Saturday, February 9, 2013

मंदिर का सफ़र : २

मंदिर का सफ़र १ से आगे  

बस स्टैंड से मंदिर की दुरी लगभग दो-तीन किलोमीटर की थी.मंदिर तक जाने का रास्ता एक छोटे गाँव से होकर जाता था.कच्ची सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ हरे भरे खेत थे.वो बार बार दौड़ के खेतों में चली जाती थी और किसी पेड़ की टहनी से झूलने लगती थी या फिर खेतों में पड़े पुराने साईकिल के टायर को दौड़ाने लगती.मुझे हर बार उसे डांट कर वापस सड़क पर लाना पड़ता था.

वो बेहद खुश थी, और उसे खुश देख मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था. पिछले कई दिनों से वो थोड़ी गुमसुम सी थी, लेकिन आज उसमे जैसे एक नयी उर्जा आ गयी थी...

हम चलते चलते मंदिर के पास पहुँच गए थे. मंदिर के आसपास छोटे मोटे कई ढाबे थे और उन्हें देखते ही मुझे अचानक भूख लग गयी. हमने वैसे भी सुबह से कुछ भी नहीं खाया था.मेरी ईच्छा हुई की नास्ता-पानी कर के आगे बढ़ा जाए, लेकिन वो मेरी इस बात पर नाराज़ हो गयी.

"पूजा से पहले हम कुछ भी नहीं खा सकते" उसने डांटते हुए मुझे कहा.

मुझे अब तक लग रहा था कि वो यहाँ सिर्फ मंदिर घुमने के इरादे से आई है. लेकिन मैं गलत था. उसे बाकायदा पूजा करनी था, ठीक वैसे ही जैसे बाकी औरतें वहां पूजा कर रही थीं. पूजा में इस्तेमाल होने वाले सामग्री और प्रसाद उसने मंदिर के सामने एक दुकान से खरीदा और बाकी औरतों के साथ कतार में खड़ी हो गयी. मंदिर में जाने की मेरी कोई ईच्छा नहीं थी, और मैं बाहर ही खड़ा था, लेकिन उसनें ऐसी तीखी नज़रों से मुझे देखा कि मैं बिना सोचे समझे पूजा के कतार में खड़ा हो गया.

मंदिर से निकल कर हम आसपास के इलाकों में टहलने लगे. इस जगह हम दोंनो पहले भी आ चुके थे लेकिन ये पहली बार था कि हम दोनों एक साथ मंदिर आये थे. उसके साथ घुमने पर मुझे वही जगह बिलकुल नयी सी जान पड़ रही थी.

मंदिर के पास ही एक बड़ा सा धर्मशाला था जिसका कैम्पस भी काफी बड़ा था. उस कैम्पस में छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनी हुई थीं और उन झोपड़ियों में दुकानें लगी हुई थीं. कैम्पस के ही अन्दर ही पूजा की सामग्री, प्रसाद और बच्चों के खिलौने के कई सारे दूकान एक पंक्ति में लगे हुए थे.कैम्पस को एक बार देखने से कोई मेला जैसा दृश्य मालुम होता था. उसने उन दुकानों से कई चीज़ें खरीदी...वे चीज़ें जिन्हें हम बचपन में दशहरा के मेले में खरीदते थे, प्लास्टिक के गागल्ज़, घड़ी, प्लास्टिक की गुड़िया और बासुंरी. खिलौने के दूकान के अलावा वहां कई छोटे छोटे मिठाई के दूकान भी बने हुए थे जहाँ से उसने कुछ मिठाइयाँ भी खरीद ली.मैंने उससे कहा "इनसे अच्छी मिठाइयाँ तो तुम्हे अपने मोहल्ले में मिल जायेगी", लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया और बिना कुछ जवाब दिए मिठाई खरीदने लगी.

आसपास के खेतों में टहलते घूमते हम काफी थक चुके थे, और वहीँ एक पेड़ के पास बने सीमेंट की बेंच पर बैठ गए. सामने दो  तीन बैलगाड़ियाँ लगी हुई थीं और उनके ठीक बगल में पुआल का ढेर रखा था. वो दृश्य देखकर उसे अचानक अपनी गाँव की बातें याद आने लगी. वो गाँव जो पारिवारिक मदभेद की वजह से छूट चूका है और जहाँ वो कभी बचपन की छुट्टियाँ बिताती थी. उसनें बताया कि उसकी सबसे डाई-हार्ड ख्वाहिशों में से एक ख्वाहिश ये भी है कि वो अपने गाँव वापस जा सके, और इस बार मेरे साथ जाए वो और कुछ दिन वहाँ बिताये. वो अपने बचपन के दोस्तों से मुझे मिलवाना चाहती थी.

गाँव की बातें करते वक़्त उसकी आँखें डबडबा गयीं थी. ऐसे मौकों पर जब वो बिना किसी वार्निंग के मजाक के मोड से बाहर निकल कर बिलकुल संजीदा हो जाती, तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे उस वक़्त क्या करना या कहना चाहिए और मैं बिलकुल खामोश बस उसका हाथ थामे उसके पास बैठा रहता हूँ.

हम दोनों बहुत देर तक वहाँ वैसे ही बैठे रहे, बिना एक दुसरे को देखे और बिना एक दुसरे से एक भी शब्द कहे...बस एक दुसरे का हाथ थामे हुए.

शाम होने चली थी और हवा थोड़ी  सर्द होने लगी थी. "हमें चलना चाहिए..." मैंने धीमे से उससे कहा.

वो बिना कुछ कहे उठ खड़ी हुई, "हाँ चलो... कैसे चलेंगे? ट्रेन से या बस से..."

मैं जानता था उसे लोकल ट्रेन का सफ़र पसंद नहीं, इस वजह से ही हम सुबह भी बस से ही आये थे. तय तो किया था कि शाम में समय बचाने के लिए ट्रेन से लौटा जाएगा लेकिन मैं जानता था वो बस से लौटना चाहती है. "बस से ही चलेंगे", मैंने कहा और हम दोनों बस स्टैंड की तरफ बढ़ गए.

बस स्टैंड ज्यादा दूर नहीं था, और हम बातें करते हुए वहाँ तक पहुँच आये थे. लेकिन जो मजाक और शरारत उसकी बातों में सुबह थी वो अब नहीं दिखाई दे रही थी. वो बेहद संतुलित और संजीदा बातें कर रही थी. उसका ये रूप आसानी से नज़र नहीं आता, लेकिन जब कभी वो बेहद इमोशनल हो जाती है तब वो बेहद संजीदा हो जाती है.वो रुक रुक कर बातें करने लगती है. सच कहूँ तो मुझे उसका ये रूप थोड़ा थोड़ा पसंद भी आता है. अपने इस मोड में वो कमाल की बातें करती है, अपने दिल की हर छोटी से छोटी बात बेहद खूबसूरती के साथ बिना किसी डर शर्म या हिचक से बताती है.

बस स्टैंड पहुँचते ही हमें बस मिल गयी. बस खाली ही थी इसलिए हमें सीट मिलने में भी ज्यादा तकलीफ नहीं हुई. बस में एक विंडो सीट खाली थी, वो उसे देख मुस्कुराने लगी...हम दोनों वहीँ जाकर बैठ गए.

"अच्छा, तुम्हे कौनट्रेल्स पता है?" उसने पूछा.

"कौनट्रेल्स?? नहीं!!", मुझे सच में कौनट्रेल्स नहीं पता था..

"तुम देखते हो न जब कभी हवाई जहाज आसमान से गुज़रता है तो एक लम्बी सी लकीर अपने पीछे छोड़ते जाता है, देखने पर वो जहाज की पूंछ जैसी लगती है लेकिन दरअसल बादलों का कुछ वेपर ट्रेल होता है वो. जानते हो, मुझे हमेशा वो लकीर एक रहस्मयी सड़क सी दिखती है. कभी कभी सोचती हूँ कि अगर सच में वो कोई सड़क हो तो कहाँ जाती होगी वो सड़क? स्वर्ग?"

वो मेरे तरफ देख रही थी, और मैं बिलकुल क्लूलेस सा उसे घूर रहा था. एकदम ब्लैंक!

"अच्छा, सोचो ज़रा, अगर एक दिन हमें पता चले, और सिर्फ हम दोनों को पता चले कि ये वेपर ट्रेल्स कौनट्रेल्स न होकर सच में कोई जादुई सड़क है जो आसमान तक जाती है, और फर्ज करो कि उस सड़क पर चलने का हुनर, वहां तक पहुँचने का राज़ मुझे और तुम्हे पता लग गया तो?", उसनें मेरे तरफ फिर देखा, और मैं फिर से ब्लैंक था. बस आँखें फाड़ कर उसकी रहस्मयी बातें सुन रहा  था.

"सोचो अगर एक दिन हम उस सड़क पर सच में चलने लगे तो? धरती से कोई अगर उस वक़्त आसमान की तरफ देखेगा तो उसे काफी ताज्जुब होगा न कि ये दोनों लोग आसमान में कैसे चल रहे हैं? जानते हो, अगर मुझे उस सड़क पर चलने का राज़ मालुम हो गया न तो मैं यहाँ से कई सारे फुल और खूबसूरत पौधे लेकर जाउंगी, और आसमान के उस कौनट्रेल्स वाली सड़क के दोनों तरफ फुल-पौधे लगाती जाउंगी. तुम भी तो रहोगे न मेरे साथ. तुम दायीं तरफ फूल-पौधे लगाना और मैं बायीं तरफ. धरती से लोग अगर आसमान की तरफ देखेंगे तो उन्हें कितनी हैरानी होगी न, सोचेंगे कि आसमान में फुल कैसे उग आये हैं और उन्हें जब हम दोनों दिखेंगे, हाथों में फूल लिए आसमान की सड़क पर चलते हुए तो वो मुझे कोई परी समझेंगे और तुम्हें शहजादा... अच्छा, तुम्हे क्या लगता है, अगर मैं आसमान से हाथ हिलाकर धरती के लोगों को हेल्लो कहूँ तो क्या मुझे वापस कोई जवाब देगा?  हम्म्म्म???"

मेरे पास उसके ऐसे सवालों का कोई जवाब नहीं होता बल्कि मैं अक्सर ओवरव्हेल्म हो जाता हूँ ऐसे मौकों पर.. मैं फिर से ब्लैंक हो गया था!

उसनें, आगे कहा,

"किसे पता, शायद उस सड़क पर चलते हुए हमें कोई ऐसा एक दरवाज़ा दिख जाए जो स्वर्ग को जाती होगी या कोई वैसा सीक्रेट डोर जिसकी कल्पना मैंने बचपन से कर रखी है जो किसी अल्तेर्नाते युनिवेर्स में जाती हो और जहाँ सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ ही हो, प्यार ही उस जगह की जुबां हो और प्यार ही वहाँ का चलन.

क्या पता उस जगह कोई ऐसी तकनीक हो जिसकी मदद से मैं जितनी चाहूँ उतनी खुशियाँ बटोर कर किसी बहुत बड़े से थैले में लेते आऊं और अपने दोस्तों में, दुनियावालों में बाँट सकूँ, उन्हें दे सकूँ जिन्हें सच में बेहद जरूरी है और जो एक लम्बे समय से दुखी उदास हैं. जिसे देखो वही आज कल उदास रहता है. मुझे बिलकुल पसंद नहीं कि मेरे आसपास रहने वाला कोई इन्सान उदास रहे. तुम भी अक्सर खोये हुए से और परेशान रहते हो. यू नो, मैं सबसे अच्छी और बड़ी वाली ख़ुशी तुम्हें दे दूँगी, और फिर प्रायोरिटी के बेसिस पर, अपने परिवार में खुशियाँ बाटूंगी, फिर रिश्तेदारों में, मोहल्ले में, अपने शहर में, पूरे देश में और फिर बाकी दुनिया में. मैं तो एक खुशियों का स्टाल भी तब खोल दूँगी, जिसे जितनी जरूरत हो वो उतनी ले जाए, और कीमत होगी बस एक प्यार भरी मुस्कान.

देखना फिर सब मुझे हमेशा याद करेंगे, कि थी कोई ऐसी लड़की जो दुनिया भर में अपने दोनों हाथों से खुशियाँ बाँटती थी, ये कहते ही  उसनें अपनी दोनों बाहों को हवा में फैला दिया, कि जैसे सच में उस पल वो खुशियाँ बाँट रही हो. मेरी तरफ वो टकटकी लगाये देखने लगी.

भयानक क्लूलेस!!! क्या कोई ऐसा शब्द है? अगर है तो मेरी उस वक़्त वैसी ही हालत थी. मैं बस बेवकूफों की तरह मुस्कुरा रहा था.

वो लेकिन मेरी इस ठंडी प्रतिक्रिया से ज्यादा खुश नहीं हुई. "तुम्हें शायद हँसी आ रही होगी न मेरी इन अजीबोगरीब बातों से?" उसनें मेरी तरफ रूखेपन से देखा.

अरे नहीं ऐसा नहीं है...मैं तो सच में खो सा गया था, मैंने उसे समझाना चाहा.

आई नो, बड़े बेपरवाही से उसनें कहा और कुछ देर तक खिड़की के बाहर देखते रही, फिर मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया और कहा, "देखो, दुनिया में कुछ भी मुमकिन है. एनी डैम मैजिक इन दिस वर्ल्ड इज पोसिबल. यू नो, मुझे सबसे ज्यादा मैजिकल क्या लगता है? किसी बच्चे का पैदा होना. अगर सोचो तो वो कहीं नहीं है. जैसे हम और तुम...आज से पच्चीस-तीस साल पहले कहाँ थे? कहीं नहीं थे, और फिर एक दिन वो बच्चा इस दुनिया में आ जाता है. हम सबके सामने, हम सबके बीच बड़ा होता है. स्कुल जाता है, पढता है और फिर देखते ही देखते वो हम तुम सा बड़ा हो जाता है. सोचो अगर तो ये कितना मैजिकल और रहस्यपूर्ण है? मुझे मालुम है दुनियावाले इसमें भी साईंस लगा देंगे और ये नहीं मानेगे की ये कोई चमत्कार है. वो मुझपर अपना बायोलोजी का ज्ञान उड़ेल देंगे लेकिन मेरे लिए तो ये एक चमत्कार ही है. भगवन का सबसे बड़ा मैजिक. दुनिया का सबसे बड़ा मैजिक व्हिच इज इम्पॉसिबल टू बीट.

तो जब इतना बड़ा मैजिक मुमकिन है, तब कुछ भी हो सकता है. आसमान में सड़क भी बन सकती है. यु नो व्हाट, जो लोग किसी भी जादू, मैजिक या मिस्ट्री में विश्वास नहीं रखते, दे आर सिम्पली नॉट लिविंग."

वो मेरे तरफ फिर देखने लगी और इस बार बिना मेरे जवाब का इंतजार किये आगे कहने लगी,

"तुम्हे पता है, ये जो मेरी ख्वाहिशों और ख्वाबों की दुनिया है न, उसमें मैं कुछ भी कर सकती हूँ. वहां कोई मुझपर बंदिश लगाने वाला नहीं है. मैं अपने मर्जी से जी सकती हूँ. मैं कहीं भी जा सकती हूँ. मैं तुम्हारे साथ दुनिया घूम सकती हूँ और मैं चाहूँ त..तो तुम..तुमसे शादी भी कर सकती हूँ..."

उसनें आखिरी के कुछ शब्द इतने धीमे से कहा था, कि मुझे पहले तो लगा कि ये भ्रम है, उसनें ये  शब्द तो नहीं कहा होगा. लेकिन उसकी आँखों में उस वक़्त वही शब्द झाँक रहे थे..."हाँ, मैं चाहूँ तो अपने ख्वाबों में तुमसे शादी भी कर सकती हूँ.." उसकी पलकें नीची हो गयीं, और मेरी नज़रें उसके चेहरे पर उठ आयीं थीं और वहीँ अटकी रहीं.

कुछ देर तक हम कुछ और देख और सुन नहीं सके थे. बस एक दुसरे को देखते रहे थे.

हम दोनों के बीच जो जादू-सा पल हो आया था वो तब टुटा जब बस में अचानक हंगामा होने लगा. एक शराबी बस में घुस आया था और वो बस के कंडक्टर से बहस करने लगा था. हंगामे की वजह से हमारा वो पल अचानक  नष्ट हो गया था.

बहस ने तुरंत ही हाथापाई का रूप ले लिया था. शराबी अपने हाथ में एक लाठी लिए हुए था और जाने क्या बड़बड़ा रहा था. मालूम हो रहा था उसनें कई दिन से कुछ नहीं खाया था और बस के किराये के लिए उसके पास पैसे नहीं थे. बस ड्राईवर ने बस रोक दी और फिर कंडक्टर और ड्राईवर ने मिलकर उस शराबी की पिटाई कर उसे बस से उतार फेंका.

अचानक हुए इस हरकत से वो बुरी तरह घबरा गयी थी, और उसनें मेरी बाहों को कस कर जकड़ लिया था... "पता नहीं कुछ लोग ऐसे कैसे हो जाते हैं", उसनें गुस्से में कहा.

इस हँगामे से मैं भी कुछ सोचने लगा था.  यूहीं, उत्सुकतावश और रैंडमली मैंने उससे एक सवाल पूछा, "माल लो कि कल को तुम यूहीं किसी बस में सफ़र कर रही हो और आज जैसे वो शराबी बस में घुसा वैसे ही मैं उस दिन शराबी की जगह मैं बस में घुस जाऊं, बिलकुल वैसे ही नशे की हालत में और लोग वैसे ही मुझे भी घसीटने-पीटने लगे तो क्या करोगी तुम? बचओगी न मुझे? या रास्ता नाप लोगी?"

मैंने तो ये सवाल बिलकुल मजाक के उद्देश्य से पूछा था, लेकिन वो मेरे इस सवाल से एकदम चौंक सी गयी और बेहद घबरा गयी. उसने मेरी ओर देखा और पहले तो मुझे दो मुक्के मारे और फिर अपने दोनों हाथों से मुझे जकड़ लिया था और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे थे. होठ उसके बार बार कुछ कहने के लिए हिल रहे थे  लेकिन कुछ कह नहीं पा रहे थे... वो बस मेरे बाहों को पकड़  कर रो रही थी.

उसकी डबडबाई आँखों को देखकर एक पल के लिए घबरा गया था. यार मैं मजाक कर रहा था, मैंने उसे समझाना चाहा लेकिन वो लगातार रोये जा रही थी. मैंने उसे अपने थोड़े और करीब कर लिया और उसनें अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया और कांपती आवाज़ में अटकते अटकते सिर्फ इतना ही वो कह पाई, 'तुम प्लीज ऐसी बुरी बातें फिर मत करना'.

मुझे अपने उस सवाल पर और खुद पर बेहद गुस्सा आने लगा था.

हमारी बस शहर में प्रवेश कर चुकी थी, और मैं चाहता था की बस से उतरने से पहले उसका मन कुछ हल्का कर सकूँ. बहुत देर तक वो मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाये रही थी और जब बस शहर के आखिरी स्टैंड पर पहुँची, मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा... "जानती हो ये अच्छे..ये सुख के दिन हैं..".वो विस्मित होकर मेरी तरफ देखने लगी. "तुम्हें कभी बताया  नहीं मैंने न, लेकिन तुम्हारे साथ यूँ तुम्हारे ख्वाबो की दुनिया में भटकना मुझे बेहद अच्छा लगता है. आज का ये दिन मैं कभी नहीं भूल सकूँगा.."

वो मुस्कुराने लगी. "जानते हो, जब तुम ऐसी बातें करते हो तब बहुत स्वीट लगते हो...ऐसी ही बातें करते रहना हमेशा, अगर मैं कहीं दूर चली जाऊं तब भी.."

मैंने उसके होठों पर अपनी उँगलियाँ रख दी, "तुम कभी मेरे से दूर नहीं जाओगी...हमेशा मेरे पास रहोगी..."

वो फिर से मुस्कुराने लगी. मुझे लगा की शायद उसका मन अब अच्छा हो गया है.

हम बस से उतर चुके थे..और उसने मुझे एक मिठाई का पैकट थमा दिया, "ये मैंने तुम्हारे लिए ख़रीदा था".

वो रिक्शे से वापस अपने घर चली गयी. शाम के छः बज चुके थे लेकिन मैं उस स्टैंड से वापस जाने के बजाये काफी देर तक वहां इधर उधर घूमता रहा, बेवजह समय काटता रहा..जब कुछ देर बाद वापस घर की ओर बढ़ा तो एक अजीब सी ताजगी महसूस हो रही थी. वही पुराना सब कुछ शाहर, घर, लोग नए जैसे लग रहे थे. दिन भर भटकने के बाद भी मुझे थकावट महसूस नहीं हो रही थी..रात में भी बहुत देर तक मैं सो नहीं सका...बस में जो बातें वो करती आई थी, मैं बस उन्हीं बातों में रात भर उलझा रहा था.

अब सोचता हूँ तो लगता है की जैसे वो कोई अलग ही ज़माना था जब उसके साथ मैंने वो खूबसूरत दिन बिताया था. वो अब किसी दुसरे ही जन्म की बात जान पड़ती है. सोचता हूँ कि अगर अब कभी उस मंदिर में  दुबारा जाना हुआ तो पता नहीं फिर कितनी यादों के तहे खुलेंगे और मुझे फिर से उन पगडंडियों पर चलना पड़ेगा, और पता नहीं उसके बगैर उन यादों की पगडंडियों पर चलना कितना आसन होगा।