Thursday, November 1, 2012

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टेरेस, कॉफ़ी और वो


हम उसे "रिफ्रेशमेंट की पुड़िया' कहते थे, क्यूंकि उसके आसपास कोइ भी उदास नहीं रह सकता था.उसकी बेवकूफियों को और शरारतों को सब इसलिए बर्दाश्त कर जाते थे क्यूंकि वो जहाँ भी जाती थी खुशियाँ बिखेरते चलती थी.हम सब उबाऊ इंसानों में वह एकमात्र ऐसी थी जो ज़िन्दगी को खुल के जीना जानती थी, जो हर बात पे हँसती थी और अपने आसपास के लोगों को हमेशा हँसाते रहती थी.दुःख के मौसमों में भी वो हँसने की वजह खोज लिया करती थी.कितने ऐसे उदास दिन थे हमारे जो उसकी हँसी से खिल से गए थे.शायद यही वजह थी की हम उसके अजीबोगरीब लॉजिक आसानी से बर्दाश्त भी कर लेते थे.लेकिन कभी कभी वो ऐसी बाते कर दिया करती थी जिसे बर्दाश्त कर पाना बेहद मुश्किल होता था..उसकी इल-लौजिकल बातों का वैसे तो कोई मौसम होता नहीं था, लेकिन सर्दियों में उसकी बेवकूफियां हद दर्जे तक बढ़ जाती थी.
एक दिन शाम जब सारे दोस्त बैठे थे वो युहीं कहने लगी "पता है आजकल मैं हर सुबह जॉगिंग पे जाती हूँ..जाड़ों के दिनों में सुबह पार्क में अगर टहलने जाओ तो स्पेशल किरण जैसा कुछ निकलता है एटमासफेअर से जो सीधे दिमाग को टच करता है, और जिससे दिमाग तेज और खूबसूरत हो जाता है..ऐसा मैं नहीं...डॉक्टर्स ने प्रूफ किया हैं".
मुझे उसके इस बेतुके बात पर ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ, आश्चर्य तो तब हुआ जब उसने कहा की वो पिछले दस पंद्रह दिनों से लगातार जॉगिंग के लिए जा रही है.मैंने सोचा की जो लड़की गर्मियों में सुबह नौ बजे के पहले उठती नहीं वो सर्दियों में सात बजे कैसे उठ जायेगी.लेकिन ये मुमकिन भी था, वो खुद ये जानती थी उसकी बातों का कोई ओरछोर नहीं होता है, लेकिन फिर भी वो अक्सर अपनी इल-लॉजिकल बातों को सच मान बैठती थी.उस शाम उसकी ये बकवास बातें सुनते सुनते मुझे एक शरारत सूझी और अगले दिन सुबह सुबह मैंने उसके घर जाने का प्लान बनाया.

अगले दिन मैं उसके घर के पास सुबह साढ़े छः बजे ही पहुँच गया.उसके अपार्टमेन्ट के गेट से थोड़ा पहले ही मैंने अपना स्कूटर खड़ा कर दिया.उसके अपार्टमेन्ट में दो ब्लॉक थे, पहला ब्लॉक जिसके छत से आगे की सड़क दिखती थी, मैं उस ब्लॉक के छत पे चला गया.दुसरे ब्लॉक में वो रहती थी, जो की पीछे की तरफ था.ठीक सात बजे वो अपनी दीदी के साथ बाहर निकली.मैं उसे छत से देख रहा था.अपार्टमेन्ट के कम्पाउंड से बाहर निकलते ही उसकी नज़र मेरे स्कूटर पर पड़ी.मेरे स्कूटर को देखते ही वो ठिठक गयी.उसने इधर उधर देखा, अपनी दीदी से कुछ कहा और फिर कुछ देर वहीँ कन्फ्यूज्ड अवस्था में खड़ी रही.आसपास के दुकानों की तरफ उसने नज़र दौड़ाई, फिर कम्पाउंड के अन्दर आकर उसने एक चक्कर लगाया.वो मुझे खोज रही थी, और मैं छत से उसे देख देख मुस्कुरा रहा था.मुझे यकीन था की वो छत की तरफ देखेगी भी नहीं..दिमाग के स्टॉक की कमी हमेशा उसे रहती है और आलसी भी वो एक नंबर की, तो छत पे मुझे ढूँढने के लिए वो आएगी भी नहीं...ये  भी मैं जानता था.करीब दस पंद्रह मिनट परेसान होने के बाद वो अपनी दीदी के साथ पार्क में जॉगिंग करने चली गयी.करीब आधे घंटे के बाद वो वापस आई और मेरे स्कूटर को वहीँ लगा देख वो फिर से मुझे इधर उधर खोजने लगी.आगे बढ़ के आसपास की गलियों में भी उसने ताक-झाँक की, और फिर कुछ बुदबुदाते हुए थककर अपने फ़्लैट में चली गयी.उसके जाने के बाद, मैं भी बड़ी निश्चिन्तता के साथ छत से नीचे उतरा, और उसके अपार्टमेन्ट के सामने वाले चाय की दूकान पे चाय पी और वापस अपने घर आ गया.

शाम को जब उससे मिलने गया तो वो बेहद नाराज़ सी थी...."मेरे घर के आसपास चक्कर मत काटा करो, पुलिस कम्प्लेन कर दूंगी..." मिलते ही बड़े गुस्से में उसने मुझसे कहा.

"तुम्हारे घर के आसपास??मैं कब तुम्हारे घर के आसपास आया...फिर से कोई सपना देखी क्या...??", मैंने बिलकुल अनजान होकर पूछा उससे

"अच्छा, तो तुम नहीं आये थे...तो क्या अपने स्कूटर में कोई ऑटो-पायलट वाला सिस्टम भी लगाये हुए हो...जिससे तुम्हारा स्कूटर खुद-ब-खुद मेरे घर के पास चला आया और तुम्हे पता भी नहीं चला...." वो अभी तक गुस्से में ही थी.

"देखो, मैं तो सच कह रहा हूँ, मैं तो घर पे ही था, हाँ सुबह पापा किसी काम से जरूर निकले थे, हो सकता है तुम्हारे मोहल्ले में वो अपने किसी मित्र से मिलने गए हों." मैंने बड़े ही शान्ति उसके इस बात का जवाब दिया.

"अच्छा हाँ, अंकल भी हो तो हो सकते हैं..मैंने सोचा ही नहीं था....देखो कितनी बेवकूफ हूँ मैं...सॉरी सॉरी सॉरी". मुझे पता था की मेरा तीर सही निशाने पर लगेगा.मैंने एक बार पहले उसे बताया था की उसके मोहल्ले में मेरे पापा के कुछ दोस्त भी रहते हैं, और उस शाम उसने बड़ी जल्दी मेरे बहाने पर यकीन भी कर लिया.

मैंने लेकिन उस खेल को एक दिन तक ही सिमित नहीं रखा, तीन दिन लगातार मैं उसके घर हर सुबह जाता रहा और छत पर से उसे देखते रहता.उसने मेरे उस बहाने पर यकीन तो कर लिया था लेकिन फिर भी तीनों दिन सुबह जॉगिंग पर जाते और वापस आते वक़्त वो जब भी मेरे स्कूटर को वहां खड़ा देखती, तो बड़ा कन्फ्यूज्ड सा हो जाती थी..शाम में मिलती तो हमेशा पूछती मुझसे, की मैं उसके घर आया तो नहीं था...और मैं हमेशा इंकार कर देता.लेकिन तीसरे दिन शाम में उसके तेवर कुछ बदले से थे, मुझे समझ आ गया था की अब मेरा ये खेल ज्यदा लम्बा नहीं चल सकता.

चौथे दिन सुबह मैं अपने वक़्त के हिसाब से उसके अपार्टमेन्ट के छत पे पहुँच गया.उसके बाहर निकलने का समय हो गया था, लेकिन अब तक वो निकली नहीं थी.मैं लगातार सड़क की तरफ ही देख रहा था, की पीछे से किसी ने मेरी पीठ थपथपाई.मैं एकदम से हडबडा गया, और जैसे ही पीछे मुड़ के देखा तो वो खड़ी थी, अपने ऑल टाईम फेमस "ईवल वाली हंसी" के साथ.

"अरे..तुम...कैसे....जॉगिंग के लिए....तुम्हे कैसे पता.......छत पे.....मैं तो.....बस...." मैं कोई भी वाक्य पूरा नहीं कर पा रहा था और सच कहूँ तो यूँ उसे एकाएक सामने देख कर मैं थोड़ा डर भी गया था, की वो नाराज़ न हो जाए मुझे यूँ छत पे देखकर.

"क्या कर रहे हो यहाँ खड़े खड़े, पता है बिना परमिसन के किसी दुसरे के छत पे आना इलीगल है...चक्की पीसोगे पुलिस पकड़ के ले गयी तो". उसके चेहरे पे गुस्से और शरारत का मिक्स्ड सा भाव था..कुछ देर रुक कर उसने कहा "मैं पूछती थी तो पता नहीं क्या क्या बहाने बनाते थे साहब, और आज पकडे गएँ हैं तो मुहं से आवाज़ भी नहीं फुट रही"

मैं एम्बैरस्मन्ट में सिर्फ मुस्कुरा रहा था, और पता नहीं क्या क्या लॉजिक दिए वहां उसे लेकिन वो बेहद नाराज़ थी, की मैंने चार दिन बेमतलब ही उसे परेसान किया.मैं भी समझ गया था, की वो नाराज़ है, तो आज शाम तक मेरे हाथ में वो कोई एक लम्बा सा लिस्ट थमा देगी, जिसमे वो सब बातें लिखी होंगी जिसे पूरा करने से उसकी नाराजगी दूर हो जायेगी.लेकिन मैंने देखा की उसके एक हाथ में एक कागज़ भी था, यानी की वही लिस्ट.उसने पहले से तैयार कर रखी थी.मुझे लेकिन एक बात की हैरानी थी, की उसे कैसे पता चल गया की मैं छत पे हूँ.उसने इस बात का जवाब खुद ही दिया.-
"वो तो दीदी ने अचानक कल सुबह पार्क से लौटते वक़्त तुम्हे यहाँ देख लिया, वरना मुझे तो पता भी नहीं चलता की तुम कितने बड़े क्रिमनल हो...बिना इज़ाज़त दुसरे के छत पे आना किसी क्राईम से कम है क्या?"

"अरे लड़की, क्या क्या बकते जा रही हो...मैं बस युहीं आ गया था...खास तुम्हे परेसान करने नहीं...वो तो यहाँ मेरा एक और दोस्त रहता है...तुम्हे नहीं पता उसके बारे में..." मैं अपने बात पर कायम था लेकिन वो मेरे बातों से बहलने वाली नहीं थी, ये मुझे पता था.

"डोंट यु डेअर मिस्टर....काफी बहाने बना चुके, अब जल्दी से कान पकड़ के सॉरी बोलो,'मुसू मुसू हासी' गाओ,  ये लिस्ट पकड़ों...इसमें लिखी बातें मानो और फिर मुझे मनाओ...तब बात बनेगी, वरना से अपनी दोस्ती आज यहीं इसी वक़्त खत्म.वैसे तो तुम्हारा गुनाह देखते हुए ये सजा काफी कम है, लेकिन चलो फिर भी ठीक है.

एक जज की तरह उसने फैसला सुना दिया था.उसके फैसले के विरुद्ध जाने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी, तो मैंने भी हामी भर दी, उससे कान पकड़ के माफ़ी भी मांगी मैंने और उसने माफ़ भी तुरंत कर दिया, इस कंडीसन के साथ, की मैं लिस्ट में लिखी गयी सभी बातें पूरा करूँगा.उसने मुझे छत पे रुकने को कहा और खुद नीचे चली गयी.दस मिनट बाद वो छत पे आई, तो अपने साथ एक थर्मस और दो कप लेते आई थी.थर्मस में कॉफ़ी थी, जो उसने बनायीं थी.तब तक नौ बज चुके थे और नर्म सी धुप बिखरी हुई थी.हम दोनों वहां करीब और दो घंटे तक बैठे रहे, इस दौरान वो तरह तरह के "ज्ञान की बातों" से मुझे एन्लाइटन करती रही.

जब उसके अपार्टमेन्ट के गेट से बाहर मैं निकला तो मैंने उसका दिया वो लिस्ट पढ़ा..सबसे पहली सजा मेरी ये थी, की मुझे एक महीने तक रोज़ सुबह उसके छत पे आना पड़ेगा, और उसकी बनाई कॉफ़ी पीनी होगी, और उससे ज्ञान की बातें सीखनी पड़ेंगी.लेकिन एक महीने उसके घर जाना हो न सका, एक सप्ताह ही चला ये सिलसिला, लेकिन आज भी वो आठ दिन भुलाये नहीं भूलते जब सर्दियों की सुबह की शुरुआत उसकी मुस्कराहट और कॉफ़ी के कॉम्बिनेसन के साथ होती थी.


जवां दिल की राहों में, जैसे खिलती है कली,
तेरे होटों पे बसी, ऐसी हलकी सी हँसी..

24 comments:

  1. वैसे लड़कियों को इतना परेशान करना अच्छी बात नहीं है ।

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  2. तुम अब राज़ खोल ही दो अभि...कोई तो है...वरना प्यारा सा , मीठा सा यह अहसास क्या सिर्फ़ कल्पना है...? लगता तो नहीं, और अगर कल्पना है, तो फिर कहानी में हाथ अजमाओ...।
    बहुत अच्छी पोस्ट है...बधाई...।
    प्रियंका

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  3. प्रियंका जी ने जो बातें पूछी हैं वही मैं भी पूछना चाहती हूँ...सिर्फ कल्पना...या हकीकत?
    हमें भी बेवकूफ़ नहीं बना देना-दीदियों से झूठ नहीं बोला करतेः)
    वैसे बहुत प्यारी पोस्ट है!!

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  4. लिखते रहो ‘अभि’अभी और लिखो...

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  5. प्यारी सज़ा और प्यारी पोस्ट ...... ऐसी सजा मिले तो भला कैसे भूलेंगे वो 8 दिन ...

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  6. बहुत ही प्यारी पोस्ट, यह गीत हमें भी बहुत प्रिय है।

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  7. बहुत अच्‍छी पोस्‍ट ..

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  8. :-) sardi ki subah kuchh aisi hee hoti hai

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  9. आज फिर नज़्म लिखने की ख्वाहिश हो रही थी.. फिर लगा कि नहीं, तुम्हारी यादों की खूबसूरती और मासूमियत के आगे कुछ भी कहना छोटा लगता है.. मगर एम्मान्दारी से कह रहा हूँ कि जब भी तुम्हारी इन यादों से गुज़रता हूँ तो कोई नज़्म खुद ब खुद अंगडाई लेने लगती है..
    बहुत प्यारी लगी ये याद भी!!

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  10. बालिका को परेशां किया , अच्छी बात नहीं है मगर पोस्ट प्यारी लगी :)

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  11. wo 8 din.........................ehsaas..........
    Bandhu ye jo ehsaas hai na bari meethi si hoti hai.
    Wo jo 8 lamha beeta hoga na uski yaad men 8 janam ji saken aisa kahna bilkul hi imperfect hoga aise ehsaas ko define karne ke lie
    balki main to ye kahunga iss ehsaas ko kewal mehsoos hi kiya jaa sakta hai.
    Bata paana bahut mushkil hoga mere lie hi nahi kisi ke lie kyunki jo iss lamhon ko jiega wo hi jaane ga ki wo kuch pal beetne ke baad phir se us pal ke aane ka intejaar kis kadar pyaara hota hoga kitne sapne sajate hoge.......

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  12. क्या लिखूं? बहुत प्यारी पोस्ट ? नहीं मन नहीं है ..क्योंकि प्यारी तो है ही.:)

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  13. जब दांव उलटा पड़ जाता है तो यूँ ही कान पकड़ कर सॉरी कहना पड़ता है तब भी अक्ल है कि खुलती नहीं..बहुत अच्छी लगी.

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  14. यह गाना तो बहुत अच्छा लगता है मुझे भी ...और आपकी पोस्ट बढ़िया बन पड़ी है :)

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  15. वाह सुंदर छोटी सीधी सादी सी बात

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  16. किस्सा है या असलियत ... जी तो करता है इसक असलियत ही मानू ओर खो जाऊं ख्यालों में ...
    खड़ा कर दूं उसे अपनी नायिका बना के ...

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  17. what a post............dil ko chu gai......aur taja kr gai bhut si purani yaadien

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया