Friday, January 6, 2012

// // 13 comments

तुम्हारे नाम लिखी एक और चिट्ठी

(बड़ा अन्यूजवल सा पोस्ट है, शायद ऐब्नॉर्मल और बेतुका भी...तो अपने रिस्क पर ही पोस्ट पढ़ें)

बड़ी मुश्किल से कल रात मैने सुलाया खुद को 
इन आंखो को तेरे ख्वाब का लालच दे कर

याद है तुम्हे, मैंने एक बार तुमसे कहा था की जब भी मुझे रात को नींद नहीं आती तो आँखें बंद कर के उन चीज़ों के बारे में सोचने लगता हूँ जिनकी कभी मैंने तमन्ना या ख्वाहिश की थी.तुम्हे बताने की जरूरत नहीं है की जब भी मैं आँखें बंद करता हूँ तो सिर्फ तुम्हारा ही चेहरा आँखों के सामने आता है, और फिर तुम्हारे बारे में सोचते सोचते पता भी नहीं चलता की नींद कब मुझे अपने आगोश में समेट लेती है.

ये एक बड़ा बेतुका सा खेल है जो कभी कभी मुझे हैरत में डाल देता है.एक दिन युहीं ये खेल खेलते खेलते मुझे नींद आ गयी और मैं सपना देखने लगा की तुम्हारा विवाह मेरे साथ हो गया है.सुबह सुबह अचानक जब एक टेक्स्ट मेसेज से नींद खुली और सपना टूटा, तो महसूस हुआ की मैं सपना देख रहा था...मेरे सामने वही कमरा था, वही किताबें...सब कुछ वैसा ही था..मेरी साँसे तेज चल रही थी, ऐसा लग रहा था की मैं बहुत देर तक दौड़ता रहा था और अंत में ठोकर खा कर गिर गया..मैं कुछ देर एकदम हताश सा बैठा रहा.

मेरे लिए ऐसे सपने देखना कोई नयी बात नहीं है.कल रात वैसा ही कुछ सपना फिर से देखा मैंने..मैंने देखा की सुबह जब मेरी नींद खुली तो तुम मेरे बगल में बैठी हुई हो और मुझे बड़े प्यार से नींद से जगा रही हो.हम अपने घर में हैं और वो घर मुझे एक वुडेन हाउस जैसा लग रहा था.याद है न एक दफे तुमने कहा था की जैसा 'पटना जू' में एक वूडेन हाउस है, ठीक वैसा ही किसी बड़े से पेड़ पर बना हुआ वुडेन हाउस में तुम रहना चाहती हो..ये तुम्हारी बहुत सी ख्वाहिशों में से एक थी..फिर जब कुछ सालों बाद एक फिल्म आई थी 'द लेक हाउस' तो तुमने कहा था की तुम्हारी ख्वाहिश है की तुम भी उस तरह के घर में रहो जो सिर्फ शीशों से बना हुआ हो.उस रात जो मैंने सपने में देखा था की हम वैसे ही किसी घर में रह रहे हैं..

देखो न, तुम्हारी बातों जैसी ही तुम्हारे सपने भी कितने इल-लॉजिकल हैं.अगर मैं अपने एक सपने के बारे में बताऊंगा तो तुम यकीन बिलकुल नहीं करोगी...और मैं जानता हूँ की तुम उसे सुन खूब हंसोगी भी.लेकिन वो सपना मैंने सच में देखा था.

एक बार कहीं पढ़ा था, की अगर आप किसी रात बहुत अच्छा सा कोई ख्वाब देखते हैं, और चाहते हैं की वो ख्वाब हमेशा आपके पास सुरक्षित रहे तो नींद से जागने के ठीक बाद आप अपने उस ख्वाब को किसी डायरी या नोटबुक में सहेज कर रख लीजिए.हो सकता है की बाद में जब भी आप उस ख्वाब के बारे में पढ़ें, तो आपको हंसी आये, दुःख हो या अच्छे लगे..जो भी होगा, लेकिन वो ख्वाब आपसे हमेशा के लिए जुड़ा रहेगा.सिर्फ नींद से जागने के बाद का ही वो वक्त होता है जब आप उस ख्वाब की हर छोटी छोटी बातें भी अच्छे से याद रख सकते हैं.बाद में धीरे धीरे वो ख्वाब आप भूलते जाते हैं.पता नहीं ये लॉजिक कैसा है, लेकिन तुम यकीन नहीं करोगी, मैं ऐसा सही में करने लगा था और खास कर के तब जब मेरे ख्वाबों में तुम आती थी.

चलो, मैं तुम्हे उस सपने के बारे में बताता हूँ..

मैंने देखा की तुम मेरे शहर में आई हुई हो.मेरे ही मोहल्ले में.मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे तुम बहुत दिनों से इस शहर में मेरे साथ रह रही थी.तुम मुझसे फरमाइश कर रही थी की तुम्हे कौन से दूकान की कौन सी चीज़ चाहिए.फिर जब हम दोनों साथ साथ घूमने निकले तो मैं देख के हैरान रह गया की मुझे सड़क के दूसरी तरफ पटना शहर दिखाई दे रहा था.मैंने सोचा की ऐसा कैसे हो सकता है..फिर ख्याल आया की मैं सपने में ये देख रहा हूँ.
मुझे लगा की शायद सपने सही में बहुत पावरफुल होते हैं..दो शहरों को भी मिला सकते हैं, आप सपने में कुछ भी देख सकते हैं...- फिर भी मैं बड़ा कन्फ्यूज सा खड़ा था.मैं तुमसे पूछना चाह रहा था की मुझे पटना शहर कैसे दिखाई दे रहा है, लेकिन इस कारण चुप रहा की पता नहीं तुम इस बात पे कैसे रीऐक्ट करोगी.
मैं सड़क के दूसरी तरफ देखने लगा..और मुझे वहाँ पटना की बड़ी जानी-पहचानी तस्वीर दिख रही थी, मुझे वहाँ से तुम्हारा मोहल्ला दिख रहा था, तुम्हारा घर और तुम्हारी गली के सामने वाला साइकिल-दूकान.मैं लगातर उधर ही देख रहा था की इधर से अचानक तुम गायब हो गयी.मैं परेसान हो गया की तुम गयी कहाँ?सड़क के उस तरफ या इस तरफ?
पीछे पलटा तो एक अपार्ट्मन्ट दिखाई दिया, जो मुझे बहुत जाना पहचाना सा लगा.लेकिन फिर तुरत ये ख्याल आया की ये अपार्ट्मन्ट इधर कैसे?इसे तो सड़क के दूसरी तरफ होना चाहिए..खैर, मैं उस अपार्ट्मन्ट की तरफ बढ़ा..सब कुछ बड़ा जाना पहचाना सा लगा...वही गेट, वही सीढियां...मैंने देखा की उस अपार्ट्मन्ट की पहली मंजिल पे चार फ़्लैट थे..और तीन में बड़े बड़े ताले लगे हुए थे.एक फ़्लैट खुला हुआ था, दरवाज़ा आधा खुला हुआ था और अंदर से बेसन के हलुए की सोंधी खुशबु आ रही थी.मैं जैसे ही दरवाज़े के पास पहुंचा तो मुझे कुछ आवाजें सुनाई देने लगी...आवाजें साफ़ नहीं थी, लेकिन मैं फिर भी आवाजों को पहचान पा रहा था.मैं दरवाज़े पे दो पल खड़ा रहा, सोच ही रहा था की दरवाज़ा खोल के अंदर जाऊं या न जाऊं, की उतने में तुमने आकार दरवाज़ा खोल दिया.
मैं एकदम हैरान तुम्हे देखने लगा.

मैं फिर तुमसे पूछना चाह रहा था की तुम एकाएक यहाँ कैसे आ गयी, लेकिन मैं तुमसे पूछ नहीं पा रहा था.मुझे ऐसा लगा की जैसे मैं चाह के भी कुछ कह नहीं पा रहा हूँ.एक पल के लिए मुझे भ्रम हुआ की मेरी आवाज़ हमेशा के लिए चली गयी है.
तुम मुझे वहीँ..उसी कन्फ्यूज अवस्था में खड़ा छोड़ फिर से रसोई में चली गयी और मैं कमरे को देखने लगा.वो कमरा बहुत जाना पहचाना सा दिख रहा था..वहाँ मेरी बहुत सी चीज़ें दिखाई दे रही थी और मैं इस बात पे भी हैरान था की वो सब चीज़ें यहाँ कैसे पहुंची और ये कमरा किसका है?मेरा दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था और मैं वहाँ लगे सोफे पे बैठ गया(वो सोफा भी बिलकुल वैसा ही था जो मेरे घर में है).मुझे हलकी नींद आने लगी, मैं वहीँ सोफे पे सो गया.

कुछ देर के बाद एक आवाज़ से मेरी नींद खुली...

मैंने देखा सामने मेरा दोस्त मुराद खड़ा है, और वो मुझे उठा रहा है -"अबे उठ जा, चाय पिएगा?बनाते हैं".

मैं आँखें फाड़ फाड़ के उसे देख रहा था, वो मेरे इस बर्ताव को देख कहने लगा, भाई, मैं ही हूँ...कोई भूत नहीं हूँ, हुआ क्या तुझे?". मुझे एकाएक ख्याल आया की मैं हैदराबाद में मुराद के फ़्लैट पे हूँ, और मैं सपना देख रहा था...मैं तुम्हे सपने में देख रहा था..
मैं फिर हताश सा उठ के बैठ गया...यकीन जानो, जब मुराद की आवाज़ से मेरी नींद खुली तो मेरी साँसे सही में बहुत तेज चल रही थी और मुराद भी थोडा चिंतित सा हो गया था.


| मेरे इस शहर की एक शाम, जो तुम्हारे नाम थी |
ये तो रही सपनो की बात.कितनी बार तो ये भी किया है मैंने की रात को सोने के ठीक पहले उन बातों को सोचने लगता हूँ..उन जगहों के बारे में सोचने लगता हूँ जहाँ मैं तुम्हे कभी ले जाना चाहता था. मैं तुम्हे वो शहर घुमाना चाहता था, जहाँ से मैंने पढाई की..और चाहता था की हम दोनों शाम में देर तक उन पेड़ों के नीचे बैठे रहे, जहाँ मैं अपने दोस्तों के साथ अक्सर बैठा करता था.देर रात तक हम दोनों उसी दीवाल पे बैठ के गप्पें करें जिस दीवाल पे बैठ के अपने दोस्त को तुम्हारे किस्से सुनाता था.मैं तुम्हे उस साइबर कैफे में भी ले जाना चाहता था जो उस समय उस शहर का एकमात्र साइबर कैफे था, जहाँ से तुमसे हर वीकेंड चैट पे बात होती थी..मैं चाहता था की तुम्हे मैं उस रेस्टुरेंट में ले जाऊं, जहाँ मैंने अपने दोस्तों को तुम्हारे जन्मदिन की पहली पार्टी दी थी.मैं चाहता था तुम उस शहर से जुड़ी मेरी हर बात को देखो और जानो.

मेरी ये बेतुकी ख्वाहिश पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में घुस के बैठ गयी..जब मेरी जिंदगी के सबसे बुरे दिन चल रहे थे तो मैं अक्सर सोचता था, की अगर कभी हम एक हो गए तो मैं तुम्हे उन सब जगहों पे घुमाने ले जाऊँगा.मैं तुम्हे अपना ये शहर भी दिखाना चाहता था जहाँ मैं अभी रह रहा हूँ(जहाँ से बस कुछ ही घंटों में मैं विदा भी हो जाऊँगा).मैं तुम्हे इस शहर में वो सब जगहें दिखाना चाहता था जो तुम्हे कभी कोई भी ट्रैवेल गाईड नहीं दिखा पायेगा.मैं तुम्हारा शहर भी घूमना चाहता था, तुम्हारे साथ.मैं चाहता था की तुम्हारे साथ मैं उन सब जगहों पे जाऊं जहाँ की बातें तुम अक्सर करती थी.तुम्हारे उस शहर में जाने के पहले वो मेरे लिए विदेश का एक अनजान, खूबसूरत सा शहर था.लेकिन जैसे जैसे तुम उस शहर से मेरी पहचान कराते गयी तो मुझे ऐसा लगने लगा की वो शहर मेरा भी उतना ही है जितना तुम्हारा और कभी अगर मैं उस शहर गया तो बिना किसी की मदद लिए मैं पूरा शाहर आराम से घूम सकता हूँ..

सच पूछो तो कभी कभी मुझे ऐसा लगता है की उस शहर का अस्तित्व सिर्फ तुमसे है.जब भी उस शहर का कोई जिक्र करता है या फिर कहीं उस शहर से जुड़ी कोई खबर पढता हूँ तो बस एक सिर्फ तुम्हारा ही ख्याल ज़हन में आता है.ये भी तय है की कुछ समय बात तुम वहाँ से हमेशा के लिए कहीं और चली जाओगी, लेकिन फिर भी मेरे लिए उस शहर से तुम्हारा नाम हमेशा जुड़ा रहेगा.

.....
मुझे दिल से उसने पूजा
उसे जाँ से मैने चाहा
इसी हमराही मेँ आखिर
कहीँ आ गया दोराहा

फिर इक ऐसी शाम आई
कि वो शाम आखिरी थी
कोई जलजला सा आया
कोई बर्क सी गिरी थी

अजब आँधियाँ चली फिर
कि बिखर गए दिलो-जाँ
न कहीँ गुले-वफा था
न चरागे-अहदो-पैमाँ

[अहमद फराज़]

13 comments:

  1. आधे घंटे में अगर इतनी बड़ी पोस्ट टाईप कर के पोस्ट कर दी गई हो तो गलतियाँ स्वाभाविक है होंगी ही...तो Please kindly ignore :)

    ReplyDelete
  2. क्या?? गलतियाँ या पोस्ट??
    गलतियाँ दिखती नहीं जब पोस्ट इग्नोर करने लायक न हो तो?? :)
    बेंगलुरु से आख़िरी पोस्ट??? \:(

    ReplyDelete
  3. अपने रिक्स पर तो हम कुछ भी कर जाते हैं. ये चुनौती देकर पोस्ट पढवाना ठीक बात नहीं है. अभिषेक बाबु :)

    ReplyDelete
  4. अरे क्या है...जाते जाते भी धमाल ..वैसे वो शुरू वाला शेर भी तुम्हारा है ??? गज़ब है.एकदम क़त्ल टाइप.(स्वप्निल से साभार :))

    ReplyDelete
  5. शिखा दीदी..
    नाम मुझे लिख देना चाहिए था..फराज़ साहब का लिखा हुआ है..मेरा नहीं...ऐसे शेर मैं नहीं लिख सकता! :)

    ReplyDelete
  6. sapne illogical bhale hon, par sapne hain tabhi to zindagi hai:)

    pyari si chitthi...
    aisi chitthiyan likhi jaati rahein!

    ReplyDelete
  7. अभि, बहुत अच्छी पोस्ट है...

    ReplyDelete
  8. bahut pyaari chittthi hai :)
    abhi sapno ki wajah se bhi hum kabhi wo paa lete hain jiske paane ki koi aasaar na ho aur sapne hume unse bhi mila deta hai jinse milne ki ummeed door door tak na ho

    ReplyDelete
  9. ....जल्दी ही मिलती हूँ फ़िर से ....अबकि तुम्हारे सो कॉल्ड -- नये शहर में ....हैप्पी जर्नी...

    ReplyDelete
  10. तुम्हारे अहसास में डूब कर किन नजरों को भला गलती दिखेगी...?

    ReplyDelete
  11. क्या लिखूँ इस पर...? कई बार कुछ बातें सिर्फ महसूस की जा सकती है, उनमे डूबा जा सकता है...पर उनका जो असर होता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है...|
    इस समय यही स्थिति है मेरी...| बस एक शब्द समझ आ रहा...अप्रतिम...|

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया