Saturday, June 1, 2013

// // 8 comments

दिल्ली डायरीज : २




ऑटो वाले ने हमें सीधा पालिका बाजार के सामने वाली सड़क के पास छोड़ा था.ऑटो वाले को मैं पैसे देने ही वाला था की उसने मेरा हाथ पकड़ के पीछे खींच लिया.."नो वे मिस्टर..आप मेरे शहर में आये हैं..यहाँ आप पैसे नहीं दे सकते..वरना ये शहर मुझे ये कहकर ताने मारेगा की अपने दोस्त से खर्च करवा दिया तुमने...आपको बस अपने शहर में मेरे लिए पैसे देने की इज़ाज़त है".मैंने भी उसके इस बात का कोई विरोध नहीं किया..और उलटे उससे कहा "अच्छा ये बात है...तो देखो, सामने आइसक्रीम की एक ट्रौली है...चलो मुझे खिलाओ आईसक्रीम".
"वाऊ  ये हुई न बात...कम औन!! अभी आईसक्रीम खिलाती हूँ." वो लगभग उछलते कूदते हुए उस आइसक्रीम वाले के पास पहुँच गई थी..और मैं उसके पीछे पीछे..

आइसक्रीम लेने के बाद जैसे ही हम दोनों आगे बढे तो एकाएक एक धुल भरी आंधी उठी...हम दौड़ते हुए से पालिका के गेट के पास आकर खड़े हो गए.उसने अपना चेहरा मेरे कंधे के पीछे छिपा लिया था और तब तक उसने अपना चेहरा छिपाए रखा जब तक आंधी थोड़ी थम नहीं गयी.मैंने पालिका बाज़ार का नाम बहुत सुना था और अन्दर घूमना चाहता था..लेकिन उसने पालिका के अन्दर जाने से साफ़ मना कर दिया.एक टीचर की तरह मुझे धमकाने लगी  "ख़बरदार जो अन्दर गए तो...ये भी कोई घुमने की जगह है".
मैंने कहा उससे की पालिका बाज़ार के गेट के पास खड़े होकर अन्दर न जाना कितना अजीब होगा...उसे शायद मेरे पर दया आ गयी थी.थोड़ी नरमी दिखाते हुए उसने कहा "ठीक है, हम एक चक्कर लगाकर वापस आ जायेंगे.उसकी इस नरमी पर मैं खुश हो गया था.हम जब पालिका बाज़ार का एक चक्कर लगाकर बाहर आयें तब तक मौसम भी बहुत हल्का हो चूका चका था और धुप लगभग गायब सी हो गयी थी.

वो अपने गाईड के रोल में फिर से वापस आ गयी थी..."पता है ये पूरा कनौट प्लेस सर्कल/ब्लॉक में बंटा हुआ है..तुम्हे यहाँ सर्दियों में या फिर किसी बारिश के दिन आना चाहिए तब कनौट प्लेस की खूबसूरती देखते  बनती है.सर्दियों में हर दिन यहाँ लोगों का जमावड़ा लगा रहता है..यहाँ बने सीमेंट की बेंच दिन भर लोगों से भरी होती हैं...सामने जो पार्क दिख रहा है उसे सेन्ट्रल पार्क कहते हैं...जाड़ों में लोग दिन भर यहाँ बैठे रहते हैं..छुट्टियाँ में वो यहाँ आ जाते हैं...धुप सेंकते हैं..पिकनिक मनाते हैं.मैं भी क्रिसमस की छुट्टियों में जब आती थी तो हर सन्डे हम सेंट्रेल पार्क या फिर इंडिया गेट के पास पिकनिक मनाते थे.अभी तो गर्मियों के दिन हैं इसलिए यहाँ दोपहर में भीड़ कम होती है.लोग शाम में आते हैं.आज देखो थोड़ी भीड़ जो नज़र आ रही है वो इसलिए है की ये वीकेंड है न..लोग घुमने फिरने निकल जाते हैं.
"वीकेंड?वीकेंड क्या?" मेरे मुहँ से ये प्रश्न ना चाहते हुए भी निकल गया था..जबकि मुझे भी पता था वीकेंड क्या होता है, बस उस समय ये शब्द ज्यादा सुनने को नहीं मिलता था.ऐसे कई शब्द थे जो वो बोल देती थी और मैं विस्मित सा उसे देखने लगता था.उसे लगता की मुझे सच में उनके अर्थ नहीं मालुम हैं, और वो मुझे उनके अर्थ समझाने लगती.मैं बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनता, वो तरह तरह के उदाहरण देकर अपनी बातें समझाया करती थी.उसे काफी अच्छा लगता था जब वो वैसी कोई बात जानती थी जो मुझे मालुम नहीं होता था.वो उन बातों को मुझे समझाने का कोई मौका नहीं छोड़ती नहीं.
"हाँ वीकेंड..".उसने कहा.."देखो मुझे इसका हिंदी अर्थ नहीं पता लेकिन सप्ताह के आखिरी दिन को वीकेंड कहते हैं...अब इसका मतलब ये नहीं की सप्ताह का आखिरी दिन सन्डे...मतलब आखिरी काम करने वाला दिन...जैसे फ्राइडे...हाँ, यहाँ कई जगह शनिवार और रविवार दोनों दिन छुट्टियाँ होती हैं.सो यू सी वीकेंड में लोग घुमने निकल जाते हैं.

सो यु सी - ये तीन शब्द उसने पुरे दिन में बहुत बार कहा था...अलग अलग सिचूऐशन में...अलग अलग तरीकों से...वो अक्सर अपने कुछ फेवरिट शब्द चुन लेती थी और उसे बातचीत के दौरान बार बार दोहराते रहती थी.उसे इस बात की फ़िक्र नहीं होती थी की उसका वो शब्द उस पुरे वाक्य में फिट बैठ रहा है या नहीं.मेरे साथ बातचीत के दौरान वो अक्सर अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करती थी और अक्सर मुझसे सवाल अंग्रेजी में पूछती थी इस उम्मीद से की मैं भी उसे अंग्रेजी में ही जवाब दूंगा...लेकिन मैं हमेशा हिंदी में जवाब देकर उसे निराश कर देता था...जिससे वो थोड़ी चिढ़ सी जाती थी और हमेशा एक ही बात दोहराती थी..."यु आर सच अ होपलेस केस"

उसके उस वीकेंड के ज्ञान को सुनने के बाद हम घूमते घूमते एक आईसक्रीम की ट्रोली के पास आकर खड़े हो गए.उसे आईसक्रीम खाने की तलब हुई थी.उसने मुझे पहले ही समझा दिया था की "देखो, ना तो तुम्हारे पास उतने पैसे हैं और ना ही मेरे पास की कनौट प्लेस के महंगे महंगे रेस्टोरेन्ट में जाकर कुछ खाए, तो हमें अपना पेट इस आईसक्रीम से ही भरना पड़ेगा".
हम कनौट प्लेस के दो ब्लॉक के बीच खड़े थे और वहां सड़क का तिकोना फुटपाथ बना हुआ था.वहां कई सारे कबूतर जमा हो आये थे, लोग उन्हें दाना खिला रहे थे..जैसे ही आसपास से कोई गाड़ी गुज़रती वो सारे  कबूतर एक साथ आसमान की तरफ उड़ जाते..वो उन कबूतरों को बड़े गौर से देख रही थी.और फिर अचानक वो उनके तरफ दौड़ गयी...उसके दौड़ते ही सारे के सारे एकसाथ उसके सर के ऊपर से उड़ने लगे.उसने कुछ क्षण अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया और फिर आसमान की तरफ नज़रें उठाकर उन्हें उड़ते हुए देखने लगी.वो कुछ देर उन्हें आसमान में उड़ते देखते रही थी और फिर धीरे से मुझसे कहती है "I want to fly like a bird".मैं उसकी इस बात कर कुछ भी नहीं कहता, और उसे देख सिर्फ मुस्कुराने लगता हूँ.वो फिर से अपना कहा वाक्य दोहराती है "I really want to fly like a bird".मुझे याद आता है की वो हमेशा पंछियों से काफी फैसनेट होती आई है.शुरू की एक मुलाकात में भी वो एकटक से खिड़की से बाहर पेड़ों की शाखाओं पर बैठे पंछियों को देख रही थी...और फिर बहुत बाद की एक शाम में उसने किसी पार्क की ही बेंच पर बैठे जाने किस बात पर मुझसे कहा था "थाम लेना अगर देखो मुझे उड़ते हुए".


हम कुछ देर तक कनौट प्लेस के गलियारों में घूमते रहे थे और फिर थक कर एक सीमेंट की बेंच पर बैठ गए.एकाएक मेरी नज़र घड़ी पर गयी..साढ़े छः बज रहे हैं...मैंने कहा उससे..."अब तुम्हे जाना चाहिए...शाम हो गयी है".
"अरे डोंट वारी...ये दिल्ली है, मुझे दिक्कत नहीं होगी...कुछ देर बैठते हैं फिर चली जाउंगी.मुझे सिर्फ बीस मिनट लगेंगे जाने में" उसने कहा था.लेकिन मेरे थोड़ा गुस्सा दिखाने पर उसने कहा "अच्छा चलो उस कोने पर एक दूकान है जहाँ मुझे कुछ खाना है, उसके बाद मैं चली जाऊँगा".

उसके "उस कोने" का दूकान एक पान-दूकान था.मैंने बड़े आश्चर्य से पूछा उससे "तुम पान खाओगी??कब से शुरू कर दिया पान खाना?".उसने कहा की ये कोई चुस्की पान की दूकान है जो आम पानों सा नहीं होता और कनौट प्लेस की ये पान दूकान काफी मशहूर है.चुस्की पान?? ऐसा तो कोई नाम मैंने पहले कभी सुना नहीं था.वो मुझे बताने लगी की उस पान में क्या क्या डालते हैं..बहुत सारा बर्फ, मसाला और जाने क्या क्या(उसने क्या क्या बताया था मुझे कुछ भी याद नहीं).मैंने जब कहा की मैं ये पान नहीं खाने वाला तो उसने कई सारे तर्क देकर मुझे पान खाने के लिए कहा....."ये पान न बिलकुल हवा मिठाई सी होती है, मुहँ में डालते ही वैसे ही ये भी घुल जाती है जैसे हवा मिठाई.हवा मिठाई याद है न तुम्हे?" उसने मुझे पान खाने के लिए कई तरह से कन्विंस करना चाहा लेकिन मैं पान न खाने के मामले पर बिलकुल अडिग रहा.

"तुम नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाने वाली"..वो निराश होकर मेरे बगल में बैठ गयी.
मैंने देखा की उसे चुस्की पान खाने का बहुत मन था लेकिन सिर्फ इस गिल्ट की वजह से की मैं नहीं खाऊंगा  वो कुछ देर खुद को रोके रही..लेकिन ज्यादा देर खुद को वो रोक न सकी और अपने मन को अपने गिल्ट के ऊपर प्रायोरिटी देते हुए वो भागकर दूकान के पास पहुँच गयी.उसने एक चुस्की पान बनाने को कहा और मैं उस पानवाले को पान बनाते देख कर हैरत में था..इतने बड़े साइज़ का पान? वो इसे खाएगी कैसे? उस पान का साईज तो उसके मुहं से भी बड़ा दिखाई दे रहा था.मैंने देखा की उस दूकानवाले ने चुस्की पान उसके मुहं में ठूंस दिया था और तब मुझे लगा की मेरे पान न खाने का फैसला कितना सही था.
कुछ देर तक तो वो कुछ भी बोल ही नहीं पायी थी.सिर्फ उसके एक्स्प्रेसन लगातार बदल रहे थे...जिससे ये पता चल रहा था की वो उस पान को एन्जॉय कर रही थी..वो मुझे देख हंस रही थी लेकिन मुहं में पान होने की वजह से वो ना तो खुल के हँस पा रही थी और ना कुछ कह पा रही थी.करीब बीस तीस सेकण्ड बाद उसके मुहँ को थोड़ी रहत मिली होगी...और अपने दोनों पैरों पर एक पेंग्युन की तरह चलते हुए वो मेरे पास आई... "बेवकूफ हो तुम..तुम्हे खाना चाहिए था पान..ईट वाज़ वंडरफुल..!" उसने कहा और जोर से एक मुक्का मेरे पीठ पे दे मारा.

चुस्की पान खाने के बाद मैंने उसे ऑटो में बिठा दिया और वो घर चली गयी..उसने मुझे अगले दिन का कार्यक्रम समझा दिया था...अगले दिन मेरी एक परीक्षा थी और उस परीक्षा के बाद वो मेरे से मिलने वाली थी...उसने मुझे मिलने का जगह बताया अंसल प्लाजा, जो की मेरे परीक्षा के सेंटर से ज्यादा दूर नहीं था.उसके जाने के बाद मैं कुछ देर तक वहीँ उसी सीमेंट की बेंच पर बैठा रहा और फिर वापस होटल आ गया.होटल पहुँचते पहुँचते मुझे रात के आठ बज गए थे..मैंने होटल के फोनबूथ से उसे फोन किया और ये तसल्ली करने के बाद की वो सही सलामत पहुँच गयी है, मैं भी अपने कमरे में चला गया.मेरा दोस्त भी अपना काम निपटा कर वापस आ चूका था और हम कुछ देर बाद डिनर के लिए बाहर निकल गए.

वापस होटल पहुँच कर अगले दिन होने वाली परीक्षा के सारे कागज़, पेन-पेन्सिल एक जगह समेट कर रख देने के बाद मैं सोने चले गया..अच्छा खासा थक चूका था मैं...पुरे दिन तपती गर्मी में दिल्ली के एक कोने से दुसरे कोने घूमते रहा था..लेकिन फिर भी मुझपर थकान हावी नहीं हो रही थी..मन बहुत खुश था और दिन भर के सारे पल आँखों के सामने घूम रहे थे..आँखों से नींद गायब सी हो गयी थी..होता है न जब आप बहुत खुश होते हैं तो आपको उस रात जल्दी नींद नहीं आ पाती..उस रात भी मेरे साथ ऐसा ही हुआ था..आधी रात के बाद मैं थोडा सो सका था...

सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गयी थी...होटल की खिड़की से बाहर देखा तो दिल खुश हो गया था...आसमान में बाहर बादल छाये हुए थे..लगा जैसे की अच्छी बारिश होगी, लेकिन बारिश हुई नहीं बस पुरे दिन हलके बादल दिल्ली के आसमान पर छाये रहे थे.मैं जल्दी जल्दी तैयार होकर परीक्षा देने निकल गया.परीक्षा की तैयारी बहुत ख़ास तो नहीं थी लेकिन फिर भी परीक्षा उम्मीद से बेहतर हुआ था.परीक्षा देने के बाद मैं सीधा अंसल प्लाजा की ओर बढ़ गया.

उसने ठीक ही बताया था.अंसल प्लाजा जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई.ऑटो वालें ने दस मिनट में ही मुझे अंसल प्लाजा पहुंचा दिया था..उन दिनों मॉल होते नहीं थे, दिल्ली का भी शायद एकमात्र बड़ा मॉल था अंसल प्लाजा.टी.वी फिल्मों के अलावा मैं ज़िन्दगी में पहली बार किसी मॉल को सामने से देख रहा था.मैं तो आँखें फाड़ फाड़ कर मॉल के भव्यता को देख रहा था.बहुत ही विशाल और भव्य लगा था वो मॉल.मॉल के अन्दर प्रवेश करने में मुझे हिचक सी महसूस हो रही थी..फिर भी थोड़ा हिम्मत बाँधा..अपने कपड़ों को थोड़ा ठीक किया और सीधा मॉल के अन्दर प्रवेश कर गया.उसने कहा था की वो मॉल के गेट के आस पास खड़ी रहेगी.लेकिन वो कौन से गेट के आसपास रहेगी ये नहीं बताया था.मैंने पूछा भी नहीं था, मुझे क्या मालुम था की मॉल में दो तीन मुख्य द्वार होते हैं.सामने जो एंट्रेंस था वहां से मैं अन्दर प्रवेश किया..वो कहीं दिखी नहीं, मैं इधर उधर देखने लगा..दिल में डर ये था की ये मॉल इतना बड़ा है की कहीं उसे खोजने में ही शाम न हो जाए(अब सोचता हूँ तो लगता है की आज के ज़माने में कितना आसन होता है मोबाइल से कॉल कर के पूछ लेना की कहाँ हो, बताओ मैं आ रहा हूँ.लेकिन उन दिन कितनी अनिश्चिताएं होती थी..अगर आप जिसका इंतजार कर रहे हैं वो देरी से आये या नहीं आ पाए तो इस सोच से की वो क्यों नहीं आ पाया मन कितना बेसब्र हो जाता था).मैं थोड़ा बेसब्र होकर इधर उधर देख ही रहा था की वो दुसरे गेट के पास खड़ी दिखाई दी मुझे.मैं दौड़ते हुए उसके पास पहुंचा था.

हम बहुत देर तक अंसल प्लाजा में घूमते रहे थे.मॉल के अन्दर की ठंडी ए.सी की हवा अच्छी लग रही थी.वो मुझे भी अपने साथ विंडो शौपिंग करवाने लगी थी.वो हर दूकान के शो-विंडो के पास जाकर खड़ी हो जाती थी और चीज़ों को देखने लगती थी.एक जवेलरी के शोरुम के पास आकर उसने शो-विंडो में रखे एक नेकलेस की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा कहा "जब तुम नौकरी करने लगोगे तो मुझे ये खरीद देना..".हर शोरम में उसे जो चीज़ें पसंद आ जाती वो तब अपने वही शब्द दोहराती थी "जब तुम नौकरी करने लगोगे तो मुझे ये खरीद देना".

"एस्कलेटर" पर भी पहली बार मैं उसी के साथ चढ़ा था...अंसल प्लाजा मॉल में ही.उसने बड़े सावधानी से मेरे हाथों को पकड़ रखा था, लेकिन फिर भी पहली बार एस्कलेटर पर चढ़ते हुए मैं लड़खड़ा गया था...उसने मुझे अपने बाहों का सहारा देकर संभाला था.कोल्ड कॉफ़ी जैसी अद्भुत चीज़ भी पहली बार उसने ही मुझे पिलाई थी, उसी अंसल प्लाजा मॉल में.हमें मॉल घूमते घूमते शाम हो गयी थी.हमने तय किया की अब मॉल से निकल कर हम सीधा उसके मोहल्ले जायेंगे जहाँ वो रहती थी.उसे छोड़कर मैं वापस होटल आ जाऊंगा.

हम मॉल से निकले और सीधा बस पर बैठ गए.वो मेरे बगल में बैठी थी.आगे की सीट पर एक आदमी बैठा हुआ था जो अपने छोटे से ब्रीफकेस को अपनी गोद में रख कर उसपर तबले के जैसे ताल दे रहा था और कोई लोकगीत गुनगुना रहा था.उसे असल में गुनगना नहीं कहना चाहिए क्यूंकि वो बाकायदा गा रहा था और आवाज़ तेज़ भी इतनी थी की बस में बैठे सभी लोगों की निगाहें उस व्यक्ति पर आकर टिक गयीं थी.वो मेरे बगल में बैठी, उस आदमी को गीत गाता देख जाने क्यों खुश हो रही थी.उसने अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया था और बस की खिड़की से बाहर देखने लगी थी.

मैंने देखा की कुछ देर बाद वो मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मेरी उँगलियों से खेलने लगी थी.उसने मेरे हथेलियों को अपने हथेलियों में लॉक कर लिया और आँखें मूंदकर कुछ बुदबुदाने लगी.मैं उसके इतने पास बैठा था फिर भी मैं सुन नहीं पाया की वो क्या बुदबुदा रही है.मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश भी की लेकिन एक दो शब्दों के अलावा कुछ भी समझ नहीं आता था.मैंने अंदाज़ा लगाया की वो कुछ दुआ मांग रही है.जाने क्यों मुझे उस पल बेचैनी सी होने लगी.मैंने अपना हाथ उसके हाथों से छुड़ाना चाहा था, उसे टोका मैंने..."ये क्या कर रही हो"...लेकिन उसने मेरी हथेलियों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली थी...कुछ देर बाद उसने अपनी आँखें खोली और मुझसे कहा "सुनो, जब कोई दुआ मांग रहा हो तो उसे बीच में टोकना अपशुकन होता है".मुझे कुछ भी समझ नहीं आया था.उसने दुआ मांगी थी?कौन सी दुआ माँगी थी उसने और क्यों?अब सोचता हूँ तो लगता है की मैं समझ सकता हूँ की उस दिन वो मेरे हथेलियों को हथेलियों में लेकर क्या दुआ मांग रही थी.अब जब सोचता हूँ कभी तो एक बेतुका ख्याल ये भी आता है की शायद उस दिन मैंने उसे बीच दुआ में टोक दिया था इसलिए उसकी वो दुआ कुबूल नहीं हुई.

उस दिन बस में मेरे उसे टोकने के बाद उससे मेरी और कोई बात नहीं हुई थी..हम दोनों चुपचाप ही रहे..मैं उसे उसके घर के नज़दीक वाले बस स्टैंड पर छोड़कर वापस लौट आया था...दिल्ली का घूमना फिरना अब खत्म हो गया था और अगले दिन हमें अपने शहर लौटना था.वो सीधा मुझसे अगले दिन स्घाम में अपनी दीदी के साथ स्टेशन पर मिलने वाली थी.


जारी...

8 comments:

  1. रोचक व गहन अवलोकन क्षमता।

    ReplyDelete
  2. बहुत प्यार और गहनता से समेटी हैं स्मृतियाँ

    ReplyDelete
  3. हमेशा की तरह बहुत अच्छी पोस्ट...| कुछ पल मुस्कराहट भरे, पर अंत तक आते-आते जाने क्यों ऐसा लगा, बहुत कुछ दरक गया कहीं, बहुत गहरे...| एक कसक-सी छोड़ गई ये पोस्ट...|
    यादगार लम्हों को यूँ ही समेटे रहो...|

    ReplyDelete
  4. सरल...सहज लेखन ...!सुखद अनुभूति देता है तुम्हें पढ़ना ...!!

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया