही कहते हो..
तुम मुझको इम्पल्सिव कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको मासूम कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको सुन्दर कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको चंचल कहते हो / ठीक ही कहते हो.
. . .

. . .
('गुड़िया' की जगह ऐसे कितने शब्द रख कर एक लम्बी कविता सुनाई थी उसने,और फिर..)
. . .
. . 
.
तुम मुझको अपनी प्रेमिका क्यों नहीं कहते हो / शायद ठीक ही कहो.."
इस आखिरी पंक्ति पर अचानक आकर वो रुक गयी.उसके होठ बहुत देर तक खुले हुए से हलके कांपते हुए से रह गए थे.जैसे खुद ही कहे इस आखिरी पंक्ति से वो भी मेरी तरह बिलकुल आश्चर्यचकित थी..कुछ देर हम वहीँ दुसरे मंजिल की सीढ़ियों पर खड़े रहे...थोड़ी देर बाद उसकी धीमी आवाज़ सुनाई दी थी...
"तुम मुझे अपनी प्रेमिका क्यों कहोगे / शायद ठीक ही है जो नहीं कहते हो.."

दिवार पर उस परछाई में बहुत देर तक उसका वो चेहरा झिलमिलाता हुआ सा मुझे दिखाई देता रहा...मैं बिस्तर से उठ गया और खिड़की के परदे को पूरी तरह से खींच कर लगा दिया...कमरे में बिलकुल अँधेरा हो जाता है.मैं कमरे से बाहर निकल आता हूँ..लॉबी खाली है, रिसेप्सन का डेस्क भी खाली है, रिसेप्सन के पास सोफे पर बैठकर मैं वहां रखे कुछ ऑटो-मैगजीन पढने लगता हूँ...मैं घड़ी देखता हूँ तो सुबह के पांच बज रहे होते हैं..मैं बाहर टहलने निकल जाता हूँ...मैं टहलते हुए बस स्टैंड तक पहुँचता हूँ, चाय पीता हूँ और वापस कमरे में आ जाता हूँ.सुबह के साढ़े पांच बजे रहे होते हैं उस वक़्त..एक म्यूजिक चैनल टी.वी पर चला देता हूँ और फिर बिस्तर पर लेट जाता हूँ..मुझे हलकी झपकी आने लगती है और मैं टी.वी देखते देखते थोड़ा सो जाता हूँ.

सुबह के साढ़े सात बजे.. कमरे की घंटी से मेरी नींद एकाएक टूट जाती है.मैं घबरा कर उठता हूँ..बाहर होटल का वेटर खड़ा है, वो ब्रेकफास्ट के लिए पूछने आया था.उसे ब्रेकफास्ट लाने को कहकर मैं कमरे में आता हूँ, घडी देखता हूँ तो सुबह के साढ़े सात बज रहे होते हैं, मुझे हलकी ख़ुशी होती है की कम से कम दो घंटे मैं सो पाया...थोडा आश्चर्य भी होता है की पूरी रात मैं सोने की कोशिश करता रहा लेकिन नींद रूठी रही और दो घंटे कैसे इतनी गहरी नींद मैं सो गया..मैं जल्दी जल्दी तैयार होता हूँ लेकिन रात की बात और दिवार पर छपी उसके चेहरे की परछाई बहुत देर तक मेरा पीछा करते रहती है...

11 comments:

  1. म्युज़िक चैनल पहले लगा लेते तो नींद आ जाती :) :)

    खैर, ऑन द सीरियस नोट, लिखे अच्छा हो !!!!

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  2. मेरे मन में विश्व बसते हैं,
    यह शहर निगल न जाये मुझको।

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  3. अकेले ठैबो, अच्छा सोचते हो.. लिखते हो.. अच्छा पढ़ने को मिलेगा..

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  4. अजीब है न नींद तो बस एक रात की ही थी जो नहीं आई पर कितना लंबा फलसफा होता है जीवन का कितना कुछ लौटने की कोशिश करता है पर अटक जाता है घुट जाता है ... फिर जब चला जाता अहि तो गहरी नींद के कुछ पल ही ताज़ा कर देते हैं ....

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी की 48 वीं पुण्य तिथि पर विशेष - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. वाह क्या रात थी, कुछ और ही बात थी ।

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  7. सच है ज़िंदगी में किए कुछ फैसले ज़िंदगी ही बादल देते हैं .....पर वक़्त कहाँ लौट कर आता है .... सुंदर लेखन ।

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  8. aisi sannate se bhai raaton mein ....aksar ateet vartmaan bankar khada ho jaata hai

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  9. अच्छा लगा पढना!
    आपके सभी सपने पूरे हों...!
    भगवान् प्रार्थना सुनकर आपके मनोनुकूल कोई चमत्कार कर ही दें... बीता समय लौटे न लौटे पर जिस सुधार हेतु व्यग्रता है, वह घटित हो ही जाए बस!

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  10. हम नींद के पीछे जब ही भागते हैं जब नींद आँखों से खोई हो

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया