Friday, April 26, 2013

परफ्यूम की खुशबु


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तुम्हे परफ्यूम का बेहद शौक था न...तुम हमेशा अलग ही किस्म का एक परफ्यूम लगाती थी.तुम मुझे अक्सर उसका नाम बताया करती थी और मैं हमेशा उस परफ्यूम का नाम भूल जाया करता..देखो न अभी भी मुझे उस परफ्यूम का नाम याद नहीं आ रहा है...हाँ एक परफ्यूम का नाम याद आ रहा है जो की बेहद कीमती था और तुम्हारे किसी चाचा ने उसे विदेश से तुम्हे भेजा था जिसे बाद में तुमने मुझे गिफ्ट कर दिया था.शनेल नाम था न उस परफ्यूम का? शायद..
तुम्हे तो मालुम है, मुझे परफ्यूम बहुत ज्यादा पसंद नहीं..मैं तो बस जब कभी किसी शादी या पारिवारिक पार्टी में जा रहा होता तो थोडा बहुत परफ्यूम लगा लेता था..वो भी सिर्फ माँ के कहने पर..मैं अगर मना करता भी तो भी माँ डांट डपटकर परफ्यूम की एक दो बूंद शर्ट पर डाल ही दिया करती थी.मुझे परफ्यूम की स्ट्रोंग खुशबु से खासकर के इरिटेसन होती थी..अब भी होती है.लेकिन तुम...तुम परफ्यूम बिलकुल संतुलित मात्रा में लगाया करती थी..ना बहुत कम और ना ही बहुत स्ट्रोंग...बस इतना सा की जब भी तुम आसपास रहो तो परफ्यूम की खुशबु तुम्हारे होने का अहसास दिलाती रहे और तुम्हारे चले जाने के बाद भी बहुत देर तक उसकी खुशबु ज़हन में बसी रहे.तुम्हे तो परफ्यूम से इतना प्यार था की शायद ही कभी ऐसा हुआ हो की तुम मुझसे मिलने बिना परफ्यूम लगाये आई हो..मैं कभी कभी तुम्हे मजाक में इस गाने से छेड़ भी दिया करता था "तू धरती पे चाहे जहाँ भी रहेगी, तुझे तेरी खुशबु से पहचान लूँगा". तुम भी हँस कर कहा करती थी..."हाँ, नहीं तो..."

तुम्हे शायद पता नहीं होगा..मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं..लेकिन तुम्हारी परफ्यूम की खुशबु का पहली बार मुझे अहसास तब हुआ था जब हम दोनों उस दिन कॉलेज में बस का फ़ीस जमा करने फीस काउंटर के पास खड़े थे..याद आया वो दिन तुम्हे? वो शनिवार का दिन था और मुझे बस की फीस जमा करनी थी..मैं कॉलेज थोडा जल्दी पहुँच गया था और सीधा कॉलेज के ऑफिस में दाखिल हुआ..वहां कोई भी स्टाफ मौजूद नहीं था..यूँ भी शनिवार को बस दो सेक्सन के क्लास कंबाईंड चलते थे...एक तुम्हारे और एक मेरे सेक्सन के..बाकी सभी की छुट्टियाँ होती थी.तो ऑफिस के स्टाफ भी आराम से आया करते थे.ऑफिस के एक कोने में फीस जमा करने का काउंटर था..काउंटर नंबर 9.मैं जैसे ही 9 नंबर काउंटर की तरफ बढ़ा तो मेरे पांव ठिठक गए..तुम उस काउंटर के पास खड़ी थी और वहां के स्टाफ के आने का इंतजार कर रही थी..मुझे तो एक पल विश्वास ही नहीं हुआ की तुम वहां खड़ी हो..कब से मैं तुमसे बात करना चाहता था, लेकिन हमारे बीच तो बस औपचारिक ही बातें हो पाती थी.."कौन सा पिरीअड होने वाला है", "क्या पढाया गया इस पिरीअड में"...बस इससे ज्यादा कुछ नहीं और ये बातें भी कभी कभी ही हो पाती थी...जब मैं तुम्हारे पीछे वाली बेंच पर बैठता था.इससे ज्यादा बातों का सिलसिला कभी आगे बढ़ा ही नहीं.सच कहूँ तो मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी की तुमसे बातें शुरू कर सकूँ.मैंने जब तुम्हे काउंटर नंबर 9 पर देखा तो सोच लिया था की आज तुमसे बात करने का ये अच्छा मौका है.

मैं काउंटर के पास पहुंचा और तुम्हे देखकर थोड़ा मुस्कुराया..लेकिन तुमने मेरी मुस्कराहट का कोई जवाब नहीं दिया, और बिलकुल स्ट्रेट फेस बना कर तुम खिड़की के बाहर देखने लगी थी.मैं थोड़ा निराश हो गया.मैंने भी अपनी नज़रें मोड़ ली.तुम खिड़की के बाहर पेड़ों पर बैठे पंछियों को देख रही थी..मैं भी कभी उस तरफ देखता जिधर तुम देख रही थी तो कभी चुपके से तुम्हे देख लेता था.तुमने उस दिन वही अपना रेगुलर ब्रांड वाला परफ्यूम लगा रखा था..जिसकी भीनी भीनी सी खुशबु मुझे बड़ी अच्छी लग रही थी..हम थोड़े देर तक वहां अकेले ही खड़े रहे..लेकिन तुमने एक बार भी पलट के मेरी तरफ नहीं देखा था.मैं सोच ही रहा था की तुमसे कुछ बातें शुरू करूँ, की इतने में दनदनाता हुआ काउंटर का स्टाफ ऑफिस में आ धमका..उसने आते ही ऐसी जल्दबाजी दिखाई की हम दोनों जल्दी जल्दी अपने फॉर्म और पैसे निकालने लगे.तुम मेरे से आगे खड़ी थी और मैं तुम्हे देख-देख अपने पॉकेट से अपना वालेट निकाल रहा था, जबकि तुम बड़ी स्थिरता से अपने पर्स में पैसे टटोल रही थी..मेरी नज़र लगातार तुमपर ही थी की वालेट निकालते समय मेरे पॉकेट से कुछ खुल्ले पैसे नीचे फर्श पर गिर गए.मेरी बेवकूफी तो देखो...मुझे लगा था की वो पैसे तुम्हारे गिरे हैं और मैंने तुमसे कहा था  "देखो तुम्हारे पैसे नीचे गिरे हैं, उठा लो".तुमने इस कदर गुस्से में मुझे देखा था की अभी भी तुम्हारा वो चेहरा याद करने से सहम जाता हूँ...और ऐसा टफ लुक दिया जिससे साफ़ झलक रहा था जैसे तुम कह रही हो."इडियट...लाईन मारने का यही तरीका सुझा है तुम्हे"..तुम तो गुस्से में और उस टफ लुक में तुरत ऑफिस से बहार चली गयी...ये भी नहीं कहा तुमने की नीचे गिरे हुए पैसे मेरे नहीं हैं...और मैं वहां खड़ा खड़ा इस कदर एम्बैरस फील करने लगा की क्या बताऊँ.जैसे तैसे काउंटर पर रसीद कटवाई और क्लास जाने के बजाये मैं सीधा कॉलेज की छत पर भागते हुए चला गया.

मुझे उस वक़्त खुद पे बेहद गुस्सा आ रहा था और अपने उस स्टुपिड सी हरकत पर थोड़ी शर्म भी आ रही थी.उस दिन तीन पिरीअड थे और मैंने सोच लिया था की मैं एक भी क्लास अटेंड नहीं करूँगा.उस दिन तुम्हारे और मेरे सेक्सन की कम्बाइंड क्लास चलती थी और मैं नहीं चाहता था की तुम मेरे सामने आओ.मैंने सोच लिया था की कॉलेज की आखिरी बस जो की क्लास खत्म होने के आधे घंटे बाद जाती है, मैं उससे जाऊँगा..उस समय तक तुम पहली बस से घर जा चुकी होगी और फिर मैं एक दो दिन कॉलेज ही नहीं आऊंगा ताकि तुम्हारे सामने आने में मैं एम्बैर्स फील न करूँ.मैं वहीँ छत पर बैग से एक कहानी की किताब निकाल कर पढने लगा.

छुट्टी होने के करीब आधे घंटे बाद मैं नीचे कम्पाण्ड में आया.उस वक़्त तक लगभग सभी लड़के-लड़कियां जा चुके थे.मैं चुपचाप जाकर बस में बैठ गया और अपनी उस कहानी की किताब को पढने लगा.मैं जैसे ही बैठा की पता नहीं कहाँ से तुम दौड़ती हुई बस में दाखिल हो गयी.तुम्हे यूँ बस में चढ़ते देख मैं तो बिलकुल ही घबरा गया था...लेकिन तुम सीधा बस में आई और मेरी ही पास वाली सीट पर आकर बैठ गयी.मेरा तो दिल  सौ किलोमीटर की रफ़्तार से धड़कना शुरू कर दिया था.दिमाग ने काम करना बंद कर दिया....पूरी की पूरी बस खाली है और ये यहाँ मेरे पास आकर बैठी है...इसने पहली बस क्यों छोड़ दी...ऐसे कई सवाल मेरे मन में उमड़ने लगे थे..मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी उस वक़्त की तुम्हे देखूं..मैंने चुपचाप अपनी नज़रें उसी किताब पर गड़ा दी जिसे मैं पढ़ रहा था.तुम इतने पास आकर बैठ गयी थी, किताब का एक भी अक्षर क्या ख़ाक समझ में आता...लगातार सुबह वाली ही बात याद आ रही थी मुझे..जिससे मेरी शर्मिंदगी और बढती जा रही थी...मेरा पूरा ध्यान तुम्हरी तरफ लगा था..तुम उस समय बस की खिड़की के बाहर देख रही थी और मैं किताब पर नज़रें गड़ाए पन्ने पलटता रहा.

"कौन सी किताब है" अचानक तुमने पूछा था..
मैं तो कुछ सेकण्ड के लिए सच में हडबडा सा गया था और फिर झिझकते हुए मैंने बड़ी मुस्किल से कहा "शिवानी की कहानियों की किताब है".
"उम्म्म......शिवानी.......शिवानी कौन?" तुमने फिर से सवाल किया था..
"पता नहीं....कोई राईटर हैं...." मैंने फिर से झिझकते हुए तुम्हे जवाब दिया..
तुम्हारी नज़र कुछ देर तक उसी किताब पर जमी रही और फिर तुमने बड़े धीरे से और थोड़ा हिचकिचाते हुए मुझसे कहा था "अच्छा सुनो, सुबह मेरा मूड ठीक नहीं था, एक दोस्त से लड़ाई कर के ऑफिस आई थी...शायद थोडा रुड पेश आई मैं तुमसे..सॉरी".
मैंने तुम्हारी तरफ देखा...सुबह जो तुम्हारे चेहरे पर गुस्से की लकीरें थीं वो गायब थीं और एक बेहद प्यारी मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर सिमट आई थी..
"इट्स ऑलराईट.." मैंने तुमसे कहा था और तुम बिलकुल खिल सी गयी थी.
"वाऊ..गुड! मुझे बड़ा अफ़सोस आ रहा था की तुम्हारे साथ मैं इतना रयुडली पेश आई थी.." तुमने ये कहा और मुझे अपने चोकलेट का एक टुकड़ा तोड़ के दे दिया था.मेरी तो ख़ुशी की कोई सीमा ही नहीं थी...मैं तो ये सोच सोच के निहाल हुआ जा रहा था की तुम भी पूरा दिन मेरे बारे में सोचती रही हो और खुद आकर तुमने मुझसे माफ़ी मांगी..मैं तो सातवें आसमान पर पहुँच गया था.

जब तक तुम मेरे पास वाली सीट पर बैठी रही तब तक बस कहने को मेरे हाथ में किताब थी..मेरा ध्यान तो सिर्फ तुमपर लगा हुआ था..तुम खिड़की से बाहर देख रही थी और मैं चोरी चोरी तुम्हे देखना चाह रहा था..लेकिन तुम्हारे चेहरे तक आ आकर मेरी नज़रें खुदबखुद फिर से नीचे किताबों की तरफ मुड़ जा रही थी..कुछ देर बाद तुम मेरे से ठीक आगे वाली सीट पर अपनी सहेली के पास जाकर बैठ गयी.मैंने भी कुछ देर बाद उस किताब को बंद कर दिया और बस की खिड़की पर सर टिकाकर तुम्हे देखने लगा था..तुम्हारी परफ्यूम की खुशबु लगातार आ रही थी और हवा से तुम्हारी जुल्फें कभी कभी उड़ के मेरी तरफ आ जाया कर रही थीं जिसे तुम बिना पीछे मुड़े वापस ठीक कर ले रही थी...मुझे तुम्हे यूँ देखते रहना अच्छा लग रहा था...और तुम्हारी उस परफ्यूम की खुशबु से तो दिल दिमाग पर एक ताजगी सी आ जा रही थी...मैं मन ही मन एक गाने के बोल गुनगुनाने लगा..
"धीमी धीमी भीनी भीनी
खुशबू है तेरा बदन
सुलगे महके पिघले दहके
क्यूँ न बहके मेरा मन"
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