Friday, October 19, 2012

लिखने की वजहें...


लड़का जब भी अपनी खुद की कहानियों से उबने लगता, जब उसे ये लगता की इन कहानियों को लिखकर कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, ये बकवास बातें लिखना सिर्फ उसका पागलपन है और जब कभी वो फैसला करता की "अब ये बकवास बातें और नहीं लिखूंगा", ठीक उसी वक़्त ये बकवास बातें लिखने की उसे कोई न कोई वजह मिल ही जाती थी...

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लोग मशगूल थे सब शादी में
रस्में मंडप में चल रही थीं उधर,
दूर उस लॉन की सरगोशी में
तन्हाँ बैठे हुए थे हम दोनों
और अचानक बजी गाने की धुन
तुम उठी, उठके नाचने भी लगी,
मुझको तो नाचना आता ही नहीं.
तुमने पीछा शुरू किया मेरा
मैं तो बस गोल-गोल भागा फिरा
ऐसे जैसे न पकड़ पाओ मुझे.
और फिर रुक गयीं अचानक तुम
हंसके बोली कि बड़े बुद्धू हो
मन्त्र पंडित जी पढ़ रहे थे वहाँ
और हम गोल-गोल घूमें यहाँ.
देख लो सात पे रुकी हूँ मैं
कोई वादा नहीं लिया मैंने
मैं बिना शर्त बस तुम्हारी हूँ
अपनी मम्मी से कहके घर रख लो!

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एक पॉडकास्ट : तुम्हारे ख़त 


(पॉडकास्ट का टेक्स्ट पढने के लिए इस लिंक पर जाएँ
पॉडकास्ट क्रेडिट : अर्चना चाओजी
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Monday, October 15, 2012

मिस्टिरीअस अक्टूबर -२-


वे अक्टूबर के दिन थे जब वो छुट्टियाँ बिताने शहर आई हुई थी.उन्ही दिनों मेरे एक करीबी रिश्तेदार की शादी तय हुई.मेरी ईच्छा थी की उस शादी में वो भी शामिल हो.मुझे पता था की वो शुरू में नखरे दिखायेगी, लेकिन फिर भी मैं उसे मना लूँगा.मैंने तय किया की शादी का कार्ड देने मैं उसके घर जाऊँगा और उसके माता-पिता के हाथ में ही कार्ड दूंगा.कार्ड देने जब उसके घर जा रहा था, तो बेवजह ये सोच कर घबरा रहा था की उसके माता-पिता क्या सोचेंगे.उन्होंने बल्कि बहुत आराम से उसे शादी में शामिल होने की अनुमति दे दी.जब उसके घर से वापस आ रहा था, वो मुझे छोड़ने बाहर की गली तक साथ आई.उसने मुझे याद दिलाया की मैं उसके घर ठीक तीन साल बाद आ रहा हूँ.तीन साल पहले जब उसके घर आया था तो उसकी दीदी से मैंने वादा किया था की अपने परिवार के अगली शादी में उन्हें जरूर बुलाऊंगा.ये बात मुझे भी याद थी...लेकिन मैंने जान-बुझकर इस बात का जिक्र नहीं किया था..चलते वक़्त उसने मुझसे कहा "तुम अगर इस शादी में ना भी बुलाते मुझे, तो भी मैं जरूर आती".


मैंने उसे शादी के दिन शाम में आने को कहा था लेकिन वो सुबह ही पहुँच गयी थी..मैं छत पर कुछ तैयारियों में व्यस्त था की उसकी गाड़ी आते दिखाई दी...और मैं दौड़ते हुए उसे रिसीव करने नीचे गेट के पास पहुंचा.गेट के पास कुछ मेहमान और मेरे कुछ रिश्तेदार कुर्सियां डाल कर बैठे हुए थे.वहीँ पास में मेरी माँ और भाभी खड़ी थीं.मेरी भाभी से वो पहले भी एक बार मिल चुकी थी.गाड़ी से उतरते ही उसकी नज़र मेरी माँ पर गयी.उसने मेरे कानों में कहा "सुनो जनाब, आंटी वहां खड़ी हैं...अब बताओ अगर ऐसे में तुमको मैं अभी एक 'किस' कर लूँ, तो सोचो तुम्हारा क्या हाल होगा".ये कहने के बाद वो बिलकुल बेपरवाह तरीके से हंसने लगी..उसकी इस बेपरवाह हंसी से वहां बैठे कुछ रिश्तेदार हम दोनों को शक की नज़रों से देखने लगे..मेरी कुछ बहनें जो वहां खड़ी थी, उन्होंने कानाफूसी भी शुरू कर दी "लगता है ये भैया की गर्लफ्रेंड है".

माँ और भाभी हमारे पास आयीं तो मैंने उसका परिचय माँ से करवाया...मैंने कहा "ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त है"....माँ ने जब पूछा "ये तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त तुम्हारे साथ कॉलेज में पढ़ती है या स्कुल की दोस्त है?" तो जबतक मैं माँ के इस प्रश्न का कुछ जवाब दे पाता, पीछे से भाभी ने एक जबरदस्त गुगली फेंक दिया "अरे ये झूठ बोल रहे हैं, इनकी दोस्त वोस्त नहीं है...ये आपकी होने वाली बहु है...प्यार करते हैं ये जनाब इनसे".  भाभी का ये गुगली इतना स्ट्रोंग था की उसके तो होश ही उड़ गए थे और मुझे भी चक्कर सा आ गया था...हम दोनों भाभी के इस गुगली से बिलकुल क्लीन बोल्ड हो गए थे.मैं भाभी के तरफ गुस्से से देखने लगा लेकिन फिर भी उनकी बातों का मैंने कोई विरोध नहीं किया...शुक्र इस बात का था की भाभी के इस गुगली को माँ ने सिरिअसली नहीं लिया और वो भी हंसने लगीं...

उसे देख जहाँ एक तरह कुछ लोग हैरान थे और उसे मेरी गर्लफ्रेंड मान लिए थे वहीँ दूसरी तरफ मेरी सभी बहनें उससे मिलकर बेहद खुश थीं..मेरी बहनों को खुश करने के लिए उसने कोई कसर भी नहीं छोड़ा था, सबके लिए वो कुछ न कुछ तोहफे लायी थी.उसकी चुलबुली हरकतों ने मेरी बहनों के साथ साथ मेरे परिवार में सबका दिल जीत लिया था..वो घर के कामों में मेरी बहनों का हाथ बटाने लगी.चाय भी उसने ही सबके लिए बनाई....और तब मुझे सही में यकीन हो गया की उसे चाय बनाने आती है.शो-ऑफ़ करना और खुद की तारीफ़ करना उसे सबसे ज्यादा पसंद है...मेरी बहनों और भाभियों को उसने ये बता दिया था की उसने हाथों में मेहँदी लगाने का कोई कोर्स किया हुआ है...फिर क्या था, घर की सभी लड़कियां उसे घेर के बैठ गयीं और उससे मेहँदी लगवाने लगीं....वो घर में इस कदर हिल मिल गयी थी की कुछ लोग तो उसे घर का ही कोई सदस्य समझने लगे थे...शाम में बारात निकलने के कुछ देर पहले जब उसे कुछ फुर्सत मिली तो मेरे पास आकर बैठ गयी...कहने लगी मुझसे "तुम्हारी फैमली कितनी प्यारी सी है, काश मैं हमेशा के लिए तुम्हारे इस परिवार का एक हिस्सा बन जाऊं".मैं कुछ भी नहीं कह सका, सिर्फ उसे देखता रहा..

बारात में वो शुरू में ही मुझसे खफा हो गयी...उसने कह रखा था की पुरे बारात के दौरान मैं उसके साथ ही रहूँ...लेकिन मैं अपने बड़े मामा के साथ सबसे पीछे चल रहा था..इसकी मुख्य वजह ये थी की बारात में मेरी बहनें परिवार के सभी सदस्यों को खींच ला रही थीं नाचने के लिए और मुझे और मामा को इससे बचना था, इसलिए हम दोनों बारातियों से थोड़ी दुरी बनाकर चल रहे थे.वो पुरे बेफिक्री में मेरी बहनों के साथ नाच रही थी और जब न तब मुझे देख कर गुस्से में अजीब अजीब सी शक्लें बना रही थी और लगातार इशारों से मुझे नाचने के लिए बुला भी रही थी...लेकिन मैं अपनी जगह से हिला भी नहीं..वैसे मुझे उसे नाचते हुए देखने का बड़ा मन था, लेकिन कोई नाचने के लिए खींच लेगा, इसका डर ज्यादा था...इसलिए मैंने अपने मन पर बड़ी मुस्किल से काबू किया.

मेरी सभी बहने उसके बारे में मेरे से इतना सुन चुकीं थी, की सबको उससे ढेर सारी बातें करनी थीं...हम लोगों ने प्लान बनाया की शादी की रस्में जब शुरू होंगी, तो हम सब लॉन के एक कोने में अपनी महफ़िल सजा लेंगे, और वो महफ़िल पूरी रात चलेगी.हम सबने वही किया भी...लॉन के एक कोने में हम जाकर बैठ गए और पूरी रात बातों और मजाकों का सिलसिला चलता रहा...उस महफ़िल में वैसे तो ज़्यादातर मेरी टांग-खींचाई ही होती रही, लेकिन उस रात हम सबने अपने ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पल जिये थे.करीब तीन घंटे हम सब बातें करते रहे और उसके बाद मेरी बहनों को शादी के कुछ रस्मों के लिए जाना पड़ा.वो भी मेरी बहनों के साथ जा रही थी, लेकिन मैंने उसे रोक लिया...

कुछ देर हम दोनों खामोश से बैठ रहें..बैकग्राउंड से कुछ पुराने गानों की आवाज़ आ रही थी...

"ये सब गाने कितने बार सुनती रहती हूँ, लेकिन ऐसे शादी के पंडालों में जब ये गाने बजते हैं तो कुछ अलग सा लगता है न", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"हाँ, मुझे याद है जब मेरी मौसी की शादी हुई थी बहुत साल पहले, तब मैं अक्सर 'डेक' वालों के पास चला जाता था इंस्ट्रकसन देने के लिए की कौन से गाने बजने चाहिए"..

"ह्म्म्म" उसने मेरी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.वो कुछ सोचने लगी :

"अच्छा ये बताओ, तुम्हे याद है...उन दिनों जब जाड़ों की सुबह हम कंप्यूटर क्लासेज के बाद चचा की दुकान पे चाय पीते थे, तो चचा के 'डेक' में भी ऐसे गाने बजते थे...मुझे वैसा ही कुछ फील आ रहा है"...बैकग्राउंड में बज रहे गानों की तर्ज पे वो बैठे बैठे ही झुमने लगी थी...."आओ न, लेट्स डांस टू दिस सॉंग"..उसने मुझे खींचते हुए कहा...

"पागल मत बनो.." मैंने उसे थोड़ा डांट सा दिया..

"ओफ्हो...तुम सच में बोरिंग हो....अच्छा बताओ तुम नाचने से घबराते क्यों हो...आज बारात में नाचने क्यों नहीं आये, पता है मैं कित्ता गुस्सा हुई थी...देखो तो मेरे हाथ अभी तक लाल हैं गुस्से से"  उसने अपना हाथ आगे बढ़ा कर मुझे दिखाया.

"अच्छा, हाथ लाल हो गए, मैंने तो सुना था की चेहरा लाल होता है गुस्से से"

"सुनो मिस्टर, बात को मोड़ो मत...चेहरा क्या, हाथ पैर सब लाल हो जाते हैं गुस्से से.....अच्छा जल्दी बताओ तुम आज नाचे क्यों नहीं बाराती मे"

"अरे, मुझे नाचना अच्छा नहीं लगता...अनकम्फर्टेबल महसूस करता हूँ..बस इसलिए".. मैंने सफाई देने की कोशिश की लेकिन मेरे इस सफाई पर वो हंसने लगी...कहने लगी "हाँ, तुम्हारे चेहरे से तो वो पता ही चल रहा था..कितने डरे हुए से लग रहे थे तुम...और तुम्हारे मामा भी...मेरा तो दिल किया तुम दोनों को जबरदस्ती पकड़ के नचा दूँ...लेकिन...."

लेकिन क्या...तुम आ जाती...और हमें भी नाचने के लिए जबरदस्ती खींच ही लेती जैसे तुमने मेरी मौसी को खींचा था...कम से कम इसी बहाने परिवार के बाकी लोगों को मुझे और मामा को नाचते हुए देखने का मौका तो मिलता...

"हाँ वो तो ठीक है लेकिन मेरी उस संस्कारी लड़की के टैग का क्या होता जो तुम्हारे परिवार वालों ने आज दिया है मुझे...सब को लगता की लड़की तो बिगड़ी हुई है केवल सबको नचाते रहती है....पता है कितना बेशकीमती होता है ये संस्कारी और सुशिल लड़की का टैग.... "

नहीं, कम से कम तुम्हारे बारे में तो ऐसा कोई भी नहीं सोचता...ये मैं जानता हूँ... "मैंने पुरे विश्वास के साथ कहा.

"अच्छा...लेकिन तुम ये कैसे जानते हो ?" उसने पूछा..

"बस ऐसे ही....कुछ है कारण, किसी और दिन बताऊंगा"  (मैंने बात को टालने के लिए ये कह दिया था..लेकिन कारण मैं जानता था..उसकी इतनी बातें मैंने अपनी दोनों भाभी, मामी और मौसी को बताई थी की मेरे आधे घरवाले उससे बहुत अच्छी तरह से वाकिफ हो गए थे. )

"अच्छा, ये शादी बहुत ख़ास है न तुम्हारे परिवार के लिए..देखो, तुम्हारे घर के सभी लोग नाच रहे थे...

"हाँ, पता है ये एक जेनरेसन की आखिरी शादी है...तो खास तो होनी ही है...

"ओह अच्छा...हाँ...फिर तो बहुत ही स्पेशल शादी है, और शादी को ख़ास बनाने की एक और वजह है देखो....मैं...मैं आई हूँ न इस शादी में... " अपनी तारीफ़ करने का वो एक मौका भी नहीं छोडती थी..और उसकी इस बेवकूफी भरी बातों पर मुझे हमेशा बहुत प्यार आता..

"पता है तुम्हारी फैमली मुझे बिलकुल उस फिल्म की फैमली की तरह लगती है, जो तुम्हे और तुम्हारी बहनों को सबसे ज्यादा पसंद है".

अच्छा, ऐसा तुम्हे क्यों लगा?

"देखे नहीं सब कैसे एक दुसरे को जबरदस्ती खींच ला रहे थे नाचने के लिए...ख़ुशी झलक रही थी सबके चेहरे से...और फिर कैसे गोलगप्पे के स्टाल पर सब एक दुसरे को जबरदस्ती एक के बाद एक गोलगप्पे खिला रहे थे...मेरे भी मुहं में आठ दस गोलगप्पे ठूंस दिए गए थे...पता नहीं किन किन लोगों ने खिलाया मुझे...याद भी नहीं.."  वो कुछ सोचने लगी, शायद ये याद करने की कोशिश कर रही हो की किस किस ने उसे गोलगप्पे खिलाये थे.

"हाँ, थोड़ी पागल सी फैमली है मेरी...लेकिन कुछ साल पहले अगर मेरे परिवार के किसी फक्सन में शामिल होती शायद तुम्हे कुछ और पागलपन देखने को मिलते...कुछ रिश्तेदार थोड़े अलग से रहने लगे हैं आजकल..." मैंने कहा.

"तुम्हे याद है, जब तुम हमारे घर आये थे विडियो कैसेट लेकर...तुम्हारे जाने के बाद दीदी ने ऐसा कुछ गेस किया था..वो कहती थी की तुम्हारे घर के पुरानी शादियों में जो ख़ुशी दिखती थी, वो तुम्हारे परिवार के इधर के शादियों में देखने को नहीं मिलती....दीदी कहतीं थी...." वो कहते कहते रुक सी गयी...अचानक अपनी दीदी का जो उसने जिक्र छेड़ दिया था, उसके लिए मैं भी बिलकुल तैयार नहीं था, और एकाएक हम दोनों के बीच एक सन्नाटा सा छा गया...

उसकी आँखें अचानक से नम हो गयीं थी... उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया...कहने लगी " माफ़ कर देना तुम मुझे...कम से कम आज के दिन मुझे ऐसे उदास होकर रोना नहीं चाहिए...अच्छा शगुन नहीं होता"

उसकी ये बेवजह का गिल्ट और मुझसे ऐसे माफ़ी माँगना मुझे अच्छा नहीं लगा...और मैंने उसके आंसू पोछते हुए उसे थोड़ा डांटते हुए कहा "कैसी बातें करती हो तुम...आज के दिन तो हम दोनों को उन्हें याद करना चाहिए..उनके बिना तो आज के दिन का कोई महत्त्व ही नहीं है"

"हाँ जानती हूँ मैं...जब मैं सुबह आ रही थी न यहाँ, तो पुरे रास्ते मुझे दीदी की बहुत याद आई.." वो कुछ और कहना चाह रही थी लेकिन कहते कहते बीच में ही वो रुक गयी...कुछ देर तक हम दोनों चुप ही बैठे रहे...बिलकुल खामोश

हम दोनों के बीच पसरी उस ख़ामोशी को तोड़ने के लिए और बातों का रुख मोड़ने के लिए मैंने कहा उससे...."पता है तुम्हे, इस हरी साड़ी में तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो आज...मोहल्ले के सभी लड़के आज सिर्फ तुम्हे ही देख रहे थे....." वो इस बात पर मुस्कुराने लगी...अपनी तारीफ़ सुनने के बाद तो वो वैसे भी मुस्कुराने ही लगती है...फिर अपने ट्रेडमार्क अंदाज़ में उसने कहा "तुम मुझे क्या कह रहे हो...देखो तो लेदर जैकेट,जींस और इस कूल से कैप में तुम कितने मस्त दिख रहे हो..और वो पीली साड़ी वाली गन्दी सी लड़की तुमपर बहुत लाईन मार रही थी...मैं शुरू से उसे नोटिस कर रही थी" उसके चेहरे पर उसकी ट्रेडमार्क हंसी और उसके जलन वाले एक्स्प्रेसन वापस लौट आये थे...जिससे मुझे बड़ी राहत सी मिली..

मैंने जानबूझकर उसे चिढ़ाने के लिए कहा "पीली साड़ी वाली?? अच्छा, मैंने तो उसपर ध्यान ही नहीं दिया...रुको जाकर बात करता हूँ..."

"हहं,...ध्यान नहीं दिया??????......अरे जनाब, लड़के लोग तो लड़कियों पर खूब ध्यान देते हैं....तुम कोई प्लूटो से थोड़े ही आये हो...जो अलग होगे...चुपचाप बैठे रहो..."

हम दोनों कुछ देर तक एक दुसरे को देखकर मुस्कुराते रहे और अजीब अजीब से शक्लों में एक दुसरे को चिढाते रहे...ये अजीब शक्लें बनाकर एक दुसरे से सवाल जवाब करने का और एक दुसरे को चिढ़ाने का खेल भी मुझे इसी लड़की ने सिखाया था....तब तक सुबह भी हो गयी थी और शादी की रस्में भी खत्म हो गयीं थी.मेरी बहनें भी तब तक हम दोनों के पास आकर बैठ गयीं थी और सुबह की पहली चाय भी हमारे टेबल पर आ गयी थी....बैकग्राउंड में एक गाना बज रहा था, मैंने इशारों में उसे वो गाना सुनने के लिए कहा...उसने सुन कर अपनी आँखों से जवाब दिया था...."हमेशा याद रखूंगी..."

ये लम्हे ये पल हम बरसो याद करेंगे...



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Saturday, October 6, 2012

मिस्टिरीअस अक्टूबर -१-

बस कुछ ही दिनों में त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है..आज की सुबह फिज़ा में बिलकुल वही ताजगी महसूस हुई जो अमूमन अक्टूबर के महीने में महसूस होनी चाहिए.अक्टूबर महिना आते ही मौसम अचानक करवट लेने लगता है..गर्मी और धुप की चुभन कम होने लगती है, रात में ठंडी हवा चलने लगती है और धुप की खुशबु में ये एहसास होता है की बस कुछ ही और दिनों में सर्दियाँ शुरू हो जायेंगी.

जिस तरह से दिसंबर उसके लिए एक खूबसूरत महिना था ठीक उसी तरह अक्टूबर उसके लिए एक महत्वपूर्ण महिना रहा है.जहाँ एक तरफ उसकी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी तरफ उसके ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी.महीनों से प्यार करने की और उनके नाम रखने की तो उसकी आदत पुरानी है, जिस तरह से उसने दिसंबर को "टेन्डर दिसम्बर" कहा था, ठीक उसी तरह वो अक्टूबर को कहती "मिस्टिरीअस अक्टूबर".वो कहती थी, की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर बुरा...बड़ा अजीब महिना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा.


वो भी अक्टूबर का ही एक दिन था..दुर्गा पूजा के आसपास का ही कोई वक़्त, जब मैं पहली बार उसके फ़्लैट पर गया था.वो मुझे अपना नया फिश-टैंक दिखाना चाहती थी.फिश-टैंक दिखाने का तो बस एक बहाना था.मुझे अपने फ़्लैट पर बुलाने का उसका मकसद कुछ दूसरा था.दरअसल एक दिन युहीं बातों बातों में पारिवार में हुई शादियों के तरफ बातों का रुख मुड़ गया.उस दिन से जाने अनजाने में अपने परिवार में हुई शादियों के इतने चर्चे मैंने उससे कर दिए थे, की वो बेचैन थी मेरे परिवार में किसी भी शख्स की शादी का कोई विडियो देखने के लिए.वो मुझसे घंटों बैठकर मेरे परिवार में हुए शादियों के किस्से सुना करती.मैं उससे कहता की हमारे घर में जब शादियाँ होती हैं तो उसके कुछ दिन पहले से ही रिश्तेदार आना शुरू कर देते हैं..और फिर पुरे घर में एक दो हफ्ते धमाचौकड़ी मची रहती है..हफ्ते भर के लिए पूरा घर रौशन हो जाता है.वो मेरी इन बातों को सुनकर अक्सर उदास हो जाया करती थी.वो कहती "मेरे घर में तो शादी किसी की भी हो, वो मुझे किसी बर्थडे पार्टी सा ही लगता है..शाम को सब एक जगह मिलते हैं, पार्टी होती है,डांस-म्यूजिक-डिनर...और फिर सुबह वापस अपने अपने घरों में लोग चले जाते हैं..हमारे घर के लोग सो-कॉलड मॉर्डन, व्यस्त और बोरिंग से हो गए हैं..अच्छा है, तुम्हारे घर में अभी तक सबके चेहरे पर हंसी,ख़ुशी बरक़रार है, और भगवन करे उनका ये सुख हमेशा बना रहे".

वो हर रोज़ मिन्नतें करती की मैं उसे सारे विडियो कैसेट लाकर दे दूँ, वो कुछ दिन कैसेट देखेगी और वापस कर देगी.एक दिन उसके जिद से परेसान होकर मैंने युहीं कह दिया की तुम अकेले विडियो देखोगी, उससे क्या फायदा?मेरे परिवार में किसी को तुम जानती नहीं..कैसे पहचानोगी किसी को?".वो ये बात समझ भी गयी, लेकिन दुसरे ही दिन से एक नयी जिद लेकर बैठ गयी..."तुम किसी दिन मेरे घर आओ, और मैं तुम्हारे साथ बैठकर विडियो देखूंगी..कैसेट के माध्यम से ही सही, तुम अपने परिवार वाले से परिचय करवा देना".

एक दिन वक़्त निकालकर मैंने उसके फ़्लैट जाने का कार्यक्रम बना ही लिया.कुछ रिश्तेदारों की शादियों के विडियो कैसेट भी बैग में रख लिए.उस दिन उसके परिवार में सभी लोग किसी काम से दुसरे शहर गए हुए थे.घर में सिर्फ वो और उसकी बड़ी दीदी थी.मैं जब उसके घर पहुंचा तो दोनों बहनों ने कुछ इस तरह मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला की मुझे लगा जैसे वे दोनों मेरे ही आने का इंतजार कर रही थीं.दोनों मुझे ड्राविंग रूम में बिठा कर घर के अन्दर चली गयीं.मैं थोड़ा हैरान-परेसान-क्लूलेस सा हो गया.वे दोनों बिना एक भी शब्द कहे सिर्फ मुझे ड्राविंग रूम में बिठा के जाने कहाँ गुम हो गयीं.ड्राविंग रूम भी इस कदर सजा हुआ था की मुझे भ्रम हुआ कहीं आज कोई ख़ास दिन तो नहीं है.रंगीन मोमबत्तियां, रंग-बिरंगे झालर और हर तरह के सजावट के सामन चारों दीवारों पे टंगे हुए थे.कमरे की सज-सज्जा देखकर मैं ये सोच समझ ही रहा था की माजरा क्या हो सकता है, की तभी मेरी नज़र कमरे की सबसे विचित्र चीज़ पे गयी, जिसे देख सहसा मैं हंसने लगा.कमरे के एक कोने पे नए सोनी टी.वी के ठीक ऊपर रखा हुआ था बाबा आदम के ज़माने का वी.सी.आर, जिसके कई चर्चे मैं उसके मुहं से सुन चूका था.वो बड़े गर्व से बताती थी  "मेरे वी.सी.आर की खासियत है की वो सिर्फ मेरी बात मानता है इसलिए कोई दूसरा चलाये उसे तो नखरे दिखाता है, लेकिन मैं चलाऊं तो बटर सा स्मूथ चलता है".

करीब पंद्रह बीस मिनट के लम्बे इंतजार के बाद दोनों बहन ड्राविंग रूम में आयीं.उन्हें देख मैं थोड़ा और हैरान सा हो गया.दोनों बिलकुल सज-संवर के आयीं थी.बाकायदा साड़ी और गहने पहने हुए..उन्हें देख एक पल लगा की वो दोनों किसी शादी में जाने के लिए तैयार हुई हैं.दीदी के हाथ में एक डब्बा था, और उन्होंने उसे टेबल पर रखते हुए कहा "देखो, आज सारा दिन तुम हमलोगों के साथ रहोगे तो इसलिए चोकलेट का ये कोटा मैंने पहले से लेकर रखा था".मैं सोच ही रहा था की उनसे कुछ पूछूं, आज कोई ख़ास दिन है क्या, या कहीं आप लोग जा रही हैं? की वो खुद ही कहने लगीं : "हम दोनों को देख तुम समझ रहे होगे की आज कोई पार्टी या शादी या वैसा ही कोई फंक्सन है जहाँ हम जा रहे हैं...लेकिन घबराओ मत..ऐसा कुछ नहीं है, असल में हम दोनों शैतान बहनों की ये पागल्पंती है...हम जब अपने डेली-रूटीन से उब जाते हैं तो युहीं पुरे घर को अच्छे से डेकोरेट कर देते हैं और खुद भी खूब सज-संवर जाते हैं और पुरे दिन खूब अच्छी अच्छी फ़िल्में देखते हैं,अच्छी अच्छी बातें करते हैं..आज तुम आये हो तो पुरे दिन तुम्हारे परिवार की फ़िल्में देखेंगे हम".इतना कह कर वे दोनों कुछ अजीब तरह से हंसने लगीं..कोई और होता तो उन्हें पागल समझ लेता लेकिन दोनों की हंसी और दीदी के इस जवाब से मुझे ज्यादा ताज्जुब नहीं हुआ...मैं जानता था की दोनों बहनों का स्क्रू थोड़ा ढीला है.

छः घंटे में उन दोनों ने मेरे परिवार की चार शादियाँ देखी..दोनों बहनें शादी के विडियो में पूरी तरह खो गयीं थीं..वे ठहाके लगाकर हँस भी रही थीं और बिना मेरी परवाह किये रो भी रही थीं.दीदी ने अंत में कहा "तुम बहुत ज्यादा 'लकी' हो की तुम्हारे परिवार वाले इतने अच्छे हैं..अगर कभी मौका मिला तो मैं तुम्हारे परिवार को करीब से जानना चाहूंगी..अगली शादी तुम्हारे परिवार में किसी की भी हो, मुझे इन्वाइट करना भूल कर भी नहीं भूलना..मैं चाहती हूँ की ऐसे शादी वाले माहौल में कुछ दिन रहूँ..लोग कहते हैं की शादी में थकावट होती है..लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती, शादी अगर ऐसे हो जैसे तुम्हारे परिवार में तो शारीरिक थकावट हो सकती है लेकिन मानसिक थकावट शायद नहीं...दिलो-दिमाग बिलकुल तरोताज़ा हो जाते होंगे...अगर तुम्हारे घरवालों को कोई आपत्ति न हो तो मुझे अपने परिवार की अगली शादी में इनवाईट जरुर करना".

मैंने भी उस दिन दीदी से वादा कर तो दिया था की "आपको अपने परिवार की अगली शादी में जरूर इनवाईट करूँगा, और पुरे शादी के दौरान आप हमारे साथ हमारे घर पे ही रहेंगी".लेकिन मुझे तब कहाँ पता था की दीदी से वो मेरी आखिरी मुलाकात होगी और ठीक बीस दिनों बाद वो हम सब को हमेशा के लिए छोड़कर कहीं दूर चली जायेंगी.


जारी..
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