Friday, August 10, 2012

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तुम्हारे नाम लिखी आठवीं चिट्ठी


वो एक उदास और तन्हा शाम थी.सुबह एक बुरी खबर मिली थी और पूरा दिन मैं काफी बेचैन सा रहा.शाम तक मेरा मन काफी भारी सा हो गया और मैं अपना मूड अच्छा करने बाहर घुमने निकल गया.पास में ही एक खूबसूरत कॉफ़ी शॉप था, मैं वहां जाकर बैठ गया.जब भी मैं उदास होता था, तब मैं उस सुन्दर से कॉफ़ी शॉप में चला जाता था.वहां शाम में अक्सर कॉलेज के लड़के-लड़कियां आया करते थे...उनके चेहरे काफी खिले खिले से रहते थे, और सब काफी खुश दीखते थे.मुझे उन स्टुडेंट्स को देख कर अच्छा लगता था, अपने पुराने दोस्तों की, और उनके साथ बिताये पल याद आते थे.उस कॉफ़ी शॉप में एक तरफ शेल्फ पर कुछ मैगजीन और अख़बार रखे होते थे.मुझे उस शाम वापस घर लौटने की कोई जल्दी नहीं थी, इसलिए मैंने उस शेल्फ से कुछ मैगजीन पढने के लिए उठा लिए.मैं जैसे ही वापस अपने टेबल पर आया, देखा की सामने वाली टेबल पर एक बहुत ही खूबसूरत सी लड़की बैठी हुई है.वो शायद किसी का इंतजार कर रही थी.उसने हलके आसमानी रंग की साडी पहनी हुई थी, कानों में उसके बड़े से झुमके थे और हाथों में उसने ब्रेसलेट पहने हुए थे.उन बड़े से झुमकों को देख कर मुझे बहुत साल पहले की गर्मियों की एक शाम याद आ गयी.उस दिन मैं दिल्ली से वापस आया था, लेकिन मेरे वापस आने से पहले ही मेरी असफलता की खबर लोगों तक पहुँच चुकी थी.तुमने मुझे उस दिन सुबह ही फोन किया था, लेकिन तुमने इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं बताया था, शायद तुम वो बुरी खबर मुझे देना नहीं चाहती थी.तुमने मुझे शाम में मिलने के लिए बुलाया था.तुमसे फोन पर बात करने के ठीक बाद ही मुझे वो खबर एक दोस्त के द्वारा मिली.मैंने उस वक़्त सोचा की तुमसे मिलने मैं नहीं जाऊं, कोई बहाना बना लूँ..लेकिन तुमसे मैं कोई बहाना कैसे कर सकता था, तुम मेरे हर झूठ को पहचान लेती थी.

मैं उस रेस्टुरेंट में वक़्त से पहले ही पहुँच गया था, लेकिन बाहर ही खड़ा रहा.मुझे लगा की तुम वक़्त से कैसे आ सकती हो..अपनी आदत से मजबूर देर से ही पहुँचोगी...लेकिन मैं इस बात से अनजान था की तुम वक़्त से पहले ही पहुँच चुकी हो.अगर मैं रेस्टुरेंट का चक्कर लगाने अन्दर नहीं गया होता तो मुझे मालुम भी नहीं चलता की तुम पहले से वहां बैठी हुई हो.तुम आसमानी रंग की साड़ी पहने हुई थी, हाथों में नए ब्रेसलेट थे जो तुमने मेरे साथ बाज़ार से खरीदा था और कानों में तुम्हारे दो बड़े बड़े चांदी के झुमके थे, जिसे तुम्हारी दीदी ने तुम्हे तोहफे में दिया था. उदास और वीरान सा दिखने वाला वो रेस्टुरेंट अचानक फुल ऑफ़ लाईफ सा दिखने लगा था.शायद ये तुम्हारे झुमके, नीले ब्रेसलेट, आसमानी साड़ी और तुम्हारा कंबाइंड इफेक्ट था.मुझे देखते ही तुम्हारा चेहरा खिल गया था, और जैसे ही मैं तुम्हारे पास आया तुमने मुझसे कहा "रिजल्ट से सम्बंधित या कोई और डीप्रेसिंग बात आज किये अगर तो इसी चाक़ू से तुम्हारा कतल कर दूंगी".तुमने टेबल पर रखे चाक़ू को एक बार फिर गौर से देखा और कहा मुझसे "देख रहे हो न कितना बड़ा सा चाक़ू है".मैं तुम्हारी उस मासूम सी धमकी से डरने की बजाये उसपर हंसने लगा.

मैं अपनी ब्लू वाली मेरी फेवरिट शर्ट और नीली जींस में था.स्टाईल मारने के लिए मैंने मोहब्बतें स्टाईल वाले सादे ग्लासेज पहन रखे थे, जो तुमने मुझे गिफ्ट में दिया था.तुमने बड़े गौर से मुझे देखा था और मुझे देखते ही तुमने कहा था "क्या लग रहे हो यार तुम, किसी भी लड़की को जाकर आज प्रपोज कर दो..वो मना कर ही नहीं पाएगी.."मैं बस तुम्हे देखते रह गया.तुमने कितनी आसानी से ये बात कह दी थी.मैंने सोचा एक पल की तुम्हारा ये आईडिया तुमपर ही आजमा लूँ, लेकिन हमेशा की तरह, मैं चुप रहा.


हमने उस शाम बहुत सी बातें की थी.तुमने मुझे अपने उस तोते के बारे में बताया था, जिसने तुम्हारा नाम कहना सीख लिया था, और हर सुबह जब भी वो तुम्हे देखता था, तो बड़े प्यार से तुम्हे पुकारता था.तुमने कहा था मुझसे की बाहर जाने के बाद तुम्हे अपने तोते की बहुत याद आएगी..बातों बातों में तुमने ये भी कहा था की इस ख्याल से तुम्हे डर लगता है की मैं वहां तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा, तुम अकेले रहोगी...अकेले ही तुम्हे सारे छोटे मोटे फैसले लेने होंगे.मैं उस दिन कहना चाह रहा था तुमसे की अगर तुम्हे मेरी इतनी याद आएगी, तो क्यों जा रही हो, मत जाओ..यहाँ लोगों का और उनकी बकवास का हम दोनों मिलकर सामना करेंगे.ऐसे ज़माने से भाग कर कहीं दूर चले जाना अच्छा नहीं.लेकिन तुमने जाने का फैसला कर लिया था, और उस फैसले पर कुछ महीने पहले मैंने मुहर लगा दी थी. 


मैं चाह रहा था उस दिन तुम्हे ये कहूँ की उतनी दूर जाने से अच्छा है तुम वापस अपने उस शहर चले जाओ..जहाँ से तुम यहाँ आई हो, लेकिन मैं जानता था की तुम वापस उस शहर जाना नहीं चाहती थी.वहां तुम्हारी दीदी की यादें तुम्हे और परेसान कर जायेंगी..मैं जानता था की तुम्हारा दूर चले जाना उस वक़्त तुम्हारे लिए ठीक रहेगा..इसलिए जब तुमने मुझसे पूछा था की तुम जाना चाहती हो, तो मैंने तुम्हे रोका नहीं बल्कि तुम्हारे फैसले को सपोर्ट किया.तुमने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख कर पूछा था मुझसे, की "मेरे जाने के बाद तुम ठीक रहोगे न?".मैं चुप रहा..मैं क्या कहता, उस समय सिर्फ तुम ही थी जिससे मैं दिन भर की सारी उलझनें बड़ी आसानी से कह देता था.

