Sunday, June 30, 2013

बारिश का एक दिन

उसे बारिश के मौसम से प्यार था.बारिशों में वो रूमानी हो जाया करती थी.शायरी और कविताओं में दिलचस्पी उसकी अचानक से बढ़ जाती और हँस के कहती की ये बारिश तो ज़िन्दगी जीना सिखा देती है, शायरी क्या चीज़ है.बारिश में भींगते हुए चंदू के दूकान के पकौड़ियाँ और गर्म भुट्टे खाना उसे पसंद थे.वो अक्सर कहती थी "बारिशों में कोई जादू सा होता है, वो उदासियों और तकलीफों को अपने साथ साथ बहा ले जाती है.बारिशों में दिल खुश रहता है और ख्वाहिशें पूरी होती हैं.".चार्ली चैपलिन का एक मशहूर कोट भी वो उन दिनों अक्सर दोहराया करती थी "I Love Walking in the rain Because No body can see me crying".वो बारिशों में नाचती थी, गाती थी, जी भर भींगती थी और शरारतें करती थी.एक नियम भी उसने बनाया था..की जिस दिन बारिश हो उस दिन हम जरूर मिलेंगे..चाहे भींगते हुए ही मिलने क्यों न आना पड़े.

उन दिनों मुझे बारिश पसंद तो थी लेकिन बारिश के साथ जो समस्याएं आती थी मैं हमेशा उसकी शिकायत करता था.इस बात से वो मुझसे खफा रहती.उस शाम भी उससे मेरी बहस हो गयी थी.वो बारिश न होने से दुखी थी, और मैं खुश था की पिछले कुछ दिनों से बारिश नहीं हो रही है.मेरे मोहल्ले में वाटरलोगिंग की समस्या इतनी थी की अगर बारिश कुछ दिनों के लिए नहीं रूकती तो नाव चलाने की नौबत आ जाती.रात सोने के पहले मैं युहीं छत पर टहल रहा था और शाम में उसने जो कहा था, उन बातों को याद कर के हंस रहा था.
उसने कहा था - "देख लेना, कल सुबह बारिश के दस्तक से ही तुम्हारी नींद खुलेगी".
मुझे आसमान बिलकुल साफ़ दिख रहा था और बादलों का दूर दूर तक पता नही था.
बारिश क्या ख़ाक होगी, मैंने सोचा और कुछ देर छत पर टहलने के बाद अपने कमरे में सोने चला गया.

सुबह मैं नींद में ही था की लगा जैसे मैं बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा हूँ.मुझे भ्रम हुआ की शायद मैं कोई सपना देख रहा हूँ, लेकिन जैसे ही मैंने आँखें खोली और खिड़की के बाहर देखा तो झमाझम बारिश हो रही थी.मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, कल रात बादलों का कोई अता पता नहीं था और अब इतनी ज़ोरदार बारिश हो रही है.सुबह सुबह ऐसी झमाझम बारिश देख मैं बहुत खुश हो गया था, चाहे लाख मुसीबतें बारिश साथ लेकर आये, लेकिन जब कभी सुबह आँख खुलती और मैं बारिश होते देखता तो मुझे अच्छा लगता था.

मुझे एकाएक उसकी कही बात याद आ गयी..उसने कहा था "सुबह बारिश जरूर होगी".
मैंने जब पूछा था उससे की तुम्हे कैसे मालुम? तो उसने हँसते हुए, खुद पे इतराते हुए कहा था "ये बादल मेरे दोस्त हैं, मैंने कहा है इन्हें कल बरसने के लिए".
मुझे उसकी वो बात याद आते ही हँसी आ गई...एक पल के लिए तो सच में यकीन हो गया था की ये बादल उसके दोस्त हैं और उसके कहने पर ही ये बरस रहे हैं.
मैं बिस्तर से उठने ही वाला था की अचानक मुझे उसकी एक और बात याद आई... - वो हमेशा कहती थी की बारिश की बूंदों की दस्तक से सुबह अगर नींद खुले तो बिस्तर से उठते ही बारिश में भींगने बाहर चले जाओ...ये शुभ होता है.
मैं उसकी इस पागलपन वाली बात को याद करते ही हंसने लगता हूँ, और एक पल तो सच में ईच्छा होती है की बाहर भींगने चला जाऊं, लेकिन मैं बाहर नहीं जाता और बरामदे में ही कुर्सी डालकर बैठ जाता हूँ.

कुछ देर बाद फोन की घंटी बजती है और मैं समझ जाता हूँ की ये उसका ही फोन होगा .वो मुझे आज मिलने के लिए कहीं बुलाएगी.
जब कभी सुबह सुबह बारिश होती थी, तो वो हमेशा मुझे फोन कर के मिलने बुलाती थी..चाहे बारिश हलकी हो रही हो या मुसलाधार...घरवाले कितना भी मुझे बाहर जाने से रोके..मुझे उससे मिलने के लिए जाना ही पड़ता था.

"देखो, कहा था मैंने की बारिश जरूर होगी, इन्हें मैंने भेजा है" फोन के दुसरे तरफ से आ रही उसकी खनकती आवाज़ में ख़ुशी साफ़ झलक रही थी..
जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही हुआ...उसने मुझे तीन घंटे बाद मिलने का फरमान सुना दिया था, और मुझसे कहा की मैं दिन भर के दुसरे कामों को रद्द कर दूँ..पुरे दिन का कार्यक्रम उसने फोन पर ही बना डाला था.

थोड़ी देर बाद बारिश थोड़ी थमी, और मैं उससे मिलने निकल पड़ा.रास्ते में जगह जगह कीचड़ गढ़हे और पानी जमा हो गए थे..जिससे मुझे थोड़ी इरिटेशन तो हुई, लेकिन मौसम इतना सुहावना हो गया था की मेरी वो चिढ ज्यादा देर तक नहीं रही.हलकी फुहारों वाली बारिश हो रही थी..घर से चलते वक़्त माँ ने जो रेनकोट दिया था वो साईकल के कैरिअर में युहीं दबा रहा, और मैं भींगते हुए उससे मिलने गया था.

हम दोनों के मिलने का जगह तय रहता था, उस जगह में कभी कोई बदलाव नहीं होता.जो भी पहले पहुँच जाता, वो आर्चीस गैलरी के पास खड़े होकर दुसरे का इंतजार करता था.हालांकि उसने कभी मेरा इंतजार किया हो, ये याद नहीं आता.मैं हमेशा की तरह पहले पहुँच गया था दुकान के पास खड़ा था की सामने से वो आते हुए दिखी.पीले और उजले रंग की समीज सलवार में उसे देखते ही मुझे ख्याल आया की वो बारिशों में अक्सर इसी रंग के कपड़े पहना करती है.उसके बैग से छाता बाहर झाँक रहा था, जिसे देखते ही मुझे हँसी आ गयी.मैं सोचने लगा की ये लड़की इतनी डिसप्लिनड है कपड़ों के मामले में..ड्रेस कम्बिनेसन का खासा ध्यान रखती है.. मौसमों के हिसाब से कपड़ें पहनती है..अपने श्रृंगार पर भी ख़ास ध्यान देती है..यहाँ तक की कभी कभी पार्टियों में वो खाना बस इस डर से नहीं खाती की कहीं उसकी लिप्सटिक खराब न हो जाए..लेकिन बारिशों में उसे इन सब बातों की कोई फ़िक्र नहीं होती...वो जी भर के बारिश में भींगती है, बिना इसकी परवाह किये की उसके मेक-अप का क्या होगा या फिर उसके कपड़े ख़राब हो जायेंगे.बारिशों में उसपर एक अलग ही रंग चढ़ जाता था.

"चलो चंदू की दूकान पर..मुझे पकौड़े और पुदीने की चटनी खानी है"..उसने आते ही कहा.

मैंने कहना चाहा की बारिश थोड़ी रुकने दो..लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया.

मैंने साईकिल से अपना रेनकोट निकलना चाहा तो वो पीछे से ये कहकर छेड़ने लगी "हाँ तुम मुझसे भी ज्यादा नाज़ुक हो, थोड़ी सी फुहार में गल जाओगे".मैंने रेनकोट वैसे ही साइकिल के कैरिअर में दबा छोड़ दिया और उसके साथ चंदू की दूकान की तरफ चल पड़ा.

बारिश हलकी हो रही थी, लेकिन फिर भी भींगने के लिए वो हलकी बारिश ही काफी थी.मैंने उसे जबरदस्ती छाता निकालने के लिए कहा, लेकिन उससे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा..उसकी वो छतरी छोटी सी थी और हम दोनों छतरी में चलने के बावजूद भींगते रहे थे.हम दोनों इतने पास पास चल रहे थे की अक्सर एक दुसरे से टकरा जाते और जब कभी उसकी बाहों का स्पर्श मेरे बाहों से होता..पुरे बदन में मुझे एक हरारत सी महसूस होने लगती.मेरी नज़र कभी उसके चेहरे पर जाती तो कभी उसकी खुली बाहों पर.चलते चलते जब कभी मेरी नज़रें उसके चेहरे की तरफ जाती तो वो वहीँ अटक के रह जाती.
मैं उसे देखकर सोचने लगा हूँ की बारिशों में सच में उसका रूप और निखर जाता है.मैं जब कभी बारिश में भींगे उसके चेहरे की तरफ ऐसे देखने लगता तो वो अक्सर मुझे टोक दिया करती..."ऐसे क्या देख रहे हो साहब, कभी कोई खूबसूरत चेहरा नहीं देखा क्या"...और मैं हर बार शरमा के अपनी नज़रें दूसरी तरफ मोड़ लेता..

चंदू के दूकान के सामने हम पहुँच चुके थे, लेकिन अब भी फुहारों वाली बारिश रुकी नहीं थी.पकौड़ियाँ खाते समय उसके चेहरे के भाव देखने लायक होते थे, खासकर बारिशों में...बिलकुल एक बच्ची सी मुस्कान उसके चेहरे पर सिमट आती थी.पकौड़ियाँ, चाय और भुट्टे के बाद मैंने सोचा की अब हम वापस जायेंगे, लेकिन उसके दुसरे इरादे थे.

उसने मुझे सामने वाले पार्क में चलने के लिए कहा.मैं आश्चर्य में उसकी तरफ देखने लगा. बारिश के वक़्त हम पार्क में आमतौर पर जाते नहीं थे...लेकिन उस दिन उसने मुझे सोचने समझने या रियेक्ट करने का वक़्त ही नहीं दिया..."आओ तुम्हे एक मैजिक ट्रिक दिखाउंगी" ये कहते हुए वो मुझे खींचते हुए पार्क में ले गयी.उस पार्क में हम दो पागल लोगों के सिवा कोई तीसरा मौजूद नहीं था, यूँ भी जब बारिश हो रही हो तो पार्क में कोई टहलने या फिर बैठने आता भी नहीं.

चलो एक खेल खेलते हैं, उसने कहा मुझसे और अपने दुपट्टे को गले से उतार कर उसे अपने हाथों में ले लिया..उसने मुझे मेरी हथेलियों को सामने लाने के लिए कहा और फिर अपनी हथेलियों में मेरी हथेलियों को मिला कर उसने उसे एक दुसरे में लॉक कर दिया...लॉक हुए हथेलियों को उसने अपने दुपट्टे से बाँध दिया और कुछ देर तक वैसा ही छोड़ दिया..बारिश की बूँदें हथेलियों पर गिरती रहीं और वो अपनी आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगी..

मुझे एक पल लगा की अपनी हथेलियों को खींच कर उसके दुपट्टे से बाहर निकाल लूँ, आखिर कब तक उसके ऐसे विचित्र ,इललॉजिकल और बेतुके खेल को झेलता रहूँ, लेकिन उसी वक़्त मेरी नज़र उसके चेहरे की तरफ गयी...उसका चेहरा इतना मासूम इतना शांत नज़र आ रहा था की मुझे खुद के गुस्से पर शर्म आने लगी.

वो कुछ देर तक आँखें बंद कर पता नहीं क्या बुदबुदाते रही थी.
मैं उसके चेहरे की तरफ देखने लगता हूँ.उसके माथे पर लगा लाल टिका बारिश में भींगने से माथे पर फ़ैल गया था..मैं अपनी जेब में हाथ डालता हूँ और सोचता हूँ की रुमाल निकालकर उसके माथे पर फैले लाल टिके को पोछ दूँ..लेकिन पता नहीं किस संकोच से मैं रुमाल नहीं निकाल पाता.बारिश के फुहारों के साथ हवा भी चलने लगी, जिससे उसकी जुल्फें हवा में लहराते हुए मेरे चेहरे पर आकार टिक गए थे, मैं उन्हें हटाने की कोशिश भी नहीं करता और अपने चेहरे पर युहीं उसकी जुल्फों को टिके रहने देता हूँ.

