Saturday, May 26, 2012

तुम्हारी आवाजों के कुछ टुकड़े


वो बेहद तनहा कर देने वाली शाम थी.रात से ही लगातार बारिश हो रही थी..दिन में कभी कभी हवा अचानक से तेज हो जाती, और तब खिड़की के दोनों पाट इतने जोर से आपस में टकराते की मेरे दिल की धड़कन एकदम से बढ़ जाती..और मैं बेवजह बहुत डर जाता.ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है..जब मैं अपने उन सपनों के बारे में सोचने लगता हूँ जिसे वक्त ने बड़ी बेरहमी से कुचल डाला है, तब मैं अक्सर तेज आवाजों से डर जाता हूँ.रात भी कमोबेश ऐसे ही कटी थी...कभी खिड़की की आवाज़ से डरते हुए तो कभी सुबह होने की प्रतीक्षा में...दिल में अजीब अजीब से मिक्स्ड ख्याल आ रहे थे.दोपहर में भी बारिश की तेज आवाज़ और खिड़कियों की भयावह आवाजों ने सोने नहीं दिया.शाम होते होते मैं इन आवाजों से इतना घबरा गया, अपने तन्हाई से इस कदर डर गया की तेज बारिश में ही घर से निकल गया और एक पार्क में चला आया.पार्क में पहुँचते ही बारिश अचानक रुक गयी, और तब मुझे ये भ्रम हुआ की कहीं ये सारी साजिश मुझे घर से बाहर निकलने पर मजबूर करने की तो नहीं थी.

अभी याद करने बैठूं तो मुझे एक्जेक्टली ये याद आता नहीं की उस पुरे दिन मैं क्या सोच रहा था..बस यही याद आता है की उस शाम मैं बहुत डरा हुआ, घबराया हुआ और अकेला था..उस शाम पार्क में मेरी नज़र एक छोटी बच्ची पर गयी.वो कभी अपनी माँ को चिढाती तो कभी पार्क में इधर उधर भागने लगती.उस छोटी बच्ची को देख मुझे जाने क्यों तुम्हारी एक बात याद आ गयी...तुम कहती थी -घास पर नंगे पाँव चलने से पाँव कोमल और हसीन हो जाते हैं..तुम जब भी बारिशों के मौसम में पार्क आया करती थी, तो नंगे पाँव ही भींगी हुई घाँस पर दौड़ जाती थी, आसपास वाले लोग क्या कहेंगे इसकी तुमने कभी परवाह नहीं की.ये बात याद आते ही मेरे चेहरे पे एक मुस्कान आ गयी, जिसकी मुझे उस शाम बेहद जरूरत थी.

याद है तुम्हे, बहुत पहले जब एक शाम मैं अपने दोस्तों के साथ अपने शहर में अपने इलाके के पार्क के गेट के पास खड़ा था तो अचानक तुम पार्क के अंदर से दौड़ते हुए आई और मुझे लगभग खींचते हुए उस पार्क में ले गयी थी..जब तक की मैं कुछ समझ पाता, या सवाल कर पाता, मैं उस पार्क के एक कोने में एक पौधे के पास पहुँच चूका था.तुमने झपटकर मेरा हाथ पकड़ लिया और उस पौधे तरफ देख कर इशारों से कहा.."देखो तो उसे...कितना अच्छा है न?"..

सब कुछ इतना जल्दी हुआ था की एक पल तो मैं कुछ भी समझ नहीं पाया की तुम मुझे कहाँ देखने को कह रही हो, और फिर मेरी नज़रें उस पौधे के बजाय तुम्हारे चेहरे पर जाकर टंगी रह गयीं..तुमने फिर मुझे छेड़ते हुए कहा -- "अरे जनाब, इस बेयुतिफुल(ब्यूटफल) की तरफ नहीं..उस बेयुतिफुल की तरफ देखो" और तब मैं कुछ झेंप सा गया...मैंने देखा की तुम उस पौधे के तरफ ही इशारा कर रही हो.मैं कुछ समझ नहीं पाया की आखिर तुम मुझे क्या दिखाना चाह रही हो..ख्याल आया, की हो न हो उस पौधे का कोई फूल तुम्हे प्यारा लगा हो या आसपास कोई चींटी हो, जिसकी चाल ने तुम्हे अट्रैक्ट किया हो..मैं अभी अंदाजा ही लगा रहा था की तुम किस बात पर इतना खुश हो रही हो, की तुमने उस पौधे को बाय बोलकर मुझे वापस खींचते हुए बाहर ले गयी, पार्क के मैन गेट के पास..और जबतक मैं संभल पाता, तुम मुझे आइसक्रीम के एक ठेले के पास लेते आई थी, और मुझसे कह रही थी - "तुम्हे मैंने इतना अच्छा चीज़ दिखाया, अब चलो मुझे आईसक्रीम खिलाओ".

मैं तुमसे पूछना चाह रहा था की आखिर पार्क में तुम मुझे क्या दिखाना चाह रही थी..लेकिन बस इस वजह से चुप रहा की तुम हर बार की तरह मेरे सवालों को बेमतलब और व्यर्थ का बोल के खारिज कर दोगी.उस शाम की तुम्हारी वो अजीब हरकत को मैंने तुम्हारी बातों और हरकतों के उस कैटेगरी में डाल दिया था, जो मुझे हमेशा से बहुत रहस्मयी सी लगती थी और आज तक कभी समझ में नहीं आई..

तुम्हारे शहर से जाने के बहुत दिन बाद युहीं एक उदास शाम मैंने खुद से एक वादा किया था की अब कभी उस पार्क में दोबारा नहीं जाऊँगा.लेकिन कुछ महीनों पहले जब मैं उस पार्क के तरफ से गुजर रहा था..तो अचानक ही मेरे कदम पार्क के गेट के पास आकार ठिठक गए.और मैं खुद से किये वादे को तोड़ता हुआ पार्क के अंदर दाखिल हो गया.पार्क का पूरा नक्शा ही बदल गया था..सिंपल सा दिखने वाला पार्क अब बेहद खूबसूरत हो गया था..पार्क का एक कोना जहाँ पर बेंच लगी रहती थी और जहाँ तुम अक्सर बैठा करती थी..वहाँ से गायब था.पार्क के पीछे जो लंबे लंबे से पेड़ थे, वो पुरे कट गए थे, और वहाँ खाली मैदान था.सब ही कुछ पार्क में बदल गया था.मुझे इस बात से थोड़ी खुशी भी हुई, की अब इस पार्क में ऐसा कुछ भी नहीं है जो मुझे तुम्हारी याद दिलाएगा..लेकिन मेरी ये खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी.पार्क के दीवारों से सटे लंबे लंबे पीले फूलों वाले पेड़ अब भी अपने जगह वैसे ही मुस्तैद खड़े थे, जैसे उन दिनों खड़े रहते थे.मैंने सोचा--सब कुछ बदल भी जाए, लेकिन ये पेड़ कभी नहीं बदलते, वैसे ही रहते हैं जैसे बरसो पहले हुआ करते थे..मैं जाकर वहीँ एक पेड़ के नीचे बैठ गया..

पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ सोच ही रहा था की अचानक लगा की जैसे तुमने मेरा नाम लिया है कहीं से...मैं हतप्रभ होकर इधर उधर देखने लगा..फिर याद आया की तुम तो बहुत दूर किसी दूसरे शहर में हो..और ये सिर्फ मेरा वहम है..मुझे खुद पर ही हंसी आ गयी..लेकिन दूसरे ही पल तुम्हारी आवाज़ मुझे फिर से सुनाई दी..इस बार मैं सही में चौंक गया था और इधर उधर देखने लगा..मेरी नज़र ऊपर पेड़ की टहनियों पर जाकर टिक गयी..और तब मुझे लगा की इसी पेड़ की किसी टहनी से तुम्हारी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही है...शायद तुम्हारे आवाज़ के कुछ टुकड़े यहाँ टंगे हुए रह गए हों...जिसे तुम अपने साथ वापस ले जाना भूल गयी..तब मुझे ये भी लगा की ये तुम्हारी आवाजों के टुकड़े यहाँ युहीं टंगे रहेंगे..बहुत साल बाद भी, शायद हमेशा हमेशा के लिए...और तब मैं बेहद निराश और उदास हो गया, और खुद से फिर एक वादा किया की अब फिर कभी इस पार्क में दुबारा नहीं आऊंगा.


कभी कभी सोचता हूँ की आने वाले सालों में तुम कभी अगर ये शहर वापस भी आई तो क्या तुम उस पार्क में जाओगी..क्या पार्क की गेट पर तुम्हारे कदम वैसे ही ठिठकेगें जैसे मेरे ठिठके थे....क्या तुम भी उस पौधे और पार्क का वो कोना को वहाँ न पाने पर दुखी होगी...और क्या तुम्हे भी ऐसा लगेगा की मेरी आवाजों के कुछ टुकड़े वहाँ के लंबे और घने पीले पेड़ों के टहनियों पर टंगे हुए हैं....क्या तुम उस समय मुझे याद करोगी..और क्या तुम भी उस समय वहाँ किसी पेड़ के नीचे बैठकर रोयोगी?
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Saturday, May 5, 2012

टूटते तारों का सच

वे गर्मियों के दिन थे.लड़का शहर में नया था और शहर की तेज गर्मी से वो बहाल था.पहली बार वो ऐसी गर्मी झेल रहा था..दोपहर होते होते पूरा शहर तपने लगता और जिस घर में वो रहता, उसके कमरे गर्मियों के दोपहर में रहने लायक नहीं होते..छत और फर्श से आग बरसती रहती..लड़का पूरा दिन अपने कमरे में नहीं गुज़ार सकता था इसलिए वो बाहर चला जाता..बाहर की गर्मी बर्दाश्त करना उसके लिए कमरे की गर्मी और उमस को बर्दाश्त करने से ज्यादा आसान होता.वो सुबह ही घर से निकल जाता..शहर में इधर उधर भटकते रहता..अपने मोहल्ले के एक दो दुकानवालों से उसका परिचय हो गया था तो वो अक्सर उन दुकानों में बैठ जाता और बातें करने लगता..कभी कभी वो घर के पास ही एक मॉल में चला जाता.वो अक्सर उस मॉल के फ़ूडकोर्ट में बैठा रहता और पूरा दिन वहीँ गुजार देता.उस मॉल के फ़ूड कोर्ट में वीरानी छाई रहती थी तो उसके वहाँ बैठे रहने से वहाँ के कर्मचारियों को कोई आपत्ति नहीं होती.फ़ूड कोर्ट वाले उस लड़के को अच्छे से पहचान गए थे.लड़का हमेशा अपने साथ कई किताबें,डायरी और नोटबुक रखता जिसे वो मॉल के फ़ूड कोर्ट पहुँचते ही टेबल पे फैला देता..पुरे फ़ूड कोर्ट में उसका टेबल सबसे अलग दीखता.हर के टेबल पे खाने के तरह तरह के व्यंजन होते लेकिन उसके टेबल पर तरह तरह की किताबें होती और साथ में कॉफी या चाय.वहाँ के लोग उसे कोई बड़ा लेखक समझते और शायद इस कारण से वे लोग उस लड़के की इज्ज़त भी करने लगे थे.

वो देर शाम तक वापस आता, लेकिन दिन भर की गर्मी से कमरा फिर भी तपा हुआ ही रहता.मॉल में पुरे दिन ठंडी हवा खाने के बाद जब वो अपने कमरे में दाखिल होता तो उसे कमरे की ताप बर्दाश्त नहीं होती और वो खिड़कियाँ दरवाज़े को खोल छत पे चला जाता.छत की सीढियां चढ़ते हुए वो अक्सर गिनने लगता की बारिशों में अब कितने और दिन बचे हैं..बारिश में तपन थोड़ी कम होगी और फिर उसके बाद सर्दियाँ शुरू हो जायेगी.ये सोच उसे कुछ तसल्ली मिलती और सर्दियों की बात सोच के वो कुछ देर के लिए खुश हो जाता.वो बहुत देर तक छत पे रहता..वो तब तक छत पे रहता जब तक उसके कमरे की ताप कम नहीं होती.गर्मियों की शाम उसे छत पे गुज़ारना हमेशा से अच्छा लगता था..अक्सर वो छत पे ही अपना बिस्तर लगा देता और वहीँ सो जाता.लेटे लेटे वो देर तक तारों को देखते रहता नींद कब उसे अपने आगोश में ले लेती ये उसे भी पता नहीं चलता.

उसके मकान के ठीक सामने तीन मंजिले का एक और मकान था.उसे वो मकान बहुत रहस्मयी सा लगता.वहाँ लोग रहते थे लेकिन फिर भी लगता की पुरे मकान में सन्नाटा पसरा है, एक वीरानी और उदासी छाई हुई है..पूरी शाम वो मकान अँधेरे में डूबा रहता.एक दो कमरे में कभी कभी हलकी रौशनी दिखाई देती थी लेकिन अक्सर मकान अँधेरे में ही डूबा रहता.वो हमेशा उस मकान में रहने वाले लोगों के बारें में सोचता..कौन रहते होंगे वहाँ?कैसे लोग होंगे वे?क्या करते होंगे?अँधेरे में वे क्यों रहते हैं..वो सोचता की अगर कभी उस मकान के किसी सदस्य से राह चलते उसकी मुलाकात हुई तो वो ये सब बातें उनसे पूछेगा.मकान के छत के एक कोने में एक टेबल और उसके दोनों तरफ दो छोटे बेंच लगे हुए थे...लड़के को थोड़ी हैरानी इस बात से होती की मकान में हमेशा अँधेरा रहता लेकिन वहाँ लगी टेबल और दो बेंचों के पास बत्ती पूरी रात जलते रहती और इसी वजह से छत का वो कोना बहुत खूबसूरत दीखता.

वो अक्सर उस छत पे एक खूबसूरत लड़की को देखता.उसे वो लड़की बड़ी अजीब और रहस्मयी लगती...वो अक्सर शाम में छत पे टहलती और अजीब हरकतें करती.कभी बिना बात अचानक नाचने लगती तो कभी हवा में अपनी उँगलियों से कई शकलें बनाने लगती.वो जब छत पे आती तो मकान की पूरी बत्तियाँ जलने लगती, और उसके वापस जाते ही बत्तियाँ फिर से बुझ जाती.वो जब भी वो उस लड़की को देखता तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आती, जो उन दिनों किसी दूसरे शहर में थी.उसकी प्रेमिका भी तो इस लड़की की ही तरह अजीब हरकतें करती थी.

एक शाम वो छत पे टहल रहा था और उदास था.उसकी नज़र फिर से उस लड़की पे टिक गयी.वो लड़की बहुत उदास लग रही थी और छत के कोने में लगी बेंच पे वो बैठी थी.उस लड़की को यूँ उदास देख उसे एक पुरानी बात याद हो आई.एक ऐसी ही गर्मियों की शाम थी, जब वो लड़का अपनी प्रेमिका के साथ अपने शहर में था.उसकी प्रेमिका उस शाम बहुत उदास थी.वे दोनों अपनी ऑफिस के छत के कोने में लगी बेंच पे बैठे हुए थे.लड़के की कोशिश जारी थी की वो अपनी प्रेमिका को खुश कर सके..उसे हँसा सके..लड़के को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी.लड़की की उदासी ज्यादा देर चेहरे पे टिक नहीं सकी...यही उन दोनों के रिश्ते की खूबसूरती थी..जब भी दोनों साथ रहते तो दोनों में से कोई ज्यादा देर उदास नहीं रह सकता था.लड़का उस शाम पहली बार अपनी प्रेमिका के इतने करीब बैठा था और पहली बार उसने उसकी आँखों को करीब से देखा था और तब उसकी आँखों में झांकते हुए उसे पता नहीं क्यों ये भ्रम हुआ की उसकी आँखों के पीछे कोई एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया है जहाँ सिर्फ वो जा सकती है..जहाँ की हर चीज़ उसके मुताबिक है और जहाँ उसके अलावा किसी दूसरे को जाने की कोई इजाज़त नहीं है..वो अक्सर देखता था की उसकी प्रेमिका जब भी उदास होती तो कुछ देर के लिए अपनी आँखें मुंद लेती, और फिर जब आँखें खोलती तो मुस्कुराने लगती.लड़के को उस शाम ये भी भ्रम हुआ की लड़की हमेशा अपनी आँखें बंद कर उसी खूबसूरत सी दुनिया में चली जाती है और अपने सारे गम और उदासी वहीँ छोड़ खुशियाँ ले वापस आ जाती है.

अचानक याद हो आई अपने अच्छे दिनों की स्मृति से वो थोड़ा और उदास हो गया और उसके मन ने चाहा की अभी इस वक्त वो अपनी प्रेमिका के पास पहुँच जाए.लेकिन सिर्फ चाहने भर से कुछ मिलता नहीं.वो उदास हो गया और छत पे टहलने लगा..की इतने में उसने आकाश से एक तारे को टूट के गिरते हुए देखा.उसने पहले कभी टूटते तारों को नहीं देखा था.सिर्फ फिल्मों में या अपनी प्रेमिका से वो टूटते तारों का जिक्र सुनते आया था.लड़की उससे हमेशा कहती की तारे जब टूट के गिरते हैं तो उस समय की मांगी हुई कोई भी मुराद जरूर पूरी होती है.लड़की ने उसे सलाह दी थी की जैसे ही टूटते तारों को वो देखे, कोई अच्छी 'विश' वो भी मांग ले..उसकी वो 'विश' जरूर पूरी होगी..लड़के ने पहली बार आज तारों को टूटते हुए देखा और जाने कैसे उसने उसी वक्त ये दुआ मांग ली की वो और उसकी प्रेमिका जिंदगी भर साथ रहे और उनकी मोहब्बत हमेशा जिंदा रहे.उसने सोचा की अगर उसकी मांगी ये मुराद पूरी हो जाती है तो वो इसके पीछे की सच्चाई को मानने लगेगा...अगर नहीं तो उसे ये बातें कहानियों सी लगेगी, जिसका होना असल जिंदगी में नामुमकिन है और जो सिर्फ बच्चों को रोमांचित करने के लिए बुनी जाती हैं.


उस शाम को बीते बहुत से साल गुजार गए...और अब लड़के को पूर्ण विश्वास है की टूटते तारों की ये कहानियाँ सिर्फ मनगढ़त हैं और इनका असल जिंदगी से कोई ताल्लुक नहीं..टूटते तारे तो असल में उल्का होते हैं जो यदि जमीन पे गिरे तो उल्का पिण्ड बनाते हैं.टूटते तारों को देखते वक्त मांगी कोई भी कोई भी मुराद कभी पूरी नहीं होती.
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