हम दोनों बहुत देर तक वहां बैठे रहे..और रह रह कर तुम अपनी ज्ञान की बातों से मुझे एन्लाइटन कर रही थी.तुमने खुद मुझे चेतावनी दी थी की मैं रिजल्ट से सम्बंधित कुछ भी बात नहीं करूँ, लेकिन तुम खुद उस शाम मुझे अपने तरीके से यही समझाते रही की रिजल्ट बुरा होने से दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती.तुम जब भी अपने मासूम शब्दों में मुझसे ऐसी बातें कहती थी तो मुझे अच्छा लगता था.उस शाम जब तुमसे मिलने आया था उससे पहले ही मैंने अपने रिजल्ट को स्वीकार कर लिया था, मैंने खुद को समझा लिया था की मुझे इसी परिणाम के साथ जीना है...लेकिन फिर भी मैं बहुत निराश था.जब तुमने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा था "देखना एक दिन तुम अपने उन सब दोस्तों से कहीं आगे निकल जाओगे जो तुम्हारे पीछे तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं", तब मुझे सच में तुम्हारी बातों पे यकीन हुआ था.

याद है तुम्हे वो बड़ा सा ग्रीटिंग्स कार्ड, जो तुमने बनाया था और मुझे उस शाम दिया था? तुमने कहा था मुझसे की इसे अपने रूम के दीवार पर लगा देना.लेकिन मैंने उस ग्रीटिंग्स को अपने दीवार में नहीं, बल्कि अपने फोल्डर में लगा लिया था..कुछ साल बाद जब एक शाम मैं उस ग्रीटिंग्स को देख रहा था तो मैंने गौर किया की कार्ड के पीछे जो तुमने बड़ा सा मिकी-माउस का स्टीकर चिपकाया था, वो अपनी जगह से उखड़ने लगा है.मैंने सोचा इसे एहतियात से उखाड़ लूँ और फिर से चिपका दूंगा.मैंने वो स्टीकर वहां से हटाया तो देखा की तुमने वहां कुछ लिखा था, जो ख़ास मेरे लिए था..और शायद लिखने के बाद तुम खुद से शर्माने लगी होगी और इस डर से की कहीं तुम्हारे लिखे शब्दों को मैं पढ़ न लूँ, तुमने अपने उन शब्दों पर स्टीकर चिपका दिया होगा.अगर वो स्टीकर अपने जगह से उखड़ता नहीं तो मैं कभी जान नहीं पाता की तुमने मेरे लिए उस कार्ड में क्या लिखा था. मेरे लिए ये यकीन कर पाना मुस्किल था की इतनी संजीदा बातें तुम लिख सकती हो..तुमने आखिरी लाईन में लिखा था "बुरी बातें सिर्फ तुम्हारे साथ ही क्यों होती है, मेरे अच्छे दोस्त? और फिर भी तुम हमेशा कितना मुस्कुराते रहते हो, इतना पोजिटिव एनर्जी कहाँ से लाते हो तुम?". यकीन करो, तुम्हारे लिखे इन शब्दों को पढ़ कर मेरी हालत क्या हुई थी, ये मैं बता भी नहीं सकता तुम्हे.

मुझे ये सब बातें उस शाम उस कैफे में बैठे बैठे याद आ रही थी...मेरे टेबल पर सभी मैगजीन वैसे ही पड़े हुए थे और मैं तुम्हारे साथ बिताये उस शाम की यादों की गलियों में टहल रहा था.मेरे पास एक डायरी थी,मैं चाह रहा था की डायरी में मैं उस शाम की हर छोटी से छोटी बातें तफसील से लिख दूँ...लेकिन मैंने डायरी खोला नहीं.वो वैसे ही टेबल पर पड़ी मुझे ताकते रह गयी.कितनी ही बार तुम्हारी बातों को डायरी में लिखते हुए,मेरे आँखें गीली हुई हैं, धड़कने बढ़ जाती हैं और मेरा मुझपर कुछ भी कंट्रोल नहीं रहता है..मैं अक्सर तुम्हारी बातें तन्हाई में लिखता हूँ, ताकि मेरे आखों से आसूं गिरे भी अगर, तो कोई उसे देख ना सके.मैं नहीं चाहता था की उस जाने पहचाने कैफे में लोग मेरी नम आँखें देखें, मैं वहां से वापस चला आया.पूरी रात मुझे नींद नहीं आई...तुम्हारे ख्यालों में लिपटा, अपने बिस्तर पर पडा रहा..
 _

  उजले उजले फूल खिले हैं 
  बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो
  
  मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो 
  मेरी तरह तुम भी झूठे हो...

 


[ १० अगस्त २०११ ] 

21 comments:

  1. बड़ी प्रेम पूर्ण स्मृतियां हैं। कहानी के नायक को उसी समय प्रपोज कर देना चाहिये था जब नायिका ने उकसाया था :)

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  2. jab bhi aapka ye blog padho .... kuch aur hi duniya me phnch jata hun ... !
    superbly written ... ! :)

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  3. अभी तो गज़ल सुन रहे हैं ....मेरी पसंदीदा....
    खो गए हैं ...

    अब पोस्ट का कमेन्ट गज़ल के बाद....
    :-)
    अनु

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  4. यादें ऐसे ही सताती हैं, उनका काम ही यही है..
    बहुत सुंदर

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  5. पोस्ट पढ़ कर तो पूरे ही गुम और ग़मगीन हो गए...
    :-(

    अनु

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  6. u kno wat sir...dats why people love ur blog and ur writings...
    direct dil se likhte ho aap...and agree wid ryder's cmnt...
    kal raat dekha tha aapka blog ka link in ur fb prf but i was too tired..
    aaj subah padha and was completely lost...bahut emotional hai..

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  7. Bahut he khoob.. pehle do paragraphs padh ke laga jaise aaj meri he kahani suna rhe hai...! Aur last maon jagjit sigh ji ka yeh khoobsurat geet likh kar aapne hume yaadon main daal diya hai :)

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  8. कोमल एहसास के साथ भीनी खुशबू ....रूमानियत की नरमी या विछोह की नमी , भीगी भीगी लगी रचना !

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  9. mujhse bichadkar khush rahte ho...meri tarah tum bhi jhoote ho..aha kitni purani yadein....

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  10. ......यादें ऐसे ही है अभी भाई

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  11. पिछली सात चिठियाँ तो पढी नही लेकिन इस चिठी से समझ सकती हूँ कि यादे कहीं गहरे मे डूब कर लिखी हैं।यादें ज़िन्दगी का अहम हिस्सा होती हैं। वर्तमान मे जीने का कभी कभी सहारा भी होती हैं। खुश रहो , आबाद रहो आशीर्वाद।

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  12. यादें ... अक्सर यादों का पुलिंदा जब खोलो तो उन्ही गलियों में ले जाता है .. पर क्यों ...
    डायरी के पन्नों में हर दर्द भी नहीं समेटा जा सकता ... कई बार आंसू धोखा दे जाते हैं ... लिखने नहीं देते ...
    ये एहसास है ... फलसफा या हादसा ...

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  13. kuchh chitthiyan agar ba-awaaz hoti to behtar hota

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  14. बहुत अच्छा...यादें भी कभी कभी सजीव हो जाती हैं !!

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  15. यादों की गलियों में खुद भटकते हुए न जाने कितनी ही गलियों को हमारे लिए खोल जाते हो..हम उन्हीं में खो जाते हैं..

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  16. कोमल अहसासों से भरी एक मासूम सी पोस्ट...। तुम अपने साथ पाठकों को भी अपने साथ बहा ले जाने में सक्षम हो अभि...बहुत बधाई...।

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  17. प्रेम सबसे बड़ी अनुभूति है , शब्दों में व्यक्त करना और भी मुश्किल , पर ये कम आप बखूबी निभा रहे है ......

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  18. एक चिट्ठी किसी की मेरे पास भी है बहुत से कोमल अहसासों से भरी...मैंने भी उसे सहेज लिया है.
    बहुत प्यारा लिखा है अभि !!!

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया