Sunday, November 24, 2013

सफ़र की शुरुआत...


ज़िन्दगी की कुछ अच्छी चीज़ों की शुरुआत युहीं हो जाती है...अचानक ही. मेरे लिए लिखने की शुरुआत ऐसे ही हुई थी...एकदम रैंडमली...युहीं बातों बातों में...दो दोस्तों के साथ मजाक में लिखी गयी एक कहानी से...नवम्बर की एक सर्द शाम में, लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहलते हुए...चानू चाचा के चाय की दूकान में बैठकर चाय पीते हुए.

वो बाईस नवम्बर की एक शाम थी.छठ पूजा सुबह के अर्ध्य के साथ समाप्त हुआ था.शाम में हम तीन दोस्त(मैं, सुदीप और शिखा) बोरिंग रोड के लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहल रहे थे...और पुरानी यादें ताज़ा कर रहे थे.छठ पूजा की शाम आमतौर पर सड़के सुनसान सी हो जाती हैं..दुकानें बंद रहती हैं.बोरिंग रोड का भी कुछ वैसा ही नज़ारा था...पटना के सबसे भीड़ भरे इलाकों में से एक बोरिंग रोड बिलकुल सुनसान सा था..कुछेक दुकानें खुली हुई थी, सड़कों पर लोग भी काफी कम नज़र आ रहे थे और ऐसे में शाम की हलकी सर्द हवा में बोरिंग रोड में टहलना हमें बहुत अच्छा लग रहा था..हम बहुत देर तक घूमते रहे थे...तीनों में से किसी को भी वापस घर जाने की जल्दी नहीं थी.हम तीनों अपनी गाड़ियों से आये थे, तो ये चिंता किसी को नहीं थी की देर हो गयी तो घर कैसे जायेंगे.मेरा घर तो खैर पास में ही था, बाकी दोनों के घर दूर थे.

कुछ देर घूमते घूमते जब हम थोड़े थक गए तो वहीँ लक्ष्मी काम्प्लेक्स के पास ही एक चाय की दूकान पर जाकर बैठ गए.वो चानू चाचा की चाय दूकान थी...जहाँ पहले हम अक्सर चाय पिया करते थे और बहुत बहुत देर तक बैठ कर बातें करते थे.चानू चाचा की चाय की दूकान पर हमें हमेशा गज़ब के आईडियाज आते थे.सबसे ज्यादा शिखा को.वो अजीब अजीब बातें यहाँ बैठ कर सोच लिया करती थी, और खुश होकर कहती थी..."ये मेरे लिए थिंकिंग पॉइंट है, जहाँ बैठकर मुझे अच्छी अच्छी बातें सूझती हैं".सुदीप बाबु नॉर्मली कभी कोई बहकी बातें सोचते नहीं थे, लेकिन उस शाम वहाँ जब हम तीनों एक अरसे बाद बैठ कर चाय पी रहे थे, तो उन्हें एक गज़ब की बात सूझी....वो अचानक से बहुत एक्साईटेड हो गए...कहने लगे "अभि...शिखा...लेट्स प्रोड्यूस अ फिल्म टूगेदर.....".
एक तो सुदीप बाबु की मुहँ से इस तरह की बातें सुनना बड़ा आश्चर्यजनक था दूसरा की उसने कुछ इस अंदाज़ में इस बात को कहा था, अपने दोनों हाथों को पुरे एक्साईटमेंट में हवा में ऐसे उछाल दिया था उसने की मुझे एकाएक बहुत जोरों की हँसी आ गयी.आगे मैं कुछ कह पाता इससे पहले ही मेरे बगल में बैठी शिखा ने एक मुक्का मेरी पीठ पर दे मारा और डांटते हुए कहा मुझे..."ख़बरदार तुमने कुछ कहा तो..............हाँ सुदीप, तुम कुछ कह रहे थे न यार...कहो.....इग्नोर हिम".
सुदीप बाबु को अब शिखा का सपोर्ट मिल गया था, वो थोड़े तन से गए...एक कोंफीडेंस आ गयी थी उनमे...उन्होंने मुझे देखा, थोड़ा चिढ़ाया मुझे और शिखा की तरफ मुखातिब होकर कहने लगे...  "मेरे पास एक सिच्युएसन है, एक कहानी, एक लव स्टोरी...लव ट्रायंगल...क्या कहती हो?? एक फिल्म बनाया जाए?.....सोचो अगर....."
सुदीप की बातें अभी खत्म भी नहीं हुई थी, शिखा ने झट से कहा "वाऊ...दैट्स ग्रेट यार!! वैस भी ज़िन्दगी काफी बोरिंग हो गयी है..कुछ तो नया करना ही चाहिए, मैं तुम्हारे साथ हूँ, चलो फिल्म बनाते हैं...तुम कहानी सुनाओ मुझे अपनी...लेट्स डिस्कस स्टोरी".
वैसे दोनों हमेशा मजाक के मूड में रहते हैं लेकिन उस शाम दोनों में से कोई भी मजाक के मूड में नहीं था....फिर भी दोनों की की बातें सुन कर जाने क्यों मुझे थोड़ी हँसी आ रही थी..मैंने बीच में टोकते हुए उन्हें कहा "वो कहानी बाद में डिस्कस कर लेना यार, अभी शाम इतनी अच्छी है, क्यों बर्बाद कर रहे हो तुम दोनों इसे?"
लेकिन मेरी बात को दोनों में से किसी ने लिफ्ट नहीं दिया....और दोनों कहानी डिस्कस करने में व्यस्त हो गए.

ना चाहते हुए मुझे भी उनकी कहानी सुननी पड़ रही थी.सुदीप की कहानी की शुरुआत लक्ष्मी काम्प्लेक्स के उसी कोक-शेप्ड दूकान से हुई, जहाँ हम पहले फाउन्टेन कोक पीने जाया करते थे.उसकी कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे वैसे मुझे भी उस कहानी में इंटरेस्ट आने लगा था.मैंने बीच में कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप इस वजह से रहा की कुछ देर पहले मैंने कहानी का मजाक उड़ा दिया था.लेकिन थोड़ी देर बाद जब खुद को कंट्रोल नहीं कर सका तो बेशर्मों की तरह मैं भी कहानी के बीच में कूद पड़ा और अपने इनपुट देने लगा.कुछ एक-डेढ़ घंटे के  डिस्कसन के बाद एक अच्छी खासी लव स्टोरी तैयार हो गयी थी.बाकायदा एक कागज़ पर कहानी के पॉइंट्स लिखे गए थे ताकि हमें याद रहे.कहानी में सब कुछ ठीक था, सब बातें बहुत अच्छी थीं...लेकिन कहानी का क्लाइमैक्स तय नहीं हो पा रहा था.लड़की दोनों में से किस लड़के की होगी इस बात पर मेरी और सुदीप की राय अलग अलग थी..शिखा की कोई राय ही नहीं थी.बेसक्ली वो न्यूट्रल रहना चाह रही थी.हमने जब गेंद उसके पाले में फेंक दिया..की तुम ही अब फैसला करो, की कहानी का अंत क्या होगा....तो वो बेचारी धर्मसंकट में फँस गयी...किस दोस्त का पक्ष ले वो? किसके क्लाइमैक्स को बेहतर बताये...? कुछ देर वो सोचती रही थी और फिर कहती है वो "यु नो व्हाट ...लड़की किसी को नहीं मिलेगी....मैं तो सोच रही हूँ की कहानी का सबसे अच्छा क्लाइमैक्स ये हो सकता है की दोनों लड़के और वो लड़की पागल हो जाए और किसी मेंटल हॉस्पिटल चले जाए.इस तरह प्यार करने वाले लोगों को दुनिया वैसे भी पागल ही तो कहती है न". शिखा ने पूरी कोशिश की की इस बात को एक मजाक की तरह ही कहे वो, उसने हँसते हुए चुटकी लेते हुए इस बात को कहा था लेकिन फिर भी हम दोनों में से किसी को भी इस बात पर हँसी नहीं आ सकी..क्यूंकि कहानी सच में बहुत भावुक बन गयी थी और कहानी डिस्कस करते वक़्त हम तीनों ही काफी सेंटीमेंटल से हो गए थे.

कुछ देर हम तीनों चाय दूकान पर युहीं बैठे रहे..एकदम चुप..बस चाय पीते हुए और सड़कों पर आ जा रही गाड़ियों को देखते हुए.तीनों के बीच अचानक आ गयी इस चुप्पी को सुदीप ने ही तोडा..."कम ऑन यार....हम तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे सच में एक फिल्म बन जायेगी इस बकवास कहानी पर..." सुदीप की कही इस बात पर शिखा थोड़ी चिढ़ सी गयी, एक मुक्का उसने उसे भी दे मारा और उसके हाथों से वो कागज़ छीन कर उसने मुझे थमा दिया.."इसे तुम रखो, इस पागल लड़के को इतनी बेहतरीन कहानी बकवास लग रही है......किसे पता यार, कभी हम साथ मिलकर इसपर एक फिल्म बना ही दें".
सुदीप मुस्कुराने लगा, उसने शिखा के कंधे को हिलाकर कहा, हाँ रे..जरूर बनायेंगे फिल्म एक दिन और फिल्म की डाईरेक्टर तुम ही बनोगी..सुदीप की इस बात से शिखा मुस्कुराने लगी....हम तीनों सुदीप के इस छोटे से मजाक के सहारे उस सेंटीमेंटल मूड से बहार निकल आये थे.

उस शाम शिखा ने वो कागज़ मेरे को ये कह कर थमाई थी की इसे मैं अपनी डायरी में अच्छे से सहेज कर रख लूँ ताकि फिर कभी जब हम तीनों मिले तो इस कहानी को फाईनल टच दे पायें.बहुत दिनों तक वो कहानी रही भी मेरे साथ, लेकिन फिर पता नहीं कैसे अन्फॉर्चूनट्ली वो कागज़ मेरे से खो गया.वो जो अच्छी सी कहानी बन गयी थी, उसके पॉइंट्स सही सही याद नहीं थे, लेकिन फिर भी उस कागज़ के गुम हो जाने के बाद मैंने एक दिन उस कहानी को लिखना शुरू किया, लेकिन कहानी उस तरह से लिख नहीं पाया...युहीं आधी अधूरी बातें उस शाम की जो याद थी बस वो ही लिख पाया मैं.सोचता हूँ की कभी ये दोनों मिलें अगर फिर से, हमारे पास फिर से बैठ कर बातें करने का वक़्त हो, तो वहीँ चानू चाचा की चाय की दूकान पर हम फिर से एक बार बैठ कर कहानी को डिस्कस करें और पूरी कहानी अच्छे से लिखें, उस अधूरी कहानी को एक मुक्कमल शक्ल दें.

जिस शाम की ये बातें मैं बता रहा हूँ आपको, उन दिनों मैं कुछ लिखता नहीं था, हाँ ब्लॉग थे मेरे...दोनों ब्लॉग थे...लेकिन बस कॉलेज टाईम में मस्ती में लिखी हुई एक दो कवितायें ही ब्लॉग पर डाला करता था...अक्सर अपनी कविताओं को मैं अपनी डायरी में लिखा करता था...लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं.फिर भी पता नहीं कैसे कुछ दोस्तों को विश्वास था की एक दिन मैं लिखूंगा, कुछ भी लिखूंगा लेकिन लिखूँगा जरूर.दिव्या, शिखा, सुदीप और शायद प्रभात ऐसे दोस्त थे जिन्हें ये भरोसा था की मैं कभी न कभी कुछ न कुछ तो लिखूंगा ही.उस शाम  जब हमने वो कहानी डिस्कस की थी, शिखा ने चानू चाचा की चाय की दूकान पर बैठे हुए अचानक कहा था मुझसे..."तुम्हे सब काम वाम छोड़कर राईटर बन जाना चाहिए, तुम बहुत अच्छा लिखते हो...और कम से कम एक किताब तो तुम्हारी पब्लिश होनी ही चाहिए".सुदीप जो आमतौर पर इन सब बातों से दूर ही रहता है, किताबों का भी ज्यादा शौक नहीं उसे...सिर्फ अपने विषय की ही समझ रखता है...उसने भी शिखा का फुल सपोर्ट करते हुए कहा था "हाँ, सिरिअसली यार, यु सूड कंसीडर राईटिंग...तुम्हे लिखना चाहिए". दोनों ने ये बातें इस तरह कही थी की मुझसे आगे कुछ भी नहीं कहा गया.मैंने बस ये कहा की "I will try".

उस साल, छठ पूजा के आसपास कई लोगों ने रैंडमली मुझे इस तरह की बातें कही थी....सबसे पहले मेरी बहन मोना ने, जिसने बैंगलोर के एक रेस्टुरेंट में, कहा था मुझसे...जब किसी नए फिल्म का एक बकवास सा गाना बज रहा था वहाँ...मोना ने कहा था मुझसे "देखो तो आजकल कैसे वाहियात से गाने बनने लगे हैं...भैया तुम तो इन सब से अच्छे गाने लिख सकते हो..तुम लिखते क्यों नहीं?".दिवाली के दुसरे दिन दिव्या का जब फोन आया तो उसने भी एक्जैक्टली यही बातें कही थी मेरे से....."तुम लिखा करो यार, कितनी बार कहा है तुम्हे लिखना शुरू कर देना चाहिए". मैं अब सोचता हूँ तो लगता है की कहीं इन सब लोगों ने पहले से कोई प्लान तो नहीं बना रखा था की एक साथ सब मुझे लिखने के लिए यूँ इंस्पायर करेंगे? खैर, जो भी हो...दिव्या, शिखा,सुदीप और मोना की ये बातें कहीं न कहीं मेरे दिमाग में ठहरी हुई थी...और मैं सच में कुछ लिखना चाहता था...फिर करीब दो महीने बाद मौका मिला मुझे जब जनवरी की एक शाम मैं अपनी बहन सोना के साथ बैठकर कुछ पुराने किस्से, अपने स्कुल कॉलेज की पुरानी यादें उसे सुना रहा था.उसे किस्से सुनाते हुए एकाएक कुछ लिखने का ख्याल आया...एक कविता लिखने का मन किया....और इस तरह उस रात मैंने ये कविता लिखी थी जिसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट भी किया था.....उस दिन मैंने ये भी तय किया की आज के बाद से मैं लगातार ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिखते जाऊँगा...चाहे मेरी लिखी बातें अच्छी हों या बकवास...चाहे उसे कोई पढ़े या न पढ़े..और उस दिन किया गया खुद से वादा अब तक कायम है.
शिखा ने उस शाम, जब हम कहानियाँ डिस्कस कर रहे थे तो एक और बात कही थी, "तुम एक दिन बहुत बड़े राईटर बनोगे, लोग तुम्हे जानेंगे". ये एक दोस्त का प्यार था...उसका मेरे पर ब्लाईंड फेथ..., बड़ा राईटर का तो कुछ अता पता नहीं, लेकिन मुझे लगता है उस शाम ने जो ट्रिगर किया था मेरे अन्दर, उससे अब एक स्माल टाईम ब्लॉगर तो बन ही चूका हूँ मैं.

सच कहूँ, तो इस ब्लॉग पर जब से लिखना शुरू किया था, तो एकदम नहीं सोचा था की लोग मेरी ये बातें पढेंगे भी....मुझे इतना प्यार देंगे......और ये तो कभी सपने में भी सोचा भी नहीं था की मेरी ये बातें अखबारों में भी छपेंगी.इस ब्लॉग की अब तक की आठ पोस्ट चार अखबारों में छप चुकी है.ये बातें दिल को खुश तो करती ही है, और लिखने के लिए उत्साहित भी करती हैं.अभी कुछ दिनों पहले कुछ ऐसा हुआ जिससे लगा की इस ब्लॉग पर जो भी छोटी मोटी कहानियाँ मैं लिखता हूँ, वो लिखना सच में सफल हुआ.मेरी दोस्त शिखा, जो अभी बोस्टन में रह रही है, उसने वहाँ एक कम्युनिटी फंक्सन में इस ब्लॉग की दो पोस्ट्स अपनी आवाज़ में लोगो को सुनाई...एक स्टोरी-टेलिंग सेसन में...और शिखा को इसके लिए पहला पुरुस्कार भी मिला था.जब शिखा ने मुझे ये बात बताई थी की वो मेरी कहानी एक फंक्सन में पढने वाली है, तो मैंने मजाक में कह दिया था उससे...तुम अगर चाहो, तो सबको ये कह कर सुना सकती हो की ये कहानियाँ तुमने लिखी हैं, या अगर चाहो तो कोई दूसरी कहानी लिख कर मैं तुम्हे भेज सकता हूँ....लेकिन उसने मना कर दिया...खुद के पसंद की दो कहानियाँ उसने उस फंक्सन में सबको सुनाई और अंत में उसने मेरा भी नाम लिया, ये कह कर की इन दोनों कहानियों को मेरे एक दोस्त ने लिखा है, जो दिल्ली में रहता है.ये मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात थी.



जब से यहाँ मैंने लिखना शुरू किया है, बहुत से लोग मिले हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बहुत जायदा उत्साह बढ़ाया है मेरा...यहाँ लिखी जिनकी बातें पढ़कर और बेहतर लिखने का मन करता है.आज कुछ वैसे ही लोगों को थैंक्स कहने का दिल कर रहा है...वैसे ये थैंक्स कहकर फोर्मलिटी करने में मैं यकीन नहीं रखता लेकिन फिर भी, आज के दिन जब ये लिख रहा हूँ...बाईस नवम्बर का समय भी है और सौ पोस्ट इस ब्लॉग के पूरे भी हो चुके हैं तो दिल की बात सुन रहा हूँ, और ये थैंक्स आप सब के नाम....

सबसे पहले तो प्रियंका दीदी, अगर आप ना होती...तो ये ब्लॉग शायद कब का इनएक्टिव हो गया होता...कितने ही पोस्ट्स इस ब्लॉग पर सिर्फ आपकी वजह से लग पाए हैं.मुझे डांट डांट कर आप पोस्ट्स लिखवाती हैं...और ये पोस्ट के लिए भी मुझे आप कई दिनों से डांट रहीं हैं....मेरा होमवर्क था की इसे मैं बाईस तारीख के शाम में लगाऊं...लेकिन अपना होमवर्क पूरा नहीं कर पाया समय पर.आपने मुझे आज तक का ग्रेस टाईम दिया है, तो देखिये मुझे पनिशमेंट न झेलनी पड़े, इस वजह से मैं इसे आज रात पोस्ट कर रहा हूँ..ये जानता हूँ की इसे पोस्ट कर भी दूँ, तो आप एक दूसरा होमवर्क लेकर मेरे सर पर बैठ जायेंगी...लेकिन कोई बात नहीं, मुझे अच्छा लगता है आपके दिए गए टास्क को पूरा करना.
दीदी, आप युहीं मेरे से पोस्ट लिखवाते रहिये, मैं बहुत आलसी हूँ लिखने में...आप हैं तो ये विश्वास भी है की ये ब्लॉग अब कभी इनएक्टिव नहीं होगा.

सलिल चचा.....इस ब्लॉग का ही शुक्रिया अदा करूँगा की आपसे मुलाकात हुई.सबसे खूबसूरत बातें आपकी ही होती हैं मेरे हर पोस्ट्स पर...कई कई बार तो आपकी तारीफ़ सुन कर दिल बहुत खुश हो जाता है, तब यकीन दिलाना मुश्किल होता है खुद को की क्या मैंने सही में अच्छा लिखा है? लेकिन आप तारीफ़ के साथ साथ गलतियाँ भी बता देते हैं, और मुझे बहुत अच्छा लगता है....लगता है जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे बता रहा हो की देखो तुमने यहाँ यहाँ गलतियाँ की हैं.इस ब्लॉग के कुछ पोस्ट्स के लिए ख़ास तौर पर आपने दो तीन कवितायें लिखी हैं...जो की मेरे लिए अनमोल है.

शिखा वार्ष्णेय दीदी..आप तो हैं ही बहुत स्वीट, और आपके कमेंट्स भी आपकी ही तरह स्वीट होते हैं....दीदी, आपकी छोटे से स्वीट कमेन्ट का इंतजार हमेशा रहता है मुझे...कुछ ऐसे भी कमेंट्स हैं आपके जिन्हें पढ़कर मैं सिर्फ मुस्कुराता हूँ...नहीं, मैं नहीं बताने वाला वो कौन कौन से कमेंट्स हैं, आपको जानना हो तो आप खुद ढूँढ लें वो कमेंट्स.आप ऐसे ही स्वीट सी बातें यहाँ करते रहिये...इस ब्लॉग को आपके स्वीट कमेंट्स की जरूरत है, और हाँ, मेरी गलतियाँ भी सुधारते रहिये(यु नो व्हाट आई मीन)...मैं काफी गलतियाँ करता हूँ.

अनुपमा पाठक.....आपके बारे में क्या कहूँ मैं....आप खुद इतना सुन्दर इतना "अवसम" टाईप लिखती हैं, की मुझे कुछ भी कहने को शब्द नहीं मिलते...अक्सर आपकी कवितायें पढ़ते हुए लगता है की आपने हमारे ही मन की बातें कही हो कविताओं में.और आप जैसी लेखिकाएं जब इतने सुन्दर कमेन्ट करती हैं तो बता नहीं सकता मन कितना खुश हो जाता है.आपके कमेंट्स गज़ब का हौसला देते हैं बेहतर लिखने को.आप इस ब्लॉग का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं.

अर्चना बुआ...रश्मि दीदी....यूँ तो आप दोनों के कमेंट्स यहाँ कम मिले हैं, लेकिन उसे क्या फर्क पड़ता है? आप दोनों की बातें हमेशा बहुत खुश कर जाती हैं मुझे.रश्मि दीदी, आप तो शायद अब ब्लॉग की साईलेंट रीडर बन चुकी हैं, और कभी कभी अर्चना बुआ भी साईलेंट रीडर का रोल निभा देती हैं.अर्चना बुआ, आपके कहे अनुसार मैंने सोचा है जल्द ही एक पॉडकास्ट इस ब्लॉग पर लगाऊं.आप दोनों अपना स्नेह युहीं बनाये रखिये.

अनु जी(अनुलाता जी)..आपके कमेंट्स थोड़े "हट-के" होते हैं न,. भीड़ से एकदम अलग...अपनापन झलकता है आपके हर कमेंट्स से..चाहे वो फेसबुक पर हो या ब्लोग्स पर...बिना < 3 सिंबल के पूरे नहीं होते...खूब सारा प्यार भरा होता है आपके कमेन्ट में....और कभी कभी शायद ये प्यार थोड़ा ज्यादा दिख जाता है, जैसे की एक दफे आपने एक पोस्ट में कहा था "पढ़ते हुए मुझे लगा आप बिलकुल गुलज़ार के जैसा लिखते हैं". ये बहुत बड़ी बात आपने कह दी थी पोस्ट में....और मैं बहुत खुश हो गया था, उस दिन तीन चार बार पढ़ा था आपका ये कमेन्ट...युहीं अपना प्यार बनाये रखिये आप.

दिगम्बर नासवा...आप तो खुद ही इतने शानदार शायर हैं..कमाल की ग़ज़लें कवितायें लिखते हैं आप..एक दो नहीं कई बार पढ़ता हूँ आपकी कविताओं और गजलों को...आपकी यहाँ लिखी बातें कितना उत्साह बढाती हैं ये मैं बता नहीं सकता...आप नियमित रूप से हर पोस्ट पर अपना प्यार बरसा कर चले जाते हैं..बहुत अच्छा लगता है आपकी प्यार भरी बातों को अपने पोस्ट्स में पढना.

स्नेहा...आपका इंग्लिश ब्लॉग है, मैं ज्यादा इंग्लिश ब्लॉग नहीं पढ़ता, लेकिन आप कमाल लिखती हैं.आपसे युहीं एक दिन घूमते फिरते टकरा गया था मैं, और तब से आज तक हमारी दोस्ती कायम है और रहेगी.शिखा दीदी के लिए जो बातें कही है मैंने, वही दोहराना चाहूँगा, आप जितनी स्वीट हैं, उतने ही स्वीट आपके कमेंट्स भी होते हैं...एक बड़ा सा शुक्रिया आपको स्नेहा.


दिव्या...तुम्हे क्या कहूँ दोस्त? एक समय था जब ये ब्लॉग नहीं था तब भी मेरी हर कविताओं को तुमने झेला है, हमने गाँधी मैदान के आसपास घूमते टहलते जाने कितनी कहानियां बनायीं होंगी...अगर उस समय पता होता की कभी ब्लॉग पर लिखना शुरू करूँगा तो उन कहानियों को मैं सहेजते जाता...तुम एक समय इस ब्लॉग की सदस्य थी, लेकिन फिर बाद में तुमने ये कहकर ब्लॉग को अलविदा कह दिया की यहाँ सिर्फ मेरा नाम अच्छा लगता है, वापस इस ब्लॉग से जुड़ने के बारे में सोचना तुम....

अकरम...दोस्त, तुम्हे शुक्रिया कहे बिना ये पोस्ट पूरी नहीं हो सकती.तुमने हर पोस्ट पर अपनी राय दी है, और हर पोस्ट पर तुमने अच्छी बातें ही कही है.तुमसे तो कई कहानियाँ यूँ भी कह चूका हूँ मैं, और बाद में उन्हें ब्लॉग पर लगाया है.शुक्रिया दोस्त.

रुचिका, वरुण, अतिप्रिया , शुभ्रा, अनिल, प्रभा.....तुम सब बच्चों को मैं क्या कहूँ...तुम सब का ब्लॉग से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है...नाही तुम हिंदी की किताबें या कहानियां पढ़ते हो.....फिर भी मेरी लिखी बातों को, यहाँ लिखी कहानियों, कविताओं को तुम सब नियमित पढ़ते आये...और यकीन मानो, शुरू के कुछ पोस्ट इस ब्लॉग को सिर्फ और सिर्फ तुम सब के लिए ही लिखे थे मैंने...तुम सब हमेशा मुझे बहुत खुश कर देते हो.शुक्रिया तुम बच्चों का, और युहीं मेरी कहानियों को झेलते रहो...

इन सब के अलावा और भी कई लोग मिले हैं, जिनका शुक्रिया मैं अदा करना चाहता हूँ की उन्होंने इतना प्यार दिया मुझे....कुछ लोग जिन्हें आज याद कर रहा हूँ....
श्रेया, निवेदिता भाभी, वाणी गीत जी, स्नेहा, संगीता स्वरुप जी, ऋता दीदी, सोनल जी, प्रवीण भैया,  अनुराग शर्मा जी, ऋचा गुप्ता जी, गुंजन दीदी, अर्चना बुआ, प्रशांत, स्तुति, रश्मि दीदी, स्मृति, पूजा, अजय भैया, देव भैया, वंदना, आराधना जी ,समीर चाचा, शिवम् भैया, अनूप शुक्ल जी, देवेद्र पाण्डेय जी, अमिता नीरव जी, अमृता तन्मय जी, देवांशु, शेखर , गिरिजा जी , गायत्री गुप्ता जी, मोनिका जी, रश्मि प्रभा जी, अभिषेक भाई, मोनाली जी, माही जी, रीना मौर्य,रूचि जैन, पल्लवी जी, नितीश,मुकेश भाई, निर्मला कपिला जी.

बहुत से लोग मिले हैं इस ब्लॉग के सफ़र में अब तक...बहुत लोग ऐसे भी हैं शायद जिनका नाम मैं यहाँ लेना भूल रहा हूँ...जिनका नाम मैं यहाँ न ले पाया हूँ...उन सबको कहना चाहता हूँ की आपके बिना ये सफ़र मुश्किल होता..आप सब का शुक्रिया, साथ ही उन सभी लोगों का जो ब्लॉग नहीं लिखते हैं फिर भी ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...उन तमाम साईलेंट रीडर्स का जो ब्लॉग पढ़ते हैं......सभी उन साथियों को शुक्रिया जो किसी भी तरह से इस ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...ये ब्लॉग मेरे लिए बहुत ख़ास है, अपना स्नेह बस युहीं बनाये रखिये.......!


अभि 
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Wednesday, October 30, 2013

मैंने परी को देखा है..



आज से ठीक चार साल पहले की ३१ अक्टूबर की बात है..युहीं घूमते हुए एक ब्लॉग पर जा रुका था..एक कहानी सामने दिखी थी..."ज़िन्दगी बाकी है".मुझे कहानी काफी पसंद आई, सोचा की कुछ कमेन्ट कर दूँ, की तभी ब्लॉगर प्रोफाइल के तरफ ध्यान गया.सोचा कमेन्ट करने से पहले देख तो लूँ की आखिर किसका ब्लॉग है, नाम क्या है इनका? और क्या करती हैं?लेखिका हैं कोई या हम लोग टाईप टाईमपास ब्लॉगर.इनका प्रोफाइल क्लिक किया तो सबसे पहले जिस चीज़ पर नज़र गयी थी वो थी इनके फोटो पर...फोटो से बड़ी सुन्दर लेखिका लग रही थी..इनका नाम जानना चाहा तो देखा नाम के जगह लिखा था "कही अनकही".मुझे थोड़ी हंसी आ गयी थी, मैंने सोचा कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं, ब्लॉगर प्रोफाइल में अपना नाम लिखने के जगह अपने ब्लॉग का नाम ही लिख दिया है इन्होने..फिर इनका प्रोफाइल आगे पढ़ा...'अबाउट मी' सेक्सन के तरफ नज़र गयी तो मैं थोड़ा सा संभला...लिखा था "I have got my five books published, out of which two are awarded...I write basically in my mother tongue-Hindi- but there are some stuffs in English too.".. जो इनके बारे में पहली सोच थी की कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं वो सोच अब तब्दील हो गयी थी, की "अरे ये तो बड़ी हॉट-शॉट टाईप कोई चीज़ हैं".पांच किताबें, दो सम्मानित और इंग्लिश में भी कुछ लिखती हैं.अब मैं सोचने लगा था की कमेन्ट करूँ या न करूँ?? लेकिन उसके पहले दुविधा ये थी की इन्हें बुलाऊं किस नाम से?नाम तो इनके पूरे ब्लॉग पर कहीं नहीं लिखा था, नाही प्रोफाइल पर...कमेंट्स मोडरेसन लगाया हुआ था इन्होने तो कोई कमेन्ट भी नहीं दिख रहा था जहाँ से हिंट ले सकूँ, की तभी ध्यान गया की इन्होने कहानी में अपना नाम तो लिख ही रखा है, जिसे पता नहीं क्यों मैंने देखा ही नहीं था.खैर, नाम जानने के बाद और काफी सोच विचार करने के बाद मैंने कहानी के ऊपर कमेन्ट कर दिया(एज युज्वल, विद अ ग्रमैटिकल मिस्टेक)..मैंने सोचा नहीं था की इनका कोई जवाब भी आएगा, लेकिन अगले ही दिन या शायद उसी दिन ई-मेल के जरिये इनका एक औपचारिक सा जवाब आया था.हम दोनों के बीच बातचीत उसी ई-मेल से शुरू हुई थी.उस वक़्त हम दोनों में से किसी को ये नहीं मालुम था की एक सिम्पल ई-मेल से शुरू हुआ रिश्ता ज़िन्दगी भर का साथ बन जाएगा.

पहले ईमेल पर हुई उस औपचारिक बातचीत के बाद(जिसमे मुख्यतः झूठी तारीफ़ शामिल थी.."प्रियंका जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं", "अभिषेक जी आपका आभार, आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं".) हमारे बीच बातें लगातार होती रहीं, हम लगातार ईमेल एक्सचेंज करते रहे.बहुत जल्दी ही हमारे बीच सारी औपचारिकतायें मिट गयीं और दोस्ती हो गयी.अब ये याद भी नहीं की कितने ख़त(ई-मेल) हमने एक दुसरे को लिखे थे.वैसे यहाँ मैं ये बता दूँ की ये मैं फेसबुक के ज़माने की बात कर रहा हूँ..साल २००९-२०१० में फेसबुक काफी सक्रीय था और सभी लोग इससे जुड़े हुए भी थे..मैं भी था, ये भी थीं फेसबुक पर...लेकिन फिर भी हम एक दुसरे के फेसबुक अकाउंट से जुड़े नहीं थे.हमने तो फेसबुक पर बहुत बाद में एक दुसरे को एड किया था...हमारे बीच जो भी एक रिश्ता बना था वो किसी सोशल नेटवर्किंग साईट, चैट या फोन के माध्यम से नहीं बल्कि खतों के माध्यम से बना था..और हमें पता भी नहीं चला की कब और कैसे हम एक दुसरे के इतने करीब आ गए की एक दुसरे से हर बात शेयर करने लगे...चाहे वो दोस्तों की बातें हों, शहर की या परिवार की..हम पारिवारिक फंक्सन की तस्वीरें भी एक दुसरे को भेजने लगे..और बाद में तो ऐसा हो गया था की अगर एक का जवाब वक़्त पर ना आये तो दूसरा परेशान हो जाता था की "आखिर बात क्या है?अब तक जवाब क्यों नहीं आया?".

एक दिन युहीं बातों बातों में  मैंने इनसे पूछ ही लिया था, "आपको मैं दीदी बुला सकता हूँ?".इनके ख़ुशी का तो फिर कोई ठिकाना ही नहीं था...बड़ा खुश होकर इन्होने एक प्यारा सा जवाब भेजा था मुझे और कहा था "क्यों नहीं, तुम भी तो मेरे छोटे भाई ही तो हो"
और फिर ये बन गयीं मेरी प्रियंका दीदी और मैं बन गया इनका छोटा अभि भैया.अब सोचता हूँ तो ये असंभव सा लगता है की कभी कोई ऐसा भी वक़्त था जब हम एक दुसरे को नहीं जानते थे.जब कभी पुराने खतों को देखता हूँ तो हँसी भी बहुत आती है, की पहले इन्हें मैं "प्रियंका जी" कहता था और ये मुझे "अभिषेक जी".मुझे ये पता भी नहीं चला की कब ये मेरे लिए प्रियंका जी से प्रियंका दीदी बन गयीं और प्रियंका दीदी से सिर्फ "दीदी".और मैं कब इनके लिए अभिषेक जी से अभि भैया बन  गया और अभि भैया से सिर्फ "भाई".

अब कभी सोचता हूँ तो लगता है की कहाँ से अचानक यूँ चलते चलते इनसे मेरी मुलाकात हो गयी और पता भी नहीं चला की कैसे ये मेरी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गयीं...इतना की मेरे पल पल की खबर रखती हैं...मैं कब क्या कर रहा हूँ, कहाँ हूँ, वक़्त पर खा रहा हूँ या नहीं, सही वक़्त पर सो रहा हूँ या नहीं...मेरी हर बात का ये ख्याल रखती हैं.छोटी छोटी बातों पर परेशान भी बहुत हो जाती हैं..इनका फोन भी अगर रिसीव करने में देरी करूँ तो ये बहुत घबरा जाती हैं.मैं इन्हें समझाता हूँ की दीदी इतना जल्दी परेशान नहीं होना चाहिए, इनका जवाब होता है..."तुम्हारे लिए कैसे न परेशान हों हम?" . मेरी हर लापरवाही पर वैसे ही पुरे अधिकार से डांटती हैं जैसे माँ डांटती हैं.खाने पीने में, या तबियत ख़राब हो जब तब....हर ढंग से हर समय ये मेरे पीछे पड़ी रहती हैं..अब तो लगता है ऐसा की दो दी निगाहें मुझपर हर वक़्त लगी रहती हैं...एक मेरी माँ की और दूसरी इनकी.

मेरे पर ये हर हुक्म चला लेती हैं.जब कहता हूँ, की "देखो भाई पर इतना हुक्म चलाना ठीक नहीं"..तो कहती हैं "ये 'दिदिगिरी' तो तुमको हमेशा झेलनी पड़ेगी रे".दीदीगिरी इनकी कम खतरनाक नहीं होती है..अक्सर ये मुझे इमोशनल ब्लैकमेल भी कर देती हैं...पता नहीं कहाँ कहाँ से आईडियाज लेकर आती हैं ये भाई को इमोशनल ब्लैकमेल कर अपना काम निकलवाने का? वो काम इनका चाहे भाई को वक़्त पर खाना खिलाने का हो या उसे समय पर सुला देने का, ऐसी धमकियाँ देती हैं की इनका भाई चुपचाप इनका बात मान लेता है.
कोई गलती करूँ तो ये थोड़ा डांट भी लगा देती हैं मुझे(हाँ, थोड़ा ही डांट लगाती हैं, क्यूंकि भाई को ये खुल कर डांट भी नहीं सकती न, इतना प्यार करती हैं अपने भाई से).इनकी डांट से वैसे मुझे थोडा डर भी लगता है, ये आज कन्फेस कर रहा हूँ(ये जानता हूँ अच्छे से की यूँ इनके सामने ये कन्फेस करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, फिर भी).

लेकिन आमतौर पर इनका एक अलग ही रूप मेरे सामने रहता है, उस वक़्त मुझे बिलकुल नहीं लगता की ये मेरे से बड़ी हैं, कभी कभी इनसे पूछ भी देता हूँ मैं "तुमने सच तो बताया था न मुझे की मेरे से बड़ी हो तुम, या झूठ कह दिया था".अक्सर एकदम बच्चों जैसी हरकतें और जिद होती हैं इनकी.बदमाशियां तो इनकी रूकती ही नहीं हैं..कभी कभी जब मैं प्यार से डांट देता हूँ..."बहुत बदमाशियां कर रही हो तुम आजकल"..तो ये और भी बच्ची बन जाती हैं और कहती हैं "हाँ तो?भाई हो, झेलो मेरे इन नखरों को...".

जब भी इनसे मिला हूँ, इनकी ढेर सारी इललोजिकल और बकवास बातों को झेलना पड़ा है...मुझे देखते ही इन्हें लगातार हँसी के दौरे पड़ते रहते हैं और अजीब अजीब हरकतें करती रहती हैं.....खूब बदमाशियां भी कर लेती हैं ये मेरे सामने..मुझे ही उलटे चुप हो जाना पड़ता है...कभी कभी तो इन्हें संभाल लेता हूँ, लेकिन अक्सर इनकी बदमाशियाँ, इनकी हंसी, और इनकी ईललॉजिकल बातें आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो जाया करती हैं....वैसे ये भी सच है की जब ये बदमाशियाँ कर रही होती हैं, उस समय मन ही मन ये भी दुआ करता हूँ की इनकी ये हरकतें, ये बदमाशियां और हंसी के ये दौरे तामुम्र पड़ते रहे.

इन्हें हमेशा मेरे से शिकायत रहती है की मैं जब इनसे मिलने आता हूँ तो इनके लिए चोकलेट लेकर नहीं आता...ये मुझे धमकाती भी हैं बहुत, मैं फिर भी भूल जाता हूँ.अगली बार भी हम जल्दी ही मिल रहे हैं और ये अभी से ही मुझे याद दिला रही हैं चोकलेट लाने को...और मैं हमेशा की तरह इस बार भी जान बुझकर चोकलेट लाना भूल जाऊँगा.इनसे हुई पहली मुलाकात का एक मजेदार किस्सा भी है...वो बहुत खूबसूरत सा एक दिन था.मुझे याद है, जब इन्हें मैंने पहली बार देखा था, ये मेरे इंतजार में गेट पर खड़ी थीं और मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहती हाँ..."स्वागत है"...इन्होने उस समय "स्वागत है" कुछ इस तरह से कहा था, अपने दोनों हाथों को फैला यूँ वेलकम किया था की जैसे कह रही हों..."आ जाओ बेट्टा, अब बचकर कहाँ जाओगे?".
मैंने इन्हें पैर छू कर प्रणाम किया, उस समय भी दीदी की हल्की "दीदीगिरी" झेलनी पड़ी थी...इन्होने मुझे और नीचे झुकाया और कहा की पैर को अच्छे से छुओगे तब आशीर्वाद मिलेगा.मैंने भी इनके मन मुताबिक ही पैर को अच्छे से छूकर प्रणाम किया, इनका आशीर्वाद लिया.घर में इत्मिनान से बैठा ही था..चाय पानी पीकर थोड़ा आराम कर ही रहा था की मुझे अहसास हुआ ये बड़े इक्साइट्मन्ट से मेरी तरफ देख रही हैं..मैंने पूछा, क्या बात है दीदी? ऐसे क्या देख रही हो? इन्होने कहा, चलो जल्दी से मुझे मेरा चोकलेट दो तो.मुझे हँसी आने लगी..मैंने कहा आपके लिए कोई चोकलेट नहीं लाये.इनका चेहरा उदास हो गया था...कहने लगीं..."मैं कब से इंतजार कर रही थी की भाई जेब से अब चोकलेट निकालेगा की तब निकालेगा और भाई को देखो...खाली हाथ हिलाते हुए आ गया मेरे पास...चोकलेट क्यों नहीं लाये? मैंने दीदी की बात का जवाब नहीं दिया और सामने जो स्नैक्स रखा था उनपर कान्सन्ट्रेट करते हुए कहा इनसे..."अगली बार". ये कहाँ मानने वाली थीं..कहने लगीं...अगली बार नहीं, अभी जाओ..सामने ही दूकान है". इन्होने जिद दिखाया तो मैं भी जिद पर अड़ गया और बेशर्मों की तरह बैठा रहा.अंत में तंग आकर ये कहती हैं...मुझे पता था तुम मुझे चोकलेट नहीं खिलाओगे.
इनसे बाद की मुलाकातों में भी ये बात होती रही है, हर बार ये उम्मीद करती हैं की मैं इनके लिए चोकलेट लेकर आऊंगा और हर बार मैं चोकलेट लाना जान बुझकर भूल जाता हूँ...
वैसे दीदी, आप तो ये पोस्ट पढ़ ही रही हैं और अब तक समझ भी चुकी होंगी, की हम आपके लिए चोकलेट नहीं लाने वाले...अगली बार भी ये उम्मीद छोड़ दीजियेगा की हम आपको चोकलेट खिलाएंगे, अरे..बड़ी बहन
चोकलेट खिलाती है या छोटा भाई?

ये मेरे से खूब लड़ाई भी कर लेती हैं, और खूब नखरे भी दिखाती हैं...लेकिन कितनी भी ये लड़ाईयां करे, अपने भाई से जुडी हर बात से इन्हें प्यार है."भाई सब काम सही ही करता है ये इनका विश्वास है".इनके भाई की जब कोई तारीफ़ करता है तो भाई से भी ज्यादा ख़ुशी इन्हें होती है....भाई के लिखे स्टुपिड ब्लॉग पोस्ट्स की तो ये तारीफ़ करते नहीं थकती.वैसे भाई की तारीफ़ करना इनका फेवरिट काम है(और बड़ा गर्व भी है इन्हें इस पर).जब ये कहती हैं मुझसे(और अक्सर कहती ही हैं) की "काश भाई की तरह मैं लिख पाती", तो उस समय सच में मैं निशब्द हो जाता हूँ.खुद दीदी इतना अच्छा लिखती हैं, साहित्य की पता नहीं कौन कौन सी विधा जानती हैं ये, कहानियां, कवितायें, हाईकू और जाने क्या क्या में माहिर दीदी अपने भाई के लिए ऐसा कहती हैं तो ये उनका बस प्यार ही है.

सच में कुछ लोग होते हैं जो आपके ज़िन्दगी में जब आते हैं तब आपकी ज़िन्दगी बदल जाती है, और खूबसूरत हो जाती है..दीदी वैसे ही लोगों में से हैं.कभी कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता है की इतना प्यार करने वाली बहन से मिलना लिखा था.हर तरह से ये मेरे लिए एक सहारा बन जाती हैं...चाहे कितनी भी परेशानियों में रहूँ, ये मेरे साथ हर वक़्त रही हैं.अब खुद मैं अगर ज्यादा परेशान हो जाता हूँ तो इनके पास चला आता हूँ..कभी कभी तो ये यकीन होता है की इनकी बातों में सच में कोई मसीहा बसता है..थोड़ी देर भी इनसे बातें कर लेता हूँ तो सारी परेशानियां सारी चिंताएं पीछे छुट जाती हैं.मेरे लिए ये एक इन्स्परेशन भी हैं और मेरी स्ट्रेंथ भी.बहुत कुछ ऐसा है जो मैंने इनसे सीखा है.खासकर जिस जिन्दादिली से ये ज़िन्दगी जीती हैं, वो सच में कमाल है.हर परिस्थिति में, हर हालात में ये मुस्कुराते रहती हैं, हँसते रहती हैं.मैं सच में चाहता हूँ की काश मैं भी खुद में ये ऐटिटूड डेवलप कर सकूँ.

इनके कुछ बेहद करीबी लोग इन्हें कभी कभी "परी" कह कर भी बुलाते हैं...ये सच भी है, ये हैं भी परी जैसी...जो मेरी उदासियों और तकलीफों को ही नहीं बल्कि जाने कितनों की उदासियों को अपने प्यार की छड़ी घुमा कर छूमंतर कर चुकी हैं.कभी कभी लगता है की मेरे लिए तो ये एक परी ही हैं जो जाने कितनी आसानी से मेरी सारी चिंताओं को दूर कर देती हैं...

आज के दिन, जब दीदी का जन्मदिन है...तो मैंने सोचा की दीदी के लिए ये एक छोटा सा तोहफा, एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में उन्हें दे दूँ मैं.कम से कम अपनी प्यारी परी जैसी दीदी के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ मैं...

तो,
अ वैरी हैप्पी बर्थडे टू यु दीदी....!
आप युहीं मुस्कुराती रहिये, हँसते रहिये और खूब बदमाशियां करते रहिये....! 

एक कविता जो कहीं पढ़ी थी कभी किसी मैगज़ीन में उसे आपके नाम कर रहा हूँ -

"भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,"


दीदी, तमाम उम्र दुआएं रहेंगी आपके नाम ! हमेशा खुश रहिये आप !




दीदी से जुडी इस पोस्ट को "मेरी बातें" पर ना लगाकर यहाँ लगाने की एक वजह भी है.ये जो ब्लॉग है,जितना मेरा है, उससे कहीं ज्यादा इस ब्लॉग पर दीदी का अधिकार है.पिछले कई पोस्ट्स ऐसे हैं जो सिर्फ दीदी के कहने पर मैंने लगाए हैं.मुझे बाकायदा धमकियाँ मिलती थी, "बहुत दिन हो गए पोस्ट लिखे, चलो आज कोई अच्छी पोस्ट लिख दो". जून में लिखी "दिल्ली डायरी" तो पूरे तौर पर इन्होने धमका धमका कर लिखवाया था मेरे से....फोन पर धमकियां देती थी.."तुम लिखोगे की नहीं?" और तब तक ये मेरे पीछे पड़ी रही थी जब तक मैंने वो तीनों पोस्ट लिख कर यहाँ लगा न दिया था.वैसे ये क्यों मुझे हमेशा नयी पोस्ट लिखने के लिए धमकाते रहती हैं ये भी अच्छे से जानता हूँ मैं...इन्हें भाई की तारीफ़ करने की एक और वजह जो मिल जाती है..मेरी एक नयी पोस्ट का हैंगओवर इनपर तब तक चढ़ा रहता है जब तक दूसरी कोई और पोस्ट न लगा दूँ..कहने का अर्थ इतना सा है की ये उस हैंगओवर से एक अरसे से बाहर नहीं निकली हैं...कभी कभी इनको दौरे चढ़ते हैं तो भाई की पुरानी सभी पोस्ट एक सिरे से पढ़ जाती हैं, और फिर मुझे अपने भाई की तारीफें सुना सुना कर पका डालती हैं..


आज इस ब्लॉग की ये सौवीं(100th)पोस्ट भी है, सेंचुरी पोस्ट, जो डेडीकेटेड है मेरी दीदी को !  




continue reading मैंने परी को देखा है..

Monday, October 28, 2013

सर्दियों की आहट और मौसम का पहला खत..तुम्हारे नाम


बहुत दिनों बाद तुम्हे आज खत लिखने बैठा हूँ...ये खत तुम्हे क्यों लिख रहा हूँ ये मैं नहीं जानता.क्या लिखूंगा इस खत में ये भी नहीं जानता..बस जानता हूँ तो इतना की आज की रात तुम्हे एक ख़त लिखना है, सो खत लिख रहा हूँ.पिछले कुछ खतों की तरह इस ख़त को भी मैं तुम्हे दे तो नहीं पाऊंगा लेकिन फिर भी लिख रहा हूँ.जिस फोल्डर में तुम्हारे नाम लिखी बाकी की सभी चिट्ठियां रखी हुई हैं उसमे इस खत को भी रख दूंगा, कभी तुम आओगी अगर तो इन खतों को पढ़कर तुम्हे सुनाऊंगा.

आज शाम से ही तुम्हारी बड़ी याद आ रही है..तुम्हारी छोटी बड़ी शरारतों को याद कर के लगतार मुस्कुरा रहा हूँ.कुछ देर पहले एफएम पर एक गाना सुन रहा था, और उसे सुनते हुए लगा की सच में उस गाने की एक लाईन ख़ास तुम्हारे लिए ही लिखी गयी है..."जग मुझपे लगाए पाबंदी, मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की...".
सच में, तुम इस दुनिया की नहीं हो...इस दुनिया से अलग कोई लड़की हो तुम.सोचता हूँ कभी तो लगता है की तुम बाकी सभी लड़कियों से कितनी अलग हो.कहाँ बाकी लडकियाँ ऐसी बहकी बहकी बातें सोच लेती हैं जैसे तुम सोचती हो?तुम्हारी हरकतें भी तो अजीब होती हैं न, कहाँ सब लडकियाँ ऐसी हरकतें करती हैं? चींटियों को तुम देखती हो, उनसे बातें करने लगती हो?तुम आसमान में सड़क बनाने की बात करती हो...तुम्हे लगता है की तुम कोई जादू करोगी और दो हथेलियाँ हमेशा के लिए आपस में जुड़ जायेंगी...फुल और पत्तियों को तुम अपने बैग में जमा कर लेती हो..हर मौसम के अजीब अजीब लौजिक्स और नियम होते हैं तुम्हारे...कहाँ सब लडकियाँ ऐसी होती हैं? कहाँ सबकी ऐसी सोच और ऐसी हरकतें होती हैं? सच में तुम इस दुनिया की नहीं लगती हो...जितनी अजीब हो तुम उतने ही अजीब तुम्हारे लौजिक्स होते हैं....

एक दफे याद है, तुमने पता नहीं किस बात पर कहा था मुझसे की सर्दियों में पर्पल रंग 'लकी' होता है..और जितना संभव हो हमें पर्पल रंग का इस्तेमाल करना चाहिए.तुमने जिस दिन ये बात कही थी उसके अगले ही दिन तुमने मुझे एक पर्पल रंग की डायरी लाकर दी थी..उसे देते हुए तुमने कहा था, की इसमें तुम अपनी कवितायें लिखना, सर्दियों वाली कवितायें..किसी और मौसम की कवितायें इस डायरी में लिखना अलाउड नहीं है.याद है न तुम्हे, मैं कितना हँसा था इस बात पर..और मेरे हँसने पर तुमने कैसे अपने बैग को घुमा कर मेरी पीठ पर दे मारा था...और रूठ गयी थी तुम...
लेकिन सच में यार, क्या गज़ब की लौजिकल थिंकिंग थी तुम्हारी....? पर्पल रंग का इस्तेमाल सर्दियों में करना चाहिए???हैरत होती थी मुझे की तुम कैसे ये सब बातें सोच लिया करती हो? मुझे तो कभी भी तुम्हारी ऐसी लॉजिकल बातें समझ में नहीं आती थीं, और अगर गलती से भी मैं कुछ भी कहता तुम्हारे इन लौजिक्स पर तो तुम नाराज़ हो जाया करती थी....मुझे ही क्या??किसी को भी तुम्हारी ये बातें समझ में नहीं आती थीं.कोई अगर इन बातों को समझने की कोशिश भी करे तो कैसे?तुम तो इनका अर्थ बताने से रही..और कोई खुद से अंदाज़ा लगाए भी तो कहाँ तक? अरे पर्पल रंग का सर्दियों से क्या कनेक्सन होता है? पर्पल रंग के डायरी में सिर्फ सर्दियों में ही क्यों लिखना चाहिए? इन बातों को कोई समझे भी तो कैसे??अब हर के पास तो तुम जैसा यूनिक दिमाग है नहीं.

खैर...आज शाम तुम्हारी लौजिक्स के पीछे नहीं भागने वाला हूँ, आज तो बस युहीं बातें करने का मन कर रहा है...पता है यहाँ सर्दियाँ शुरू हो गयीं हैं.शायद तुम्हे मैंने सबसे ज्यादा खत सर्दियों में ही लिखे हैं...है न? तुम्हे जो पहला खत मैंने दिया था वो भी सर्दियों में ही लिखा था न और तुम्हे अपने हाथों से दिया था.शायद नवम्बर की पहली तारीख थी वो? है न? दिवाली के तीन दिन पहले की एक शाम थी.तुम दिवाली की छुट्टियों में कलकत्ता जा रही थी.और मैंने तुम्हे मिलने के लिए बुलाया था.मिलने का तो बस बहाना था, मैं तुम्हे एक लम्बा खत देना चाहता था...वो ख़त भी क्या था, पूरा एक नोटबुक ही तो था जिसे मैंने पता नहीं किन रैंडम बातों से पूरा भर दिया था...

याद है न तुम्हे? वो पतली सी स्पाईरल बाईंडिंग वाली एक नोटबुक थी और उसी में तुम्हे मैंने लेटर लिखा था(तुमने बाद में उसे एक नाम भी दे दिया था "नोटबुक लेटर"). सच कहूँ तो मेरा कोई इरादा नहीं था उस नोटबुक में लिखने का...एक दिन पहले मैं तो स्टेशनेरी गया था एक लेटर पैड खरीदने, लेकिन ये नोटबुक वहां दिख गयी...बड़ी खूबसूरत सी थी तो मैंने तुरंत खरीद भी लिया इसे.जाने क्या सोच कर मैंने पहले पन्ने पर तुम्हारा नाम लिखा और फिर तुम्हे खत लिखना शुरू कर दिया...पूरी शाम मैं लिखता रहा हूँगा, और जब रात में डिनर के लिए माँ ने आवाज़ लगाई थी तब तक मैं नोटबुक के आखिरी पन्ने पर पहुँच चूका था....मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई की तुम्हे मैं पहली चिट्ठी लिख रहा हूँ और वो भी इतनी लम्बी?ये तो जैसे एक डायरी ही लिख दिया था मैंने तुम्हारे नाम..लिखने के बाद मैंने जोड़ा तो नहीं था लेकिन बाद में तुमने ही एक दिन बताया था की उस नोटबुक में बत्तीस पन्ने थे.

वो शाम तो तुम्हे अच्छे से याद है न जब मैंने तुम्हे वो खत दिया था? ...ऑफ़कोर्स तुम्हे याद होगा.
हम दोनों चाहे भी तो उस शाम को भूल नहीं सकते हैं...दिल में फ्रिज होकर रह गयी है उस शाम की तस्वीर.कितनी खूबसूरत शाम थी न वो? नवम्बर की पहली तारीख थी और सर्दियों की शुरुआत हो गयी थी...सड़कों पर तो कुछ लोग गर्म कपड़ों में नज़र आने लगे थे...लेकिन बहुत से लोगों ने अब तक स्वेटर और जैकेट्स पहनने नहीं शुरू किये थे.मैं उनमे से था...सिर्फ एक टी-सर्ट पहन कर तुमसे मिलने चला आया था..
और तुम..तुम बाकायदा गर्म कपड़ों में थी...एक जैकेट, हाथों में दस्ताने(सिरसली यार? वो हाथों में दस्ताने पहनने के दिन थे क्या?) और एक बड़ा ही स्टाईलिश सा वूलेन कैप, जिसे तुम्हारी दीदी लन्दन के किसी हाईफाई दूकान से खरीद लायी थी(तुमने ही तो कहा था एक बार की मेरी हाईफाई दीदी आयीं हैं लन्दन से, मेरे लिए हाईफाई टोपी लायीं हैं).
उस शाम तुमने जैसे ही मुझे देखा था, बिना किसी स्वेटर या जैकेट के तो तुमने एक जबरदस्त डांट लगा दी थी मुझे "ऐसे हिरोगिरी दिखाओगे? ठण्ड लग जायेगी न तो सारी मस्ती निकल जायेगी". तुमने बिलकुल यही शब्द कहे थे और कुछ इतने ज़ोर से तुमने कहा था की पास ही खड़े कुछ लोग हमारी तरफ देखने लगे थे.


जैसे तैसे तुम्हे चुप करवा कर, तुम्हारी डांट सुन कर और अपनी गलती मानकर हम दोनों आगे बढे....शहर में एक नया कॉफ़ी शॉप खुला था.वो असल में कॉफ़ी शॉप तो था नहीं(ये नाम तो उसे हम दोनों ने दिया था न), वो फ़ास्ट फ़ूड का एक छोटा सा रेस्टुरेंट था, जहाँ कॉफ़ी भी मिलती थी...लेकिन हमने वहां कॉफ़ी या चिकन सूप के अलावा और कुछ कभी खाया हो ये याद नहीं आता.

एक तो तुम मेरे स्वेटर ना पहनने से नाराज़ थी और पहले की भी कुछ बातें थी जिससे तुम रूठी हुई सी थी..जैसे ही हम कोने वाली अपने रेगुलर टेबल की तरफ आगे बढे और वहां बैठते ही तुमने कहा था "साहब आजकल आप बहुत गलतियाँ कर रहे हैं, आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी मुझे मनाने के लिए"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा था, "मेरे पास भी तुम्हारी इस नाराजगी का एक गेरन्टीड ईलाज है", और ये कहते हुए मैंने बैग से उस नोटबुक को निकला और तुम्हारे आगे टेबल पर रख दिया..."लो, तुम्हारे लिए, दिवाली का तोहफा".
तुमने बड़े ही अजीब ढंग से उस नोटबुक को देखा था...जैसे वो नोटबुक ना होकर कोई रहस्मयी या जादुई किताब हो...फिर तुमने उसे अपने हाथों में लिया और बहुत देर तक तुम उसे हाथों में ही पकडे रही थी..जैसे ये तय नहीं कर पा रही हो की इसे खोले या न खोले..तुम बस उसे लगातार देख रही थी..नोटबुक के कवर पर मैंने हरे रंग के पेन से दो शब्द लिखे थे ..."फॉर यु".तुम शायद इन्ही दो शब्दों को लगातार देख रही थी..
कोई और वक़्त होता तो मैं शायद मजाक में ये भी कह देता..."चश्मा लगाने की नौबत आ गयी क्या?दो शब्द भी नहीं पढ़ा जा रहा तुमसे.."
लेकिन तुम्हारा चेहरा लाल सा हो आया था...तुम एकाएक बहुत इमोशनल सी हो गयी थी..उस नोटबुक को तुमने फिर वापस टेबल पर रख दिया और मेरी तरफ देखते हुए पूछा था तुमने "क्या है ये?क्या लिखा है इसमें?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया था...तुमने थोड़ा और सोचा और फिर कहा था "ओके, मैं इसे खोल कर देखने जा रही हूँ...आई डोंट नो इसमें क्या लिखा है तुमने? तुम्हारी कविताओं का कलेक्सन है क्या ? या वो जो मैं सोच रही हूँ? खोल कर देखती हूँ इसे...देखूं न?

और जैसे ही तुमने नोटबुक को खोला था, और उसपर लिखा अपना नाम पढ़ा था... "A letter to my princess ______ " तुम बिलकुल हैरान सी रह गयी थी.मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता उस वक़्त तुम्हारे चेहरा का क्या एक्स्प्रेसन था. तुमने कुछ भी नहीं कहा था, बस अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढँक लिया था और तुम्हारी आँखों में आंसूं आ गए थे...कुछ देर तक तुम कुछ भी बोल नहीं सकी थी..तुम बस मुझे देखती रही थी और फिर थोड़ी देर बाद तुमने कहा था "Oh My God! Its a notebook letter...मेरा ड्रीम था कोई मुझे ऐसा एक नोटबुक लेटर लिखकर दे..its my most precious gift...".कुछ देर तक तुम उसके पन्ने पलटते रही थी और फिर आँखों में जो कुछ बूंद आँसूं के आ गए थे उन्हें पोछते हुए तुमने कहा था..."बड़े क्रीएटिव हो गए हो यार...मेरी संगत का देखो तो कितना खूबसूरत असर हो रहा है तुमपर..."


आज भी जब उस शाम की बातें याद आती हैं तो चेहरे पर एक बड़ी मुस्कराहट आ जाती है...तुम्हारी बहुत याद भी आती है, जब इन बातो को याद करता हूँ...जानती हो तुम, अब अक्सर तुम्हे ख़त लिखने के बाद मैं किस चीज़ को सबसे ज्यादा मिस करता हूँ..तुम्हारे चेहरे के उस एक्स्प्रेसन को...बड़ी प्यारी सी मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर आ जाती थी....मेरी चिट्ठी को अपने हाथों में लेते ही कैसे तुम्हारा चेहरा खिल उठता था, आँखों में एक चमक आ जाती थी...तुम बहुत खुश हो जाया करती थी...शर्म और इक्साइट्मन्ट का मिला जुला भाव तुम्हारे चेहरा पर होता था...सच में मुझे तुम्हारा वो खुश चेहरा आज भी बहुत याद आता है...अभी ये चिट्ठी लिखते वक़्त भी मन में यही सोच रहा हूँ की काश तुम्हे मैं अपने हाथों से ये चिट्ठी दे पाता तो? लेकिन शायद अब ये मुमकिन नहीं है...

तुम्हे अपने हाथों से खत दे पाना अगर मुमकिन ना भी हो, तो भी तुम्हे चिट्ठी तो मैं लिख ही सकता हूँ न? इसमें तो कोई पाबन्दी नहीं है.......
तो देखो, आज इस मौसम की पहली चिट्ठी तुम्हे लिख रहा हूँ....इस बार सर्दियों में तुमसे ढेर सारी बातें करने का मन है...खूब चिट्ठियां लिखना चाहता हूँ तुम्हे...जाने कितनी और चिट्ठियां लिखूंगा इन तीन महीनों में....अभी तो ये पहली ही चिट्ठी है

बाकी और बहुत सी बातें हैं, वो अगले खत में.....!

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Thursday, October 24, 2013

टूटी हुई बिखरी हुई

शमशेर बहादुर सिंह की ये लम्बी कविता जाने कितनी बार पढ़ चूका हूँ..ये मेरी सबसे पसंदीदा कविताओं में से है!


टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पांव के नीचे
पत्तियां
मेरी कविता

बाल झड़े हुए, मैल से रूखे, गिरे हुए गर्दन से फिर भी
चिपके
....कुछ ऐसी मेरी खाल
मुझसे अलग सी, मिट्टी में
मिली -सी

दोपहर-बाद की धुप-छांह खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ...
खाली बोरे सूजों से रफ़ू किये जा रहे हैं....जो 
मेरी आँखों का सूनापन हैं

ठण्ड भी मुस्कराहट लिए हुए है
जो की मेरी दोस्त है !

कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...
मैं समझ ना सका, रदीफ़-काफिए क्या थे
इतना खफिफ़, इतना हल्का, इतना मीठा
उनका दर्द था!

आसमान में गंगा की रेत आइने की तरह हिल रही है
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं...
ना जाने कहाँ !

मेरी बांसुरी है एक नाव की पतवार-
जिसके स्वर गीले हो गए हैं
छप छप छप मेरा ह्रदय कर रहा है
छप.छप छप !

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है
वह दूकान मैंने खोली है जहाँ "प्वाइज़न" का लेबुल लिए हुए
दवाइयां हँसती हैं -
उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है

वह मुझ पर हंस रही है, जो मेरे होठों पर तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं

उसके चुम्बन की स्पष्ट परछाइयाँ मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्पे से मेरे मुह को कुचल चुकी हैं
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है !

मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ !
मुझको सूरज की किरणों में जलने दो -
ताकि उसकी आंच और लपट में तुम
फौव्वारों की तरह नाचो !

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो
ताकि उनकी दबी हुई खुश्बू से अपने पलकों की
उनिन्दी जलन को तुम भिगा सको, मुमकिन है तो !
हां, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाजे की शर्माती चूलें
सवाल करती हैं बार - बार .... मेरे दिल के
अनगिनत कमरों से

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
....जिनमें वो फंसने नहीं आती
जैसे हवाएं मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पाती
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ

आइनों, रोशनी में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो
आइनों, मुस्कुराओ और मुझे मार डालो
आइनों, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ !

उसमें काटें नहीं थे - सिर्फ एक बहुत
काली, बहुत लम्बी जुल्फ थी जो ज़मीन तक
साया किये हुए थी.... जहाँ मेरे पांव
खो गए थे !

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक ज़िन्दा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा !

और तब मैंने देखा की मैं सिर्फ एक साँस हूँ जो उसकी
बूंदों में बस गयी है
जो तुम्हारे सीनों में फांस की तरह ख्वाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी

मैं उसके पाओं पर कोई सिजदा ना बन सका
क्यूंकि मेरे झुकते ना झुकते
उसके पांव की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गई थी !

जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफाफा
तुम्हारे हाथ आया
बहुत उल्टा-पल्टा - उसमें कुछ ना था -
तुमने उसे फेक दिया - तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्हें 'मैं" लगा ! तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीँ छोड़ दिया!  मैं तुमसे
यों ही मिल लिया

मेरी यादाश्त को तुमने गुनाहगार बनाया - और उसका 
सूद बहुत बढाकर मुझसे वसूल किया ! और तब 
मैंने कहा -अगले जनम में ! मैं इस
तरह मुस्कुराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ ग़मगीन मुस्कुराते हैं!

मेरी कविता की तुमने खूब दाद दी - मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सूना रहे हो 
तुमने मेरी
कविता की खूब दाद दी

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया:
और जब लपेट ना खुले - तुमने मुझे जला दिया
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे: और वह
मुझे अच्छा लगता रहा !

एक खुश्बू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गई है, जैसे तुम्हारे नाम की नन्ही-सी
स्पेलिंग हो, छोटी-सी प्यारी सी, तिरछी स्पेलिंग,

आह, तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है !

अगर मुझे किसी से इर्ष्या होती तो मैं
दूसरा जन्म बार बार हर घंटे लेता जाता:
पर मैं तो इसी शरीर में अमर हूँ
तुम्हारी बरकत

बहुत से तीर, बहुत सी नावें, बहुत से पर इधर
उड़ते हुए आये, घूमते हुए गुज़र गए
मुझको लिए सबके सब | तुमने समझा
की उनमें तुम थे ! नहीं, नहीं, नहीं !
उनमें कोई ना था ! सिर्फ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं! फ़क़त !!
continue reading टूटी हुई बिखरी हुई

Sunday, September 29, 2013

देखो रूठा न करो...


उन दोनों की जोड़ी कमाल की थी, जहाँ एक तरफ लड़का शर्मीला और कम बोलने वाला था, वहीँ दूसरी तरफ लड़की बिंदास और हमेशा नयी शरारतें करने वाली.लड़की को सबसे ज्यादा चिढ़ लड़का के कम बोलने वाले ऐटिटूड से थी..वो हमेशा इस बात से चिढती थी, की लड़का उससे खुल कर प्यार जताने में हिचकता है, खतों में लाख वो अपना प्यार दिखाए...उसके लिए कवितायें लिखे लेकिन कभी लड़की के सामने खुल कर प्यार नहीं जताता था.लड़की कहती उससे "काश कभी तुम अपनी मर्ज़ी से भी कुछ प्यार भरी बातें मुझसे कर लिया करो..." लड़का इस बात का कोई जवाब नहीं देता, और तब लड़की रूठ जाया करती थी.फिर लड़का उसे मनाता, उसकी हर फरमाईश पूरा करता और अंत में लड़की लड़का से वो सब कहलवा लेती जो वो सुनना चाहती!

लड़की के पास कई ट्रिक्स होते थे, जिन्हें वो लड़के पर आजमाती थी और लगभग हमेशा उसे कामयाबी मिल ही जाया करती थी.वो पूरी प्लानिंग के साथ अपने ट्रिक्स को एक्सक्यूट करती थी..कहीं कोई मिस्टेक नहीं.लडक के जवाब पर भी उसका कंट्रोल होता था.उसे पता रहता हमेशा की कौन सी बात कहने पर लड़का कौन सा जवाब देगा..और वो इन्ही सब बातों के आधार पर अपना कंवरसेसन पहले से प्लान कर लिया करती थी.लड़की को गाने का शौक था, वो हमेशा उसे अपने पसंदीदा गाने गाकर लड़के को सुनाती थी.एक तरह से उसके ट्रिक गानों में ही छुपे होते थे.

वो जुलाई का कोई दिन था.दोनों अलग अलग शहरों में रह रहे थे, और दोनों के शहर में बारिश हो रही थी, एक ही वक़्त.दोनों एक दुसरे से बात कर रहे थे, फोन पर नहीं बल्कि फेसबुक चैट पर.लड़की को अचानक याद आया की पहले जिस दिन भी बारिश होती थी, वो लड़के के साथ अन्ताक्षरी खेलती जरूर खेलती थी.ये लड़की ने एक नियम सा बना रखा था.बारिशों के मौसम के ऐसे कई नियम लड़की ने बनाये थे.लड़का हमेशा अन्ताक्षरी खेलने से बचना चाहता था..लड़के की दो वजहें थी..एक तो ये की लड़की का नियम था, की पुरे सुर में वो गाकर लड़की के गाने का जवाब दे.अन्ताक्षरी से घबराने की लड़के की दूसरी वजह थी लड़की की गुंडागर्दी.अन्ताक्षरी के दौरान अगर लड़के को 'ह' से कोई गाना गाना होता और वो जो भी गाना चुनता गाने के लिए, लड़की फौरन कहती "नहीं तुम इसे नहीं गा सकते, ये मेरा फेवरिट है, मैं गाऊँगी जब मुझे 'ह' से गाना गाना होगा...तुम कोई दूसरा गाना चुन लो".लड़की के तो कई गाने फेवरिट थे, और लड़के के हर गाने पर लड़की को ऐतराज़ था.."नहीं ये भी नहीं, दूसरा गाना गाओ..." इस गुंडागर्दी से परेसान लड़का कभी अन्ताक्षरी में जीत नहीं पाता था..और जब लड़की जीत जाया करती थी, तो अक्सर लड़का को उसकी जीत सेलिब्रेट करने के लिए उसे समोसे और कोल्डड्रिंक खिलानी पड़ती थी.कभी अगर लड़का गलती से जीत गया, तो लड़के की मुश्किलें और बढ़ जाया करती थी...उसे लड़की को मानना पड़ता, ये कहना पड़ता...की उसने चीटिंग की है, तभी वो जीता है....और अंत में लड़की का मूड ठीक करने उसे फिर से उसे ट्रीट देनी पड़ती थी.

ऐसे कई मुश्किलात थे जिसके वजह से लड़का अन्ताक्षरी खेलना नहीं चाहता था.कभी किसी दिन अगर लड़के ने मना भी कर दिया अन्ताक्षरी खेलने से, तो लड़की खुद अकेले ही खेलने लगती थी.लड़का कुछ काम में उलझा रहता और लड़की चुपचाप कुछ गुनगुनाते रहती.लड़के को लगता की लड़की कोई गाना गुनगुना रही है, और वो उसपर ज्यादा ध्यान नहीं देता.जब लड़की चुप हो जाती, तो लड़का पूछता, गाना क्यों बंद कर दिया? लड़की का जवाब होता.."मैं गाना नहीं गा रही थी, हम दोनों अन्ताक्षरी खेल रहे थे न.." तुम्हारे बारी का गाना भी मैं गा रही थी, और पता है क्या...तुम हार गए, मैं जीत गयी....बस अन्ताक्षरी खत्म..."

चैट के दौरान भी लड़की ऐसे ही अन्ताक्षरी खेलती उसके साथ.लड़का जब ऑफलाइन होता तो अक्सर लड़की उसी वक्त अन्ताक्षरी खेलती थी, ताकि लड़का उसे डिस्टर्ब न करे..लड़का जब ऑनलाइन आता तो देखता मेसेज में सिर्फ गाने के बोल भरे पड़े हैं, और अंत में एक लाइन लिखा है "तुम आज फिर से हार गए...".उसकी ऐसी नौटंकियों से लड़का खुश हो जाया करता था.वो उस वक़्त दुनिया की सारी परेशानियाँ भूल जाया करता था और सिर्फ मुस्कुराता था.

जुलाई के वो बारिश वाले दिन भी लड़का लड़की जब चैट पर थे, तो लड़की ने लड़के से जिद की अन्ताक्षरी खेलने की...शायद लड़की ने जिद कुछ ज्यादा ही कर दी थी, लड़का इस बार नाराज़ हो गया, लिखा उसने "कभी तो तुम सिरिअस हो जाओ, हमेशा बचपना"...कुछ देर तक लड़की का कोई जवाब नहीं आया, फिर कुछ देर बाद लड़की का जवाब आता है -

"देखो रूठा न करो, बात नज़रों की सुनो...हम न बोलेंगे कभी...तुम सताया न करो... :)"

"चुप रहो "

"हाय कितना क्युटली मैंने कहा था.. :'( और तुम गुस्सा हो गए? "

"हाँ.."

"तो क्या बात भी नहीं करोगे मुझसे? नाराज़ होगये इतनी छोटी सी बात पर??"

"हाँ..."

"चेहरा तो लाल हुआ, क्या क्या हाल हुआ...इस अदा पर तेरी मैं तो पामाल हुआ
एच्क्युली...हुआ नहीं...हुई...मैं तो पामाल हुई!!!"

"सुनो, तुम बेकार में इतनी मेहनत कर रही हो, कुछ भी कर लो, मैं तुम्हारे साथ यहाँ चैट पर अन्ताक्षरी तो नहीं खेलने वाला..ग्रो अप!!"

"तुम बिगड़ने जो लगो और भी हसीन लगो... :) "

"तुम सच में पागल हो!!"

" हाँ इसमें क्या शक है, जब तुम सामने होते हो वैसे भी मैं पगला सी जाती हूँ न....
काश तुम होते यहां, देखते मेरा ये पागलपन...
कैसे मेरे चेहरे पर ४४० वाल्ट की स्माइल आई हुई है..इतना घूमते रहते हो, कभी इधर भी आओ न?"

"हाँ जल्दी ही आयेंगे.."

"दिल...?
उप्स, सॉरी........डील?"

"पागल हो तुम!!
हाँ डील!!! :) :) :) :) "

"हाय!!....जान पर मेरी बनी, आपकी ठहरी हंसी..हाय मैं जान गयी.......
अब आगे तुम गाओ..."

"दीखता नहीं तुम्हे मैं कुछ काम कर रहा हूँ, और सौ बार कहा है तुमसे मैं गाना नहीं गता हूँ..."

"पहली बात...तुम्हारे कमरे में कोई लाईव रिकॉर्डिंग हो रहा है, मुझे कैसे पता चलेगा तुम काम कर रहे हो?
और गाना गाने को कौन कह रहा है, बस टाईप ही तो करना है..."

"मैं नहीं गाने वाला बस...चाहे जो भी कर लो आज तुम...!"

"चलो छोडो, समझ गयी तुम नहीं गाने वाले...कद्र ही कहाँ तुम्हे मेरी?
अच्छा, सुनो एक बात.."

"हाँ, कहो न.."

"कल इजाजत देखी मैंने, फिर से...शाम में तुम्हारी दी हुई साड़ी भी पहनी थी..
घुमने भी गयी...बारिश में भींगी भी.."

"अरे वाह!!!"

"हाँ और मैं बहुत सुन्दर लग रही थी उस साड़ी में.बहुत क्यूट.तुम्हे तस्वीर भेजी तो थी.
लग रही थी न मैं सुन्दर?"

"ह्म्म्म...हाँ!!"

"क्या हम्म्म हाँ?? खुल कर कहो न जी!!इसमें भी क्या इतनी कंजूसी?
तीन वर्ड्स ही तो हैं..."तुम सुन्दर हो" कह दो न, प्लीज एक बार कह दो...मेरे लिए!!"

"अच्छा ठीक है!!!"

"क्या ठीक है??"

"कुछ नहीं..."

"" कुछ नहीं?कुछ नहीं??कुछ नहीं?????
बोरिंग कहीं के...बड़े आये "कुछ नहीं" बोलने वाले..
"भूच मही"  ""

"ये 'भूच मही' क्या है? "

" तुम्हारे मन में आया तो तुमने मुझे "कुछ नहीं" कह दिया :/
मेरा मन आये तो मैं "भूच मही" भी नहीं कह सकती..
मेरा वर्ड है!!मैंने ईजाद किया है इसे!!! " 

"ओफ्फ्फ!!!तुम बहुत परेसान करने लगी हो आजकल...
मैं लॉगआउट हो जाऊँगा यहाँ से..."

"धमकी मत दो तुम..खुद को सनी देओल समझ रहे हो क्या तुम?" 

"सनी देओल??"

" हाँ सनी देओल!!हर फिल्म में इतनी इतनी धमकियां देता है वो..हीरोइन को भी नहीं बख्शता!!बेचारे विलेन को डराता रहता है धमकियों से!!
तो तुम प्लीज सनी देओल मत बनो.!!धमकी मत दो!!

"तुम ये क्या बोले जा रही हो?दिमाग का वो जो पेंच ढीला था वो आख़िरकार लगता है निकल ही गया अपने जगह से और नीचे गिर गया??"

"तुम्हे क्या पता? जब मैं उदास होती हूँ और रोने का मन करता है तो ऐसे ही बे-सर पैर की बातें करती हूँ.. इललॉजिकल बातें, यु सी!!"

"अच्छा, तुम जब उदास होती तब ही इललॉजिकल बातें करती हो क्या??"

"व्हाट डू यु मीन? क्या मैं हमेशा इल्लिजिकल बातें करती हूँ?"

"अब मैं क्या जानूं?शायद??"

"डोंट एवर टॉक टू मी लाइक दिस..!!!
डोंट यु एवर टॉक टू मी!!!! आई एम सो हर्ट!!!!
आई हेट यु!!
आई हेट यु!!
आई हेट यु!! "

कुछ समय तक लड़की का जवाब नहीं आया, लड़की लेकिन अब भी ऑनलाइन थी.लड़के को लगा शायद कहीं सच में लड़की ने बुरा नहीं मान लिया हो.वो थोडा घबरा सा गया.उसने सोचा नाज़ुक सा मन है इसका कौन सी बात दिल से लगा बैठे किसे पता...बेचारे लड़के ने आखिरकार कह ही दिया -

"अच्छा सुनो,न, देखो नाराज़ न हो तुम...
"हैं खुशी आज हमे, तेरे पहलू में गिरे...." देखो हमने गाना गया, तुम्हारे लिए...अब खुश न? "

लड़की का फिर भी कोई जवाब नहीं आया...

" अब भी नाराज़ हो...वैसे तुम सच में बहुत सुन्दर लग रही थी साड़ी में!!! लव यु!!! " 

लड़की का उधर से फ़ौरन मेसेज आया...

"बदमाश, इतनी देर लगा दिए तुम? और मैं डर गयी थी कहीं तुम मेरी मजाकिया नाराजगी का बुरा तो नहीं मान गए? दस मिनट से देखो कैसे स्क्रीन को घुर रही थी मैं!!!अब राहत मिली!!!

"तो ये नाटक था तुम्हारा? "

"जी हाँ, तुमसे ये प्यार के तीन शब्द कहलवाना इतना आसन है क्या? रात भर प्लानिंग की है!! एक एक कदम फूंक फूंक कर रखा है, तब जाकर तुम्हरे ज़बान से क्यूट से ये शब्द बाहर आये हैं!!
देख लो तुम खुद,  दिल की धड़कन पर सनम, फुल सा हाथ रखो....... "

"बेशर्म..."

"आई डोंट केयर...हूँ तो हूँ बेशर्म...लेकिन तुम्हे पता नहीं तुमने कितना खुश कर दिया है मुझे आज.
आज तो मैं सारा दिन नाचती रहूंगी, गाती रहूंगी, मुस्कुराती रहूंगी..."

"हाँ क्यों नहीं, मुझसे अपनी मर्ज़ी के शब्द कहलवा जो लिए तुमने...."

"हाँ नहीं तो...मान गए न हमें तुम...बड़े 'वो' हैं हम !!! "


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Saturday, September 7, 2013

वो शाम कुछ अजीब थी....

(२)

वो शाम कुछ अजीब थी..
.....पार्क में बैठी हुई वो अपनी दोनों आँखें बंद कर पूरी तन्मयता से कवितायें सुन रही थी.मैं उसे कवितायें पढ़ के सूना रहा था और उसके चेहरे के भाव भी पढ़ने की कोशिश कर रहा था.उसे आज से पहले कविताओं पर इतना भावुक और गंभीर होते मैंने नहीं देखा था.वो हमेशा कविताओं को मजाक में उड़ा दिया करती थी, कहती की कविता समय की बर्बादी है.लेकिन मैं जानता था की उसे कवितायें पढ़ना अच्छा लगता है.स्कुल के दिनों में लंच ब्रेक में वो नज़र बचा कर चुपके से मेरे बैग से शायरी और कविता की पतली सी किताब निकाल कर अपने पास रख लेती और उसे अपनी कॉपी के बीच रख कर क्लास के दौरान चुपके चुपके पढ़ती रहती..और फिर छुट्टी होते ही बड़े चालाकी से उस किताब को वापस मेरे बैग में रख भी देती.उसे लगता था की मुझे ये बात पता नहीं..लेकिन मैंने बहुत पहले ये बात जान ली थी.बाद के सालों में भी जब पढाई के लिए वो बाहर गयी तब भी अक्सर खतों(ईमेल)में वो कविताओं की फरमाइश करती थी.फरमाईश करने का उसका तरीका अलग सा होता था.वो कभी सीधे कुछ भी नहीं कहती...बात को घुमा कर कहा करती थी..जैसे वो कहती - "क्या बात है? पिछली चिट्ठी में तुमने कोई कविता नहीं लिखी, लगता है इधर कोई कविता पढ़ी नहीं तुमने जिससे तुम्हे मेरी याद आये?". वो ये कहती और मैं समझ जाता की अगली चिट्ठी में उसे कोई कविता लिख कर भेजनी होगी.सच तो ये है की वो लाख दिखावा करे, लाख बिंदास, कुल और डेविल मे केअर ऐटिटूड का लबादा ओढ़े रहे लेकिन उसके मन का एक कोना ऐसा है जो बेहद सेंसिटिव है खासकर इन कविताओं और शायरी के मामले में...उसके मन का ये कोना कविताओं और गजलों पर जान झिड़कता है..और उस शाम कवितायें सुनते वक़्त उसकी आँखों में ये बात एकदम साफ़ नज़र आ रही थी...

शाम गहराई..और आसमान में काले बादल उमड़ आये थे.ऐसा लग रहा था की जोरों की बारिश आने वाली है.वो बादलों की तरफ देखने लगी.."नेचर इज एन अमेजिंग पेंटर...देखो तो लगता है की आसमान पर कोई एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग सी हो आई है"..उसने बादलों को देखते हुए कहा.."बहुत ज़ोरों की बारिश आने वाली है, देखो शाम पांच बजे ही इतना घना अँधेरा हो गया है.चलो अब चलते हैं...."
"क्यों, आज बारिश में तुम्हे भींगना नहीं है?" मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की..
वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी..
"नहीं...." कहकर वो उठी, अपना बैग उठाया और धीरे धीरे पार्क की गेट की तरफ बढ़ने लगी....

मैं भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा.

बारिश थोड़ी तेज़ हो गयी थी.हम गाड़ी में आकर बैठ गए.उसने गाड़ी में बैठते ही सीट को थोड़ा पीछे खींच लिया और अपने पैरों को डैशबोर्ड पर टिका दिया...और एक लम्बी अंगडाई लेते हुए उसने कहा "आई कैन डाई राईट नाऊ...आई एम सो हैप्पी, एट दिस मोमेंट....."
उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा...मैं मुस्कुराने लगा.वो भी मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी.
वो कुछ गुनगुना रही थी..याद नहीं कौन सा गाना..लेकिन कोई अंग्रेजी गाने के बोल थे.वो कार के खिड़की से बाहर देख रही थी और मैं.....मैं कभी डैशबोर्ड पर रखे उसके पांव को, उसपर लगे आसमानी नेलपॉलिश को, और कभी शीशे पर गिरती बारिश की बूंदों को देख रहा था.
तुम तो आज आसमानी दिख रही हो, मैंने मजाक के लहजे में कहा...
"और नहीं तो क्या, वो गाना भूल गए तुम...तुमने ही तो सुनाया था...आसमानी रंग है, आसमानी आँखों का...तो देखो हमने अपना रंग आज आसमानी कर लिया है..."
"कोई गाना सुनाओ न तुम मुझे?" उसने मुझसे कहा...
"मैं गाता नहीं हूँ, वो तुम्हारा काम है, या तो तुम गाना सुनाओ मुझे या स्टीरेओ ऑन कर खुद ही सुन लो.."
"मैं अभी गाने के मूड में नहीं हूँ, स्टीरेओ ही ऑन करती हूँ..." उसने कहा.

उसने गाड़ी का स्टीरेओ ऑन किया.मैंने एक सी.डी पहले से स्टीरेओ में लगा रखा था.उसने पूछा की कौन सी सी.डी लगी हुई है?
मैंने कहा "खुद ही सुन लो...चुन चुन कर गाने डाले हैं मैंने, ख़ास तुम्हारे लिए.."
उसने प्ले का बटन दबाया और पहला गाना चलने लगा...."आपकी आँखों में कुछ महके हुए से ख्वाब हैं..."
वो ख़ुशी से उछल पड़ी..."हाय राम ये तो मेरे फेवरिटेस्ट गानों में से है.....बहुत बदमाश हो तुम"
"अब तुम्हारे लिए इतना तो कर ही सकते हैं" मैंने उसकी तरफ देखा...वो बहुत खुश हो गयी थी....बस इस एक छोटी सी बात पर वो इतनी खुश हो जायेगी मैंने सोचा नहीं था.
वो गायिका के सुर में सुर मिलाते हुए गाने लगी...और मेरे कन्धों को झकझोरते हुए गाने के बहाने मुझसे पूछने लगी..."आपकी बातों में फिर कोई शरारत तो नहीं?" और फिर जब मैंने उसे डांटा तो खुद ही खिलखिलाकर हंस दी.
उसे यूँ खुल कर हँसता देख मुझे बहुत अच्छा लगा.पार्क में वो उदास थी और मुझे अच्छा लगा की एक गाना के बहाने ही सही उसके चेहरे पर रौनक वापस तो आई.

बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन उतनी तेज़ नहीं.उसने गाडी के शीशे को नीचे कर दिया...हवा बहुत तेज़ चल रही थी जिससे बारिश की बहुत सी बूँदें तेज़ हवा के साथ अन्दर आ गयी और एक एक कर सभी बूँदें उसके चेहरे पर ठहर गयीं.वो बारिश की बूंदों से खेलने लगी..दोनों हथेलियों को बाहर निकालकर बूंदों को पकड़ने की कोशिश करने लगी.बारिशों में ये उसका प्रिय खेल था.
उसने अपने बालों को खोल लिया था और क्लिप मुहं में दबाये अपने बालों को सँवारने लगी.सामने पड़ा अपना गॉगल्स उसने उठाया और उसे बालों में हेअर बैंड की तरह फंसा दिया...वो फिर आराम के मुद्रा में बैठ गयी...उसकी इस हरकत से मुझे हंसी आ गयी. मैंने सोचा की अच्छा मौका है उसे छेड़ने का, लेकिन जब तक मैं कुछ कह पाता वो मेरे तरफ देखने लगी..मुझे हँसते देख वो शायद समझ गयी की मैं कुछ विशेष टिप्पणी करने के मूड में हूँ...बनावटी गुस्से में सड़क की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा "सामने देखो..सामने... कंसंट्रेट प्लीज.."

उसने पांव अब तक डैशबोर्ड पर जमा रखे थे....और उसने देख लिया था की मेरी नज़र उसके पैरों पर है...उसे थोडा अजीब लगा की मैं उसके पैरों को यूँ देख रहा हूँ.उसे शायद ये डर था की इस चक्कर में कहीं मेरा ध्यान न बिगड़ जाए और मैं गाड़ी से किसी को ठोक न दूँ...
उसने मुझसे कहा "बत्तमीज लड़के..सामने देखकर गाड़ी चलाओ...मेरे पैर को यूँ क्या देखते हो?किसी सुन्दर लड़की के सुन्दर पैरो को कभी नहीं देखा क्या?"
मैं हँसने लगा..."मुझे तुम्हारे पैरो को देखकर एक फिल्म का डायलोग याद आ रहा है.."
वो भी हंसने लगी..."बदमाश!!जानती हूँ मैं..तुम्हे कौन सा डायलोग याद आया है.पाकीज़ा का डायलोग न?"
"हाँ..."
"तो कह दो, इतना सोचते क्या हो..." वो अब मुझे छेड़ रही थी.
"अब रहने भी दो, तुमने तो गेस कर लिया.अब क्या फायदा?"
"ह्म्म्म..." उसने बुझे हुए मन से कहा, शायद वो मेरे से कुछ और सुनना चाह रही थी..शायद वो डायलोग ही  सुनना चाह रही थी जो सच में उसके पैरों को देखते हुए मुझे याद आया था..

हालांकि उसके पैरों को देखते हुए मुझे वो डायलोग ही नहीं बल्कि कुछ और बातें भी याद आ रही थी...और उन बातों को याद करते हुए मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था.पहले स्कूल और कोचिंग के दिनों में उसे क्लास ना आने का बहाना बनाना होता तो वो हमेशा अपने पैर का बहाना बनती थी..कभी कहती "मेरे पैरों में बड़ा दर्द है", तो कभी "मेरे पांव में चोट लग गयी है.." एक बार तो उसने हद कर दिया था..एक दोस्त के जरिये उसने संदेशा भेजा था - "मेरे पैर की सर्जरी होने वाली है इसलिए मैं दो हफ्ते क्लास नहीं आउंगी.." हम सब ये बात सुनकर सन्न हो गए थे..की अचानक उसे क्या हो गया. बाद में जब पता चला की ये उसका सफ़ेद झूठ था तो हम सबने उसे खूब डांटा भी..इस हिदायत के साथ की वो अब फिर ऐसा बहाना कभी नहीं बनाएगी.
इसी तरह...एक दफे जब उसके पांव में हलकी सी खराश लग गयी थी, कोचिंग क्लास के दरवाज़े में ठुकी एक कील से, तो उसने इस जरा सी बात पर पूरा क्लास सर पर उठा लिया था...बाद में उसको सर ने उसे दो चोकलेट दिए तब जाकर उसका रोना कम हुआ था.

मैंने सोचा ये बातें उसे याद दिलाऊं.लेकिन एक तो वो किसी दुसरे ही ख्यालों में खोयी हुई थी,दूसरा मुझे ये डर भी था कहीं वो मेरी इस बचकानी हरकत पर हँसने न लगे की मुझे हर छोटी बड़ी चीज़ों पर पहले की कोई बात याद आ जाती है.

मैंने जब उसकी तरफ देखा तो वो सड़क की ओर देख रही थी...वो जाने किस सोच में थी...सड़क पर उसे जाने क्या नज़र आया रहा था जिसे वो लगातार देख रही थी और उसके चेहरे के भाव भी फ्रीक्वेंटली बदल रहे थे...कभी गुस्सा दिखाती कभी मुस्कुराने लगती...बहुत देर तक मैं सोचता रहा की आखिर वो देख क्या रही है, फिर बाद में मैंने गौर किया की वो डैशबोर्ड पर बैठे 'टेडी' को देखकर वैसी शक्लें बना रही थी.

वो टेडी से बातें करने लगी थी.उसने उसे एक नाम(चेरी) भी दे दिया था और मुझे हिदायत दी की मैं उसे आगे से इसी नाम से बुलाऊं.वो उसे कवितायें सुनाने लगी..मुझे थोडा आश्चर्य हुआ.टेडी को कविता सुनाने के बहाने वो पहली बार वो मुझे कोई कविता सुना रही थी.जब एक दो जानी पहचानी कविता के बाद एक टूटी फूटी कविता उसके ज़बान से निकली, तो मैंने आश्चर्य में पूछा उससे , ये कहाँ पढ़ा तुमने?किसने लिखा है?
उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा "एक पागल लड़की ने एक उदास शाम अपनी डायरी में ये कविता लिखी थी, सोचा तुम्हे सुना दूँ..कहो कैसी लगी?
"ये तुमने लिखा है? इतनी अच्छी कविता?सिरिअसली तुमने? वाऊ!!इट्स वंडरफुल!! आई मीन इट!"
मेरी इस तारीफ़ से वो बहुत खुश हो गयी.उसका चेहरा सुर्ख हो आया था, उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गयी थी.उसने बहुत कोशिश की अपनी ख़ुशी को छिपाने की..लेकिन उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कराहट फ़ैल आई थी जिसे छुपाने की कोशिश करना व्यर्थ था.
उसकी कविता सुनने के बाद मुझे पुरानी एक बात याद आई...जब बहुत पहले कुछ ऐसा हुआ था, मैंने एक छोटी सी कविता एक कागज़ पर लिखकर उसे दिया था.वो कविता पढ़ कर पहले तो बहुत खुश हुई फिर अचानक उदास हो गयी, कहने लगी..."काश तुम्हारी तरह मैं भी लिख पाती.."
मैंने तब उससे कहा था..."तुम जब चाहो मेरी तरह लिख सकती हो, मच मच बेटर देन मी..यु नो, हर लड़की बाई डिफाल्ट एक पोएटेस होती है". उस समय भी उसके चेहरे पर एक चमक दिखी थी और उसने कहा था उस दिन की वो जरूर कभी कोई कविता लिखेगी और मुझे सुनाएगी.

कविता सुनाने के बाद कुछ देर तक वो चुप रही, टेडी को देखकर शक्लें बनाती रही, फिर उसकी पलकें मेरी ओर उठ आयीं - "क्या सोच रहे हो तुम? मेरी कविता सुनकर अचानक चुप क्यों हो गए?
मैं चुपचाप उसकी ओर देखता रहा..मन में बहुत सी बातें थी, सोचा सब उससे कह दूँ, उसे ये भी बता दूँ की सुबह उसके मना करने के बावजूद मैं एअरपोर्ट गया था, बस उसकी एक झलक देखने के लिए...लेकिन मैं चुप रहा ये सोच कर की वो फिर से उदास हो जायेगी और मैं एअरपोर्ट गया था इस बात से मेरे से नाराज़ भी हो जायेगी..
एक शेर याद आ रहा है, मैंने धीरे से बात को बदलते हुए कहा.
"कौन सा शेर? तुमने तो वैसे ही आज कमाल कमाल की कवितायें और ग़ज़लें सुनाई है मुझे...सुना डालो ये शेर भी.."
"है एक शेर बशीर बद्र साहब का बड़ा मशहूर शेर है जिसे मैंने कल ही पढ़ा था किसी मैगजीन में और तब से मेरे मन में वो शेर घूम रहा है....सुनो, सुनाता हूँ...- "सर से पांव तक वो गुलाबों का शजर लगता है / बावज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है".
उसने मेरी तरफ अपना चेहरा किया, वो हंस रही थी..पूछती है मुझसे "वो" या "मैं".
मैं थोडा झेंप सा गया, बिना उसकी तरफ देखे मैंने मुस्कुराते हुए कहा "तुम"
"तब ठीक है..." वो कुछ देर तक मेरे चेहरे को देखती रही इस इंतजार में की शायद मैं कुछ और बोलूं.लेकिन मैं चुपचाप गाड़ी चला रहा था.

वो टेडी को देखकर कहने लगी "देख लो चेरी, तुम्हारे साहब आज मेरी जान लेकर रहेंगे, पूरी शाम ऐसे कातिलाना शेर और कवितायें सुनाये हैं ये"


बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी और ठंडी हवा चल रही थी..मौसम बहुत सुहावना और रोमांटिक हो गया था.अगस्त के महीने में ही सर्दियों का हल्का अहसास हो रहा था.हमने उस शाम रेस्टुरेंट जाने का अपना प्लान कैंसल कर दिया था, हम दोनों नहीं चाहते थे की ऐसी खूबसूरत शाम हम किसी रेस्टुरेंट में बैठ कर बर्बाद करें..हम शहर के उस कोने में आ गए थे, जो सबसे शांत..सबसे कम भीड़ वाला इलाका था, जो उसे और मुझे दोनों को पसंद था.वो शहर के एअरपोर्ट का इलाका था, जहाँ बहुत कम भीड़ होती है..और आप गाडी पुरे रफ़्तार में चला सकते हैं.मैंने भी गाड़ी की स्पीड एकदम से बढ़ा दी...वो रोमांचित हो गयी - "ये कार इतनी तेज़ भी जा सकती है.., लेट मी ड्राईव".उसने मुझसे आग्रह किया लेकिन मैं उसके ड्राईविंग स्किल के प्रति ज्यादा आश्वस्त नहीं था और मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था..इसलिए उसके आग्रह पर मैंने ज्यदा ध्यान नहीं दिया.

एअरपोर्ट, गवर्नर हॉउस, सेक्रटेरिअट, बेली रोड, चिड़ियाखाना और फिर एअरपोर्ट...हम इसी लूप में घूम रहे थे...और अजीबोगरीब बातें कर रहे थे..फिल्मों की, गानों की, रिश्ते की, दोस्तों की, प्रेम की...यहाँ तक की पुनर्जनम की भी बातें हमने उस शाम की थी..वो मुझे अपने शहर में, जहाँ से वो पढाई कर रही थी वहां के खूबसूरत सड़कों के बारे में बता रही थी....विक्टोरिया रोड, क्लैपहैम, रीजेंट कैनाल और पता नहीं कौन कौन से सड़कों के नाम उसने लिए थे.वो हर जगह के डिटेल्स मुझे एक टूर गाईड की तरह बता रही थी..और वहां की हर छोटी बड़ी खासियत मुझे समझा रही थी.

हम अपनी बातों में इतना मशगुल थे की कब शाम के साढ़े सात बज गए ये पता भी नहीं चला.उसने घर में कह रखा था की वो सात बजे तक वापस आ जायेगी, और आधा घंटा वो वैसे ही लेट हो गयी थी.
हमें और देरी हो जाती अगर बातों बातों में वो ये न बताती की उसने अपनी घड़ी वहां के किस मार्किट से खरीदा है और उस बहाने मुझे अपनी घड़ी न दिखाती(जिसमे साढ़े सात बज रहे थे) तो संभव था की हमें वक़्त का कुछ और देर ख्याल नहीं आता और जिससे उसको इंडिया में पहले ही दिन घर में अच्छी खासी डांट सुननी पड़ती.

हमारे पास अब मात्र पंद्रह बीस मिनट का वक़्त था...बस पंद्रह से बीस मिनट में उसके घर पहुँच जायेंगे और वो अपने घर चली जायेगी..और मैं? नहीं, मैं इतनी जल्दी घर नहीं जाऊँगा.घर में कहकर आया था की आज मुझे आने में देर हो जायेगी.मैं कुछ देर सड़कों पर और भटकूँगा...सीधे रात में डिनर के समय घर पहुंचूंगा.

हम दोनों सहसा चुप हो गए.ऐसा अक्सर होता था, पहले के दिनों में भी, जब उसके जाने की घड़ी आ जाती थी तो उसके कुछ देर पहले से ही हम दोनों के बीच चुप्पी आ जाती थी...और हम चुपचाप प्रतीक्षा करते थे उस समय का जब दोनों अलग अलग अपने घरों के लिए निकल जाएँ.

उस शाम भी जब से घडी में वक़्त देखा था की साढ़े सात बज रहे हैं तब से ही हम दोनों चुप थे..वो दूसरी तरफ देख रही थी, जाने क्या सोच रही थी वो? और मैं..? मैं सोच रहा था की "वो घर जाकर क्या करेगी? याद आया की उसने बताया था की आज पूरी रात वो अपनी बहनों के साथ गप्पें करने वाली है.
लेकिन मैं? मैं क्या करूँगा? घर पहुँच कर मैं क्या करूँगा? मैं ये सोचने लगा...मैं घर जाते ही अपने कमरे में घुस जाऊँगा, दरवाज़ा बंद कर लूँगा और सो जाऊँगा.....माँ आएगी मेरी पास, मेरे कमरे में...ये पूछने के लिए की कल जन्मदिन में क्या क्या तैयारियां करनी है...और मैं हमेशा की तरह उनसे कहूँगा, की कुछ भी ख़ास करने की जरूरत नहीं है.माँ फिर अपनी लिस्ट सुनाने लगेगी की उसे कल क्या क्या तैयारियां करनी हैं...और कौन कौन सी मिठाइयाँ वो बनाने वाली हैं....और फिर...और फिर वो जाते जाते मुझसे तुम्हारे बारे में पूछेगी..सुबह ही उन्हें बताया था मैंने की तुमसे आज मिलूँगा...और वो जब भी तुम्हारे बारे में पूछती है मुझसे, मैं बड़ा असहज सा हो जाता हूँ..फिर भी मैं उन्हें बताऊंगा...क्या बताऊंगा ये पता नहीं...शायद ये की हम आज बहुत देर तक घूमते रहे थे...माँ फिर और भी दुसरे सवाल करेगी जिसका जवाब मेरे पास नहीं होगा और मैं उन सवालों को टाल दूंगा...."तुम कभी पूरी बात नहीं बताते मुझे" ये शिकायत कर वो अपने कमरे में चली जायेंगी....फिर..फिर..मैं भी सो जाऊँगा.....नहीं, मैं सोयुंगा नहीं...मैं एक कविता लिखूंगा...हाँ, आज की रात मैं एक कविता लिखूंगा...बहुत दिनों बाद एक कविता लिखने का मन कर रहा है...और वो कविता मैं तुम्हे सुनाऊंगा अगली मुलाकात में..."

मैंने सोचा मन में आई ये बातें उसे बताऊँ, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं था...रात के आठ बज चुके थे और हम उसके अपार्टमेंट के सामने पहुँच भी चुके थे और वो जल्दी में थी...वो तेज़ क़दमों से चलते हुए अपने अपार्टमेंट के गेट के अन्दर चली गयी..जल्दबाजी में ठीक से बाय कहने का मौका भी नहीं मिला...बस उसने इतना कहा की कल सुबह वो फोन करेगी.
मैं वहीँ उसके अपार्टमेंट के सामने वाली चाय की दूकान में बैठ गया और जो वक़्त उसके साथ बिताया उसके बारे में सोचने लगा...चाय दूकान पर रेडिओ पर एक गाना चलने लगा था..."वो शाम कुछ अजीब थी..." मैं सोचने लगा, की ये शाम सच में अजीब ही थी....कितने ही रंग थे इस एक शाम में...




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Sunday, August 4, 2013

वो शाम कुछ अजीब थी...


वो शाम बहुत ख़ास थी...आज उस शाम को बीते कई साल हो चुके हैं लेकिन अभी भी याद ऐसे ताज़ा है की लगता है वो बस जैसे कल की ही बात थी.उस शाम मैं बहुत खुश था...मेरी सबसे अच्छी दोस्त शहर वापस आ रही थी...वो डेढ़ साल बाद शहर वापस आने वाली थी और ठीक अगले दिन मेरा जन्मदिन था.वो अक्सर जुलाई के आखिरी दिनों में आती थी, और मेरा जन्मदिन बीत जाता था.लेकिन ये पहला मौका था जब वो मेरे जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आ रही थी.

रात भर बारिश हुई थी और मौसम बहुत सुहावना हो गया था.मैं खुश था की मौसम भी बिलकुल वैसा ही है जैसा उसे पसंद है.मैं बार बार घडी देख रहा था, उसने मुझे दोपहर तीन बजे बुलाया था.दिन भर का इंतजार करना मेरे लिए पहाड़ सा काम लग रहा था.दिन अचानक बहुत लम्बा हो गया था..मैं तीन बजे तक का इंतजार नहीं कर पाया...जैसे ही घड़ी में दो बजे, मैं घर से निकल गया और आधे घंटे में ही उसके अपार्टमेंट के गेट के सामने पहुँच गया.

मुझे उसे ढूँढना या उसका इंतजार करना नहीं पड़ा..मैंने देखा की वो अपनी नानी के साथ अपने अपार्टमेंट के कम्पाउंड में टहल रही थी.वो शायद मेरा इंतजार ही कर रही थी..शायद उसे अंदाज़ा था की मैं समय से पहले आ जाऊँगा..उसने मुझे देख लिया था और मुझे देखते ही वहीँ से हाथ हिलाकर मुझे हेल्लो कहा.मैं अपार्टमेंट के तरफ बढ़ना चाहा तो उसने इशारा कर के मुझे वहीँ पर ठहरने के लिए कहा.
वो अपनी नानी से कुछ बातें करने लगी और मेरी तरफ इशारा कर के वो उन्हें कुछ बताने लगी...मुझे कुछ समझ में नहीं आया की आखिर वो क्या बातें कर रही हैं, जाहिर सी बात थी की वो नानी को मेरे बारे में कुछ बता रही थी...लेकिन वो क्या बता रही थी? मैं कुछ समझ नहीं सका...वो दोनों मुझे देखकर मुस्कुराने लगीं...उन्हें मुस्कुराता देख मैं भी बेवकूफों की तरह बिना बात जाने समझे मुस्कुराने लगा.

वो बिलकुल बदली हुई सी लग रही थी.हमेशा सजी-संवारी रहने वाली लड़की बिलकुल साधारण आसमानी सलवार समीज में थी..उसने माथे पर एक बड़ी सी गोल बिंदी लगा रखी थी..और उस दिन उस सादगी में वो पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही थी.मैंने गौर किया की उसके हाथों में कांच की हरी चूड़ियाँ थी.उसने पहले कभी कांच की चूड़ियाँ पहनी हो मुझे याद नहीं आता.वो मेरे पास आई तो मैंने उसे छेड़ने के इरादे से कहा ""आज तो तुम पुराने ज़माने की हीरोइन सी लग रही हो".लेकिन उसने मेरी बात का कुछ जवाब नहीं दिया और बस मुस्कुरा के रह गयी.

"पुरे एक साल बाद तुमसे मिल रही हूँ, ना हाल चाल पूछा न कुछ खबर ली, बस ये बोरिंग सा कमेन्ट कर के रह गए..." उसने मुस्कुराते हुए ही कहा, लेकिन जाने क्यों उस समय उसकी आवाज़ में वो शरारत या चंचलता नहीं थी..बल्कि वो बेहद शांत और गंभीर दिख रही थी.उसने आगे कुछ भी नहीं कहा और सीधा गाडी में बैठ गयी.

मुझे संकेत मिल गया था की आज वो गंभीर मूड में.उसके गाड़ी में बैठते ही हम वहां से निकल गए.

मैं पता नहीं किस संकोच में था, मैं उससे खुलकर पूछना चाह रहा था की तुमने नानी से क्या कहा की वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी, वह जो मैं समझ रहा हूँ या कोई दूसरी बात...लेकिन मैंने कुछ भी नहीं पूछा.
दो तीन ट्रैफिक सिग्नल हम पार कर गए थे और हमारे बीच बस फोर्मली बातें हो रही थी."कैसा रहा फ्लाईट", "घर में सब कैसे हैं?" "कल जन्मदिन पर क्या कर रहे हो?" वैगरह वैगरह...कुछ देर में हम दोनों ही इन फॉर्मल सवाल जवाब से बोर हो गए थे और दोनों के बीच एक अन्कम्फर्टबल ख़ामोशी आ गयी..वो चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी और मैं उसे देखकर ये समझने की कोशिश कर रहा था की वो इतनी चुपचाप सी क्यों है.
उस अन्कम्फर्टबल ख़ामोशी को आख़िरकार मैंने ही तोड़ा..
"सुनो एक बात कहूँ तुमसे?"

"हाँ कहो..."

"कभी कभी दो बेतकल्लुफ दोस्तोँ के बीच भी / खामुशी इतनी अजीयतनाक होती है कि बस"...

वो मुस्कुराने लगी..."ये किसने कहा है साहब? क्या आपने?"

"नहीं...किसी बड़े शायर ने...लेकिन ये शेर अभी के माहौल पर फिट है, क्यों? है न?"

"अरे नहीं साहब...ऐसी कोई बात नहीं है...मैं तो बस युहीं थोड़ी थक सी गयी हूँ...."

"ह्म्म्म...जेट लैग्ड? "

"हाह.....हाँ कह सकते को...." वो मुस्कुराने लगी..लेकिन खुलकर वो अब भी नहीं मुस्कुरा रही थी...मुझे जाने क्यों लग रहा था उसके मन में कुछ ऐसा है जिससे वो परेसान सी है...कुछ ऐसा जो वो कहना चाह रही है लेकिन कह नहीं पा रही है.

"कहाँ चलें, किसी रेस्टुरेंट में चलें? एक नया रेस्टुरेंट खुला है, बिलकुल अर्बन टाईप..तुम्हे पसंद आएगा...वहां चलें?"... मैंने पूछा उससे.

वो कुछ देर खामोश रही..

"सुनो, पार्क में ले चलोगे आज मुझे...वहां गए एक अरसा हो गया...चिल्ड्रेन्स पार्क में?" उसने इतने भारी आवाज़ में कहा की मैं एक पल के लिए घबरा सा गया.

"हाँ क्यों नहीं...चालो वहीँ चलते हैं..." मैंने बिना कुछ आगे पूछे या सोचे जल्दी से गाड़ी पार्क के रास्ते के तरफ मोड़ दी..

मैं उसके प्रति थोड़ा चिंतित सा हो गया था....वो अपसेट सी दिख रही थी और जब भी वो ऐसे अपसेट या डिप्रेस्ड हो जाती थी तो मुझे हमेशा घबराहट होने लगती थी.शायद घर की कोई बात होगी जिससे वो इतनी परेसान सी है या किसी ने कुछ कह दिया होगा....मैं इसी उधेरबन में था की आखिर वो इतनी चुप सी क्यों है, की तभी मुझे लगा उसने कुछ पूछा है मुझसे...लेकिन उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी की पहले तो मुझे भ्रम हुआ वो खुद से बातें कर रही है, और मैंने उसे अनसुना कर दिया.

"कहो न, तुम्हे वो फिल्म याद है? "उसने जब दोबारा पूछा और हलके से मेरे कंधे को झकझोरा तब मुझे अहसास हुआ की वो ये सवाल मुझसे ही पूछ रही थी..
"क्या, कुछ पूछा तुमने?.."
"हाँ, उस फिल्म का वो सीन याद है तुम्हे जब प्रेम निशा से कहता है की आज पहली बार कोई लड़की मेरे गाड़ी के फ्रंट सीट पर बैठी है..."
"हाँ...याद है"
"ह्म्म्म....मैं तो सोच रही थी की तुम्हारे गाड़ी के फ्रंट सीट पर पहली बार बैठ रही हूँ, मुझे लगा था तुम वैसा ही कुछ प्यारा सा डायलोग कहोगे जिसमे थोडा इनोसेंट फ्लर्टिंग भी शामिल होगा, गेस आई वाज रोंग...." वो मुस्कुराने लगी थी.उसकी आवाज़ में पहली बार मुझे शरारत की एक झलक मिली थी.मेरे लिए ये एक राहत की बात थी.
"क्यों तुम्हे ऐसा क्यों लगा की तुम पहली लड़की हो जो मेरे गाड़ी के फ्रंट सीट पर बैठी हो?"
"ओह अच्छा, तो क्या कोई और बैठ चुकी है? देखो साहब तुम मुझसे कह सकते हो...मैं किसी से नहीं कहूँगी"
"पागल हो क्या, ऐसा कुछ भी नहीं है..."
"अच्छा तो सुनो न, एक बार एक बार वो डायलोग कह तो दो ज़रा...मुझे अच्छा लगेगा..."
उसकी आवाज़ में कोई जबरदस्ती या जिद नहीं थी बल्कि उसने इतने विनम्रता से कहा था की मुझसे आगे कुछ भी न कहा जा सका..ना तो मैंने उसे इस जिद के लिए डांटा और नाही चिढाया....मैंने उसका मन रखने के लिए वो डायलोग दोहरा दिया.इस बार उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कराहट फ़ैल आई थी..
"तुम सच में बहुत अच्छे हो..." उसने कहा और मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया..I missed you so much". उसने आँखें बंद करते हुए कहा.



हम पार्क के मेन गेट के पास पहुँच चुके थे..

मैंने जैसे ही गाड़ी पार्क की, उसका ध्यान अचानक कोने वाली दूकान की तरफ गया...
"अरे वो पकौड़ियों की दूकान कहाँ गयी? "उसने पुरे आश्चर्य में मुझसे पूछा.मैंने उसे बताया की वो दूकान बंद हो गयी.उसे जैसे मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ..एक समय पकौड़ियों वाली दूकान उसकी फेवरिट दुकानों में से एक थी..और मैं जानता था की वो उस दूकान को वहां नहीं देखकर दुखी होगी.हुआ भी वैसा ही...उसे बुरा लग रहा था की दूकान अब यहाँ से हट गयी है...वो याद करने लगी की हम कैसे कितनी देर देर तक यहाँ बैठे सर्दियों की शाम पकौड़ियाँ और समोसे खाते थे.हम कुछ देर वहीँ पर खड़े रहे जहाँ पहले दूकान हुआ करती थी और फिर पार्क के अन्दर चले आये.पार्क के अन्दर प्रवेश करते ही वो खिल उठी...पार्क का नया रूप उसे बहुत पसंद आया था.

उसके पांव खुदबखुद उसी पेड़ की तरफ बढ़ चले थे जिसके पास लगी बेंच पर कभी हम शामों में बैठा करते थे...और जहाँ से अब बेंच नदारद था.वो पेड़ के पास घास पर ही बैठ गयी.मैं भी उसके पास वहीँ घास पर बैठ गया.

"अच्छा याद है तुम्हे एक बारिशों वाले दिन हम यहाँ आये थे...तुमने चंदू के दूकान की पकौड़ियाँ खाने की जिद की थी और फिर हम यहाँ बेंच पर बहुत देर तक बैठे थे...बारिश में भींगते हुए.." मैंने उससे पूछा.

"हाँ याद क्यों नहीं है..बहुत अच्छे से याद है मुझे..पांच अगस्त का दिन, आज से पांच साल पहले... .....और....और... ...मैंने बेवजह ही कितना तुम्हे परेसान कर दिया था...कितनी पागल थी मैं उन दिनों...है न?"  उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा..
"क्यों, अब तुम वैसी पागल नहीं रही क्या...सुधर गयी?"
"हूँ क्यों नहीं...अब भी मैं वही पागल लड़की हूँ...." उसने हंसने की कोशिश भर की...लेकिन खुल कर हँस न सकी.

वो बहुत देर तक पुरे पार्क का जायजा लेते रही और पुरानी बातों को याद करते रही.

"यु हैव नो आईडिया मैं इस जगह को कितना मिस करती हूँ...ये लैम्प पोस्ट याद है तुम्हे...इसके पास खड़े होकर मैं तुम्हारी और मेरी लम्बाई नापती थी...और मुझे हमेशा चिढ होती थी तुमसे, की तुम मेरे से इतने लम्बे क्यों हो....मैं तो यहाँ तक सोचती थी की इस लैम्पोस्ट पर लटकने से मेरी लम्बाई तुम जैसी हो जायेगी..
और..और तुम्हे वो डस्टबिन याद है, वो जो सामने वाले गेट के पास रखा रहता था, फिश-शेप्ड डस्टबिन..मुझे उस वक्त कितना प्यारा सा लगता था वो...मैंने तुमसे कहा करती थी की उसे अपने साथ घर ले जाउंगी, और तुम हँसते थे मेरी उस बात पर...और एक शाम मैंने तो हद ही कर दी थी...मैंने जाकर उस फिश-शेप्ड डस्टबिन को 'हग' कर लिया था.तुमने कितना डांटा था मुझे...अभी तक याद है.
....उफ्फ्फ...देखो कितना कुछ छुट जाता है पीछे...ये सब की सब बातें यादें मुझे हमेशा याद आती हैं...I miss those days..जानते हो कभी कभी बहुत सी पुरानी बातें मन में आती हैं और मैं घंटों सोचती रह जाती हूँ.मुझे बड़ा संतोष मिलता है जब मैं उन पिछली बातों को याद करती हूँ...इन यादों के अलवा और क्या रह जाता है इंसान के पास....क्यों? है न?" .वो एकाएक बहुत उदास सी हो गयी..और आसमान की तरफ बादलों को ताकने लगी.

"सुनो तुम ठीक तो हो आज?"

"हाँ मुझे क्या हुआ है...मैं ठीक ही हूँ..."

"ऐसी बातें कर रही हो...इतनी चुप सी लग रही हो आज तुम...तुम ऐसे रहती हो तो मुझे चिंता होने लगती है..देखो तुम्हारी यु.एस.पी तुम्हारी नादानी और इललॉजिकल बातें ही है.तुम ऐसे खामोश रहती हो तो अच्छी नहीं लगती...मुझे चिढ़ाती हो, तंग करती हो, जिद करती हो, बक बक किये जाती हो तो अच्छी लगती हो.."

"मुझे पता है जब भी मैं ऐसे चुप हो जाती हूँ तो तुम्हे डर लगता है कहीं मेरे आंसू न निकल आयें....लेकिन चिंता न करो...ऐसी कोई बात नहीं...आई नो हाउ तो टेक केअर ऑफ़ मायसेल्फ...तुमने ही तो सिखाया है...
और वैसे कभी तुम भी तो बातें शुरू करो...ये क्या की हमेशा मैं ही बोलती जाऊं...इस बार मैं तुम्हे मौका दे रही हूँ..." एक फीकी मुस्कान के साथ उसने कहा.

मुझे लगा कुछ ऐसा है जो वो बताना चाह रही है लेकिन खुल कर कह नहीं पा रही, मुझे उसको देखकर जाने कैसा महसूस होने लगा.वो जब भी ऐसे उदास हो जाती तो मैं बड़ा बेचैन सा हो जाता था.
मैंने अपना हाथ उसके हाथों पर रख दिया.मेरी इस हरकत के लिए वो शायद तैयार नहीं थी...वो सिहर सी उठी.नीचे दबी उसकी हथेलियों में थोड़ी हलचल सी हुई...लेकिन उसने अपना हाथ हटाया नहीं...बल्कि उसकी नज़रें हम दोनों की हथेलियों पर आकर ठहर गयी थी और वहीँ जमी रहीं...

"सुनो, क्या तुम्हे लगता है हम कभी साथ साथ रह पायेंगे". उसकी आवाज़ में एक भींगा सा कम्पन था..उसकी नज़रें अब भी हथेलियों पर जमी हुई थी.

मैंने उसके हाथों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली...
"शायद नहीं".

वो मेरी तरफ अपलक देखती रही, मुझे लगा वो रो देगी, लेकिन वो बस मुझे देखे जा रही थी...अपलक.
कुछ देर तक वो मुझे ऐसे ही टकटकी लगाये देखती रही की मैं कुछ और बोलूं. ना मुझसे कुछ भी कहा गया ना उसने कुछ भी कहा.

"जानते हो मुझे तुम्हारी सबसे अच्छी बात क्या लगती है, की तुम कभी झूठा दिलासा नहीं देते हो...
...सुनो..."
लेकिन उसने कुछ कहा नहीं, उसकी आँखें ऊपर आसमान की तरफ मुड़ गयीं और ऊपर बादलों को देखते हुए उसने कहा...
"सुनो, कोई शेर सुनाओ न मुझे...."

"कौन सा शेर सुनोगी?"

"वो एक शेर कौन सा था...समथिंग आंचल दुपट्टा टाईप...समथिंग लाईक परचम...टिका...बिंदी..आई डोंट नो...तुम ज्यादा जानते हो".

"अच्छा हाँ...वो..मजाज़ साहब का.." सुनो -
तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है / अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था  
तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही खूब है लेकिन /  तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था..

"ओह वाऊ...बहुत अच्छा है...कितना अच्छा शेर है! जब तुमने मुझे भेजा था तो मैं बहुत देर तक इसे मन में पढ़ती रही थी....सुनो, तुम मुझे ये पूरी ग़ज़ल लिख कर भेज देना.." उसने कहा और कुछ देर के लिए उसकी नज़रें नीची हो गयीं...

"अच्छा बताओ तो ज़रा...मेरी जब शादी होगी, और होपेफुली............
...तो मैं कैसी दिखूंगी? सुन्दर? या फिर कार्टून जैसी?"  उसने सवाल पूछा और अपने दुपट्टे को सर पर ओढ़ लिया घूंघट की तरह..

"बहुत सुन्दर..."

"हाँ  सच में? "

"बिलकुल".
वो बच्चों सी खुश हो गयी थी.वो मुस्कुराने लगी..उसने अपना दुपट्टा सर से हटाया तो एकाएक मेरी नज़र उसके चेहरे पर जा टिकी...मुझे जाने क्यों उसकी आँखें भींगी हुई सी लगीं....मेरी नज़र उसके चेहरे से होते हुए उसके माथे पर और फिर उसकी मांग पर जाकर अटक गयी....वो मांग जो अभी खाली है.मैं उसकी मांग को देख कर जाने क्या सोचने लगा....कैसा लगेगा जब इस मांग पर सिन्दूर लगेगा...मैं सोचने लगा की वो कैसी दिखेगी...मैं सोचने लगा की ऐसा क्यों होता है की लड़कियों की खूबसूरती सिन्दूर से और बढ़ जाती है.मुझे एक पुरानी बात बिलकुल उसी वक़्त याद आती है...जब भी बचपन में मैं शादियाँ देखता था तो सिन्दूर दान रस्म के समय लड़की के पुरे माथे पर सिन्दूर फ़ैल सा जाता था..मैं उस रस्म को हमेशा बड़ा विस्मित सा होकर देखता था.मुझे लगता था की ये शायद शादी के सब रस्मों में सबसे अच्छा रस्म है.
मुझे उस वक़्त अपना वो सपना भी याद आता है जिसे मैंने कुछ दिन पहले ही देखा था.मैंने सपने में देखा था की उसका विवाह मेरे साथ हो गया है..और वो मेरे कमरे में मेरे साथ बैठी हुई है.मैं खुद से ही प्रश्न पूछता हूँ...क्या उसकी मांग पर जो हाथ सिन्दूर लगायेंगे वो मेरे होंगे? जवाब कुछ भी नहीं आता..मैं सुनी सुनी आँखों से फिर से उसके चेहरे की ओर देखने लगता हूँ.

"ऐसे मुझे क्या देख रहे हो?तुम क्या सोच रहे हो?" उसने पूछा 

"कुछ नहीं...
...बस यही की तुम्हारी शादी होगी तो तुम कैसी दिखोगी? तुम्हारे माथे पर जब सिन्दूर लगेगा तो तुम कैसी दिखोगी...बहुत खूबसूरत दिखोगी तुम..."

उसकी आँखें अनायास ही मुझपर उठ आई..कुछ देर तक वो आँखें मेरे चेहरे पर स्थिर रहीं फिर धीरे धीरे नीचे गिर गयीं.वो एक गाने के बोल गुनगुनाने लगी थी..."लग जा गले कि फिर ये हसीं 'शाम' हो न हो / शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो ".उसने गाने के बोल में 'रात' की जगह 'शाम' गाया था और गाने के बीच की पंक्ति में आकर वो ठहर गयी...
हमको मिली हैं आज, ये घड़ियाँ नसीब से 
जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से 
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
वो बिलकुल चुप हो गयी...उसकी नज़रें फिर से मेरे ऊपर उठ आयीं थी....और मेरी नज़र उसकी बड़ी सी गोल बिंदी पर जाकर ठहर गयीं थी...कुछ देर तक मैं इंतजार करते रहा की वो गाना फिर से शुरू करेगी, लेकिन वो बिलकुल खामोश हो गयी और गाने आगे गाने के बजाये मुझसे ही कहने लगी...
"कोई दूसरा शेर सुनाओ न...जाने क्यों आज तुमसे सिर्फ शायरी और कवितायेँ सुनने का दिल कर रहा है...."

"अच्छा...सुनाता हूँ,...ये सुनो-
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना..

"ओह शानदार...कितनी खूबसूरत बात कही है शायर ने...कुछ और सुनाओ न.."

तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है
हंसी लबों से बरसती शफ़ा में जीते हैं
तेरे ख्याल की आबो-हवा में जीते हैं !

"वाह! गज़ब! एक और प्लीज.."

वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे,
तुझे भूलने की दुआ करूँ, तो मिरी दुआ में असर न हो!!

"शानदार शानदार शानदार!!!! तुम बस कमाल हो....कैसे कैसे शेर तुम्हे याद रहते हैं...एक और सुना दो प्लीज़......उसके बाद जिद नहीं करुँगी."
वो ऐसे भी जिद नहीं कर रही थी, और मुझे उसे शेर सुनना अच्छा लग रहा था...उसने उस शाम बहुत से शेर सुने थे...और फिर अंतिम एक ग़ज़ल के इस पंक्ति पर वो उछल पड़ी थी..

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

तुम्हे ये पूरी ग़ज़ल याद है? उसने पूछा..और पूरी ग़ज़ल सुनने के बाद वो बहुत खुश हो गयी...

"तुम कहते थे न, आज मैंने महसूस किया है...शायरी और कवितायेँ सच में राहत पहुंचती है..मुझे बहुत अच्छा लगा तुमसे यूँ सुनना कवितायेँ."
"तुम्हे और शायरी अगर पढ़नी हो तो चलो अभी मैं तुम्हे एक दो किताबें खरीद देता हूँ...
"नहीं, मुझे बस तुमसे सुनना था...तुमसे शायरी सुनने में जो मजा है वो किताबों में पढने में नहीं...मैं बोर हो जाउंगी, लेकिन तुम चाहो तो अपनी पसंद की शेर ग़ज़लें और कवितायेँ मुझे कैसेट पर रिकॉर्ड कर के गिफ्ट कर सकते हो, आई वोंट माईंड." वो हंसने लगी थी, और मुझे उसे इस तरह हँसते हुए देखकर बहुत अच्छा लगा.ऐसा लगा जैसे उसका मन थोड़ा शांत हुआ.


आसमान में काले बादल उमड़ आये थे और ऐसा लग रहा था की जोरों की बारिश आने वाली है.वो फिर से बादलों की तरफ देखने लगी.
"नेचर इज एन अमेजिंग पेंटर...देखो तो लगता है की आसमान पर कोई एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग सी हो आई है"..उसने बादलों को देखकर कहा...
"बहुत ज़ोरों की बारिश आने वाली है, बादलों को देखो, शाम पांच बजे ही इतना अँधेरा सा हो गया है...चलो अब चलते हैं, तुम जिस रेस्टोरेन्ट के बारे में बता रहे थे उसी में.....तुम्हारे जन्मदिन की कॉफ़ी और ट्रीट मैं आज ही लुंगी...चलो अब..."

"क्यों, आज बारिश में तुम्हे भींगना नहीं है?"  मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की..

वो बस मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगी...
"नहीं...." कहकर वो उठी, अपना बैग उठाया और धीरे धीरे पार्क की गेट की तरफ बढ़ने लगी....

मैं भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा.

...maybe continued 


अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं 
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं 


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Happy 6th Birthday Blog !
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Saturday, July 20, 2013

होटल की एक रात

चंडीगढ़...द सिटी ब्यूटीफल
अपने प्रिय मित्र की सगाई के मौके पर मैं चंडीगढ़ आया हूँ.पहली बार में ही ये शहर भा गया मुझे.चंडीगढ़ में बस ने जैसे ही प्रवेश किया एक साईन बोर्ड ने मेरा स्वागत किया.."वेलकम तो द सिटी ब्यूटीफल.बस स्टैंड तक आते हुए बस ने शहर का अच्छा खासा चक्कर लगाया जिससे मुझे शहर को थोड़ा देखने का मौका मिला.मैं बहुत खुश था, जाने कब से तमन्ना थी ये शहर देखने की.बस स्टैंड पर दोस्त मुझसे मिलने आया, और फिर जहाँ उसने मुझे ठहराने का प्रबंध किया था हम उस होटल की तरफ बढे.

शाम छः बजे.. मुझे मेरे दोस्त ने एक होटल में ठहराया है.जिस कमरे में मैं ठहरा हूँ वो एक छोटा सा लेकिन खूबसूरत कमरा है.सामने की दीवार पर एक बड़ा एल.सी.डी टीवी लगा हुआ है, उसके ठीक बगल में एक स्टडी टेबल और एक खिड़की जहाँ से बाहर की सड़क दिखती है.
दोस्त मुझे होटल में छोड़कर वापस चला जाता है.मैं आराम से बिस्तर पर लेट जाता हूँ.अगले दिन होने वाली दोस्त की सगाई को लेकर मैं बहुत खुश और उत्सुक हूँ.उत्सुकता का एक व्यग्तिगत कारण भी है.मैं सोचता हूँ की थोड़ी देर आराम करूँगा और फिर फ्रेश होकर शहर घुमने निकलूंगा.

रात नौ बजे.. दो घंटे शहर घुमने के बाद मैं वापस अपने कमरे में आ गया हूँ.गर्मी ज्यादा नहीं है, एक पंखे से काम चल सकता है लेकिन फिर भी मैंने कमरे का ए.सी चला दिया है.एक दोस्त की कही बात याद आती है - "होटल में मिलने वाली हर सुविधा का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए".
होटल के मेनू कार्ड पर नज़र गयी, तो सभी चीज़ों के दाम देखकर मेरे होश उड़ गए, इसलिए मैं बाहर से डिनर लेकर होटल में आ गया.
टी.वी चालु किया तो किसी चैनल पर कुछ भी ख़ास देखने लायक कार्यक्रम नहीं आ रहा...एक चैनल पर देखा की एक बेहद पुरानी और शानदार फिल्म आ रही है..."जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली".फिल्म का बस कुछ ही हिस्सा बाकी है, मैं फिल्म देखने लगता हूँ.मैं सोचता हूँ की मुझे वी.शांताराम की फ़िल्में देखे बहुत समय हो गया है और उन्हें दोबारा देखना चाहिए.मैं निश्चय करता हूँ की वापस दिल्ली जाते ही मैं अपने डी.वी.डी कलेक्सन से उनकी फिल्मों की डी.वी.डी खोज के निकालूँगा और देखूंगा.

रात के दस बजे.. मैंने डिनर कर लिया है और फिल्म भी खत्म हो चुकी है.मैं टी.वी बंद कर देता हूँ और सोने के लिए बिस्तर पर आ जाता हूँ.मैं सोचता हूँ की एक अरसा हो गया है की मैं रात के दस बजे सोया हूँ...मैं मोबाइल में सुबह सात बजे का अलार्म लगा देता हूँ..मुझे हलकी सी ख़ुशी भी होती है की मैं आज की रात एक लम्बी नींद ले सकूँगा.कई महीनो हुए मैं चार पांच घंटे से ज्यादा सो ही नहीं पाता हूँ...तमन्ना ही रह जाती है की सात आठ घंटे की एक लम्बी नींद लूँ.
बेहद थके होने के बावजूद मैं सो नहीं पा रहा...मैं कभी उठ कर कमरे के कोने में पड़े एक बड़े से सोफे पर बैठ जाता हूँ तो कभी उस स्टडी टेबल पर...फिर अंत में खिड़की का पर्दा हटा कर मैं वापस बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ...बड़े शीशे की खिड़की से बाहर की रौशनी अन्दर कमरे में आती है, सड़क पर अभी भी ट्रैफिक नज़र आता है लेकिन बाहर की कोई भी आवाज़ कमरे में नहीं आती.एक बड़ा स्ट्रीट लैम्प सामने खिड़की के ठीक बहार दिखाई देता है, उसके ठीक बगल में एक बड़ा सा पेड़ खड़ा है..उस पेड़ की परछाई अन्दर कमरे की दिवार पर पड़ती है.मैं उस विशाल पेड़ और स्ट्रीट लैम्प को देखने लगता हूँ.मुझे नहीं पता चलता कब मुझे नींद आती है और मैं सो जाता हूँ.

रात के एक बजे.. मेरी नींद अचानक एक सपने से टूटती है.कोई बुरा सपना नहीं है बल्कि बड़ा विएर्ड सा सपना है.मुझे खुद पर बेहद गुस्सा आता है.."आखिर कब तक मैं ऐसे अजीबोगरीब और बेमतलब सपने देखते रहूँगा.मैं सोचता हूँ जिनके बारे में वो सपना देखा है उन्हें बताऊंगा, लेकिन फिर अपना ये ख्याल ये सोच कर टाल देता हूँ की कहीं वो मुझे पागल न समझे.
बिस्तर पर लेटे हुए मैं याद करने की कोशिश करता हूँ की मैं ऐसे विएर्ड सपने कब से देख रहा हूँ, लेकिन ठीक से कुछ याद नहीं आता.मुझे ख्याल आता है की एक अरसा हुआ मैंने कोई भयानक सपना नहीं देखा है.पहले जब भयानक सा कोई सपना देखता था तो डर से मेरी नींद टूट जाती थी.मैं बदहवास सा उठता था..पानी पीता था, दिल की धड़कन तेज़ चल रही होती थी..मैं कमरे की बत्ती जला देता था, लैपटॉप पर कुछ अच्छे गाने चला कर...बिस्तर पर एक साफ़ चादर बिछा कर इत्मिनान से सो जाता था.मुझे नींद फिर से आ जाती थी और मैं  फिर सीधे सुबह ही उठता था.लेकिन जब से ऐसे अजीबोगरीब सपने देखने लगा हूँ तब से जब कभीं सपने से जागता हूँ, मुझे जल्दी नींद नहीं आ पाती.मैं सोचता हूँ की इन विएर्ड सपने से तो अच्छे वो बुरे सपने ही थे, मैं डर के जागता था लेकिन कम से कम मुझे दोबारा नींद तो आ जाती थी.

रात के डेढ़ बजे.. मैं सोने की फिर से कोशिश करता हूँ, लेकिन नींद पता नहीं क्यों एकाएक रूठ गयी है.सोचता हूँ कहीं उस सपने की वजह से तो नींद नहीं रूठी हुई है.
कमरे में कोई शोर शराबा या फिर किसी तरह का कोई हस्तक्षेप भी नहीं है की नींद ना आये...बिलकुल शांत सा है कमरा...शायद जरूरत से कुछ ज्यादा ही शांत कमरा है...कमरे में एक भयानक शान्ति पसरी हुई है...शायद इतनी ज्यादा शान्ति में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कुछ ज्यादा ही साफ़ सुनाई देती है,बिलकुल थ्री-डी डिजटल साऊंड में..शायद यही वजह हो की नींद नहीं आ रही है.मैं कोशिश करता हूँ उस आवाज़ को ना सुनने की...लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता है.मैं इरिटेट सा हो जाता हूँ और बिस्तर से उठ कर उस स्टडी टेबल के पास चला जाता हूँ और वहीँ कुर्सी पर बैठ जाता हूँ..

खिड़की से बहार देखता हूँ, सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, कभी कभी कोई गाडी तेज़ी से गुज़रती है लेकिन उसकी कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती.मैं खिड़की से बाहर लगे उस पेड़ को देखने लगता हूँ, बहुत से मिक्स्ड ख्याल दिमाग में आते जाते हैं..मैं अपनी हथेलियों को देखता हूँ...अपने हाथों की लकीरों पर मेरी नज़र जाती है..एक भाग्यरेखा सी कोई लम्बी लकीर है...मैं देर तक उस लकीर को देखते रहता हूँ और फिर हाथों की दूसरी लकीरों में उस लकीर को पहचानने की कोशिश करता हूँ जिसने उसे मुझसे जुदा किया होगा.लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आता.यूँ भी हाथों की लकीरें कभी मेरे पल्ले नहीं पड़ती..लोग कहते हैं की मेरे हाथों में बड़े अनयुज्वल सी रेखाएं हैं.मुझे याद आता है की बचपन में माँ ने जितने पंडितों को मेरी कुंडली या हाथ दिखलाई थी सभी ने एक बात कही थी, की मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ.सभी ने कहा था की इसकी भाग्य रेखा तो कमाल की है..बिलकुल हथेलियों को चीर के भाग्यरेखा निकली है..ये जो चाहेगा वो इसे मिलेगा.मुझे एकाएक उन सभी पंडितों पर बेहद गुस्सा आने लगता है..दिल करता है की मैं उन सब पंडितों को बुलाऊं और एक लाईन से खड़ा कर के उनसे जवाब मांगूं, की क्यों उन्होंने मुझसे और मेरी माँ से ये झूठी बातें कही थी.

रात के दो बज रहे हैं, और मैं वहीँ कुर्सी पर बैठा हूँ..भगवान से प्रार्थना करता हूँ की कोई ऐसा चमत्कार हो जाए और मेरे पिछले पांच साल वापस मुझे मिल जाए.मैं ज्यादा समय नहीं मांग रहा..सिर्फ अपने पिछले पांच साल..मैं बस अपनी कुछ गलतियों को सुधारना चाहता हूँ...अपने द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसले को सुधारना चाहता हूँ...ये भी कितना अजीब है न...कैसे हम बस एक गलत फैसला ले लेते हैं और हमारी पूरी ज़िन्दगी ही बदल जाती है...वो एक गलत फैसला हमारे साथ हमारी पूरी उम्र तक घसीटते चला जाता है.
मैं खुद को बड़ा बेबस महसूस करने लगता हूँ..सोचता हूँ की जो भी मैं कर सकता था, जो मेरे हाथ में था वो मैंने नहीं किया..पता नहीं कितनों के सपनों और उम्मीदों को मैं पूरा नहीं कर पाया..मुझे अपने आप से थोड़ी घृणा  भी होने लगती है.

रात के तीन बजे.. मैं बिस्तर पर फिर से आ जाता हूँ...बगल में एक किताब रखी हुई है...सैकड़ों बार पढ़ी हुई किताब(गुनाहों का देवता).जाने क्या सोचकर चलते वक़्त मैंने उस किताब को अपने बैग में रख लिया था.रास्ते में भी किताब पढ़ते आया था..अभी जिस मोड़ पर किताब का वो पन्ना है, मुझे उससे आगे पढने की हिम्मत नहीं होती, मैं किताब बंद कर उसे वापस अपने बैग में डाल देता हूँ.मैं आँखें बंद कर के फिर से सोने की कोशिश करता हूँ.लेकिन...

सामने खिड़की के ठीक पास जो दिवार है, उसपर जो उस विशाल पेड़ की परछाई बन रही है, मेरी नजर उसपर जाती है.मैं अपलक उस परछाई को देखने लगता हूँ.मुझे उस परछाई के बीच सहसा एक चेहरा दिखाई देने लगता है.एक जाना पहचाना सा चेहरा..बहुत साल पहले का एक चेहरा, उसी लड़की का चेहरा जिसने एक दिन अपने पुराने घर की पुरानी और जर्जर हुई सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे एक कविता सुनाने की कोशिश की थी.उस दिन की स्मृति बिलकुल साफ़ साफ़ मेरे मन में है.मैं दिवार पर पड़ रही उस परछाई पर अपनी नज़रें और गड़ा देता हूँ, जैसे वो कोई स्क्रीन हो जहाँ उस दिन का, उस पल का विडियो चल रहा है...

"एक कविता है, मैंने लिखी है..सुनाऊं? "
"तुम और कविता? "
"हाँ, मैं और कविता..याद है, तुमने मुझे एकदिन किसी कवियित्री की एक कविता थमाई थी, बस उसी की पहली पंक्ति से इंस्पायर्ड है...सुनोगे?सुनाऊं?"
"हाँ सुनाओ.."
"तुम मुझको गुड़िया कहते हो / ठीक ही कहते हो..
तुम मुझको इम्पल्सिव कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको मासूम कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको सुन्दर कहते हो / ठीक ही कहते हो.
तुम मुझको चंचल कहते हो / ठीक ही कहते हो.
. . .

. . .
('गुड़िया' की जगह ऐसे कितने शब्द रख कर एक लम्बी कविता सुनाई थी उसने,और फिर..)
. . .
. . 
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तुम मुझको अपनी प्रेमिका क्यों नहीं कहते हो / शायद ठीक ही कहो.."
इस आखिरी पंक्ति पर अचानक आकर वो रुक गयी.उसके होठ बहुत देर तक खुले हुए से हलके कांपते हुए से रह गए थे.जैसे खुद ही कहे इस आखिरी पंक्ति से वो भी मेरी तरह बिलकुल आश्चर्यचकित थी..कुछ देर हम वहीँ दुसरे मंजिल की सीढ़ियों पर खड़े रहे...थोड़ी देर बाद उसकी धीमी आवाज़ सुनाई दी थी...
"तुम मुझे अपनी प्रेमिका क्यों कहोगे / शायद ठीक ही है जो नहीं कहते हो.."

दिवार पर उस परछाई में बहुत देर तक उसका वो चेहरा झिलमिलाता हुआ सा मुझे दिखाई देता रहा...मैं बिस्तर से उठ गया और खिड़की के परदे को पूरी तरह से खींच कर लगा दिया...कमरे में बिलकुल अँधेरा हो जाता है.मैं कमरे से बाहर निकल आता हूँ..लॉबी खाली है, रिसेप्सन का डेस्क भी खाली है, रिसेप्सन के पास सोफे पर बैठकर मैं वहां रखे कुछ ऑटो-मैगजीन पढने लगता हूँ...मैं घड़ी देखता हूँ तो सुबह के पांच बज रहे होते हैं..मैं बाहर टहलने निकल जाता हूँ...मैं टहलते हुए बस स्टैंड तक पहुँचता हूँ, चाय पीता हूँ और वापस कमरे में आ जाता हूँ.सुबह के साढ़े पांच बजे रहे होते हैं उस वक़्त..एक म्यूजिक चैनल टी.वी पर चला देता हूँ और फिर बिस्तर पर लेट जाता हूँ..मुझे हलकी झपकी आने लगती है और मैं टी.वी देखते देखते थोड़ा सो जाता हूँ.

सुबह के साढ़े सात बजे.. कमरे की घंटी से मेरी नींद एकाएक टूट जाती है.मैं घबरा कर उठता हूँ..बाहर होटल का वेटर खड़ा है, वो ब्रेकफास्ट के लिए पूछने आया था.उसे ब्रेकफास्ट लाने को कहकर मैं कमरे में आता हूँ, घडी देखता हूँ तो सुबह के साढ़े सात बज रहे होते हैं, मुझे हलकी ख़ुशी होती है की कम से कम दो घंटे मैं सो पाया...थोडा आश्चर्य भी होता है की पूरी रात मैं सोने की कोशिश करता रहा लेकिन नींद रूठी रही और दो घंटे कैसे इतनी गहरी नींद मैं सो गया..मैं जल्दी जल्दी तैयार होता हूँ लेकिन रात की बात और दिवार पर छपी उसके चेहरे की परछाई बहुत देर तक मेरा पीछा करते रहती है...

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