कुछ देर बाद उसने आँखें खोली और कुछ जादू का मंत्र-सा पढने लगी...उसने लॉक हुई उन हथेलियों पर एक फूंक लगाईं, वो जैसे जादूगर लगाते हैं न...ठीक वैसे ही..और कहने लगी "देखना अब जब मैं ये दुपट्टे का बंधन खोलूंगी तो हम दोनों की हथेलियाँ हमेशा के लिए एक दुसरे से जुड़ जायेंगी".मैं उसकी इस बेतुकी बात पर चाह कर भी हँस नहीं पाया.

उसने दुपट्टे को हटाया तो कुछ पल के लिए हथेलियाँ वैसे ही रही, एक दुसरे के ऊपर ठहरी हुई..वो बेहद खुश हो गयी और चहकने लगी..लेकिन जैसे ही दुसरे पल मैंने अपनी हथेलियों को उसकी हथेलियों पर से उठा लिया वो एकदम निराश सी हो गयी.


"नहीं जुड़ा...मुझे लगा था की हमारी हथेलियाँ जुड़ी रहेंगी.." उसने कहा और अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया..मुझे ये भ्रम हुआ की वो भर्राये गले से बोल रही है.
ऐसा अक्सर उसके साथ होता है, वो अपनी इन पागलपन वाली हरकतों को, अपने इललॉजिकल खेल को सच समझ बैठती है और बाद में जब खेल का उसके मन मुताबिक परिणाम नहीं निकलता तो वो उदास हो जाती है.मैं उसे कुछ कहना चाहता हूँ की तभी उसे अचानक कुछ याद सा आ जाता है....
अपने चेहरे को मेरी तरफ कर के वो कहती है - "ये हथेलियाँ नहीं जुड़ीं तो चलो कोई बात नहीं...लेकिन इतनी देर जो मेरी हथेलियाँ तुम्हारी हथेलियों से बंधी रहीं, लॉकड रही..जो गर्माहट मैंने महसूस की वही गर्माहट तुमने भी महसूस की न?"...उसके इस प्रशन पर मैं कुछ भी नहीं कहता और बस अनिश्चित भाव से उसकी तरफ देखता हूँ..वो मेरा जवाब "हाँ" समझ लेती है....
"इतना काफी है मेरे लिए, जो गर्माहट मैंने महसूस की वही तुमने...तुम जानते हो, जब तक तुम्हारी हथेलियाँ मेरी हथेलियों में लॉक थी, और मैं आँखें बंद कर वो स्टुपिड मन्त्र पढ़ रही थी, मुझे लग रहा था की मेरी हथेलियाँ तुम्हारी हथेलियों में पिघल कर एक हो रही हैं, इसलिए मुझे विश्वास सा हो आया की हमारी हथेलियाँ जुडी रहेंगी...लेकिन गेस व्हाट...आई एम सच अ स्टुपिड गर्ल".

वो एकटक से मुझे देखने लगी.वो मुझे ऐसे देख रही थी जैसे आँखों से वो बहुत कुछ और भी कह देना चाह रही हो..शायद जो वो कहना चाह रही थी मैंने उन शब्दों को पढ़ भी लिया था.
मैं भी उससे बहुत कुछ कहना चाह रहा था, शायद ये की जब वो आँखें मूँद कर बुदबुदा रही थी, तो मैं क्या महसूस कर रहा था...लेकिन मैं चाह कर भी कुछ भी न कह सका...और बस इतना ही कह पाया...
"चलो अब चलते हैं यहाँ से".

उसने भी कोई जिद नहीं की और हम पार्क के बाहर आ गए.


उस रात अपने कमरे में लेटे हुए मैं दिन भर की बातों को याद करने लगा..सच कहूँ तो सिर्फ एक ही बात मुझे याद आ रही थी...उसने अपनी हथेलियों में मेरी हथेलियों को लॉक कर लिया था और वो सोचती थी की ये ऐसे ही रहेंगे...जुड़ जायेंगे.अपने बिस्तर पर लेटे हुए मैं बहुत देर तक अपनी हथेलियों को देखता रहा और सोचने लगा की वो जो पल जो गुज़रा था उसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा.मुझे उसका चेहरा याद आने लगता है, लाल टिका उसके माथे पर पसरा हुआ, बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर ठहरी हुई और उसकी जुल्फें मेरे चेहरे पर अटकी हुई.मैं आँखें बंद करता हूँ और सोने की कोशिश करने लगता हूँ..मुझे पता भी नहीं चलता की कब धीरे धीरे नींद मुझे अपने आगोश में समेट लेती है.

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