Thursday, August 30, 2012

मुझे अपने कॉलर से झटक कर गिरा मत देना


एक बेहद सर्द रात में लिखी कुछ बकवास बातें..


तुम्हे इजाजत पसंद है न? याद है तुम्हे जब हम एक इम्तिहान देकर कलकत्ते से वापस आ रहे थे, तब मैंने पहली बार तुम्हे इस फिल्म के बारे में बताया था.हमारी ट्रेन किसी अनजान प्लेटफोर्म पर आकर रुक गयी थी और लगातार ये अनाउन्स्मन्ट की जा रही थी की आगे ट्रैक में खराबी आ जाने की वजह से ट्रेन यहाँ दो-तीन घंटे रुकेगी.बाहर बारिश हो रही थी, लेकिन तुम आदत से मजबूर, ट्रेन से उतर गयी और प्लेटफोर्म पर टहलने लगी..मैंने तुम्हे डांटा, लेकिन मेरी डांट का तुमपर कोई असर नहीं हुआ और उल्टा तुमने मुझे प्लेटफोर्म पर खींच लिया था.हम बहुत देर प्लेटफोर्म पर लगी एक बेंच पर बैठे रहे..शायद रात के नौ-दस बज रहे होंगे.

उस वक़्त वहां बैठे बैठे मुझे एकाएक इजाज़त फिल्म की याद आ गयी थी, जो मैंने कुछ दिन पहले ही देखी थी.प्लेटफोर्म के उस बेंच पर बैठे मैं ये सोच ही रहा था की वो ऐसी ही कोई बारिशों वाली रात रही होगी जब महिंदर सुधा से पांच साल बाद मिला होगा, किसी अनजान से प्लेटफोर्म पर....की तभी तुमने जोर से एक हाथ मेरे पीठ पर दे मारा था - "ऐसे क्या बैठे हो..देखो तो ये रेलवे का अनाउन्स्मन्ट कितना बोर कर रहा है... जाकर बंद कराओ इसे".
मुझे हँसी आ गयी थी तुम्हारी इस बात पर.मैंने तुमसे कहा.."अच्छा तो ये होगा की तुम रेलव अनाउन्स्मन्ट करना शुरू कर दो, और उस अनाउन्स्मन्ट में अपनी क्रीऐटिवटी और इमोशन डाल कर उसे थोड़ा इक्साइटिंग बना दो, जैसे एक बार  महिन्द्र ने न्यूज़ रीडिंग में अपने ईमोसन डाल कर उसे इक्साइटिंग बनाया था".
तुम मुझे एकटक से ऐसे देखने लगी थी की जैसे मैंने फ़ारसी में कुछ कह दिया हो..कुछ देर कुछ सोचने के बाद तुमने पूछा था मुझसे "ये  महिन्द्र कौन है?"

बिना बताये चले जाते हो!
जा के बताऊं कैसा लगता है?
जब तुम्हे पता चला की महिन्द्र कौन है तब तुमसे रहा नहीं गया और वहीँ प्लेटफोर्म के बेंच पर बैठे बैठे तुमने मुझसे फिल्म की पूरी कहानी सुन ली.वापस जब हम अपने शहर पहुंचे तो तुमने जो सबसे पहला काम किया था वो था इजाज़त फिल्म का विडियो कैसेट लाकर उसे देखना.

फिल्म देखने के बाद तो कई हफ़्तों तक तुमपर माया का किरदार इस कदर हावी रहा की तुम हर बात पर कहती थी...देखो तो ऐसे माया करती थी, ऐसे मैं भी करती हूँ...माया को बारिश अच्छी लगती थी, मुझे भी..". एक शाम जब हम दोनों बैठे थे किसी पार्क के बेंच पर तब तुमने कहा था मुझसे -
"जानते हो, मैं माया की तरह ही इम्पल्सिव हूँ और तुम महिन्द्र की तरह ही समझदार और डांटने वाले, लेकिन सुधा..सुधा कौन होगी??हो सकता है आगे जाकर पता चले की सुधा कौन होगी...वैसे...नहीं ही हो तो अच्छा है..देखे थे न जब महिन्द्र की जिंदगी में सुधा आई थी तो बेचारी माया कितनी अकेली हो गयी थी,इसमें सुधा की कोई गलती नहीं थी...वो तो बेचारी बहुत ही सीधी सी लड़की थी...लेकिन मैं माया के जैसे अकेली रहना नहीं चाहती.जानते हो तुम...माया की तरह ही मैं भी एक सूखे पत्ते की तरह उड़ के तुम्हारे कॉलर पर आकर अटक गईं हूँ...मुझे अपने कॉलर से झटक कर कभी गिरा मत देना..बहुत दर्द होता होगा न ऐसे गिरने में?"
मैं चाह रहा था की उस वक़्त तुमसे कहूँ की तुम्हे हमेशा संभाल कर अपने पास रखूँगा लेकिन मैं चुप रहा.अब सोचता हूँ की अच्छा ही था की मैंने उस वक़्त तुमसे ऐसा कोइ वादा नहीं किया था..

तुमने उस शाम मुझसे कहा था की मैं तुम्हे इस फिल्म के सारे गाने एक कागज़ पर लिख कर दूँ, तुम्हे गानों में कई शब्द समझ में नहीं आ रहे थे.मैंने तुम्हे गाने तो लिख कर दिए ही थे और साथ ही इस फिल्म का कैसेट भी तुम्हे खरीद कर दे दिया था.

अगले दिन जब तुम मिलने आई थी तब तुम्हारा मुझसे सबसे पहला सवाल यही था "ये बड़ा कन्फयूजिंग सा गाना है..इसका क्या मतलब हुआ -एक इजाज़त दे दो बस, जब इसको दफ़नाऊँगी..मैं भी वहीं सो जाऊंगी??माया ये लाईन कहते वक़्त कितनी दुखी हो गयी थी...मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा..तुम मुझे पूरा गाना समझाओ"  . 

मेरे जैसे कम बोलने वाले इंसान के सामने तुमने ऐसा ट्रिकी सवाल कर दिया था की मैं सोच में पड़ गया..तुम्हे ये गाना समझाऊं तो कैसे?इस तरह के गानों को समझा ही नहीं सकता कोई...बस महसूस कर सकता है और गाना सुनते वक़्त रो सकता है.

फिर भी मैंने कोशिश की और तुम्हे गाना समझाया.तुम बिलकुल उदास सी हो गयी थी..कहने लगी "बेचारी माया..कितनी अकेली हो गयी थी...पता है दो दिनों तक मैंने इस फिल्म का विडियो कैसेट अपने पास रखा था और लगातार दो दिन तक देखते रही ये फिल्म...दो दिन मैं कितना रोई हूँ ये फिल्म देख कर तुमको क्या मालुम..और वो हॉस्पिटल वाला सीन याद है तुम्हे जब माया कहती है 'गाल पे मत मारना...बहुत जोर से लगता है'...और तब महिन्द्र उसके गालों को चूम लेता है...मेरी तो जान ही निकाल दी थी उस सीन ने.

...और जब माया जा रही होती है सुधा के पास और रास्ते में उसके गले का स्कार्फ टायर में अटक जाता है तब मुझे ऐसा लगा था की जैसे माया नहीं मैं हूँ वहां पर..और मैं वो सीन देखते समय ऐक्चूअली उसे महसूस कर सकती थी...महिन्द्र को उस वक़्त वैसे रोते हुए देख लगा की कहीं से भी कोई चमत्कार हो जाए और माया फिर से जिन्दा हो जाए...पता है मैं रात भर सोचते रह गयी...इस तरह की फुल ऑफ़ लाईफ, बिंदास और खूबसूरत लड़की की ऐसी मौत..मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए थे.यु नो शायद ऐसा ही होता भी है....लड़की जब इस तरह की बेफिक्री से जिंदगी जिए तो उसका अंत शायद ऐसा ही होता होगा, मौत का भी कहाँ डर था उसे...याद है तुम्हे वो सीन जब माया महेंद्र के पास बाईक चलाते हुए आती है और कहती है महेंद्र से "तुम्हे तो बस मौत से डर लगता है"..वो जिस तरह से ये कहती है मुझे तो लगता था की मौत उसकी बेस्ट फ्रेंड है...इसलिए तो जब देखा की वो इतनी तन्हा हो गयी तो उसे अपने साथ लेते चली गयी.."

तुम मेरे तरफ देख कर मुस्कुराने लगी थी, लेकिन मैं तुम्हारे चेहरे पर एक दूसरा ही भाव देख रहा था, जिसमे माया का दर्द, उसके प्रति तुम्हारा लगाव मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था...जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा या महसूस किया था..मन में सोचते रह गया की क्या कोई भी फिल्म किसी पर इस तरह का प्रभाव डाल सकती है?जिस लड़की को सारी दुनिया, घरवाले और उसके दोस्त पागल और बेवकूफ समझते हैं वो एक फिल्म को देखकर ऐसी बातें कर सकती है?
और तब मुझे शक भी हुआ था की तुम उस गाने को अच्छी तरह समझ भी गयी थी, मुझसे युहीं पूछने चली आई थी.तुम्हारे दिलो-दिमाग में माया इस कदर बस गयी थी की एक दिन जब तुमने मेरे नोटबुक के आखिरी पन्ने पर एक नज़्म देखी तो कहने लगी "ये कविता तो माया ने लिखी थी.."
मैंने तुम्हे डांटकर कहा "बुद्धू, ये कविता माया ने नहीं, बल्कि जिस फिल्म में माया थी उसके डायरेक्टर ने लिखी है"..
तुम मुझसे लड़ पड़ी थी इस बात पर..और कहने लगी..फिल्म के डायरेक्टर की नहीं ये माया की ही कविता है.मैंने तुमसे पूछा था "ये बताओ की माया तो फिल्म का एक किरदार है, वो असली तो है नहीं की कवितायेँ और शायरी करेगी".. तुम कहने लगी "  क्या पता हो भी कहीं ऐसी कोई लड़की जिसकी कहानी तुम्हारे इस डाईरेक्टर ने अपनी फिल्म में दिखाई है और जिसकी नज्मों और कविताओं को चुरा कर उन्होंने फिल्म में डाल दी हो..तुम्हे कुछ नहीं पता...ऐसी लड़कियां होती हैं, मुझे ही देख लो...मैं भी तो माया की तरह हूँ...बस कवितायेँ नहीं करती, हूँ तो कुछ कुछ उसकी तरह ही...यु डोंट नो एनिथिंग...दुनिया में माया जैसी लड़कियां कहीं भी मिल जायेंगी तुम्हे...

उस दिन के बाद मैंने कभी तुमसे इस टॉपिक पर बहस नहीं की,बहस का कोई फायदा भी नहीं था...तुम तो मानने लगी थी की माया सच में कोई लड़की थी और महेंद्र और सुधा आज भी कहीं दुनिया के किसी कोने में होंगे..शायद कभी कभी किस्मत से किसी रेलवे प्लेटफोर्म पर मिल भी जाते होंगे.

एक बार युहीं जब शाम में मैं उस कॉम्प्लेक्स की सीढ़ियों पर बैठा हुआ था जहाँ हम मिलते थे..मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था.तुमने आते ही कहा मुझसे "अपना पर्स दिखाओ तो मुझे".मैंने भी बिना कुछ सोचे तुम्हे पर्स थमा दिया.पर्स के उस जगह जहाँ तस्वीरें लगायी जाती हैं और जो वो जगह खाली था, वहां पर तुमने पेन से लिख दिया था "Dont Waste Money".पहले तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया की तुमने ये क्या लिखा है, क्यूँ लिखा है..फिर जब तुमने मुझे याद दिलाया की महिन्द्र के पर्स में जहाँ माया की तस्वीर लगी हुई थी उसके ठीक ऊपर भी यही लिखा हुआ था.मैं तुम्हारे इस जवाब से अवाक् रह गया था.मेरे लिए ये विश्वास करना मुस्किल था की फिल्म की इतनी छोटी से छोटी बात भी तुम्हारे अन्दर घर कर गयी है.

न जाने कितनी ही ऐसी शामें थी जब तुम मुझसे माया के बारे में बातें करती...तुमने मुझसे युहीं एक दिन बातों बातों में कहा  "यु नो वाट?? अगर कभी मैं जाऊं कहीं..वैसे तो यहीं रहूंगी...कहीं नहीं जाउंगी...लेकिन सपोज अगर कभी जाना पड़ा मुझे, हमेशा के लिए तो मैं भी तुमसे इजाज़त लेकर जाउंगी..ऐसे नहीं चली जाउंगी..बट देन डोंट एक्स्पेक्ट ऑल दैट ट्रेडिशनल थिंग्स एंड मैनर्ज़ जो सुधा ने अंतिम बार जाते वक़्त किया था, मैं झुक कर तुम्हारे पैर नहीं छूने वाली...मैं बस हाथ मिला कर चली जाउंगी...यु नो...ऐक्चवली फाईनल गुडबाय इग्ज़िस्ट ही नहीं करता...वो तो फिल्म में दिखा देते होंगे...लेकिन इन रिअल लाईफ, ऐसा होता नहीं...इतनी बड़ी तो जिंदगी है और लोग कहीं न कहीं तो मिल ही जाते हैं, कितने भी फाईनल गुडबाय कह लो...हाँ बस अगर इस दुनिया से ही चले जाओ तो होगा वो फाईनल गुडबाय...है न?" तुम्हारी इस बात से मेरे चेहरे का रंग बिलकुल सफ़ेद हो गया था, कहीं अन्दर कुछ होने सा लगा था मुझे, मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया था, उस वक़्त तुम्हारी आँखों में देख पाने का मैं सहस नहीं जुटा पाया था.

जानती हो, जिस शाम तुमने मुझसे वो बातें कहीं थी, उसे बीते बहुत से साल गुज़र गए, लेकिन मैं उस बात को भूल नहीं पाया...भूलता भी कैसे...बातों को डायरी में कैद कर लेने की ख़राब बीमारी जो है मुझे...मुझे हमेशा लगता था की तुम उस बात को भूल चुकी हो, लेकिन जब तुम आखिरी बार मिली थी मुझे, एक अंडरग्राऊंड स्टेशन में, तब तुमने जाते वक़्त मुझसे हाथ मिलाया था और मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा था "चलती हूँ मैं अब, टेक केअर ऑफ़ यॉर्सेल्फ..तब मुझे लगा की शायद तुम्हे भी उस शाम की बातें याद हैं और तुम सच में मुझसे इजाज़त लेकर जा रही हो...एक पागलपन सा ख्याल ये भी आया मन में की शायद उस वक़्त तुमने नीचे झुकने की कोशिश की थी...सोचता हूँ की ये मेरा भ्रम ही हो तो अच्छा है, अगर तुम उस दिन सच में नीचे झुकती, तो मुझे पता नहीं उस वक्त मैं खुद को और तुम्हे कैसे संभाल पाता...लेकिन तुम सिर्फ हाथ मिलकर चली गयी थी....दिल में मेरे बस इस बात का अफ़सोस रहा की उस वक़्त तुम्हारे गालों को छु कर मैं इतना भी नहीं कह सका की खुश रहो!



29 Feb 2012