Sunday, July 8, 2012

यादों में एक दिन : आधे अधूरे नोट्स



उसे डर था की मैं उदास रहने लगा हूँ और खुद से बेहद निराश हूँ..उसे डर था की एक दिन मैं अपनी असफलताओं और परेशानियों से घबराकर कहीं चला जाऊँगा, किसी ऐसी जगह जहाँ मुझे कोई भी खोज न सके.उसने सुन रखा था उन लोगों के बारे में जो जब जिंदगी से हार जाते हैं तो कहीं चले जाते हैं और उनके घरवालों को उनकी कोई खबर नहीं मिलती.मिलती है तो सिर्फ उनके मरने की खबर, और कुछ बदनसीबों को वो खबर भी नहीं नसीब होती.वो पागल थी जो ऐसा सोचती थी.घरवालों से और उससे दूर मैं जाने की बात भी नहीं सोच सकता था..एक दफे जब मजाक में ही उसने मुझसे ये प्रश्न किया की मैं कहीं चला तो नहीं जाऊँगा, तो मैं उसे ये बताना चाह रहा था की मैं कहीं नहीं जाऊँगा, घरवालों के और उसके बिना मेरी कोई जिंदगी ही नहीं..लेकिन मैं खामोश रह गया और उसने मेरी ख़ामोशी का अर्थ ये लगा लिया की मैं सच में एक दिन कहीं बहुत दूर निकल जाऊँगा जहाँ से वो चाह कर भी मुझे वापस नहीं ला सकेगी.

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वे बारिशों के मौसम और मेरे उदासियों के दिन थे.लगातार मिल रही असफलताओं से मैं बेहद हताश और निराश था, खुद के ऊपर से मेरा विश्वास पुरे तरह से उठ चूका था.बाहर आना जाना मैंने काफी कम कर दिया था और घर में ही रहने लगा था.शाम अक्सर मेरे लिए बहुत बोझिल हो जाया करती थी..दिन में तो घर में मैं अकेला रहता था, लेकिन शाम होते ही सारे लोग घर आ जाते थे जो मुझपर तरह तरह के ताने कसने से भी नहीं चुकते थे..और मैं उनसे छुपते फिरता था...कभी अपने कमरे के कोने में तो कभी घर के पीछे बने छोटे से बगीचे में..मेरी शामें अक्सर उसी छोटे बगीचे में गुज़रती थी जहाँ मैं अपनी डायरी लेकर चला आया करता था और तब तक वहाँ बैठा रहता था जब तक रात के खाने के लिए माँ आवाज़ न दे.मैं डायरी में सब कुछ लिखने लगा था..जो भी दिल में आता उसे मैं डायरी में दर्ज कर लेता...लोगों की फटकार से लेकर माँ की प्यार भरी बातें...सभी उसमे दर्ज होती थी...अपने दिल की बात कागज़ पर लिख देने से मुझे बड़ा सुकून मिलता था, और ऐसा लगता की मेरे दर्द का कुछ हिस्सा कागज़ पर उतर आया है..लिखने के बाद मैं बहुत हल्का महसूस करता था.ऐसी ही एक उदास शाम मुझे खबर मिली की वो दो महीने के लिए अपने शहर जा रही है.उन दिनों वह एकमात्र ऐसी लड़की थी जिससे मैं अपनी दिल की हर बात, हर दर्द कह देता था..उससे लगभग हर शाम मुलाकात होती थी और शायद दिन भर में वही दो घंटे जब उससे मुलाकात होती थी, मेरे सुख के पल होते थे.ये सोच की दो महीने मैं उससे नहीं मिल पाऊंगा, मैं थोड़ा घबरा सा गया.उस रात मैं बहुत देर तक जागा रहा और जाने क्या क्या सोचता रहा, कागज़ पर न जाने क्या क्या लिखते रहा.मैं अभी याद करूँ तो मुझे कुछ भी याद नहीं की उस रात मैंने क्या लिखा था, हाँ बस इतना ही याद है की मैंने चार पन्नों में कविता सा कुछ लिखा था जिसे लिखने के बाद उसी रात उन कागज के टुकड़े-टुकड़े कर बाहर फेंक दिया था.

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वो जब भी सोचने लगती तो उसका वो मासूम सा चेहरा काफी संजीदा हो जाता और वो अपने उम्र से काफी बड़ी दिखने लगती.जब भी मैं उसे कुछ सोचते हुए देखता तो मुझे लगता यह वो लड़की नहीं जिसे मैं जानता हूँ..यह कोई दूसरी लड़की है, जिसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता.जब कभी कुछ सोचते सोचते वो अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर विश्वास भरी निगाहों से मुझे देखती तो मुझे लगता की सच में सब ठीक हो जाएगा.वो जब यह कहती की ये एक फेज है, और ये भी गुज़र जाएगा तो मुझे उसकी बातों पर ठीक वैसे ही विश्वास होता जैसे माँ की बातों पर होता था, जब वो सर पर हाथ फेर कर कहती थी "ये एक खराब समय है..जल्द ही सब ठीक हो जाएगा".
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अगले दिन सुबह जैसे ही मेरी नींद खुली तो देखा बाहर बारिश हो रही है.मैं एकाएक बहुत खुश हो गया..पता नहीं क्यों लेकिन उन दिनों जब कभी सुबह तेज बारिश होती थी तो मैं हमेशा बहुत खुश हो जाया करता था, और अपनी किताबें, अपना टू-इन-वन लेकर मैं बारामदे में आकार बैठ जाता था.घर का एक वही कोना था जो मुझे बड़ा सुकून देता था, जहाँ मैं पुरे दिन बैठा रहता था.सुबह माँ जब चाय लेकर बारामदे में आई तो मुझे इस तरह खुश देख वो भी बहुत खुश हो गयी.वो वहीँ मेरे पास बैठ गयी.माँ ऐसा हमेशा करती थी.उसे मालुम था की मैं परेसान और उदास रहता हूँ और ऐसे में जब कभी वो मुझे इस तरह खुश देखती तो मेरे पास आकार बहुत देर तक बैठी रहती और दुनिया भर की बातें करती.मुझे वो पल बहुत अच्छे लगते थे.माँ की एक आदत और भी थी, जिस दिन उसे लगता की मैं बहुत खुश हूँ तो वो सुबह के नाश्ते में बहुत ही अच्छे अच्छे पकवान बनाती थी..पूरी, हलवा और न जाने क्या क्या...और जब मैं पूछता की "माँ, आज कोई खास दिन या त्यौहार है क्या?"  तो वो हमेशा कोई न कोई बात बना जाती, लेकिन सच्चाई मैं जानता था की माँ मुझे खुश देख कर खुश है और इसलिए उसने ये सब पकवान बनाये हैं.
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वो बारिशों की एक शाम थी..ठंडी और तेज हवा चल रही थी.उसने अपने बाल खोल दिए थे और कभी कभी उसके बाल हवा में लहराते हुए मेरे चेहरे पर आकार टिक जाते थे, जिन्हें मैं हटाने की कोशिश भी नहीं करता. उसकी ये आदत थी की पार्क में आते ही वो अपने लंबे काले बालों को खोल देती और उसके बाल हवा में उड़ने लगते.उसे ये काफी अच्छा लगता.वो कहती की "बालों को भी आज़ाद छोड़ देना चाहिए, जैसे मैं पार्क में एन्जॉय करती हूँ, वैसे बालों को भी पार्क में लहरा कर एन्जॉय करने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए".

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पहली बार जब उसने कहा था की "मैं अब जाउंगी", तो मेरी धड़कन एकदम से तेज हो गयी थी.मुझे लगा की अब उसके जाने का वक्त आ गया है और अब उससे मिलने के लिए मुझे फिर से छः महीने का लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा.लेकिन वो जाने के बजाये फिर से अपनी जगह बैठ गयी.ये खेल वो पिछले एक घंटे में दसवीं बार खेल चुकी थी.वो एकाएक उठ खड़ी होती और कहती की "मैं अब जाउंगी".लेकिन जाने के बजाय वो बेंच के पास खड़ी होकर सामने पेड़ों के जंगल की तरफ देखकर कुछ सोचने लगती और अचानक से उसे कोई पुरानी बात याद आ जाती.वो फिर से बेंच पर बैठ कर मुझे वे बातें बताने लगती.बातें जैसे ही खत्म होती वो फिर खड़ी हो जाती और झाडियों की तरफ फिर से अपलक देखने लगती.मुझे उसकी ये हरकत देख कभी कभीं संदेह होता की उन झाडियों के पीछे कोई छुप कर बैठा हुआ है जो सिर्फ उसे ही दिखाई दे सकता है और जो इशारों के जरिये उसे पुरानी बातें याद दिला रहा है..मैं उसके इस खेल का इतना अभ्यस्त हो चूका था की जब भी वो खड़ी होती तो मुझे लगता की वो जाने के लिए नहीं बल्कि कुछ सोचने के लिए खड़ी हुई है.वो झाडियों की तरफ देखेगी और उसे कुछ याद आ जाएगा और वो बैठ जायेगी.उसके इस खेल पर मेरा यकीन इतना पक्का हो गया था की जब अंतिम बार वो खड़ी हुई और झाडियों की तरफ देखने के बजाय उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा "अपना ध्यान रखना, मैं अब चलूंगी" तो मैं एकदम स्तब्ध सा उसे देखने लगा.वो बिना मेरे जवाब का प्रतीक्षा किये वहाँ से जाने लगी..और मैं सुन्न नज़रों से उसे जाते हुए तब तक देखता रह गया जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी.मैं बहुत देर तक उसी बेंच पर बैठे हुए पार्क के उसी गेट की तरफ देखता रह गया जिधर से वो गयी थी.मुझे अब भी लग रहा था की वो उसी गेट से फिर से वापस आएगी और इसी बेंच पर मेरे पास बैठकर मुझे फिर से कोई पुरानी बात सुनाने लगेगी.लेकिन जब बहुत देर तक वो वापस नहीं आई तो मेरा भ्रम टुटा और मुझे होश आया, की वो सचमुच जा चुकी है और उससे अब मुलाकात अगले साल ही होगी.

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हाँ तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
. . . जिनमें वह फँसने नहीं आतीं
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं...



यादों में एक दिन ]