Friday, July 27, 2012

यादों में एक दिन : बिस्कुट केक


हर शनिवार की सुबह 'आई' और 'एफ' सेक्सन की कम्बाइंड क्लास चलती थी, और मैंने उसे पहली बार उसी कम्बाइंड क्लास में देखा था.वो मेरे ठीक आगे की बेंच पर बैठी हुई थी.वो मुझे पहली नज़र में ही अच्छी लगने लगी थी, लेकिन चाह कर भी मैं कभी उससे बात नहीं कर पाता था..हमारे कुछ कॉमन फ्रेंड थे, तो कभी कभी बस औपचारिक सी बातचीत हो जाया करती थी.एक दो बार मैंने उसके कुछ प्रोजेक्ट के कामों में मदद भी की, लेकिन फिर भी बातचीत हमेशा काफी औपचारिक सी ही रही, इसके पीछे मुख्य वजह मेरा कम घुलने मिलने वाला स्वाभाव ही था.मेरी आदत थी की हर दिन क्लासेज खत्म होने के बाद मैं बाहर सीढ़ियों पर बैठ जाता था, और अपनी डायरी में कुछ भी उल्टा सीधा लिखते रहता था.वे बारिशों के दिन थे और मुझे उन सीढ़ियों पर बैठ कर बारिश देखना अच्छा लगता था.

उस दिन भी हलकी बारिश हो रही थी और मैं सीढ़ियों पर बैठा था..सभी लड़के अपने अपने घर को वापस जा रहे थे, लेकिन मुझे उस दिन घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी..घरवाले किसी पारिवारिक समारोह में गए हुए थे और देर रात तक ही वापस आने वाले थे.मैंने सोचा की आज अच्छा मौका है, काफी देर तक यहाँ बैठा जा सकता है और बारिश के मजे लिए जा सकते हैं...मैं वहाँ बैठा ही था की मुझे लगा मेरे ठीक पीछे कोई खड़ा है.मैंने मुड के देखा तो वहाँ वो खड़ी थी.मैं उसे देख हडबड़ा सा गया और लगभग हकलाते हुए मैं उससे बस इतना ही पूछ पाया..तुम यहाँ...कैसे? वो हँसने लगी, उसने मेरे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा और वहीँ मेरे पास सीढ़ियों पर बैठ गयी..वो अपने बड़े से बैग में कुछ ढूँढने लगी और एक अमरुद निकाल कर मेरे सामने रख दिया और कहा : "थैंक गौड, तुम मिल गए..ये लो आपका गिफ्ट"..

"गिफ्ट???? कैसा गिफ्ट??" मैंने उससे पूछा. 

वो लगभग मुझे डांटते हुए कहने लगी..."ज्यादा बनने की जरूरत नहीं है, कल आपका बर्थडे है, वो मुझे पता चल गया...तो ये गिफ्ट लायी हूँ...इसे चुपचाप एक्सेप्ट कर लो". मैं मुस्कुराने लगा लेकिन अमरुद किस तरह का गिफ्ट है, मैं यही सोचने लगा...मैंने पूछा उससे "ये अमरुद कुछ डिफरेंट किस्म का गिफ्ट नहीं लगता तुम्हे ??".

वो हँसने लगी और अपने कमीज के कॉलर को पुरे टसन में ऊपर उठा कर कहने लगी " अरे हाँ हाँ...बहुत ही डिफरेंट गिफ्ट है...आखिर लाया कौन है इसे...मैं...देखो, जैसे मैं यूनिक अन्यूश़वल एंड प्राइस्लेस, वैसे ही ये अमरुद भी.."

मैं उसके इस मासूम से जवाब पर हँसने लगा.मुझे हँसता देख वो खफा हो गयी, गुस्सा दिखाते हुए कहने लगी.. "तुम्हे मजाक लग रहा है...पता है मैंने कितनी मेहनत से कल अमरुद तोड़ा था..आजतक पेड़ पर चढ़ने के नाम से डरती रही, सिर्फ डंडे से ही मारकर अमरुद तोड़ा करती थी, और अब जब पेड़ पर चढ़ कर अमरुद तोड़ने की हिमाकत कर डाली और सबसे पहला तोड़ा हुआ अमरुद मैंने तुम्हे गिफ्ट में दिया तो तुम्हे ये मजाक लग रहा है...यु नो...आई थिंक आई डिजर्व लिटल बिट ऑफ अप्रीशीएशन !"   वो इतना कह कर चुप हो गयी, वो गंभीर सा चेहरा लिए मुझे देखने लगी...मैं भी चुप हो गया...मुझे लगने लगा की मुझे हँसना नहीं चाहिए था..शायद वो सही में मेरे हँसने से नाराज़ हो गयी...मैं सोच ही रहा था की उससे माफ़ी मांग लूँ की लेकिन अचानक ही वो मुझे देख कर फिर से मुस्कुराने लगी, और मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहने लगी..."  चिल यार, मैं बस मजाक कर रही थी, मेरे पास और भी कुछ है तुम्हे देने के लिए, रुको अभी देती हूँ..."   इतना कह कर वो अपने बैग में फिर से कुछ ढूँढने लगी और मैं सोचने लगा की मेरे दोस्त इस लड़की के बारे में सही कहते थे...थोड़ी पागल सी लड़की है, कुछ अजीब सी.....बर्थडे गिफ्ट में अमरुद देती है...कभी गुस्सा हो जाती है और कभी बिना बात हँसने लगती है...बड़ी कन्फ्यूज सी लड़की मालुम पड़ती है.

उसने अपने बैग में से एक गिफ्ट पैक निकाल कर मुझे दिया और गिफ्ट खोल कर देखने के लिए कहा.गिफ्ट पैक को खोला तो उसमे दो बड़े खूबसूरत से सिल्वर कलर के पेन थे.मैंने उसे तोहफे के लिए जब शुक्रिया कहा तो कहने लगी "देखो, तुमने मेरे प्रोजेक्ट में इतनी हेल्प की, तो ये तोहफा तो मुझे देना ही चाहिए न...और इस तोहफे के जरिये हमारी दोस्ती आज से शुरू होती है...नेवर एन्डिंग फ्रेंडशिप..ये सिल्वर पेन विटनेस रहेगी हमारी दोस्ती की.."   ये कहने के बाद उसने एक सिल्वर पेन से मेरी हथेली पर बड़े खूबसूरत अक्षरों में लिख दिया "  विश यु अ वैरी हैप्पी बर्थडे...फ्रॉम योर न्यू स्वीट एंड क्यूट सी दोस्त".  


वो कुछ देर चुप रही, हम दोनों कुछ देर तक वहीँ बैठ कर बाहर हो रही हलकी बारिश को देखते रहे..उसने थोड़ी देर बाद कहा मुझसे "कल तो तुम आओगे नहीं, तो परसों मेरे लिए एक चोकलेट लेते आना..उसे मैं तुम्हारे बर्थडे का ट्रीट समझ कर रख लुंगी". मैंने उसकी इस बात का जवाब नहीं दिया.वो थोड़ी देर मुझे देखती रही और मेरे कुछ कहने का इंतज़ार करती रही.वो निराश हो गयी और फिर से बारिश देखने लगी..वो एकाएक सीढ़ियों से उठी और दौड़ कर सामने कैंटीन के अंदर चली गयी.वहाँ से वो कुछ चीज़ें खरीद लायी.पहले तो मैं समझ नहीं पाया की वो कैंटीन अचानक क्यों गयी.वो जब आई तो उसके हाथ में एक बड़ा पैकेट था जिसमे तीन बिस्कुट के पैकेट, गुलाबजामुन और दो डैरी मिल्क चोकलेट थी.मैंने जब पूछा ये किसके लिए खरीद लायी..उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया..उसने अपने बैग में से एक बड़ा सा चार्ट पेपर निकाला..उसने उस चार्ट पेपर पर बिस्कुट को एक के ऊपर एक रख उसे एक केक का शक्ल दे दिया...चोकलेट को उसने छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर बिस्कुट पर छिड़क दिया और दो गुलाबजामुन को बिस्कुट के ठीक ऊपर रख दिया...जैसे केक के ऊपर चेरी रखा जाता है.करीब दस-पन्द्रह मिनट के मेहनत के बाद उसका ये बिस्कुट वाला केक तैयार हो गया था.वो उस केक को देख बहुत खुश हो रही थी, और मैं हैरान हो रहा था...की ये कैसे उसने अचानक से बिस्कुट और चोकलेट से केक बना दिया.


मेरे कम बोलने की बीमारी की हद इतनी थी की मैंने उस दिन उसे उस केक के लिए एक थैंक्स तक नहीं कहा, तारीफ़ करनी तो दूर की बात थी.उसने उस बिस्कुट केक का एक टुकड़ा मुझे खिलाया, और कहा की अब इसका एक टुकड़ा मैं उसे खिलाऊं.मैंने झिझकते हुए केक का एक टुकड़ा उसे खिला दिया.हम दोनों कुछ देर वहीँ बैठ कर बिस्कुट केक को खाते रहे.थोड़ी देर बाद जब बारिश पूरी तरह थम गयी, तब वो वापस घर चली गयी, लेकिन मैं वहीँ सीढ़ियों पर बैठा रहा.मुझे यकीन नहीं हो पा रहा था की जिस लड़की को मैं हर रोज देखता था, जिससे चाह कर भी कभी बात नहीं कर पाता था, उसके साथ मैंने इतना खूबसूरत वक्त बिताया, और उसने मेरे लिए एक यूनिक किस्म का बर्थडे केक भी बनाया.मैंने उस दिन उन्ही सीढ़ियों पर बैठ कर उस पुरे लम्हे को अपने डायरी में लिख लिया था, और आज भी जब डायरी का वो पन्ना आँखों के सामने से गुज़र जाता है तो याद आता है की कभी मैंने अपना जन्मदिन किसी बारिश के दिन, सीढ़ियों पर बैठकर एक पागल और मासूम लड़की के साथ सेलिब्रेट किया था.



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Sunday, July 8, 2012

यादों में एक दिन : आधे अधूरे नोट्स



उसे डर था की मैं उदास रहने लगा हूँ और खुद से बेहद निराश हूँ..उसे डर था की एक दिन मैं अपनी असफलताओं और परेशानियों से घबराकर कहीं चला जाऊँगा, किसी ऐसी जगह जहाँ मुझे कोई भी खोज न सके.उसने सुन रखा था उन लोगों के बारे में जो जब जिंदगी से हार जाते हैं तो कहीं चले जाते हैं और उनके घरवालों को उनकी कोई खबर नहीं मिलती.मिलती है तो सिर्फ उनके मरने की खबर, और कुछ बदनसीबों को वो खबर भी नहीं नसीब होती.वो पागल थी जो ऐसा सोचती थी.घरवालों से और उससे दूर मैं जाने की बात भी नहीं सोच सकता था..एक दफे जब मजाक में ही उसने मुझसे ये प्रश्न किया की मैं कहीं चला तो नहीं जाऊँगा, तो मैं उसे ये बताना चाह रहा था की मैं कहीं नहीं जाऊँगा, घरवालों के और उसके बिना मेरी कोई जिंदगी ही नहीं..लेकिन मैं खामोश रह गया और उसने मेरी ख़ामोशी का अर्थ ये लगा लिया की मैं सच में एक दिन कहीं बहुत दूर निकल जाऊँगा जहाँ से वो चाह कर भी मुझे वापस नहीं ला सकेगी.

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वे बारिशों के मौसम और मेरे उदासियों के दिन थे.लगातार मिल रही असफलताओं से मैं बेहद हताश और निराश था, खुद के ऊपर से मेरा विश्वास पुरे तरह से उठ चूका था.बाहर आना जाना मैंने काफी कम कर दिया था और घर में ही रहने लगा था.शाम अक्सर मेरे लिए बहुत बोझिल हो जाया करती थी..दिन में तो घर में मैं अकेला रहता था, लेकिन शाम होते ही सारे लोग घर आ जाते थे जो मुझपर तरह तरह के ताने कसने से भी नहीं चुकते थे..और मैं उनसे छुपते फिरता था...कभी अपने कमरे के कोने में तो कभी घर के पीछे बने छोटे से बगीचे में..मेरी शामें अक्सर उसी छोटे बगीचे में गुज़रती थी जहाँ मैं अपनी डायरी लेकर चला आया करता था और तब तक वहाँ बैठा रहता था जब तक रात के खाने के लिए माँ आवाज़ न दे.मैं डायरी में सब कुछ लिखने लगा था..जो भी दिल में आता उसे मैं डायरी में दर्ज कर लेता...लोगों की फटकार से लेकर माँ की प्यार भरी बातें...सभी उसमे दर्ज होती थी...अपने दिल की बात कागज़ पर लिख देने से मुझे बड़ा सुकून मिलता था, और ऐसा लगता की मेरे दर्द का कुछ हिस्सा कागज़ पर उतर आया है..लिखने के बाद मैं बहुत हल्का महसूस करता था.ऐसी ही एक उदास शाम मुझे खबर मिली की वो दो महीने के लिए अपने शहर जा रही है.उन दिनों वह एकमात्र ऐसी लड़की थी जिससे मैं अपनी दिल की हर बात, हर दर्द कह देता था..उससे लगभग हर शाम मुलाकात होती थी और शायद दिन भर में वही दो घंटे जब उससे मुलाकात होती थी, मेरे सुख के पल होते थे.ये सोच की दो महीने मैं उससे नहीं मिल पाऊंगा, मैं थोड़ा घबरा सा गया.उस रात मैं बहुत देर तक जागा रहा और जाने क्या क्या सोचता रहा, कागज़ पर न जाने क्या क्या लिखते रहा.मैं अभी याद करूँ तो मुझे कुछ भी याद नहीं की उस रात मैंने क्या लिखा था, हाँ बस इतना ही याद है की मैंने चार पन्नों में कविता सा कुछ लिखा था जिसे लिखने के बाद उसी रात उन कागज के टुकड़े-टुकड़े कर बाहर फेंक दिया था.

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वो जब भी सोचने लगती तो उसका वो मासूम सा चेहरा काफी संजीदा हो जाता और वो अपने उम्र से काफी बड़ी दिखने लगती.जब भी मैं उसे कुछ सोचते हुए देखता तो मुझे लगता यह वो लड़की नहीं जिसे मैं जानता हूँ..यह कोई दूसरी लड़की है, जिसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता.जब कभी कुछ सोचते सोचते वो अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर विश्वास भरी निगाहों से मुझे देखती तो मुझे लगता की सच में सब ठीक हो जाएगा.वो जब यह कहती की ये एक फेज है, और ये भी गुज़र जाएगा तो मुझे उसकी बातों पर ठीक वैसे ही विश्वास होता जैसे माँ की बातों पर होता था, जब वो सर पर हाथ फेर कर कहती थी "ये एक खराब समय है..जल्द ही सब ठीक हो जाएगा".
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अगले दिन सुबह जैसे ही मेरी नींद खुली तो देखा बाहर बारिश हो रही है.मैं एकाएक बहुत खुश हो गया..पता नहीं क्यों लेकिन उन दिनों जब कभी सुबह तेज बारिश होती थी तो मैं हमेशा बहुत खुश हो जाया करता था, और अपनी किताबें, अपना टू-इन-वन लेकर मैं बारामदे में आकार बैठ जाता था.घर का एक वही कोना था जो मुझे बड़ा सुकून देता था, जहाँ मैं पुरे दिन बैठा रहता था.सुबह माँ जब चाय लेकर बारामदे में आई तो मुझे इस तरह खुश देख वो भी बहुत खुश हो गयी.वो वहीँ मेरे पास बैठ गयी.माँ ऐसा हमेशा करती थी.उसे मालुम था की मैं परेसान और उदास रहता हूँ और ऐसे में जब कभी वो मुझे इस तरह खुश देखती तो मेरे पास आकार बहुत देर तक बैठी रहती और दुनिया भर की बातें करती.मुझे वो पल बहुत अच्छे लगते थे.माँ की एक आदत और भी थी, जिस दिन उसे लगता की मैं बहुत खुश हूँ तो वो सुबह के नाश्ते में बहुत ही अच्छे अच्छे पकवान बनाती थी..पूरी, हलवा और न जाने क्या क्या...और जब मैं पूछता की "माँ, आज कोई खास दिन या त्यौहार है क्या?"  तो वो हमेशा कोई न कोई बात बना जाती, लेकिन सच्चाई मैं जानता था की माँ मुझे खुश देख कर खुश है और इसलिए उसने ये सब पकवान बनाये हैं.
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वो बारिशों की एक शाम थी..ठंडी और तेज हवा चल रही थी.उसने अपने बाल खोल दिए थे और कभी कभी उसके बाल हवा में लहराते हुए मेरे चेहरे पर आकार टिक जाते थे, जिन्हें मैं हटाने की कोशिश भी नहीं करता. उसकी ये आदत थी की पार्क में आते ही वो अपने लंबे काले बालों को खोल देती और उसके बाल हवा में उड़ने लगते.उसे ये काफी अच्छा लगता.वो कहती की "बालों को भी आज़ाद छोड़ देना चाहिए, जैसे मैं पार्क में एन्जॉय करती हूँ, वैसे बालों को भी पार्क में लहरा कर एन्जॉय करने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए".

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पहली बार जब उसने कहा था की "मैं अब जाउंगी", तो मेरी धड़कन एकदम से तेज हो गयी थी.मुझे लगा की अब उसके जाने का वक्त आ गया है और अब उससे मिलने के लिए मुझे फिर से छः महीने का लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा.लेकिन वो जाने के बजाये फिर से अपनी जगह बैठ गयी.ये खेल वो पिछले एक घंटे में दसवीं बार खेल चुकी थी.वो एकाएक उठ खड़ी होती और कहती की "मैं अब जाउंगी".लेकिन जाने के बजाय वो बेंच के पास खड़ी होकर सामने पेड़ों के जंगल की तरफ देखकर कुछ सोचने लगती और अचानक से उसे कोई पुरानी बात याद आ जाती.वो फिर से बेंच पर बैठ कर मुझे वे बातें बताने लगती.बातें जैसे ही खत्म होती वो फिर खड़ी हो जाती और झाडियों की तरफ फिर से अपलक देखने लगती.मुझे उसकी ये हरकत देख कभी कभीं संदेह होता की उन झाडियों के पीछे कोई छुप कर बैठा हुआ है जो सिर्फ उसे ही दिखाई दे सकता है और जो इशारों के जरिये उसे पुरानी बातें याद दिला रहा है..मैं उसके इस खेल का इतना अभ्यस्त हो चूका था की जब भी वो खड़ी होती तो मुझे लगता की वो जाने के लिए नहीं बल्कि कुछ सोचने के लिए खड़ी हुई है.वो झाडियों की तरफ देखेगी और उसे कुछ याद आ जाएगा और वो बैठ जायेगी.उसके इस खेल पर मेरा यकीन इतना पक्का हो गया था की जब अंतिम बार वो खड़ी हुई और झाडियों की तरफ देखने के बजाय उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा "अपना ध्यान रखना, मैं अब चलूंगी" तो मैं एकदम स्तब्ध सा उसे देखने लगा.वो बिना मेरे जवाब का प्रतीक्षा किये वहाँ से जाने लगी..और मैं सुन्न नज़रों से उसे जाते हुए तब तक देखता रह गया जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी.मैं बहुत देर तक उसी बेंच पर बैठे हुए पार्क के उसी गेट की तरफ देखता रह गया जिधर से वो गयी थी.मुझे अब भी लग रहा था की वो उसी गेट से फिर से वापस आएगी और इसी बेंच पर मेरे पास बैठकर मुझे फिर से कोई पुरानी बात सुनाने लगेगी.लेकिन जब बहुत देर तक वो वापस नहीं आई तो मेरा भ्रम टुटा और मुझे होश आया, की वो सचमुच जा चुकी है और उससे अब मुलाकात अगले साल ही होगी.

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हाँ तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
. . . जिनमें वह फँसने नहीं आतीं
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं...



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