Saturday, February 9, 2013

मंदिर का सफ़र : २

मंदिर का सफ़र १ से आगे  

बस स्टैंड से मंदिर की दुरी लगभग दो-तीन किलोमीटर की थी.मंदिर तक जाने का रास्ता एक छोटे गाँव से होकर जाता था.कच्ची सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ हरे भरे खेत थे.वो बार बार दौड़ के खेतों में चली जाती थी और किसी पेड़ की टहनी से झूलने लगती थी या फिर खेतों में पड़े पुराने साईकिल के टायर को दौड़ाने लगती...मुझे हर बार उसे डांट कर खींच कर वापस सड़क पर लाना पड़ता था...वो बहुत खुश दिखाई दे रही थी, और उसे खुश देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.पिछले कई दिनों से वो थोड़ी गुमसुम सी थी, लेकिन आज उसमे जैसे एक नयी उर्जा आ गयी थी...हम चलते चलते मंदिर के पास पहुँच गए थे...मंदिर के आसपास छोटे मोटे कई ढाबे थे.ढाबों को देखते ही मुझे भूख लग गयी.हमने वैसे भी सुबह से कुछ भी नहीं खाया था.मेरी ईच्छा हुई की नास्ता-पानी कर के आगे बढ़ा जाए..लेकिन वो मेरी इस बात पर नाराज़ हो गयी..."पूजा से पहले हम कुछ भी नहीं खा सकते" उसने डांटते हुए मुझे कहा.मुझे अब तक लग रहा था की वो सिर्फ यहाँ मंदिर घुमने के इरादे से आई है...लेकिन मैं गलत था...उसे बाकायदा पूजा करनी था...ठीक वैसे ही जैसे बाकी औरतें वहां पूजा कर रही थीं.पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और प्रसाद उसने मंदिर के सामने एक दुकान से खरीदी और बाकी औरतों के साथ कतार में खड़ी हो गयी.मैंने बाहर से ही मंदिर के दर्शन कर लिया था और अन्दर पंक्ति में खड़ा होने की मेरी कोई ईच्छा नहीं थी, लेकिन उसने ऐसी तीखी नज़रों से मुझे देखा की मैं भी चुपचाप कतार में जाकर खड़ा हो गया.

मंदिर में उसे पूजा करते लगभग दिन के बारह बज चुके थे.मुझे वैसे ही बहुत ज़ोरों से भूख लगी हुई थी, पूजा करते करते शायद उसे भी अच्छी खासी भूख लग गयी थी...हम मंदिर के पास ही एक ढाबे में गए और वो पूरी और जलेबियों पर एकदम टूट सी पड़ी...ढाबे से निकलने के बाद हम आसपास का इलाका घुमने लगे.इस मंदिर में हम दोनों पहले भी आ चुके थे और घूम भी चुके थे, लेकिन हम एक साथ मंदिर पहली बार आये थे और उसके साथ घुमने पर मुझे वही जगह बिलकुल नयी सी मालुम पड़ रही थी.

मंदिर के ठीक सामने एक बड़ा सा धर्मशाला था जिसका की काफी बड़ा सा कैम्पस था.उस कैम्पस में छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनी हुई थीं और उन झोपड़ियों में दुकानें लगी हुई थीं...कैम्पस के ही अन्दर ही पूजा की सामग्री, प्रसाद और बच्चों के खिलौने के कई सारे दूकान एक पंक्ति में लगे हुए थे.कैम्पस को एक बार देखने से कोई मेला जैसा दृश्य मालुम होता था.उसने उन दुकानों से कई चीज़ें खरीदी...वे चीज़ें जिन्हें हम बचपन में दशहरा के मेले में खरीदते थे...प्लास्टिक के गागल्ज़,घड़ी....प्लास्टिक की गुड़िया और बासुंरी.खिलौने के दूकान के अलावा वहां कई छोटे छोटे मिठाई के दूकान भी बने हुए थे जहाँ से उसने कुछ मिठाइयाँ भी खरीद ली.मैंने उससे कहा "इनसे अच्छी मिठाइयाँ तो तुम्हे अपने मोहल्ले में मिल जायेगी", लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया और बिना कुछ जवाब दिए मिठाई खरीदने लगी.

आसपास के खेतों में टहलते घूमते हम काफी थक चुके थे, और वहीँ एक पेड़ के पास बने सीमेंट की बेंच पर बैठ गए.उसकी इक्स्क्लूसिव शरारतें जारी थीं, की तभी मजाक में ही उसे पता नहीं कौन सी पुरानी बात याद हो आई.वो एकाएक मुझे अपने गाँव के बारे में बताने लगी.बड़ी धुंधली सी याद थी उसे अपने गाँव की और बचपन के बाद वो अपने गाँव वापस नहीं जा पायी थी.एक अरसे से उसकी ईच्छा थी की किसी गाँव को वो करीब से देखे, शायद इसलिए वो मेरे साथ मेरे गाँव जाना चाहती थी, वहां कुछ दिन रहना चाहती थी...ताकि वो गाँव में कुछ समय बिता सके.वो अक्सर अपने गाँव की बातें करती थी और वहां बिताये अपने बचपन के दिनों की...गाँव की बातें करते वक़्त अक्सर उसकी आँख भर आती थीं.ऐसे मौकों पर जब वो एकाएक बिना किसी वार्निंग के मजाक के मोड़ से बाहर निकल कर बिलकुल संजीदा सी हो जाती, तो मैं कभी समझ नहीं पाता की मुझे उस वक़्त क्या करना या कहना चाहिए और मैं बिलकुल खामोश होकर सिर्फ उसकी बातें सुनता रहता.उस दिन भी वैसा ही हुआ...कुछ देर हम वहीँ बैठे रहे, बिना एक दुसरे को देखे और बिना एक दुसरे से एक भी शब्द बोले...उसकी नज़रें बहुत देर से दूर खड़ी एक बैलगाड़ी पर टिकी हुई थी.शायद उस बैलगाड़ी को देखने के बाद उसे कुछ याद आया हो.मुझे उसने एक बार बताया था की जब वो बचपन में गाँव जाती थी, तो उसके दादा उसे बैलगाड़ी में बिठा कर खेतों में घुमाते थे.मैंने उस वक़्त उससे कुछ भी नहीं पूछा, थोड़ी देर बाद उसने खुद कहा, हमें शायद देर हो रही है...अब चलना चाहिए.

मैंने उससे कहा की हम वापस ट्रेन से चल सकते हैं..हमारा काफी वक़्त बच जाएगा..लेकिन उसने बस से ही जाने की जिद की...उसकी उस जिद में जिद वाली कोई बात नहीं थी, बल्कि एक विनम्र आग्रह जैसा कुछ था...वैसे तो बस से वापस लौटना मैं भी चाहता था लेकिन मुझे समय की फ़िक्र भी सता रही थी.मुख्य सड़क तक हम रिक्शे से आये थे.मंदिर से सड़क तक रिक्शे पर वो खामोश बैठी हुई थी.ऐसा नहीं की वो कुछ भी नहीं कह रही थी, वो बातें करती आ रही थी, लेकिन बेहद संतुलित और संजीदा बातें.. उसका ये रूप आसानी से नज़र नहीं आता, लेकिन जब कभी वो बेहद इमोशनल हो जाती है या कुछ ऐसा हो जाता है जो उसके दिल को अन्दर तक छू जाए, तब ऐसे मौके पर वो बेहद संजीदा हो जाती है.वो रुक रुक कर बातें करने लगती है.मुझे उसका ये रूप पसंद आता है....जब वो अपने इस मोड में आती है, तो कमाल की बातें करती है...अपने दिल की हर छोटी से छोटी बात बहुत खूबसूरती के साथ बिना किसी डर शर्म या हिचक से बताती है.

हमें बस स्टैंड पहुँचते ही बस मिल गयी.बस खाली ही थी इसलिए हमें सीट मिलने में भी ज्यादा तकलीफ नहीं हुई.हम बस में चढ़ गए...इस बार उसने विंडो सीट कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं की...बल्कि मैंने खुद ही उसे विंडो सीट पर बैठने को कहा.वो मुझे देखकर मुस्कुरा दी.बाहर अच्छी खासी धुप निकल आई थी.वो लगातार बस की खिड़की से बाहर आसमान की तरफ देख लगी....

"तुम्हे कौनट्रेल्स पता है?" उसने पूछा.

कौनट्रेल्स?? नहीं तो क्या होता है....मुझे सच में कौनट्रेल्स नहीं पता था..

"तुम देखते हो न जब कभी कभी हवाई जहाज आसमान से गुज़रता है तो एक लम्बा सा लकीर अपने पीछे छोड़ते जाता है, देखने पर लगता है की जैसे वो उसकी पूंछ हो लेकिन वो असल में बादलों का कुछ वेपर ट्रेल जैसा होता है.पता है, मुझे हमेशा वो एक रहस्मयी सड़क सा दिखाई देता है...कभी कभी सोचती हूँ की अगर सच में वो कोई सड़क हो तो कहाँ तक जाता होगा....शायद स्वर्ग तक....अच्छा, सोचो ज़रा, अगर एक दिन हमें पता चले(सिर्फ हम दोनों को) की वो कौनट्रेल्स न होकर कोई जादुई सड़क है जो आसमान तक जाती है...और उस सड़क पर चलने का हुनर, वहां तक पहुँचने का राज़ मुझे और तुम्हे पता लग गया तो?...और मान लो अगर एक दिन हम उस सड़क पर सच में चलने लगे तो? धरती से कोई अगर उसी वक़्त आसमान की तरफ देखेगा तो उसे काफी ताज्जुब होगा की दो लोग आसमान में कैसे चल रहे हैं...अगर मुझे उस सड़क पर चलने का राज़ मालुम चला तो मैं यहाँ से कई सारे फुल और बहुत से खूबसूरत पौधे लेकर जाउंगी...और आसमान के उस कौनट्रेल्स वाली सड़क के दोनों तरफ फुल-पौधे लगाती जाउंगी....तुम्हे भी अपने साथ मैं लेकर चलूंगी...तुम दायीं तरफ पौधे लगते जाना और मैं बायीं तरफ...धरती से लोग अगर आसमान की तरफ देखेंगे तो उन्हें कितनी हैरानी होगी.....की आसमान में फुल कैसे उग आये हैं और वे जब मेरी तरफ देखेंगे तो शायद मेरे हाथों में फूलों को देखकर मुझे कोई परी समझ लेंगे..और तुम्हे मेरे साथ देखकर शहजादा समझेंगे.....तुम्हे क्या लगता है, अगर मैं आसमान से हाथ हिलाकर 'हाय'(hi) कहूँगी तो क्या कोई मुझे वापस जवाब देगा??हम्म्म्म???"
वो मेरे तरफ देखने लगी लेकिन बिना जवाब की प्रतीक्षा किये फिर कहने लगी
"क्या पता शायद उस सड़क पर चलते हुए मुझे कहीं कोई ऐसा एक दरवाज़ा दिख जाए जो स्वर्ग या वैसी ही किसी खूबसूरत सी दुनिया में खुलता हो....क्या पता वैसी कोई दुनिया जहाँ वो दरवाज़ा खुलता है वहां खुशियों का कोई बड़ा सा खजाना हो.....और शायद मैं उन खुशियों को बटोर कर किसी बहुत बड़े से थैले में भरकर लेते आ सकूँ....और अपने दोस्तों में, दुनियावालों में बाँट सकूँ..जिसको देखो वही उदास रहता है, और मुझे बिलकुल पसंद नहीं की मेरे आसपास रहने वाला कोई इन्सान उदास रहे..तुम भी कितने खोये खोये से और परेसान रहते रहते हो.मैं सबसे अच्छी और बड़ी वाली ख़ुशी तुम्हे दे दूंगी...और फिर अपने परिवार में बाटूंगी..फिर पुरे अपने मोहल्ले में, फिर शहर में, फिर पुरे देश में और फिर पूरी दुनिया में...सब मुझे हमेशा याद करेंगे...की कोई ऐसी भी लड़की थी जो अपने दोनों हाथों से खुशियाँ बंटती थी...." ये कहते ही उसकी दोनों हाथ हवा में फ़ैल गयीं...मैं उसकी बातों में सच में खो गया था और किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच चूका था...लेकिन शायद मेरी सिर्फ एक छोटी सी मुस्कराहट से वो कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं हो सकी....और समझने लगी की मैं हमेशा की तरह उसकी बातों को नादानी भरी बातें समझ बैठा हूँ...जबकि ऐसा नहीं था..

वो मेरी ठंडी प्रतिक्रिया से ज्यादा खुश नहीं हुई....वो कहने लगी..."मुझे मालुम है, मैं अक्सर नादानी वाली बातें करती हूँ, शायद इसलिए तुम्हे मेरी ये बात भी मेरा बचपना और दुनियादारी से परे वाली बातें लगती होंगी....लेकिन देखो, दुनिया में कुछ भी मुमकिन है...एनी डैम मैजिक इन दिस वर्ल्ड इज पोसिबल.. पता है मुझे सबसे ज्यादा मैजिकल और आस्चार्जनक क्या लगता है...किसी बच्चे का पैदा होना...अगर सोचो तो वो कहीं नहीं है, जैसे हम और तुम...आज से बीस-पचीस साल पहले कहाँ थे?कहीं नहीं थे...और फिर एक दिन वो बच्चा इस दुनिया में आ जाता है.हम सबके सामने, हम सबके बीच बड़ा होता है...स्कुल जाता है, पढता है और फिर हमारे तुम्हारे जितना बड़ा हो जाता है....देखो ये कितना मैजिकल और रहस्यपूर्ण है... मुझे मालुम है दुनियावाले इसमें भी साईंस लगा देंगे और ये नहीं मानेगे की ये कोई चमत्कार है...लेकिन मेरे लिए तो ये एक चमत्कार ही है, भगवन का मैजिक....मुझे ये भगवन का सबसे बड़ा जादू लगता है, और जब ये पोसिबल है तब कुछ भी हो सकता है, आसमान में सड़क भी बन सकती है....यु नो व्हाट....जो लोग किसी भी जादू, मैजिक या मिस्त्री में विश्वास नहीं रखते...दे आर सिम्पली नॉट लिविंग." वो मेरे तरफ फिर देखने लगी और मेरे जवाब का इंतजार करने लगी.इस बार मैंने सिर्फ उसे इतना ही कहा, की तुम्हारी इन बातों को कभी भी मैं नादानी भरी बातें नहीं समझता.मुझे अच्छा लगता है जब तुम ऐसी बातें करती हो.वो थोडा आश्वस्त हो गयी.

ये उसकी ख्वाबों की दुनिया की बातें थीं....उसकी ख्वाबों की दुनिया ऐसी ही थी..कहाँ से कौन सी बात अचानक से सामने निकल आती थी किसी को पता भी नहीं चलता था....जब वो ऐसी बातें करती, तो मुझे हैरत होती थी की वो कहाँ तक सोच सकती है..उसकी इमैजनैशन की कोई हद नहीं थी....और कभी कभी ऐसी बातें करते वक़्त वो एक दो ऐसी बात भी कह जाती थी जिससे मैं अक्सर चौंक सा भी जाता था. उसने उस दिन कहा था "तुम्हे पता है, मैं अपने ख्वाबों के दुनिया में कुछ भी कर सकती हूँ...वहां कोई मुझपर बंदिश लगाने वाला नहीं होता..मैं अपने मर्जी से जी सकती हूँ...मैं कहीं भी जा सकती हूँ और कुछ भी कर सकती हूँ...कुछ भी....तुमसे शादी भी...

उसने इतने धीरे से ये आखिरी शब्द कहा की एक पल लगा की ये मेरा भ्रम है, लेकिन उसकी आँखों में ये शब्द बिलकुल साफ़ साफ़ छपे हुए थे..घबराहट से या शर्म से, मैं नहीं जानता....लेकिन उसकी पलकें नीची हो गयीं, और मेरी नज़रें उसके चेहरे पर उठ आयीं थीं और वहीँ अटकी रहीं...

हम दोनों के बीच जो जादू सा पल हो आया था वो तब टुटा जब बस में अचानक हंगामा होने लगा...एक शराबी बस में खुस आया था और वो बस के कंडक्टर से बहस करने लगा.उस शराबी के बस में यूँ अचानक आ जाने से हमारे बीच जो एक पल पैदा हुआ था वो अचानक से नष्ट हो गया.

शराबी और कंडक्टर की बहस तेज होने लगी...हाथापाई भी होने लगी थी.वो शराबी अपने हाथ में एक लाठी लिए हुए था और कह रहा था मुझे अमरीका जाना है..वो बस में कैसे घुस आया ये मुझे पता नहीं चल पाया था..शायद जबरदस्ती खुस आया था..वो अपने लाठी से कंडक्टर को धमका रहा था..ड्राइवर ने बस रोक दी और उसे धक्के दे कर बाहर निकाल दिया...कंडक्टर और कुछ बस के यात्री ने बस से उतर के उसकी थोड़ी पिटाई भी की.अचानक हुए इस हरकत से वो बहुत घबरा गयी थी.उसने मेरे बाहों में कस कर पकड़ लिया और बेहद घबराई आवाज़ में कहने लगी "पता नहीं कुछ लोग ऐसे कैसे हो जाते हैं".
मैं कुछ सोचने लगा...और फिर मैंने युहीं हंसी में उससे एक सवाल पूछा "सोचो अगर कल को तुम युहीं किसी बस में सफ़र कर रही हो और उस शराबी की तरह ही अचानक मैं बस में घुस आऊं..बिलकुल वैसे ही नशे में और बुरी हालत में...और लोग वैसे ही मुझे भी घसीटने-पीटने लगे....तो क्या करोगी तुम? क्या तुम सामने आकर कहोगी की इसे मैं जानती हूँ? मैंने ये सवाल मजाक में युहीं पूछ दिया था लेकिन वो मेरे इस सवाल से एकदम चौंक सी गयी और बेहद घबरा गयी.उसने अपने दोनों हाथों से मुझे पकड़ लिया था और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे...वो बिना कुछ कहे बस मेरी तरफ देखने लगी....उसके होंठ हिलने लगे...जैसे वो कुछ कहना चाह रही हो लेकिन कह नहीं पा रही हो....उसकी डबडबाई आँखों को देखकर एक पल के लिए खुद मैं भी अपने ही मजाक से भयभीत सा हो गया...मैं उसकी डबडबाई आँखों को ज्यादा देर सह नहीं सका और अपनी नजर दूसरी तरफ कर लिया.उसने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया और कांपती आवाज़ में उसने अटकते अटकते सिर्फ इतना ही कहा की 'तुम प्लीज ऐसी बुरी बातें फिर मत करना'.मुझे अपने उस सवाल पर और खुद पर बेहद गुस्सा आने लगा था.

हमारी बस शहर में प्रवेश कर चुकी थी, और मैं चाहता था की बस से उतरने से पहले उसका मन कुछ हल्का कर सकूँ....बहुत देर तक वो मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाये रही थी और मैं बहुत देर से उससे तरह तरह की बातें कर रहा था, लेकिन मुझे उसका वो रूप जो सुबह था, मंदिर जाते हुए..बस में शरारत करते हुए....खेतों में दौड़ते हुए...कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.मैं जानता था की वो आसानी से इस मोड से बाहर नहीं निकल पाएगी.जब बस लगभग स्टैंड में लगने वाली थी, तब मैंने कहा उससे "जानती हो ये अच्छे..ये सुख के दिन हैं..".वो विस्मित होकर मेरी तरफ देखने लगी...
"तुम्हारे साथ यूँ वक़्त गुज़ारना और तुम्हारे ख्वाबो की दुनिया में यूँ भटकना अच्छा लगता है.आज का ये दिन मैं कभी नहीं भूल सकूँगा.."
वो मुस्कुराने लगी...कहने लगी "तुम ऐसी बातें करते हो तो बहुत स्वीट लगते हो...ऐसी ही बातें करते रहना हमेशा, अगर मैं कहीं दूर चली जाऊं तब भी..
मुझे लगा की शायद उसका मन अब अच्छा हो गया है..
हम बस से उतर चुके थे..और उसने मुझे एक मिठाई का पैकट पकड़ा दिया और कहा "ये मैंने तुम्हारे लिए ख़रीदा था".वो रिक्शे से वापस अपने चली गयी.शाम के चार बज चुके थे लेकिन मैं उस स्टैंड से वापस जाने के बजाये काफी देर तक वहां इधर उधर घूमता रहा, बेवजह समय काटता रहा..जब कुछ देर बाद वापस घर की ओर बढ़ा तो एक अजीब सी ताजगी महसूस हो रही थी, वही पुराना सब कुछ (शाहर, घर, लोग) नए जैसे लग रहे थे...दिन भर भटकने के बाद भी मुझे थकावट महसूस नहीं हो रही थी..रात में भी बहुत देर तक मैं सो नहीं सका...बस में जो बातें वो करती आई थी, मैं उसी में उलझा रहा.

अब सोचता हूँ तो लगता है की जैसे वो कोई अलग ही ज़माना था जब उसके साथ मैंने वो खूबसूरत दिन बिताया था...वो अब किसी दुसरे ही जन्म की बात जान पड़ती है..सोचता हूँ की अगर अब कभी उस मंदिर में  दुबारा जाना हुआ तो पता नहीं फिर कितनी यादों के तहे खुलेंगे और मुझे फिर से उन पगडंडियों पर चलना पड़ेगा.
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Sunday, February 3, 2013

मंदिर का सफ़र


वे साल के आखिरी दिन थे, उसकी एक जिद थी की वो मेरे साथ माता के मंदिर जाए, वो मंदिर जो शहर से पचास-साठ किलोमीटर दूर स्थित था.मैं कई दिनों से उसकी ये जिद टालता आया था लेकिन एक समय के बाद मुझे लगा की उसकी जिद को अब टालना असम्भव सा है.मैं उससे जब पूछता की सर्दियों में तुम्हे वहां जाने की इतनी जल्दी क्यों है, हम एक दो महीने बाद वहां जा सकते हैं, फरवरी या मार्च के महीने में.लेकिन वो हमेशा एक ही जवाब देती "आई हैव माई ओन रीजन्स'.उसके 'रीजन्स' का पता मुझे बाद में चला था. उसका मानना था की "साल के आखिरी दिन माता के मंदिर जाकर अपनी सारी गलतियाँ कन्फेस करना जरूरी है, उतना ही जरूरी जितना साल के शुरू में मंदिर में 'विशेज' माँगना.अगर पूरी इमानदारी से तुमने अपनी गलती कुबूल नहीं की तो तुम्हारी एक भी विशेज पूरी नहीं होंगी".उसके मंदिर जाने की दूसरी और मुख्य वजह मुझे कुछ दिनों बाद पता चली थी, वो चाहती थी की मेरे साथ मंदिर जाकर वो मेरे लिए भी कोई दुआ मांग सके.

उसके साथ शहर के बाहर जाने के बारे में सोचकर मैं थोडा चिंतित सा हो गया.चिंता की वजह थी की अगर हम ट्रैफिक में फंस गए(जिसकी सम्भावना ज्यादा थी, कोहरे की वजह से) तो वापस आने में शाम भी हो सकती है.मैं नहीं चाहता था की वापस आने में हमें देर हो...मैं चाहता था की कुछ भी हो जाए हमें दोपहर तक घर पहुँच जाना है.हमने तय किया था की सुबह जितनी जल्दी हो सके हम मंदिर के लिए निकल जायेंगे और यदि वापस आने में देरी हो गयी तो हम वहां से लोकल ट्रेन में वापस आ जायेंगे.एक दिन पहले ही शहर के बस स्टैंड जाकर हमने दो टिकट बुक करवाई थी.वैसे तो वहां जाने के लिए पहले से टिकट लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन उसे डर था की मैं फिर अपनी बात से मुकर जाऊँगा.मैंने उसे कह दिया था की सुबह जब मैं उसे फोन करूँ तो वो अपने घर से बस स्टैंड के लिए निकले.मैंने उसे कहा था की मैं सुबह ६ बजे फोन करूँगा.लेकिन अगली सुबह उसी ने मुझे आधे घंटे पहले फोन कर दिया.वो मंदिर जाने के बात से बड़ी उत्साहित थी, इतनी की उसे पूरी रात ठीक से नींद भी नहीं आई थी.ये उसने मुझे फोन पे बताया था. उत्साहित मैं भी था, इस बात से की उसके साथ मैं पूरा एक दिन बिता सकूँगा.

मैंने टिकट एक दिन पहले शाम में ही ले लिया था.दुसरे दिन सुबह मैं समय से बहुत पहले वहां पहुँच गया.सुबह बहुत ही घना कोहरा था.सर्दियों की सुबह इतने घने कोहरे और ठण्ड में किसी का इंतजार करना बेहद तकलीफदेह होता है.लेकिन मैं ठण्ड से ज्यादा परेसान नहीं था, जितना कोहरे से परेसान था, और कोहरे को देखते हुए बार बार ट्रैफिक में फंसने की चिंता मुझे सताने लगी थी.मैंने एक पल सोचा की मंदिर जाने का प्लान कैंसल ही कर दूँ, लेकिन दुसरे ही पल उसका वो उत्साहित सा चेहरा मेरी आँखों के सामने घुमने लगा.मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था.मैं इसी कशमकश में सड़कों पर टहल रहा था की वो आते हुए दिखी.उसने काली जींस और फर का उजला और लम्बा जैकट पहन रखा था.उसने हलके आसमानी रंग की ऊनी टोपी और हाथों में दस्ताने पहन रखे थे...उस ऊनी टोपी पर पिंक कलर के तीन गुलाब के फुल बने थे, जो बड़े सुन्दर से दिख रहे थे.उसने अपने नए वूडलैंड के जूते पहने हुए थे, ये वही जूते थे जिसे उसने बड़े मन से खरीदा था, और उसे शो-ऑफ़ करने का वो एक भी मौका नहीं छोडती थी.उन दिनों शहर में वूडलैंड का जूता पहनना एक बड़ी बात थी.कंधे पर उसने एक रंगबिरंगा सा फैंसी बैग लटका रखा था, जो उसके किसी रिश्तेदार ने विदेश से भेजा था.मुझे उसका वो बैग हमेशा बड़ा आकर्षक और बिलकुल हट के दीखता था.उसने एक भूरे रंग का वूलेन स्टोल गले में लपेट रखा था जिसे देख मुझे एक पुरानी बात याद आ गयी थी...मैंने एक दिन मजाक में उससे पूछा था "ये मफलर कहाँ से खरीदी हो", उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और कहा था "ये मफलर नहीं स्टोल है".उसने स्टोल के एक सिरे से अपने सर को भी ढँक लिया था..वो बिलकुल एक गुडिया सी प्यारी और मासूम दिख रही थी.वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी.सर्दियों में मुझे वो हमेशा दुसरे मौसमों की तुलना में ज्यादा खूबसूरत दिखती थी...वो जब कभी इतनी खूबसूरत दिखती, तो मैं चाह कर भी बहुत देर तक उसे लगातार देख नहीं पाता था.मन ही मन ये विश्वास करना भी मेरे लिए मुस्किल हो जाता था की इतनी खूबसूरत लड़की को मैं जानता हूँ,उसके साथ शहर घूमता हूँ और वो मेरी सबसे प्यारी दोस्त है.कभी कभी एक बेतुका सा ख्याल भी आता मन में की इतनी भोली, निश्चल और साफ़ मन की लड़की के साथ मुझे नहीं होना चाहिए.मैं किसी भी तरह इसके काबिल नहीं हूँ...लेकिन वो मेरे साथ थी, ये सच था और मुझे हमेशा इस बात का गर्व होता रहा की वो मेरी दोस्त थी.....


वो लगभग दौड़ते हुए मेरे पास आई, दोनों हाथों से मेरे कन्धों को पकड़ कर उसने कहा "फाइनली...हम जा रहे हैं.....गौड आई एम सो इक्साइटड".उसकी ख़ुशी देखकर कुछ देर के लिए मेरी चिंता और फ़िक्र खत्म हो गयी.उसने टिकट हाथ से छिनकर कहा "विंडो सीट मेरी है...तुम्हे बैठने नहीं दूंगी".मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा "ठीक है, तुम ही बैठना".वो मेरे इस बात से ज्यादा आश्वस्त नहीं हुई, और बस में दौड़ते हुए उसने विंडो सीट कैप्चर कर लिया और मेरी तरफ देखकर मुझे अंगूठा दिखाने लगी.बस अपने समय से निकली.मुझे बड़ी ख़ुशी और राहत हुई जब शहर से निकलते वक़्त हमें कोई ट्राफिक नहीं मिली, रोड बिलकुल खुली थी और बस रफ़्तार के साथ चलने लगी थी.

बस के शीशों पर ओस जम गया था जिससे बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.वो खिड़की पर अपनी ऊँगली से शक्लें बनाने लगी, और उन्हें तब तक देखते रहती जब तक खिड़की पर फिर से ओस की फ्रेश बुँदे न चिपक जाती और उसकी बनाई शक्ल लगभग मिट नहीं जाती.वो तब फिर कोई नयी शकल बनाने लगती, और उसी शक्ल को देखते हुए उससे कुछ बात करने लगती.ये उसका खेल था.वो बीच बीच में मुझे देखती और कहती "तुम भी बात करो न इससे".मैं उसे थोड़ा चिढ़ा सा देता, और वो फिर से मुह फेर कर उन शक्लों से बात करने लगती.जब वो अपने इस खेल से उब गयी,तो उसने अपने दोनों हाथों को खिड़की के शीशे पर रख दिया, और जब कुछ देर बाद उसकी हथेलियाँ ओस से भींग गयी तो उसने जल्दी से उन्हें शीशे से हटा कर मेरे गालों पर रख दिया था.मुझे एक पल बड़ा इरिटेटिंग लगा.ठण्ड में कोई ऐसी हरकत करे तो इरिटेटिंग लगता ही है,लेकिन वो अपनी इस बेवकूफी पर बहुत खुश हो गयी और जोर से हंसने लगी, उसे हँसता देख मैं भी हंसने लगा था.आगे वाली सीट पर बैठे दो बुजुर्ग पीछे मुड़ के हमें देखने लगे.उनके देखने से शायद वो शरमा गयी थी....उसने अपना चेहरा मेरे जैकेट में छुपा लिया था.

खिड़की से बार शहर को कुहरे में लिपटे देखकर वो एकाएक अपने बीते दिनों में चली गयी, जब वो नवमी या दसवीं क्लास में थी और पहली बार लन्दन गयी थी, क्रिसमस की छुट्टियों में, अपने बड़े पापा के घर.उन दिनों वहां हमेशा बर्फ़बारी होती रहती थी और जब बर्फ गिरती तो सारा शहर बर्फ की चादर में ढँक जाता था.उसने अपनी बहनों के साथ पुरे गार्डन को सजाया था..बर्फ से लदे पेड़ों को रंग बिरंगे लाईटों से सजाया था..बहुत सारे झालर से पुरे गार्डेन को सजाया था, और दो बड़े बड़े सांता क्लॉस के टेडी गेट पर दरबान की तरह उसने लगा दिए थे, और दोनों के ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में लिख दिया था "क्रिसमस में गिफ्ट्स लाने वाले अंकल".गार्डेन में एक बड़ा सा "स्नो गार्डन" का बोर्ड भी उसने और उसकी बहनों ने मिलकर लगा दिया था.वो ये बातें मुझे पहले भी कई बार बता चुकी थी,लेकिन मैं हर बार उतने ही उत्सुकता से उसकी बातें सुनता जैसे पहली बार उसकी बातें सुन रहा हूँ.अपने बचपन और लन्दन की बातें बताते वक़्त उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी.उसकी नॉस्टैल्जिक बातें सुन मुझे भी वो दिन याद आ गए जब मैं अपने गाँव जाया करता था, इसी रास्ते से जिससे होकर हम मंदिर जा रहे थे.मुझे याद आया की जब मैंने पहली बार अपने गाँव का जिक्र उससे किया था, तो उसने मुझसे कहा था की वो मेरे साथ मेरे गाँव जाना चाहती है, वहां घूमना चाहती है.उस दिन मैंने उसे ये नहीं बताया था की मेरा गाँव उस मंदिर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है..नहीं तो वो मेरे गाँव चलने की भी जिद कर सकती थी.

उसकी छोटी मोटी बदमाशियां, शरारतें और नौटंकियाँ झेलते हुए हम आख़िरकार पहुँच गए थे, जितना हमने अंदाज़ा लगाया था उससे कहीं पहले.इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ था.हमने मुख्य सड़क पर बस छोड़ी थी और वहां से मंदिर लगभग दो तीन किलोमीटर की दुरी पर था.मैंने उससे कहा की हम रिक्शा ले सकते हैं, लेकिन उसे रिक्शे से जाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी..वो मंदिर तक पैदल जाना चाहती थी...गाँव और खेतों से होते हुए...


...contd
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