Saturday, May 5, 2012

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टूटते तारों का सच

वे गर्मियों के दिन थे.लड़का शहर में नया था और शहर की तेज गर्मी से वो बहाल था.पहली बार वो ऐसी गर्मी झेल रहा था..दोपहर होते होते पूरा शहर तपने लगता और जिस घर में वो रहता, उसके कमरे गर्मियों के दोपहर में रहने लायक नहीं होते..छत और फर्श से आग बरसती रहती..लड़का पूरा दिन अपने कमरे में नहीं गुज़ार सकता था इसलिए वो बाहर चला जाता..बाहर की गर्मी बर्दाश्त करना उसके लिए कमरे की गर्मी और उमस को बर्दाश्त करने से ज्यादा आसान होता.वो सुबह ही घर से निकल जाता..शहर में इधर उधर भटकते रहता..अपने मोहल्ले के एक दो दुकानवालों से उसका परिचय हो गया था तो वो अक्सर उन दुकानों में बैठ जाता और बातें करने लगता..कभी कभी वो घर के पास ही एक मॉल में चला जाता.वो अक्सर उस मॉल के फ़ूडकोर्ट में बैठा रहता और पूरा दिन वहीँ गुजार देता.उस मॉल के फ़ूड कोर्ट में वीरानी छाई रहती थी तो उसके वहाँ बैठे रहने से वहाँ के कर्मचारियों को कोई आपत्ति नहीं होती.फ़ूड कोर्ट वाले उस लड़के को अच्छे से पहचान गए थे.लड़का हमेशा अपने साथ कई किताबें,डायरी और नोटबुक रखता जिसे वो मॉल के फ़ूड कोर्ट पहुँचते ही टेबल पे फैला देता..पुरे फ़ूड कोर्ट में उसका टेबल सबसे अलग दीखता.हर के टेबल पे खाने के तरह तरह के व्यंजन होते लेकिन उसके टेबल पर तरह तरह की किताबें होती और साथ में कॉफी या चाय.वहाँ के लोग उसे कोई बड़ा लेखक समझते और शायद इस कारण से वे लोग उस लड़के की इज्ज़त भी करने लगे थे.

वो देर शाम तक वापस आता, लेकिन दिन भर की गर्मी से कमरा फिर भी तपा हुआ ही रहता.मॉल में पुरे दिन ठंडी हवा खाने के बाद जब वो अपने कमरे में दाखिल होता तो उसे कमरे की ताप बर्दाश्त नहीं होती और वो खिड़कियाँ दरवाज़े को खोल छत पे चला जाता.छत की सीढियां चढ़ते हुए वो अक्सर गिनने लगता की बारिशों में अब कितने और दिन बचे हैं..बारिश में तपन थोड़ी कम होगी और फिर उसके बाद सर्दियाँ शुरू हो जायेगी.ये सोच उसे कुछ तसल्ली मिलती और सर्दियों की बात सोच के वो कुछ देर के लिए खुश हो जाता.वो बहुत देर तक छत पे रहता..वो तब तक छत पे रहता जब तक उसके कमरे की ताप कम नहीं होती.गर्मियों की शाम उसे छत पे गुज़ारना हमेशा से अच्छा लगता था..अक्सर वो छत पे ही अपना बिस्तर लगा देता और वहीँ सो जाता.लेटे लेटे वो देर तक तारों को देखते रहता नींद कब उसे अपने आगोश में ले लेती ये उसे भी पता नहीं चलता.

उसके मकान के ठीक सामने तीन मंजिले का एक और मकान था.उसे वो मकान बहुत रहस्मयी सा लगता.वहाँ लोग रहते थे लेकिन फिर भी लगता की पुरे मकान में सन्नाटा पसरा है, एक वीरानी और उदासी छाई हुई है..पूरी शाम वो मकान अँधेरे में डूबा रहता.एक दो कमरे में कभी कभी हलकी रौशनी दिखाई देती थी लेकिन अक्सर मकान अँधेरे में ही डूबा रहता.वो हमेशा उस मकान में रहने वाले लोगों के बारें में सोचता..कौन रहते होंगे वहाँ?कैसे लोग होंगे वे?क्या करते होंगे?अँधेरे में वे क्यों रहते हैं..वो सोचता की अगर कभी उस मकान के किसी सदस्य से राह चलते उसकी मुलाकात हुई तो वो ये सब बातें उनसे पूछेगा.मकान के छत के एक कोने में एक टेबल और उसके दोनों तरफ दो छोटे बेंच लगे हुए थे...लड़के को थोड़ी हैरानी इस बात से होती की मकान में हमेशा अँधेरा रहता लेकिन वहाँ लगी टेबल और दो बेंचों के पास बत्ती पूरी रात जलते रहती और इसी वजह से छत का वो कोना बहुत खूबसूरत दीखता.

वो अक्सर उस छत पे एक खूबसूरत लड़की को देखता.उसे वो लड़की बड़ी अजीब और रहस्मयी लगती...वो अक्सर शाम में छत पे टहलती और अजीब हरकतें करती.कभी बिना बात अचानक नाचने लगती तो कभी हवा में अपनी उँगलियों से कई शकलें बनाने लगती.वो जब छत पे आती तो मकान की पूरी बत्तियाँ जलने लगती, और उसके वापस जाते ही बत्तियाँ फिर से बुझ जाती.वो जब भी वो उस लड़की को देखता तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आती, जो उन दिनों किसी दूसरे शहर में थी.उसकी प्रेमिका भी तो इस लड़की की ही तरह अजीब हरकतें करती थी.

एक शाम वो छत पे टहल रहा था और उदास था.उसकी नज़र फिर से उस लड़की पे टिक गयी.वो लड़की बहुत उदास लग रही थी और छत के कोने में लगी बेंच पे वो बैठी थी.उस लड़की को यूँ उदास देख उसे एक पुरानी बात याद हो आई.एक ऐसी ही गर्मियों की शाम थी, जब वो लड़का अपनी प्रेमिका के साथ अपने शहर में था.उसकी प्रेमिका उस शाम बहुत उदास थी.वे दोनों अपनी ऑफिस के छत के कोने में लगी बेंच पे बैठे हुए थे.लड़के की कोशिश जारी थी की वो अपनी प्रेमिका को खुश कर सके..उसे हँसा सके..लड़के को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी.लड़की की उदासी ज्यादा देर चेहरे पे टिक नहीं सकी...यही उन दोनों के रिश्ते की खूबसूरती थी..जब भी दोनों साथ रहते तो दोनों में से कोई ज्यादा देर उदास नहीं रह सकता था.लड़का उस शाम पहली बार अपनी प्रेमिका के इतने करीब बैठा था और पहली बार उसने उसकी आँखों को करीब से देखा था और तब उसकी आँखों में झांकते हुए उसे पता नहीं क्यों ये भ्रम हुआ की उसकी आँखों के पीछे कोई एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया है जहाँ सिर्फ वो जा सकती है..जहाँ की हर चीज़ उसके मुताबिक है और जहाँ उसके अलावा किसी दूसरे को जाने की कोई इजाज़त नहीं है..वो अक्सर देखता था की उसकी प्रेमिका जब भी उदास होती तो कुछ देर के लिए अपनी आँखें मुंद लेती, और फिर जब आँखें खोलती तो मुस्कुराने लगती.लड़के को उस शाम ये भी भ्रम हुआ की लड़की हमेशा अपनी आँखें बंद कर उसी खूबसूरत सी दुनिया में चली जाती है और अपने सारे गम और उदासी वहीँ छोड़ खुशियाँ ले वापस आ जाती है.

अचानक याद हो आई अपने अच्छे दिनों की स्मृति से वो थोड़ा और उदास हो गया और उसके मन ने चाहा की अभी इस वक्त वो अपनी प्रेमिका के पास पहुँच जाए.लेकिन सिर्फ चाहने भर से कुछ मिलता नहीं.वो उदास हो गया और छत पे टहलने लगा..की इतने में उसने आकाश से एक तारे को टूट के गिरते हुए देखा.उसने पहले कभी टूटते तारों को नहीं देखा था.सिर्फ फिल्मों में या अपनी प्रेमिका से वो टूटते तारों का जिक्र सुनते आया था.लड़की उससे हमेशा कहती की तारे जब टूट के गिरते हैं तो उस समय की मांगी हुई कोई भी मुराद जरूर पूरी होती है.लड़की ने उसे सलाह दी थी की जैसे ही टूटते तारों को वो देखे, कोई अच्छी 'विश' वो भी मांग ले..उसकी वो 'विश' जरूर पूरी होगी..लड़के ने पहली बार आज तारों को टूटते हुए देखा और जाने कैसे उसने उसी वक्त ये दुआ मांग ली की वो और उसकी प्रेमिका जिंदगी भर साथ रहे और उनकी मोहब्बत हमेशा जिंदा रहे.उसने सोचा की अगर उसकी मांगी ये मुराद पूरी हो जाती है तो वो इसके पीछे की सच्चाई को मानने लगेगा...अगर नहीं तो उसे ये बातें कहानियों सी लगेगी, जिसका होना असल जिंदगी में नामुमकिन है और जो सिर्फ बच्चों को रोमांचित करने के लिए बुनी जाती हैं.


उस शाम को बीते बहुत से साल गुजार गए...और अब लड़के को पूर्ण विश्वास है की टूटते तारों की ये कहानियाँ सिर्फ मनगढ़त हैं और इनका असल जिंदगी से कोई ताल्लुक नहीं..टूटते तारे तो असल में उल्का होते हैं जो यदि जमीन पे गिरे तो उल्का पिण्ड बनाते हैं.टूटते तारों को देखते वक्त मांगी कोई भी कोई भी मुराद कभी पूरी नहीं होती.

26 comments:

  1. अबे ई तारा सूरज चांद छत , टेबुल , गर्मी ...सब का एक ही उपाय है पार्थ ..

    बियाह काहे नय करता है बे ..बियाह करो बियाह .ऊ भी टेम से ..न त अगिला पार्ट में ..ई लईका भी छते पे नाचता रहेगा ..

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  2. बह्तु ही खूबसूरती से प्रवाहमय शैली में लिखा है अभिषेक । एक प्रेमी नवयुवक का पूरा दिन ..और शायद पूरी जिंदगी उकेर दी ..बहुत खूब लिखते रहो

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  3. तारे में छूटेंगे सारे,
    गहो उसे जो सबको तारे।

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  4. अच्छा फ्लो है , बढ़िया कहानी |

    तारों के टूटने पर विश मांगने का लफड़ा हमें भी समझ नहीं आता, पर फिर भी मांग ही लेते हैं |
    पर ये ध्यान नहीं दिया कि कितनी पूरी हुई कितनी नहीं| अब ध्यान देंगे :) :) :)

    अजय जी की बात पे भी ध्यान दिया जाये :) :) :)

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  5. Very Beautiful story hai sir

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  6. main bhi wish mangti hu taare jb tutte hai :D

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  7. सपने सपने हैं, और दुनिया दुनिया! :(

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  8. तुम इतने अच्छे क्यों हो पुत्र!! कभी कभी दुनिया के दस्तूर से अच्छे लोगों को देखकर डर लगने लगता है.. अभि, तुम जब भी लिखते हो दिल से लिखते हो.. अगर कभी तुम्हारी किताब छपी, तो याद रखना उसका इंट्रो हम ही लिखेंगे!!
    आजकल चचा से नाराज़ चल रहे हो लगता है!! न फोन न मुलाक़ात!! जब हम नहीं रहेंगे त हमको भी ऐसे ही याद करोगे बेटा और सोचोगे मिल ही लेते तो अच्छा था!!

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  9. शायद पूरी भी होती होगी... कौन जाने तारों और मुरादों का सच!
    इस कहानी को लिखने वाले की हर 'विश' पूरी हो... आपको ढ़ेर सारी शुभकामनाएं:)

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  10. बहुत दिनों बाद नई पोस्ट आई...बहुत गर्मी है शायद इसलिए:)

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  11. आपकी प्रस्तुति दिल की धड़कन है ।बहुत सुंदर शैली में इसे प्रस्तुत किया है । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  12. i hate sad endings............but loved your story.....

    regards

    anu

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  13. इतना सुंदर प्रवाह है पूरी कहानी का ....खूबसूरती से बयां किये हैं दिल के जज़्बात ....तुम्हारी कहानी आसानी से दिल को छूती है क्योंकि तुम दिल से लिखते हो ....!!
    शानदार लेखन कि बधाई और भविष्य कि शुभकामनायें .....!!

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  14. आपकी लिखी यह कहानी बहुत ही प्रवाहमयी थी..सच में उस नवयुवक की पूरी जिंदगी व्यक्त कर दी कहानी में..
    यह कहानी इतनी संजीदा है की आँखों के सामने दृश्य दिख रहा था...जैसे कोई फिल्म देख रहे हो...
    उत्कृष्ट अभिव्यक्ति....

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  15. वाह! वाह! क्या बात है भैया तुम तो छा गए हो..:D

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  16. टूटे तारों से कुछ माँगना .. पूरा हो न हो ... एक आस तो रहती ही है ... न चाहते हुवे भी हाथ उठ जाता है कुछ मांगने को बार बार टूटते तारे कों देख के ...
    दिल से लिखी सपनों में बुनी ... प्रवाहमय कहानी ... मज़ा आ गया ... कई दिनों बाद कुछ लिखा है आपने ...

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  17. बहुत ही बढ़िया ..बचपन में टूटते तारों को देखना बहुत अच्छा लगता था..
    तारों को फुर्सत में देखना सुकूनकारी लगता है ..
    टूटते तारों को देखने से सपने कितना पूरे हुए यह तो पता नहीं ..लेकिन बहुत ही सुन्दर लगी यह किस्सागोई ..

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  18. jante to sab hai ki wo ulka hai par jane kyu ye mn nahi manta.....

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  19. bahut khoobsuart lagi kahani...sabse interesting ladki ke aankhon mein dekhne wala part laga..

    prerna

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  20. बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति.

    माँ है मंदिर मां तीर्थयात्रा है,
    माँ प्रार्थना है, माँ भगवान है,
    उसके बिना हम बिना माली के बगीचा हैं!

    संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी

    आपको मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं..
    आपका
    सवाई सिंह{आगरा }

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  21. कल 22/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  22. अभिषेक आपके लेखन का जबाब नहीं ।हमेशा इतनी बारीकी से हर भाव को व्यक्त करते हैं कि पढना आत्मीय लगता है । टूटे तारे से कुछ माँगने वाली बात का तो पता नही लेकिन सच्चे भाव अदिकांशतः सफल होजाते हैं ।

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  23. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  24. Vote hai poore Mager sacche dil se mangi muraad

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  25. कौन जाने टूटते तारों का सच...!
    पर सलिल चचा की बात से सहमत हैं हम भी...तुम इतने अच्छे क्यों हो...? :) :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया