Sunday, June 30, 2013

बारिश का एक दिन

उसे बारिश के मौसम से प्यार था.बारिशों में वो रूमानी हो जाया करती थी.शायरी और कविताओं में दिलचस्पी उसकी अचानक से बढ़ जाती और हँस के कहती की ये बारिश तो ज़िन्दगी जीना सिखा देती है, शायरी क्या चीज़ है.बारिश में भींगते हुए चंदू के दूकान के पकौड़ियाँ और गर्म भुट्टे खाना उसे पसंद थे.वो अक्सर कहती थी "बारिशों में कोई जादू सा होता है, वो उदासियों और तकलीफों को अपने साथ साथ बहा ले जाती है.बारिशों में दिल खुश रहता है और ख्वाहिशें पूरी होती हैं.".चार्ली चैपलिन का एक मशहूर कोट भी वो उन दिनों अक्सर दोहराया करती थी "I Love Walking in the rain Because No body can see me crying".वो बारिशों में नाचती थी, गाती थी, जी भर भींगती थी और शरारतें करती थी.एक नियम भी उसने बनाया था..की जिस दिन बारिश हो उस दिन हम जरूर मिलेंगे..चाहे भींगते हुए ही मिलने क्यों न आना पड़े.

उन दिनों मुझे बारिश पसंद तो थी लेकिन बारिश के साथ जो समस्याएं आती थी मैं हमेशा उसकी शिकायत करता था.इस बात से वो मुझसे खफा रहती.उस शाम भी उससे मेरी बहस हो गयी थी.वो बारिश न होने से दुखी थी, और मैं खुश था की पिछले कुछ दिनों से बारिश नहीं हो रही है.मेरे मोहल्ले में वाटरलोगिंग की समस्या इतनी थी की अगर बारिश कुछ दिनों के लिए नहीं रूकती तो नाव चलाने की नौबत आ जाती.रात सोने के पहले मैं युहीं छत पर टहल रहा था और शाम में उसने जो कहा था, उन बातों को याद कर के हंस रहा था.
उसने कहा था - "देख लेना, कल सुबह बारिश के दस्तक से ही तुम्हारी नींद खुलेगी".
मुझे आसमान बिलकुल साफ़ दिख रहा था और बादलों का दूर दूर तक पता नही था.
बारिश क्या ख़ाक होगी, मैंने सोचा और कुछ देर छत पर टहलने के बाद अपने कमरे में सोने चला गया.

सुबह मैं नींद में ही था की लगा जैसे मैं बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा हूँ.मुझे भ्रम हुआ की शायद मैं कोई सपना देख रहा हूँ, लेकिन जैसे ही मैंने आँखें खोली और खिड़की के बाहर देखा तो झमाझम बारिश हो रही थी.मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, कल रात बादलों का कोई अता पता नहीं था और अब इतनी ज़ोरदार बारिश हो रही है.सुबह सुबह ऐसी झमाझम बारिश देख मैं बहुत खुश हो गया था, चाहे लाख मुसीबतें बारिश साथ लेकर आये, लेकिन जब कभी सुबह आँख खुलती और मैं बारिश होते देखता तो मुझे अच्छा लगता था.

मुझे एकाएक उसकी कही बात याद आ गयी..उसने कहा था "सुबह बारिश जरूर होगी".
मैंने जब पूछा था उससे की तुम्हे कैसे मालुम? तो उसने हँसते हुए, खुद पे इतराते हुए कहा था "ये बादल मेरे दोस्त हैं, मैंने कहा है इन्हें कल बरसने के लिए".
मुझे उसकी वो बात याद आते ही हँसी आ गई...एक पल के लिए तो सच में यकीन हो गया था की ये बादल उसके दोस्त हैं और उसके कहने पर ही ये बरस रहे हैं.
मैं बिस्तर से उठने ही वाला था की अचानक मुझे उसकी एक और बात याद आई... - वो हमेशा कहती थी की बारिश की बूंदों की दस्तक से सुबह अगर नींद खुले तो बिस्तर से उठते ही बारिश में भींगने बाहर चले जाओ...ये शुभ होता है.
मैं उसकी इस पागलपन वाली बात को याद करते ही हंसने लगता हूँ, और एक पल तो सच में ईच्छा होती है की बाहर भींगने चला जाऊं, लेकिन मैं बाहर नहीं जाता और बरामदे में ही कुर्सी डालकर बैठ जाता हूँ.

कुछ देर बाद फोन की घंटी बजती है और मैं समझ जाता हूँ की ये उसका ही फोन होगा .वो मुझे आज मिलने के लिए कहीं बुलाएगी.
जब कभी सुबह सुबह बारिश होती थी, तो वो हमेशा मुझे फोन कर के मिलने बुलाती थी..चाहे बारिश हलकी हो रही हो या मुसलाधार...घरवाले कितना भी मुझे बाहर जाने से रोके..मुझे उससे मिलने के लिए जाना ही पड़ता था.

"देखो, कहा था मैंने की बारिश जरूर होगी, इन्हें मैंने भेजा है" फोन के दुसरे तरफ से आ रही उसकी खनकती आवाज़ में ख़ुशी साफ़ झलक रही थी..
जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही हुआ...उसने मुझे तीन घंटे बाद मिलने का फरमान सुना दिया था, और मुझसे कहा की मैं दिन भर के दुसरे कामों को रद्द कर दूँ..पुरे दिन का कार्यक्रम उसने फोन पर ही बना डाला था.

थोड़ी देर बाद बारिश थोड़ी थमी, और मैं उससे मिलने निकल पड़ा.रास्ते में जगह जगह कीचड़ गढ़हे और पानी जमा हो गए थे..जिससे मुझे थोड़ी इरिटेशन तो हुई, लेकिन मौसम इतना सुहावना हो गया था की मेरी वो चिढ ज्यादा देर तक नहीं रही.हलकी फुहारों वाली बारिश हो रही थी..घर से चलते वक़्त माँ ने जो रेनकोट दिया था वो साईकल के कैरिअर में युहीं दबा रहा, और मैं भींगते हुए उससे मिलने गया था.

हम दोनों के मिलने का जगह तय रहता था, उस जगह में कभी कोई बदलाव नहीं होता.जो भी पहले पहुँच जाता, वो आर्चीस गैलरी के पास खड़े होकर दुसरे का इंतजार करता था.हालांकि उसने कभी मेरा इंतजार किया हो, ये याद नहीं आता.मैं हमेशा की तरह पहले पहुँच गया था दुकान के पास खड़ा था की सामने से वो आते हुए दिखी.पीले और उजले रंग की समीज सलवार में उसे देखते ही मुझे ख्याल आया की वो बारिशों में अक्सर इसी रंग के कपड़े पहना करती है.उसके बैग से छाता बाहर झाँक रहा था, जिसे देखते ही मुझे हँसी आ गयी.मैं सोचने लगा की ये लड़की इतनी डिसप्लिनड है कपड़ों के मामले में..ड्रेस कम्बिनेसन का खासा ध्यान रखती है.. मौसमों के हिसाब से कपड़ें पहनती है..अपने श्रृंगार पर भी ख़ास ध्यान देती है..यहाँ तक की कभी कभी पार्टियों में वो खाना बस इस डर से नहीं खाती की कहीं उसकी लिप्सटिक खराब न हो जाए..लेकिन बारिशों में उसे इन सब बातों की कोई फ़िक्र नहीं होती...वो जी भर के बारिश में भींगती है, बिना इसकी परवाह किये की उसके मेक-अप का क्या होगा या फिर उसके कपड़े ख़राब हो जायेंगे.बारिशों में उसपर एक अलग ही रंग चढ़ जाता था.

"चलो चंदू की दूकान पर..मुझे पकौड़े और पुदीने की चटनी खानी है"..उसने आते ही कहा.

मैंने कहना चाहा की बारिश थोड़ी रुकने दो..लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया.

मैंने साईकिल से अपना रेनकोट निकलना चाहा तो वो पीछे से ये कहकर छेड़ने लगी "हाँ तुम मुझसे भी ज्यादा नाज़ुक हो, थोड़ी सी फुहार में गल जाओगे".मैंने रेनकोट वैसे ही साइकिल के कैरिअर में दबा छोड़ दिया और उसके साथ चंदू की दूकान की तरफ चल पड़ा.

बारिश हलकी हो रही थी, लेकिन फिर भी भींगने के लिए वो हलकी बारिश ही काफी थी.मैंने उसे जबरदस्ती छाता निकालने के लिए कहा, लेकिन उससे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा..उसकी वो छतरी छोटी सी थी और हम दोनों छतरी में चलने के बावजूद भींगते रहे थे.हम दोनों इतने पास पास चल रहे थे की अक्सर एक दुसरे से टकरा जाते और जब कभी उसकी बाहों का स्पर्श मेरे बाहों से होता..पुरे बदन में मुझे एक हरारत सी महसूस होने लगती.मेरी नज़र कभी उसके चेहरे पर जाती तो कभी उसकी खुली बाहों पर.चलते चलते जब कभी मेरी नज़रें उसके चेहरे की तरफ जाती तो वो वहीँ अटक के रह जाती.
मैं उसे देखकर सोचने लगा हूँ की बारिशों में सच में उसका रूप और निखर जाता है.मैं जब कभी बारिश में भींगे उसके चेहरे की तरफ ऐसे देखने लगता तो वो अक्सर मुझे टोक दिया करती..."ऐसे क्या देख रहे हो साहब, कभी कोई खूबसूरत चेहरा नहीं देखा क्या"...और मैं हर बार शरमा के अपनी नज़रें दूसरी तरफ मोड़ लेता..

चंदू के दूकान के सामने हम पहुँच चुके थे, लेकिन अब भी फुहारों वाली बारिश रुकी नहीं थी.पकौड़ियाँ खाते समय उसके चेहरे के भाव देखने लायक होते थे, खासकर बारिशों में...बिलकुल एक बच्ची सी मुस्कान उसके चेहरे पर सिमट आती थी.पकौड़ियाँ, चाय और भुट्टे के बाद मैंने सोचा की अब हम वापस जायेंगे, लेकिन उसके दुसरे इरादे थे.

उसने मुझे सामने वाले पार्क में चलने के लिए कहा.मैं आश्चर्य में उसकी तरफ देखने लगा. बारिश के वक़्त हम पार्क में आमतौर पर जाते नहीं थे...लेकिन उस दिन उसने मुझे सोचने समझने या रियेक्ट करने का वक़्त ही नहीं दिया..."आओ तुम्हे एक मैजिक ट्रिक दिखाउंगी" ये कहते हुए वो मुझे खींचते हुए पार्क में ले गयी.उस पार्क में हम दो पागल लोगों के सिवा कोई तीसरा मौजूद नहीं था, यूँ भी जब बारिश हो रही हो तो पार्क में कोई टहलने या फिर बैठने आता भी नहीं.

चलो एक खेल खेलते हैं, उसने कहा मुझसे और अपने दुपट्टे को गले से उतार कर उसे अपने हाथों में ले लिया..उसने मुझे मेरी हथेलियों को सामने लाने के लिए कहा और फिर अपनी हथेलियों में मेरी हथेलियों को मिला कर उसने उसे एक दुसरे में लॉक कर दिया...लॉक हुए हथेलियों को उसने अपने दुपट्टे से बाँध दिया और कुछ देर तक वैसा ही छोड़ दिया..बारिश की बूँदें हथेलियों पर गिरती रहीं और वो अपनी आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगी..

मुझे एक पल लगा की अपनी हथेलियों को खींच कर उसके दुपट्टे से बाहर निकाल लूँ, आखिर कब तक उसके ऐसे विचित्र ,इललॉजिकल और बेतुके खेल को झेलता रहूँ, लेकिन उसी वक़्त मेरी नज़र उसके चेहरे की तरफ गयी...उसका चेहरा इतना मासूम इतना शांत नज़र आ रहा था की मुझे खुद के गुस्से पर शर्म आने लगी.

वो कुछ देर तक आँखें बंद कर पता नहीं क्या बुदबुदाते रही थी.
मैं उसके चेहरे की तरफ देखने लगता हूँ.उसके माथे पर लगा लाल टिका बारिश में भींगने से माथे पर फ़ैल गया था..मैं अपनी जेब में हाथ डालता हूँ और सोचता हूँ की रुमाल निकालकर उसके माथे पर फैले लाल टिके को पोछ दूँ..लेकिन पता नहीं किस संकोच से मैं रुमाल नहीं निकाल पाता.बारिश के फुहारों के साथ हवा भी चलने लगी, जिससे उसकी जुल्फें हवा में लहराते हुए मेरे चेहरे पर आकार टिक गए थे, मैं उन्हें हटाने की कोशिश भी नहीं करता और अपने चेहरे पर युहीं उसकी जुल्फों को टिके रहने देता हूँ.

कुछ देर बाद उसने आँखें खोली और कुछ जादू का मंत्र-सा पढने लगी...उसने लॉक हुई उन हथेलियों पर एक फूंक लगाईं, वो जैसे जादूगर लगाते हैं न...ठीक वैसे ही..और कहने लगी "देखना अब जब मैं ये दुपट्टे का बंधन खोलूंगी तो हम दोनों की हथेलियाँ हमेशा के लिए एक दुसरे से जुड़ जायेंगी".मैं उसकी इस बेतुकी बात पर चाह कर भी हँस नहीं पाया.

उसने दुपट्टे को हटाया तो कुछ पल के लिए हथेलियाँ वैसे ही रही, एक दुसरे के ऊपर ठहरी हुई..वो बेहद खुश हो गयी और चहकने लगी..लेकिन जैसे ही दुसरे पल मैंने अपनी हथेलियों को उसकी हथेलियों पर से उठा लिया वो एकदम निराश सी हो गयी.


"नहीं जुड़ा...मुझे लगा था की हमारी हथेलियाँ जुड़ी रहेंगी.." उसने कहा और अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया..मुझे ये भ्रम हुआ की वो भर्राये गले से बोल रही है.
ऐसा अक्सर उसके साथ होता है, वो अपनी इन पागलपन वाली हरकतों को, अपने इललॉजिकल खेल को सच समझ बैठती है और बाद में जब खेल का उसके मन मुताबिक परिणाम नहीं निकलता तो वो उदास हो जाती है.मैं उसे कुछ कहना चाहता हूँ की तभी उसे अचानक कुछ याद सा आ जाता है....
अपने चेहरे को मेरी तरफ कर के वो कहती है - "ये हथेलियाँ नहीं जुड़ीं तो चलो कोई बात नहीं...लेकिन इतनी देर जो मेरी हथेलियाँ तुम्हारी हथेलियों से बंधी रहीं, लॉकड रही..जो गर्माहट मैंने महसूस की वही गर्माहट तुमने भी महसूस की न?"...उसके इस प्रशन पर मैं कुछ भी नहीं कहता और बस अनिश्चित भाव से उसकी तरफ देखता हूँ..वो मेरा जवाब "हाँ" समझ लेती है....
"इतना काफी है मेरे लिए, जो गर्माहट मैंने महसूस की वही तुमने...तुम जानते हो, जब तक तुम्हारी हथेलियाँ मेरी हथेलियों में लॉक थी, और मैं आँखें बंद कर वो स्टुपिड मन्त्र पढ़ रही थी, मुझे लग रहा था की मेरी हथेलियाँ तुम्हारी हथेलियों में पिघल कर एक हो रही हैं, इसलिए मुझे विश्वास सा हो आया की हमारी हथेलियाँ जुडी रहेंगी...लेकिन गेस व्हाट...आई एम सच अ स्टुपिड गर्ल".

वो एकटक से मुझे देखने लगी.वो मुझे ऐसे देख रही थी जैसे आँखों से वो बहुत कुछ और भी कह देना चाह रही हो..शायद जो वो कहना चाह रही थी मैंने उन शब्दों को पढ़ भी लिया था.
मैं भी उससे बहुत कुछ कहना चाह रहा था, शायद ये की जब वो आँखें मूँद कर बुदबुदा रही थी, तो मैं क्या महसूस कर रहा था...लेकिन मैं चाह कर भी कुछ भी न कह सका...और बस इतना ही कह पाया...
"चलो अब चलते हैं यहाँ से".

उसने भी कोई जिद नहीं की और हम पार्क के बाहर आ गए.


उस रात अपने कमरे में लेटे हुए मैं दिन भर की बातों को याद करने लगा..सच कहूँ तो सिर्फ एक ही बात मुझे याद आ रही थी...उसने अपनी हथेलियों में मेरी हथेलियों को लॉक कर लिया था और वो सोचती थी की ये ऐसे ही रहेंगे...जुड़ जायेंगे.अपने बिस्तर पर लेटे हुए मैं बहुत देर तक अपनी हथेलियों को देखता रहा और सोचने लगा की वो जो पल जो गुज़रा था उसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा.मुझे उसका चेहरा याद आने लगता है, लाल टिका उसके माथे पर पसरा हुआ, बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर ठहरी हुई और उसकी जुल्फें मेरे चेहरे पर अटकी हुई.मैं आँखें बंद करता हूँ और सोने की कोशिश करने लगता हूँ..मुझे पता भी नहीं चलता की कब धीरे धीरे नींद मुझे अपने आगोश में समेट लेती है.

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Saturday, June 15, 2013

दिल्ली डायरी ३

-- दिल्ली डायरी १ -- दिल्ली डायरी २ --

मैं बहुत खुश था, कुछ दिन पहले तक जिन परेसनियों से मैं घिरा रहा था, उनसे कुछ समय के लिए ही सही आज़ादी मिल गयी थी.दिल-दिमाग कुछ शांत सा हो गया था.तीन दिन दिल्ली में ऐसे बीते थे की लगा बहुत अरसे के बाद मैं इतना खुश रहा हूँ...हँसा हूँ और किसी के साथ बैठकर इतनी देर बातें की है..अपनी दोस्त के साथ दिल्ली में बिताये उन दो दिनों में ही मुझे दिल्ली से इश्क हो गया था.पिछले दिनों के जिन हादसों से मुझे अन्दर तक तोड़ दिया था, दिल्ली में आकर जैसे मुझे एक नयी उर्जा मिल गयी थी.मैं बेहद पोजिटिव माइंडसेट से वापस अपने शहर जाने के लिए तैयार था.

हमारी ट्रेन जो की एक तरह से ख़ास ट्रेन थी(समर स्पेशल)..वो अपने "स्पेशल" के टैग का लाज रखते हुए लगभग छः घंटे लेट चल रही थी.ट्रेन का लेट होना कोई बड़ी दिक्कत की बात नहीं थी जितना ये की मेरा टिकट कन्फर्म नहीं था.हम चार लोग थे..मैं,मेरा दोस्त, वो..और उसकी दीदी.उसका और दीदी का टिकट कन्फर्म था इसलिए हमें ज्यादा चिंता नहीं थी लेकिन फिर भी हम चाहते थे की हमारे टिकट कन्फर्म हो जाए ताकि सफ़र में कोई परेशानी न हो...
टिकट कन्फर्म कराने के चक्कर में ही मैं स्टेशन वक़्त से कुछ पहले पहुँच गया था, पहुंचा तो मालुम चला की ट्रेन छः घंटे बाद खुलेगी.मैंने चाहा की उसे फोन कर के बता दूँ की आराम से आये.लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.मैंने फोन किया और सिर्फ फोन की घंटी बजती रही, वो घर से स्टेशन के लिए निकल चुकी थी.

स्टेशन के बाहर सीढ़ियों पर मैं अपने दोस्त के साथ उसके आने का इंतजार कर रहा था.वो सामने से अपनी दीदी के साथ आते दिखी..अपने उसी 'दिल्ली-लुक' में - हैट,गौग्ल्ज ,जींस और कुरते में. उसे देखते ही मैं हँस पड़ा था...मेरी हँसी देखकर उसके चेहरे का भाव कुछ अजीब तरह से बदल गया, जिससे ये तो साफ़ साफ़ पता चल रहा था की उसे मेरा इस तरह से हँसना पसंद नहीं आया था..कायदे से तो ऐसे मौके पर उसे भड़क जाना चाहिए था, लेकिन वो पास आई और एक टफ लुक देने की कोशिश करते करते वो खुद ही हँस पड़ी..

"मुझे ऐसे मत देखो न तुम..ऐसी ड्रेसिंग तो आज की सभी लड़कियां करती हैं". उसने कहा,  और मेरी नज़रों से बचते हुए कोने में बने बैठने की जगह पर जाकर वो बैठ गयी.

हम इधर इस बात पर विमर्श कर रहे थे की आगे क्या किया जाए, यहाँ रुका जाए या फिर कहीं चला जाये ..लेकिन उसे इन सब बातों से कोई ख़ास मतलब नहीं था..वो कोने में चुपचाप बैठी कॉमिक्स की एक किताब पढ़ रही थी.हमने तय किया की हम स्टेशन के वेटिंग रूम में ही बैठकर इंतजार करेंगे.

हम सामन लेकर वेटिंग रूम में आ गए थे...मैंने सुझाव दिया की क्यों न हम क्लॉक रूम में सामान रख कर आसपास के मार्केट घूम आयें...वो मेरे इस सुझाव से एकाएक बहुत इक्साइटेड हो गयी..जैसे वो ऐसे ही किसी सुझाव का इंतजार कर रही हो..दीदी ने लेकिन बाहर घुमने जाने पर असहमति जताई...वो अपने दो साल के बेटे को साथ लेकर बाहर घुमने नहीं जाना चाह रही थी.उन्होंने हमसे कहा की अगर हम चाहे तो घुमने जा सकते हैं...हम तो जैसे दीदी के इस अप्रूवल का ही इंतजार कर रहे थे..
मैंने अपने दोस्त को साथ चलने के लिए कहा, लेकिन उसने साफ़ इंकार कर दिया..मुझे उसके इंकार करने की वजह मालुम थी.वो लड़कियों से बात करने या फिर उनके साथ समय बिताने से हिचकिचाता था.और जब भी वो मेरे साथ होती थी, वो हमेशा उसके साथ समय बिताने से बचना चाहता था..वो शायद बहुत शरमा सा जाता था उसके सामने...इसलिए दीदी को और अपने उस दोस्त को वेटिंग में ही बैठा छोड़ हम दोनों बाहर निकल आये.

पहाड़गंज मार्केट
नई दिल्ली स्टेशन के बाहर खड़े होकर उसने कनौट प्लेस जाने की जिद की.,,लेकिन मैं वहां न जाने की बात पर अड़ा रहा.वैसे तो समय हमारे पास बहुत था और हम आराम से कनौट प्लेस से घूम कर आ सकते थे...लेकिन फिर भी मुझे डर था की हम लेट न हो जाएँ.हम कनौट प्लेस की तरफ न निकल कर सामने पहाड़गंज के मार्केट की तरफ घुमने निकल पड़े.

पहाड़गंज मार्केट में सड़कों के किनारे लगे दुकाने देखकर उसने मुझे वो सब चीज़ें गिनाने शुरू कर दिए जो वो खरीदना चाह रही थी..मैं भी उसकी बातों को ध्यान से सुनने का ढोंग कर रहा था, सच कहूँ तो उसकी उस लिस्ट को मैं पिछले दो दिनों में जाने कितनी बार सुन चूका था और मुझे लिस्ट में लिखी सभी चीज़ों के नाम याद से हो गए थे.

हम थोड़ी दूर आये थे की एक गली के पास आकर मैं रुक गया..गली की तरफ इशारा कर के मैंने उसे वो होटल दिखाया मैंने पिछली तीन रातें बिताई थी...वो एकटक से उस गली को देखने लगी..और दूर से ही होटल के बिल्ल्डिंग को और होटल के साईनबोर्ड को ध्यान से पढने लगी...

"होटल स्कॉट..तुम यहाँ रुके थे?...कैसा अजीब सा नाम है,कैसी अजीब सी गली में है ये होटल....ऐसे होटल में मत रुका करो" उसने कहा मुझसे.

"क्यूँ, नाम में ऐसा क्या है?" मैंने थोडा क्यूरोसिटी  दिखाते हुए पूछा.

"एक तो...एक तो ये ठीक जगह नहीं है...ऊपर से...यहाँ...ये...ये ..देख नहीं रहे, इस होटल का नाम इंग्लिश है, ऐसे विदेशी नामों वाले होटल में विदेशी लोग रहते हैं...तुम ऐसे होटल में रहोगे तो लोग तुम्हे भी विदेशी समझने लगेंगे".उसने कुछ झिझकते हुए कहा था..

उसने फिर से एक बेमतलब लॉजिक सामने रखा था,  लेकिन मैं समझ गया था की वो क्या कहना चाह रही थी...वो कुछ दूसरी बात कहते कहते बीच में रुक गयी थी और एक बेमतलब सा लॉजिक देकर उसने जानबुझकर बात को दूसरी तरफ मोड़ दिया था.कोई और वक़्त होता तो मैं उसके उस लॉजिक पर उसकी जम कर खिंचाई करता लेकिन उस दिन मैंने कुछ भी नहीं कहा..

हम कुछ देर युहीं साथ चलते रहे थे...वो हर दूकान के आगे रुकते जा रही थी और मैं बार बार आगे बढे जा रहा था, पीछे मुड़कर देखता तो वो साथ नहीं चल रही होती और किसी दूकान के आगे खड़ी होकर चीज़ों को निहारते दिखती वो...उसके इस तरह हर दूकान पर रुक जाने से मैं थोड़ा चिढ़ रहा था, लेकिन चिढ़ ज्यादा इस वजह से थी की वो बिन बताये ही दूकान पर रुक जाया कर रही थी..और मैं आगे बढ़ जा रहा था.

"कहीं भी रुक जाती हो...कम से कम एक आवाज़ तो दे सकती हो" मैं थोड़ा इरीटेट सा हो गया था और गुस्से में कहा उससे "हर दूकान में तुम्हे जाने की क्या जरूरत होती है....".

मेरी इस डांट का उसने हँसते हुए जवाब दिया था "लड़कियों के साथ घुमने की आदत डाल लो, कुछ मैनर्स सीख लो...आगे आगे बढ़ के चलोगे तो ऐसे ही चिढ़ते रहोगे...साथ साथ या पीछे चलो..तब कुछ नहीं होगा".उसने हँसते हुए इतनी मासूमियत से ये बात कही की मेरा सारा गुस्सा काफूर हो गया.

शायद मेरी उस डांट ने कुछ ज्यादा असर कर दिया था...वो एकदम शांत सी होकर चलने लगी...हर दूकान के आगे वो रुक भी नहीं रही थी...कभी कभी किसी दूकान के आगे उसके पैर ठिठक जाते थे लेकिन बिना रुके वो जल्दी ही आगे बढ़ जा रही थी.मुझे उस वक़्त अपनी उस बात पर बहुत पछतावा हो रहा था.."बेकार में ही उसे डांट दिया" मैंने सोचा. मैंने उसे कहना भी चाहा की तुम्हे दूकान में जो कुछ भी देखना हो तुम देख लो, मैं डाटूंगा नहीं.लेकिन मैं चुप ही रहा.मैं सोचने लगा की क्यों मैं अक्सर गलत शब्दों को गलत वक़्त पर चुन लेता हूँ और बाद में अपने कहे शब्दों पर पछताता हूँ.

कुछ देर तक हम युहीं साथ चलते रहे बिना कुछ कहे...वो पता नहीं किस सोच में थी...जब भी वो ऐसे किसी सोच में डूब जाती थी तब मैं थोड़ा चिंतित सा हो जाता...ये सोच कर की उसे किस तरह मैं संभालूँगा.वो बहुत ज्यादा देर चुप रहती थी  तो अक्सर उसके आँखों से आंसूं निकलने लगते थे.उस दिन मुझे इस बात की चिंता होने लगी थी, लेकिन मेरी वो चिंता बेमतलब की थी...उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था.

हम घूमते घूमते एक छोटे से कैफे के पास आकर रुक गए...उसकी ईच्छा हुई की यहाँ कुछ खाया जाए....और दीदी के लिए भी कुछ यहाँ से पैक करवा लेंगे.उस कैफे में प्रवेश करते ही हम दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था...पहाड़गंज की एक संकड़ी सी गली में बाहर से दिखने वाला बिलकुल ही साधारण सा कैफे अन्दर से इतना खूबसूरत भी हो सकता है, इसकी हम दोनों ने कल्पना भी नहीं की थी.हम कोने की एक टेबल पर बैठ गए.यूँ तो उस कैफे में सभी चीज़ों के दाम भी हमारी कल्पना से ज्यादा थे,लेकिन हम उस सुन्दर से कैफे में आकर इतने खुश थे की थोड़ा ज्यादा दाम देना हमें कुछ ख़ास अखरा नहीं...मैंने अपनी बची खुची पौकेट मनी का एक बड़ा हिस्सा कैफे के मेनू पर कुर्बान कर दिया था..

सैंडविच का एक टुकड़ा मुहं में लेते हुए अचानक से एक शेर उसके जुबान पर चढ़ आया था...
"जिगर और दिल को बचाना भी है/ नज़र आप ही से मिलाना भी है
 महब्बत का हर भेद पाना भी है / मगर अपना दामन बचाना भी है"

मैं हतप्रभ सा होकर उसे देखने लगा...मेरी आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी...मैंने कभी नहीं सोचा था की वो कभी मुझे शेर सुना पाएगी..."शायरी बड़े-बूढ़े लोगों का काम है" यही कहती थी वो.लेकिन आज उसने इतना खूबसूरत शेर कह दिया, मैं तो बिलकुल दंग रह गया था.

"किसने लिखा है ये?" मेरे पूछने पर उसने मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा था - "मैंने लिखा है..खुद मैंने".

उसकी आँखें उस वक़्त इतनी साफ़...निश्चल और मेरे चेहरे के इतने पास थीं की ना चाहते हुए भी मुझे उसपर विश्वास करना पड़ा था.बाद में मैंने अपनी डायरी में वो शेर नोट कर लिया था और उसके नीचे उसका नाम लिख दिया था.

कुछ साल बाद जब शायरी पढने का सलीका आया और कुछ शायरों की शायरी पढ़ी तो एक दिन मजाज लखनवी की एक ग़ज़ल पर नज़र गयी और शुरू के दो शेर पढ़कर मैं हतप्रभ सा रह गया.ये वही शेर थे जो उसने मुझे सुनाये थे..पहाड़गंज के उस कैफे में और जिसे मैंने बाद में अपनी डायरी में नोट कर लिया था, उसके नाम के साथ.मुझे एकाएक हँसी आने लगी और इस बात पर काफी अचरज भी हो रहा था की उसने मजाज़ का शेर उन दिनों कैसे और कहाँ से पढ़ लिया होगा.मेरी उस डायरी के पन्ने पर वो शेर अब तक लिखा हुआ है..लेकिन मैंने उन दो पंक्तियों के नीचे से उसका नाम कभी हटाया नहीं..बल्कि जब मुझे जब पता चला की शेर मजाज साहब का है तब मैंने शेर के नीचे उनका नाम लिखने के बजाये उसके ही नाम को बड़े बड़े अक्षरों में एक स्केच पेन से हाईलाईट कर के लिख दिया था.वो नाम आज भी वैसे ही है और अब भी जब कभी वो शेर कहीं पढ़ लेता हूँ तो मुझे मजाज़ साहब का ख्याल नहीं आता, लगता है सच में ये शेर उसने ही लिखा था.

शायद उस शाम उसे शायरी का रोग सा लग गया था या कोई शायर की आत्मा उसके ऊपर हावी हो गयी थी...कैफे से निकलने के बाद से लेकर वेटिंग रूम में पहुँचने के बीच उसने कई शेर कह दिए थे..बिलकुल ही शायराना अंदाज़ में वो बातें कर रहीं थी.कहीं कहीं से सुने कुछ अंग्रेजी के कुछ हिंदी की कविताओं की पंक्तियाँ वो लगातार दोहरा रही थी...वेटिंग रूम में बैठे हुए उसने पता नहीं कहाँ  से सुना हुआ अंग्रेजी का एक कोट दोहराया था.."True love comes quietly, if you hear bells, get your ears checked"..
मजे की बात ये थी की वो जो कुछ भी कह रही थी हर कुछ को वो खुद का लिखा बताती थी...और मैं बेवकूफों की तरह उसकी बात पर यकीन भी कर लेता था...उसकी ये चोरी बहुत बाद में पकड़ी गयी थी.

उस शाम सिर्फ शायरी ही नहीं...वो अजीब बहकी बहकी बातें भी कर रही थीं, हम तीनों का उसकी बातों पर हँसते हँसते बुरा हाल था.प्लेटफोर्म पर जब हम पहुंचे और ट्रेन को आने में थोड़ी और देर हो गयी तो उसने लगभग चिल्लाते हुए कहा था "अरे अब आ भी जा कमबख्त...." आसपास की कुछ नज़रें हमारी तरफ मुड़ गयीं थीं...दीदी ने उसे चुप कराने की कोशिश की लेकिन वो वहां प्लेटफोर्म पर खड़े ट्रेन को जी भर कोस रही थी...."I swear...i'm gonna kill this bloody train..." उसने गुस्से में कहा था...शायद उसकी ये धमकियों को ट्रेन ने सच में सुन लिया होगा और वो जल्द ही आकर प्लेटफोर्म पर लग गयी.

मेरा और मेरे दोस्त का टिकट आखिरी वक़्त तक कन्फर्म नहीं हुआ था...दीदी ने हमें अपने बर्थ के पास ही आ जाने के लिए कहा.हम उन दोनों के बर्थ के पास आकर बैठ गए..दीदी के कॉलेज के किस्से जो वेटिंग रूम में अधूरे रह गए थे वो उन्हें पूरा करने लगीं...और हम तीनों उनके कॉलेज के दिनों की यादों को बड़े चाव से सुन रहे थें.दीदी बहुत देर तक जाग नहीं सकीं और वो सोने चली गयीं.मेरे दोस्त को इतनी तेज़ नींद आ रही थी की वो दीदी की बातों के बीच में ही बैठे बैठे एक कोने में सो गया था.सिर्फ हम दोनों जाग रहे थे.उसने मुझे कैफे में ही कह दिया था..."आज तुम ट्रेन में सो मत जाना..हम पूरी रात बातें करेंगे".

"तुम जानते हो ट्रेन में हम वो सब सोच लेते हैं जो आमतौर पर हम सोच नहीं पाते..मुझे तो ट्रेन के सफ़र में अक्सर बड़े वीयर्ड लेकिन कमाल के ख्याल और आइडिया आते हैं" उसने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा था.
मैंने पहले कभी ऐसा नहीं सोचा था, और मुझे लगा की वो शायद ठीक ही कह रही है.वो बहुत देर तक अपने सभी वीयर्ड और पागलपन वाले ख्यालों को एक एक कर के गिनाते रही थी, जो की मैं लगभग भूल सा गया हूँ...सबसे वीयर्ड जो उसने उस रात बात कही थी, बस वो याद रह गयी - "जानते हो मुझे हमेशा से सुपरपावर वाले स्टफ़ बड़े फैस्नेट करते हैं...मैं सोचती हूँ की कितना अच्छा होता अगर मेरे हाथ कोई सुपरपावर आ जाए.. मैं बस अपनी उँगलियों से इशारा करूँ और कुछ करामात हो जाए...किसी के कंधे पर हाथ रख दूँ और उसका सारा दुःख दूर हो जाए(मुझे याद आने लगा की वो हमेशा मेरे कंधे पर हाथ रखती थी)...मैं ट्रेन पर हमेशा ये बात सोचती हूँ की अगर मेरे पास कोई सुपरपवार आ जाए तो मैं क्या क्या करुँगी".वो ऐसे कई बातें गिनाती आ रही थी...

हम रात भर जागे रहे थे...उसके साथ उस रात ट्रेन पर बीता वक़्त बहुत अच्छा लग रहा था.मुझे रह रह कर उस दिन की बातें याद आ रही थी जब हम लखनऊ से वापस आ रहे थे, और वो रास्ते भर बीमार रही थी.कुछ वैसा ही यादगार ये सफ़र भी बीत रहा था..सुबह के वक़्त एक स्टेशन पर मैं चाय लेने नीचे उतरा और जैसे ही ट्रेन खुलने लगी थी, उसने इतने जोर से मुझे आवाज़ देकर बुलाया था की मैं भी जल्दबाजी में भागते हुए ट्रेन पर चढ़ गया था, जल्दबाजी में चाय वाले से छुट्टे पैसे लेना भी भूल गया और पुरे पचास रुपये उसके हवाले कर आया था.उसने कहा की वो डर गयी थी की कहीं मैं पीछे न छुट जाऊं.

हमारी ट्रेन रास्ते में और दो घंटे और लेट हो गई थी, और दोपहर के वक़्त पहुंची थी....सुबह से लेकर दोपहर तक का सारा वक़्त फिर से दीदी के किस्सों को सुनते हुए बीता था. मैं बहुत खुश था, मैं दिल्ली की बहुत सी खूबसूरत यादों को साथ लेकर वापस अपने शहर पहुंचा था...और एक बिलकुल पोजिटिव एनेर्जी खुद में महसूस कर रहा था.मुझे रह रह कर दिल्ली में बिताये उन तीन दिनों की याद आ रही थी..उन यादगार लम्हों की याद जिसे मैंने अपनी सबसे अच्छी दोस्त के साथ बीताये थे...और जो हमेशा हमेशा के लिए मेरे दिल में फ्रीज़ होकर रह गयीं..

अब सोचता हूँ तो बड़ा 'फनी' लगता है की दस साल बाद मैं इस शहर में रहने लगा हूँ, और ये जून का महिना है और अब भी मैं उन जगहों पर घूमता हूँ जहाँ उन तीन दिन तक उसके साथ घूमता रहा था..जब भी कनौट प्लेस के गलियारों में टहलता हूँ, तो मुझे याद आता है की कनौट प्लेस की बेंच पर बैठकर उसने मेरे से कहा था "देख लेना आज से दस बारह साल बाद जब हम इस शहर में रह रहे होंगे तब हम इस बात को याद कर के हसेंगे की हम यहाँ के महंगे होटल अफोर्ड नहीं कर सकते थे इसलिए सारा दिन ट्रोली वाली आईसक्रीम खाते रहे थे...".आज उस बात को बीते दस साल हो भी चुके हैं और सच कहूँ तो अब ये एक भ्रम सा लगता है, किसी दुसरे जन्म की बात सी लगती है...यकीन ही नहीं होता की आज से दस साल पहले मैंने कभी तीन दिन उसके साथ बिताये थे.

पहाड़गंज में अब भी वो होटल स्कॉट है उसी गली में जहाँ उसके पाँव ठिठक गए थे और वो कुछ कहते कहते रुक गयी थी.वो कैफे भी अब भी वहीँ हैं...बारिश की एक शाम जब उस कैफे के आगे से गुज़र रहा था तो कुछ देर सड़क पर खड़े रहकर उस कैफे को देखता रहा..अन्दर जाने की मेरी कोई ईच्छा नहीं हो रही थी..लेकिन तभी एक पागलपन सा ख्याल भी आया की मैं कैफे के अन्दर जाऊं और पूछूं की आज से दस साल पहले हम यहाँ आये थे और उस कोने वाले टेबल पर हम बैठे थे...और वहां मेरी दोस्त का एक रुमाल और बालों के क्लिप छुट गए थे..क्या मुझे वो मिल सकते हैं अब?. मैं अपने इस ख्याल पर खुद ही हँसने लगता हूँ और सोचने लगता हूँ की मैं भी उसकी तरह बातें करने लगा हूँ, उसके जैसे ही सोचने लगा हूँ.

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A Note of thanks to Priyanka didi(priyanka gupta) जिनकी वजह से ये पोस्ट और इसके पहले वाली पोस्ट पूरी हो पायी है.मैंने इस पोस्ट को लिखने का इरादा छोड़ दिया.वो दो हफ़्तों से लगातार फोन पर मुझसे इस पोस्ट को पूरा करने की जिद न करती तो शायद ये पोस्ट मैं लिखता भी नहीं,So this one is for you didi!

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Saturday, June 1, 2013

दिल्ली डायरीज : २




ऑटो वाले ने हमें सीधा पालिका बाजार के सामने वाली सड़क के पास छोड़ा था.ऑटो वाले को मैं पैसे देने ही वाला था की उसने मेरा हाथ पकड़ के पीछे खींच लिया.."नो वे मिस्टर..आप मेरे शहर में आये हैं..यहाँ आप पैसे नहीं दे सकते..वरना ये शहर मुझे ये कहकर ताने मारेगा की अपने दोस्त से खर्च करवा दिया तुमने...आपको बस अपने शहर में मेरे लिए पैसे देने की इज़ाज़त है".मैंने भी उसके इस बात का कोई विरोध नहीं किया..और उलटे उससे कहा "अच्छा ये बात है...तो देखो, सामने आइसक्रीम की एक ट्रौली है...चलो मुझे खिलाओ आईसक्रीम".
"वाऊ  ये हुई न बात...कम औन!! अभी आईसक्रीम खिलाती हूँ." वो लगभग उछलते कूदते हुए उस आइसक्रीम वाले के पास पहुँच गई थी..और मैं उसके पीछे पीछे..

आइसक्रीम लेने के बाद जैसे ही हम दोनों आगे बढे तो एकाएक एक धुल भरी आंधी उठी...हम दौड़ते हुए से पालिका के गेट के पास आकर खड़े हो गए.उसने अपना चेहरा मेरे कंधे के पीछे छिपा लिया था और तब तक उसने अपना चेहरा छिपाए रखा जब तक आंधी थोड़ी थम नहीं गयी.मैंने पालिका बाज़ार का नाम बहुत सुना था और अन्दर घूमना चाहता था..लेकिन उसने पालिका के अन्दर जाने से साफ़ मना कर दिया.एक टीचर की तरह मुझे धमकाने लगी  "ख़बरदार जो अन्दर गए तो...ये भी कोई घुमने की जगह है".
मैंने कहा उससे की पालिका बाज़ार के गेट के पास खड़े होकर अन्दर न जाना कितना अजीब होगा...उसे शायद मेरे पर दया आ गयी थी.थोड़ी नरमी दिखाते हुए उसने कहा "ठीक है, हम एक चक्कर लगाकर वापस आ जायेंगे.उसकी इस नरमी पर मैं खुश हो गया था.हम जब पालिका बाज़ार का एक चक्कर लगाकर बाहर आयें तब तक मौसम भी बहुत हल्का हो चूका चका था और धुप लगभग गायब सी हो गयी थी.

वो अपने गाईड के रोल में फिर से वापस आ गयी थी..."पता है ये पूरा कनौट प्लेस सर्कल/ब्लॉक में बंटा हुआ है..तुम्हे यहाँ सर्दियों में या फिर किसी बारिश के दिन आना चाहिए तब कनौट प्लेस की खूबसूरती देखते  बनती है.सर्दियों में हर दिन यहाँ लोगों का जमावड़ा लगा रहता है..यहाँ बने सीमेंट की बेंच दिन भर लोगों से भरी होती हैं...सामने जो पार्क दिख रहा है उसे सेन्ट्रल पार्क कहते हैं...जाड़ों में लोग दिन भर यहाँ बैठे रहते हैं..छुट्टियाँ में वो यहाँ आ जाते हैं...धुप सेंकते हैं..पिकनिक मनाते हैं.मैं भी क्रिसमस की छुट्टियों में जब आती थी तो हर सन्डे हम सेंट्रेल पार्क या फिर इंडिया गेट के पास पिकनिक मनाते थे.अभी तो गर्मियों के दिन हैं इसलिए यहाँ दोपहर में भीड़ कम होती है.लोग शाम में आते हैं.आज देखो थोड़ी भीड़ जो नज़र आ रही है वो इसलिए है की ये वीकेंड है न..लोग घुमने फिरने निकल जाते हैं.
"वीकेंड?वीकेंड क्या?" मेरे मुहँ से ये प्रश्न ना चाहते हुए भी निकल गया था..जबकि मुझे भी पता था वीकेंड क्या होता है, बस उस समय ये शब्द ज्यादा सुनने को नहीं मिलता था.ऐसे कई शब्द थे जो वो बोल देती थी और मैं विस्मित सा उसे देखने लगता था.उसे लगता की मुझे सच में उनके अर्थ नहीं मालुम हैं, और वो मुझे उनके अर्थ समझाने लगती.मैं बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनता, वो तरह तरह के उदाहरण देकर अपनी बातें समझाया करती थी.उसे काफी अच्छा लगता था जब वो वैसी कोई बात जानती थी जो मुझे मालुम नहीं होता था.वो उन बातों को मुझे समझाने का कोई मौका नहीं छोड़ती नहीं.
"हाँ वीकेंड..".उसने कहा.."देखो मुझे इसका हिंदी अर्थ नहीं पता लेकिन सप्ताह के आखिरी दिन को वीकेंड कहते हैं...अब इसका मतलब ये नहीं की सप्ताह का आखिरी दिन सन्डे...मतलब आखिरी काम करने वाला दिन...जैसे फ्राइडे...हाँ, यहाँ कई जगह शनिवार और रविवार दोनों दिन छुट्टियाँ होती हैं.सो यू सी वीकेंड में लोग घुमने निकल जाते हैं.

सो यु सी - ये तीन शब्द उसने पुरे दिन में बहुत बार कहा था...अलग अलग सिचूऐशन में...अलग अलग तरीकों से...वो अक्सर अपने कुछ फेवरिट शब्द चुन लेती थी और उसे बातचीत के दौरान बार बार दोहराते रहती थी.उसे इस बात की फ़िक्र नहीं होती थी की उसका वो शब्द उस पुरे वाक्य में फिट बैठ रहा है या नहीं.मेरे साथ बातचीत के दौरान वो अक्सर अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करती थी और अक्सर मुझसे सवाल अंग्रेजी में पूछती थी इस उम्मीद से की मैं भी उसे अंग्रेजी में ही जवाब दूंगा...लेकिन मैं हमेशा हिंदी में जवाब देकर उसे निराश कर देता था...जिससे वो थोड़ी चिढ़ सी जाती थी और हमेशा एक ही बात दोहराती थी..."यु आर सच अ होपलेस केस"

उसके उस वीकेंड के ज्ञान को सुनने के बाद हम घूमते घूमते एक आईसक्रीम की ट्रोली के पास आकर खड़े हो गए.उसे आईसक्रीम खाने की तलब हुई थी.उसने मुझे पहले ही समझा दिया था की "देखो, ना तो तुम्हारे पास उतने पैसे हैं और ना ही मेरे पास की कनौट प्लेस के महंगे महंगे रेस्टोरेन्ट में जाकर कुछ खाए, तो हमें अपना पेट इस आईसक्रीम से ही भरना पड़ेगा".
हम कनौट प्लेस के दो ब्लॉक के बीच खड़े थे और वहां सड़क का तिकोना फुटपाथ बना हुआ था.वहां कई सारे कबूतर जमा हो आये थे, लोग उन्हें दाना खिला रहे थे..जैसे ही आसपास से कोई गाड़ी गुज़रती वो सारे  कबूतर एक साथ आसमान की तरफ उड़ जाते..वो उन कबूतरों को बड़े गौर से देख रही थी.और फिर अचानक वो उनके तरफ दौड़ गयी...उसके दौड़ते ही सारे के सारे एकसाथ उसके सर के ऊपर से उड़ने लगे.उसने कुछ क्षण अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया और फिर आसमान की तरफ नज़रें उठाकर उन्हें उड़ते हुए देखने लगी.वो कुछ देर उन्हें आसमान में उड़ते देखते रही थी और फिर धीरे से मुझसे कहती है "I want to fly like a bird".मैं उसकी इस बात कर कुछ भी नहीं कहता, और उसे देख सिर्फ मुस्कुराने लगता हूँ.वो फिर से अपना कहा वाक्य दोहराती है "I really want to fly like a bird".मुझे याद आता है की वो हमेशा पंछियों से काफी फैसनेट होती आई है.शुरू की एक मुलाकात में भी वो एकटक से खिड़की से बाहर पेड़ों की शाखाओं पर बैठे पंछियों को देख रही थी...और फिर बहुत बाद की एक शाम में उसने किसी पार्क की ही बेंच पर बैठे जाने किस बात पर मुझसे कहा था "थाम लेना अगर देखो मुझे उड़ते हुए".


हम कुछ देर तक कनौट प्लेस के गलियारों में घूमते रहे थे और फिर थक कर एक सीमेंट की बेंच पर बैठ गए.एकाएक मेरी नज़र घड़ी पर गयी..साढ़े छः बज रहे हैं...मैंने कहा उससे..."अब तुम्हे जाना चाहिए...शाम हो गयी है".
"अरे डोंट वारी...ये दिल्ली है, मुझे दिक्कत नहीं होगी...कुछ देर बैठते हैं फिर चली जाउंगी.मुझे सिर्फ बीस मिनट लगेंगे जाने में" उसने कहा था.लेकिन मेरे थोड़ा गुस्सा दिखाने पर उसने कहा "अच्छा चलो उस कोने पर एक दूकान है जहाँ मुझे कुछ खाना है, उसके बाद मैं चली जाऊँगा".

उसके "उस कोने" का दूकान एक पान-दूकान था.मैंने बड़े आश्चर्य से पूछा उससे "तुम पान खाओगी??कब से शुरू कर दिया पान खाना?".उसने कहा की ये कोई चुस्की पान की दूकान है जो आम पानों सा नहीं होता और कनौट प्लेस की ये पान दूकान काफी मशहूर है.चुस्की पान?? ऐसा तो कोई नाम मैंने पहले कभी सुना नहीं था.वो मुझे बताने लगी की उस पान में क्या क्या डालते हैं..बहुत सारा बर्फ, मसाला और जाने क्या क्या(उसने क्या क्या बताया था मुझे कुछ भी याद नहीं).मैंने जब कहा की मैं ये पान नहीं खाने वाला तो उसने कई सारे तर्क देकर मुझे पान खाने के लिए कहा....."ये पान न बिलकुल हवा मिठाई सी होती है, मुहँ में डालते ही वैसे ही ये भी घुल जाती है जैसे हवा मिठाई.हवा मिठाई याद है न तुम्हे?" उसने मुझे पान खाने के लिए कई तरह से कन्विंस करना चाहा लेकिन मैं पान न खाने के मामले पर बिलकुल अडिग रहा.

"तुम नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाने वाली"..वो निराश होकर मेरे बगल में बैठ गयी.
मैंने देखा की उसे चुस्की पान खाने का बहुत मन था लेकिन सिर्फ इस गिल्ट की वजह से की मैं नहीं खाऊंगा  वो कुछ देर खुद को रोके रही..लेकिन ज्यादा देर खुद को वो रोक न सकी और अपने मन को अपने गिल्ट के ऊपर प्रायोरिटी देते हुए वो भागकर दूकान के पास पहुँच गयी.उसने एक चुस्की पान बनाने को कहा और मैं उस पानवाले को पान बनाते देख कर हैरत में था..इतने बड़े साइज़ का पान? वो इसे खाएगी कैसे? उस पान का साईज तो उसके मुहं से भी बड़ा दिखाई दे रहा था.मैंने देखा की उस दूकानवाले ने चुस्की पान उसके मुहं में ठूंस दिया था और तब मुझे लगा की मेरे पान न खाने का फैसला कितना सही था.
कुछ देर तक तो वो कुछ भी बोल ही नहीं पायी थी.सिर्फ उसके एक्स्प्रेसन लगातार बदल रहे थे...जिससे ये पता चल रहा था की वो उस पान को एन्जॉय कर रही थी..वो मुझे देख हंस रही थी लेकिन मुहं में पान होने की वजह से वो ना तो खुल के हँस पा रही थी और ना कुछ कह पा रही थी.करीब बीस तीस सेकण्ड बाद उसके मुहँ को थोड़ी रहत मिली होगी...और अपने दोनों पैरों पर एक पेंग्युन की तरह चलते हुए वो मेरे पास आई... "बेवकूफ हो तुम..तुम्हे खाना चाहिए था पान..ईट वाज़ वंडरफुल..!" उसने कहा और जोर से एक मुक्का मेरे पीठ पे दे मारा.

चुस्की पान खाने के बाद मैंने उसे ऑटो में बिठा दिया और वो घर चली गयी..उसने मुझे अगले दिन का कार्यक्रम समझा दिया था...अगले दिन मेरी एक परीक्षा थी और उस परीक्षा के बाद वो मेरे से मिलने वाली थी...उसने मुझे मिलने का जगह बताया अंसल प्लाजा, जो की मेरे परीक्षा के सेंटर से ज्यादा दूर नहीं था.उसके जाने के बाद मैं कुछ देर तक वहीँ उसी सीमेंट की बेंच पर बैठा रहा और फिर वापस होटल आ गया.होटल पहुँचते पहुँचते मुझे रात के आठ बज गए थे..मैंने होटल के फोनबूथ से उसे फोन किया और ये तसल्ली करने के बाद की वो सही सलामत पहुँच गयी है, मैं भी अपने कमरे में चला गया.मेरा दोस्त भी अपना काम निपटा कर वापस आ चूका था और हम कुछ देर बाद डिनर के लिए बाहर निकल गए.

वापस होटल पहुँच कर अगले दिन होने वाली परीक्षा के सारे कागज़, पेन-पेन्सिल एक जगह समेट कर रख देने के बाद मैं सोने चले गया..अच्छा खासा थक चूका था मैं...पुरे दिन तपती गर्मी में दिल्ली के एक कोने से दुसरे कोने घूमते रहा था..लेकिन फिर भी मुझपर थकान हावी नहीं हो रही थी..मन बहुत खुश था और दिन भर के सारे पल आँखों के सामने घूम रहे थे..आँखों से नींद गायब सी हो गयी थी..होता है न जब आप बहुत खुश होते हैं तो आपको उस रात जल्दी नींद नहीं आ पाती..उस रात भी मेरे साथ ऐसा ही हुआ था..आधी रात के बाद मैं थोडा सो सका था...

सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गयी थी...होटल की खिड़की से बाहर देखा तो दिल खुश हो गया था...आसमान में बाहर बादल छाये हुए थे..लगा जैसे की अच्छी बारिश होगी, लेकिन बारिश हुई नहीं बस पुरे दिन हलके बादल दिल्ली के आसमान पर छाये रहे थे.मैं जल्दी जल्दी तैयार होकर परीक्षा देने निकल गया.परीक्षा की तैयारी बहुत ख़ास तो नहीं थी लेकिन फिर भी परीक्षा उम्मीद से बेहतर हुआ था.परीक्षा देने के बाद मैं सीधा अंसल प्लाजा की ओर बढ़ गया.

उसने ठीक ही बताया था.अंसल प्लाजा जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई.ऑटो वालें ने दस मिनट में ही मुझे अंसल प्लाजा पहुंचा दिया था..उन दिनों मॉल होते नहीं थे, दिल्ली का भी शायद एकमात्र बड़ा मॉल था अंसल प्लाजा.टी.वी फिल्मों के अलावा मैं ज़िन्दगी में पहली बार किसी मॉल को सामने से देख रहा था.मैं तो आँखें फाड़ फाड़ कर मॉल के भव्यता को देख रहा था.बहुत ही विशाल और भव्य लगा था वो मॉल.मॉल के अन्दर प्रवेश करने में मुझे हिचक सी महसूस हो रही थी..फिर भी थोड़ा हिम्मत बाँधा..अपने कपड़ों को थोड़ा ठीक किया और सीधा मॉल के अन्दर प्रवेश कर गया.उसने कहा था की वो मॉल के गेट के आस पास खड़ी रहेगी.लेकिन वो कौन से गेट के आसपास रहेगी ये नहीं बताया था.मैंने पूछा भी नहीं था, मुझे क्या मालुम था की मॉल में दो तीन मुख्य द्वार होते हैं.सामने जो एंट्रेंस था वहां से मैं अन्दर प्रवेश किया..वो कहीं दिखी नहीं, मैं इधर उधर देखने लगा..दिल में डर ये था की ये मॉल इतना बड़ा है की कहीं उसे खोजने में ही शाम न हो जाए(अब सोचता हूँ तो लगता है की आज के ज़माने में कितना आसन होता है मोबाइल से कॉल कर के पूछ लेना की कहाँ हो, बताओ मैं आ रहा हूँ.लेकिन उन दिन कितनी अनिश्चिताएं होती थी..अगर आप जिसका इंतजार कर रहे हैं वो देरी से आये या नहीं आ पाए तो इस सोच से की वो क्यों नहीं आ पाया मन कितना बेसब्र हो जाता था).मैं थोड़ा बेसब्र होकर इधर उधर देख ही रहा था की वो दुसरे गेट के पास खड़ी दिखाई दी मुझे.मैं दौड़ते हुए उसके पास पहुंचा था.

हम बहुत देर तक अंसल प्लाजा में घूमते रहे थे.मॉल के अन्दर की ठंडी ए.सी की हवा अच्छी लग रही थी.वो मुझे भी अपने साथ विंडो शौपिंग करवाने लगी थी.वो हर दूकान के शो-विंडो के पास जाकर खड़ी हो जाती थी और चीज़ों को देखने लगती थी.एक जवेलरी के शोरुम के पास आकर उसने शो-विंडो में रखे एक नेकलेस की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा कहा "जब तुम नौकरी करने लगोगे तो मुझे ये खरीद देना..".हर शोरम में उसे जो चीज़ें पसंद आ जाती वो तब अपने वही शब्द दोहराती थी "जब तुम नौकरी करने लगोगे तो मुझे ये खरीद देना".

"एस्कलेटर" पर भी पहली बार मैं उसी के साथ चढ़ा था...अंसल प्लाजा मॉल में ही.उसने बड़े सावधानी से मेरे हाथों को पकड़ रखा था, लेकिन फिर भी पहली बार एस्कलेटर पर चढ़ते हुए मैं लड़खड़ा गया था...उसने मुझे अपने बाहों का सहारा देकर संभाला था.कोल्ड कॉफ़ी जैसी अद्भुत चीज़ भी पहली बार उसने ही मुझे पिलाई थी, उसी अंसल प्लाजा मॉल में.हमें मॉल घूमते घूमते शाम हो गयी थी.हमने तय किया की अब मॉल से निकल कर हम सीधा उसके मोहल्ले जायेंगे जहाँ वो रहती थी.उसे छोड़कर मैं वापस होटल आ जाऊंगा.

हम मॉल से निकले और सीधा बस पर बैठ गए.वो मेरे बगल में बैठी थी.आगे की सीट पर एक आदमी बैठा हुआ था जो अपने छोटे से ब्रीफकेस को अपनी गोद में रख कर उसपर तबले के जैसे ताल दे रहा था और कोई लोकगीत गुनगुना रहा था.उसे असल में गुनगना नहीं कहना चाहिए क्यूंकि वो बाकायदा गा रहा था और आवाज़ तेज़ भी इतनी थी की बस में बैठे सभी लोगों की निगाहें उस व्यक्ति पर आकर टिक गयीं थी.वो मेरे बगल में बैठी, उस आदमी को गीत गाता देख जाने क्यों खुश हो रही थी.उसने अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया था और बस की खिड़की से बाहर देखने लगी थी.

मैंने देखा की कुछ देर बाद वो मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मेरी उँगलियों से खेलने लगी थी.उसने मेरे हथेलियों को अपने हथेलियों में लॉक कर लिया और आँखें मूंदकर कुछ बुदबुदाने लगी.मैं उसके इतने पास बैठा था फिर भी मैं सुन नहीं पाया की वो क्या बुदबुदा रही है.मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश भी की लेकिन एक दो शब्दों के अलावा कुछ भी समझ नहीं आता था.मैंने अंदाज़ा लगाया की वो कुछ दुआ मांग रही है.जाने क्यों मुझे उस पल बेचैनी सी होने लगी.मैंने अपना हाथ उसके हाथों से छुड़ाना चाहा था, उसे टोका मैंने..."ये क्या कर रही हो"...लेकिन उसने मेरी हथेलियों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली थी...कुछ देर बाद उसने अपनी आँखें खोली और मुझसे कहा "सुनो, जब कोई दुआ मांग रहा हो तो उसे बीच में टोकना अपशुकन होता है".मुझे कुछ भी समझ नहीं आया था.उसने दुआ मांगी थी?कौन सी दुआ माँगी थी उसने और क्यों?अब सोचता हूँ तो लगता है की मैं समझ सकता हूँ की उस दिन वो मेरे हथेलियों को हथेलियों में लेकर क्या दुआ मांग रही थी.अब जब सोचता हूँ कभी तो एक बेतुका ख्याल ये भी आता है की शायद उस दिन मैंने उसे बीच दुआ में टोक दिया था इसलिए उसकी वो दुआ कुबूल नहीं हुई.

उस दिन बस में मेरे उसे टोकने के बाद उससे मेरी और कोई बात नहीं हुई थी..हम दोनों चुपचाप ही रहे..मैं उसे उसके घर के नज़दीक वाले बस स्टैंड पर छोड़कर वापस लौट आया था...दिल्ली का घूमना फिरना अब खत्म हो गया था और अगले दिन हमें अपने शहर लौटना था.वो सीधा मुझसे अगले दिन स्घाम में अपनी दीदी के साथ स्टेशन पर मिलने वाली थी.


जारी...

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