Sunday, February 3, 2013

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मंदिर का सफ़र


वे साल के आखिरी दिन थे, उसकी एक जिद थी की वो मेरे साथ माता के मंदिर जाए, वो मंदिर जो शहर से पचास-साठ किलोमीटर दूर स्थित था.मैं कई दिनों से उसकी ये जिद टालता आया था लेकिन एक समय के बाद मुझे लगा की उसकी जिद को अब टालना असम्भव सा है.मैं उससे जब पूछता की सर्दियों में तुम्हे वहां जाने की इतनी जल्दी क्यों है, हम एक दो महीने बाद वहां जा सकते हैं, फरवरी या मार्च के महीने में.लेकिन वो हमेशा एक ही जवाब देती "आई हैव माई ओन रीजन्स'.उसके 'रीजन्स' का पता मुझे बाद में चला था. उसका मानना था की "साल के आखिरी दिन माता के मंदिर जाकर अपनी सारी गलतियाँ कन्फेस करना जरूरी है, उतना ही जरूरी जितना साल के शुरू में मंदिर में 'विशेज' माँगना.अगर पूरी इमानदारी से तुमने अपनी गलती कुबूल नहीं की तो तुम्हारी एक भी विशेज पूरी नहीं होंगी".उसके मंदिर जाने की दूसरी और मुख्य वजह मुझे कुछ दिनों बाद पता चली थी, वो चाहती थी की मेरे साथ मंदिर जाकर वो मेरे लिए भी कोई दुआ मांग सके.

उसके साथ शहर के बाहर जाने के बारे में सोचकर मैं थोडा चिंतित सा हो गया.चिंता की वजह थी की अगर हम ट्रैफिक में फंस गए(जिसकी सम्भावना ज्यादा थी, कोहरे की वजह से) तो वापस आने में शाम भी हो सकती है.मैं नहीं चाहता था की वापस आने में हमें देर हो...मैं चाहता था की कुछ भी हो जाए हमें दोपहर तक घर पहुँच जाना है.हमने तय किया था की सुबह जितनी जल्दी हो सके हम मंदिर के लिए निकल जायेंगे और यदि वापस आने में देरी हो गयी तो हम वहां से लोकल ट्रेन में वापस आ जायेंगे.एक दिन पहले ही शहर के बस स्टैंड जाकर हमने दो टिकट बुक करवाई थी.वैसे तो वहां जाने के लिए पहले से टिकट लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन उसे डर था की मैं फिर अपनी बात से मुकर जाऊँगा.मैंने उसे कह दिया था की सुबह जब मैं उसे फोन करूँ तो वो अपने घर से बस स्टैंड के लिए निकले.मैंने उसे कहा था की मैं सुबह ६ बजे फोन करूँगा.लेकिन अगली सुबह उसी ने मुझे आधे घंटे पहले फोन कर दिया.वो मंदिर जाने के बात से बड़ी उत्साहित थी, इतनी की उसे पूरी रात ठीक से नींद भी नहीं आई थी.ये उसने मुझे फोन पे बताया था. उत्साहित मैं भी था, इस बात से की उसके साथ मैं पूरा एक दिन बिता सकूँगा.

मैंने टिकट एक दिन पहले शाम में ही ले लिया था.दुसरे दिन सुबह मैं समय से बहुत पहले वहां पहुँच गया.सुबह बहुत ही घना कोहरा था.सर्दियों की सुबह इतने घने कोहरे और ठण्ड में किसी का इंतजार करना बेहद तकलीफदेह होता है.लेकिन मैं ठण्ड से ज्यादा परेसान नहीं था, जितना कोहरे से परेसान था, और कोहरे को देखते हुए बार बार ट्रैफिक में फंसने की चिंता मुझे सताने लगी थी.मैंने एक पल सोचा की मंदिर जाने का प्लान कैंसल ही कर दूँ, लेकिन दुसरे ही पल उसका वो उत्साहित सा चेहरा मेरी आँखों के सामने घुमने लगा.मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था.मैं इसी कशमकश में सड़कों पर टहल रहा था की वो आते हुए दिखी.उसने काली जींस और फर का उजला और लम्बा जैकट पहन रखा था.उसने हलके आसमानी रंग की ऊनी टोपी और हाथों में दस्ताने पहन रखे थे...उस ऊनी टोपी पर पिंक कलर के तीन गुलाब के फुल बने थे, जो बड़े सुन्दर से दिख रहे थे.उसने अपने नए वूडलैंड के जूते पहने हुए थे, ये वही जूते थे जिसे उसने बड़े मन से खरीदा था, और उसे शो-ऑफ़ करने का वो एक भी मौका नहीं छोडती थी.उन दिनों शहर में वूडलैंड का जूता पहनना एक बड़ी बात थी.कंधे पर उसने एक रंगबिरंगा सा फैंसी बैग लटका रखा था, जो उसके किसी रिश्तेदार ने विदेश से भेजा था.मुझे उसका वो बैग हमेशा बड़ा आकर्षक और बिलकुल हट के दीखता था.उसने एक भूरे रंग का वूलेन स्टोल गले में लपेट रखा था जिसे देख मुझे एक पुरानी बात याद आ गयी थी...मैंने एक दिन मजाक में उससे पूछा था "ये मफलर कहाँ से खरीदी हो", उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और कहा था "ये मफलर नहीं स्टोल है".उसने स्टोल के एक सिरे से अपने सर को भी ढँक लिया था..वो बिलकुल एक गुडिया सी प्यारी और मासूम दिख रही थी.वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी.सर्दियों में मुझे वो हमेशा दुसरे मौसमों की तुलना में ज्यादा खूबसूरत दिखती थी...वो जब कभी इतनी खूबसूरत दिखती, तो मैं चाह कर भी बहुत देर तक उसे लगातार देख नहीं पाता था.मन ही मन ये विश्वास करना भी मेरे लिए मुस्किल हो जाता था की इतनी खूबसूरत लड़की को मैं जानता हूँ,उसके साथ शहर घूमता हूँ और वो मेरी सबसे प्यारी दोस्त है.कभी कभी एक बेतुका सा ख्याल भी आता मन में की इतनी भोली, निश्चल और साफ़ मन की लड़की के साथ मुझे नहीं होना चाहिए.मैं किसी भी तरह इसके काबिल नहीं हूँ...लेकिन वो मेरे साथ थी, ये सच था और मुझे हमेशा इस बात का गर्व होता रहा की वो मेरी दोस्त थी.....


वो लगभग दौड़ते हुए मेरे पास आई, दोनों हाथों से मेरे कन्धों को पकड़ कर उसने कहा "फाइनली...हम जा रहे हैं.....गौड आई एम सो इक्साइटड".उसकी ख़ुशी देखकर कुछ देर के लिए मेरी चिंता और फ़िक्र खत्म हो गयी.उसने टिकट हाथ से छिनकर कहा "विंडो सीट मेरी है...तुम्हे बैठने नहीं दूंगी".मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा "ठीक है, तुम ही बैठना".वो मेरे इस बात से ज्यादा आश्वस्त नहीं हुई, और बस में दौड़ते हुए उसने विंडो सीट कैप्चर कर लिया और मेरी तरफ देखकर मुझे अंगूठा दिखाने लगी.बस अपने समय से निकली.मुझे बड़ी ख़ुशी और राहत हुई जब शहर से निकलते वक़्त हमें कोई ट्राफिक नहीं मिली, रोड बिलकुल खुली थी और बस रफ़्तार के साथ चलने लगी थी.

बस के शीशों पर ओस जम गया था जिससे बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.वो खिड़की पर अपनी ऊँगली से शक्लें बनाने लगी, और उन्हें तब तक देखते रहती जब तक खिड़की पर फिर से ओस की फ्रेश बुँदे न चिपक जाती और उसकी बनाई शक्ल लगभग मिट नहीं जाती.वो तब फिर कोई नयी शकल बनाने लगती, और उसी शक्ल को देखते हुए उससे कुछ बात करने लगती.ये उसका खेल था.वो बीच बीच में मुझे देखती और कहती "तुम भी बात करो न इससे".मैं उसे थोड़ा चिढ़ा सा देता, और वो फिर से मुह फेर कर उन शक्लों से बात करने लगती.जब वो अपने इस खेल से उब गयी,तो उसने अपने दोनों हाथों को खिड़की के शीशे पर रख दिया, और जब कुछ देर बाद उसकी हथेलियाँ ओस से भींग गयी तो उसने जल्दी से उन्हें शीशे से हटा कर मेरे गालों पर रख दिया था.मुझे एक पल बड़ा इरिटेटिंग लगा.ठण्ड में कोई ऐसी हरकत करे तो इरिटेटिंग लगता ही है,लेकिन वो अपनी इस बेवकूफी पर बहुत खुश हो गयी और जोर से हंसने लगी, उसे हँसता देख मैं भी हंसने लगा था.आगे वाली सीट पर बैठे दो बुजुर्ग पीछे मुड़ के हमें देखने लगे.उनके देखने से शायद वो शरमा गयी थी....उसने अपना चेहरा मेरे जैकेट में छुपा लिया था.

खिड़की से बार शहर को कुहरे में लिपटे देखकर वो एकाएक अपने बीते दिनों में चली गयी, जब वो नवमी या दसवीं क्लास में थी और पहली बार लन्दन गयी थी, क्रिसमस की छुट्टियों में, अपने बड़े पापा के घर.उन दिनों वहां हमेशा बर्फ़बारी होती रहती थी और जब बर्फ गिरती तो सारा शहर बर्फ की चादर में ढँक जाता था.उसने अपनी बहनों के साथ पुरे गार्डन को सजाया था..बर्फ से लदे पेड़ों को रंग बिरंगे लाईटों से सजाया था..बहुत सारे झालर से पुरे गार्डेन को सजाया था, और दो बड़े बड़े सांता क्लॉस के टेडी गेट पर दरबान की तरह उसने लगा दिए थे, और दोनों के ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में लिख दिया था "क्रिसमस में गिफ्ट्स लाने वाले अंकल".गार्डेन में एक बड़ा सा "स्नो गार्डन" का बोर्ड भी उसने और उसकी बहनों ने मिलकर लगा दिया था.वो ये बातें मुझे पहले भी कई बार बता चुकी थी,लेकिन मैं हर बार उतने ही उत्सुकता से उसकी बातें सुनता जैसे पहली बार उसकी बातें सुन रहा हूँ.अपने बचपन और लन्दन की बातें बताते वक़्त उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी.उसकी नॉस्टैल्जिक बातें सुन मुझे भी वो दिन याद आ गए जब मैं अपने गाँव जाया करता था, इसी रास्ते से जिससे होकर हम मंदिर जा रहे थे.मुझे याद आया की जब मैंने पहली बार अपने गाँव का जिक्र उससे किया था, तो उसने मुझसे कहा था की वो मेरे साथ मेरे गाँव जाना चाहती है, वहां घूमना चाहती है.उस दिन मैंने उसे ये नहीं बताया था की मेरा गाँव उस मंदिर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है..नहीं तो वो मेरे गाँव चलने की भी जिद कर सकती थी.

उसकी छोटी मोटी बदमाशियां, शरारतें और नौटंकियाँ झेलते हुए हम आख़िरकार पहुँच गए थे, जितना हमने अंदाज़ा लगाया था उससे कहीं पहले.इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ था.हमने मुख्य सड़क पर बस छोड़ी थी और वहां से मंदिर लगभग दो तीन किलोमीटर की दुरी पर था.मैंने उससे कहा की हम रिक्शा ले सकते हैं, लेकिन उसे रिक्शे से जाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी..वो मंदिर तक पैदल जाना चाहती थी...गाँव और खेतों से होते हुए...


...contd

5 comments:

  1. ह्म्म्मम्म....हम्मम्मम्म.......

    आगे?????
    :-)

    अनु

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  2. उफ़ ... ये contd ... क्यों करते हो ऐसा ... वो भी ऐसी शुरुआत के बाद ...

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  3. दूसरा अंक पढ़ने के बाद ये अंक पढ़ा .... रोचक ...

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