Friday, June 15, 2012

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ये चांद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा...


वो बहुत खुश थी..लड़का उससे पूरे एक हफ्ते बाद आज शाम मिलने वाला था...लड़का सात दिनों के लिए कलकत्ता चला गया था और इन सात दिनों में लड़की ने उसे बेतरह मिस किया था...जिस दिन लड़का कलकत्ता जा रहा था उस दिन लड़की उससे काफी नाराज़ हो गयी थी.लड़के ने उसे अपने कलकत्ता जाने की बात उसी दिन सुबह बताई थी, और लड़की इस वजह से नाराज़ थी की उसे उसने ये बात पहले क्यों नहीं बताई.उन दिनों लड़की का एकमात्र सहारा वो लड़का ही था, जिससे वो हर शाम मिला करती थी..और उससे एक हफ्ते नहीं मिल पाना उसके लिए बहुत उदास कर देने वाली बात थी.उस दिन लड़की फोन पर खूब रोई थी.लड़के से उसने विनती की थी की वो उसे भी अपने साथ कलकत्ता ले जाए.लड़के ने बहुत समझाया उसे, बहुत बहलाया तब जाकर वो शांत हो पायी थी.

जब से लड़का गया था, तब से वो बस दिन ही गिन रही थी, की कब पंद्रह तारीख आये और लड़के से वो मिल पाए. .जिस दिन लड़का आने वाला था उस दिन वो सुबह से वो फोन के पास बैठी हुई थी, और जैसे ही लड़के ने कॉल किया उसने झट से फोन का रिसीवर उठा लिया.लड़का उधर से कुछ कहता इससे पहले लड़की ने ही उससे कह दिया..."सेम प्लेस, गार्डन रेस्टुरेंट, सेम टाईम, सी यु इन द इवनिंग". फोन के दूसरी तरफ लड़का हंसने लगा तो लड़की ने उसे डांट दिया..."इतने दिन बाद तुमसे मिलूंगी, और तुम इस बात पर हंस रहे हो...आज शाम में मिलो तब मनाना मुझे, बहुत नाराज़ हूँ तुमसे".लड़की ज्यादा देर उससे फोन पर बात नहीं कर सकी...और शाम में मिलने के लिए कह कर उसने फोन रख दिया,



लड़की हमेशा उसे खूब इंतजार करवाती थी लेकिन उस शाम वो वक़्त से बहुत पहले ही तय जगह पर पहुँच गयी थी.हमेशा की तरह वो अपने खूबसूरत ख्यालों में उलझी हुई, बाकी लोगों से बेपरवाह, लड़के के आने का इंतजार कर रही थी.लड़के ने उसे दूर से ही देख लिया था.वो सफ़ेद साड़ी में बिलकुल एक परी जैसे दिख रही थी.लड़का इस कशमकश में था की लड़की का मूड जाने कैसा होगा..सुबह फोन पर तो वो नाराज़ थी और लड़के से कह रखा था उसने, की आज मैं इतनी आसानी से नहीं मानने वाली हूँ.लेकिन वो ये भी जानता था की लड़की का वो गुस्सा सिर्फ उपरी दिखावा था, लड़की ने कभी गुस्से में उससे कुछ कहा हो ये उसे याद नहीं.वैसे भी लड़की को मानना लड़के के लिए कभी कोई मुश्किल काम नहीं रहा है.वो जहाँ एक तरफ ये सोच कर घबरा रहा था की कहीं लड़की सच में तो नाराज़ नहीं, वहीँ उसे ये भी विश्वास था की वो उसे झट से मना लेगा.लड़की के नज़दीक पहुँचते ही उसकी निर्मल हंसी और चुलबुलेपन से वो समझ गया की सब कुछ ठीक है और लड़की का मूड अच्छा है.वो खुश दिख रही थी.

लड़की उस गार्डन रेस्टुरेंट के गेट के पास खड़ी थी और हाथ में एक ईंट के टुकड़े से रेस्टुरेंट के दिवार पर जाने क्या लिख रही थी.उसने लड़के को आते हुए देखा नहीं, और जब लड़के ने पीछे से उसे आवाज़ लगाईं, लड़की ने वो ईंट के टुकड़े को जल्दी से अपने हाथ से फेंक दिया और जो भी वो दिवार पर लिख रही थी, हडबडाहट में उसे ऐसे मिटाने लगी जैसे वो कोई राज़ की बात हो जिसे वो लड़के को दिखाना नहीं चाहती..
वो एक पेंगुइन की अपने उचक कर अपने दो पैरों पर खड़ी हो गयी, और अपने फेमस शरारती अंदाज़ में उससे कहा...“तो साहब  कलकत्ता से वापस आ गए आप...चलिए अब समोसे और गोल्डस्पॉट से मेरी कुछ खातिरदारी कीजिये..ऐसे चले जाते हो कहीं भी, मुझे अपने साथ भी नहीं ले जाते तो हर्जाना भरना पड़ेगा न...देखिये तो, आप नहीं थे तो आपकी चिंता में हमारी सेहत कितनी बिगड़ गयी है..देखिये तो ज़रा हमें..” वो अपने दोनों पैरों पर ऐसे खड़ी थी जैसे सच में वो लड़के को दिखा रही हो, की देखो मैं इन सात दिनों में कितनी कमज़ोर हो गयी हूँ..वो बड़े निरीहता से लड़के को देख रही थी.
लड़के को अचानक उसपर बहुत प्यार आने लगा...उसने प्यार से उसका हाथ थामा और कहा “अच्छा चलो अब माफ कर दो मुझे, सब कुछ बहुत जल्दबाजी में हुआ था इसलिए तुम्हे पहले बता नहीं सका मैं....लेकिन आज तुम जो कहोगी वही होगा".. लड़की ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया...बस एक प्यारी मुस्कान उसके चेहरे पर सिमट आई थी.

दोनों रेस्टुरेंट के अन्दर गए और अपने फेवरिट सीट पर जाकर बैठ गए...

लड़की कुछ कहने जा ही रही थी की लड़के ने उसके हाथ में एक डब्बा थमा दिया और कहा – 
“ये लो..तुम्हारा तोहफा..खास कलकत्ता से तुम्हारे लिए लेकर आया हूँ"....
लड़की कुछ देर बड़ी हैरानी से उस डब्बे को देखते रही और डब्बा खोलते ही उसकी आँखें चमक उठी, वो खुशी से उछल पड़ी.डब्बे में मिठाईयां थी, कलकत्ता के उसी दूकान की मिठाईयां जो उसे सबसे ज्यादा पसंद थी.ये एक ऐसा सरप्राईज था, जिसके लिए लड़की बिलकुल तैयार नहीं थी.लड़का जानता था की अपनी फेवरिट दूकान की मिठाईयों को देखकर वो इसी तरह खुश होगी, इसी वजह से जिस दिन उसकी ट्रेन थी, वो उस दूकान में जाकर उसके लिए मिठाईयां खरीद लाया था.

लड़की ने उस डब्बे को अपने दोनों हाथों से कुछ ऐसे पकड़ रखा था की जैसे वो कोई खजाना हो जिसे कोई भी दूसरा उससे छीन कर ले जा सकता हा.उसने बड़े एहतियात से इधर उधर देखा और फिर चुपके से उस डब्बे को अपने बैग में रखते हुए लड़के से कहती है “ये जो तुमने मुझे प्राईसलेस गिफ्ट दिया है न, मैं आज घर जाकर  दीदी को दिखाउंगी और उन्हें ही सबसे पहले खिलाउंगी...तुम्हे एक भी मिठाई नहीं दूंगी मैं...यही तुम्हारी सजा है...हाँ, लेकिन तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ है..रुको, अभी दिखाती हूँ...” 
इतना कह कर वो अपने बैग में कुछ ढूँढने लगी.लड़की जब भी इस तरह अपने बैग में कुछ ढूँढती तो लड़के को वो हमेशा चकित कर जाती.लड़के को लड़की का बैग अलादीन का चिराग से कम जादुई नहीं लगता था.वो जब भी अपने बैग को टटोलती तो उसमे से अजीबोगरीब चीज़ बाहर निकलते...किसी बहुत पुराने फिल्म का कैसेट, कैडबरी चोकलेट के पुराने रैपर्स,फटे पुराने नोट, पुराने पेन जो की बिलकुल खराब हो चुके होते थे और जाने क्या क्या...और वो लड़के को हर बार ऐसे ही अजीबोगरीब चीज़ थमा दिया करती थी, और कहती की देखो, इसे मैंने दिया है तो थोडा संभाल के रखना अपने पास.इस बार लेकिन लड़की ने कोई अजीबोगरीब चीज़ बैग से नहीं निकाला बल्कि एक कैसेट बैग से निकाल लड़के को थमा दिया.

लड़के ने कैसेट को यूँ उलट पलट कर देखा की जैसे वो कैसेट न होकर सच में अलादीन के चिराग से निकला कोई जादुई चीज़ हो..कैसेट का कवर सादे कागज़ का था और खुद से बनाया हुआ..कैसेट का वो खूबसूरत कवर देखकर लड़के को हाथ से बने हुए नये साल के ग्रीटिंग्स कार्ड की याद आ गयी...जिसमे ठीक वैसे ही फूलों वाले बॉर्डर्स बने होते थे.लड़के को ये समझने में देर नहीं लगी की एक ब्लैंक कैसेट में लड़की ने अपने पसंद के गानों को रिकॉर्ड करवाया है और उसका कवर लड़की ने खुद बनाया है.कैसेट के कवर में लिखा कैसेट का टाईटल जरूर लड़के को अजीब लग रहा था -"तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे चंपा को बनाया".
कुछ देर तक उसकी नज़र कैसेट के टाईटल पर ही अटकी रह गयी..टाईटल के ठीक नीचे छोटे अक्षरों में कुछ गानों के कोटेशन लिखे हुए थे.लड़के ने कैसेट को पलटा तो दूसरी तरफ पर्पल स्केच पेन से लिखा था 
"इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तुने सीखा कहाँ से??????????"

लड़के की नज़र जाने क्यों गाने के इस लाईन पर टंगी रह गयी.वो जाने क्या सोचने लगा.....कुछ देर तक वो कैसेट को वैसे ही उलट पलट कर कभी आगे लिखी लाईन को पढता, कभी पीछे लिखे गाने के इस लाईन को पढता, जो उसे जाने क्यों गाना कम और लड़की का सवाल ज्यादा लग रहा था...

वो फिर लड़की को देखने लगता है - “ये चंपा कौन है?”

"तुम्हे चंपा नहीं मालुम??” लड़की ने आश्चर्य से पूछा

नहीं, कौन है ये चंपा??'

अरे, चंपा तो काश्मीर की कली है, तुम्हे नहीं पता??' लड़की ने शरारत भरे अंदाज़ में कहा.

लड़के को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और वो जवाब देने के बजाये हैरान सा चेहरा लिए उसे देखता रहा..और लड़की उसका कन्फ्यूज्ड चेहरा देख खुश हो रही थी.लड़की की शरारती हंसी से जब वो इरिटेट सा होने लगा तो लड़की अपनी हंसी को रोकते कहती है "अच्छा मैं बताती हूँ ये चंपा कौन है, लेकिन पहले तुम बताओ की तुमने काश्मीर की कली फिल्म देखी है?"

"हाँ देखी है, लेकिन क्यों?"

"अरे बेवकूफ उस फिल्म में ही तो शर्मीला आंटी का नाम चंपा था...भूल गए?"

"शर्मीला आंटी"????तुम्हारा मतलब शर्मीला टैगोर  न???

"हाँ...हाँ..वही...मेरी शर्मीला आंटी" लड़की ने बेपरवाही से हँसते हुए कहा

लड़के के समझ में अब पूरी बात आ गयी थी और वो उसे छेड़ते हुए कहता है "अच्छा..तो वो तुम्हारी आंटी कब से बन गयी?"

"पिछले वीक से..." लड़की बस तीन शब्दों का ये छोटा सा जवाब लड़के को थमा कर अपने बैग से खेलने लगी.

वो जब भी अपनी बात खत्म कर के बैग से खेलना शुरू कर देती तो ये इस बात के तरफ इशारा होता था की उसे उस टॉपिक पर अब आगे बहस नहीं करनी है.लड़का भी बस मुस्कुरा कर रह गया.
ये लड़की का एक बड़ा ही अनयुज्वल सा और प्योर पागलपन वाला खेल था.वो फिल्मी कलाकारों को अपना रिश्तेदार बना लेती थी और फिर उन्हें रिश्ते वाले नाम से ही बुलाती.जैसे की "कामिनी दादी,साधना मौसी,स्मिता आंटी,मीना मौसी, दीप्ति दीदी,जुही दीदी वैगरह"...लड़की के दोस्तों को ना चाहते हुए भी लड़की के इन रिश्तेदारों का पूरा मान सम्मान रखना पड़ता, और लड़की के सामने कोई उसके इन रिश्तेदारों की बुराई नहीं कर सकता था.ये लड़की का नियम था, जिससे उसके सभी दोस्त डरते थे...लड़की को अपने इस खेल में जाने क्यों बड़ा मजा आता था.

थोड़ी देर अपने बैग से खेलने के बाद जब लड़की आश्वस्त हो गयी, की अब लड़का इस सम्बन्ध में कोई मजाक नहीं करेगा तो वो कहती है - 
"पता है..तुम तो थे नहीं यहाँ और मेरे पास करने को कुछ काम भी नहीं था..शाम को भी घर से निकलना नहीं होता था...तो मैं कुछ दिनों के लिए अपने चाचा के पास चली गयी थी...वहाँ शर्मीला आंटी के बहुत से हिट गानों के कैसेट थे और मुझे सारे गाने बहुत पसंद आए.मैं पूरी शाम गार्डन में टहलते रहती और वाकमैन में गाने सुनते रहती.कुछ गाने तो मुझे इस कदर पसंद आ गए की मैंने सोचा जब तुम आओगे तो मैं तुम्हे वे सब गाने रिकॉर्ड कर के गिफ्ट करुँगी..तभी ये कैसेट बनाया मैंने....."
बड़ी मासूमियत से लड़की ने ये बात लड़के से कही थी और तब लड़का एक और बात समझ गया था, की कैसेट में जितने गाने हैं उसे लड़की ने अपनी ही आवाज़ में रिकॉर्ड कर के उसे दिए हैं..लड़के ने बड़े प्यार से लड़की का हाथ अपने हाथों में लिया और धीमे से उसे चूम कर कहा "कैसेट बहुत खूबसूरत है, थैंक्स फॉर दिस".

लड़की को अपने आप पर गुमान होने लगा और वो फिर बच्चों की तरह हँसने लगी.

कुछ देर दोनों खामोश रहे.बस एक दूसरे का हाथ पकड़े दूर आकाश में तैरते बादलों के टुकड़ों को देखते रहे..शाम में हुई बारिश से मौसम में थोड़ी ठंडक आ गयी थी.शाम भी गहराने लगी थी.सड़कों के किनारे और दुकानों के आगे बत्तियाँ जलने लगी थी.कुछ देर बाद जब दोनों वहाँ से जाने के लिए उठे तो लड़की को एकाएक कुछ याद आया.वो एकदम से लड़के के सामने खड़ी हो गयी और कहने लगी 
"हमें मंदिर जाना चाहिए...आज ही...मैंने सोचा था, जब तुम आओगे तो हम दोनों एकसाथ शिव मंदिर जायेंगे"
लड़का इस बात पर अपनी सहमति या असहमति जता पाता, इससे पहले ही लड़की उसका हाथ थाम कर उसे अपने साथ ऑटोरिक्शे के स्टैंड तक लेते आई.जब तक लड़का कुछ संभल पाता, दोनों ऑटोरिक्शे पर बैठ चुके थे और मंदिर की ओर जाने लगे थे...

ऑटोरिक्शे पर अभी वो बैठे ही थे की ऑटो-रिक्शे वाले ने रेडियो चालु कर दिया..रेडियो पर भी लड़की की शर्मीला आंटी का गाना आ रहा था....

"ये चाँद सा रौशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा,
ये झील सी नीली आँखें, कोई राज़ है इनमे गहरा..
तारीफ़ करूँ क्या उसकी, जिसने तुम्हे बनाया"

गाने के बोल सुनते ही दोनों चौंक पड़े, दोनों ने एक दूसरे को देखा...पहले तो एकसाथ ही दोनों हँसने लगे, फिर लड़की ने अपने आप को संभाला और अपनी नज़रों को दूसरी तरफ मोड़ दिया..लड़के ने जब देखा की लड़की एकाएक शरमाने लगी है तो उसने उसका चेहरा अपने हाथों में लेते हुए शरारत भरे लहजे में कहा "सच में, तारीफ़ करूँ क्या उसकी...जिसने तुम्हे बनाया".लड़की की नज़रें अब नीचे झुक गयी, और ऑटो के सीट पर वो अपनी उँगलियों से आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगी..लड़के ने फिर उसे छेड़ते हुए कहा "पता है..गाने में तुम्हारी शर्मीला आंटी की नहीं, तुम्हारी तारीफ़ की गयी है...देखो तो ज़रा..चाँद सा तुम्हारा चेहरा, झील सी तुम्हारी आँखें और जो तुम मुखड़े से अपने हटा दो ये आँचल, तो सच में हो सवेरा हो जाएगा...

लड़की इसका कुछ भी जवाब नहीं दे सकी, बस "तुम भी ना" कह कर लड़के के कन्धों पर अपना सर टिका दिया और अपनी आँखें मुंद ली.फिल्म का गाना आगे बढ़ रहा था और लड़का उस गाने को अब सच में लड़की के साथ रिलेट कर के देख रहा था, और शायद धीरे धीरे लड़के को भी ये विश्वास होते जा रहा था की ये गाना चंपा के लिए नहीं, उसी लड़की के लिए लिखा गया है, जो इस वक्त उसके पास उसके कन्धों पर सर रख कर सोयी हुई है...


7 comments:

  1. बढ़िया कहानी है बस इस कहानी में उस लड़के और लड़की का नाम कारण भी हो गया होता तो शायद मेरे विचार से कहानी में थोड़ी और जान डाली जा सकती थी।

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  2. ये बच्चे भी बस ... खुश रहें!

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  3. शर्मिला आंटी...लड़की की रिश्ते जोड़ लेने की आदत अच्छी है...वह चुलबुली लड़की हमेशा खुश रहे...वह खुश रहेगी तो लड़का भी खुश रहेगा |

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  4. वाह, कहानी में जान आ रही है या जान में कहानी डाल दी है..

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  5. कुछ ख़ास है... प्यारा अहसास है..बेहद ख़ास है..

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया