Saturday, October 6, 2012

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मिस्टिरीअस अक्टूबर -१-

बस कुछ ही दिनों में त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है..आज की सुबह फिज़ा में बिलकुल वही ताजगी महसूस हुई जो अमूमन अक्टूबर के महीने में महसूस होनी चाहिए.अक्टूबर महिना आते ही मौसम अचानक करवट लेने लगता है..गर्मी और धुप की चुभन कम होने लगती है, रात में ठंडी हवा चलने लगती है और धुप की खुशबु में ये एहसास होता है की बस कुछ ही और दिनों में सर्दियाँ शुरू हो जायेंगी.

जिस तरह से दिसंबर उसके लिए एक खूबसूरत महिना था ठीक उसी तरह अक्टूबर उसके लिए एक महत्वपूर्ण महिना रहा है.जहाँ एक तरफ उसकी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी तरफ उसके ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी.महीनों से प्यार करने की और उनके नाम रखने की तो उसकी आदत पुरानी है, जिस तरह से उसने दिसंबर को "टेन्डर दिसम्बर" कहा था, ठीक उसी तरह वो अक्टूबर को कहती "मिस्टिरीअस अक्टूबर".वो कहती थी, की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर बुरा...बड़ा अजीब महिना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा.


वो भी अक्टूबर का ही एक दिन था..दुर्गा पूजा के आसपास का ही कोई वक़्त, जब मैं पहली बार उसके फ़्लैट पर गया था.वो मुझे अपना नया फिश-टैंक दिखाना चाहती थी.फिश-टैंक दिखाने का तो बस एक बहाना था.मुझे अपने फ़्लैट पर बुलाने का उसका मकसद कुछ दूसरा था.दरअसल एक दिन युहीं बातों बातों में पारिवार में हुई शादियों के तरफ बातों का रुख मुड़ गया.उस दिन से जाने अनजाने में अपने परिवार में हुई शादियों के इतने चर्चे मैंने उससे कर दिए थे, की वो बेचैन थी मेरे परिवार में किसी भी शख्स की शादी का कोई विडियो देखने के लिए.वो मुझसे घंटों बैठकर मेरे परिवार में हुए शादियों के किस्से सुना करती.मैं उससे कहता की हमारे घर में जब शादियाँ होती हैं तो उसके कुछ दिन पहले से ही रिश्तेदार आना शुरू कर देते हैं..और फिर पुरे घर में एक दो हफ्ते धमाचौकड़ी मची रहती है..हफ्ते भर के लिए पूरा घर रौशन हो जाता है.वो मेरी इन बातों को सुनकर अक्सर उदास हो जाया करती थी.वो कहती "मेरे घर में तो शादी किसी की भी हो, वो मुझे किसी बर्थडे पार्टी सा ही लगता है..शाम को सब एक जगह मिलते हैं, पार्टी होती है,डांस-म्यूजिक-डिनर...और फिर सुबह वापस अपने अपने घरों में लोग चले जाते हैं..हमारे घर के लोग सो-कॉलड मॉर्डन, व्यस्त और बोरिंग से हो गए हैं..अच्छा है, तुम्हारे घर में अभी तक सबके चेहरे पर हंसी,ख़ुशी बरक़रार है, और भगवन करे उनका ये सुख हमेशा बना रहे".

वो हर रोज़ मिन्नतें करती की मैं उसे सारे विडियो कैसेट लाकर दे दूँ, वो कुछ दिन कैसेट देखेगी और वापस कर देगी.एक दिन उसके जिद से परेसान होकर मैंने युहीं कह दिया की तुम अकेले विडियो देखोगी, उससे क्या फायदा?मेरे परिवार में किसी को तुम जानती नहीं..कैसे पहचानोगी किसी को?".वो ये बात समझ भी गयी, लेकिन दुसरे ही दिन से एक नयी जिद लेकर बैठ गयी..."तुम किसी दिन मेरे घर आओ, और मैं तुम्हारे साथ बैठकर विडियो देखूंगी..कैसेट के माध्यम से ही सही, तुम अपने परिवार वाले से परिचय करवा देना".

एक दिन वक़्त निकालकर मैंने उसके फ़्लैट जाने का कार्यक्रम बना ही लिया.कुछ रिश्तेदारों की शादियों के विडियो कैसेट भी बैग में रख लिए.उस दिन उसके परिवार में सभी लोग किसी काम से दुसरे शहर गए हुए थे.घर में सिर्फ वो और उसकी बड़ी दीदी थी.मैं जब उसके घर पहुंचा तो दोनों बहनों ने कुछ इस तरह मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला की मुझे लगा जैसे वे दोनों मेरे ही आने का इंतजार कर रही थीं.दोनों मुझे ड्राविंग रूम में बिठा कर घर के अन्दर चली गयीं.मैं थोड़ा हैरान-परेसान-क्लूलेस सा हो गया.वे दोनों बिना एक भी शब्द कहे सिर्फ मुझे ड्राविंग रूम में बिठा के जाने कहाँ गुम हो गयीं.ड्राविंग रूम भी इस कदर सजा हुआ था की मुझे भ्रम हुआ कहीं आज कोई ख़ास दिन तो नहीं है.रंगीन मोमबत्तियां, रंग-बिरंगे झालर और हर तरह के सजावट के सामन चारों दीवारों पे टंगे हुए थे.कमरे की सज-सज्जा देखकर मैं ये सोच समझ ही रहा था की माजरा क्या हो सकता है, की तभी मेरी नज़र कमरे की सबसे विचित्र चीज़ पे गयी, जिसे देख सहसा मैं हंसने लगा.कमरे के एक कोने पे नए सोनी टी.वी के ठीक ऊपर रखा हुआ था बाबा आदम के ज़माने का वी.सी.आर, जिसके कई चर्चे मैं उसके मुहं से सुन चूका था.वो बड़े गर्व से बताती थी  "मेरे वी.सी.आर की खासियत है की वो सिर्फ मेरी बात मानता है इसलिए कोई दूसरा चलाये उसे तो नखरे दिखाता है, लेकिन मैं चलाऊं तो बटर सा स्मूथ चलता है".

करीब पंद्रह बीस मिनट के लम्बे इंतजार के बाद दोनों बहन ड्राविंग रूम में आयीं.उन्हें देख मैं थोड़ा और हैरान सा हो गया.दोनों बिलकुल सज-संवर के आयीं थी.बाकायदा साड़ी और गहने पहने हुए..उन्हें देख एक पल लगा की वो दोनों किसी शादी में जाने के लिए तैयार हुई हैं.दीदी के हाथ में एक डब्बा था, और उन्होंने उसे टेबल पर रखते हुए कहा "देखो, आज सारा दिन तुम हमलोगों के साथ रहोगे तो इसलिए चोकलेट का ये कोटा मैंने पहले से लेकर रखा था".मैं सोच ही रहा था की उनसे कुछ पूछूं, आज कोई ख़ास दिन है क्या, या कहीं आप लोग जा रही हैं? की वो खुद ही कहने लगीं : "हम दोनों को देख तुम समझ रहे होगे की आज कोई पार्टी या शादी या वैसा ही कोई फंक्सन है जहाँ हम जा रहे हैं...लेकिन घबराओ मत..ऐसा कुछ नहीं है, असल में हम दोनों शैतान बहनों की ये पागल्पंती है...हम जब अपने डेली-रूटीन से उब जाते हैं तो युहीं पुरे घर को अच्छे से डेकोरेट कर देते हैं और खुद भी खूब सज-संवर जाते हैं और पुरे दिन खूब अच्छी अच्छी फ़िल्में देखते हैं,अच्छी अच्छी बातें करते हैं..आज तुम आये हो तो पुरे दिन तुम्हारे परिवार की फ़िल्में देखेंगे हम".इतना कह कर वे दोनों कुछ अजीब तरह से हंसने लगीं..कोई और होता तो उन्हें पागल समझ लेता लेकिन दोनों की हंसी और दीदी के इस जवाब से मुझे ज्यादा ताज्जुब नहीं हुआ...मैं जानता था की दोनों बहनों का स्क्रू थोड़ा ढीला है.

छः घंटे में उन दोनों ने मेरे परिवार की चार शादियाँ देखी..दोनों बहनें शादी के विडियो में पूरी तरह खो गयीं थीं..वे ठहाके लगाकर हँस भी रही थीं और बिना मेरी परवाह किये रो भी रही थीं.दीदी ने अंत में कहा "तुम बहुत ज्यादा 'लकी' हो की तुम्हारे परिवार वाले इतने अच्छे हैं..अगर कभी मौका मिला तो मैं तुम्हारे परिवार को करीब से जानना चाहूंगी..अगली शादी तुम्हारे परिवार में किसी की भी हो, मुझे इन्वाइट करना भूल कर भी नहीं भूलना..मैं चाहती हूँ की ऐसे शादी वाले माहौल में कुछ दिन रहूँ..लोग कहते हैं की शादी में थकावट होती है..लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती, शादी अगर ऐसे हो जैसे तुम्हारे परिवार में तो शारीरिक थकावट हो सकती है लेकिन मानसिक थकावट शायद नहीं...दिलो-दिमाग बिलकुल तरोताज़ा हो जाते होंगे...अगर तुम्हारे घरवालों को कोई आपत्ति न हो तो मुझे अपने परिवार की अगली शादी में इनवाईट जरुर करना".

मैंने भी उस दिन दीदी से वादा कर तो दिया था की "आपको अपने परिवार की अगली शादी में जरूर इनवाईट करूँगा, और पुरे शादी के दौरान आप हमारे साथ हमारे घर पे ही रहेंगी".लेकिन मुझे तब कहाँ पता था की दीदी से वो मेरी आखिरी मुलाकात होगी और ठीक बीस दिनों बाद वो हम सब को हमेशा के लिए छोड़कर कहीं दूर चली जायेंगी.


जारी..

8 comments:

  1. अरे! यह क्या???? आख़िरी लाइन ने तो सारा मज़ा बदमजा कर दिया.. तुरत रिएक्ट करना भी सही नहीं लग रहा, लेकिन अक्टूबर की मिस्त्री का ये अंत होगा और 'जारी' भी....?? ओफ्फ्फ!!

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  2. बहुत ही खूबसूरत लिखा है तुमने,हमारे यहाँ की शादियाँ यादगार बन जाती हैं...अंत दुखी कर गईः(

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  3. रोचक .... मिस्ट्री सी ही लगी यह पोस्ट

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  4. दुर्गा भाभी को शत शत नमन - ब्लॉग बुलेटिन आज दुर्गा भाभी की ११० वीं जयंती पर पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से हम उनको नमन करते है ... आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

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  5. इस पोस्ट की सुरुआत तो इतनी अच्छी थी की मैं भी इसमें गुम सा हो गया था और काफी अच्छा लग रहा था साज सजावट और इतने जोश से दिने बिताने का अंदाज. इससे जरा भी अंदाजा नहीं हो रहा था की अंत इतना दुखद होगा, बरा ही अफ़सोस हो रहा है इस पोस्ट को पढकर बिलकुल गमगीन सा हो गया हूँ. दीदी जहाँ कहीं भी हो हम सब आपके लिए दुआएं करते है.

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  6. Maine notice kiya hai ki jin cheezon ke baare main main soochte rehtu hu aap generally ussi ki baare main likh dete hai.

    Kuch dino pehle he shaadi ke baare main sooch rhe thae, yeh ki humne kab se koi bhi shaadi attend nhi ki! Appka yeh post padhke bht accha lga :-)

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  7. sach me ant ne maja kirkira kar diya... !!

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया